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Friday, September 14, 2012

Let’s play हिंदी हिंदी.




पुंज प्रकाश 
हिंदी तुम्हारी मातृभाषा है! पर मेरे घर और गाँव में तो मगही बोली जाती है. इस शब्द का उच्चारण ऐसे करो! हम बचपन से तो ऐसे ही बोलते आयें हैं. अरे यार तुम्हारी हिंदी में बिहारी टच आता है! तो कहाँ का टच आना चाहिए सर? आखिर हिंदी कहाँ की भाषा है सर? किसी के बोलने में बिहारी टच आता है किसी में पंजाबी, किसी में साऊथ इंडियन, किसी में मराठी, किसी में राजस्थानी, किसी में गुजराती, किसी में असमियां किसी में बंगाली, किसी में ये, किसी में वो. तो एकदम खांटी शुद्ध हिंदी कैसे बोली जाय सर?  ये है हिंदी बोलने का संकट. हाँ लिखने का भी एक संकट है, अगर दरवाज़ा खुलता है तो फिर खिडकी खुलती है, अगर यह शुद्ध हिंदी है तो इसका आधार क्या है सर? राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों में जहाँ पूरे देश से विभिन्न भाषा भाषी छात्रों का चयन किया जाता है, रंगमंच के प्रशिक्षण के लिए. चयन का आधार हिंदी नहीं होता पर बेचारे गैर हिंदी इलाके ( वैसे हिंदी इलाका कौन है तय नहीं कर पाया.) के प्रतिभाशाली छात्र या तो परिकल्पना(design) नामक विषय चुनतें हैं या अभिनय विषय चुन लिया तो उनके मानसिक संतुलन का भगवान ही मालिक है. भले ही ये अपने बैच के सबसे ज़्यादा प्रतिभावान अभिनेताओं में से एक हों लेकिन इनका पूरा तीन साल मुंह में पेन्सिल डालकर हिंदी ठीक से बोलने की कुंठा से निजात पाने में ही निकल जाता है. इनके लिए छुट्टी के दिन अलग से स्पीच की क्लास लगाई जाती है. इनके लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय हिंदी स्पीकिंग कोर्स में तबदील हो जाता है. इनमें से जो छात्र ठीक ठाक हिंदी बोल गए वो स्कूल के प्रतिभावान छात्रों की लिस्ट में शामिल कर लिए जातें हैं. चयन का आधार भले ही भाषा न हो पर यहाँ नाटक हिंदी में ही होते हैं और अमूमन हिंदी का कोई भी सफल नाट्य निर्देशक इन्हें कोई बड़ी भूमिका नहीं देता और अगर दे भी दे तो नाटक की पूरी तैयारी के दौरान सबसे पहला नोट्स स्पीच ठीक करो का ही होगा और फिर दर्शक जो हिंदी नाटक देखने आया है, ऐसी हिंदी सुनकर त्रस्त हो जाता है. तात्पर्य ये कि एक अच्छा खासा अभिनेता केवल भाषा की वजह से तनावग्रस्त हो हास्य का पात्र बन जाता है. ये केवल एक उदाहरण है राष्ट्रीय के नाम पर हिंदी के आतंक और वर्चस्व का. तो क्या मान लिया जाय कि विजेता की भाषा ही राष्ट्र की भाषा मानी जाती है. पर यहाँ विजेता कौन है? प्रजातन्त्र में राजतंत्र और सामंतवाद का समावेश या फिर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का वहीं पुराना गणित! आप इस विषय पर ज़रा चिंतन-मनन करें तब तक हम कोई दूसरी बात कर लेते हैं.
गोष्ठियों, सेमिनारों, नाट्यशालाओं, चाय की दुकानों आदि साहित्यिक- सांस्कृतिक आयोजनों में हमसे लगभग रोज़ मिलने वाले एक महत्वपूर्ण साथी की उपस्थिति एकाएक कम होते होते खत्म हो जाती है. हम सरसरी नज़र से कुछ दिन उसे तलाशतें हैं. याद रहने पर एकाध लोगों से पूछताछ भी कर लेतें हैं. अगर कुछ पता चलता है तो अफसोस ज़ाहिर कर उसे धीरे-धीरे भूल जातें हैं और अगर कुछ नहीं पता चलता तो बिना अफ़सोस के भूल जातें हैं और समाज के अन्यप्रगतिके कार्यों में लग जातें हैं, क्योंकि हमारी पहचान प्रगतिशील लोगों की है और हमेशा प्रगतिशीलता की प्रस्तुति करते रहना हमारी चाहत भी है और मजबूरी भी. आत्मकेंद्रित पूरा समाज ही हुआ है और हम समाज के ही तो एक अंग हैं.
