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Wednesday, March 23, 2016

हिंदी रंगमंच : अब खैनी, गुटखा और पान के लिए भी मिलेगा सांस्कृतिक अनुदान !!!

अंतराष्ट्रीय हिंदी रंगमंच दिवस, होलीपुर। अंतराष्ट्रीय हिंदी रंगमंच दिवस के अवसर पर जम्बो देश के होलीपुर नामक कुख्यात स्थान पर महिला वस्त्र धारी बाबा कामदेव की अध्यक्षता में विश्वभर के हिंदी रंगकर्मी, नाट्यलोचक, दर्शक आदि-इत्यादि बिना दारु, भांग, खैनी, गुटखा, गांजा आदि के इक्कठा हुए। हालांकि इन पावन वस्तुओं के आभाव में उन्हें एकाग्रचित होने में तनिक कठिनाई का सामना करना पड़ा, रात के आठ बजते ही कुछ रंगकर्मी और नाट्यलोचक लोग तो इन पावन और पवित्र वस्तुओं के आभाव में बेहोशी और मिर्गी का शिकार होते भी पाए गए। एक प्रख्यात नाट्यलोचक ने तो इन वस्तुओं के आभाव में पुरे आयोजन को ही कूड़ा बता दिया। उन्होंने रंगकर्मियों पर नाट्यलोचकों का हक़ छीन लेने का आरोप लगते हुए निम्न बातें कहीं - "हिंदी रंगमंच दरअसल नाट्य - आलोचना और नाट्यलोचक विरोधी रंगमंच है। एक तो पहले से ही यहां नाट्यलोचक और आलोचना की हालत खराब है ऊपर से कभी-कभी मुफ़्त में मिल जानेवाली पावन पेय "मदिरा" व अन्य पुजनीय वस्तुओं का भी निषेध करने की साजिश की गई है। जो लोग भी इस घिनौने कृत्य में शामिल हैं उन्हें दरअसल भारतीय नाट्य परम्परा का ज्ञान ही नहीं है। वो दरअसल भारतीय संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। देशद्रोही हैं - सब के सब। ऐसे लोगों यथाशीघ्र ही रंगमंच क्या उस देश की परिधि से बाहर फेंक देना चाहिए।" अपनी बात समाप्त करते हुए इन्होंने साढ़े सात बार "भारत माता की जय" का जयकारा भी लगाया और धरने पर बैठ गए। स्थिति को सामान्य करने के लिए अन्तः बाबा कामदेव के आदेश पर इन नाट्यलोचकों के लिए चार-चार बून्द अल्कोहल का प्रबंध किया गया। नाट्यलोचक ने होमियोपैथिक दावा की तरह इस चार बून्द अल्कोहल का दो पैग बनाकर नमक और सत्तू की गोली के साथ गले के नीचे उतारा और स्वदेशी बीड़ी के सुट्टे मारे तब जाकर उनकी जान में जान आई और फिर उन्होंने सारे हिंदी रंगकर्मियों को "देशप्रेमी कलाकार" का सर्टिफिकेट दिया। ड्राई डे के दिन मदिरा का प्रबंध करनेवाले एक चालीस वर्षीय युवा रंगकर्मियों का नाम तो उन्होंने शहनाई खां युवा पुरस्कार के लिए उसी वक्त प्रस्तावित कर दिया है और यदि कोई अन्य इनकी भक्ति में इससे ज़्यादा लीन न हुआ तो यह पुरस्कार इन युवा रंगकर्मी को ही मिलेगा।
