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Tuesday, January 22, 2013

कथादेश वाले हरिनारायण बाबू को मालूम हो कि ....


आज हरिनारायणजी सम्पादित और अर्चना वर्माजी द्वारा सहसम्पादित - साहित्य, संस्कृति और कथा का समग्र मासिक कथादेश का दिसम्बर 2012 का अंक मिला | पत्रिका में प्रकाशित सामग्री पर कोई विचार दूँगा तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होने लगेगा, तो रचना और रचनाकार पर बात नहीं करेंगें | पर इतना ज़रूर कहेंगें कि किसी एक व्यक्ति को किसी पत्रिका में लगातार एक ही विषय पर नहीं लिखना चाहिए | यह एक बोझ जैसा भी हो जाता है लिखनेवाले और पढ़नेवाले के लिए भी | पाठक किसी खास व्यक्ति के किसी खास विषय पर विचार बार-बार पढ़कर बोर भी होने लगता है | फिर ऐसे आलेखों में अमूमन एकपद्दो ( एक पद वाले ) राग का गायन भी होता है | कथादेश में ऐसा कॉलम है जिसे वर्षों से एक ही व्यक्ति लिखे जा रहा हैं, ये ‘छप ही जाऊंगा’ का अति-आत्मविश्वास भी बड़ा घातक होता है | सो ऐसी बातों पर पत्रिका के सम्पादक मंडल व स्वंय लेखक को भी लेखकीय ईमानदारी बरतते हुए विचार करते रहना चाहिए |  भले ही जीवन की मूलभूत समस्याएं आज भी मुंह बाये खड़ी है पर युग बदला है, बदलता है | चीज़ें सत्तर के दशक के मापदंडों से आगे बढ़ीं हैं | कई युवा लोग इस वजह से कथादेश में उस खास विषय पर अपने आलेख नहीं भेजते कि वहाँ तो फलां आदमी शालिग्राम की तरह स्थापित है | वहाँ किसी और के लिए जगह ही कहाँ है | एक तरफ़ आज कथादेश में कई कॉलम के लेखक फिक्स  हैं वहीं पुनर्प्रकाशन के दिन से आज तक सम्पादकीय नामक पन्ने की तलाश जारी है | वैसे रोज़ एक कहानी के साथ मंटो जैसा लेखक जब न्याय नहीं कर सका तो ..|
कथादेश का यह अंक पलटने पर ऐसा लगा जैसे जूठे बर्तन में ताज़ा खाना परोसा गया हो | इतना घटिया कागज़ कि इस पन्ने का मैटर उस पन्ने पर ऐसे झांक रहा है जैसे बादल से चाँद झांकता है और छपाई ऐसी कि ‘क’ फैलकर न जाने कब चुपके से ‘छ’ बन चुका है और ‘भ’ तथा ‘म’ में विषमता समाप्त हो कर इस प्रकार समता स्थापित हो गई है कि इसे फ़िल्मी अंदाज़ में दो जिस्म एक जान होना भी कह सकतें हैं  | पन्ने भारतीय सामंतवाद की तरह बेदर्दी से अकड़े ऐसे मुडे हैं कि अक्षर ने छपने की हिम्मत कहीं दिखाई है और कहीं आदाब बजाके ही निकल लिया | किसी–किसी पन्ने पर तो अक्षर खून टपकाते हुए प्रतीकों में तबदील हो चुकें हैं, वो तो शुक्र मानिये कि काले रंग की छपाई है वरना पुरी पत्रिका अक्षरों के लहू से लाले-लाल हो जाती | किसी-किसी पन्ने पर शब्दों के फेड इन, फेड आउट का खेल चल रहा है तो कहीं अक्षर डबल, ट्रिपल रोल निभा रहें हैं | तस्वीरों को तो ऐसे छापा गया है कि जिनकी भी तस्वीरें हैं वो खुद पहचानने से इनकार कर दे ! हो सकता है कि अपनी कुरूपता पर डर भी जाए |
