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Tuesday, September 11, 2012

अख़बार पोषित पोर्नोग्राफी, ठगी और अंधविश्वास.



अखबार आज मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है. खास तौर पर नगरों, कस्बों और महानगरों के बारे में तो ये बात कही ही जा सकती है. बिना अखबार के दिन की शुरुआ़त ज़रा मुश्किल ही है. अखबार आज हर वर्ग के तलब में शुमार हो गई है. ये बात तब और समझ में आती है जब किसी रोज़ किसी कारणवश घर में अखबार नहीं पहुँच पाता या देर से आता है. घर का लगभग हर सदस्य एक दूसरे से ये पूछता हुआ पाया जाता है कि आज अखबार क्यों नहीं आया और तब तो हद ही हो जाती है जब पड़ोसी का अखबार गया हो और वो आपके सामने चाय की चुस्की के साथ उसका रसास्वादन कर रहा हो. निःसंदेह आज भी ये समाचार और विचार संचार का एक अति महत्वपूर्ण साधन हैं. जिसके पाठकों की सूची में लगभग हर वर्ग, वर्ण और समाज का व्यक्ति शामिल होता है. अक्षरज्ञान से संपन्न ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति मिले जिसने अपने जीवन में कभी अखबार पढ़ा हो. अख़बारों की छवि अमूमन जनपक्षीय ही होती है ये बात और है कि अधिकतर अखबार किसी ना किसी बड़े व्यावसायिक घराने या समूह से जुड़े होते हैं. ये व्यावसायिक घराने या समूह कोई भी काम घाटा सहके नहीं करते, चाहे वो जनपक्षीय काम ही क्यों हो. घाटे में चलने वाले कई अखबार बंद हो गए अथवा उनके संपादकों पर गाज गिरी. अपने मालिकों को मुनाफ़ा कमा के देना या उनके लिए अख़बारों को घाटे का सौदा बनने देना आज हर सम्पादक का व्यक्तिगत नैतिक कर्तव्य जैसा ही कुछ बन गया है. इसीलिए कुछ घनघोर आलोचकों का कथन है कि अख़बारों को आज सम्पादक नहीं मैनेज़र की ज़रूरत है.
आज कुछ प्रमुख अखबार पलटते हुए वर्गीकृत (classified) विज्ञापनों पर नज़र टिक गई. हालांकि यह रोज़ ही छपता है और अमूनन हम इस पर ध्यान नहीं ही देतें हैं, पर आज मैंने उपलब्ध सारे अख़बारों में प्रकाशित वर्गीकृत को बड़ी ही गंभीरता से पढ़ा या कहा जा सकता है कि अध्ययन किया. बाप रे बापएक से एक अद्भुत विज्ञापनों से पाला पड़ा. बालों के विज्ञापन, सफ़ेद दाग ठीक करने के विज्ञापन, मदहोश बातें, गरमा गरम बातें, मोहक बातें करने वाले विज्ञापन, मसाज पार्लर के विज्ञापन, छोटा अंग निराश क्यों?,सेक्स समस्याओं के विज्ञापन, बिना बताये नशा छुडानेवाले का दावा करनेवाले एक से एक विज्ञापन. उस वक्त एक क्षण के लिए तो मैं भी भूल गया था कि मैं हिंदी की कोई सॉफ्ट पोर्न पत्रिका नहीं बल्कि आंदोलन और जनपक्षीयता का दावा करनेवाला एक अखबार पढ़ रहा हूँ.
हालांकि आपने भी पढ़ा ही होगा फिर भी आइए इन विज्ञापनों से ज़रा परिचय प्राप्त करतें हैं. पहले मनोरंजन या दोस्ती कॉलम में छपे मदहोश बातें, गरमा-गरम बातें, मोहक बातें नामक विज्ञापनों की बात करतें हैं. किसी सुन्दर कन्या की मनमोहक तस्वीर के साथ कुछ नंबर प्रकाशित किया जाता है, नीचे कहीं छुपकर आई एस डी चार्ज का भी ज़िक्र किया गया होता है, जिसे तलाशना पारखी नज़र का काम है. उसके बाद जो लिखा रहता है ज़रा उसपर गौर करें - " अगर आप हाई प्रोफ़ाइल कॉलेज गर्लहॉउस वाइफ, एनआरआई हॉउस वाइफ ( जिन्हें तलाश है क्रेज़ी बोल्ड फ्रेंड की ) से आमने-सामने