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Saturday, November 3, 2012

इरोम चानू शर्मिला : 12 साल का अनशन.


भारतीय संविधान की एक धारा के तहत किसी भी व्यक्ति को एक साल से ज़्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता. तो एक साल पूरा होते ही इरोम चानू शर्मिला को रिहा कर दिया जाता है और पुनः गिरफ्तार कर लिया जाता है. शर्मिला कैद से छूटने के बाद एक टेंट में रहती हैं, ये टेंट उनके साथी आन्दोलनकारियों का ठिकाना है कुछ दिन यहाँ रहने के बाद उन्हें वापस जेल भेज दिया जाता है.  पढ़ने में ये ज़रा मज़ाक जैसा लग रहा है न ? पर ये चाहे जितना भी मज़ाकिया लगे, है आज का एक क्रूर सच, जो लोकतंत्र के नाम पर पिछले 12 साल से लगातार किया जा रहा है. जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का एक वार्ड मूक गवाह है इस बात का कि कैसे इरोम चानू शर्मीला को पिछले 12 सालों से नाक के द्वारा जबरन खाने के नाम पर तरल पदार्थ पेट में किसी तरह पहुँचाया जाता है. ज्ञातव्य हो कि ये वही देश है जहाँ गांधीजी के अनशन के किस्से एक गौरवगाथा की तरह बच्चों को “रटाये” जातें हैं और व्यावहारिक धरातल पर भारतीय सेनाएं लगभग हर रोज़ महिलाओं के बलात्कार, हत्या और उत्पीडन में मस्त है. याद कीजिये वर्ष 2004 में मनोरमा देवी के बलात्कार और हत्या के विरोध में महिलाओं का इम्फाल के सेना मुख्यालय पर Indian Army Rape Us के बैनर के तले सारे कपड़े स्वं ही उतार कर किया गया प्रदर्शन. ये किसी भी तरह के लोकतंत्र के लिए शर्मनाक वाकया है.
मणिपुर जिन हालातों से गुज़र रहा है उसकी एक झलक मनोरमा देवी की माँ के इस बयान में देखी जा सकती है 10-11 जुलाई की रात को आसाम राइफल्स के लगभग सात-आठ जवान उनके घर में जबरन घुसे और उनमें से एक अधिकारी उसके ऊपर बन्दूक तानते हुए सुश्री मनोरमा के बारे में पूछने लगा. उसी समय मनोरमा अपने कमरे से बाहर आई. आसाम रायफल के आदमी उसपर झपट पड़े और उसे बरामदे की तरफ़ ले गए. वो लोग उसे बुरी तरह पीटने लगे. मैं बस उसकी घुटती हुई आवाज़ सुन पा रही थी. कुछ समय बाद, अधिकारी मनोरमा को घर के पीछे ले गए. मनोरमा अपने बाएं हाथ से अपने फनेक ( मणिपुरी महिलाओं का पारंपरिक वस्त्र ) को कस के पकड़े थी. उसकी कमीज़ खुली हुई थी. फिर एक अधिकारी ने गिरफ़्तारी का मेमो बनाया और अंगूठे का निशान लगवा लिया. अगली सुबह मनोरमा देवी की लाश पाई गई और डाक्टरों को मनोरमा देवी के अन्तः वस्त्रों पर वीर्य की मौजूदगी के अलावा उनके गुप्तांगों सहित शरीर पर एक दर्जन से ज़्यादा गोलियों के निशान मिले. यह मात्र एक उदाहरण है. पूर्वोत्तर के राज्यों, कश्मीर, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में ऐसे किस्से आजकल आम हो गए है.     
कवयित्री, नागरिक अधिकार व राजनीतिक कार्यकर्त्ता इरोम चानू शर्मिला का जन्म 14 मार्च 1972 को हुआ और आज से ठीक 12 साल पहले यानि 4 नवंबर 2000 को  इरोम चानू शर्मिला ने सशत्रबल विशेषाधिकार अधिनियम,1958 ( आफ्स्पा ) के विरुद्ध अपना अनशन शुरू किया था. यह अधिनियम अलगाववाद से निपटने के नाम पर दरअसल स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का आयोजन, आज़ादी से घूमने-फिरने, व्यवसाय करने, मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध सुरक्षा, धर्म की स्वतंत्रता आदि नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इरोम चानू शर्मिला उस वक्त महज 28 साल की थीं. विशेषाधिकार अधिनियम अर्थात एक ऐसा कानून जो सेना को यह अधिकार देती है कि वो मात्र संदेह की आधार पर बिना किसी वारंट के कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है या ज़रूरत पडने पर गोली चला सकती है. यह अधिनियम राज्यपाल को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह स्व विवेक के आधार पर पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित कर दे. यह एक तरह से आपातकालीन स्थिति लागू करने जैसा ही है. यह कानून पहली बार असम और मणिपुर में लागू किया गया जिसे 1972 में संशोधित कर उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में लागू कर दिया गया. ये राज्य हैं – असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड.
