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Monday, December 2, 2013

गोदान में पांच किलो प्याज़ !

प्याज़ की कसम खाके विश्वास दिलाता हूं कि किसी बाबा के भक्तों या नेता के चमचों की तरह झूठ नहीं बोलूंगा. वैसे भी बड़े-बुजुर्गों का कहना था कि अन्न-जल की कसम खाकर कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए. शायद इसीलिए पुराने लोग खाते वक्त चुप रहते थे. आप चाहे तो पुरातनपंथी कह सकते हैं किन्तु खानेवाले चीज़ और वो भी प्याज़ की कसम खाके झूठ नहीं बोलूंगा. वैसे भी प्याज़ की कीमत आसमान छूकर खाने वालों का जिस प्रकार मुंह चिढ़ा रहीं हैं, आनेवाले दिनों में हो सकता है कि प्याज़ की कसम खाना भी इतना महंगा पड़े कि हिम्मत जवाब दे दे. वैसे आज के युग में ज़रूरत से ज़्यादा सत्यवादी लोग बेचारे कहलाते हैं और तत्काल मेरा मन बेचारा कहलाने का नहीं है.
जबसे कीमतें बढ़ी हैं तमाम मध्यवर्गीय परिवारों की तरह हमने भी तय किया कि बिना प्याज़ के खाना बनाएगें. कुछ दिनों तक यह सिलसिला चला भी. पर क्या करें जीभ जो न कराए. स्वाद कम हिंसक चीज़ नहीं है ! प्रतिष्ठा में प्राण गंवाने का कोई तुक नहीं है सो आखिरकार एक दिन किलो भर बड़े-बड़े प्याज़ ले आए. खरीदते वक्त सोना खरीदने जैसी खुशी मिल रही थी, जैसे कोई अनमोल खजाना हाथ लग रहा था. घर आके लगा कि कहीं छुपा के रखा जाय. चोर घर में आएगा तो सबसे पहले प्याज़ ही चुराएगा.
इन दिनों हमारे शहर में चोरियां बढ़ गई हैं, लोग या तो खुद जागकर पहरा दे रहें हैं या फिर किसी आदमी को नियुक्त कर रहे हैं जो रात भर सिटी बजाकर और डंडे पीटकर “शरीफों” को चैन की नींद सुलाता है. यह हाल पुरे देश का है. हां, देश के सन्दर्भ में अब यह फर्क करना मुश्किल हो गया है कि कौन पहरेदार है और कौन चोर ! वैसे, ‘शरीफों’ की नींद आज भी वैसे ही कायम है.
नींद बड़ी प्यारी चीज़ है. स्वस्थ रहने और सपने देखने के लिए सोना बहुत ज़रुरी है. हो सकता है कि सपनों में आप पचास किलो प्याज़ के मालिक हों, प्याज़ के कोट पहने हों, जूते, टोपी, टाई सब प्याज़ के हों और किसी प्याजू अप्सरा के साथ एक शानदार प्याजू होटल में, प्याज़ की पकौड़ी का आनंद तब तक ले रहे हों जब तक यथार्थ की कड़वी सच्चाई आपके सपनों का मुंह न नोच ले.  
प्याज़, नींद, सपने और यथार्थ के साथ दादाजी की भी बात करते हैं. दादाजी जो एक किसान हैं, मंझोले किसान. ओह हैं नहीं थे. वो थे  और प्याज़ की भी खेती करते थे. प्याज़ की फसल जैसे ही खेत में तैयार होती उसे खरीदनेवाले व्यापारी घूमने और कीमत लगाने लगते थे. दादाजी पूरे घर में मचान बनाकर प्याज़ रखते. दादीजी और बुआजी का काम होता हर ओ-चार दिन में मचान पर चढ़कर प्याज को पलटना और सड़े हुए प्याज़ को निकालना. रोज़ व्यापारी दरवाज़े पर दस्तक देकर रेट बता जाता. दो-चार दिन और रखके देखते हैं, शायद दाम ज़रा और बढ़े – ऐसा पूरा गांव सोचता और रोज़ ढेर सारा प्याज़ कूड़े के ढेर में फेंका जाता. खेत से उखड़ते वक्त प्याज़ जिस दाम पर बिकता है उसे बता दूं तो उन नेताओं के चेहरों पर कालिख पुत जायेगी जो ये कहते हैं कि प्याज़ की कीमत बढ़ने से किसानों को फ़ायदा हो रहा है.