दोस्ती करना चाहतें हैं तो निम्न नंबरों पर कॉल करें. फुल इन्जॉयमंट, मीटिंग विथ फुल सर्विस." साथ ही यहाँ फिमेल मेम्बरशिप फ्री के प्रलोभन के साथ तमाम उम्र के लोगों को ( खासकर युवा-युवतियों ) फ्रेंडशिप क्लब का सदस्य बनकर घर बैठे 11,000 से 55,000 से भी ज़्यादा रुपये तक कमाने का प्रलोभन भी दिया जाता है. अब ये बताने की ज़रूरत क्या बच जाती है कि ये किस चीज़ का विज्ञापन है? अगर फिर भी किसी को कोई संदेह हो तो अपना रीजनल अखबार उठाइए और वहाँ दिए नंबरों पर अपनी ज़िम्मेदारी से कॉल करके व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करिये, खुद ही दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा. एक बार फिर से याद रखें आईएसडी चार्ज लगेगा.
इन अखबारों का दोहरापन का एक नमूना देखिये, विभिन्न अखबार समय-समय पर बाबाओं एवं माताओं की एक तरफ़ पोल खोलते रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसी दिन ज्योतिष कॉलम के अंतर्गत इस प्रकार के विज्ञापनों को भी प्रकाशित करते रहते हैं. - " (आल वर्ल्ड चैलेन्ज) 11,000% गारंटी के साथ अपना खोया प्यार वापिस पायेंलव मैरेजमाता-पिता को मनानाप्यार में घोखापति-पत्नी में अनबनसंतानहीनतानौकरीकारोबारसौतन से छुटकाराविदेश यात्रापरीक्षाव्यापारबीमारीटेंशन आदि  टू ज़ेड समस्याओं का उपचार / समाधान वशीकरण के द्वारा घर बैठे पायें. फ़ीस काम हो जाने के बाद." अब इस दोहरी नीति के पीछे क्या तर्क हो सकता है ? ये इतने मासूम भी नहीं हैं कि इन्हें ये पता हो कि ये चंद रुपयों के एवज में इस्तेमाल किये जा रहें हैं और इनके इन विज्ञापनों की वजह से कितने झोलाछाप बाबाओं और माताओं का कारोबार चल रहा है और उनकी दिन दुगनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही है. आस्था और विश्वास के नाम पर इस मुल्क में कैसी-कैसी मूर्खतापूर्ण बातों अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है, ये खबर क्या इन अख़बारों के कर्ताओं के निगाह से ओझल रहतीं हैं?
अब बात करतें हैं विश्वप्रसिद्ध वेदों द्वारा पुरुषार्थ को बढ़ाने तथा पुरुष के अंगों को मोटा-बड़ा करने वाले विज्ञापन की. आप भी देखें ये क्या क्या दावे करतें हैं.-छोटा अंग! निराश क्यों?, सेक्स समस्याएं?, इस्तेमाल करते ही असर शुरू, यौन रोगों का सम्पूर्ण समाधान, अंग का छोटा, पतला, टेढ़ा, ढीलापन को जड़ से समाप्त कर अंग का मनचाहा विकास कर कड़क सुडौल ताकतवर बनाये. नामर्दी, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, पुत्रहीनता का सफल इलाज. चमत्कारी दावा, उत्तेजना कैप्सूल, रोमैंटिक स्प्रे द्वारा. साथ में कामसूत्र पुस्तिका एवं जीवी मेमोरी कार्ड फ्री.क्या आपने इससे बेहूदा, हिंसक, हास्यास्पद, बकवास और अप्राकृतिक विज्ञापन कहीं और पढ़ा है? वैसे सुना है आजकल फील लाईक वर्जिन का भी हंगामा शुरू हो गया है. किसी ने एक क्रीम बनाई है जिसे लगाते ही महिलाएं फिर वर्जिन जैसी हो जायेगीं. कमाल है! वैसे स्तनों को सुडौल और कड़क बनाने का दावा तो कई सालों से कई कम्पनियाँ करती आयीं हैं.
