Monday, January 23, 2017

दस्तक पटना का नाट्योत्सव : रंग दस्तक 2017

नाट्य दल दस्तक की स्थापना 15 साल पहले हुई थी. तब से लेकर अब तक इस नाट्यदल ने कई नाटकों का मंचन कुशलतापूर्वक किया है. अब दस्तक के अध्याय में एक नया आयाम अब जुड़ने जा रहा है. इस तीन दिवसीय नाट्योत्सव का नाम “रंग-दस्तक -2017” है. इस उत्सव में दस्तक के तीन नाटकों – पटकथा (धूमिल की लंबी कविता) का मंचन प्रेमचंद रंगशाला, पटना में 24 जनवरी 2017 को संध्या 6:30 बजे, भूख और किराएदार नामक नाटक का मंचन क्रमशः 25 व 26 जनवरी 2017 को कालिदास रंगालय, पटना में संध्या 6:30 बजे से किया जाएगा.

नाट्य दल दस्तक के बारे में

रंगकर्मियों को सृजनात्मक, सकारात्मक माहौल एवं रंगप्रेमियों को सार्थक, सृजनात्मक, नवीन और उद्देश्यपूर्ण कलात्मक अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से “दस्तक” की स्थापना सन 2 दिसम्बर 2002 को पटना में हुई. दस्तक ने अब तक मेरे सपने वापस करो (संजय कुंदन की कहानी), गुजरात (गुजरात दंगे पर आधारित विभिन्न कवियों की कविताओं पर आधारित नाटक), करप्शन जिंदाबाद, हाय सपना रे (मेगुअल द सर्वानते के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास Don Quixote पर आधारित नाटक), राम सजीवन की प्रेम कथा (उदय प्रकाश की कहानी), एक लड़की पांच दीवाने (हरिशंकर परसाई की कहानी), एक और दुर्घटना (दरियो फ़ो लिखित नाटक) आदि नाटकों का कुशलतापूर्वक मंचन किया है.

दस्तक का उद्देश्य केवल नाटकों का मंचन करना ही नहीं बल्कि कलाकारों के शारीरिक, बौधिक व कलात्मक स्तर को परिष्कृत करना और नाट्यप्रेमियों के समक्ष समसामयिक, प्रायोगिक और सार्थक रचनाओं की नाट्य प्रस्तुति प्रस्तुत करना भी है.

नाटक पटकथा के बारे में                                                                  

दस्तक, पटना की प्रस्तुति

सुदामा पांडेय “धूमिल” लिखित लंबी कविता

पटकथा

आशुतोष अभिज्ञ का एकल अभिनय

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

ध्वनि संचालन – आकाश कुमार

प्रस्तुति प्रबंधन –  सुजीत कुमार, मंज़र हुसैन

प्रस्तुति संचालक – रेखा सिंह

सहयोग – अरुण कुमार, राहुल कुमार

परिकल्पना व निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – प्रेमचंद रंगशाला, पटना

दिनांक – 24 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

पटकथा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लंबी कविताओं में से एक है जो भारतीय आम अवाम के सपने, देश की आज़ादी और आज़ादी के सपनों और उसके बिखराव की पड़ताल करती है. देश की आज़ादी से आम आवाम ने भी कुछ सपने पाल रखे थे किन्तु सच्चाई यह है उनके सपने पुरे से ज़्यादा अधूरे रह गए. अब हालत यह है कि अपनी ही चुनी सरकार कभी क्षेत्रीय हित, साम्प्रदायिकता, तो कभी धर्म, भाषा, सुरक्षा, तो कभी लुभावने जुमलों के नाम पर लोगों और उनके सपनों का दोहन कर रही है. इस कविता के माध्यम से धूमिल व्यवस्था के इसी शोषण चक्र को क्रूरतापूर्वक उजागर किया है और लोगो को नया सोचने, समझने तथा विचारयुक्त होकर सामाजिक विसंगतियो को दूर करने की प्रेरणा भी देते हैं. कहा जा सकता है कि पटकथा प्रजातंत्र के नाम पर खुली भिन्न – भिन्न प्रकार के बेवफाई की बेरहम दुकानों से मोहभंग और कुछ नया रचने के आह्वान की कविता है. यह कविता बेरहमी, बेदर्दी और बेबाकी से कई धाराओं और विचारधाराओं और उसके नाम के माला जाप करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का काम करती है; वहीं आम आदमी की अज्ञानता-युक्त शराफत और लाचारी भरी कायरता पर भी क्रूरता पूर्वक सवाल करती है.

नाटक- ‘किराएदार’ के बारे में

यह फ़्योदोर दोस्तोव्येसकी की लंबी कहानी “रजत रातें” से प्रभावित नाटक है जो एक लड़का, एक लड़की और एक आदमी के माध्यम से प्रेम की संवेदनाओं सम्बन्धों की पड़ताल दुनियावी मान्यताओं से परे जाकर करता है. यहाँ प्रेम पाने, खोने, यथार्थवादी, आध्यात्मवादी मान्यताओं के परे जाकर एहसासों की बात करता है. यहाँ प्रेम एक मनःस्थिति है न कि खोना, पाना या हासिल करना.

मंच पर – रेखा सिंह, पुंज प्रकाश और आकाश कुमार

प्रकाश परिकल्पना – सुमन सौरव

सहयोग – अरुण कुमार, राहुल कुमार

ध्वनि – सुजीत कुमार

सहायक निर्देशक – अमन कुमार

पूर्वाभ्यास प्रभारी – बादल कुमार

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

प्रस्तुति प्रभारी – सुधांशु शेखर

प्रस्तुति संचालक – मंज़र हुसैन एवं नीतीश कुमार

सानिध्य – ऋचा शर्मा एवं मुन्ना कुमार पांडेय

नाट्यालेख, परिकल्पना और निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – कालिदास रंगालय, पटना

दिनांक – 25 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

नाटक भूख के बारे में

हाल ही की एक सच्ची घटना है जब एक महानगर में तीन बहनों ने अपने आपको घर के अंदर क़ैद कर लिया था और अपने आपको मजबूरन भूखों मरने के लिए छोड़ दिया था. इस क्रम में छोटी बहन की मौत हो गई और किसी प्रकार दो बहनों को ज़िंदा बचा लिया गया. इस पूरी घटना की पड़ताल करने पर कई पहलू निकलकर सामने आते हैं और हमें देश, समाज, सामाजिक – राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था समेत मानवता के क्रूरतम पक्ष से साक्षात्कार कराते हैं. एक ऐसे देश में जिसकी पहचान ही कृषि प्रधान देश के रूप में हो, वहां इंसानों का भूख से दम तोड़ देना एक भयानक घटना और क्रूरतम सच्चाई नहीं तो और क्या है? सच्ची घटना पर आधारित इस नाटक का लेखन पुंज प्रकाश ने किया है. इस वृतचित्रात्मक नाटक में रेखा सिंह, अरुण कुमार, राहुल कुमार, सुजीत कुमार, मंज़र हुसैन, अमन कुमार, बादल कुमार आदि अभिनेता/अभिनेत्री काम कर रहे हैं.

मंच परे :-

ध्वनि संचालन – आकाश कुमार

सहयोग – सुधांशु शेखर

प्रकाश परिकल्पना – पुंज प्रकाश

सहायक निर्देशक – अमन कुमार

मंच सामग्री – दस्तक परिवार

पूर्वाभ्यास प्रभारी – बादल कुमार

सानिध्य – ऋचा शर्मा व मुन्ना के. पांडेय

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

नाटककार, परिकल्पना एवं निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – कालिदास रंगालय, पटना

दिनांक – 26 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

इस उत्सव का कोई स्पॉन्सर/ग्रांट नहीं है. रंगप्रेमियों से उचित सहयोग की कामना के साथ टिकट के द्वारा शो करने का एक प्रयास है. टिकट दर 50रू प्रतिदिन है.

