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Monday, November 13, 2017

फ़िल्म इत्तेफ़ाक : हर इत्तेफ़ाक़ महज इत्तेफाक नहीं होती !

यह सच है कि कलाकार एक दूसरे की कला से प्रभावित होते हैं, यह एक स्वाभविक प्रक्रिया है; लेकिन प्रभाव के साथ ही साथ चुपके से नकल कर लेना हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण आदत रही है। यह सब आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से हो रहा है। तब इंटरनेट का ज़माना नहीं था, और आम दर्शकों की पहुंच विश्व सिनेमा तक नहीं थी। उनके सामने जो कुछ भी परोसा जाता था, वो उसे ही असली मानकर देखने या झेलने को अभिशप्त थे। जहां तक सवाल फ़िल्मी पत्रकारिता का है तो वहां अमूमन मूढ़ता की स्थिति ही है, उसे सच्चाई से ज़्यादा गॉशिप से प्यार है और समीक्षा का है और वो भी हिंदी में तो उसकी हालत गंभीर रूप से नाजुक है। ख़ैर, इंटरनेट के आगमन ने बड़े - बड़ों की पोल खोलके रख दी है; वो चाहे लेखक हों, निर्देशक हों, संगीत परिकल्पक हों, या अभिनेता। अब तो फ़िल्म प्रदर्शित होते ही कथा-कहानी ही नहीं बल्कि फ्रेम तक कहाँ से कॉपी मारा गया है - ट्रोल करने लगता है।
हॉलीवुड में सन 1965 में George Englundand के निर्देशन में Signpost to Murder नामक एक सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म बनती है। यह फ़िल्म Monte Doyle नामक एक नाटककार के नाटक से प्रेरित था, जिसे Sally Benson नामक लेखक ने लिखा था। इस फ़िल्म में Joanne Woodward, Stuart Whitman, Edward Mulhare, Alan Napier, Joyce Worsley and Leslie Denison नामक कलाकारों ने अभिनय किया था। 
यह फ़िल्म सन 1969 में हिंदी में बनी इत्तेफ़ाक नाम से। फ़िल्म के निर्माता थे बी. आर. चोपड़ा और निर्देशक थे यश चोपड़ा। अब यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि आज चोपड़ा फैमली हिंदी सिनेमा में एक प्रतिष्ठित घराने का नाम है! बहरहाल, इस फ़िल्म में राजेश खन्ना के साथ नंदा, मदन पूरी, बिंदु,सुजीत कुमार और इफ़्तिख़ार आदि ने काम किया था। फ़िल्म में सबने एक से एक वाहियात अभिनय किया है। किन्तु वो राजेश खन्ना के दौर था और संस्पेंस-थ्रिलर का तड़का तो फ़िल्म साधारण कामयाबी हासिल करने में सफल रही थी। वैसे इस फ़िल्म को देखने के बाद यह यक़ीन करना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वो वही राजेश खन्ना हैं जो आनंद और बाबरची जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय करेंगें। पूरी फिल्म अजीब है और अंत तो सबसे अजीब। फिल्म में एक भी गाना नहीं था जबकि फ़िल्म के संगीत निर्देशक थे मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी और लेखक के रूप में G.R. Kamath का नाम भी आता है। फ़िल्म 10 नवम्बर 1969 को प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म ने बेहतरीन निर्देशन और पार्श्वसंगीत का अवार्ड भी जीता था! अब यह पता लगाना चाहिए कि फ़िल्म में शानदार निर्देशन के नाम पर ऐसा क्या था कि उसे बेहतरीन निर्देशन का सम्मान मिला। वैसे इस फ़िल्म का पार्श्वसंगीत निहायत ही ख़राब है और संगीत के नाम पर बड़ा ही बचकाना शोर पैदा किया गया है। उस वक्त का तो पता नहीं लेकिन आज जब वो फ़िल्म देखिए तो कई जगह पार्श्व संगीत के आने पर शोर इस क़दर बढ़ जाता है कि कान बंद करना पड़ता है। वैसे इस फ़िल्म से पहले इस कथ्य पर आधारित एक गुजराती नाटक भी खेला गया था। अब इस फ़िल्म और नाटक ने हॉलीवुड की फ़िल्म Signpost to Murder के राइट्स ख़रीदे थे या नहीं, इसकी कोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती। ख़ैर, अपने यहां तो नक़ल को भी एक कला ही माना जाता है और ऐसे निर्माताओं-निर्देशकों की कोई कमी नहीं जो किसी फ़िल्म की सीडी या कैसेट पकड़कर लेखक को पटकथा और संवाद लिखने को कहते हैं और फिर उसे लगभग फ्रेम बाई फ्रेम शूट कर लेते हैं। और लेखक इतने बेशर्म कि पटकथा केके नीचे अपना नाम लिखते हैं। यह सब इत्तेफ़ाक से नहीं बल्कि जानबूझकर किया जाता है। कई बार प्रभावित होने की बात को स्वीकार कर लिया जाता है तो कई बार निर्माता-निर्देशक बेशर्मी से कह देता है कि मैंने फलां फ़िल्म अबतक देखी ही नहीं है और यदि मेरी फिल्म से उस फिल्म का कोई मेल है तो वह महज एक इत्तेफ़ाक है। गुलज़ार जैसे संवेदनशील कवि भी अपनी फिल्म परिचय को हॉलीवुड की फ़िल्म Sound of music के प्रभाव को आजतक स्वीकार नहीं करते। ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। बहरहाल, वर्तमान में उस पुराने इत्तेफ़ाक का भी पुनर्निर्माण हुआ है, जिसका प्रदर्शन गत 3 November 2017 को हुआ है। इस बार निर्माता हैं प्रतिष्ठित शाहरुख खान, गौरी खान और कारण जौहर, और इसे निर्देशित किया है अभय चोपड़ा (चौपड़ा फैमिली) ने। फ़िल्म में अक्षय खन्ना, सोनाक्षी सिन्हा और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने काम किया है। 
फ़िल्म उद्योग में लेखकों और मूलकथा का घोर अभाव है; जबकि भारत किस्से-कहानियों और एक से एक साहित्य के भंडार का देश है। इस बीमारी के लिए कई सारे कारक हैं, जिसमें सबसे बड़ी बीमारी है लकीर का फ़क़ीर होना। 
पटकथा किसी भी फ़िल्म कला की रीढ़ होती है लेकिन यहां कला किसको निर्मित करना है? अमूमन सबको बस हिट फ़िल्म बनानी है, जैसे भी। वैसे एक टैग याद आ रहा है - नकल से सावधान!

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