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Tuesday, August 9, 2016

एक मध्यवर्गीय लड़के का जन्मदिन

अपनेआप को लड़का क्यों कह रहा हूँ? तर्क तगड़ा है कि यदि पचास साल के कवि, कथाकार, रंगकर्मी आदि युवा कहलाते हैं तो उस हिसाब से तो मैं अभी लड़का ही हुआ न! तो जन्मदिन था। रंगकर्मी का जन्मदिन नाटकीय न हो तो लानत है। तो हुआ यह कि छः तारीख को रांची से पटना जाने का प्रोग्राम था लेकिन 3G, 4G और 5G वाले इस महान तंत्र में मेरे नेट की स्पीड इतनी अद्भुत थी कि कई दिनों से टिकट महोदय कट ही नहीं पा रहे थे। चार अलग-अलग कंपनियों से सिम कार्ड ट्राई किए परन्तु नेट आँख मिचौली कर रहा था और डमरू समय के रथ के पहिए के साथ घूमे ही जा रहा था। बीएसएनएल का तो मामला आज भी “भाई साहेब नहीं लगेगा” वाला ही है। अंततः तंग आकर रात अपने एक स्टूडेंट सुजीत को फोन किया कि मेरा टिकट कटा दो। सुजीत हैदराबाद में था, उसने भी कोशिश की, लेकिन वह भी सफलता हासिल नहीं कर पाया। थक-हारकर रात एक बजे सोने चला गया। तबतक विभिन्न सोशल साइट्स पर जन्मदिन की बधाई के सन्देश आने शुरू हो गए थे। साढ़े चार बजे सुबह के लगभग आँख खुली तो फिर स्मार्टफोन लेकर टिकट कटाने बैठ गया। इस बार सफलता मिली लेकिन तभी सुजीत का भी मैसेज आया कि उसने मेरा टिकट करा दिया है। अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि दोनों में से कौन सा टिकट कैंसल कराया जाय। कमाल यह कि दोनों ही टिकट एक ही बोगी में थे, बस एक नंबर के फर्क के साथ। अन्तः मैंने सुजीत को वाट्सअप किया कि उसने जो टिकट कराया है उसे कैंसिल कर दे। पुनः सोने जाने से पहले सोशल साईट खोला तो बधाई सन्देश के मैसेजों से इनबॉक्स गुलज़ार हुआ पाया।
सुबह – सुबह तीन साल की प्यारी सी बेटी को स्कूल ले जाने की ज़िम्मेदारी मेरी होती है। बेटी और उसकी माँ का उधम चालू हो चुका था लेकिन मेरी आँख खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। बहरहाल, बेटी और उसकी माँ के दुलार-पुचकार से आँख खुली। उठकर अखबार उठाया तो पहले ही पन्ने पर पूरे पन्ने के लेटेस्ट मोबाईल फोन के विज्ञापन ने तमाचा जड़ा और मेरा आधुनिक फोन मुझे किसी कचड़े के डब्बे में परिवर्तित होता प्रतीत होने लगा। स्मार्टफोन को लेकर मेरा पैशन भी कमाल है। मुझे यह दुनिया का सबसे चमत्कारी आविष्कार लगता है। एक छोटे से उपकरण ने अपने अंदर क्या कुछ नहीं समाहित कर लिया है। सो, यदि मेरा वश चले तो मैं रोज़ ही नया से नया मोबाईल फोन इस्तेमाल करूँ, ठीक उस पागल शहंशाह की तरह जो एक बार पहने कपड़े, जूते आदि इत्यादि को दुबारा इस्तेमाल नहीं करता। वैसे आज यह भी खबर कहीं पढ़ी कि हमारे देश के “साहेब जी" भी कपड़ों को लेकर कुछ ऐसे ही शौक रखते हैं।
तो भाग-भाग कर तैयार हुआ। स्कूटर पर हम और बेटी जी महराज निकले। दोनों ने बरसाती धारण कर रखा था। बेटी को पूरे रास्ते गाना, कविता और पापा, ये क्या है वो क्या है करने में बहुत ही मज़ा आता है। सो वो मगन थी। रास्ते भर अजीब सी बारिश हो रही थी – टिप, टिप टिप टिप टाइप और रांची की बारिश का मज़ा यह कि भींगे नहीं कि सर्दी-बुखार के प्यार में गिरफ्तार हुए। तो मैं सड़ा सा मुंह बनाए कछुए की गति से गाड़ी चला रहा था और मन ही मन मेघदूतम के रचयिता कालिदास को बुरा-भला भी कह रहा था। पक्का मिस्टर कालिदास कभी रांची के बारिश में नहीं भींगे होंगे। यदि भींगते और सर्दी-बुखार के प्यार में पड़ते तो मेघदूतम लिखने का रूमानी ख्याल शायद दूर-दूर तक नहीं आता। वैसे भी सर्दी बुखार में अच्छे से अच्छा रूमानी ख्याल अघोरपंथ में तबदील हो जाता है।
