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Sunday, October 1, 2017

चार्ली चैप्लिन : हास्य एक गंभीर विषय है।


टीवी से अमूमन दूर ही रहता हूँ लेकिन कभी-कभी तफ़रीह मार लेता हूँ। आज तफ़रीह के चक्कर में #Romedy_Now नामक चैनल पर गया तो देखा चार्ली चैप्लिन की फ़िल्म#The_Circus आ रही है। अब चार्ली की कोई फ़िल्म आ रही हो और उस पर से मेरी नज़र हट जाए, ऐसा तो आजतक हुआ नहीं। मुझे वो विश्व के इकलौते कलाकार लगते हैं जिन्होंने अभिनय, निर्देशन, पटकथा, निर्माण और संगीत में एक आदर्श स्थापित किया और दुनियां के तमाम अभिनेताओं को यह बताया कि देखो एक अभिनेता अपनी कला से क्या आदर्श रच सकता है। जब पूरी दुनियां विश्वयुद्ध के पागलपन में अंधी हुई पड़ी थी, हर ओर नफ़रत और साज़िश की बू थी, ठीक उसी वक्त एक कलाकार अपनी कला से दुनियां को प्रेम, स्नेह, त्याग के साथ हास्य-व्यंग्य का अमृत पिला रहा था। जब पूरी दुनियां हिटलर के आतंक से आतंकित थी और बड़े से बड़ा कलाकार या तो हिटलर की चापलूसी करने में व्यस्त थे या फिर बेदर्दी से मौत के घाट उतारे जा रहे थे ठीक उसी वक्त #The_Great_Dictator नामक फ़िल्म बनाकर पूरी दुनियां समेत ख़ुद हिटलर को यह एहसास करवाना कि देखो यह जो तुम दुनियां का मसीहा बनने की कोशिश कर रहे हो दरअसल तुम कितने फेक, फेंकू और हास्यास्पद हो, कोई माज़क नही है।
चार्ली की कला का मूल स्वर हास्य-व्यंग्य है। बहुतेरे लोग जिसमें कुछ पढ़े-लिखे महाज्ञानी भी हैं, हास्य-व्यंग्य को बड़ा ही कमतर आंकते हैं। कुछ तो भाव ही नहीं देते। शायद उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि हास्य-व्यंग्य एक गंभीर विषय होता है और व्यक्ति कभी भी हास्यास्पद होना पसंद नहीं करता। मौलियार अपने नाटकों में जब तथाकथित सभ्य लोगों को हास्यास्पद बनाते हैं, तो वो दरअसर शराफत के उस नकली परत को भेद रहे होते हैं जिसे ओढ़कर दोहरी मानसिकता में जीनेवाला समाज खुद को सुरक्षित, सुखी और संपन्न महसूस करता है। 
हमारे यहां बुद्धिजीवी तबका मुस्कुराने तक से परहेज़ करता है और दुनियां की ऐसी तैसी करते हुए किसी अंदरूनी बीमारी के मरीजों की तरह सड़ा हुआ चेहरा बनाए रखने में ही अपनी विद्वता समझता है। वहीं सामान्य जन की स्थिति यह है कि अवतारवाद के अफीम ने उन्हें ऐसे ग्रस्त लिया है कि वो कभी कोई लोड ही नहीं लेता। उसे तो हर बात में "मनोरंजन" चाहिए, घटिया या सतही ही सही। 
और हास्य-व्यंग्य की स्थिति यह कि हरिशंकर परसाई से ज़्यादा सम्मान और प्रतिष्ठा टीवी पर किसी छिछोरे शो के एंकर का है। अकबर-बीरबल, गोनू झा, तेनालीराम, देवेन मिसिर आदि के किस्सों का मर्म समझना आज भी रहस्य बना हुआ है। 
बहरहाल, #The_Circus एक प्रेम कहानी है। जहाँ प्रेम का अर्थ किसी व्यक्तिगत संपात्ति की तरह हीरो या हीरोइन को हासिल कर लेना भर नहीं है बल्कि यहां उसकी ख़ुशी ज़्यादा मायने रखती है जिसे आप प्यार करते हैं। हालांकि, अमूमन भारतीय सिनेमा, सीरियल और ग्रंथ जैसे-तैसे हीरो-हीरोइन को मिलवा या हासिल कर लेने का आदर्श ही स्थापित करते हैं, उसके लिए चाहे उसे कितनी भी हत्या करनी पड़े। पति या प्रेमी अमूमन अपनी पत्नियों या प्रेमिकाओं को व्यक्तिगत संपात्ति से ज़्यादा महत्व नहीं देते। शैलेन्द्र जब हिरामन और हीराबाई की स्नेह कथा तीसरी क़सम बनाते हैं और अंत में हीराबाई शारीरिक रूप में हिरामन से दूर चली जाती है तो वितरक उनसे अंत बदलने को कहते हैं ताकि फ़िल्म का तथाकथित सुखद अंत हो और वितरक इस सुखद अंत को अफीम की तरह दर्शकों में बांट या बेच सकें। जब शैलेंद्र ऐसा नहीं करते तो फ़िल्म ढंग से रिलीज़ तक नहीं होती। वैसे भी एक ऐसे समाज में जो प्रेम की पूजा तो करता है लेकिन व्यवहार में उसकी मानसिकता सामंती और प्रेम विरोधी हो, वहां नकली सुख की ही प्रधानता ज़्यादा होती है। वहां नकली सुख बेचे और खरीदे जाते हैं। 
ऐसी दुनियां में अभी से कई दशक पहले चार्ली चैप्लिन नामक यह कलाकार दुनियां के चेहरे पर मुस्कान लाते हुए सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ता है। इस पाठ को आज भी पढ़ना और समझना ज़रूरी है। ख़ासकर जब लोग नफ़रत की खेती और गलतबयानी करके बड़ी आसानी से अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। 
यह दुनियां नफ़रत और साजिशों की बदौलत नहीं बल्कि प्रेम, स्नेह और प्रकृति की वजह से ख़ूबसूरत है। इसे खूबसूरत बनाना ही मानव और मानवीय कला का एकमात्र उद्देश्य हो सकता है। 

