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Friday, November 16, 2012

स्पेशल सेल के खतरनाक खेल का खुलासा करती किताब


समाचारों में एक खबर आए दिन प्रकाशित-प्रसारित होती रहती है कि ‘फलां’ आतंकवादी संगठन के ‘इतने’ आतंकवादी ‘इतने’ गोलाबारूद, हथियार और पैसे के साथ पकड़े गए और हम ये जानते हुए कि कानून के रखवालों का दामन भी पाक-साफ़ नहीं है, इन बातों पर सहज ही यकीन कर लेतें हैं. पर क्या सच केवल उतना ही होता है जितना कि प्रचारित, प्रसारित, प्रस्तावित किया जाता है? यक़ीनन नहीं. इसी विषय की पड़ताल करती ‘आरोपित, अभिशप्त और बरी: स्पेशल सेल का खोखला सच’ जामिया टीचर्स सौलिडैरिटी एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक अत्यंत ही पठनीय पुस्तक है. इस पुस्तक में स्पेशल सेल से वर्ष 1992 से लेकर 2012 तक के कुल 16 मामलों की तफसील पेश किया गया है जिसमें हुजी, लश्कर-ए-तैयबा व अल-बदर जैसे समूहों के आतंकवादी होने के आरोप में पकडे गए लोगों के केस की पूरी जानकारी है, जिन पर देशद्रोह, राज्य के खिलाफ़ युद्ध, आपराधिक षडयंत्र, बम धमाकों की योजना और क्रियान्वयन, आतंकवादियों को प्रशिक्षण, हथियार और गोलाबारूद जमा करना, आतंकी कार्यों के लिए धन स्थानान्तरण आदि संगीन आरोप लगाते हुए ज़्यादातर मामलों में फंसी की सजा की मांग की गई थी, जिसमें अदालत अंततः उन्हें बरी करती है साथ ही मामले को गढ़कर पेश करने की बात पर कई बार पुलिस और स्पेशल सेल को फटकार भी लगाती है तथा सेल के खिलाफ़ सी.बी.आई. जाँच के आदेश के साथ ही साथ एफ.आई.आर. दर्ज़ करने और विभागीय जाँच किये जाने के निर्देश भी देती है.
इस पुस्तक में (1) राज्य बनाम तनवीर अहमद, शकील अहमद, इश्तियाक अख्तर दार, मो. अख्तर दार, मो. युसूफ लोन, अब्दुल रॉफ, और गुलाम मोहम्मद (2) राज्य बनाम फारुख अहमद खान आदि (3) राज्य बनाम आमिर खान (4) राज्य बनाम खोंगबेतबम ब्रोजेन सिंह एवं अन्य (5) राज्य बनाम हामिद हुसैन, मो. शरीक, मो. इफ़्तिखार अशन मालिक, मौलाना दिलावर खान, मसूद अहमद रशीद (6) राज्य बनाम इरशाद अहमद मालिक (7) राज्य बनाम अयाज अहमद शाह (8) राज्य बनाम साकिब रहमान, बशीर अहमद शाह, नाजिर अहमद सोफ़ी, हाजी गुलाम मुइनिद्दीन दार, अब्दुल कयूब खान और बिरेन्द्र कुमार (9) राज्य बनाम खुर्शीद अहमद भट्ट (10) राज्य बनाम सलमान खुर्शीद कोरी तथा अन्य (11) राज्य बनाम मॉरिफ़ कमर तथा अन्य (12) राज्य बनाम गुलज़ार अहमद गनी तथा मो. अमीन हजाम (13) राज्य बनाम तारिक डार (14) राज्य बनाम मो. इमरान अहमद (15) राज्य बनाम मो. मुख्तार अहमद खान (16) राज्य बनाम मो.इकबाल उर्फ़ अब्दुर्रहमान, नजरुल इस्लाम तथा जलालुद्दीन नामक केस की रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है. इन 16 में से 15 मामले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल से सम्बंधित हैं. 