नेता चाहे जैसा भी हो चुकी वह चुनाव नामक जादुई और पहेलीनुमा प्रक्रिया को पार करके जनप्रतिनिधि का मुकुट पहनता है और जिसे लोकतंत्र का पर्याय माना जाता है. इसलिए इनके बारे में कुछ बोलने का कोई अर्थ ही नहीं बनता है. वे बोलें जो इन्हें चुनकर पुष्ट प्याज़ की तरह सीना फुलाकर घूमते हैं कि मेरा प्याज़ (नेता) जीत गया. और जश्न शांत पड़ते ही फिर कुढ़ते हुए कि हमने किस सड़े ‘प्याज़’ को चुन लिया, अगले चुनाव का इंतज़ार करते रहते हैं.
अलग-अलग रूप-रंग के बारह प्याजों के बीच मुकाबला है, इनमें से एक प्याज़ के चयन का हक़ प्रजातंत्र में प्रजा का नैतिक अधिकार है. उसे प्रतिनधि तय करने का अधिकार नहीं क्योंकि इसमें पार्टियों का आरक्षण है. पार्टियां प्यादों को खड़ा करती हैं और जनता उन्हें वोट देकर हराती-जिताती हैं. यह जादुई प्रक्रिया किसी सस्ते लाइन होटल के मिक्स वेज की तरह है, जिसमें कौन-कौन और कैसी-कैसी चीज़ पड़ी है “छोटू” के अलावे कोई नहीं जानता. होटलवाले को पता है कि खानेवाले को बस मज़ा आना चाहिए. जो होटल मज़ा देता है वहां खरीदारों की कतार लग जाती है और छोटू इन कतारों में खड़े “शरीफों” को मुस्कुराता हुआ पच से गुटखे की पीक सड़क पर थूकता है. वैसे जब प्याज़ में आग लगी है लोग होटलों में खाना कम प्याज़ ज़्यादा खाने लगे हैं. कुछ होटलवालों ने प्याज़ की जगह सेव का सलाद देना शुरू कर दिया है वहीं कुछ होटलों ने अपने मुख्य द्वार पर एक बोर्ड टंगवा दिया है जिस पर लिखा है कि यहां पांच सौ रूपये के खाने के साथ प्याज़ का सलाद भी मिलाता है.
प्याज़ और राजनीति में बहुत सारी समानताएं हैं. मसलन – दोनों के कई परतें होतीं हैं, दोनों के उपरी और अंदरूनी रंग में फर्क होता है, दोनों जैसे होते हैं वैसे दिखते नहीं, दोनों के परत दर परत निकालते जाने पर अनतः कुछ हासिल नहीं होता, दोनों एक खास मौसम में फलते-फूलते हैं पर मुनाफ़ा कमाने के लिए सालों भर सहेजकर रखे जाते हैं, दोनों जब लगाए जाते हैं तो हरियाली से भरपूर होते हैं पर जैसे-जैसे पकते हैं हरियाली सुखाने लगती है, दोनों को जमीन से उखाड़कर गोदाम में रखा जाता है और दोनों अपने पैदा करनेवालों के बजाय दूसरों को मुनाफ़ा देते हैं. सबसे ज़रुरी और अहम् बात यह कि दोनों ही अनतः इंसान को रुलाते हैं.
राजनीति में परिवार, चमचा-चमचीवाद और चिकन, मटन व सब्ज़ी में प्याज़ की उपयोगिता जायका बढ़ाती है. यह भी सच है कि प्याज़ की राजनीति भी होती है और राजनीतिक प्याज़ भी होता है.
