Pages

Monday, June 6, 2016

नाट्य - संस्कृति

दुनियां में रहो ग़मज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ करके चलो जाके बहुत याद रहो। - मीर तकी मीर

एक ऐसे देश में जहाँ कोस-कोस पर पानी और वाणी बदल जाती है, जहां भिन्न - भिन्न प्रकार के धर्म, समुदाय, वर्ग, जाति, प्रजाति सदियों से विद्दमान है, वहां कोई भी सत्य सर्वमान्य हो ही नहीं सकता। कला - संस्कृति के परिवेश में तो यह बात और भी प्रखरता से लागू होती है। जब समाज का सत्य एक नहीं तो कला का सत्य एक कैसे हो सकता है? फिर कला, संस्कृति और समाज एक दूसरे की संगिनी हो न हो किन्तु एक दूसरे के पूरक तो अवश्य ही हैं। एक दूसरे से प्राण वायु ग्रहण करके ही यह न केवल अंकुरित होती हैं बल्कि पलती, फलती, फूलती और बढ़ती भी है। इसलिए कला का सत्य पहले स्थानीय होगा, तत्पश्चात वैश्विक। वैसे भी कोई भी कला स्थानीय हुए बिना वैश्विक हो ही नहीं सकती।
जहाँ तक सवाल नाट्य संस्कृति का हैं तो उसका जड़ तो समाज के अंदर ही होता है। नाट्य संस्कृति समाज से खाद, पानी और ऊर्जा लेकर ही अमूमन कलात्मक रूप धारण करके दर्शक समाज के सामने प्रस्तुत होती है। समाज में घटित घटनाएँ, विचार, संस्कार आदि न केवल इसके विषय वस्तु बनते हैं बल्कि कहीं परोक्ष तो कहीं प्रत्यक्ष रूप से नाट्यकला और उसकी विषय वस्तु को प्रभावित भी करते हैं। अतिशयोक्ति न होगी कि नाटक यथार्थ जगत की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्वरूपों, घटनाक्रमों और संवेदनाओं में यथार्थ और कल्पना की उचित मात्रा का सहारा लेकर चयनित एक कलात्मक अभिव्यक्ति है, जो केवल यथार्थ जगत तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि तमाम सामाजिक बंधनों को तोड़कर कलात्मक सौंदर्य के खुले आकाश में भी विचरण करता है। कला की दुनियां में ना कुछ वर्जित है और ना ही पूजनीय। न कोई राजा है न रंक। ना कोई स्त्री है न पुरुष। यहाँ कल्पना और यथार्थ दोनों ही का स्थान समान है। यह कल्पना से ज़्यादा काल्पनिक और यथार्थ से ज़्यादा यथार्थवादी सामाजिक वर्जनाओं के अतिक्रमण का एक ऐसा स्थान है जो न केवल यह बताता है कि क्या सही और क्या गलत है बल्कि यह भी जतलाने की हिमाकत करता है कि बहुतेरे सत्य सही – गलत के परे और प्राकृतिक व संवेदनात्मक भी है। प्रसिद्द नाट्य चिन्तक बर्तोल्त ब्रेख्त कहते हैं – “हमारे रंगमंच के लिए निहायत ज़रुरी है कि वह समझ से पैदा होनेवाले रोमांच को प्रोत्साहित करे और लोगों को यथार्थ में परिवर्तन करने से प्राप्त होनेवाले आनंद का प्रशिक्षण दे। हमारे प्रेक्षक सिर्फ यह नहीं सुनते रहें कि प्रोमेथियस को कैसे मुक्त किया गया, बल्कि वे स्वयं को भी मुक्त करने के आनंद का प्रशिक्षण दें। हमारे रंगमंच से उन्हें आविष्कारक तथा खोजकर्ता को अनुभव होनेवाले तमाम संतोष और सुख के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए; मुक्तिदाता द्वारा अनुभव की जानेवाली तमाम विजयों के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।”
