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Monday, November 13, 2017

नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876 अर्थात एक काला अध्याय अब समाप्त होगा।

सबसे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि नाटय प्रदर्शन अधिनियम 1876 क्या है? इस का निर्माण क्यों किया गया? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतांत्रिक देश की मूलभूत ज़रूरतों में से एक है और जहां तक सवाल कला और संस्कृति का है तो उसे तो फलने-फूलने के लिए पूणतः स्वतंत्र वातावरण ही चाहिए। लेकिन समय समय पर विभिन्न रूप से इसे नियांत्रिक करने का भी प्रयास होता ही रहता है। सरकार, समाज, परिवार, विभिन्न संस्थाएं और व्यक्ति भी कला और संस्कृति पर अपना ज़ोर आजमाते रहे हैं।
1876 में ब्रिटिश राज ने भारतीय रंगमंच पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के लिए नाटय प्रदर्शन अधिनियम पारित किया था । नाट्य प्रदर्शन अधिनियम’ 16 दिसंबर 1876 को प्रचलन में आया, जिसका प्रारूप थामस बेरिंग ने तैयार किया था और यह वायसराय नार्थब्रूक के समय में अमल में लाया गया था। देश के आजाद होने के 70 वर्ष बाद भी यह कानून विद्यमान है. 
भारत देश ब्रिटिशसमाज का उपनिवेश था अत: ब्रिटिश राज की जातीय विरोध में रंगमंच को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा । क्रांति एवं विरोध की इस नई धारा को रोकने और इस पर नियंत्रण स्थापित करने की दृष्टी से ब्रिटिश सरकार ने इस अधिनियम की स्थापना की अत: इस अधिनियम को वक्त पूर्वक स्थापित किया । तत्कालीन वायसराय की “नर्थ बूक” की राय में इस अधिनियम के द्वारा भारत में रंगमंच पृदृश्य को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है इस अधिनियम के संबंध में उनके निम्न विचार जो इस प्रकार है :- 
#इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के द्वारा किसी भी नाटक सार्वजनिक प्रावधान को रोका जा सकता ।
नाटक के क्षेत्र में मूका अभिनय एवं अन्य नाटय रूपों को भी शामिल कर लिया गया था। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ये अधिकार प्राप्त हो गये थे कि वह किसी भी नाटय प्रदर्शन का :-
(क) षड्यंत्रकारी प्रकृती का ।
(ख) सामाजिक मूल्यों को ध्वस्त करने का ।
(ग) कानून द्वारा स्थापित सरकारी नियमों एवं संस्थाओ के विरूद्ध असंतुष्टी एवं विरोध उत्पन्न करने वाला।
व्यक्तियों को भ्रम उत्पन्न करने वाला घोषित किया जा सकता था तथा एसे प्रदर्शन को निषिद्ध किया जा सकता था ।
#इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अनुसार उपनियमों के अवहेलना करने वाले व्यक्तियों के समूह को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है जिसके अंदर तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता था या दोनों । 
#इस अधिनियम के अंतर्गत सरकारी एजेंसी या अधिकारी को यह अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी नाटक या नाटकों की संतुष्टी एवं सत्यापन कर सकता था ।
#पुलिस को यह भी अधिकार था कि वह नाटक कि प्रस्तुती के दौरान उस प्रेक्षागृह में जा कर वह उस नाटक को रुकवा भी सकती थी साथ ही दृश्य सज्जा, वस्त्र एवं अन्य सामग्री को जब्त भी कर सकती थी ।
#सरकारी की अनुमती के बिना किसी भी सार्वजनिक स्थल पर नाटक प्रस्तुत करने की अनुमती नहीं थी ।