Sunday, January 1, 2017

वर्ष 2017 : पूरा विश्व ही हमारा घर है।

नया वर्ष में केवल कलेंडर ही बदलता है बाकि सब जस का तस रहता है - प्यार, स्नेह, दुश्मनी, दोस्ती, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा सब। एक कलाकार ह्रदय संवेदनशील व्यक्ति के लिए प्यार, स्नेह, सम्मान, दोस्ती का साथ हर क़ीमत पर निभाना उसकी फ़ितरत है और दुश्मनी, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा, धंधेबाजी, गुटबाज़ी आदि से मुक्त हो निःस्वार्थ भाव से अपना काम करते रहना उसका जूनून। 
उन सबका आभार प्रकट क्या करूँ जो मेरी ताक़त हैं? एक साल ही ख़त्म हुआ है केवल, ज़िन्दगी अभी बहुत लंबी है और जितना कुछ किया गया है उससे बहुत ज़्यादा करने को बचा है - आपका साथ व भरोसा बना रहे और मुझमें सदा इतना होश और जोश रहे कि मैं अपने कर्म और व्यवहार से सदा आपके दिल में जगह पाता रहूं - यही आशा है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात में यकीन नहीं रखता कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है पूरा साल भी वैसा ही बीतेगा। दुःख, सुख जीवन के अंग है और पूरी दुनियां में यह सब एक साथ चलता रहता है। एक कलाकार की दुनियां केवल अपने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि पूरा विश्व उसमें समाहित होता है। नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित नाटककार दारियो फ़ो कहते हैं - "पूरा विश्व ही हमारा घर है और आज़ादी हमारा क़ानून। क्रांति हमारे दिल में बसे, हमारा बस यही एक विचार है।" 
भगवत गीता की यह पंक्ति भी आज के दिन याद करने योग्य है - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)
भारत, भरतीयता, हिंदुस्तान, भारतीय संस्कृति आदि के नाम पर भी मूढ़ता पसारने का खेल ख़तरनाक तरीके से खेला जा रहा है। विविधता इस देश की संस्कृति है और उसका सम्मान संस्कृतिक पहचान। भारत एक फुलवारी है जिसमें हर प्रकार के फूल खिलते और फलते फूलते हैं। इस पहचान की रक्षा करना प्रथम नागरिक कर्तव्य है। भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं - भारतीय भूमि, जन, संप्रभुता, भाषा एवं संस्कृति। इसके अतिरिक्त अंतःकरण की शुचिता (आंतरिक व बाह्य शुचिता) तथा सतत सात्विकता पूर्ण आनन्दमयता भी भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं। भारतीय जीवन मूल्यों से निष्ठापूर्वक जीना तथा उनकी सतत रक्षा ही सच्ची भारतीयता की कसौटी है। संयम, अनाक्रमण, सहिष्णुता, त्याग, औदार्य (उदारता), रचनात्मकता, सह-अस्तित्व, बंधुत्व आदि प्रमुख भारतीय जीवन मूल्य हैं। 
मूलतः नास्तिक आदमी हूँ किन्तु किसी भी किताब में कही गई किसी अच्छी बात से मुझे कोई परहेज नहीं। अच्छी बातों का उल्लेख करना भी कोई बुरी बात नहीं और ज्ञान कहीं से भी मिले उसे धारण करने में कोई बुराई नहीं। वैसे भी भारत, भारतीयता, राष्ट्रवाद, धर्म के नाम पर उन्माद फैलानेवालों की आज कोई कमी नहीं। वो हमें इसलिए भी मुर्ख बनाने में कामयाब होते हैं क्योंकि हम शायद खुद इन शब्दों का उचित अर्थ नहीं पहचानते। भारतीयता की प्रकृति से तात्पर्य उन मान बिंदुओं से है जिनकी उपस्थिति में भारतीयता का आभास होता है। भारतीयता निम्नांकित बिंदुओं/अवधारणाओं से प्रकट होती है-
वसुधैव कटुम्बकम् की अवधारणा : संपूर्ण विश्व को परिवार मानने की विशाल भावना भारतीयता में समाविष्ट हैं। 
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। 
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।
(यह मेरा है, यह पराया है, ऐसे विचार तुच्छ या निम्न कोटि के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति समस्त संसार को ही कुटुम्ब मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम का मन विश्वबंधुत्व की शिक्षा देता है।)

विश्व कल्याण की अवधारणा :
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःख भाग्भवेत।।

भारतीय वांग्मय में सदा सबके कल्याण की कामना की गई है। उसे ही सार्वभौम मानवधर्म माना गया है।मार्कण्डेय पुराण में सभी प्राणियों के कल्याण की बात की गई है। सभी प्राणी प्रसन्न रहें। किसी भी प्राणी को कोई व्याधि या मानसिक व्यथा न हो। सभी कर्मों से सिद्ध हों। सभी प्राणियों को अपना तथा अपने पुत्रों के हित के समान वर्ताव करें।
विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प : ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ (सारी दुनिया को श्रेष्ठ, सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाएंगे।) यह संकल्प भारतीयता के श्रेष्ठ उद्देश्य को व्यक्त करता है।
सहिष्णुता : सहिष्णुता से तात्पर्य सहनशक्ति व क्षमाशीलता से है। धैर्य, विनम्रता, मौन भाव, शालीनता आदि इसके अनिवार्य तत्व हैं। भारतीयता का यह तत्व भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। यही कारण है कि भारत की कभी भी अपने राज्य विस्तार की इच्छा नहीं रही तथा सभी धर्मां को अपने यहां फलते-फूलने की जगह दी।
अहिंसात्मक प्रवृत्ति : अहिंसा से तात्पर्य हिंसा न करने से है। कहा गया है कि ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान मानो। महावीर, बुद्ध तथा महात्मा गांधी ने विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महाभारत में भी कहा गया है कि मनसा, वाचा तथा कर्मणा किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। हमारे ऋषियों ने अहिंसा को धर्म का द्वार बताया है। जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म बताया गया है।
आध्यत्मिकता : आध्यात्मिकता भारतीयता को अन्य संस्कृतियों के गुणों से अलग करती है। ईश्वर के प्रति समर्पण भाव ही आध्यात्मिकता है। भक्ति, ज्ञान व कर्म मार्ग से आध्यात्मिकता प्राप्त की जा सकती है। यह आत्मा के संपूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।पुरूषार्थ चतुष्टय आध्यात्म में संचालित, प्रेरित व अनुशासित होता है। आध्यात्म के क्षेत्र में भारत को गुरू मानता है।
एकेश्वरवाद की अवधारणा :
एकं सद् विप्राः बहुनाम वदन्ति। 
(ईश्वर एक है। विद्वान उसे अनेकों नाम से पुकारते हैं)

इस्लाम ने भी ईश्वर के एक होने की बात की है परंतु उसी सांस में यह भी कह दिया कि उसका पैगम्बर मौहम्मद है तथा उसके ग्रंथ कुरान में भी आस्था रखने की बात कही। यही बात ईसाइयत में है। भारत में ईश्वर को किसी पैगम्बर व ग्रंथ से नहीं बांधा है।
सर्वधर्म समभाव : भारत में सभी धर्म राज्य की दृष्टि में समान हैं। पूजा की सभी पद्धतियों का आदर करो तथा सभी धर्मां के प्रति सहिष्णुता बरतो।धर्म, मजहब, पंथ एक नहीं हैं। इस्लाम व ईसाइयत को पंथ/मजहब कह सकते हैं जबकि हिंदु धर्म 'जीवन पद्धति' है। कहा भी गया है कि-
‘‘धारयते इति धर्मः’’
अर्थात् जो धारण करता है, वहीं धर्म है। इसका अर्थ है पवित्र आचरण व मानव कर्तव्यों की एक आचार सहिंता। मनु ने धर्म के 10 लक्षण (तत्व) बताए हैं-

१. धृति - धैर्य / संतोष 
२. क्षमा - क्षमा कर देना 
३. दम - मानसिक अनुशासन 
४. अस्तेय - चोरी नहीं करना 
५. शौच - विचार व कर्म की पवित्रता 
६. इंद्रिय निग्रह - इंद्रियों को वश में करना 
७. धी - बुद्धि एवं विवेका का विकास 
८. विद्या - ज्ञान की प्राप्ति 
९. सत्य - सच्चाई 
१०. अक्रोध - क्रोध न करना