जिस साथी को हम भूल चुके थे या भूला चुके थे उसकी मृत्यु पर श्रद्धांजलियां बनाम शोकसभा आयोजित करना हमारी प्रगतिशीलता की पहली मांग है, उससे हम कैसे बच सकतें हैं! शायद यही वो वजह है कि आज समाज में सहायता करने या खोज-खबर लेनेवाले लोगों से ज़्यादा संख्या श्रद्धान्जलि व्यक्त करनेवालों की है. जान पहचानवाले को तो छोडिये इस विषय पर अनजान भी अखबार में विज्ञप्ति देकर अपना नाम छपवाने से नहीं चूकते, बस शर्त इतनी है कि आप ज़रा लोकप्रिय हों. हम उपरोक्त सारी बातें समाज को एक दिशा देने का बोझ उठाये तबके यानि कलाकार, साहित्यकार, नाटककार, कवि-कथाकार (और भी बहुत सारे लोग जिनके पीछेकारलगा है. ) के सन्दर्भ में कर रहें हैं. मौका भी अच्छा हैहिंदी दिवस.
हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है हमारी पीढ़ी में बहुतों को नहीं पता. मैं भी इसी पीढ़ी का हूँ तो इसे आत्मस्वीकृति ही समझाना चाहिए. दूसरी बात ये भी है कि जिस तरह बाल दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि को बचपन में हीं हमें अपने सरकारी स्कूलों में अलग-अलग तरह से रटवाया गया वैसे हिंदी दिवस पर कुछ हुआ ही नहीं. आखिरकार जो काम हमारे आदरणीय गुरु महाराजों ने नहीं किया वो गूगल बाबा ने पट से कर दिया. वो कहतें हैं हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी. इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है. स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो  भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में यह वर्णित है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय  होगा.
अब ये तो हो गई क़ानूनी बात. व्यावहारिकता यह है कि भारत एक बहुभाषीय देश है जहाँ हिंदी के अलावा बहुत सारी लिपियों और भाषाओं के अलावा कोस कोस पर बदलती असंख्य बोलियां भी हैं. उन भाषाओँ लिपियों का क्या होगा हमारे संविधान निर्माताओं ने इस महत्वपूर्ण विषय पर घोर चिंतन-मनन निश्चित ही किया होगा और उस चिन्तन मनन से जो बातें निकल के आई होगीं उसे शब्दशः हमें ग्रहण करना ही चाहिए, नहीं तो कानून के पास बहुत से रास्ते हैं संविधान को मनवाने के. जिससे हम सब भली भांति परिचित हैं और आज कल तो खास तौर से. फिर भी वैसे लोगों की भी कोई कमी नहीं जो हिंदी के प्रति कोई खास सम्मान का भाव प्रकट नहीं करते. ये दरअसल हिंदी का विरोध नहीं कर रहे होते हैं बल्कि हिंदी विरोध के बहाने जन भाषाओं एवं लिपियों को बचाने, सुरक्षित करने को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर कर रहे होतें हैं. पर जन भाषा के प्रति मोह रखने के कारण हिंदी के प्रति असम्मान रखना किसी भी सुलझे व्यक्ति या विचार का परिचायक तो कदापि ही नहीं हो सकता. एक को अच्छा कहने के लिए किसी को बुरा कहना जलन का परिचायक है. ऐसे लोगों को किसी भाषा और बोली से ज़्यादा चिंता अपनी उपयोगिता की होती है. हालांकि इनके मुंह से ये अक्सर ही सुनने को मिलेगा कि हमें अपनी कोई परवाह नहीं.
जहाँ तक सवाल सरकारी संरक्षण का है तो कानून और व्यावहारिकता में ज़मीन आसमान का फर्क है. किसी सरकारी कारकून को क्या फर्क पड़ता है हिंदी भाषा, बोलियां, लिपि, कला बचे बचे. अब कारकून ही माने तो कोई क्या करे!
हिंदी दिवस पर हिंदी का सबसे ज़्यादा रोना वही लोग रोते हैं जो पूरे साल हिंदी के नाम पर मलाई चूस चूसकर तोंदियल होते रहतें हैं. वैसे सच कहें तो साल में एक दिन तो बनता है भाई कि हर तोंदियल इस विषय पर चिंता ज़ाहिर करे. ये प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे होली के पर्व में होता है. लोग एक दूसरे का मुंह सुबह सुबह तरह तरह के रंगों से रंग देतें हैं, रंग में रंगे फोटो खिंचवाते हैं और शाम तक नहा धोकर फिर से पहले जैसे हो जातें हैं. इस पर्व को हिंदी दिवस नहीं हिंदी डे कहा जाना चाहिए.
