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Sunday, September 16, 2012

संसद का मानसून सत्र उर्फ़ आओ सखी चोर सिपाही खेलें.



पुंज प्रकाश 

भ्रष्टाचार भारतीय जन जीवन का हिस्सा बन चुका है. अब घूस को ' सेवा शुल्क ' के रूप में मान्यता दे देनी चाहिए. - सुप्रीम कोर्ट की एक व्यंगात्मक टिपण्णी.
जिस मुल्क की नीति ही निजीकरण केंद्रित और सारी सरकारी मिशिनरी लगभग चरमरा चुकी है, जहाँ गुंडों और पुलिस से एक समान डर लगता हो, उस देश में प्राकृतिक सम्पदा की लूट का मामला कोई नई बात नहीं है, ना ही नया है हमारे देश में घोटालों का इतिहास. आज़ादी के साल भर के अंदर ही हमने घोटालों में अपना खाता खोल लिया था. आज हम हर नए घोटाले पर या तो झूठमूठ के चौंकने की ओवरएक्टिंग करतें हैं या फिर हमारी यादाश्त बहुत ही क्षणिक हो गई है. पिछले कई सालों से भारत के कई जानेमाने बुद्धिजीवी व दल इसके खिलाफ़ बोलते और आवाज़ उठाते रहें हैं. लेकिन उनकी आवाज़ सुनाने में हमें तटस्थ होने के सुकून का आनंद नहीं मिल पाता, इसलिए उस ओर हम जानबूझकर अपना ध्यान नहीं जाने देना चाहते. हम खेल का आनंद लेने में अव्वल लोग हैं, खेलने में नहीं. कम्फर्ट ज़ोन में रहने का आनंद ही कुछ और है. यहाँ मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू करने का मज़ा आराम से लिया जा सकता है. हमें विकल्प शब्द अच्छा तो लगता है पर इसका इस्तेमाल करते वक्त हम अपना नफा-नुकसान देखना भी नहीं भूलते. देश और समाज की बारी हमेशा हमारे बाद ही आती है. देश में हर तरह की क्रांति हो हमें कोई आपत्ति नहीं शर्त बस इतना है कि हमें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए. हम झट से उस पार्टी और नेता से अपनापा जोड़ लेतें हैं जो हमारे हित की बात करता है ये बात जानते हुए कि ये हित की बात करनेवाला एक रंग स्यार है जो चेहरा देखकर मुँह खोलता है. इनका कोई नुमाइंदा किसी एक चुनावी महोत्सव में हमारे दरवाजों पर फौज के साथ हाथ जोड़कर घूमता है और हम अपने तारनहार की सूरत उसके अंदर देखते हुए उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में जानबूझकर फंस जातें हैं. फिर कम से कम अगले चुनाव तक वो हमसे हाथ जुडवाता है. अभागा है वो देश जहाँ नायक पैदा नहीं होते / अभागा है वो देश जिसे नायक की ज़रूरत पड़ती है, ब्रेख्त की ये दोनों बातें एक दूसरे के परस्पर विरोधी होते हुए भी यहाँ एक साथ सच प्रतीत होतें हैं. हमारा पसंद-नापसंद हम क्या हैं इससे निर्धारित होता है न कि जिसे हम चुन रहें हैं उसके गुण और दोषों से. हम अपनी इसी चयन की नीति के तहत दलों या प्रतिनिधियों का निर्धारण करतें हैं. कहने का अर्थ ये कि चयन की हमारी नीति की चाभी अक्सर ही हमारे स्वार्थ रूपी संदूकची में कैद रहती है. हम ये देखने में कभी नहीं चुकते कि हमें क्या सूट करता है, वो देश को भी सूट कर जाए तो अच्छी बात है.
कोयले के आवंटन के मुद्दे पर इतना हाय तौबा मचा है वो क्या निःस्वार्थ है ? क्या हर पार्टी अपना फायदा नुकसान देखकर अपनी गोटियां नहीं फेंक रही  ? हम समाचार चैनलों पर तमाशा देखने और गप्पें मार-मारकर अपने बाल नोंचने के सिवा और क्या कर रहें हैं ? संसद में जो भी हैं हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधि हैं ( ऐसा कहा जाता है. ) तो क्या हमारी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं बनाती ? क्या हम केवल वोट डालने और तमाशा देखने के लिए बनाये गए हैं ? क्या किसी प्रजातंत्र में प्रजा की भूमिका केवल वोट बैंक की होती है ? यदि सरकार को जनविरोधी कार्यों में लिप्त होने का अधिकार है तो क्या जनता को सरकार विरोधी कार्यों में लिप्त होने का भी अधिकार नहीं चाहिए ? क्या जनता को ये अधिकार नहीं कि वो सरकार को अयोग्य घोषित करे, इसके लिए चुनाव का इन्तेज़ार क्यों. कहनेवाले कहतें हैं कि इस तरह तो देश में अराजकता फैल जायेगी. तो क्या अभी जो हालात हैं क्या वो कम अराजक हैं ? क्या कोई सरकार देश द्रोही नहीं हो सकती ?