धर्म की इस परिभाषा में कुछ भी सांप्रदायिक नहीं है। भारतीय दृष्टि से लोग अलग पंथ/मजहब/पूजा पद्धति में विश्वास करते हुए इस धर्म का अनुसरण कर सकते हैं। जीवन के प्रति संश्लिष्ट दृष्टि - चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मानव जीवन के प्रेरक तत्व।
धर्म राज्य / राम राज्य की अवधारणा : राजा या शासन लोकहित को व्यक्तिगत रूचि या अरूचि के उपर समझे। महाभारत में निर्देश हैं कि जो राजा प्रजा के संरक्षण का आश्वासन देकर विफल रहता है तो उसके साथ पागल कुत्ते का सा व्यवहार करना चाहिए।
अनेकता में एकता : भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि यहां अनेक जातियां, खान-पान, वेश-भूषा, भाषा, प्रांत होने के बावजूद भी राष्ट्र के नाम पर एकता है।
राष्ट्रीयता : भारतीयता राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने का ही दूसरा नाम है। राष्ट्रीयता में केवल राजनीतिक निष्ठा ही शामिल नहीं होती बल्कि देश की विरासत और उसकी संस्कृति के प्रति अनुशक्ति की भावना, आत्मगर्व की अनुभूति आदि भी शामिल है। भारतीयता सभी भारतीयों में राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने के सिवाय कुछ भी नहीं है।
राष्ट्रवाद और धर्म का मुखौटा पहनकर नफ़रत की राजनीति करनेवाले लोग और समूह मासूम आमजन और देश को बांटने का कार्य करती हैं, इसका भारतीयता और भारतीय संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। ये केवल सत्ता की राजनीति करना जानते हैं, इनका किसी भी प्रकार के विकास से कोई ख़ास मतलब भी नहीं होता। और जहाँ तक सवाल सेवा भाव का है तो यह भी इनका एक ढोंग ही होता है। पडोसी के घर में आग लगाकर कोई भी अमन पसंद व्यक्ति या समूह कभी भी चैन से नहीं रह सकता। आज़ादी और ख़ुशी अकेले में अकेले की नहीं बल्कि सामूहिक होती है।
बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है - "किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है"

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है, 
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है, 
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,
उसी की जनवरी छब्बीस,
उसी का पंद्रह अगस्त है !

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,
गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,
धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,
कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

Wednesday, November 23, 2016

देशभक्ति, बदलाव और विकास उर्फ़ नोट छोड़ो paytm करो

देशभक्ति, बदलाव और विकास यह तीनों आजकल जादू की छड़ी का काम कर रहे हैं। आप कुछ भी कीजिए बस उसके ऊपर यह छड़ी घूमा दीजिए, आपके सारे कृत पाक-साफ। वर्तमान में नोटबंदी को भी इसी जादू से जोड़ दिया गया है। नोटबंदी से भ्रष्टाचार, गरीबी, कालाधन आदि ब्रह्मराक्षसों के शिकार करने की बात प्रचारित की जा रही है जबकि ज़रा सा भी सही से इतिहास और अर्थशास्त्र को जानने समझनेवाला व्यक्ति इसे भी ज़रूरत से ज़्यादा उछाला हुआ मामला ही मानेगा। दुनियां में इससे पहले भी नोटबंदी हुए हैं लेकिन आजतक किसी भी मामले में कोई स्थायी समाधान निकाला हो, ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिलता है। काला धन और भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए केवल नोटबंदी काफी नहीं। वैसे भी नगदी और गैर-नगदी (cash and cashless) व्यवस्था भ्रष्टाचार का एक पक्ष मात्र है, जड़ नहीं। सोना, रियल एस्टेट, हवाला, कर प्रणाली, प्रशासन, चुनाव में कालाधन आदि की भी बात होनी चाहिए।
वैसे, कल बड़ा ही बढ़िया वक्तव्य था - I am not for sale. वैसे भी sale होने के लिए कोई भी इंसान कभी पैदा नहीं होता। तो अब यह सवाल है कि जब आप बिकने के लिए नहीं हैं तो आपकी तस्वीर paytm के विज्ञापन में क्या कर रही थी?
सनद रहे कि नोटबंदी के बाद paytm की दैनिक खरीदारी 120 करोड़ रूपए को पार कर गई है वहीँ डॉलर के मुकाबले रूपए की हालत पिछले नौ महीने में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है अर्थात् 68.16 ₹ प्रति डॉलर।
हो सकता है यह भी देशहित में एक बदलाव ही हो कि प्रधानमंत्री का चेहरा केवल सरकारी विज्ञापनों में ही क्यों बल्कि गैर-सरकारी विज्ञापन में भी शान से छापे। आखिर "माल" तो बेचारा गैरसरकारी पूंजीपति ही प्रदान करता है - लगभग सारे राजनीतिक दल को, चंदे के रूप में।
यह paytm भी आजकल देश बदलने का नारा बुलंद कर रहा है। इसलिए उनका धंधा भी देशभक्ति और राष्ट्रहित से ही जुड़ा होगा बिल्कुल बाबा रामदेव की तरह जो देशभक्ति और स्वदेशी के नाम पर एक से एक रद्दी प्रोडक्ट बाज़ार में बेचे जा रहे हैं और बेचारे मासूम देशभक्त देशभक्ति और स्वदेशी के नाम पर अपनी मसुमियतयुक्त मूर्खता का एक से एक नमूना पेश कर रहे हैं!! यह देशभक्ति का बाजारवाद नहीं तो क्या है?
बहरहाल, नोटबंदी के दिन से ही paytm आक्रामक विज्ञापन कर रहा है और वर्तमान सरकार के डिजिटल इंडिया के नारे के साथ सुर में सुर मिलते हुए नोट छोड़ने और paytm अपनाने का राग "हुआँ, हुआँ, हुआँ" की तर्ज़ पर अलाप रहा है। नारा भी वैसा ही है अर्थात् देश बदलना है। नारे पर गौर कीजिए -
तुम बदलोगे, एक बदलेगा
सब बदलेंगें, देश बदलेगा
बस "हुआँ, हुआँ, हुआँ" लिखना भूल गए!!!
अब इस सवाल का क्या कोई औचित्य है कि सारे धंधेबाज आजकल देशभक्ति और देश बदलने का नारा क्यों बुलंद कर रहे हैं और जिनके ख़ून में देशभक्ति का एक कतरा तक नहीं वही देशभक्ति के प्रमाणपत्र के विक्रेता हो गए हैं और जो कोई भी इनके "हुआँ, हुआँ" में सुर नहीं मिलता उसे "देशद्रोही" का तमगा दे रहे हैं। नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को यह भ्रम हो जाना कि वही देश के पर्याय हैं कोई नहीं बात नहीं है इस देश के लिए। "madam is India and India is madam" का नारा भी खूब उछाला गया था किसी वक्त, आजकल हर हर और घर घर का दौर है। लेकिन पता नहीं क्यों लोग यह भूल जाते हैं कि इतिहास किसी को माफ़ नहीं करता। इतिहास सबका मूल्यांकन करता है, चाहे वो राजा हो या रंक।
सनद रहे, सत्ता जो राग अलाप कर सत्तासीन होता है आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुनाफाखोर और धंधेबाज़ भी फ़ौरन उसी सुर में सुर मिलाने लगते हैं।
फिर paytm कोई फ्री में अपनी सेवा नहीं देता है बल्कि हर लेन देन के बदले कमीशन लेता है। IRCTC का ऐप देखते ही देखते paytm की गोद में चला गया। पहले हम अपने बैंक खाते से डेविट या क्रेडिट कार्ड के द्वारा आसानी से टिकट कटा लेते थे लेकिन जबसे इसकी देख रेख का ज़िम्मा paytm को दिया गया है तबसे वहां बिना paytm के टिकट कटाना एक चुनौती हो गई है। क्या देश ने कहा कि IRCTC की देख रेख रेलवे के करने से देशभक्ति को खतरा है इसे फ़ौरन से पेश्तर peytm के हवाले किया जाय। हर लेन देन में paytm कमीशन खाता है उसका इस्तेमाल कोई पूंजीपति अपनी जेब भरने के लिए नहीं बल्कि हमारी राष्ट्रवादी सरकार देश सेवा में कर रही होगी - इस बात पर जिसे भी शक है वह दरअसल देशद्रोही है। वैसे सरकारी सेवाओं का निजीकरण भी उदारवाद का एक सड़ा और बकवास सा फार्मूला है। सरकारी तंत्रों को दुरुस्त करने के बजाय उसे किसी पूंजीपति या धंधेबाज के हाथों में सौंप दिया जाना देशभक्ति की किस किताब के कौन से अध्याय में उचित है और यह किताब कब और कहाँ छपी - यह एक खोज का विषय है। ज़रा हमारी भी जानकारी दुरुस्त किया जाय ताकि हम भी देशभक्ति का पाठ ज़रा पढ़ ले। इस नोटबंदी से आम आदमी की मुसीबत तो जो है सो है यदि बैंक कर्मचारी अपनी नौकरी का मोह त्यागकर अपनी मुसीबतें लिख दें तो भूचाल आ जाएगा। सरकार जिस तरह रोज़ नए नए फरमान सुना रही है इससे तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि दूरदर्शिता का पाठ पढनेवाले यह सरकार की तैयारी बहुत ही बचकानी थी।
paytm के लिए स्मार्टफोन चाहिए, फिर ठीक ठाक नेट कनेक्शन और नेट पैक चाहिए। अब इस देश के कितने प्रतिशत आबादी इस आफत को गले लगाने को तैयार है? खैर, आबादी की चिंता करे कौन? वैसे भी चुनाव में पैसा आबादी कम पूंजीवादी ज़्यादा लगाते हैं। तो जिसका खाया उसको चुकाना हमारा धर्म है। हम चाहे कुछ भी हों लेकिन नमक-हराम तो कतई नहीं है!!!
वोट विकास के नाम पर मिला था देश बदलने के नाम पर नहीं और कोई भी बदलाव ज़मीनी रूप से आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर से शुरू होता है जबरन थोपा नहीं जाता। असल बात मानसिकता है न कि भौतिकता।
इतिहास देख लीजिए, जिस किसी ने मानसिकता में बदलाव किए बिना जन पर किसी भी प्रकार का कोई दवाब बनाया है - उसका आज इतिहास में कोई नामलेवा तक नहीं बचा है, बड़ी-बड़ी सल्तनतें तबाह हो गईं; और जो कोई भी मानवीय चेतना से लैस होकर अपना लश्कर कठिन से कठिन वक्त में भी गतिमान रखा उसने भले ही कोई "बंदरी सेना" न बनाई हो लेकिन उनका नाम आज भी स्नेह से याद किया जाता है। यह लोकतंत्र है। इसमें नायक अन्तः जनता होती ही है। हालांकि नायकत्व का भ्रम बीच-बीच में अफसरों-नेताओं आदि को होता रहता है। किसी लोक गायक का एक गीत याद आ रहा है -
जनता की चले पल्टनियां
हिल्ले ले झकझोर दुनियां

