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Wednesday, May 10, 2017

सफलता का रहस्य और सुकरात

एक विचित्र बात देखने को मिल रही है आजकल। नौजवान तबका जो कि कठोर श्रम और अपने बिंदासपने के लिए जगत प्रसिद्ध है बहुत जल्द ही निराश हो जा रहा है और कभी यह तो कभी वह के चक्कर में पड़कर अपना कीमती और बहुमूल्य समय बर्बाद कर दे रहा है। सफलता और असफलता को लेकर या तो जल्दबाज़ी का शिकार है या फिर सफलता का गूढ़ सूत्र से पूरी तरह अनभिज्ञ। यदि इंसान किसी चीज़ में असफल होते हैं इसका मतलब यह होता है कि उसने उस चीज़ में सफल होने के लिए उतना शिद्दत, ज़िद्द और सही दिशा में मेहनत नहीं दिखलाया जितने की ज़रूरत थी। सफलता-असफलता कई बार स्थितियों-परिस्थितियों पर निर्भर तो करती है लेकिन इसके ज़्यादातर ज़िम्मेदार हम खुद होते हैं, ना कि कोई दूसरा। सफलता-असफलता के सूत्र हमारे अंदर हैं, कहीं बाहर नहीं। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिन्होंने अपने जुनून से पहाड़ों का सीना चाक कर दिया है। आखिर गया के गहलौत गांव के दशरथ मांझी के पास वो क्या बात थी जिन्होंने अकेले पहाड़ काटके रास्ता बना दिया। कबीर कहते हैं -
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात के सील पर पड़त निशान
अर्थात् अभ्यास करते करते मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान हो सकता है जैसे कुएं में बार-बार रस्सी के आने-जाने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। इस संदर्भ में सुकरात से जुड़ी एक कथा याद आ रही है।
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है? सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल नदी के किनारे मिलो। वो लड़का अगले दिन नदी के किनारे सुकरात से मिला। फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा। वे दोनों नदी में आगे बढ़ने लगे और जब आगे बढ़ते बढ़ते पानी गले तक पहुंच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़ के पानी में डुबो दिया। लड़का पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे पानी में तबतक डुबोए रखा जबतक कि वो लड़का नीला नहीं पड़ गया। फिर सुकरात ने उसका सिर पानी से निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो काम जो काम उस लड़के ने सबसे पहले किया, वो था हांफते-हांफते तेज़ी से सांस लेना।
थोड़ा सामान्य होकर लड़के ने क्रोधित होकर सुकरात से पूछा - आप क्या मुझे मार डालना चाहते थे?
सुकरात ने शांत स्वर में पूछा - जब तुम पानी के भीतर थे तब तुम सबसे ज़्यादा क्या चाहते थे?
लड़के ने उत्तर दिया - सांस लेना।
सुकरात ने कहा - यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना कि तुम सांस लेना चाहते थे, तो वो तुम्हें मिल जाएगी। इसके अलावा इसे पाने का कोई रहस्य नहीं है।
पाब्लो कुइलो ने भी अपने विश्व प्रसिद्द उपन्यास अल्केमिस्ट में यह पंक्ति बार बार दुहराते हैं - किसी चीज़ को तुम दिल से चाहो तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की जिद्द ठान लेती है। इस लाइन को शाहरुख खान की एक हिंदी फिल्म ने भी खूब इस्तेमाल किया बिना पाब्लो को आभार बोले हुए।
सो निराश होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हर असफलता के भीतर सफलता के सूत्र छिपे होते हैं बस ज़रूरत है उसे पहचानने और सही व सार्थक दिशा में सतत प्रयत्न करते रहने की।
#सुकरात के किस्से के लिए साभार #प्रभात #ख़बर

