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Wednesday, January 24, 2018

हिंदी रंगमंच की मूल समस्या !!!

हिंदी रंगमंच की मूल समस्या उसका गैरपेशेवर चरित्र है। दूसरे किसी भी पेशा को लीजिए, उस पेशे को अपना व्यवसाय बनानेवाला व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा वक्त उस पेशे में देता है और उस पेशे को व उस पेशे के लिए ख़ुद को बेहतर से बेहतर बनाने का प्रयत्न करता है।
जाड़ा हो, गर्मी हो, बरसात हो : एक चाय बेचनेवाला इंसान सुबह 6 बजे से पहले अपनी दुकान पर आ जाता है और देर रात तक चाय बेचता रहता है, तब वो उस पेशे से अपना और अपने परिवार का किसी प्रकार भरण-पोषण कर पाता है। वो पैसे के लिए सरकार या किसी और के पास हाथ नहीं फैलाता, किसी अड्डे पर जाकर समय काटने के लिए घंटे भर फालतू के गप्पें नहीं मरता बल्कि जो कुछ भी कमाना होता है, अपने पेशे से कमाता है। जितना भी वक्त बिताना होता है अपने पेशे के साथ बिताता है। दुनियां का वो कोई भी इंसान जो पेशेवर है उसके पास फालतू का वक्त होता ही नहीं। यहां तो आलम यह है कि फालतू के वक्त में से एकाध घंटे नाटक-वाटक भी कर लिए। 
कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी का अधिकार रंगकर्मी व्यवहारिक रूप से दिनभर में रोज़ 2 घंटे भी अपने पेशे को नहीं देता। ना ढंग का कोई अभ्यास करता है, ना प्रशिक्षण में रुचि है (बल्कि प्रशिक्षण और प्रशिक्षित लोगों के प्रति हेय दृष्टिकोण है) और ना ही शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास में (बल्कि अज्ञानता का घमंड है) : बस कुछ जुगाड़ और जोड़-तोड़ करके साल में जैसे-तैसे कुछ नाटक खेलना है। मेरा नाटक तुम देखो, तुम्हारा नाटक हम देखेंगे। मेरे नाटक में ताली तुम पीटो, तुम्हारे में हम पीटेंगे! मुझे तुम पुरस्कार दो, हम तुम्हें पुरस्कृत करेगें। अपने नाट्योत्सव में तुम हमें बुलाओ, हम तुम्हें बुलाएगें। तुम हमें महान घोषित करो, हम तुम्हें महानता का तमगा देगें। और कोई एकाध अगर कुछ थोड़ा बहुत बेहतर करने की चेष्टा कर रहा है तो उसे कुज़ात घोषित कर दो और ऐसे माहौल बना दो कि मानसिक टॉर्चर होता रहे। इससे क्या हासिल होगा - आत्ममुग्धता, कुछ तालियां, कुछ गालियां और कुछ झूठी - सच्ची हाय-हाय, वाह-वाह के सिवा ?
इस दृष्टिकोण को दूर कर पेशेवर बनने की दिशा में प्रयास होना चाहिए। जानता हूँ इसमें बहुत वक्त लगेगा लेकिन पूरी ईमानदारी से गंभीरतापूर्वक प्रयास हुआ तो कुछ भी असंभव नहीं। भले ही हम अपने लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाएं लेकिन हम भावी पीढ़ी के लिए एक सुंदर जगह ज़रूर छोड़ जाएगें जहां वो बड़ी आसानी से रंगमंच को अपना पेश बना सकते हैं। 24 घंटे में किसी तरह 2 घंटे रंगमंच करने को रंगमंच करना नहीं कहते। यह बदलाव रंगमंच को पेशा बनानेवाले लोग ही कर सकते हैं, इसे शौकिया तौर पर करनेवालों का इसमें कोई रुचि नहीं है और हिंदी रंगमंच व्यवसायिक हो ही नहीं सकता का जाप भी करने लगेंगे क्योंकि उनकी दाल-रोटी, चिकन-मटन, घर-गाड़ी का जुगाड़ कहीं और से हुआ रहता है। प्रसिद्द जर्मन कवि रिल्के कहते हैं - "अपनी सारी इच्छाओं और मूल्यों कला को अपना आप समर्पित किए बिना कोई भी व्यक्ति किसी ऊंचे उद्देश्य तक नहीं पहुंच सकता। मैं कला को एक शहादत की तरह नहीं - एक युद्ध की तरह मानता हूं जहां कुछ चुनिंदा लोगों को अपने और अपने परिवेश के विरुद्ध लड़ना है ताकि वे शुद्ध मन से उच्चतम उद्देश्य तक पहुंच सकें और अपने उत्तराधिकारियों को खुले हाथों से यह सम्पदा सौंप सकें। ऐसा करने के लिए एक इंसान के समग्र जीवन की ज़रूरत है न कि थकान से भरे कुछ फुर्सती घंटों की।"
इसलिए चाहे जैसे भी हो, रंगमंच को पेशा और पेशा को पेशेवर बनाने की ओर प्रयास होना चाहिए। कुछ चुनिंदा लोगों के गालों पर लाली और पेट पर चर्बी और एकाउंट में चंद रुपए आ जाने को पेशेवर होना नहीं कहते।
दूसरे का इंतज़ार मत कीजिए क्योंकि इस देश की एक और समस्या यह है कि यहां लगभग हर व्यक्ति दूसरे को बदलने में लगा है ख़ुद को नहीं। तो क्यों ना ख़ुद से ही शुरुआत हो और जो भी मुसीबत आए उससे सीना तानकर भीड़ जाया जाय। जो होगा देखा जाएगा; वैसे भी कौन सा भला हो रहा है ? रंगमंच का समृद्ध इतिहास का जाप किस काम का है, वो तो चटनी बनाने के भी काम नहीं आएगा !

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