बात 2 नवंबर 2000 की है. इरोम चानू शर्मिला एक शांति रैली की तैयारी में लगी थी कि सैनिक बलों ने मालोम के बस स्टैंड पर अंधाधुंध गोलीबारी की जिसमें करीब 10 बेगुनाह लोगों की मृत्यु हो गई. मरनेवालों में 62 वर्षीय महिला लेसंग्बम इबेतोमी समेत 18 वर्षीय राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चंद्रमणि का नाम भी शामिल था. इरोम चानू शर्मीला इस घटना से काफी व्यथित हुईं और उन्होंनें अनशन करने की ठान ली. अनशन करना हिंसा के दायरे में आता है या नहीं यह एक जटिल सवाल है पर इतना तो सच माना ही जा सकता है कि यह एक नैतिक युद्ध है जिसमें अलग से किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं होता. भूख हड़ताल के तीसरे ही दिन सरकार ने इनपर आत्महत्या करने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया. वो दिन और आज का दिन, इरोम चानू शर्मीला इसी आरोप के तहत आज भी कैद हैं. इसे लोकतंत्र रूपी नाटक का एक क्रूर अंक नहीं तो और क्या माना जाय. किसे नहीं पता कि सेना अपने विशेषाधिकारों का कितना सही और कितना गलत प्रयोग कर रही है. जिन भी राज्यों में ये कानून लागू हैं वहाँ के बाशिंदे क्या दोयम दर्ज़े के नागरिक नहीं बना दिए गए हैं ? ये कैसा लोकतंत्र है जिसे चलाये रखने के लिए शांतिप्रिय प्रतिरोध को भी कैद करके रखना पड़ता है, अब आप खुद ही सोचिये हिंसक प्रतिरोध की क्या दशा होती होगी. सन 2005 से शर्मिला पर मणिपुर राज्य द्वारा अतिरिक्त प्रतिबन्ध लगाये गए हैं. इसके तहत बिना पूर्व इजाज़त के किसी को भी इनसे मिलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है.
शासकवर्ग अपना काम निर्विरोध और सुचारुपूर्वक चलाने के लिए समाज के अंदर तरह-तरह के प्रतिमान गढ़ता रहता है. वो इस कोशिश में निरंतर लगा रहता है. जैसे अंग्रेजों ने भारतीयों के बीच ये धारणा स्थापित करने की कोशिश की कि तुम्हारा धर्म महान है. तुम अपने धर्म के अनुसार पारलौकिक जीवन की चिन्ता करो, हम तो हैं हीं तुम्हारे लौकिक जीवन की चिंता करनेवाले. क्या वर्तमान शासकों ने गांधीवाद को कुछ ऐसा ही नहीं बना दिया है. शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता अपनाओ. लोकतंत्र में इसकी जगह है. धरना, अनशन करो और हमें आराम से अपना काम करने दो. जनता से सत्य और अहिंसा के मार्ग की आशा करनेवाले देश के हुक्मरान खुद इस मार्ग को कितना आत्मसात करतें हैं ? गांधी को राष्ट्रपिता का दर्ज़ा देने वाला देश खुद उनके आदर्शों का कितना पालन करता है ? ये सब अपने आपमें एक अलग विमर्श का विषय तो है लेकिन अपने मूलभूत ज़रूरतों के लिए अनशन करो तो सरकार किसी भी रास्ते जबरन खाना ठूसकर जेल में डाल देती है, हिंसा करो तो आतंकवादी कहके गोली से उड़ाती है. ये है आज की लोकतान्त्रिक सरकार और उसपे तुर्रा ये कि इसे जनता की चुनी सरकार होने का गौरव भी प्राप्त है. वैसे शांतिपूर्ण विरोध से क्या किसी के कान पर जूं भी रेंगता है अब ?
इरोम चानू शर्मिला आत्महत्या की कोशिश करनेवाली एक स्त्री का नाम नहीं बल्कि स्वतंत्रता और आज़ादी से जीने के लिए हक और अधिकार की मांग करती हुई एक हौसलामंद स्त्री का नाम है जो समता का दिखावा करनेवाले इस लोकतंत्र पर एक मौन तमाचा है जिसकी आवाज़ आज भले ही हुक्मरानों को न सुनाई दे पर गूंज सदियों तक सुनाई देगी. आज इरोम चानू शर्मिला केवल एक नाम नहीं बल्कि इंसाफ पसंद नागरिकों के लिए एक प्रतीक बन चुकीं हैं. अंत में भगत सिंह याद आ रहें हैं, जिन्होंने कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की ज़रूरत होती है.

4 comments:

  1. आत्मा को झकझोर कर जगाने वाला आलेख लिखा है पुंज भैया ! ...

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  2. kaha chiipe hai media vaale jo iac kii ek chhek par camera lekar pahuchh jaate hai
    aur vaastvik jan sangharsh ko nahi dikhana chahate hai

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  4. natmastk hu shrmila ji ke samne..... aur dukh hota he ki hum issssss... bharat ka hissa he...

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