दुनियां की महाशक्ति वाले देश में बच्चों से पूछा गया कि दूध कहां से आता है. बच्चों ने जवाब दिया दूध वाली मशीन से. इसलिए जो लोग प्याज़ नामक वस्तु, फल, जड़ से नावाकिफ हैं उनके लिए यह बता देना ज़रुरी है कि यह एक ऐसी चीज़ है जो अमूमन खेतों में उगाया जाता है और बाज़ार में बेचा जाता है. इसमें कई परत होते हैं और इसे बहुत दिनों तक साधारण वातावरण के नहीं रखा जा सकता है. इसके लिए अनुकूल वातावरण बनाना होता है. जो लोग भी अनुकूल वातावरण बनाकर प्याज़ को सहेजते हैं और मुनाफ़ा कमाते हैं उन्हें अमूमन जमाखोर कहा जाता है. जो एक संकीर्ण सोच माना जाना चाहिए. वे जमाखोर नहीं समाजसेवक हैं. क्योंकि वो इंसान के जीभ और जायका की सेवा के लिए दिन रात चिंतित हैं, कई बेरोजगारों को रोज़गार देते हैं और सरकारी व गैर-सरकारी तंत्रों को “वेतन” पहुंचाते रहते हैं. ये वेतन न दें तो सरकारी कारकून पता नहीं कबके सर्वहार हों गए होते. इस एवज में ज़रा सा मुनाफ़ा कमाना इनका नैतिक अधिकार बनता है. कम से कम ये सरकारी गोदामों की तरह अनाज को सड़ाते तो नहीं हैं. स्वाद के दीवानों को खुले दिल से इनकी तारीफ़ और धन्यवाद ज्ञापन करना चाहिए और इनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए.
सरकारी गोदामों की जो हालत है ये गैर-सरकारी जमाखोर न हों तो हमारे देश में साल में कुछ महीने ही प्याज़ के दर्शन हों. वैसे यह एक बहस का विषय है कि प्याज़ जड़ है, फल है, सब्ज़ी है या राजनीति. क्योंकि आजकल राजनीति की भी फसल बोई. उगाई और काटी जाती है ! यह एक सदाबहार फसल है जो हर मौसम, हर स्थान, हर दल बोता, सहेजता और काटता है.
वैसे डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती कीमतों के मद्देनज़र प्याज़ की बढ़ती कीमतों से गर्व होना चाहिए कि कुछ तो है हमारे पास जो डॉलर का मुकाबला कर सकता है ! हमारा तंत्र ज़रा सी मेहनत और करें तो हम बहुत जल्द प्याज़ की बदौलत डॉलर को औकात बता सकते हैं और शान से कह सकते हैं कि हिम्मत है तो डॉलर से रोज़ाना सौ किलो प्याज़ खरीदके दिखाओ ! अमेरिकी राष्ट्रपति की हेंकड़ी झट न निकल जाए तो कहना !  
दुनियां में इंसान, इंसान में इंसानियत और किचन में प्याज़ अब खगोलशास्त्रियों के अध्ययन का विषय होना चाहिए क्योंकि अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में वाइरस का प्रकोप आजकल कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है. राजनीतिशास्त्र का सीपियो तो न जाने कब से चोर बाज़ार में धूल खा रहा है. एक से एक समाजवादी, साम्यवादी, दलितवादी, आदिवासीवादी, मनुवादी, इस्लामवादी, चर्चवादी, बुद्धिवादी इंजिनियर लगे पर मामले को सुलझाने के बजाय तारों को इतना ज़्यादा उलझा दिया कि इस सीपियो को ठीक करने से ज़्यादा बेहतर लगता है कि नया ही लगा लिया जाय. लेकिन नए के लिए अभी कोई तैयार नहीं. बुजुर्गों का कथन है कि ज़्यादा प्याज़ नहीं खाना चाहिए. इससे कोई भी समझ सकता है कि नया खिलाड़ी है.  
हम चीज़ें फेकते नहीं सहेज कर रखते हैं. न जाने कब कौन सी चीज़ कब काम आ जाए. इसीलिए हर घर में एक कबाड़ की जगह होती है. राजनीति का सीपियो भी इसी कबाड़ में कहीं पड़ा है !
