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Friday, September 7, 2012

बकर-शास्त्र का संछिप्त घोषणापत्र



सर्वप्रथम इस बात की घोषणा कर देना अहम् है कि यह व्यक्ति केंद्रित शास्त्र है, यहाँ व्यक्ति का महत्व किसी भी अन्य वाद से कहीं अधिक है | अब इस प्रश्न का निवारण करना अति-आवश्यक प्रतीत होता है कि संछिप्त घोषणापत्र क्यों, वृहद क्यों नहीं ? कारण सीधा और एकदम सरल है | बकर-शास्त्र आज तक एक अलिखित शास्त्र है जिसकी वृहद व्याख्या लिखित क्या मौखिक रूप से भी संभव नहीं है | कारण ? इसका विषय इतना ज़्यादा व्यापक है कि इसे पूरे का पूरा लिख पाना किसी भी इंसान, देवता, दानव ( अगर ये सब अस्तित्व में हैं तो ) के बस की बात ही नहीं | बची खुची कमी बकर का मूल चरित्र पूरा कर देता है | इस शास्त्र का मूल चरित्र ही ऐसा है कि हर व्यक्ति अपने लिए अपना शास्त्र खुद गढे और उसे अपनी सुविधानुसार जैसे चाहे वैसे प्रतिपादित करे | किसी और के गढे गढाए सिद्धांत पर अमल करना एवं किसी से प्रभावित होकर अपनी राय बनाना इस शास्त्र में सर्वथा वर्जित है | किसी और के बनाये सिद्धांत पर अमल करनेवाला व्यक्ति कभी भी बकर फैला ही नहीं सकता | हाँ, किसी और की मान्यता को सामने रखने की खुजली अगर बर्दाश्त के बाहर होने लगे तो बकर करने वाले को उस विचार को दुनिया के सामने कुछ इस तरह रखने का अधिकार जन्म से ही प्राप्त है कि वो इस बात को कुछ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करे जैसे ये ख्याल बकर करनेवाले के दिमाग के परकोटे में अभी अभी पनपा है | मसलन, एकदम ताज़ा-तरीन ख्याल की उत्पत्ति एक बकरवाले द्वारा अभी-अभी की गई है |
बकर-शास्त्र में बकर का मुद्दा उतना ही महत्व रखता है जितना लोकतंत्र में जनता | जनता का काम सरकार बनाना है या कम से कम ये भ्रम बनाये रखना कि जनता की चुनी सरकार है, उसी तरह दुनिया का कोई भी मुद्दा चाहे वो कितना भी संवेदनशील ही क्यों ना हो उसका काम केवल ये है कि उससे बकर की शुरुआत भर हो जाती है | श्रेष्ठ बकर फ़ैलाने वाला कभी केवल मुद्दे की बात नहीं करता | यहाँ न समय का कोई बंधन काम करता है न विचार और धारा की सीमा | यहाँ ज्ञान का आतंक भी नहीं चलता | संसार में केवल यही एक धारा है जहाँ ऐसा हो सकता है कि समाज जिसे अज्ञानी कहता हो वो बकर का मास्टर हो | यहाँ ज्ञान का महत्व उतना ही है जितना किसी चौबीस घंटे चलनेवाले समाचार चैनल में ब्रेकिंग न्यूज़ का जो किसी अमीर के छींक के साथ ही बदलती रहती है | यहाँ पूरी जानकारी के साथ बकर करनेवाल मूरख माना जाता है | ज्ञान की ललक बकर के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी की एक पेट खराब इंसान के लिए उरद की दाल | ज्ञान अच्छे खासे बकरवादी को बीमार कर सकती है | ज्ञान समाज पर एक अभिशाप की तरह है जिससे जितनी जल्दी हो सके एक बकर-वादी को ऊपर उठ जाना चाहिए | श्रेष्ठ बकर तभी हो सकती है जब आप केवल उतनी ही जानकारी रखें जितनी कि किसी रद्दी अखबार के हेडलाइन पढ़कर मिलती है | एक पुरानी कहावत बकर कौम का मूल मन्त्र होना चाहिए – “अधजल गगरी छलकत जाय |” लोगों ने आज तक इस कहावत की गलत व्याख्या की है | सही व्याख्या ये है कि गगरी आधी भरी हुई है फिर भी वो छलकती जा रही है ताकि किसी और को प्यास लगी हो तो बिना संकोच के अपनी प्यास बुझा सके | किसी की गगरी पूरी भरी है और वो छलक ही नहीं रहा, तो उससे दूसरे किसी को कोई फायदा है क्या ? नहीं न ? तो ज़रा खुद ही सोचा जाय कि इससे ज़्यादा सेवा भाव क्या किसी और सिद्धांत में बता सकता है कोई ? यह विश्व का एकलौता और एकमात्र जनवादी एवं समतामूलक सिद्धांत है | यहाँ न कोई नेता होता है न जनता | सब के समान अधिकार, समान कर्तव्य, समान अवसर | यहाँ इंसान चाहे किसी भी वर्ग, वर्ण, गोत्र आदि का हो सब एक ही उद्देश्य के लिए दिन रात लगे रहतें हैं कि बकर की महान परम्परा अपनी अवध गति से चलती रहे |