समारोह का उद्घाटन करते हुए एक केंद्रीय सह-राज्य मंत्री ने बिना फेंकते हुए कहा कि "उनकी सरकार की योजना कला (काला नहीं) संस्कृति नामक परजीवी पौधा को पुरज़ोर खाद - पानी देने की है। इसके लिए हर शहर, गाँव, कस्बा में मुफ्तखोरी का इंतज़ाम किया जाएगा। इस योजना के तहत कमीशन खाकर विभिन्न प्रकार का अनुदान तो मिलेगा ही, साथ ही साथ हर जगह बहुत सारा प्रेक्षागृह भी खोला जाएगा, जिसमें शादी - ब्याह से लेकर मुंडन - छेदन तक की बुकिंग की जाएगी। लोग चाहें तो नैतिक-अनैतिक सुहागरात की बुकिंग भी कर सकते हैं। इन आयोजनों के बाद भी यदि प्रेक्षागृह खाली पड़े रहे तो वह नाटक - नौटंकी करनेवाले भांड - मिरासियों को भी सम्मानित तरीके से लगभग मुफ़्त में उपलब्ध करा दिया जाएगा। इस कार्य को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए इस देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय के सबसे बेईमान चपरासी को समीति का चेयरमैन बनाया गया है क्योंकि उसकी मूँछ मिलीमीटर से नापने पर फ़िल्म शराबी के नत्थूलाल जी की मूँछो से ज़्यादा बड़ी पाई गई है।
मंत्रीजी की युक्त घोषणा को सुनने के पश्चात् कुछ चम्पक और अतिक्रान्तिकारी और महामूर्ख टाइप के रंगकर्मियों को छोड़कर बाकी सबलोग ग्रांट की फ़ाइल भरने और उसे स्पीड पोस्ट करने और हॉल की बुकिंग में व्यस्त देखे गए हैं। कुछ ने तो चट मंगनी पट ब्याह के तर्ज़ पर नाटक के मंचन की योजना भी बना डाली है। वहीँ कुछ वरिष्ठ रंगकर्मियों ने मांग की है कि कला और कलाकारों के लिए इतने ही अनुदान मात्र से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार कलाकारों को मदिरा, चखना और धूम्रपान के लिए भी ग्रांट दे, जिससे कि कलाकारों को इसके जुगाड़ के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़े। कुछ रंगकर्मियों ने हर नाट्यगृह में ग्रीनरूम, टॉयलेट के साथ ही साथ एक ऐसा कमरा भी बनाने का प्रस्ताव दिया है जहाँ बैठकर आराम से मांस, मदिरा और धूम्रपान आदि किया जा सके। वहीँ बिहार के कुछ रंगकर्मियों ने विशेष राज्य का दर्जा माँगते हुए मदिरा के साथ ही साथ खैनी, गुटखा और पान पर भी अनुदान देने की मांग रखी है। बिहार के रंगकर्मियों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को अनसुना किया गया तो वो सरकार को ही बिहार और बिहारी विरोधी घोषित करके दर्शकों के सामने विरोध स्वरुप "अच्छे नाटक" करने लगेगें। बिहार के रंगकर्मियों की अगुआई कोई एक व्यक्ति नहीं कर रहा था क्योंकि बिहार महापुरुषों की भूमि है और यहाँ हर कोई जन्मजात महापुरुष होता है और महापुरुषों की ख़ासियत यह होती है कि वो किसी को भी अपना नेता नहीं मानते बल्कि अपना नेता वो स्वयं होते हैं। इसलिए बिहार में जनता का कॉंसेप्ट सम्राट अशोक के समय ही खत्म हो गया है। अब यहाँ सब नेता हैं, जनता कोई नहीं।
वहीँ सभागार में उपस्थित कुछ नाट्यप्रेमी दर्शकों ने हिंदी नाटक देखने के लिए भी अनुदान देने की बात कही है। उनका तर्क यह है कि हिंदी के अमूमन नाटक इतने उच्च कोटि के घटिया, उबाऊ और रटंत विद्या के होते हैं कि उसे बिना अनुदान के झेल पाना संभव ही नहीं। वहीँ नाट्यप्रेमी गुलाबी लाल चौहान ने प्रेक्षागृह के सीटों को आरामदायक बनाने और नाटक के पश्चात् नाटक करनेवाले दल की और से दारु के साथ भोज-भात का इंतज़ाम करने की भी मांग की है ताकि नाट्यप्रेमी आराम से पूरा नाटक देखें और चैन से खा-पीकर झूमते हुए अपने - अपने घर को जाएं।
देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय के दरबान से सभा को संबोधित करते हुए कहा कि नाट्य विद्यालय ने प्रतिभा के आधार पर विद्यार्थियों का चयन करना अब बंद कर दिया है। क्योंकि जो प्रतिभावान हैं उन्हें कोई सिखाए, न सिखाए - वो तो अपनी मेहनत और लगन से सीख ही जाएगें किन्तु जो प्रतिभा के धनी नहीं हैं अब विद्यालय उनका साथ देगी क्योंकि कमज़ोर का साथ देना ही सच्ची देशभक्ति है।
उन्होंने तमाम कमज़ोरों से निवेदन किया कि चुकी प्रतियोगिता काफी कड़ी है और कमज़ोरों की संख्या ज़्यादा व सीटें कम इसलिए कमज़ोर विद्यार्थी विद्यालय में प्रवेश पाने हेतू हर प्रकार के तिकड़म अपनाएं। यह तिकड़म किस - किस प्रकार के हो सकते हैं उसे सिखाने के लिए इन्होंने "नाट्य विद्यालय प्रवेश तिकड़म संघ" की स्थापना करने बात कही जिसमें वरिष्ट तिकड़मबाज़ रंगकर्मी लोग नियमित क्लास लेकर कनिष्ठों को तिकड़म के पैंतरे कानूनी रूप से सिखाएगें। कुछ कनिष्ठ रंगकर्मी तो मक्खन भरे ड्रम के साथ अपने वरिष्ठों की आराधना में लीन भी देखे गए।
नाट्य विद्यालय के इस घोषणा के साथ ही पुरे देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है। इस फैसले का स्वागत करते हुए युवा रंगकर्मी और रंगचिंतक चम्पक कुमार ने कहा कि "यह एक अति-लोकतान्त्रिक और क्रांतिकारी फैसला है। आजतक लोग तिकड़मबाजी और मक्खनबाजी को गन्दी नज़र से देखते थे लेकिन अब यही कानून होगा। वैसे भी कला के क्षेत्र में ईमानदारी एक महामारी है। एक कलाकार को तभी तक ईमानदारी की बीन बजानी चाहिए जब तक उसे बेईमानी का मौका न मिले। कलाकारिता झूठ और सच से परे का पेशा है इसलिए कलाकार ईमानदारी और नैतिक ज़िम्मेदारी नामक रोग से जितनी जल्दी मुक्त हो जाए कला के लिए उतना ही अच्छा है।"
महिलावादी निर्देशक व नाट्याधेता मुद्रा कुमारी ने सरकार के सामने यह भी मांग रखी कि महिला कलाकारों के लिए अलग से कॉस्मेटिक ग्रांट की व्यवस्था की जाय ताकि अभिनेत्रियों मंच पर सुन्दर और हॉट दिख सकें, न कि कुपोषित और उपेक्षित। उन्होंने महिला रंगकर्मियों को रिहर्सल यात्रा भत्ता, आई लाइनर भत्ता और लिपस्टिक व रूज़ भत्ता भी देने की मांग की।
वहीँ देश के कुछ प्रतिष्ठित नाट्य परिकल्पकों और निर्देशकों से सरकार मांग की है कि उन्हें फ्री लेपटॉप और वाईफाई की सुविधा प्रदान की जाय ताकि वो अपने नाटकों की विभिन्न प्रकार की परिकल्पना (मसलन - लाइट, साउंड, कास्ट्यूम, पोस्टर आदि) इंटरनेट की दुनियां से प्रभावित, चोरी या नक़ल करके आसानी से करें। वैसे भी चोरी कोई ग़लत बात नहीं है बल्कि बड़े - बड़े महापुरुष (महा केवल पुरुष होते हैं स्त्रियां नहीं!) कह गए हैं - नक़ल के लिए भी अक़ल चाहिए। वैसे भी हमारे देश में चोरी की पुरानी परम्परा है और जो चीज़ परम्परा में हो उसे संस्कृति कहते हैं। तात्पर्य यह कि नक़ल या चोरी हमारी संस्कृति है और कलाकार वैसे भी संस्कृति का अगुआ होता है। वर्तमान समय में हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं इसलिए आज ज़रूरत है कि चोर पुराण को पुनर्जीवित और प्रतिष्ठित किया जाय।