Friday, June 30, 2017

हूल विद्रोह : भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम !

अमूमन इतिहासकार 1857 के सिपाही विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई मानते हैं लेकिन तथ्यों की पड़ताल करने पर कई अन्य विद्रोह भी सामने आते हैं जो सिपाही विद्रोह से पहले के हैं और इन विद्रोहों की भूमिका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ज़मीन तैयार करने में कमतर नहीं रही है। इन्हीं विद्रोहों में से एक विद्रोह है झारखण्ड का हूल विद्रोह जिसका नेतृत्व सीधो, कान्हू, चांद और भैरव ने किया था।
आदिवासी समाज स्वतंत्रता का पोषक रहा है। जल, जंगल और ज़मीन के साथ वो अपने तरीके से स्वतंत्र जीने में विश्वास करता है। हूल विद्रोह की पृष्टभूमि पर सरसरी निगाह डालें तो तथ्य कुछ यूं निकलकर सामने आते हैं – आदिवासियों ने यह महसूस किया कि उनकी आज़ादी के ऊपर लगाम लगाया जा रहा है। उन्हें मालगुज़ारी, बंधुआ मज़दूरी और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा था। ब्रिटिश राज में मालगुज़ारी नहीं देने पर आदिवासियों की ज़मीन नीलाम कर दी जाती थी। 30 जून 1855 को भोगनडीह नामक जगह में लगभग 28000 आदिवासियों की सभा हुई जिनमें संताल, पहाडिया व अन्य जनजातीय समुदाय के लोग शामिल हुए। इस सभा में सिदो को राजा, कान्हो को मंत्री, चांद को प्रशासक और भैरव को सेनापति नियुक्त करते हुए यह घोषणा की गई कि “अंग्रेज़ी राज गया और अपना राज कायम हुआ”। लोगों ने अंगेज़ी राज को मालगुज़ारी देना बंद किया और अंग्रेज़ी राज के खिलाफ़ अपने पारंपरिक हथियारों के साथ विद्रोह शुरू कर दिया। 11-13 जुलाई 1855 को अंग्रेज़ों ने इस विद्रोह को कुचल दिया। सिद्धो, कान्हू और भैरव महेशपुर के युद्ध में शहीद हो गए। इस क्रांति में लगभग 30,000 लोग शहीद हुए, इसमें कई लड़ाका महिलाएं भी थीं।
भारतीय इतिहास की किताबों में भले ही इस विद्रोह को सम्मानित स्थान प्राप्त नहीं है किन्तु झारखण्ड के आदिवासी आज भी अपने इस विद्रोह और उनके नायकों को अपने गीतों और संस्कृति में याद रखते हैं। सिद्धो, कान्हू, भैरव और चांद को लेकर आज भी ये अपने गीतों में बड़े ही आदर से याद करते हैं। स्थानीय निवासी आज भी अबुआ राज के इस संघर्ष को भूले नहीं हैं बल्कि उसे अपनी संस्कृति का अंग बना चुके हैं। आज इतिहासकार इन्हीं गीतों के माध्यम से इन वीरों की गाथा सुनते, लिखते और गुनते हैं। वैसे भी असली नायक वह है जो जन के दिलों में ज़िंदा रहे, वह नहीं जिन्हें व्यवस्था बार-बार जीवित करे और उनकी उपलब्धियों का रट्टा मरवाए।

किसी ने सच ही कहा है कि राजा-महाराजा, नेता-अभिनेता का इतिहास तो है लेकिन जनता और जननायकों का इतिहास अभी लिखा जाना बाकी है।