इन आरोपों का विस्तृत विश्लेषण करने पर स्पेशल सेल का एक बहुत ही डरावना और घिनौना चेहरा हमारे समक्ष प्रकट होता है, जिसमें अधिकारीगण पदोन्नति, मैडलों और इनामों के लालच में किसी भी हद तक जाने को तत्पर दिखाई पडतें हैं. इस किताब के पन्नों से गुज़रते हुए भय सा लगता है और विश्वास नहीं होता कि हम आज़ाद भारत के आतंक विरोधी एजेंसी में से सबसे बेहतर मानी जा रही एजेंसी के बारे में पढ़ रहें हैं जो अपनी असफलता छुपाने के लिए एक सोची समझी साजिश के तहत बेगुनाहों को लगातार फंसा रही है, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है. जिसके शिकार कई आम नागरिकों के साथ ही साथ मानवाधिकार कार्यकर्त्ता भी बने हैं. हम और आप इसलिए नहीं बचे है कि हम कोई गैरकानूनी हरकत नहीं करते वल्कि इसलिए बचे हैं कि हम पर अब तक इनकी नज़र नहीं पड़ी है.
एक बात स्पष्ट कर देना ज़रुरी है कि यहाँ जितने भी लोग बरी हुए वो सबूतों के अभाव के कारण नहीं बल्कि पुलिस के उन तौर तरीकों की वजह से जो पूरी तरह गढे गए, हास्यास्पद और विकृत थे. यहाँ एक अविश्वसनीय, संदिग्ध और काल्पनिक कहानी गढ़ी गई थी जिस पर सहज विश्वास करना दुनिया के किसी भी कानून के लिए संभव न था. एक नमूना इसी किताब से  – 15 मार्च 2002 को ए.सी.पी. मेहता द्वारा गिरफ्तारी के समय लिया गया बयान और उपयुक्त उज्जवल मिश्रा द्वारा पोटा की धारा 32 के तहत दर्ज़ किया गया उसका हलफनामा एक ही था. अदालत ने कहा कि “ कॉमा और पूर्णविराम सहित पूरा का पूरा बयान ज्यों का त्यों है...इससे पता चलता है कि इंसानी तौर पर ऐसा हलफनामा देनेवाले और दर्ज़ करनेवाले दोनों व्यक्ति के लिए इस तरह का एक जैसा हू-ब-हू शब्द-दर-शब्द हल्फिया बयान दर्ज़ करना असंभव है.”
इस पुस्तक में जिन व्यक्तियों के मामले प्रस्तुत किये गए हैं भले ही वो आज अदालत द्वारा मुक्त कर दिए गए हों पर उनकी गिरफ़्तारी, पूछताछ के नाम पर उत्पीडन आदि की वजह इनकी ज़िदगी का संतुलन असामान्य हो गया है. उनके व्यापार खत्म हो गए, परिवार के सदस्यों को सामाजिक अपमान, आघात व मानसिक बीमारियों तक का सामना करना पड़ा. उनके कई परिजन तो इस गम को सह न सके व उनके बच्चों का जीवन प्रभावित हुआ. इन सबके बाद भी किसी भी केस में, किसी भी सरकारी कारकून ने आज तक इनसे न माफ़ी मांगी ना ही इनके पुनर्वास का कोई प्रयास ही किया गया, उल्टे इन मामलों में सीधे-सीधे संलग्न अधिकारियों ने दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की की है. इस किताब में वर्णित किसी भी मामले में किसी भी अधिकारी पर किसी तरह की कोई कार्यवाई नहीं की गई है. अदालत द्वारा कही गई ये बात कब की आई-गई हो गई कि “ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आपराधिक मामले में फंसाने से ज़्यादा गंभीर और संगीन अपराध नहीं हो सकता. पुलिस अधिकारियों में इस तरह कि प्रवृति दिखाई नहीं देनी चाहिए और इस ओर हल्के ढंग से किन्तु पूरी कठोरता से लगाम कसने की ज़रूरत है.” अब यहाँ सवाल ये भी उठता है कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकियां मारते और मजबूरी की सरकारें झेलते इस देश में ये लगाम कसे भी तो कौन ! हाँ, जिनके पास पैसा और पावर है उनकी तो हर दिन ईद और रातें दिवाली हैं.