बाल उगाकर गंजापन दूर करने, बिना चिड-फाड़ के बवसीर का स्थाई इलाज, सफ़ेद दाग को चंद दिनों के अंदर समाप्त करने, मसाज पार्लर, बिना बताये शराब, गंजा, भांग, गुटखा, स्मैक, सुई, नींद की दवा छुडाने के विज्ञापन सब धोखाधडी के खेल नहीं तो और क्या हैंसवाल ये है कि अख़बारों के महान और बुद्धिजीवी संपादकों क्या इन बातों को नहीं जानते? जिस समाज में लोग अफवाहों पर सहज ही यकीन कर लेते हों उस समाज के प्रति क्या इनकी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती ? क्या इन अख़बारों की ज़िम्मेदारी एक कोने में केवल ये लिख भर देने से खत्म मान ली जानी चाहिए कि "पाठकों से अनुरोध है कि वे इन विज्ञापनों पर पहल करने से पहले स्वयं तथ्यों की जाँच परख कर लें. विज्ञापनदाताओं द्वारा किये गए दावों की पुष्टि अखबार नहीं करता."
    कोई अखबार इस तरह के विज्ञापन क्यों छापता है? पहला तर्क तो ये है कि इससे पैसा मिलता है और दूसरा ये कि हम नहीं छापेंगें तो कोई और छापेगा, ये दोनों ही तर्क बचकाना है. चिंता की बात तो यह है कि ये कहानी किसी एक अखबार की नहीं बल्कि एकाध अपवादों को छोड़कर सबकी ही है और संचार क्रांति के इस युग में इन विज्ञापनों की पहुँच इंटरनेट के साथ ही साथ टेलीविजन के प्रमुख चैनलों तक भी है.अखबार आज मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है. खास तौर पर नगरों, कस्बों और महानगरों के बारे में तो ये बात कही ही जा सकती है. बिना अखबार के दिन की शुरुआ़त ज़रा मुश्किल ही है. अखबार आज हर वर्ग के तलब में शुमार हो गई है. ये बात तब और समझ में आती है जब किसी रोज़ किसी कारणवश घर में अखबार नहीं पहुँच पाता या देर से आता है. घर का लगभग हर सदस्य एक दूसरे से ये पूछता हुआ पाया जाता है कि आज अखबार क्यों नहीं आया और तब तो हद ही हो जाती है जब पड़ोसी का अखबार गया हो और वो आपके सामने चाय की चुस्की के साथ उसका रसास्वादन कर रहा हो. निःसंदेह आज भी ये समाचार और विचार संचार का एक अति महत्वपूर्ण साधन हैं. जिसके पाठकों की सूची में लगभग हर वर्ग, वर्ण और समाज का व्यक्ति शामिल होता है. अक्षरज्ञान से संपन्न ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति मिले जिसने अपने जीवन में कभी अखबार पढ़ा हो. अख़बारों की छवि अमूमन जनपक्षीय ही होती है ये बात और है कि अधिकतर अखबार किसी ना किसी बड़े व्यावसायिक घराने या समूह से जुड़े होते हैं. ये व्यावसायिक घराने या समूह कोई भी काम घाटा सहके नहीं करते, चाहे वो जनपक्षीय काम ही क्यों हो. घाटे में चलने वाले कई अखबार बंद हो गए अथवा उनके संपादकों पर गाज गिरी. अपने मालिकों को मुनाफ़ा कमा के देना या उनके लिए अख़बारों को घाटे का सौदा बनने देना आज हर सम्पादक का व्यक्तिगत नैतिक कर्तव्य जैसा ही कुछ बन गया है. इसीलिए कुछ घनघोर आलोचकों का कथन है कि अख़बारों को आज सम्पादक नहीं मैनेज़र की ज़रूरत है.
आज कुछ प्रमुख अखबार पलटते हुए वर्गीकृत (classified) विज्ञापनों पर नज़र टिक गई. हालांकि यह रोज़ ही छपता है और अमूनन हम इस पर ध्यान नहीं ही देतें हैं, पर आज मैंने उपलब्ध सारे अख़बारों में प्रकाशित वर्गीकृत को बड़ी ही गंभीरता से पढ़ा या कहा जा सकता है कि अध्ययन किया. बाप रे बापएक से एक अद्भुत विज्ञापनों से पाला पड़ा. बालों के विज्ञापन, सफ़ेद दाग ठीक करने के विज्ञापन, मदहोश बातें, गरमा गरम बातें, मोहक बातें करने वाले विज्ञापन, मसाज पार्लर के विज्ञापन, छोटा अंग निराश क्यों?,सेक्स समस्याओं के विज्ञापन, बिना बताये नशा छुडानेवाले का दावा करनेवाले एक से एक विज्ञापन. उस वक्त एक क्षण के लिए तो मैं भी भूल गया था कि मैं हिंदी की कोई सॉफ्ट पोर्न पत्रिका नहीं बल्कि आंदोलन और जनपक्षीयता का दावा करनेवाला एक अखबार पढ़ रहा हूँ.