सबसे मूल बात ये कि अगर सारे समुद्र को स्याही मान लिया जाय और सारी धरती को कागज़ और दुनियां का हर जीव लिखने लग जाय फिर भी इसकी गुणवत्ता अपनी इम्प्रोवाइजेशनल क्वालिटीकी वजह से इतनी विशाल है कि कम से कम लिखित रूप से बकरशास्त्र की रचना संभव ही नहीं है | यह उसी वक्त गढा और गढते हुए जिया जाने वाला शास्त्र है |
बकर-शास्त्र अपने आपमें सारे मान्य शास्त्रों से ज़्यादा लोकप्रिय, प्रयोग में सुलभ तथा अचेतन में सर्वमान्य एक महाशास्त्र है | हर बात पर संदेह करनेवाला व्यक्ति और उसपर तर्क-वितर्क करने वाला व्यक्ति बकर कौम का महापंडित माना जाता है | यह अवधारणा मार्क्स की अवधारणा “डाउट एवरीथिंग” की अवधारणा से कहीं ज़्यादा आगे की सोच है !
बकर-शास्त्र की उत्पत्ति सृष्टि में मानव की भाषा की उत्पत्ति के साथ ही साथ मानी जानी चाहिए | हांलाकि कोई ये साबित नहीं कर सकता कि भाषा से पहले बकर का कोई अस्तित्व नहीं था | एक बार जब बकर-शास्त्र अस्तित्व में आ गया अर्थात मानव ने भाषा नामक चमत्कारिक चीज़ की रचना कर ली फिर तो ये मानव के नैसर्गिक गुणों में अपने आप ही शामिल हो गया | हम ये कह सकतें हैं कि आज इस विधा में इंसान जन्म से ही कमोबेश पारंगत होता है | जिस प्रकार जीवन में होता है कि कुछ किसी कारणवश पीछे छूट जातें हैं ठीक वैसे ही कुछ लोग दुनियावी उलझनों तथा सही गलत, तर्क कुतर्क के घनचक्कर में पड़कर इस शास्त्र में भी पीछे छूट जातें हैं | ऐसे लोग “बेचारे भले आदमी” माने जातें हैं और इनकी गणना केवल भीड़ के रूप में होती है |
जिस प्रकार किसी भी कार्य में महारत हासिल करने के लिए कठोर परिश्रम करना अनिवार्य माना जाता है ठीक वही सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है | अंतर केवल इतना है कि यहाँ ये प्रक्रिया थोड़ी उल्टी है | यहाँ धारा के साथ नहीं धारा के विपरीत बहना होता है | कहने का तात्पर्य ये कि जो कुछ भी कोमल है, सुन्दर है, तार्किक है उसे संदेहास्पद माना जाना चाहिए | यहाँ तर्क से कई गुना ज़्यादा ज़रुरी वो चीज़ है जिसे बेचारे लोग कुतर्क कहते हैं | जो कोई भी कुतर्क को गलत मानता है उसका सामाजिक बहिष्कार करना हर बकर प्रेमी का परम कर्तव्य होना चाहिए | ऐसे पापियों के नाश की धर्म और मर्यादा संगत बात है और अपने धर्म की रक्षा करना हर इंसान का कर्तव्य है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि बकर अपने आप में एक धर्म है |
बकर करने वाला इंसान किसी योगी से कम नहीं होता | जिस प्रकार एक सच्चा योगी तमाम सांसारिक मोह-माया त्यागकर हमेशा योग की साधन में लगा रहना चाहता है उसी प्रकार एक बकर करने वाला इंसान हर परीस्थिति में केवल और केवल बकर ही करना चाहता है | उसकी यह तीव्र चाहत किसी प्रह्लाद से कम नहीं होती | एक बकर फ़ैलाने वाला इंसान किसी कारण बस अगर बकर न फैला सके तो उसे अपना और संसार का अस्तिव ही निरर्थक लगाने लगता है | किसी कार्य में उसका दिल नहीं लगता | छप्पन भोग भी उसके किसी काम नहीं आते | ऐसी अवस्था में उसे तब तक शांति नहीं मिलती जबतक वो जी भरके बकर न फैला ले | एक बकर फ़ैलाने वाले इंसान को बकर फ़ैलाने से बलात् अर्थात बल पूर्वक रोका जाना उसका प्राण ख़तरे में डालने के समान है | किसी भी सज्जन पुरुष को ऐसा कृत्य शोभा नहीं देता | हालांकि यहाँ सज्जन दुर्जन की बनी-बनाई परिभाषा भी संदेहास्पद है | संदेह ही एक अच्छे बकर-कर्ता की सबसे बड़ी पूंजी है | यही वो कुंजी है जिसके बल पर एक अच्छा खासा इंसान बकर की दुनियां का शहंशाह बनाने की ओर अग्रसर होता है |