सवाल यह है कि 25 रूपये मूल्य और केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की सहायता से प्रकाशित यह मासिक पत्रिका अपने पाठकों के साथ ऐसा क्यों कर रही है ! पाठकों के साथ ही नहीं बल्कि उन रचनाकारों के साथ भी जो अपना खून जलाकर रचना करते हैं, चाहे उन रचनाओं का स्तर जो भी हो | क्या पत्रिकाओं ने झोला छाप नेताओं की तरह सौंदर्य ( लुक ) को सामंतवाद का पर्याय मान लिया है | आखिर किस बात की कमी है कथादेश को ? पैसों की ? सूचना एवं प्रसार निदेशालय, ओएनजीसी और मध्यप्रदेश सरकार का पूरे पन्ने का रंगीन विज्ञापन भी क्या पत्रिका निकालने और पत्रिका से जुड़े लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो रहा ? अगर कोई प्रजातांत्रिक देश और देश का आवाम किसी साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक पत्रिका के चंद हज़ार प्रति भी प्रकशित करने का संसाधन नहीं देती तो लानत है और यदि तमाम संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद कोई स्तरहीनता और भद्देपन का शिकार है तो उतनी ही मात्रा में लानत यहाँ भी है |
हो सकता है कि यह एक संयोग मात्र हो कि मुझे जो प्रति मिली केवल उसकी ही हालत ऐसी हो ! पर ऐसी एकलौती कॉपी का भी बाज़ार में आना और किसी के पास 25 रुपये के एवज में पहुँचाना कैसे उचित हो सकता है ? वैसी कागज़ और छपाई में इस्तेमाल स्याही का जो स्तर है उससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अधिकतर प्रतियाँ कैसी होगीं |
एक ज़माना था कि हंस, कथादेश, वागर्थ, आजकल आदि साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़ाने-संग्रह करने का काम एक जूनून के तहत अंजाम दिया जाता था | जेब के खालीपन के बावजूद नए अंक का कौन कहे पुराने अंक तक पढ़े बिना दिल है कि मानता नहीं था | मित्रों में आपस में बंटवारा भी था कि किसे कौन सी पत्रिका खरीदनी है और सब बारी-बारी मिल बाँटके पढेंगें, कभी अकेले कभी सामूहिक | अच्छी रचनाओं को पढ़ना और दूसरे को पढ़ने के लिए प्रेरित करना भी आदत में शुमार था | चीज़ें नया ज्ञानोदय, तदभव, पहल सहित कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं तक पहुंची | फिर कुछ समयाभाव और कुछ पत्रिकाओं के स्तर का कमाल था कि ज़्यादातर मामला उलटने-पलटने तक ही सीमित हो गया | हां, कुछ अच्छा जैसा दिखता या कोई पढ़ने को कहता तो जैसे-तैसे समय निकालकर या रात की नींद हराम कर ज़रूर ही पढ़ लेता | यात्रा करते वक्त सुबह शाम बस, ऑटो और मेट्रो के धक्कों के बीच भी पढ़ाई चालू रहती | इसी दौरान कई ऐसी रचनाएं भी पढ़ने को मिली जिसके पढ़ते ही लेखक को फोन करके बधाई देने का मोह नहीं त्यागा जा सका | पर साहित्यिक कबाड़ ही ज़्यादा पढ़ने को मिला | एक तरफ़ जहाँ पत्रिकाओं की संख्या बढ़ रही है वहीं गुणवत्ता का आलम हवा-हवाई हो रहा है | ब्लॉग, वेब के वर्तमान दौर में ऐसा नहीं है कि अच्छा लिखनेवाले नहीं हैं, पर पत्रिका गुणवत्ता के आधार पर निष्पक्षता से चीज़ों का प्रकाशन करती हैं, ऐसा वही मानते हैं जो लगातार छपास सुख का आनंद ले रहें हैं !
गत दिनों हिंदी के अखबार पर कुछ आपत्ति ज़ाहिर की गयी तो किसी अखबारी लेखक ने फाटक से मोर्चा सँभालते हुए जवाब दिया हिंदुस्तान में अखबार पाठक के बदौलत नहीं, विज्ञापन के बदौलत चलता है, ये एक धंधा है समाज सेवा नहीं | तो साहित्यिक पत्रिकाओं का आलम भी क्या कुछ ऐसा ही है ? ये पत्रिकाएं आज भी जहाँ दिखे उलट-पलट लेना और मौका देखकर खरीद लेना आदत में शुमार है | बिहार तो बदनाम है ऐसे कारनामों के लिए | यह जूनून भी है और आशिकी भी, पर इतनी ईमानदारी तो बरतो सनम कि मैं तुम्हें और तुम मुझे बे-शर्त प्यार कर सको |
पुनश्च – मालूम हो कि यह एक विनम्र शिकायत है, आलोचना नहीं | जल्दी से स्वस्थ हो जाओ | Get well soon.