अब ज़रा लगे हाथ हिंदी के लेखकों की ओर भी मुखातिब हो ही लेतें हैं ताकि कम से कम आज के दिन कोई मुद्दा छूट जाए. जहाँ तक सवाल हिंदी के लेखकों का है तो जो लेखक कहीं नौकरी नहीं कर रहा है उसकी हालत किसी से छुपी नहीं है. वैसे हर किसी की किस्मत राग-दरबारी नहीं होती. हमारे महान भारतीय लोकतंत्र में हमारे महान महान लेखकों ने ताउम्र किस मुफलिसी में अपने दिन काटें हैं सबको पता है. जी आज़ादी के बाद की बात कर रहें हैं. छोडिये पुरानी कहानी से आप सब परिचित हैं. आइये नई कहानी सुनतें हैं. पर अफ़सोस के साथ कहना पड़ेगा कि कहानी नई है पर प्लॉट वही पुराना है. बिहार के एक कथाकार हैं मधुकर सिंह. कई प्रसिद्ध कहानियां और उपन्यास लिख चुके हैं. भोजपुर जिला के धरहरा गाँव के निवासी हैं. कई सम्मान से सम्मानित भी हैं. देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी है. हिंदी तबके में लगभग सभी मठ, मठाधीश और बात-बात पर क्रांति कर देने वाले प्रगतिशील संपादकों का तबका इनके नाम से भली भांति परिचित है. यही मधुकर सिंह पिछले कई साल से लापता थे. एकाएक राजभाषा विभाग द्वारा इनके नाम का चयन किया जाता है 22-24 सितंबर को जोहांसबर्ग में आयोजित हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने के लिए. आगे की कथा आप इनकी ही ज़ुबानी सुनिएमैं सात साल से बिस्तर पर पड़ा हूं. पैसे के अभाव में इलाज नहीं हो पा रहा है. मैं साहित्यकार हूं. भारत का प्रतिनिधित्व भी करना चाहता हूं. लेकिन साहित्यकारों को आज पूछ कौन रहा है. केवल हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही साहित्यकारों को सरकारें याद करती हैं. यदि मेरी खोज-खबर राज्य सरकार ने पहले की होती, तो आज मैं विदेश जाने में सक्षम होता. सरकार विदेश भेजने के प्रक्रम में जो राशि मुझ पर खर्च करना चाहती है, वह मुझे दे दे. ताकि मैं अपना इलाज करा सकूं.”
इस घटना के बाद जब मीडिया ने बिहार के कुछ साहित्यकारों के मुंह से बात निकलवाई तो बेचारे प्रगतिशीलता का मुखौटा ओढने की मजबूरी से कैसे बच सकते थे. झट से व्यवस्था और समाज को कोसने लगे ये भूलकर कि स्वयं इन्होनें भी इतने सालों में मधुकर सिंह की कोई खोज खबर नहीं ली. कुछ नहीं तो कम से कम मधुकर जी के ये महान समकालीन प्रगतिशील मित्रगण इनके बारे में एक आलेख तो लिख ही सकते थे. पर लिखे तब जब कुछ पता हो, और अगर पता होते हुए भी लिखा तब तो इसे सोने पे सुहागा ही कहा जायेगा. क्या श्रद्धांजलि सभाओं में मरनेवाले से जुड़े संस्मरणों को सुनाने में इन जैसे साहित्यकारों को शर्म नहीं आनी चाहिए. जिस समाज के साहित्यकार, कलाकार इतने संवेदनहीन हों वहाँ कैसी कला और साहित्य की रचना होगी इसका अनुमान कोई भी आराम से लगा सकता है. सरकार की बात तो रहने ही दी जाय. अभी पिछले दिनों एक नए बने राज्य के विधायकों से उनकी व्यक्तिगत रुचि जानने के लिए उनके पसंदीदा लेखक का नाम बताने को कहा गया तो अधिकतर लोगों ने प्रेमचंद का नाम बताकर खानापूर्ति भर करके किसी प्रकार अपनी जान बचाई. हिंदी की पत्रपत्रिकाओं और साहित्य की पुस्तकों की एक सम्मानित बिक्री दर्ज़ करनेवाले राज्य  के मंत्रियों का भी हाल इससे कुछ ज़्यादा अलग नहीं होगा और आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब देश के सांसदों भी हाल ऐसा ही हो. अब इनसे क्या उम्मीद की जाय कि ये किसी नागार्जुन, मुक्तिबोध, निराला, मधुकर आदि की चिंता में अपनी नींद-चैन हराम करें. जिन्हें लोकतंत्र की भी चिंता नहीं वो लोक की चिंता क्या खाक करेंगें.
हिंदी दिवस के मौके पर आयोजित होने वाले विभिन्न प्रकार के कामचलाऊ कार्यक्रम, प्रचार-प्रसार, अख़बारों में राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि के संदेशों के विज्ञापन, विभिन्न सरकारी-अर्धसरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं के बैनर-पोस्टर, विदेशों में आयोजित होने वाले सम्मेलनों आदि का खर्च करोड़ों का और लाखों का खेल तो कर ही डालता है. आज एक प्रमुख हिंदी दैनिक की मूर्खतापूर्ण सम्पादकीय पढ़िए, लिखता है –“हिंदी भाषा को भले ही दक्षिण ( भारत ) में मुसीबतों का सामना करना पड़ा हो, लेकिन हमारे सामने अब ऐसा उदाहरण मौजूद है जो दक्षिण की सत्ता को झुकने पर मजबूर करता दिखाई देता है.” अब अखबारों की इस हिंसा और दूसरी भाषा पर विजय स्थापित करने के घमंड का कोई जवाब है किसी के पास. एक बहुभाषीय राष्ट्र में किसी भी भाषा के प्रति ऐसा असम्मान क्या शोभनीय है ? अंत में भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक दोहा – 
निज भाषा उन्नति आहे, सब उन्नति को मूल | 
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल || 

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