इस क्रम में 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात भी इस अधिनियम को वापस नहीं लिया गया अपितु विभिन्न प्रांतो की सरकारों ने अपनी-अपनी नीतियों एवं आवश्क्ताओं के आधार पर उपअधिनियम में संशोधन कर लागू कर दिया जिनके कारण अधिकांश प्रान्तों में रंगमंच की गतिविधियों का प्रशासन का और अधिक नियंत्रण स्थापित हो गया । 
आजादी के आंदोलन में लोक नाटकों और कलाओं के मंचन की ताकत को भांपकर ब्रिटिश सरकार ने इनके मंचन को निषिद्ध करने के लिए राजद्रोह और मानहानिकारक कानून बनाया था। इस कानून को ख़तम करने की मांग बहुत ही पुरानी है। 
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों में आजादी की अलख जगाने में नाटकों की महत्चपूर्ण भूमिका रही थी। इस श्रृंखला में गिरीश चंद्र घोष ने ‘सिराज उद दौला’ और ‘मीर कासिम’ नाट्य श्रृंखला लिखी जो अंग्रेजी शासनकाल के दमन चक्र को दर्शाती थी. इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. ऐसे नाटकों में ‘मृणालिनी’, ‘छत्रपति शिवाजी’, ‘कारागार’ जैसे नाटक प्रमुख हैं.
इसी प्रकार बंगाल में महत्वपूर्ण नाटक ‘नील दर्पण’ पर भी प्रतिबंध लगाया गया जिसे दीन बंधु मित्रा ने लिखा था. 
साल 1870 के बाद राष्ट्रवाद की भावना की अभिव्यक्ति वाले कई नाटक आए जिनमें अंग्रेजों के शासनकाल के दमन चक्र को प्रतिबिंबित किया गया था और जनमानस में इनका व्यापक प्रभाव देखा गया.
सरकार ने संसद के मानसून सत्र में निरसन और संशोधन (दूसरा) विधेयक 2017 पेश किया था जिसके माध्यम से 131 पुराने और अप्रचलित कानूनों को समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया था.
अंग्रेजों शासनकाल में प्रदर्शित ऐसे ही नाटकों की श्रृंखला में ‘चक्र दर्पण’ और ‘गायकवाड दर्पण’ का प्रमुख स्थान हैं. इन नाटकों को मानहानिकारक, राजद्रोहात्मक बताकर प्रतिबंध लगाया गया था.
इसके साथ ही ‘गजदानंद एवं युवराज’, ‘हनुमान चरित्र’ पर भी प्रतिबंध लगाया गया. ‘द पुलिस आफ पिग एंड शीप’ भी ऐसे ही नाटक हैं. इसे तत्कालीन पुलिस कमीश्नर हाग और उस समय के पुलिस अधीक्षक लैम्ब के संदर्भ में पेश किया गया था. तब नाटक के निर्माता उपेंद्र नाथ दास एवं थियेटर से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था.
नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876 में प्रवधान किया गया था कि जो कोई भी इस आदेश की अधिसूचना के बाद उसके प्रदर्शन में, प्रदर्शन संचालन में या उसके किसी भाग के दर्शक के रूप में उपस्थित रहेगा अथवा गृह, कमरे या स्थान को प्रदर्शन के लिये खोलेगा…. उसे दोष सिद्ध होने पर तीन माह का कारावास या जुर्माना या दोनों दंड प्रदान किया जाएगा.
औपनिवेशिक काल के इस कानून के अनुसार, राज्य सरकार यह आदेश भी दे सकती है कि ऐसे क्षेत्र के भीतर सार्वजनिक मनोरंजन के किसी स्थान में कोई भी नाट्य प्रदर्शन तक तक नहीं किया जायेगा, जब तक कि उस कृति की…… लिखित प्रति या मूक अभिनय का विवरण तीन दिन पहले नहीं दे दिया जाता है। 
इस काले कानून को अब समाप्त किया जा रहा है, जो निश्चित ही एक स्वागतयोग्य क़दम है। बस कला और संस्कृति के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण (ख़ासकर हिंदी में) भी ज़रा सम्मानित भाव वाला हो जाए तो आनंद आ जाए।
#कुछ शब्द द वायर, हिंदी से उधार लिया गया है।

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