कला का एक पांव धरातल पर होता है वहीं दूसरा कल्पना के असीम संभावनाओं में। इसीलिए तो कहा जाता है कि कलाकार बनने के लिए अनुभव को पकड़ना, उसे पर अधिकार करना, उसे स्मृति में रूपांतरित करना, और स्मृति को अभिव्यक्ति में, वस्तु को रूप में रूपांतरित करना आवश्यक है। एक कलाकार के लिए भावना और यथार्थ जगत ही सबकुछ नहीं है, उसके लिए निहायत ही ज़रूरी है कि वह अपने काम को जाने और उसमें आनंद ले; उन सारे नियमों को समझे, उन तमाम कौशलों, रूपों और परिपाटियों को समझे, जिसमें प्रकृति रूपी चंडिका को वश में किया जा सके और कला के अनुशासन के अंतर्गत लाया जा सके। वह आवेग जो कलाप्रेमी को ग्रस लेता है, सच्चे कलाकार की सेवा करता है। कलाकार उस आवेग रूपी वन्य पशु के हाथों क्षत - विक्षत नहीं होता, बल्कि उसे वश में करके पालतू बनाता है।
भारतीय सन्दर्भ में यदि नाट्यकला की बात करें तो ऐसे तो नाटकीय तत्वों की शुरुआत तो पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति के के साथ ही शुरू हो गया होगा किन्तु यदि हम नाटक के आज के स्वरूप की बात करें तो जिस पुस्तक की सबसे अधिक प्रतिष्ठा आज भी है उसे हम नाट्यशास्त्र के नाम से जानते हैं। विश्वासों और मान्यताओं को यदि छोड़ दिया जाय तो एतिहासिक रूप से नाट्यशास्त्र की रचना कब हुई इसके बारे में कोई प्रामाणिक और वैज्ञानिक जानकारी नहीं है, बल्कि अलग-अलग विद्वानों का मत अलग-अलग है। माना यह जाता है कि ईसा से 200 वर्ष पूर्व से 200 वर्ष पश्चात् तक इसकी रचना प्रक्रिया चली। मतभेद इस बात पर भी है कि इसे किसी एक व्यक्ति ने लिखा या अलग-अलग काल खण्डों में अन्य लोग इसमें अध्याय जोड़ते गए। हालांकि ऐसा दावा भी है कि भरतमुनि ईसा पूर्व 322 से लेकर 500 के बीच पैदा हुए, उनका जन्म भाद्र पूर्णिमा में काशी में ईसा पूर्व 463 में हुआ, काशी में ही उन्होंने नाट्यशास्त्र की रचना की, लेकिन इन सब मान्यताओं में विश्वास ज़्यादा है प्रमाणिकता कम।
नाट्यशास्त्र का अध्ययन करते व इसके रचना के कालखंड और बृहदता को मद्देनज़र रखते हुए ऐसा सहज ही विश्वास करना उचित प्रतीत नहीं होता कि इसकी रचना किसी एक व्यक्ति ने की होगी। विद्वानों का ऐसा मत भी है कि भरत किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पद का नाम है। किन्तु यदि हम यह मानकर चलते हैं कि नाट्यशास्त्र की रचना ब्रह्मा (देवता) ने की है तो फिर तर्क की गुंजाईश ही कहाँ है? क्योंकि धर्म के मामले में तर्क नहीं बल्कि विश्वास का साम्राज्य चलता है।
कला का उत्कृष्ट रूप है काव्य और उत्कृष्टतम रूप है नाटक। नाट्यशास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें काव्य, संगीत, नृत्य, शिल्प तथा तमाम ललित कलाओं का कोष है। इस अकेले ग्रंथ में नाट्य विषयक विवरण जितनी समग्रता के साथ प्रस्तुत हुआ है वह किसी भी अन्य भारतीय ग्रंथ में तो दुर्लभ है ही, संसार के किसी अन्य ग्रंथ में भी प्राप्त नहीं। प्राचीन काल में इसे नाट्यवेद नाम से भी जाना जाता था। वैसे नाट्यशास्त्र का अध्ययन करने पर यह बात भी साफ़-साफ़ पता चल जाता है कि यह नाटककला के माध्यम से पूजापाठ का शास्त्र भी है। कब, कहाँ, किस देवी-देवता की पूजा होनी चाहिए इसकी भी बृहद चर्चा इस शास्त्र में है। नाट्यशास्त्र की रचना का कारण भी नाट्यकला के माध्यम से धर्मविमुख हुए लोगों को धार्मिक शिक्षा देना ही था। इसीलिए इसे पंचमवेद भी कहा जाता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि यह नाट्यकला का धार्मिक और