दैनिक समाचार पत्र hindustan times का एक आर्टिकल संलग्न कर रहा हूँ और साथ में लिंक भी

Cash in circulation in an economy has little correlation with corruption, a comparative analysis of World Bank and Transparency International data suggests, deepening suspicion that those with black money prefer to keep their ill-gotten wealth in other forms of assets.

While figures show that India holds 11.8% of its economy in cash and is ranked a poor 76th in the global corruption ranking. Germany, at 9th in the graft ranking, has an 8.7% cash economy.

Sweden, one of the world’s top three least corrupt countries, and Nigeria, one of the worst, has near similar proportion of cash in their economies.

Hindustan Times analysed the cash in circulation and GDP of 26 countries – 12 top economies barring the US and China, 12 very corrupt countries with stable governments, and three mid-sized economies with varying corruption ranks.

The findings suggested India’s cash in circulation as a portion of GDP was near about international standards.

France, for example, holds 9.4% in cash and is ranked 23 by the anti-graft body, Transparency International. Experts said India’s marginally more cash proportion could be because a majority of Indians depend on cash for daily transactions in absence of inadequate banking facilities.

Japan, the world’s third largest economy and ranked 18th on the corruption index, has 20.7% cash economy.

The analysis of data showed up another interesting fact: Russia, the world’s 13 largest economy and Spain, the 14th largest, shared the same proportion of cash economy.

Yet, Russia is ranked 119 on the corruption index while Spain is a lot cleaner at 36. Corruption, the data suggested, had little impact on their cash in circulation.

http://m.hindustantimes.com/business-news/little-connection-between-cash-in-economy-and-corruption/story-EthX7dL7j2m1szcQkPUi7N.html

Tuesday, November 15, 2016

गाँव में धूमिल की लंबी कविता पटकथा

जैसे ही पटकथा की प्रस्तुति गांव गोंदर बिगहा, हिसुआ, नवादा (बिहार) में करने की बात हुई एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि क्या धूमिल की कविता की यह विम्बत्मक प्रस्तुति गांव के दर्शकों की जिज्ञासा को शांत कर पाएगी? क्या वो इस प्रस्तुति को सहजतापूर्वक ग्राह्य कर समझ पाएगें? इस सोच के पीछे कई सारे पूर्वाग्रह थे। गांव को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, बौद्धिक आदि स्तर पर पिछड़ा मानने का प्रचलन इस कदर व्याप्त है कि इसी देश में देहाती और गंवार जैसे शब्दों को गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह भी सच है कि शिक्षा का अर्थ केवल किताबी और डिग्री नहीं होता।
कविता ज़्यादातर लोगों के समझ में नहीं आती। समझ में आएगी कैसे जबतक कि कविता पढ़ने या समझने की कोशिश न किया जाय, उसे आदत में शम्मिलित नहीं किया जाए। वैसे भी कोई भी चीज़ समझने से समझ में आती है, उसके लिए थोड़ा प्रयास खुद भी करना पड़ता है न कि यह मान लेने से कि वो चीज़ समझ में ही नहीं आती है।
बहरहाल, समझ में आने, न आने का भय तो हमें पटना जैसे शहर में पहली प्रस्तुति करने के दौरान भी था लेकिन प्रस्तुति प्रारंभ होने के कुछ मिनटों के पश्चात् ही यह भय जाता रहा था। कालिदास रंगालय में दर्शक जिस जीवंतता के साथ धूमिल की इस प्रतिष्ठित कविता पर एकल अभिनय कर रहे आशुतोष अभिज्ञ का साथ दे रहे थे; वह अद्भुत था। अब तो आशुतोष ने इस कविता और उसके रंगमंचीय विम्बों को इस तरह आत्मसात कर लिया कि उसे पटकथा में अभिनय करते देखना एक सुखद अनुभूति की तरह हो गया है। तकनीकी भाषा में इसे इज़ कहते हैं।
बहरहाल, हम पटना के चर्चित रंगमंच, टेलीविजन और फिल्म अभिनेता बुल्लू कुमार के गांव गोंदर बिगहा, हिसुआ, नवादा (बिहार) पहुंचे। राजगीर पर्वतमाला, नदी, खेत-खलिहान से शुशोभित यह एक अद्भुत गाँव है। कुछ ऐसा कि कोई भी कलाकार ह्रदय व्यक्ति यहाँ पहुंचकर आह्लादित हो उठे। अपने जूनून से इसी पहाड़ी का एक सिरा दशरथ मांझी ने काटकर रास्ता बना दिया था। कौन जाने हम में से किस-किसकी नियति कुछ ऐसी ही हो।
यहाँ छठ के अवसर पर हर वर्ष कम से कम संसाधनों में तीन दिन नाटक खेलने का प्रचलन है। चौकी जोड़कर टेम्प्रोरी मंच बनाया जाता है। माइक लगाए जाते हैं। दरी आदि बिछाए जाते हैं। ग्रामीण नाटकों की अपनी शैली और चुनौतियाँ हैं जिनपर बात फिर कभी। रात करीब 8 बजे के आसपास पटकथा की प्रस्तुति प्रारंभ हुई। शाम से ही लोग बोरा बिछाकर अपनी-अपनी सीट लूटने में व्यस्त थे। दर्शक दीर्घा में गांव के बच्चों से लेकर बूढ़े तक विराजमान थे। स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियां, लड़के-लड़कियां सब; और जिस शांत भाव से इन्होंने पटकथा और अन्य नाटक की प्रस्तुति देखी वह सच में कमाल है। उनकी जीवंतता किसी भी दर्शकों से कतई भी कम नहीं थी। बल्कि शालीनता में चार कदम आगे ही थे। धैर्य तो ऐसा कि कोई भी कलाकार फ़िदा हो जाए। लगता है जैसे गांव और गांववालों ने कला के नाम पर केवल स्वीकारना ही सीखा है, नकारना और पूर्वाग्रह शहरवालों के लिए छोड़ दिया है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद, गांव में आज भी चैन है, सुकून है, तकनीक से ज़्यादा बात का भाव है। कुछ बड़े महोत्सव में no entry का दंश झेलता हमारी पटकथा शहर-कस्बों के सभागारों, स्कुल-कॉलेजों से होता हुआ उनतक पहुंचकर जैसे थोड़ा और ज़्यादा सार्थक सा कुछ हो गया हो। पटकथा में वर्णित स्थितियों-परिस्थियों को सबसे ज़्यादा जनता को ही समझने की ज़रूरत है और गांव से बेहतरीन जनता और कहाँ मिलेगी। वैसे भी धूमिल दाद और वाह-वाह वाले कवि तो हैं नहीं।
अंत में, भिखारी ठाकुर की रचनाओं और जीवनवृत पर आधारित अपने ही लिखे नाटक "नटमेठिया" की एक लाइन याद आ रही है - "नाच न बंद होगा। नाच खातिर तो सबकुछ किया, अब कैसे छोड़ दें यह नाच।"
यह ज़िद्द है तो ज़िद्द ही सही। वैसे भी बिना ज़िद्द के कुछ हासिल भी तो नहीं होता। इसलिए जूनून कायम रहे और हौसला बुलंद। 