Sunday, May 7, 2017

नाची से बाँची : ज़िन्दगी नश्वर है, कला अमर।

5 मई को रांची के आर्यभट्ट सभागार में पद्मश्री डॉ राम दयाल मुंडा के कार्यों एवं जीवन पर आधारित फिल्म "नाची से बाँची" नामक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का प्रीमियर देखने का अवसर प्राप्त हुआ। जिस प्रकार पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ था वह अद्भुत था। भीड़ इतनी ज्यादा हो गई कि सभागार के बाहर एक अलग स्क्रीन की व्यवस्था की गई। मेघनाथ दा और उनकी टीम के दो साल के मेहनत का प्रमाण था यह फ़िल्म। अब दर्शकों का यह उत्साह रामदयाल मुंडा के प्रति था, मेघनाथ दा और बीजू टोप्पो के प्रति इस बात से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता बल्कि मूल बात यह है कि एक डाक्युमेंट्री फ़िल्म को देखने के लिए हज़ार के ऊपर लोग पहुंचे थे।
रामदयाल मुंडा झारखंड के शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में आदर से याद किए जाने वाले व्यक्तिव हैं जो आदिवासी जीवन शैली और आदिवासियों के हक़ की पुरज़ोर वकालत करते हैं। मुंडाजी ऊपर से थोपी जा रही विकास के उस अवधारणा के कट्टर विरोधी थे जो स्थानीय निवासियों को उनके जल, जंगल और ज़मीन से बेदखल कर उजाड़ दे और उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर करे। विकास एक अंदरूनी प्रक्रिया है जो कि सामाजिक ज़रूरत से पैदा होती है। बाहर से थोपा गया विकास लुभावना होने के साथ ही साथ सामंती, औपनिवेशिक और पूंजीवाद का पोषक है जिसके चंगुल में फंसकर स्थानीय लोग दर दर की ठोकरें खाने और विरोध करने पर आतंकवादी या नक्सल करार देकर राजकीय हिंसा का शिकार होने को अभिशप्त हुए हैं। वैसे भी आदिवासी समाज स्वयं में खुश और संतुष्ट रहने का प्रेमी है, उसको जल, जंगल और ज़मीन के अलावा और कुछ नहीं चाहिए। उनपर विकास का मध्यवर्गीय और पूंजीवादी मॉडल थोपना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं कि आदिवासी लोग बड़ी बेहतरीन ज़िन्दगी जी रहे हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए बल्कि यह है कि उनके लिए विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो ना केवल उनकी संस्कृति को प्राकृतिक प्रवाह प्रदान करे बल्कि उनके जीवन शैली (जो कि प्रकृति के ज़्यादा करीब है) को और ज़्यादा कुशल और प्राकृतिक बनाए। धोती-साड़ी हटाकर विदेशी जीन्स थोप देने को विकास मानना मूर्खता है।
प्रसिद्द फ़िल्मकार सत्यजीत राय ने रवींद्रनाथ के ऊपर एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी कुछ ऐसा ही प्रयास और स्नेह मेघनाथ दा का रामदयाल मुंडा के प्रति रहा है। मुंडा जी के ऊपर डाक्युमेंट्री फ़िल्म बनाना मेघनाथ दा के एक गुरु के प्रति एक सच्चे दोस्त शिष्य का समर्पण जैसा ही कुछ है। मुंडाजी एक विशाल व्यक्तित्व के स्वामी थे, उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को 70 मिनट की डाक्यूमेंट्री में समेटना एक दुरूह कार्य है। वैसे भी जीवनी परक कार्य एक ऐसा जाला है जिसका एक छोर पकड़ो तो कई छोर पकड़ना बाकी रह जाता है। मेघनाथ दा और बीजू कितना सफल और कितना असफल हुए हैं यह तो कोई वैसा  जानकार व्यक्ति ही बता सकता है जो रामदयाल मुंडा के जीवन और कार्यों से भली-भांति परिचित हो।