हालांकि आपने भी पढ़ा ही होगा फिर भी आइए इन विज्ञापनों से ज़रा परिचय प्राप्त करतें हैं. पहले मनोरंजन या दोस्ती कॉलम में छपे मदहोश बातें, गरमा-गरम बातें, मोहक बातें नामक विज्ञापनों की बात करतें हैं. किसी सुन्दर कन्या की मनमोहक तस्वीर के साथ कुछ नंबर प्रकाशित किया जाता है, नीचे कहीं छुपकर आई एस डी चार्ज का भी ज़िक्र किया गया होता है, जिसे तलाशना पारखी नज़र का काम है. उसके बाद जो लिखा रहता है ज़रा उसपर गौर करें - " अगर आप हाई प्रोफ़ाइल कॉलेज गर्लहॉउस वाइफ, एनआरआई हॉउस वाइफ ( जिन्हें तलाश है क्रेज़ी बोल्ड फ्रेंड की ) से आमने-सामने दोस्ती करना चाहतें हैं तो निम्न नंबरों पर कॉल करें. फुल इन्जॉयमंट, मीटिंग विथ फुल सर्विस." साथ ही यहाँ फिमेल मेम्बरशिप फ्री के प्रलोभन के साथ तमाम उम्र के लोगों को ( खासकर युवा-युवतियों ) फ्रेंडशिप क्लब का सदस्य बनकर घर बैठे 11,000 से 55,000 से भी ज़्यादा रुपये तक कमाने का प्रलोभन भी दिया जाता है. अब ये बताने की ज़रूरत क्या बच जाती है कि ये किस चीज़ का विज्ञापन है? अगर फिर भी किसी को कोई संदेह हो तो अपना रीजनल अखबार उठाइए और वहाँ दिए नंबरों पर अपनी ज़िम्मेदारी से कॉल करके व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करिये, खुद ही दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा. एक बार फिर से याद रखें आईएसडी चार्ज लगेगा.
इन अखबारों का दोहरापन का एक नमूना देखिये, विभिन्न अखबार समय-समय पर बाबाओं एवं माताओं की एक तरफ़ पोल खोलते रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसी दिन ज्योतिष कॉलम के अंतर्गत इस प्रकार के विज्ञापनों को भी प्रकाशित करते रहते हैं. - " (आल वर्ल्ड चैलेन्ज) 11,000% गारंटी के साथ अपना खोया प्यार वापिस पायेंलव मैरेजमाता-पिता को मनानाप्यार में घोखापति-पत्नी में अनबनसंतानहीनतानौकरीकारोबारसौतन से छुटकाराविदेश यात्रापरीक्षाव्यापारबीमारीटेंशन आदि  टू ज़ेड समस्याओं का उपचार / समाधान वशीकरण के द्वारा घर बैठे पायें. फ़ीस काम हो जाने के बाद." अब इस दोहरी नीति के पीछे क्या तर्क हो सकता है ? ये इतने मासूम भी नहीं हैं कि इन्हें ये पता हो कि ये चंद रुपयों के एवज में इस्तेमाल किये जा रहें हैं और इनके इन विज्ञापनों की वजह से कितने झोलाछाप बाबाओं और माताओं का कारोबार चल रहा है और उनकी दिन दुगनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही है. आस्था और विश्वास के नाम पर इस मुल्क में कैसी-कैसी मूर्खतापूर्ण बातों अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है, ये खबर क्या इन अख़बारों के कर्ताओं के निगाह से ओझल रहतीं हैं?