12 comments:

  1. तमाम बातों से सहमत होते हुए यह जरूर जानना चाहेंगे कि इस पत्रिका में शालिग्राम की तरह कौन स्थापित है? जब इतनी लंबी-चौड़ी शिकायत की गई, विज्ञापनदाताओं के नाम दिए गए हैं, हरीनारायन और अर्चना वर्मा तक आपकी लेखनी से सुशोभित हैं तो उस शालिग्राम के नामोच्चारण में ऐसी परदादारी क्यों?

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    1. सहमति के लिए आभार विभा जी, आपका अनुरोध मानने में समस्या ये है बात व्यक्ति पर होने लगेगा फिर, यहाँ प्रवृति पर ध्यान केंद्रित करना ज़रुरी है. हरिनारायण और अर्चना जी का नाम इसलिए है क्योंकि ये पत्रिका के पदाधिकारीगण हैं जिनसे उम्मीद है कि इन शिकायतों पर ध्यान देंगें. वैसे पिछले कुछ अंक पलट लीजिए, पत्रिका के "शालिग्राम" के दर्शन अपने-आप ही हो जायेंगें. :)

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    2. डायरी वाले प्रिय भाई पुंज प्रकाश जी से सूचनार्थ निवेदन है कि उनकी शिकायत दर्ज कर ली गयी है और कारवाई शिकायत मिलने के पहले ही की जा चुकी है। जनवरी अंक से प्रिण्टिंग प्रेस बदल दिया गया है और उम्मीद है कि जनवरी अंक से छपाई सफ़ाई से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। उन्होंने पूछा है कि कथादेश को कमी किस बात की है। ज्ञात हो कि संसाधन की। अकेले हरिनारायण जी ही लगभग पीर बावर्ची भिश्‍ती खर की सारी भूमिकाएँ एक साथ निबाहते हैँ जिनमें से पीर (शायद) वाली भूमिका में अर्चना वर्मा उनका हाथ बँटाती है।
      समग्र मासिक होने के प्रयास में कथादेश को कुछ नियमित स्तंभों की, इसलिये समय पर डिलीवर करने वाले कुछ भरोसेमंद नियमित स्तंभकारों की ज़रूरत रहती है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल न समझें कि वहाँ कोई "यह आम रास्ता नहीं है" या "अन्दर आना मना है" की तख्ती लगी है। आम रास्ते पर हर किसी का स्वागत है और चुन लिया जाने पर अन्दर आने के लिये भी। हमारी समझ या चुनाव मेँ "चूक" से आपकी रुचि का इत्तेफ़ाक न बैठे तो वह बात अलग है। चाहे जिस भी स्तंभ के लिये कोई नियमित स्तंभकार के बावजूद सामग्री भेजना चाहे, स्वागत है।
      अर्चना वर्मा

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    3. आभार अर्चना जी, शिकायत पढ़ने और शिकायत से पहले करवाई करने के लिए, आज ही कथादेश का जनवरी अंक देखा. कागज़ और छपाई की शिकायत दूर हो गई. आपकी इस घोषणा से कि "कोई नियमित स्तंभकार के बावजूद सामग्री भेजना चाहे, स्वागत है।" आशा है जल्द ही कथादेश को कुछ नए लेखकों के आलेख प्राप्त होंगें, हम सब कथादेश को स्नेह करनेवाले ये आशा करतें हैं कि संसाधन की कमी भी जल्द से जल्द दूर हो जाए और आलेखों, स्तंभों, कथा-कहानियों में स्तरीयता बरकरार रहे इसी आशा के साथ एक बार पुनः आभार.

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  2. अतः ऑनलाइन पत्रिकाएं - जैसे कि रचनाकार.ऑर्ग पढ़ें. हर किस्म की रचना और हर किस्म के रचनाकार. अनंत, असीमित. हर एक के लिए स्पेस. और, निःशुल्क.
    जमाना अब ऑनलाइन पत्रिकाओं का ही है, यह मान लें. काश कथादेश (और उसी तरह की तमाम अन्य साहित्यिक पत्रिकाएँ) भी ऑनलाइन हो पाता.

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    1. रवि जी, प्रार्थना है की ऑनलाइन पत्रिका (या फिर किसी भी अन्य ऑनलाइन चीज) को हर समस्या का समाधान न बताएं. कागज पर छपे शब्द का अर्थ है, और रहेगा (जैसे फिल्म के ज़माने में भी नाटक मारा नहीं है, अवस्था कोई भी हो). ऑनलाइन की अपनी महत्ता है, लेकिन कोई भी चीज एक सम्पूर्ण विकल्प नहीं हो सकती.

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  3. कुछ दिनों से मंड्ली का लेख पढ रहा हुं। अच्छा लगा यह जानकर की आप की मंडली रंगमंच की हर पह्लु पर अपनी पैनी नजर रखे हुये है।

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  4. इतनी बेबाकी से अपनी बात आपने कथादेश के साथ-साथ तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं तक पहुंचाकर तमाम दबे-दुबके साहित्य प्रेमियों की सामूहिक पाती ही सार्वजनिक कर दी ....धन्यवाद आपको।

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