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Wednesday, July 4, 2018

अक्टूबर : रातरानी की हल्की और भीनीभीनी महक जैसी फ़िल्म


विश्विख्यात फ़िल्मकार Federico Fellini कहते हैं - "I don’t like the idea of “understanding” a film. I don’t believe that rational understanding is an essential element in the reception of any work of art. Either a film has something to say to you or it hasn’t. If you are moved by it, you don’t need it explained to you. If not, no explanation can make you moved by it."
सिनेमा एक कलात्मक अनुभव है जो आंखों, कानों और संवेदनात्मक ज्ञान के माध्यम से दिल और दिमाग पर असर करती है। यह सबकुछ हमारी समझ और समझदारी, दृष्टि और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। जब हम यह बात कर रहें हैं तो इसका संदर्भ उस सिनेमा से है जो सिनेमाई कला का सम्मान करने हुए सिनेमा रचता है ना कि अफ़ीम की गोली बनाता है। भारतीय संदर्भ में अमूमन सिनेमा अतिवाद की कला हो गई है और दर्शकों के दिमाग में यह बात पता नहीं कैसे घर कर गई है कि सिनेमा केवल मज़े या मनोरंजन मात्र के लिए देखा जाता है, कला या कलात्मक चिंतन के लिए। इसके पीछे का तर्क शायद बहुत पुराना है। एक से एक ग्रंथ अतिवाद और चमत्कार से भरा हुआ है और उसे सच मानने की मान्यता और परंपरा है। लेकिन इन सबके बीच भी कुछ लोग होते हैं जो कलात्मकता की परंपरा का बख़ूबी निर्वाह करते हुए भी यथार्थ का दामन नहीं छोड़ते। वो मात्र बॉक्स ऑफिस के लिए फिल्में नहीं बनाते बल्कि उनकी फिल्मों में मानवता और सिनेमाई कलात्मकता का एक मजबूत धागा बड़ी ही कुशलतापूर्वक पिरोया होता है। सत्यजीत रॉय, ऋत्विक घटक, विमल रॉय, राज कपूर, गुरुदत्त, महबूब खान, के आसिफ, वी शांताराम, कमाल अमरोही, जहानु बरुआ, श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, बुद्धदेव दासगुप्ता, जी अरविंदन, अपर्णा सेन, शाजी एन करुण, गिरीश कासरावल्ली, चेतन आनंद, मृणाल सेन, मणि कौल, अडूर गोपालकृष्णन, जी अरबिंदम, बुध्ददेव दासगुप्ता, शेखर कपूर, मीरा नायर और दीपा मेहता जैसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक सार्थकता प्रदान की है।
वर्तमान समय में कुछ बेहतरीन निर्देशक हैं जो सफलता के घिसे-पिटे फार्मूले और यूरोप की भद्दी नकल के बजाय कुछ अलग और सार्थक रचने का जोख़िम लेने की हिम्मत रखते हैं। विगत कुछ वर्षों में भारतीय सिनेमा में कुछ अद्भुत फ़िल्में बनी हैं, कम ही सही। अक्टूबर ऐसी ही एक गिलम है।
यह मानवीय संवेदना की एक अनुपम गाथा है। एक ऐसे समय में जब चारो तरफ़ इंसान से इंसान के बीच नफ़रत का बीजारोपण हो रहा है। जाति, धर्म, समुदाय और वाद के आधार पर फैसले सड़कों पर किए जा रहे हैं। असहमति को उग्रवाद और देशद्रोह का नाम दिया जा रहा है और इन सब बातों को राजनैतिक स्वीकृति प्रदान की जा रही है, वैसे वक्त में एक इंसान के प्रति एक इंसान के लगाव की कहानी कहना ठीक वैसा ही एहसास है जैसा भीषण गर्मी में बारिश की एक बूंद का शरीर पर पड़ना। नायक के दोस्त उसे कहते हैं कि तुम इतना अटैच क्यों हो रहे हो? जवाब में नायक कहता है - तुमलोग इतना डिटैच कैसे हो?
अक्टूबर सवालों के हल या वैसी फ़िल्म नहीं कि एक एक भजन गाया और गोलियों से छलनी हुआ नायक उठाकर ना केवल बैठ गया बल्कि उसमें सुपरपावर का समावेश हो गया और एक ही झटके में उसने सारे खलनायकों का खात्मा कर दिया। यह सवालों के सतही और फ़िल्म जवाब वाली फ़िल्म नहीं है बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय धर्म का पालन करते हुए उससे शालीनतापूर्वक जूझने के एहसास वाली फिल्म है। जीवन की तमाम संगति-विसंगतियों की उपस्थिति यहां भी है। अब इससे आपका मनोरंजन होता है तो ठीक नहीं होता है तो भी ठीक।
एक दुर्घटना में साथ काम करनेवाली एक लड़की कोमा में चली जाती है। उसके साथ केवल उसका परिवार होता है और होता है फ़िल्म का वो सबसे नालायक पात्र जिसे सफलता का सफलतम फार्मूला चुपचाप अपनाने में मज़ा नहीं आता। उसके बाद लगभग पूरी फिल्म हॉस्पिटल के मशीनों की आवाज़ और कुछ बहुत ही छोटे-छोटे और मासूम जीवन प्रसंगों के सहारे आगे बढ़ती है। अन्तः फ़िल्म थोड़ी आशावादिता के साथ एक यूटर्न के साथ खत्म होती है और अन्तः बहुत सारी बातें प्रतीकों के सहारे कह जाती हैं।
फ़िल्म में कोई भी महास्टार या चमत्कारी अभिनेता-अभिनेत्री नहीं है लेकिन जो भी हैं अपनी जगह एकदम फिट हैं। फिर भी अभिनेत्री गीतांजलि राव को इस फ़िल्म में अभिनय करते देखना एक अभिनय प्रेमी दर्शक के लिए सुखद अनुभूति है। बाकी किसी भी कला के बारे में उतनी ही बात करनी चाहिए जितने में कि रस बना रहे और उत्सुकता बनी रहे, ज़्यादा घोंटने से मीठा भी कड़वा हो जाता है। तो आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात है कि अगर बिना दिमाग वाली फ़िल्में आपको बोर करती हैं तो इस फ़िल्म को ज़रूर देखिए, अगर अभी तक नहीं देखें हैं तो।

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