Friday, October 21, 2016

वाचिक परंपरा के साहित्यकार बॉब डिलन

किसे साहित्य कहा जाय किसे नहीं, यह बहस एकबार फिर शिखर पर है। कारण है गायक, गीतकार और संगीतकार व दुनियां भर में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलना। अमूमन उपन्यास, कविता, कहानी को ही साहित्य माना जाता है; इन सब में भी बहुत सारे भेद-विभेद हैं। वैसे वाचिक परंपरा साहित्य की सबसे पुरानी परंपरा है। इंसान निश्चित ही लिखने से पहले बोलना सिखाता है। हालांकि इससे पूर्व डिलन को ऑस्कर, ग्रेमी, गोल्डन ग्लोब अवार्ड, प्रेजिडेंट मेडल ऑफ फ्रीडमऔर पुलित्ज़र समेत अनगिनत सम्मान मिल चुका है और इन सबसे बड़ा सम्मान यह है कि 60 के दशक से आज तक वो दुनियां भर के संगीत प्रमियों में एक अत्यंत ही प्रतिष्ठित नाम हैं।
बॉब डेलेन "सार्थक" संगीत के क्षेत्र में मेरे पसंदीदा नामों में से एक हैं। मैंने उन्हें तब सुनना शुरू किया था जब अंग्रेजी मेरे लिए अमिताभ बच्चन वाली "फन्नी लैंग्वेज" हुआ करती थी। वैसे मेरी अंग्रेजी की हालत आज भी कोई गर्व करने लायक तो नहीं ही है। और जहाँ तक सवाल संगीत का है तो उसका भी कोई प्रकांड विद्वान तो नहीं ही है। हालांकि लोगों को यह भ्रम ज़रूर है कि मुझे संगीत की बेहतरीन समझ है। खैर, मेरे संगीत की समझ से जुड़ा एक किस्सा याद आ रहा है। सन् 1981 में एक फ़िल्म आई थी क्रांति। उसमें एक गाना था - "ज़िन्दगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर लो घड़ी दो घडी।" उन दिनों यह गाना खूब पॉपुलर हुआ था, आज भी है। अब मेरी समझ में यह नहीं आता था कि यह "घड़ी दो घड़ी" मतलब कि लोग घड़ी क्यों मांग रहे हैं और फिर कौन सी घड़ी मांग रहे हैं - हाथ वाली, टेबल वाली या फिर दिवार वाली?
संगीत के बारे में लगातार पढ़, सुन और यथासंभव रियाज़ करके कुछ हद तक साधने की कोशिश की। यदि मेरा मूड़ ठीक हो तो दिन भर हर तरह का संगीत गाते रहना या संगीत सुनते रहना - मेरी आदतों में शुमार है। इसी कोशिश में दुनियां भर का संगीत सुनने की कोशिश करता हूँ - अच्छा बुरा सब। किसी गुरु के जाकर संगीत नहीं सीखा लेकिन शायद लगातार विभिन्न प्रकार के संगीत सुनना और उसे गाने की कोशिश करना ही मेरी संगीत साधना है।
अब बात डिलन की - डिलन 22 वर्ष की उम्र से गा रहे हैं। उनका जन्म 1941 में रॉबर्ट ऐलेन जिमरमैन में हुआ था। डेलेन ने अपने म्यूजिकल करिअर की शुरुआत मिनिसोता के एक कॉफी हाउस से 1959 में की थी। 1960 में उनके गानों ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। मार्च ऑन वाशिंगटन फॉर जॉब्स एन्ड फ्रीडम में नस्लभेद के ख़िलाफ़ दिया गया मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण "आई हैव अ ड्रीम" ने डिलन की ज़िंदगी बदल दी फिर वो लग गए उस दौर के युवा असंतोष को आवाज़ देने में। उनका एल्बम ब्लोइंग विथ द विंड ने प्रतिरोध का स्वर मुखर कर दिया था और बॉब सफलता के चर्मोउत्कर्ष पर पहुँच गए। डेलेन के गाने 'ब्लोविन इन द विंड, ऐंड द टाइम्स दे आर ए चेजिंग' मानवाधिकार संगठनों और युद्ध विरोधी संगठनों के लिए एंथम साबित हुए। डेलेने ने पारंपरिक संगीत के अलावा संगीत की अन्य विधाओं में हाथ आजमाया जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। किसी गीतकार को संभवत: पहली बार उनके गीतों के लिए नोबेल दिया गया है। गीतों के लिए कवियों को नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।
बॉब डिलन के गीत पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में मिस्टर टैंबूरिन मैन से लेकर लाइक ए रोलिंग स्टोन, ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर चेजिंग शामिल हैं। बहरहाल, आज ज़रूरत है साहित्य के दायरे को विस्तार देने की और उसके प्रचलित परिपाटी, संस्कार और परिभाषाओं की सीमा को विस्तार देने की।
बहुत खूब मेरे पसंदीदा गायक डिलन। आपने विश्व संगीत, साहित्य और मानवीय जीवन को एक नया, लोकप्रिय और सार्थक आयाम दिया है।
बॉब डिलन के एक मशहूर गीत 'मिस्टर टम्बरिन मैन' का 'दैनिक हिन्दुस्तान' में छपा है. पढ़ा जाय। -

मिस्टर टम्बरिन मैन

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

मालूम है मुझे कल के महल आज बिखरे राखों में पड़े
धुंए के फाए से
अंधे कुएं में पड़ा मैं, गायब नींद है
पस्त मेरे हौसले, मेरी खामोश चीख से
न मिलना बाकी किसी से
जमीनें इतनी सूखी, न सपने उगे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

आ चल हम उडे़ं तेरी जादुई नाव में
होश गुम मेरे और दम खतम बाहों में
पांव भी सोए हैं
अपने आप आते, आवारा से पड़ते
हर मंजिल तक चलेंगे, बुझ गई वो लौ बनेंगे
अपनी नुमाइश में जलेंगे, कोई मंतर लगा, जाम दे
वादा है हम पियेंगे...