बेटी को स्कूल छोड़ने के बाद मुझे प्रसिद्द डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघनाथ दा के अखरा में जाना था। दादा इन दिनों राम दयाल मुंडा जी के ऊपर डाक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे हैं। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे प्रसिद्द फिल्म निर्देशक सत्यजित राय ने रविन्द्र नाथ ठाकुर के ऊपर बनाई थी। बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि राम दयाल मुंडा ने कुछ छोटे – छोटे नाटक भी लिखे थे – एकदम अनोखे तरीके से। हमें राम दयाल मुंडा लिखित नाटकों के फिल्मांकन के लिए जगह देखने संत जेवियर कॉलेज जाना था। मेघनाथ दा मेरी स्कूटी पर सवार हुए और हम फिल्म, रंगमंच और साहित्य पर बात करते हुए संत जेवियर कॉलेज के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने बताया कि आज उनकी बेटी का जन्मदिन है और उसके लिए उन्होंने बेटी के दोस्तों के आग्रह पर वाट्सअप पर सरप्राइज़ एलिमेंट के रूप में अपनी आवाज़ में बधाई सन्देश भेजा है। उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि आज मेरा भी जन्मदिन है। यदि पता होता तो वो मुझे पता नहीं क्या खिलाने – पिलाने लगते। और जहाँ तक सवाल मेरे बताने का है तो हमारे परिवार में कभी जन्मदिन को स्पेशल दिन की तरह मनाने का कभी रिवाज़ ही नहीं रहा इसलिए यह आज भी मेरे लिए किसी अन्य सामान्य दिन की तरह होता है। वैसे भी मध्यवर्गीय मानसिकता के अंतर्गत खोखली खुशी का प्रदर्शन, उसका दिखावा, बेवजह शोरगुल, रीति-रिवाज और खर्च – इन चीज़ों से कभी भी मेरा कोई खास जुड़ाव हुआ भी नहीं। खोखले आडम्बरों से एकांत मुझे ज़्यादा प्रिय है।
तो हम स्पेस देखकर वापस आए। दादा को अखरा में छोड़ा और अब बारी थी बेटी जी महराज को स्कूल से लेकर घर जाने की। इस बीच फेसबुक, वाट्सअप और एसएमएस के ज़रिए देश के कई भागों से जुड़े दोस्तों के बधाई सन्देश भी आ रहे थे और मैं मन ही मन गदगद होता हुआ सबको जवाब देने की कोशिश भी कर रहा था।
बाकि दिन भर के किस्से नहीं सुनाऊंगा। सुनाऊंगा तो क्या पता बहुत से लोग मेरा नाम भारतीय “मर्द” की श्रेणी से काट दें और बोलें हद है यह भी, घर में झाड़ू लगाना, पोंछा लगाना, बर्तन साफ़ करना, खाना पकाना और अपने बच्चे की पॉटी साफ़ करने जैसा “औरताना” का काम करता है। वैसे हद तो यह भी है जी हम इतने “महान” हैं कि काम का भी लिंग और जाति निर्धारण कर रखा है। खैर, जन्मदिन के मौके पर सुबह – सुबह पड़ोस से जो एक मात्र गिफ्ट मिला वो था मूली के पत्ते समेत चार पांच कुपोषित मूली। बाकि देश भर से खूब सोशल मिडिया पर खूब सारे सन्देश और फोन कॉल्स। सन्देश इतने ज़्यादा और प्यारे थे कि यदि बुद्धि -विवेक का चार चांटा न पड़े तो मध्यवर्गीय दिमाग आसमान में ही उड़ने लग सकता था। भाई, आसमान में उडो लेकिन पैर ज़मीन पर ही टिका रहे नहीं तो शुभचिंतक आसमान में उड़ाना जानते हैं तो उन्हें ज़मीन पर पटकना भी और मत भूलो कि संघर्ष ही जीवन है। सफलताएं दिमाग खराब करती है इसलिए सफलताओं को भूल जाओ और असफलताएं याद रखो। तो, कल तथाकथित जन्मदिन जैसा कुछ था नहीं हां बहुत सारे काम ज़रूर थे और शायद काम ही जीवन है। वाह, मज़ा आया न उपदेश नुमा भरत वाक्य पढ़कर? अब समाप्त।
पुनश्च – ऊपर लिखी सारी बातें झूठ हैं क्योंकि प्रगतिशील दिखना एक फैशन है। सच तो यह है कि कल सुबह से ही भव्य पार्टी शुरू हो गई थी। यो यो के गाने पर चियर्स गर्ल के साथ ही साथ यज्ञ और हवन का भी आयोजन था। जिसमें पुरी दुनियां भर के रथी-महारथी शामिल हुए। गरीबों को टेलीविजन के कैमरे के सामने दान दक्षिणा भी दिया जाया। बराक ओवामा और किशोर कुमार जन्मदिन के इस समारोह में इसलिए शामिल नहीं हो पाए क्योंकि कल उनका भी जन्मदिन था।  

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