राजनीतिक इस्तेमाल का भी शास्त्र है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि चूंकि नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति चारों वेदों से हुई है इसलिए इसे उपवेद कहा जा सकता है, वेद नहीं। अब चार वेदों के होते हुए उसके अंशों को निकालकर नाट्यशास्त्र नामक पांचवें वेद की रचना की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, यह बात आसानी से नाट्योत्पत्ति नामक अध्याय से समझा जा सकता है।
नाट्योत्पत्ति नामक इस अध्याय में भरतमुनि से आत्रेय आदि ऋषियों द्वारा नाट्यवेद के विषय में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न किये गए कि नाट्यवेद कि उत्पत्ति कैसे हुई? किसके लिए हुई? इसके कौन – कौन से अंग हैं? इसकी प्राप्ति के उपाय तथा इसका प्रयोग कैसे हो? जवाब में भरतमुनि ने बताया – “नाट्यवेद की उत्पत्ति ब्रह्मा ने किया। सतयुग बीत चुका था, वैवस्वत मनु का त्रेता युग प्रारंभ हो चुका था। प्रजाजन काम, लोभ, इर्ष्या, क्रोध से अभिभूत हो चुकी थी। तब महेन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि हम ऐसा मनोविनोद का साधन चाहतें हैं जो देखने और सुनने के योग्य हो। आप सभी वर्गों  के लिए उपयोगी एक पांचवे वेद की और रचना कीजिये। तब चारों वेद का स्मरण कर ब्रह्मा ने पंचमवेद अर्थात नाट्यशास्त्र की रचना की। जो धर्म, अर्थ, यशप्रदाता, उपदेश, सभी कार्यों का पथ प्रदर्शक, सभी शास्त्रों के अर्थ से परिपूर्ण तथा सभी शिल्पों को प्रदर्शित करने वाला था। इसमें ऋग्वेद से पाठ्यांश, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस को लेकर प्रणयन किया।” ब्रह्मा के कथनानुसार नाट्य में दानवों और देवताओं दोनों के अच्छे बुरे कर्मों ही नहीं बल्कि तीनों लोकों के चरित्रों का समवेश होगा और इसमें कहीं धर्म, कहीं क्रीड़ा, कहीं राजनीति, कहीं अर्थनीति, कहीं श्रम, कहीं हास्य, कहीं युद्ध, कहीं काम तो कहीं वध को दिखाया जायेगा। नाट्य में सारी विद्याओं, कलाओं, योग सहित सांसारिक सुख-दुःख का समावेश होगा।
तो क्या यह धार्मिक संस्कृति के फैलाव का भी शास्त्र नहीं है? परम्पराशील नाट्य नामक पुस्तक में जगदीशचंद्र माथुर लिखते हैं “भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र को पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठा करते हुए तीन बातों पर ज़ोर दिया। एक तो यह कि चूंकि शुद्र तथा वन्य जातियों के लोग वेद-पाठ से वंचित थे, इसलिए ऐसे वेद की आवश्यकता पड़ी, जो सभी वर्गों की जनता के लिए उपादेय हो। दूसरी बात यह कि नाट्य में ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस का संग्रह किया। भरत की तीसरी स्थापना यह थी कि नाट्य सभी प्रकार की कलाओं, शिल्प तथा ज्ञान से संपन्न होने के कारण पंचम वेद कहलाने योग्य है।” अब इसे पंचमवेद कहें या उपवेद लेकिन नाट्यशास्त्र को आज तक वह स्थान प्राप्त नहीं है जो अन्य चारों वेदों को है।