अब बात करतें हैं विश्वप्रसिद्ध वेदों द्वारा पुरुषार्थ को बढ़ाने तथा पुरुष के अंगों को मोटा-बड़ा करने वाले विज्ञापन की. आप भी देखें ये क्या क्या दावे करतें हैं.-छोटा अंग! निराश क्यों?, सेक्स समस्याएं?, इस्तेमाल करते ही असर शुरू, यौन रोगों का सम्पूर्ण समाधान, अंग का छोटा, पतला, टेढ़ा, ढीलापन को जड़ से समाप्त कर अंग का मनचाहा विकास कर कड़क सुडौल ताकतवर बनाये. नामर्दी, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, पुत्रहीनता का सफल इलाज. चमत्कारी दावा, उत्तेजना कैप्सूल, रोमैंटिक स्प्रे द्वारा. साथ में कामसूत्र पुस्तिका एवं जीवी मेमोरी कार्ड फ्री.क्या आपने इससे बेहूदा, हिंसक, हास्यास्पद, बकवास और अप्राकृतिक विज्ञापन कहीं और पढ़ा है? वैसे सुना है आजकल फील लाईक वर्जिन का भी हंगामा शुरू हो गया है. किसी ने एक क्रीम बनाई है जिसे लगाते ही महिलाएं फिर वर्जिन जैसी हो जायेगीं. कमाल है! वैसे स्तनों को सुडौल और कड़क बनाने का दावा तो कई सालों से कई कम्पनियाँ करती आयीं हैं.
बाल उगाकर गंजापन दूर करने, बिना चिड-फाड़ के बवसीर का स्थाई इलाज, सफ़ेद दाग को चंद दिनों के अंदर समाप्त करने, मसाज पार्लर, बिना बताये शराब, गंजा, भांग, गुटखा, स्मैक, सुई, नींद की दवा छुडाने के विज्ञापन सब धोखाधडी के खेल नहीं तो और क्या हैंसवाल ये है कि अख़बारों के महान और बुद्धिजीवी संपादकों क्या इन बातों को नहीं जानते? जिस समाज में लोग अफवाहों पर सहज ही यकीन कर लेते हों उस समाज के प्रति क्या इनकी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती ? क्या इन अख़बारों की ज़िम्मेदारी एक कोने में केवल ये लिख भर देने से खत्म मान ली जानी चाहिए कि "पाठकों से अनुरोध है कि वे इन विज्ञापनों पर पहल करने से पहले स्वयं तथ्यों की जाँच परख कर लें. विज्ञापनदाताओं द्वारा किये गए दावों की पुष्टि अखबार नहीं करता."
कोई अखबार इस तरह के विज्ञापन क्यों छापता है? पहला तर्क तो ये है कि इससे पैसा मिलता है और दूसरा ये कि हम नहीं छापेंगें तो कोई और छापेगा, ये दोनों ही तर्क बचकाना है. चिंता की बात तो यह है कि ये कहानी किसी एक अखबार की नहीं बल्कि एकाध अपवादों को छोड़कर सबकी ही है और संचार क्रांति के इस युग में इन विज्ञापनों की पहुँच इंटरनेट के साथ ही साथ टेलीविजन के प्रमुख चैनलों तक भी है.

9 comments:

  1. जबरजस्त सर , बहुत ही उम्दा किस्म का लेख है , रोचकता सहित ....बहुत बहुत धन्यवाद ....

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    1. शुक्रिया. बधाई आपको आप इस ब्लॉग के पहले भी सदस्य हैं.

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  2. Describing the function of a newspaper, Mahatma Gandhi once commented, “ One of the objects of a newspaper is to understand popular feelings and give expression to it, another is to arouse among the people certain desirable sentiments and the third is fearlessly to express popular defects”.
    The irony is that Newspaper is perpetuating popular defects. It is encouraging superstition, fraud advertisement and all sorts of frauds in the name of advertisement and classifieds. Its really a very pathetic ---

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  3. बढ़िया और विचारोत्तेजक आलेख ।

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  4. बढ़िया लेख भाई साहब

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