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Monday, November 13, 2017

चार्ली चैप्लिन : अमृत और विष !!!

90 का दशक था। एंटीना और स्वेत-श्याम टेलीविजन वाला युग। चैनल के नाम पर एकलौता दूरदर्शन था। केबल और डीटीएच टीवी का आतंक अभी कोसों दूर था। दुरदर्शन पर रविवार की सुबह चार्ली चैप्लिन की फिल्में दिखाई जा रहीं थीं। चार्ली की फिल्मों का असली मर्म समझने की हमारी उम्र और समझ थी नहीं लेकिन फिर भी पता नहीं क्या आकर्षण था कि पूरे का पूरा एपिसोड देख जाते। उन दिनों रंगमंच, अभिनय आदि से मेरा कोई वास्ता नहीं था। हाँ, कुछ लुगदी साहित्य और चलताऊ पत्रिकाओं से वास्ता पड़ता रहता था। पापा की वजह से अख़बार और कुछ अच्छी समाचार पत्रिका भी पलट भर लेता था। 
उन्हीं दिनों चार्ली की फ़िल्मों में सबसे ज़्यादा जो चीज़ मुझे आकर्षित की वो थी चार्ली की आंखे। वैसे तो चार्ली की कला का मुख्य स्वर हास्य-व्यंग्य रहा है किंतु उनकी कंचई आंखों में मुझे उदासी ही उदासी दिखतीं। बाद के दिनों में जब चार्ली की बॉयोग्राफी Chaplin : his life and art पढ़ी और Robert Downey Jr द्वारा अभिनीति चार्ली के जीवन पर बनी अद्भुत फ़िल्म Chaplin (1992) देखी, डीवीडी ख़रीदकर उनकी लगभग सारी फिल्में कई बार देखी, उनके ऊपर कई आलेख और किताबें पढ़ीं तब यह समझ में आया कि दुनियां को मानवीय, खूबसूरत और उल्लासपूर्ण बनाने का ख़्वाब देखनेवाले इस कलाकार का जीवन कितना त्रासदियों से भरा था। वैसे भी चिराग़ तले अंधेरा ही होता है। लेकिन मीर ने क्या खूब कहा है - 
दुनियां में रहो ग़मज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ करके चलो जाके बहुत याद रहो। 
चार्ली इस शेर के जीते जागते मिसाल हैं। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी को अपनी कला के ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया। ना जाने कितनी बार सपने टूटे, आशियाना उजड़ा, फरेब मिला लेकिन उनकी कला हमेशा मानवता और त्याग के पक्ष में पुरज़ोर तरीक़े से खड़ी रही। अपने व्यक्तिगत जीवन के कड़वे अनुभव से उन्होंने दुनियां को नहीं परखा बल्कि खुद शंकर की भांति विष ग्रहण किया लेकिन दूसरों के हिस्से अमृत ही छोड़ा। शायद यही है एक सच्चे कलाकार का दायित्व। जो अपना और अपनों के स्वर्थपूर्ती में ही बेचैन रहे वो कलाकार कम मुनाफाखोर व्यापारी ज़्यादा है। वैसे भी एक कलाकार की दुनियां में पूरा ब्रह्मांड समाहित होता है। 
मैं चार्ली की फ़िल्में देखते हुए कभी ठहाका लगाया होऊंगा, मुझे याद नहीं आता। हां, एक दृश्य ज़रूर है जिसको याद आते ही मैं नींद में भी मुस्कुरा सकता हूँ। वो दृश्य उनकी महानतम फ़िल्म #Mordern_Times में आता है जब वो सुबह उठकर नदी में नहाने के लिए कूदते हैं और पता चलता है कि नदी में पानी ही बहुत कम है। आज सोचता हूँ कि बतौर अभिनेता अगर मुझे वो दृश्य करना होता तो क्या मैं कर पाता? और उसका जवाब है - नहीं। चार्ली का कोई भी एक्ट कर पाना बड़े से बड़े अभिनेता के कूबत से बाहर की चीज़ है तो हम जैसों की क्या विसात! चार्ली चैपलिन अभिनय के उस आदर्श का नाम है जहाँ तक पहुंचने का ख़्वाब एक अभिनेता पालता है, पालना चाहिए।
चार्ली अपने समय से कई सदी आगे के कलाकार हैं। उन्होंने प्रस्तुति से लेकर कथ्य तक मे कई ऐसे प्रयोग किए जो आज भी लोगों के लिए एक आदर्श है। उनकी कई फिल्में आज की फिल्में लगती हैं। कई तो आज से भी आगे की हैं। 1936 में अपनी फ़िल्म #Modern_Times में जिस मशीनीकरण की परिकल्पना उन्होंने की और जिस तरह उसे फिल्माया, वहां तक तो हम आजकल नहीं पहुंच पाए हैं। सन् 1940 में जिस #The_Great_dictetor की परिकल्पना चार्ली करते हैं हम आज उस तरफ कुछ कदम ज़रूर बढ़े हैं। अब हमें पार्टियों और विचार को नहीं बल्कि व्यक्ति को वोट कर रहें हैं। चाहे प्रधानमंत्री का चुनाव हो, मुख्यमंत्री का या मुखिया का। लोकतंत्र में व्यक्ति को विचार और विचारधारा और पार्टी से ज़्यादा भाव देना एक ख़तरनाक संकेत है और मूर्खता की हद तो यह कि हमें इस पागलपन में आनंद आ रहा है। आज एक तरह से पूरी दुनियां में ही अधिनायकवाद की एक ऐसी लहर चल रही है जो विनाशकारी है। यह दुनियां धर्म, जाति, समुदाय के नाम पर एक और विश्वयुध्द नहीं झेल सकती। इस ख़तरनाक प्रवृति से यदि दुनियां को कोई उबार सकता है तो वो हैं हम आम जन, नेतागण को हमें इस अंधी गली में धकेलकर और झूठे सच्चे ख़्वाब बेचकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। वैसे भी यदि लोकतंत्र सुचारू रूप से संचालित नहीं होता तो वहां अराजकता का राज होता है और वहां से तानाशाही प्रवृति का उदय होता है, जो दुनियां को एक ऐसे अंधेरी कोठारी में धकेल देती है जहां अमानवता के पास सिसकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता। ऐसी प्रवृति से हमें सच्चा ज्ञान और वैज्ञानिक चेतना ही उबार सकता है बशर्ते अफवाहों और झूठे वादे को चीरकर हमारे अंदर सच का सामना करने की हिम्मत हो, ठीक उस हंस की तरह तो दूध में मिले पानी को अलग-अलग करने की क्षमता रखता है। सनद रहे, आस्थाएं अंधी होती हैं।
सत्य का मार्ग ज़रा दुर्गम है। लेकिन बिना गहरे पानी में पैठ लगाए मोती हासिल किया भी नहीं जा सकता और जो कलाकार गहरे पैठने से बचे, वो कलाकार कैसा !!! कलाकार कहलाने की कुछ शर्तें और ज़िम्मेदारियाँ होतीं हैं। कला के क्षेत्र में घुसपैठ करनेवाला हर व्यक्ति कलाकार नहीं होता।

#फोटो - चार्ली का नदी में वो जम्प ।

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