लो प्याज़ पर बात करते-करते पता नहीं क्या-क्या बक गया. मूल मुद्दे से भटका देना भी एक शानदार कला है, जिसे नहीं आता उसे ज़रूर ही सिखाना चाहिए. वैसे यह विश्वास करना ज़रा मुश्किल है कि यह कला किसी को नहीं भी आता होगा ! हमारे यहाँ तो यह कला बचपन से ही रगों में डाल दिया जाता है. ये पोलियो के नाम पर जो ‘दो बूंद ज़िंदगी की’ पिलाई जाती है उसमें दरअसल पानी के साथ मुद्दे भटकानेवाले वाइरस ही पिलाया जाता है, विश्वास नहीं तो फोरेंसिक जांच करा लें !
एक हैं पोलियोग्रस्त बाबा खुरपेंची. जब ये बच्चे थे तो पोलियो की दावा नहीं पी पाए, सो उम्र कोई मायने नहीं रखता का सिद्धांत मानते हुए बुढ़ापे में पोलियो की एक पूरी खुराक खाने के बाद कहते हैं – “प्याज़ और लोकतंत्र एक मध्यवर्गीय समस्या है. सर्वहारा तमाम चीज़ों के बावजूद जन्मजात क्रांतिकारी होता है और क्रांतिकारियों लोग पेट भरने के लिए खाते हैं स्वाद के लिए नहीं, स्वाद के लिए खाना एक सामंतवादी प्रवृति हैं जिसका विरोध हर क्रांतिकारी को करना चाहिए. स्वाद व्यक्तिवाद का पोषक है. एक क्रांतिकारी समाज में व्यक्तिगत स्वाद की कोई जगह नहीं होती. बुर्जुआ और उच्चवर्ग को न प्याज़ की समस्या से मतलब है ना ही लोकतंत्र की समस्या से.” बोलते-बोलते बाबा खुरपेंची अन्तर्ध्यान हो जाते हैं. भक्त लोग कहते हैं कि बाबा चाइना चले गए माओवाद का ककहरा रटने. बाबा पहले रूस जाते थे - वाया जर्मनी, अब चाइना जाते हैं - वाया नेपाल. इधर  कदम के पेड़ के नीचे खादी का झोला और झोले के अंदर भारतीय संविधान की पुस्तक पर सर रखे एक ऊंघता हुआ आजनबाहू महात्मा सपना देख रहा है कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है और तमाम विकसित देश अपने-अपने फाईटर प्लेनों से पुरी दुनियां पर बमों की जगह प्याज़ बरसा रहें हैं और पूरी दुनिया के लोग अपने साड़ी, लुंगी, गमछों, मच्छरदानी में प्याज़ लूट रहें हैं ! महात्मा झट से चांद पर बैठ जाते हैं और धरती को निहारने लगते हैं जो लाल-लाल प्याजों से पटी पड़ी है. वहां से इंसान नहीं प्याज़ ही प्याज़ दिख रहे हैं.
ओह, दादाजी की कथा तो रह ही गई. विस्तार से क्या बताएं. एक साल जम के प्याज़ उपजा. कोई ढंग का खरीदार न मिला. क़र्ज़ के बोझ तले दबे दादाजी ने सारी फसल सड़क पर डाल दी और खुद अंधे कुएं में कूद गए. इस अंधे कुएं की उम्र और लोकतंत्र की उम्र एक है. भरोसा नहीं तो कुएं पर अंकित इसके उद्घाटन की तारीख आप खुद ही देख लें. 
अंत में एक बात और, चुकी सरकारी मुआवज़ा मिल चुका था इसलिए दादाजी का श्राद्ध बड़े-धूम धाम से किया गया. गोदान में पंडितजी ने बछिया लेने से मना कर दिया, बोले ई सब लेके क्या होगा, गोदान में यदि कुछ देना ही है तो पांच किलो प्याज़ दे दो !  

2 comments:

  1. दीपक सिन्हा theater activist03 December, 2013 15:59

    क्या खूब /वाकई एक चाय तो प्याज के साथ बनती ही है /.क्यों पुंज

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    1. हा हा हा चाय तक तो ठीक है. प्याज़ खाने के लिए ग्रांट लेना पड़ेगा.

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