नाट्यशास्त्र के अध्ययन से एक बात साफ़ हो जाती है कि इसका प्रयोग स्वंय देवताओं ने नहीं किया बल्कि इसे भरतमुनि और अप्सराओं से करवाया। नाट्यशास्त्र की रचना करने के पश्चात ब्रह्मा में इंद्र से देवताओं द्वारा इसका प्रयोग करने को कहा। इंद्र ने आग्रह किया कि “देवताओं में अभिनय करने का समर्थ नहीं है। इसलिए आप वेदों को जानने वाले और उत्तम चरित्र के ऋषियों से नाट्यशास्त्र का प्रयोग करवाईए।” तब ब्रह्मा ने भरत को बुलाकर यह काम सौंपा। भरत अपने सौ पुत्रों (शिष्यों) के साथ नाट्यशास्त्र के प्रयोग में लग गए। नाट्य में सौंदर्य और श्रृंगार को जोड़ने हेतू ब्रह्मा ने चौबीस अप्सराओं का नाट्य में समवेश कराया। इस प्रकार देवासुर-संग्राम नामक नाट्य तैयार हुआ। इस नाटक में देवताओं की विजयी गाथा व असुरों को खलनायक के रूप में चित्रण किया गया था।
महाजन जिधर जाएँ, सही रास्ता वही है नामक वाक्य को माननेवाला समाज में सामाजिक स्तर पर बिलकुल यही स्थिति आज भी विद्दमान है। यहाँ आज भी नाटक करनेवाले कम हैं और उन्हें नचनियां – बजानियाँ नामक शब्दों के मार्फ़त उपहास का पात्र भी बनाया जाता है। ऐसे परिवारों की संख्या अपवाद स्वरुप ही है जो अपने घर के लड़के – लड़कियों को खुशी से नाटक करने की छूट देते हैं। समाज में आज भी भरतपुत्रों की स्थिति किसी अछूत जैसी ही है, जिसे कुछ आरक्षण और दया तो मिलती है लेकिन अमूमन उचित सम्मान और स्थान नहीं। वैसे आधुनिक नाटक न जाने कब का नाट्यशास्त्र की अवधारणाओं और उद्देश्यों से आगे निकल चुका है। अब वह केवल धार्मिक प्रचार प्रसार का माध्यम न होकर आम आवाम के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मानसिक आदि सवालों से ही दो-चार नहीं हो रही है बल्कि उसका बौधिक परिवेश भी तैयार करने की फिराक में रहता है। इसके नायक - खलनायक अब देवता और दानव नहीं हैं बल्कि हार ओर मानव ने कब्ज़ा कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज का नाटक किसी भी अमानवीय सत्ता और विचार को चुनौती देने का कलात्मक मिशन पर लग गया हो। हालांकि इसकी शुरुआत की झलक नाट्यशास्त्र का पृथ्वी पर अवतरण नामक कथा में ही दिखाई पड़ जाती है जब एक हास्य भरा प्रहसन देखकर एक ऋषि क्रोधित हो जाते हैं और उन्होंने भरतपुत्रों को शाप देते हुए कहते हैं - “भरतपुत्रों। तुम्हारा यह हास्य से भरा हुआ प्रहसन, भद्दा, क्रूर और अमंगलकारी है। तुम लोग नाट्यवेद के ज्ञान के कारण इतने अहंकारी हो गए हो कि अब तुम ऋषियों का भी अपमान कर रहे हो इसलिए भरतपुत्रों कालान्तर में तुम्हारा वेद ज्ञान नष्ट हो जाएगा। ऋषियों और ब्राह्मणों की सभा में तुम्हारा सम्मान नहीं होगा। जो तुम्हारे वंश में जन्म लेगा वह भी अपवित्र - आचरणहीन माना जाएगा। तुम्हारी संतान नर्तक-नाचनेवाली कहलाएगी जो दर्शकों पर आश्रित होकर, अपना जीवन यापन करेगी।” भरतपुत्रों ने शयद इस नाटक में ऋषियों को हास्य और व्यंग्य का पात्र बनाया था। बहरहाल, इस शाप को सुनकर भारतपुत्र ने आत्महत्या करने का विचार किया तो भरत ने अपने पुत्र को प्रयत्नपूर्वक अपने शिष्यों और अप्सराओं को नाट्यवेद की शिक्षा देने और नाट्य के विकास कार्यरत होकर ही इस शाप से मुक्ति की बात समझाई। ऐसा प्रतीत होता है जैसे भरतपुत्र आज भी अपने इस निहायत ही ज़रुरी पर लगे हों और आज के समाज के प्रतिष्ठित ऋषि और ब्राहमण आज भी शाप पर शाप दिए जा रहे हैं।