कण-कण में व्याप्त भ्रष्टाचार का भार उठाये ये संसद चले न चले किसको परवाह है ? जनता का रोज़ाना 9 करोड़ पानी में जा रहा है किसको परवाह है ? ऐसी हवा बनाई गई कि सत्ताधारी पार्टी तो बहस चाहती है पर विरोधी दल ऐसा नहीं करने दे रही है. अगर ऐसा ही था तो सत्ताधारी दल के किसी एक नुमाइंदे को पहले ही दिन स्पीकर के कान में ये फुसफुसाने की क्या ज़रूरत थी कि सदन भंग कर दो, विपक्ष हंगामा करेगा. सनद हो कि ये जादूगरी पुरे देश ने देखा है. उम्मीद थी कि दो-चार दिन में सब सामान्य हो जायेगा. वहीं विपक्ष को ये भी पता था कि अगर बहस हुई तो कोयले का कुछ कालापन उनके आस्तीन पर भी पड़ेगा. ये है बेशर्मी की हद कि सब के सब एक-दूसरे की ओर उंगली करके चोर चोर चिल्ला रहें हैं और सरदार अपने मौन पर कवितापाठ आयोजित करके मज़ा ले रहा है. सबको पाता है संसद में न सही कोर्ट में मामला रफा-दफा हो ही जायेगा. अदालत तो सांसद, मंत्री, अफसर के मामले में मौन धारण या मामले को सालों लटकाने में ही अपनी भलाई समझाता है और फिर साबूत भी तो चाहिए. आम आदमी पर जब कोई मुकद्दमा चलता है तो आम आदमी को ये सावित करना होता है कि उसने ये गुनाह नहीं किया जब सांसद, मंत्री आदि पर कोई मुकद्दमा चलता है तो मामला उल्टा होता है. अगर वो सत्ताधारी हो तब मामला भगवान भरोसे ही समझिए. भारतीय घोटालों और घोटालों में हुई सजा का इतिहास पलटके देखने पर घोटालेबाजों का ही सीना चौड़ा हो जाता है.
कोयला आवंटन के मुद्दे पर संसद के मानसून सत्र में कुल 19 दिनों में केवल 6 दिनों का ही मामूली कामधाम हुआ. यानि की 13 दिन तू चोर मैं सिपाही के खेल में ही गए. मूक मोड धारक प्रधानमंत्री के नेतृत्ववाली पंद्रहवीं लोकसभा का यह दूसरा सत्र है जिसमें सबसे कम काम हुआ है. यह सत्र 8 अगस्त 2012 को शुरू हुआ था जिसमें कुल 30 विधेयक पारित होने थे पर हंगामें के बीच के केवल चार विधेयक ही पारित हो पाया, वो भी बिना बहस किये. ये तो हम सब भली भांति जानतें हैं कि ये पैसा आम जनता का ही है और दूध का घुला तो कोई भी दल नहीं.
संसदीय कार्य मंत्री का कथन है कि सदन की कार्यवाई न चलने से प्रतिदिन नौ करोड़ रुपये का नुकसान है. इस हिसाब से 13 दिन के हो गए कुल 117 करोड़ रूपये. ये केवल रूपये के नुकसान का मामला नहीं है बल्कि इसे देश के समय की बर्वादी का भी मामला है. क्या कोई पक्ष या विपक्ष इसकी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार है ? वैसे कोई क्यों ले ज़िम्मेदारी. भाई काम हो चाहे न हो. मंत्री-विधायक का भत्ता और वेतन में कौन सी कटौती होने जा रही है. प्रजातंत्र के इस महासंग्राम में जनता के नाम पर एक बार किसी भी तरह जो जीत गया उसकी सारी सुख सुविधा तबतक के लिए एकदम तय है जबतक कि दूसरा चुनाव लोकतंत्र की कुण्डी  खटखटाकर नींद न तोड़ दे. अगर यही हमारा लोकतंत्र है और खीजते-कुढते, अपनों से झगड़ते, समाचार चैनलों पर चल रही बहसों पर अपना खून जलाते, रोटी-कपड़े के लिए बैल की तरह काम पर चले जाने को ही हमने अपनी नियति चुन ली है तो फिर कहने सुनाने को बचता ही क्या है!