इस महासभा का समापन विश्व-कुख्यात नाट्य-चिंतक चखना दादा ने किया। इस अवसर पर समापन भाषण देते हुए उन्होंने उपरोक्त सारी मांगों का समर्थन करते हुए यह भी कहा कि यह एक भ्रम है कि रंगमंच एक गंभीर और समाज को दिशा प्रदान करने वाला पेशा है। बल्कि सच यह है कि रंगमंच झूठ को सच और सच को झूठ साबित करनेवाला एक ऐसा पेशा है जहाँ जो जितना बड़ा बेईमान है वह दरअसल उतना ही बड़ा महान है। लोकतान्त्रिक कार्य प्रणाली को रंगमंच विरोधी करार देते हुए उन्होंने सामंतवाद को ही रंगमंच का सच्चा साथी बताया क्योंकि यदि नाट्य समूह लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से संचालित होने लगे और सबको बराबर का हक़ और "माल" में बराबर का हिस्सा मिलने लगा तो तमाम मठ और मठाधीश दिवालिया हो जाएगें। यह न केवल रंगमंच के लिए घातक है बल्कि समाज के लिए भी। समाज और कला दोनों को सुचारू रूप से कार्यरत रहने के लिए वर्णाश्रम का सही - सही पालन होना एक अनिवार्य शर्त है। यही भारतीयता है और भारतीय संस्कृति भी। जो कला या समाज अपनी संस्कृति से कट जाए उसकी हालात धोबी के उस कुत्ते के जैसी होती है, जो न घर का होता है न घाट का।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए स्वर्गीय रंगकर्मी चम्मच प्रसाद ने विश्व भर के संस्कृतिकर्मियों का आह्वान करते हुए कहा कि नैतिक ज़िम्मेवारी के नाम का माला जपके संस्कृतिकर्मियों ने अपना कबाड़ बना लिया है। जब पूरा विश्व पूंजीवादी संस्कृति का उपासक बन खाने पीने और खिलाने में मस्त है, ऐसे समय में नैतिकता और आदर्शवाद एक मज़ाक से ज़्यादा और कुछ नहीं है। भूख से बिलबिलाते समय में अपनी रोटी, मटन और दारु की चिंता करना ही असल जनवाद है। क्योंकि दूसरे की चिंता करने के लिए अपना पेट भरा होना आज की एक अनिवार्य ज़रूरत है। इसके लिए अनुदान क्या, ज़रूरत पड़े तो उधार, चोरी, डैकैती - सब चलेगा।
जनवादी संस्कृति का नाश हो और जुगाड़ू संस्कृति ज़िंदाबाद के नारे के साथ अन्तः सबने जमकर स्वदेसी पीया और मुर्गा पुलाव का सेवन के पश्चात् विश्व बंधुत्व का नारा बुलंद किया। कार्यक्रम की समाप्ति "नाथुनिए पे गोली मारे, सैयां हमार हो" नामक भक्ति संगीत से हुआ।
आयोजन में नाटककार नामक अवांछित तत्व का प्रवेश वर्जित था।
- फेसबुकिया क्रांति के लिए यह रिपोर्ट भकचोन्हर प्रकाश ने बनाई है। *Happy Holi - बुरा न मानो होली है?

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