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

गूंजेंगी हंसी की, कुछ थिरकने की आवाजें, सूरज से भी आगे
ये कोई चुहल नहीं है, ये शोर है बच भागने का
और बढ़ने की हद केवल आसमां है
कोरस जुलूसों में एक नारा बेढंगा सा उठे
तेरी होशियार तालों में, वो बेहूदा बाजू में
उसे छोड़ो, बढ़ो आगे
वो पागल बस ढूंढ़ता है परछाइयां

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए।

और घोल दे मुझे मेरे मन के इस भंवर में,
सालों घनी तहों में, आगे झडे़ पत्तों से,
रोते पडे़ पेड़ों से, हवादार किनारों में
दूर और दूर उदासी की हदों से,
जहां तारों तले झूमें हम, लहराती फसल से
समंदर की गोदी में चमकीली रेतों से नहाते
सारी यादें सारी किस्मतें कर लहरों के हवाले
कल भर तक बस, आज को भूल जाने दे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए
(अंग्रेजी से अनुवाद: स्वप्निलकांत दीक्षित)
उनके द्वारा गाया और लिखा मेरा सबसे पसंदीदा गीत इस लिंक पर सुनिए।
 https://g.co/kgs/9QdVoI

Tuesday, August 9, 2016

एक मध्यवर्गीय लड़के का जन्मदिन

अपनेआप को लड़का क्यों कह रहा हूँ? तर्क तगड़ा है कि यदि पचास साल के कवि, कथाकार, रंगकर्मी आदि युवा कहलाते हैं तो उस हिसाब से तो मैं अभी लड़का ही हुआ न! तो जन्मदिन था। रंगकर्मी का जन्मदिन नाटकीय न हो तो लानत है। तो हुआ यह कि छः तारीख को रांची से पटना जाने का प्रोग्राम था लेकिन 3G, 4G और 5G वाले इस महान तंत्र में मेरे नेट की स्पीड इतनी अद्भुत थी कि कई दिनों से टिकट महोदय कट ही नहीं पा रहे थे। चार अलग-अलग कंपनियों से सिम कार्ड ट्राई किए परन्तु नेट आँख मिचौली कर रहा था और डमरू समय के रथ के पहिए के साथ घूमे ही जा रहा था। बीएसएनएल का तो मामला आज भी “भाई साहेब नहीं लगेगा” वाला ही है। अंततः तंग आकर रात अपने एक स्टूडेंट सुजीत को फोन किया कि मेरा टिकट कटा दो। सुजीत हैदराबाद में था, उसने भी कोशिश की, लेकिन वह भी सफलता हासिल नहीं कर पाया। थक-हारकर रात एक बजे सोने चला गया। तबतक विभिन्न सोशल साइट्स पर जन्मदिन की बधाई के सन्देश आने शुरू हो गए थे। साढ़े चार बजे सुबह के लगभग आँख खुली तो फिर स्मार्टफोन लेकर टिकट कटाने बैठ गया। इस बार सफलता मिली लेकिन तभी सुजीत का भी मैसेज आया कि उसने मेरा टिकट करा दिया है। अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि दोनों में से कौन सा टिकट कैंसल कराया जाय। कमाल यह कि दोनों ही टिकट एक ही बोगी में थे, बस एक नंबर के फर्क के साथ। अन्तः मैंने सुजीत को वाट्सअप किया कि उसने जो टिकट कराया है उसे कैंसिल कर दे। पुनः सोने जाने से पहले सोशल साईट खोला तो बधाई सन्देश के मैसेजों से इनबॉक्स गुलज़ार हुआ पाया।
सुबह – सुबह तीन साल की प्यारी सी बेटी को स्कूल ले जाने की ज़िम्मेदारी मेरी होती है। बेटी और उसकी माँ का उधम चालू हो चुका था लेकिन मेरी आँख खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। बहरहाल, बेटी और उसकी माँ के दुलार-पुचकार से आँख खुली। उठकर अखबार उठाया तो पहले ही पन्ने पर पूरे पन्ने के लेटेस्ट मोबाईल फोन के विज्ञापन ने तमाचा जड़ा और मेरा आधुनिक फोन मुझे किसी कचड़े के डब्बे में परिवर्तित होता प्रतीत होने लगा। स्मार्टफोन को लेकर मेरा पैशन भी कमाल है। मुझे यह दुनिया का सबसे चमत्कारी आविष्कार लगता है। एक छोटे से उपकरण ने अपने अंदर क्या कुछ नहीं समाहित कर लिया है। सो, यदि मेरा वश चले तो मैं रोज़ ही नया से नया मोबाईल फोन इस्तेमाल करूँ, ठीक उस पागल शहंशाह की तरह जो एक बार पहने कपड़े, जूते आदि इत्यादि को दुबारा इस्तेमाल नहीं करता। वैसे आज यह भी खबर कहीं पढ़ी कि हमारे देश के “साहेब जी" भी कपड़ों को लेकर कुछ ऐसे ही शौक रखते हैं।
तो भाग-भाग कर तैयार हुआ। स्कूटर पर हम और बेटी जी महराज निकले। दोनों ने बरसाती धारण कर रखा था। बेटी को पूरे रास्ते गाना, कविता और पापा, ये क्या है वो क्या है करने में बहुत ही मज़ा आता है। सो वो मगन थी। रास्ते भर अजीब सी बारिश हो रही थी – टिप, टिप टिप टिप टाइप और रांची की बारिश का मज़ा यह कि भींगे नहीं कि सर्दी-बुखार के प्यार में गिरफ्तार हुए। तो मैं सड़ा सा मुंह बनाए कछुए की गति से गाड़ी चला रहा था और मन ही मन मेघदूतम के रचयिता कालिदास को बुरा-भला भी कह रहा था। पक्का मिस्टर कालिदास कभी रांची के बारिश में नहीं भींगे होंगे। यदि भींगते और सर्दी-बुखार के प्यार में पड़ते तो मेघदूतम लिखने का रूमानी ख्याल शायद दूर-दूर तक नहीं आता। वैसे भी सर्दी बुखार में अच्छे से अच्छा रूमानी ख्याल अघोरपंथ में तबदील हो जाता है।
बेटी को स्कूल छोड़ने के बाद मुझे प्रसिद्द डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघनाथ दा के अखरा में जाना था। दादा इन दिनों राम दयाल मुंडा जी के ऊपर डाक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे हैं। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे प्रसिद्द फिल्म निर्देशक सत्यजित राय ने रविन्द्र नाथ ठाकुर के ऊपर बनाई थी। बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि राम दयाल मुंडा ने कुछ छोटे – छोटे नाटक भी लिखे थे – एकदम अनोखे तरीके से। हमें राम दयाल मुंडा लिखित नाटकों के फिल्मांकन के लिए जगह देखने संत जेवियर कॉलेज जाना था। मेघनाथ दा मेरी स्कूटी पर सवार हुए और हम फिल्म, रंगमंच और साहित्य पर बात करते हुए संत जेवियर कॉलेज के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने बताया कि आज उनकी बेटी का जन्मदिन है और उसके लिए उन्होंने बेटी के दोस्तों के आग्रह पर वाट्सअप पर सरप्राइज़ एलिमेंट के रूप में अपनी आवाज़ में बधाई सन्देश भेजा है। उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि आज मेरा भी जन्मदिन है। यदि पता होता तो वो मुझे पता नहीं क्या खिलाने – पिलाने लगते। और जहाँ तक सवाल मेरे बताने का है तो हमारे परिवार में कभी जन्मदिन को स्पेशल दिन की तरह मनाने का कभी रिवाज़ ही नहीं रहा इसलिए यह आज भी मेरे लिए किसी अन्य सामान्य दिन की तरह होता है। वैसे भी मध्यवर्गीय मानसिकता के अंतर्गत खोखली खुशी का प्रदर्शन, उसका दिखावा, बेवजह शोरगुल, रीति-रिवाज और खर्च – इन चीज़ों से कभी भी मेरा कोई खास जुड़ाव हुआ भी नहीं। खोखले आडम्बरों से एकांत मुझे ज़्यादा प्रिय है।
तो हम स्पेस देखकर वापस आए। दादा को अखरा में छोड़ा और अब बारी थी बेटी जी महराज को स्कूल से लेकर घर जाने की। इस बीच फेसबुक, वाट्सअप और एसएमएस के ज़रिए देश के कई भागों से जुड़े दोस्तों के बधाई सन्देश भी आ रहे थे और मैं मन ही मन गदगद होता हुआ सबको जवाब देने की कोशिश भी कर रहा था।
बाकि दिन भर के किस्से नहीं सुनाऊंगा। सुनाऊंगा तो क्या पता बहुत से लोग मेरा नाम भारतीय “मर्द” की श्रेणी से काट दें और बोलें हद है यह भी, घर में झाड़ू लगाना, पोंछा लगाना, बर्तन साफ़ करना, खाना पकाना और अपने बच्चे की पॉटी साफ़ करने जैसा “औरताना” का काम करता है। वैसे हद तो यह भी है जी हम इतने “महान” हैं कि काम का भी लिंग और जाति निर्धारण कर रखा है। खैर, जन्मदिन के मौके पर सुबह – सुबह पड़ोस से जो एक मात्र गिफ्ट मिला वो था मूली के पत्ते समेत चार पांच कुपोषित मूली। बाकि देश भर से खूब सोशल मिडिया पर खूब सारे सन्देश और फोन कॉल्स। सन्देश इतने ज़्यादा और प्यारे थे कि यदि बुद्धि -विवेक का चार चांटा न पड़े तो मध्यवर्गीय दिमाग आसमान में ही उड़ने लग सकता था। भाई, आसमान में उडो लेकिन पैर ज़मीन पर ही टिका रहे नहीं तो शुभचिंतक आसमान में उड़ाना जानते हैं तो उन्हें ज़मीन पर पटकना भी और मत भूलो कि संघर्ष ही जीवन है। सफलताएं दिमाग खराब करती है इसलिए सफलताओं को भूल जाओ और असफलताएं याद रखो। तो, कल तथाकथित जन्मदिन जैसा कुछ था नहीं हां बहुत सारे काम ज़रूर थे और शायद काम ही जीवन है। वाह, मज़ा आया न उपदेश नुमा भरत वाक्य पढ़कर? अब समाप्त।
पुनश्च – ऊपर लिखी सारी बातें झूठ हैं क्योंकि प्रगतिशील दिखना एक फैशन है। सच तो यह है कि कल सुबह से ही भव्य पार्टी शुरू हो गई थी। यो यो के गाने पर चियर्स गर्ल के साथ ही साथ यज्ञ और हवन का भी आयोजन था। जिसमें पुरी दुनियां भर के रथी-महारथी शामिल हुए। गरीबों को टेलीविजन के कैमरे के सामने दान दक्षिणा भी दिया जाया। बराक ओवामा और किशोर कुमार जन्मदिन के इस समारोह में इसलिए शामिल नहीं हो पाए क्योंकि कल उनका भी जन्मदिन था।  