नाटक को अंग्रेज़ी में प्ले कहते हैं जिसका हिंदी में अर्थ होता है खेल। खेल अर्थात एक ऐसी चीज़ जिसमें ना केवल शारीरिक एकाग्रता की ज़रूरत होती है बल्कि दिल, दिमाग और मन की एकाग्रता भी अति आवश्यक पहलू है। वैसे भी कोई भी खेल केवल शारीरिक ताकत और उर्जा के सहारे कुशलतापूर्वक नहीं खेला जाता है। लेकिन समाज में प्रचलित कथनों से खेल के प्रति समाज के नज़रिए का पता चलता है। यहाँ आज भी बात – बात में नाटक मत करो, बहुत नौटंकी किया जैसे वाक्य बोले जाते हैं वहीं “पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब! खेलोगे, कूदोगे होगे खराब!!” जैसे वाक्य भी लोकप्रिय हैं। यहाँ पढ़ाई, लिखाई से विद्वता का कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि अमूमन लोग उतनी ही पढ़ाई करने की सलाह देते हैं जितने से कि अच्छी नौकरी प्राप्त की जा सके। अच्छी नौकरी – पेशा का अर्थ नवाबी से जोड़ना सामंती मानसिकता का परिचायक हो न हो लेकिन “ज़्यादा पढ़ने से दिमाग खराब हो जाता है” जैसी मान्यता तो है ही। क्योंकि विद्या ज्ञान का मार्ग दिखता है और ज्ञान सत्य का। एक बार जिसे सत्य का आभास हो गया फिर उसके लिए तो यह जगत मिथ्या ही है। बहरहाल, प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पढ़ाई - लिखाई करने का अर्थ सरस्वती के माध्यम से लक्ष्मी पर अधिकार प्राप्त करना है। ऐसा ज्ञान जिससे धन की प्राप्ति न हो पागलपन की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे समय और समाज में कला और कलाकार जैसी पागलपन भरी राह की प्रतिष्ठा कितनी होगी, यह बात अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी जब भौतिकता सुख – सुविधाएँ ही जीवन हो जाए तब मानसिकता भौतिकता का गुलाम बनकर रह जाती है और भौतिकता को ही सफल जीवन का पर्याय मान लिया जाता है। यहाँ आध्यात्मिक (धार्मिक नहीं) और मानसिक विकास फालतू और भोग - विलास की वस्तु मान लिया जाता है।
ऐसे समय में कलाकार बनने और वह भी नाटक का कलाकार बनने का निर्णय, और वह भी ईमानदार और सच्चा कलाकार बनने का निर्णय लेना दहकते अंगारों से खेलने के समान है। लेकिन हर काल में कुछ विरले होते हैं जिन्हें अंगारों से ही खेलने में मज़ा आता है। वैसे भी आधुनिक नाट्य – संस्कृति तमाम दुनियावी मान्यताओं का अतिक्रमण करता है, वह न जाति मानता है, न धर्म और ना ही किसी अन्य प्रकार का भेद भाव। यहाँ सब केवल और केवल कलाकार हैं और कला की उत्पत्ति ही इनका धर्म है। ऐसी संस्कृति का समर्थन करने की हिमाकत कोई भी वर्ग – वर्ण में विभाजित, ईश्वरवादी, सामंती और गुलाम मानसिकता से ग्रसित समाज कर ही नहीं सकता बल्कि उल्टे मौके – बे-मौके उसका नुकसान पहुँचाने और मजाक बनाने से कतई परहेज़ नहीं करेगा। आए दिन कलाकारों पर हमले होना और उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा का शिकार बनाना, कलाकारों को समाज से अलग मानना, कला और कलाकारों की कोई परवाह या चिंता न करना, समाज के इसी सामंती और यथास्थितिवादी नज़रिए को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम अनुभूतियों, ज्ञान और विवेक को विकृत करनेवाले अति-असंवेदनशील और क्रूर युग में जी रहे हैं अथवा जीने को अभिशप्त हैं। यहाँ किसी नेता की छींक राष्ट्रीय समाचार बन जाती है और किसी कलाकार और किसान की मौत केवल एक दुर्घटना मात्र मान लिया जाता है। कोई सुपरस्टार किसी गुनाह में जेल जाने के मुहाने पर पहुंचाता है तो पूरा देश उसके लिए