लेकिन तत्काल इतना तो कहा ही जा सकता कि यह दुनियां तथाकथित मुख्यधारा के शोर में इतना संलग्न है कि उसके इंद्रियों तक रामदयाल मुंडा जैसे व्यक्तित्वों की गूंज पहुंची ही नहीं है, यदि इस डाक्युमेंट्री को देखने के बाद मुंडाजी के बारे में जानने-समझने की ललक ही पैदा हो जाय तो इस फ़िल्म को सार्थक माना जाना चाहिए।
रामदयाल मुंडा "अखरा" प्रेमी एक ऐसे व्यक्ति थे जो काम या पढ़ाई के वक्त भी मांदल और ढोल लेकर जाने को प्रेरित करते थे ताकि जब काम करते हुए या पढ़ाई करते हुए मन ऊबने लगे तो इन पर थाप मारकर और इनकी धुनों पर पैर थिरकाकर तरोताज़ा हो फिर से काम में लग जाएं। मुंडाजी चिंतक होने के साथ ही साथ खुद भी एक अच्छे गायक, वादक और नर्तक थे। उन्होंने आदिवासी संस्कृति का न केवल पुरज़ोर अध्ययन किया बल्कि उसपर कई किताबें भी लिखी। मुंडाजी का कथन था "जे नाची उहे बाँची (जो नाचेगा वही बचेगा)" से प्रभावित होकर इस फ़िल्म का शीर्षक रखा गया है। नाचने गाने का सीधा संबंध उत्साह, उमंग और अपनी संस्कृति से है और उत्साह, उमंग और संस्कृति बचेगी तभी समाज बचेगा, अपनी एक विशिष्ट पहचान के साथ क्योंकि संस्कृतियां मानव समाज की आत्मा हैं। तमाम किन्तु-परंतु के बावजूद विविधता इस देश की संस्कृति है और जो सबको एक ही रंग में रंग देने और एक ही संस्कृति को सब पर जबरन थोप देने को तत्पर हैं, दरअसल असली उग्रवादी व देशद्रोही वो ही लोग, विचार और पार्टी है, ना कि वे लोग जो अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं।
रामदयाल मुंडा मानवीय हितों के प्रबल समर्थक के रूप में विख्यात थे। इसके लिए उन्हें अपनी संस्कृति से लेकर उन सारे देसी-विदेशी नामों की शरण में जाने से कोई परहेज नहीं था जिनके पास मानव के हित में कोई भी ज्ञान हो।
सरल स्वभाव और व्यक्तित्व के मेघनाथ दा और बीजू दोनों पिछले लगभग ढाई-तीन दशक से डाक्युमेंट्री फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। इस दौरान इन्होंने गाड़ी लोहरदग्गा मेल, एक रोपा धान, गाँव छोडब नाहीं, development flows from the barrel of the Gun आदि नामक चर्चित और पुरस्कृत फिल्में बनाई हैं। कल जिस प्रकार रांची के निवासी इनकी नई फिल्म "नाची से बाची" देखने लोग उमड़ पड़े, यह इनकी सार्थकता का प्रमाण है।
डाक्युमेंट्री फ़िल्म इस देश में सहिए पर पड़ी एक विधा है जिसकी परवाह करनेवाले लोग बहुत कम हैं। लेकिन इस फ़िल्म के प्रति लोगों का उत्साह और समर्पण आशान्वित करती है और साथ ही यह भी कहती है कि थोड़ा प्रयास कलाकारों को करना है और थोड़ा समाज व सरकारों को। कलाकार लोगों तक पहुंचें, लोग कलाकार की कला तक टिकट खरीदकर पहुंचे और सरकारें व सरकारी संस्थानें कला को संरक्षण और प्रशिक्षण देने के लिए उचित रूप से फलने-फूलने का स्वस्थ्य वातावरण के निर्माण की ओर अग्रसर हो; इन बातों में ही सबकी सार्थकता है।
#नाची से #बाची
निर्देशक - Biju Toppo एवं Meghnath
निर्माता - फ़िल्म डिवीजन
अवधि - 70 मिनट
प्रस्तुति - अखरा
दिनांक - 5 मई 2017
स्थान -आर्यभट्ट हॉल, मोरबादी, रांची