सत्य – असत्य एक भ्रम ही तो है | एक का सत्य दूसरे का असत्य हो सकता है | इसीलिए बकर-शास्त्र इस सत्य-असत्य के जंजाल से परे एक ऐसा जनता का जनता के लिए शास्त्र है जिसमे राग की प्रधानता साफ़-साफ़ देखी जा सकती है |  यहाँ राग का अर्थ गायन से नहीं बल्कि कहावत से समझा जाना चाहिए | कहावत है – अपनी डफली, अपना राग | यही वो बात है जो इसे दुनिया की किसी भी चीज़ से अलग करती है |
बकर-शास्त्र अपने उत्तम चरम पर तब होता है जब कई लोग, एक स्थान पर, दीन-दुनिया से बेखबर, एक ही विषय पर, पूरे जोशो-खरोश के साथ, बिना एक दूसरे से तनिक भी प्रभावित हुए, अपना-अपना राग मूलाधार से आलाप रहें हों | ऐसी स्थिति में पूर्वाग्रह सबसे बड़ा हथियार साबित होता है | यह एक बकर फैलानेवाले इंसान के लिए ठीक वैसे ही काम करता है जैसे नाव में पतवार |
बकर कोई मामूली विद्या नहीं कि किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी विद्यालय अथवा महाविद्यालयों में रटा दिया जाय | ये एक तपस्या है जो केवल तप के ताप से ही प्राप्त की जा सकती है | सीखने – सिखाने की विधा है ही नहीं बल्कि स्वं अपने अंतर-आत्मा की आवाज़ पर कठोर परिश्रम कर परम पद को प्राप्त कर लेने की विधा है | एक बार इंसान इस परम पद को प्राप्त हो गया फिर दुनिया की तमाम चीज़ें महज माया है - मूल बात है बकर | बकर करनेवाला एक अदना सा इंसान भी समय और मर्यादा की तमाम बाधाओं को पार करके बड़े-बड़े महात्माओं से श्रेष्ठ होता है | यहाँ किसी के मानने या न मानने से किसी भी प्रकार का कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी भी बात को मानना या न मानना भी एक प्रकार का भ्रम ही तो है |
हम जिसे मानते हैं उसे कितना जानते हैं और जिसे जानते हैं उसे कितना मानते हैं और अगर जानते-मानते भी हैं तो कितने दिनों तक कायम रख पाते हैं ?
बकर विद्या में पारंगत होने के लिए किसी मठ, मंदिर, मस्ज़िद. गिरजा तथा जंगल, पहाड़ आदि-आदि के चक्कर लगाने की ज़रूरत नहीं | ना ही आँख बंद करके किसी बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर धूल-मिट्टी ही फांकने और अपने सुन्दर बालों को किसी चिड़िया के घोसले में परिवर्तित करने की ही ज़रूरत है | यह मानव समाज के बीच रहकर समाज पर अपनी बोलांठपने को स्थापित करने की कला है | यहाँ तर्क-कुतर्क, उचित-अनुचित, प्रासंगिक-अप्रासंगिक  सबका दायरा सामान है | बल्कि यहाँ जो चीज़ जितनी ज़्यादा कुतार्किक, अनुचित, अप्रासंगिक हो वो उतनी ही तार्किक, उचित और प्रासंगिक होती है | यहाँ सामनेवाले को प्रभावित करना या अपनी बौधिकता का आतंक फैलाकर अपनी बात मनवालेना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है हर परीस्थिति में बकर को सुचारू रूप से चालू रखना | सालों से केवल एक ही व्यक्ति बकबका रहा हो और सुनने वाले कुढन और मजबूरी से लबरेज हों सुने जा रहें हो, कोई कुछ बोलना भी चाहे तो केवल पहला शब्द मात्र ही बोल पाए और पुनः श्रोता बनने को बाध्य कर दिया जाये, बकर-शास्त्र की भाषा में बकर कौम के लिए एक आदर्श स्थिति माना गया है | इसे ही तो कहतें है बकर-शास्त्र की चरम अवस्था को प्राप्त कर जाना | बकर कौम का एक सच्चा सिपाही किसी भी देश, काल, परिस्थिति में बकर फ़ैलाने के लिए ठीक उसी प्रकार तत्पर रहता है जैसे भूखा शेर शिकार पर झपटने को |

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