नाजिम हिकमत की “कैद में रिहाई के बाद” शीर्षक कविता से शुरू हुई रिपोर्ट आधारित इस पुस्तक में इरशाद अली का प्रधानमंत्री, भारत सरकार के नाम खत का भी प्रकाशन किया गया है. जिसमें इरशाद अली स्पेशल सेल के खतरनाक खेल का पर्दाफाश करतें हैं. इस खत के अनुसार इरशाद अली दिल्ली के स्पेशल सेल के लिए मुखबिर का काम करते थे और जिन्हें आईबी तथा स्पेशल सेल दिल्ली ने झूठे मुकद्दमे में फंसाया था. इस खत को पूरा पढाने पर एक अत्यंत ही डरावने सच से हमारा समाना होता है कि कैसे ये सरकारी एजेंसियां नकली आतंकवादी खड़ा करती है और आतंकवाद के खिलाफ़ जंग को एक मज़ाक के रूप में परिवर्तित तथा इनाम और पदोन्नति के चक्कर में बेकसूरों को फांसकर फर्ज़ी इनकाउंटर और अपहरण जैसे अपराधों तक को बड़ी आसानी से अंजाम देतीं है. यहाँ दूसरे राज्यों से कैदियों की अदला-बदली का भी खुलासा है जिससे ये साफ़ तौर पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे कश्मीर का कोई व्यक्ति दिल्ली में गिरफ्तार किया जाता है.
स्पेशल सेल ने आज तक इस तरह के जितने भी केस पेश किये  हैं उसमें केवल 30% केसों में ही किसी को सजा हो पाई है, बाकी 70% मामलों में लोग बरी हुए, अब इसका क्या मतलब निकाला जाय ? भले ही वो बरी हो गए हों पर जो यातना या प्रताड़ना उन्होंने झेली है उसका क्या कोई निवारण हो सकता है ? वो इस देश के प्रति कौन सा नज़रिया रखेंगे इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है.
पुस्तक के अंत में राष्ट्रीय जाँच आयोग गठित करने, मुआवजा एवं पुनर्वास, सार्वजनिक माफ़ी, सेल भंग करो, मामले में संलग्न अधिकारियों के खिलाफ़ कार्यवाई जैसी चंद मांगें भी हैं जो पुस्तक में प्रकाशित रिपोर्ट को पढने के पश्चात् कहीं से भी गैरज़रूरी नहीं लगतीं.  
अब थोड़ी सी बात इस पुस्तक के प्रकाशक की. लोकतान्त्रिक एवं प्रगतिशील शक्तियों के समूह के रूप में सन 2008 में बटला हाउस मुठभेड़ के बाद गठित जामिया टीचर्स सौलिडैरिटी एसोसिएशन ( मूलतः जामिया टीचर्स सौलिडैरिटी ग्रुप ) का मूल उद्देश्य इस मुठभेड़ की न्यायिक जाँच की मांग थी लेकिन आज शासन के अन्य अन्यायपूर्ण मामलों के खिलाफ़ भी इनकी सक्रियता देखने को मिल रही है. जिसमें फैक्ट फाईंडिंग, जाँच पड़ताल, रिपोर्टों का प्रकाशन, क़ानूनी सहायता में शामिल होना तथा लोकतंत्र, न्याय और नागरिक अधिकारों के मुद्दे पर अन्य सामाजिक संगठनों के साथ साझेदारी आदि महत्वपूर्ण कार्य समाहित हैं. इन्हें info.jtsa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. साथ ही इनकी गतिविधियों के बारे में इनकी वेबसाइट www.teacherssolidarity.org  देखी जा सकता है.
ऐसी पुस्तकें बहुत कम ही प्रकाशित होतीं है. तमाम इंसाफपसंद नागरिकों को इसे एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए. 

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