Saturday, July 9, 2016

फुलसुंघी - पाण्डेय कपिल का भोजपुरिया उपन्यास

“बाबुसाहेब! फुलसुंघी के जनीले नू? उ पिंजड़ा में ना पोसा सके । ऊ एगो फूल के रस खींचके चल देले दोसरा फूल का ओर । हम त तवायफ के जात हईं । हमरी काम फुलसुंघी के लेखा एगो जेब से पैसा खींचके दोसर जेब के ओर चल दिहल ह । (बाबुसाहेब, फुलसुंघी को जानते हैं न? वो पिंजड़ा में नहीं पाली जा सकती । वो एक फूल से रस चूसकर दूसरी फूल की ओर चल देती है । हम तवायफ हैं । हमारा काम भी फुलसुंघी जैसा ही एक जेब से पैसा खींचकर दूसरी जेब की ओर चल देना है ।)  – फुलसुंघी”

“फुलसुंघी” भोजपुरी संस्थान, 2 ईस्ट गार्डिनर रोड़, पटना 800001 से सन 1977 में प्रकाशित एक भोजपुरी उपन्यास है । इसके पात्र एतिहासिक तो हैं लेकिन लेखक पाण्डेय कपिल एतिहासिकता और घटनाओं की विश्वसनीयता का दावा पेश नहीं करते । पात्र और स्थान यथार्थ जगत के तो हैं लेकिन उपन्यास में रचनात्मक कल्पनाएँ भी हैं । व्याकरण की भाषा में इसे मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया उपन्यास कहा जा सकता है । वैसे भी इतिहास की पढ़ाई इतिहास की किताबों से ही करनी चाहिए, उपन्यास, फिल्मों, कविता और कहानियों से नहीं; क्योंकि यहाँ रचनात्मक कल्पनाओं का स्थान हमेशा ही विद्दमान रहता है । वैसे इतिहास की किताबें भी पक्षधरता की मिलावट से परे है ऐसा दावा बहुत विश्वास के साथ तो नहीं ही किया जा सकता है ।
उपन्यास के पहले ही पन्ने पर लेखक लिखते हैं - “फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष कहे के नइखे । कहे के एतने भर बा कि एह उपन्यास के कथावस्तु कवनो इतिहास ना ह, एकर कवनो पात्र यथाचित्रित वास्तविक पात्र ना ह । एक में संदेह ना कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय आ रिवेल साहेब सांचो के हो चुकल बाड़े । बाकिर एह चरित्रन के कवनो प्रामाणिक ब्योरा सामने नइखे रहल, आ एह लोगन के किस्सा किवदंतीयन से भरल बा । अइसन कुछ किवदंतियन से सह पाके, एक उपन्यास के कथावस्तु कल्पना से खड़ा कइल गइल बा । बाकिर, एक उपन्यास में, एगो काल-विशेष के, क्षेत्र-विशेष के आ समाज विशेष के जवन तस्वीर उरेहल गइल बा, उ जरुर सही बा । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977” (“फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष नहीं कहना है । कहना केवल इतना है कि इस उपन्यास का कथावस्तु इतिहास नहीं है, इसका कोई भी पात्र पुरी तरह से वास्तविक नहीं है । इसमें कोई सन्देश नहीं कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय और रिवेल साहब वास्तविकता में भी हो चुके हैं । लेकिन इन चरित्रों का कोई प्रामाणिक ब्योरा सामने नहीं था, वैसे भी इन लोगों के किस्से किवदंतियों से भरा हुआ है । इन्हों किवदातियों के सहारे इस उपन्यास की कथा वस्तु टिकी है । बाकि एक उपन्यास में, एक काल विशेष के, क्षेत्र विशेष के और समाज विशेष के जो तस्वीरें अंकित हैं, वो ज़रूर सच हैं । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977)
हमारे यहाँ इतिहास अंकित करने जैसे महत्वपूर्ण काम में शायद आलस्य का प्रकोप ज़्यादा है, इसीलिए बड़े से बड़े चरित्रों के बारे में अनुमान और किवदंतियां ज़्यादा हैं – सत्य कम । इसके पीछे मौखिक परम्परा का भी भरपूर योगदान है । हम बोल-बोलके महाकाव्य रच देते हैं लेकिन बात यदि अंकित-टंकित करने की आ जाए तो हाथों को लकवा मार जाता हैं । अब सुनने-सुनाने की परम्परा में समस्या यह है कि सुनानेवाला कथा में अपने हिसाब से जोड़-तोड़ करता है और सुननेवाला अपनी बुद्धि और विवेक से उसे ग्रहण करता है; कुछ याद रहता है, कुछ याद नहीं भी रहता । फिर जब सुननेवाला सुनी हुई कथा को अपने सुनाता है तो बीच-बीच में टूटे तारों को अपनी क्षमता, मान्यता और स्वार्थ से जोड़ता, तोड़ता, मरोड़ता है । इस प्रकार सत्य में कल्पना का समावेश होता है और इतिहास में गप्प का मिश्रण और फिर पैदा होतीं हैं सत्य की चाशनी से सनी किवदंतियां । वैसे भी किसी बड़े चरित्र के साथ चमत्कार न जुड़े तो हमें मज़ा ही नहीं आता । तभी तो विद्यापति के साथ उगाना (शिव) की कथा जुड़ता है । कुछ कुछ ऐसा ही इस उपन्यास के साथ भी है । हम खोजने निकलें तो इस उपन्यास के पात्रों की सच्ची कहानियां का अता-पता शायद ही कहीं मिले; और जो मिले उसमें कितना सत्य और कितना गप्प है, बता पाना शायद बहुत ही मुश्किल है । वो चाहें ढेलाबाई हों, महेंदर मिसिर हों, रेवल साहेब हो या कोई अन्य चरित्र ।
महेंदर मिसिर का जाली नोट छापने और गिरफ्तार होने की भी (दांत) कथा है लेकिन यहाँ देशभक्ति वाला एंगल नहीं है । यहाँ महेंदर मिसिर एक कलाकार मात्र हैं, महानता के बोझ से लदे पूर्वी गायकी और “मिसिर” सरमौर महेंदर मिसिर नहीं। यहां वो परिस्थियों से लड़ते कम, भागते हुए ज़्यादा पाए जाते हैं - कुछ-कुछ आवारा मसीहा की तरह । अब पाण्डेय कपिल की लेखनी में कितना हक़ीक़त और कितना फ़साना है यह तो कोई पारखी ही बता सकता हैं।
