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Wednesday, February 7, 2018

भावनाएं : कलाकार, कला और समाज की भावना

एक फ़िल्म के लिए लोग मरने-मारने पर उतारू हैं। कानून व्यवस्था और संविधान को ताक पर रखकर भावना के नाम पर गुंडई कर रहे हैं। इन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों को तालिबानी मूल्य में बदलते हुए ज़रा भी शर्म नहीं आती और वोट बैंक की पॉलिटिक्स के चक्कर में रखवाले लोग मूक तमाशा देख रहे हैं। न्यायाधीश चीख़-चीख़कर कह रहे हैं कि यह सही नहीं है लेकिन उसकी परवाह करने का समय किसके पास है!
कोई भी लोकतांत्रिक देश कानून व्यवस्था और मेहनतकशों की मेहनत से संचालित होती है, ना कि जाति, समुदाय या धर्म की मूर्खतापूर्ण आस्थाओं से। आस्था में भावना का तड़का लगाकर सदियों से लोग आतंकवाद को बढ़ावा देते आए हैं। अब हद यह हो गई है कि देश के शीर्ष पदों पर विद्दमान लोग भी आस्था और भावना का नंगा नाच नाच रहे हैं। मुख्यमंत्री फ़िल्म बैन करते हैं तो प्रधानमंत्री मौनव्रत धारण कर लेते हैं। तत्काल मामला संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावत का है जो जायसी के काव्य पर आधारित मूलतः एक काल्पनिक गाथा ही है। जायसी के काव्य को आधार बनाकर पहले भी फ़िल्म बनी है। एक तो मणिकौल की ही लघु फ़िल्म है उसका नाम ‘द क्लाऊड डोर’। फ़िल्म का स्क्रीनप्ले स्वयं मणिकौल ने लिखा है जो प्रसिद्ध नाटककार भाष के नाटक अविमारका और मोहम्मद जायसी का काव्य पद्मावत पर आधारित है। मणि की यह फ़िल्म इरोटिक है जो कामसूत्रा के इस देश में सहज ग्राह्य नहीं है। वैसे भी हम कम्बल के नीचे से घी पीने के लिए कुख्यात हैं, कम्बल के बाहर से घी पीने पर हमारी भावनाएं आहत हो जाती है। लगभग 23 मिनट की यह फ़िल्म यूट्यूब पर मुफ़्त में उपलब्ध है, पोस्ट के अंत में लिंक दे रहा हूँ - देख सकते हैं। फ़िल्म अपने बुद्धि-विवेक से देखिएगा क्योंकि फ़िल्म न्यूड़ सीन से भरपूर है। वैसे मणिकौल की काव्यत्मक सिनेमा को समझना साधारण दिमाग के वश की बात नहीं है।
इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात है इस फ़िल्म की अभिनेत्री अनु अग्रवाल। उसने जिस सहजता से इस फ़िल्म को किया है वो काबिलेतारीफ है। वैसे अनु अग्रवाल का चेहरा तो याद ही होगा। नहीं याद तो सन 
1990 में आई फ़िल्म ‘आशिकी’ को याद कर लीजिए। 90 के दशक में महेश भट्ट की यह फ़िल्म सुपर डुपर हिट थी और राहुल रॉय और अनु अग्रवाल प्रेमी-प्रेमिकाओं के आदर्श चेहरे हो गए थे जिन्होंने उस वक्त लोगों को प्यार करने का एक नया अंदाज़ सिखाया था। उस फ़िल्म के समीर के लिखे और नदीम-श्रवण के संगीतबद्ध किए गीत चाहे वो जान इ ज़िगर जानेमन , मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में, बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए, नज़र के सामने, धीरे धीरे से मेरी ज़िन्दगी में आना , मेरा दिल तेरे लिए, तू मेरी ज़िन्दगी है, दिल का आलम मैं क्या बताऊँ तुझे संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करते हैं।
इन्हें सुनते ही हमारे सामने अनु अग्रवाल और राहुल रॉय का चेहरा अपने आप सामने आ जाता है. लेकिन फिल्मी दुनियां जितना चमकदार होती है काश सच में उसमें इतनी चमक होती। अब अनु अग्रवाल की ही कहानी ले लीजिए।
11 जनवरी 1969 को दिल्ली में जन्मी अनु अग्रवाल उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र की पढ़ाई कर रही थीं, जब महेश भट्ट ने उन्हें अपनी आने वाली संगीतमय फ़िल्म ‘आशिकी’ में पहला ब्रेक दिया। उस वक्त उनकी उम्र महज 21 वर्ष थी। फ़िल्म बम्पर हिट रही लेकिन बाद में उनकी ‘गजब तमाशा’, ‘खलनायिका’, ‘किंग अंकल’, ‘कन्यादान’ और ‘रिटर्न टू ज्वेल थीफ़’ फिल्में कब पर्दे पर आईं और कब चली गईं, पता ही नहीं चला। उन्होंने एक तमिल फ़िल्म ‘थिरुदा-थिरुदा’ में भी काम किया। 1996 के बाद अनु एकाएक बड़े पर्दे से गायब हो गईं और उन्होंने योग और अध्यात्म की तरफ़ रुख कर लिया था।
1999 में उनके साथ एक सड़क दुघटर्ना घटित हुई जिसने अनु के जीवन की गाड़ी को एक पटरी से उठाकर दूसरी पटरी पर रख दिया। इस हादसे ने न सिर्फ़ उनकी याददाश्त को प्रभावित किया, बल्कि उन्हें चलने फिरने में भी अक्षम (पैरालाइज़्ड) कर दिया। 29 दिनों तक कोमा में रहने के बाद जब अनु होश में आईं, तो वह खुद को पूरी तरह से भूल चुकी थी। लगभग 3 वर्ष चले लंबे उपचार के बाद वे अपनी धुंधली यादों को जानने में सफ़ल हो पाईं। इसके बाद उन्होंने अपनी संपत्ति त्याग कर सन्यास की ओर रुख किया। हाल ही में अनु अपनी आत्‍मकथा 'अनयूजवल: मेमोइर ऑफ़ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड' को लेकर दुबारा से चर्चा के केंद्र में आईं थी. यह आत्मकथा उस लड़की है जिसकी ज़िंदगी कई टुकड़ों में बंट गई थी और बाद में उसने खुद ही उन टुकड़ों को एक कहानी की तरह जोड़ा है। इसमें फ़िल्म उद्योग के कई स्याह पन्ने भी शामिल हैं जो केवल उगते सूरज को ही सलाम करने की आदत पाले बैठा है। वर्तमान में अनु अग्रवाल झुग्गियों के बच्चों को नि:शुल्क योगा सिखाती है। फिल्मी दुनियां ही नहीं बल्कि साहित्य, रंगमंच आदि ऐसी कहानियों से भरी पड़ी हैं जिनकी सुधबुध लेनेवाला कोई नहीं - न सरकार, न कोई जाति और ना ही कोई समुदाय इनके लिए आंदोलन करता है और ना ही किसी की भावना ही आहत होती है। बहरहाल, अनु अग्रवाल अभिनीत मणिकौल की फ़िल्म "द क्लाऊड डोर" का लिंक यह रहा। हां, इस फ़िल्म के एक शॉर्ट में इरफ़ान खान भी नज़र आएगें - सोते हुए।

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