दुआ मांगने लगता है लेकिन वहीं किसी अच्छे – सच्चे कलाकार का खाली पेट किसी की चिंता का कारण नहीं बनता। ऐसे समय में यदि यह सच है कि कला और संस्कृति समाज का आइना होता है तो उतना ही सच यह भी प्रतीत होता है कि इस आईने पर सदियों पहले ही कालिख पुत गई है। बिना इसकी गहन सफाई के इस आईने में कोई भी अश्क नहीं देखा जा सकता। लेकिन बाज़ार का अंधा खरीदार बना आदमी अश्क – वश्क की नहीं बल्कि माल, जेब और भौतिक सुख – सुविधाओं की चिंता करता है। वैसे भी आज तो पुरी दुनियां हीं बाज़ार बनने को बैचैन है और राजनीति व राजनीतिक पार्टियां इस बाज़ार में ग्राहक पटाने और अपने कारपोरेटिया मालिकों को ज़्यादा से ज़्यादा सुविधा में व्यापार करने देने और सत्ता सुख का आनंद प्राप्त करने की अंधी गली के रूप में परिवर्तित हो गईं हैं। इन्हें न प्रजा की चिंता है, न तंत्र की। कला और संस्कृति तो इनके लिए आज भी एक अबूझ पहेली ही है। धूमिल ने कुछ यूं कहा था  – न प्रजा है, न तंत्र है। आदमी के खिलाफ़, आदमी का षडयंत्र है। इस षड्यंत्र से बाहर निकलने में मदद करने का कार्य करता है कला। क्योंकि, कला और संस्कृति ही मानव जीवन के मूलाधार हैं। कला इसलिए ज़रुरी है कि आदमी दुनियां को समझ सके और इसे और ज़्यादा सुन्दर, कोमल, तार्किक और संवेदनशील बना सके। बिना इन सबके कोई भी दुनियां मानवीय हो ही नहीं सकती होगी।
वर्तमान समय में भारतीय समाज का मूल चरित्र अर्ध – सामंती और अर्ध – ओपनिवेशिक है, जिसमें यदा कदा प्रजा, प्रजातंत्र, जनवाद, समाजवाद, साम्यवाद, प्रगतिशीलता, बौधिकता, मूर्खता आदि - इत्यादि की खिचड़ी पकती रहती है। ऐसे समाज में कला या तो बे-सिर पैर के मनोरंजन के रूप में लोकप्रिय होती या की जाती है अथवा एक संदिग्ध, कुत्सित और तुच्य चीज़ मान ली जाती है। वैसे भी पूंजीवाद मुक्त बाज़ार का पोषक होता है जिसमें उद्देश्यपूर्ण कला का स्थान “गैरज़रूरी और बिना किसी लाभ वाली” चीज़ के रूप होती है। वही सामंती मानसिकता चीज़ों का उपभोग तो करती है लेकिन केवल उनका जो बिना श्रम और दिमाग लगाए हासिल किया जाय।
कला और कलाकार का एतिहासिक अध्ययन करने से एक बात जो साफ़ – साफ़ समाज में आती है वो यह कि इसे सदा ही प्रश्रय की ज़रूरत पड़ती रही है। भारतीय सन्दर्भ में कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी कि कोई कला अपनी बदौलत अपने कलाकारों का भरण – पोषण करता हो। कला कभी उत्पाद बन ही नहीं सका और जो बना उसमें कला का अंश कम से कम और बिना सिर – पैर का “खतरनाक” मनोरंजन ज़्यादा हावी रहा। कभी यह प्रश्रय जनता ने दिया, कभी राजाओं ने, कभी धार्मिक संस्थानों ने तो कभी सरकारों ने। लेकिन इन प्रश्रयों ने कला और कलाकार के लिए कोई आदर्श माहौल बनाया हो, ऐसा नहीं है। प्रजतंत्र के आगमन के साथ तो स्थिति यह है कि प्रजातंत्र के सबसे बड़े प्रहरी के रूप माने जानेवाले विभिन्न दल और उसके नेतागणों की प्राथमिकता में ना कभी कला रही और ना ही संस्कृति। इसका कारक भी समाज ही है। यह पार्टियां और उसके नेता भी इसी समाज के अंग हैं और जब समाज ही अपने कला – संस्कृति के प्रति गंभीर नहीं है तो कोई पार्टी और नेता क्यों हों? कालांतर में कला और संस्कृति के नाम पर जो कुछ हुआ उसका सगूफा ना जाने कब का फूट चुका है