यह सत्य है कि ये लोग थे, लेकिन कैसे, क्यों कहाँ, कब, किस प्रकार आदि पर मामला आके फंस जाता है । बहरहाल, पात्रों को छोड़ भी दिया जाय तो भी इस उपन्यास के लेखक पाण्डेय कपिल के बारे भी साहित्य जगत लगभग अनभिग्य ही है, जबकि यह अभी हाल ही की बात है । तो सवाल यह बनता है कि क्या साहित्य में भी चर्चित होने के लिए किसी खेमे का खूंटा पकड़ना ज़रुरी है? अब इस सवाल का जवाब साहित्य के विद्वान ही दें तो बेहतर होगा ।
कुल 112 पन्ने का यह उपन्यास अपने अंदर एक लंबा कालखंड और कई पात्रों की जीवनयात्रा समेटे हुए बड़ी ही तीब्र गति से आगे बढ़ता है, कभी-कभी पीछे की ओर (फ्लैश बैक) भी आता है ताकि कई सारी स्थितिओं-परिस्थियों और घटनाक्रमों का अर्थ स्पष्ट हो जाएँ । यह पीछे आना एक रणनीति है, बिलकुल “दो कदम आगे और एक कदम पीछे” की तरह । अब यह स्पष्टता या रणनीति इतिहास जनित है या लेखकीय टिपण्णी; यह एक शोध का विषय है ।
“फुलसुंघी” गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी सामंती व्यवस्था का आडम्बर, उससे मोहभंग के साथ कोठा से लेकर लोकसंगीत पूर्वी आदि में लिपटी एक व्यावहारिक गाथा की तरह है; जहाँ एक जेब से दूसरी जेब तक की आज़ादी और स्वछंदता भरी यात्रा करनेवाली ढेलाबाई अन्तः कैद हो जाती या कर दी जातीं हैं । रवेल साहेब और हलिवंत सहाय का तमाम भौतिक सुख सुविधाओं से मोहभंग हो जाता है, महेंदर मिसिर आवारगी को अभिशप्त होते हैं और अन्य चरित्र कई अन्य नियति को प्राप्त होते हैं । इस बिलकुल पतले से उपन्यास की टहनियाँ और जड़ें किसी बरगद की तरह फैली हैं, जहाँ इसके हर चरित्र का क्रमिक विकास है; केसरबाई, मीनाबाई, राम नारायण मिसिर, बुलकान, मुंशी शिवधारीलाल, मनोरमा आदि जैसे उन चरित्रों का भी जो इस कथा के मुख्य चरित्र नहीं हैं । वहीं कुछ ऐसे एतिहासिक घटनाक्रमों का भी एक दूसरा ही नज़रिया सामने आता है जिसे लेकर आजतक तरह-तरह की कथा सुनी-सुनाई जातीं हैं । उन घटनाओं में महेंदर मिसिर का नोट छापने का धंधा करना, गुलजारीबाई बाई का ढेला बाई के रूप में परिवर्तित हो जाना, रिवेल साहब और हलिवंत सहाय भौतिकता से मोह भंग हो सन्यासी हो जाना आदि हैं । अब सारी घटनाओं/प्रसंगों का ज़िक्र कर पाना यहाँ संभव नहीं लेकिन एक प्रसंग का ज़िक्र करने का मोह त्याग पाना मुश्किल हैं । उपन्यास के शुरूआत के पन्ने पर पाण्डेय कपिल लिखते हैं – “सुनल जाला जे प्रयागराज के गणिका जानकीबाई के गवनई पर रीझके आपन सबकुछ निछावर क देवेवाला प्रेमी जब ओकर करिया-कलूट चेचक के दाग वाला चेहरा के देखलस त उ पगला गईल आ जानकीबाई के मार छुरी के गोद दिहलस । छुरी के छप्पन घाव खाइयो के जानकीबाई जीयत बांच गईली, आ नाम बदल गईल, हो गईल छप्पनछुरी । (सुनने में आता है कि प्रयागराज की गणिका जानकीबाई के गाने पर रीझकर अपना सबकुछ न्योछावर कर देनेवाला प्रेमी जब उनकी काली और चेचक से भरा चेहरा देखा तो पागल सा हो गया और उसने जानकीबाई को छोरी से गोद दिया । लेकिन जानकी बाई बच गईं और उनका नाम बदलकर छप्पनछुरी हो गया ।)”
ठीक इसी प्रकार गुलजारीबाई के ढेलाबाई के रूप में बदल जाने की कथा भी है – “उनका एगो महफिल में पगलाइल प्रेमियन के बीच चल गईल ढेला । अ इनकरी नाम बदल गइल । हो गइल ढेला यानी ढेलाबाई । (उनकी एक महफिल में पगलाए प्रेमियों के बीच ढेला चल गया और इनका नाम बदलकर हो गया ढेला अर्थात ढेलाबाई ।)”
बिहार के विख्यात/लोकप्रिय गायक और कवि महेंदर मिसिर और ढेलाबाई पर लिखित सामग्री बहुत ही कम है और जो कुछ भी लिखा गया है उसमें हकीकत और फ़साने को अलग-अलग कर पाना बहुत ही दुरूह कार्य है । यह काम साहित्य और साहित्यकारों का कम इतिहास, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का ज़्यादा है । जहाँ तक एक उपन्यास का सवाल है तो फुलसुंघी निश्चित ही भोजपुरी ज़मीन, भाषा, बोली, वाणी, संस्कारों, संस्कृति, उपमाओं, मान्यताओं, गीत आदि से लबरेज़ एक पढ़ने-पढ़ाने वाली रचना है ।
पटना के रंगकर्मी मित्र धर्मेश मेहता के सौजन्य से मैं पहली बार कोई भोजपुरी उपन्यास पढ़ रहा था । मुझे नहीं पता कि पाण्डेय कपिल कौन हैं और आज किस स्थिति में हैं, उनकी यह रचना “फुलसुंघी” आज बाज़ार में उपलब्ध भी है या नहीं; लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि भोजपुरी और भोजपुरी साहित्य से स्नेह रखनेवालों को यह उपन्यास ज़रूर ही पढ़ना-पढ़ाना चाहिए । यह अपने आपमें एक शानदार रचना हो, न हो लेकिन एक शानदार रचना का सुख और एहसास देनेवाला उपन्यास तो ज़रूर ही है ।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...