और वर्तमान में कला और कलाकार को प्रश्रय देने के नाम पर जो सरकारी योजनाएं और अनुदान चलाए या दिए जा रहे हैं वह प्रक्रिया ही इतना अनैतिक और पंगु बनाने के विष से परिपूर्ण हैं कि उससे किसी कला और कलाकार को आज़ादीपूर्वक साँस लेने जीने की मिलेगी, इसमें संदेह है। बल्कि यहाँ तो ऐसा बंदरबांट मचा है कि जिसकी जितनी पहुँच, उसका पलड़ा उतना भरी। चारों तरफ़ खानापूर्ति का मौहौल है। हो सबकुछ रहा है लेकिन निरुद्देश्य और लगभग बकवास।
इन सब बातों के बावजूद कला और संस्कृति के क्षेत्र में जूनून और जुनूनी लोगों की भी कोई कमी नहीं, जो तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए कार्यरत और संघर्षरत हैं। क्योंकि दुनियां चाहे जैसी भी हो वह केवल बाज़ार और खरीदारों की तो कभी नहीं रही। कुछ लोग हमेशा रहे ही जो इस सारे आडम्बर पर ठहाका लगाते रहे। कला ज़रुरी है, इसलिए कि आदमी दुनियां को समझ सके और उसे बदल सके। कला के अंदर दुनियां बदलने की ताकत हो - न हो, लेकिन इसके बिना किसी भी मानव समाज का काम न आजतक चला है न चलेगा। ज्याँ कॉक्टो के शब्दों को उधार लेकर कहा जा सकता है कि नाटक के बिना किसी भी मानवीय समाज काम नहीं चल सकता, लेकिन मैं यह नहीं बता सकता कि उसका काम क्या है।
मनुष्य प्राकृतिक और प्रवृतिगत रूप से उस व्यक्ति से बढ़कर कुछ और भी है, जो वह बना दिया गया है। कला व्यक्ति के मैं को समष्टिगत अस्तित्व से जोड़ता है और उसकी वैक्तिकता को सामाजिकता से। एक ऐसे समय में जब तमाम ताकतें व्यक्ति को अकेला, स्वर्थी और आत्मकेंद्रित बनाने की साजिश में लगीं हैं वैसे समय में किसी भी सार्थक सामूहिक कला की ज़रूरत और ज़्यादा बढ़ जाती है। किन्तु यह क्रिया तबतक अपने आगाज से अंजाम तक नहीं पहुँच सकता जबतक सामाजिक स्तर पर इसकी ज़रूरत न महसूस किया जाय। हाथ पर हाथ धरे ऐसे समय का इन्तजार करने से बेहतर है उसकी दिशा में अपने कदम बढ़ाए जाएँ। एक सुदृढ़ और निश्चय भरा – सार्थक कदम। वैसे भी बिना कला, संस्कृति और ज्ञान के मनुष्य और मनुष्यता एक कदम आगे और दस कदम पीछे चलता है। एक ऐसे समय में जब किसी लेखक को अपनी मृत्यु की घोषणा करना पड़ता है और वो अपने पाठकों और प्रकाशकों से अपनी किताबें जला देने को कहने पर मजबूर किया जाता है, किसी व्यक्ति की निर्मम हत्या केवल इसलिए कर दी जाती है कि उसका धर्म और खान-पान अलग है, सत्ता का सर्वोच्य संस्थान अहम् की भेंट चढ़ जा रहा है और बाकि सलाम बजा लाने को अभिशप्त है, रचना और रचनाकार, कला और कलाकार या तो हासिए पर धकेले जा रहे हैं या फिर मानसिक गुलाम की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाने को अभिशप्त हैं, हवा और सुनामी चलाकर सरकारें बनाई और गिराई जाने लगी हैं; ऐसे समय में सार्थक और सृजनात्मक कला और कलाकार का महत्व और भी बढ़ जाता है। अरस्तु ने ठीक ही कहा था - नाटक का काम भावनाओं को परिशुद्ध करना है, आतंक और दया पर विजय प्राप्त करना है, ताकि ओरेस्टिज अथवा ईडिपस से तादात्म्य करनेवाला प्रेक्षक उस तादात्म्य से मुक्त हो सके और भाग्य की अंधी कारगुज़ारियों से ऊपर उठ सके।

आलेख मुन्ना कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक "संस्कृति : विविध परिवेश" में संलग्न

No comments:

Post a Comment