स्पीकर मीरा कुमार तक से न रहा गया तो वो फूट पड़ीं  – “हमारे लोकतंत्र में विरोध जताने के कई ऐसे तरीके हैं जो कई बार मन में अशांति पैदा करतें हैं.”  हमारा मन कब अशांत होगा और अगर अशांत है तो उसे सही दिशा कब मिलेगी ? क्या हमें यहीं पहुँचाना था आज़ादी के 63वें साल में ? कुछ हो न हो हमारी सहने की शक्ति कमाल की है, जब तक कोई हमारी गर्दन न पकड़ ले हम मौन ही रहतें हैं. अच्छाई के प्रति हो न हो बुराई के प्रति तो हम महा-उदार हैं हीं.
ले देकर हम उन्हीं तीन चार पार्टियों को घुमा-फिराकर विकल्प के रूप में चुनतें रहतें हैं जो स्वं बड़े बड़े धन्ना सेठों की कमाई पर चलतें हैं. अभी पिछले दिनों प्रकाशित एक खबर पर नज़र मारतें हैं. गैरसरकारी संगठन एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ( एडीआर ) एवं नेशनल इलेक्शन वाच ( एनईडब्लू ) ने आयकर विभाग एवं चुनाव आयोग से देश के तमाम बड़े दलों के आय के बारे सूचना के अधिकार के तहत जानना चाह तो कोंग्रेस ने पिछले सात साल में 2008 करोड़, भाजपा ने 994 करोड़, बसपा ने 484 करोड़, भाकपा ने 417 करोड़, सपा ने 279 करोड़ बता तो दिया पर कोई भी दल ये नहीं बता रहा कि इतने पैसे आए कहाँ से! कांग्रेस 11.89% , भाजपा 22.76%, राकांपा 4.69%, माकपा 1.29%, भाकपा 57.02% आमदानी का ही हिसाब दे पा रही है. बहुजन समाज पार्टी ने 20 हजारा नियम का फ़ायदा उठाते हुए साफ़ कह दिया कि उसे किसी ने भी 20,000 से ज़्यादा की रकम दी ही नहीं. कानून ये कहता है कि कोई अगर 20,000 रुपये से ज़्यादा की रकम किसी पार्टी को चंदा अथवा दान में देता है तो उसका व्योरा चुनाव आयोग को देना ज़रुरी है. कमाल तो ये है कि 21 क्षेत्रीय दलों में से केवल पांच ( सपा, ए आई ए डीएमके, जद-यू, शिवसेना और टीडीपी ) दलों ने थोड़ी बहुत जानकारी दी बाकि 18 जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, तृणमूल कोंग्रेस, केरल कोंग्रेस, इनेलो आदि दल शामिल हैं, ने तो आरटीआई को महत्व देना ही ज़रुरी नहीं समझा. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ये पार्टियां जितनी आय दिखा रहीं है हकीकत इससे कई गुना बड़ा है.
इस पुरे मुद्दे पर इलेक्शन वाच का कथन ये है “ राजनीतिक दलों को चंदे के तौर पर हो रही फंडिंग ही भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा ज़रिया है. कुछ बड़े ओद्योगिक घरानों ने चुनाव सुधार न्यास बना रखा है. ये राजनीतिक दलों को धन देतें हैं बदले में निजी सरकारी भगीदारी के तहत बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के ठेके लेतें हैं.” ज्ञातव्य हो इसके लिए कोई कड़ा कानून नहीं है. वर्ष 1968 में इंदिरा गांधी की सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को कारपोरेट डोनेशन पर रोक लगा दी. तत्पश्चात पार्टियां अवैध रूप से मिलनेवाले चंदे पर आश्रित होने लगीं. इसे राजनीति में ब्लैक मनी का विस्तार माना जाता है. 1985 में इसे फिर से वैध कर दिया गया. वर्ष 2003 में एक कानून बनाया गया जिसके तहत पार्टियों के लिए उद्योगपतियों से चन्दा लेना और आसान हो गया. इस कानून के तहत व्यावसायिक कम्पनियाँ किसी भी पार्टी को अपने लाभ के पांच प्रतिशत से कम की रकम चेक द्वारा चंदे के रूप में दे सकती है. ऐसा करने के एवज में उन कंपनियों को आयकर में शत-प्रतिशत छूट का भी प्रावधान किया गया है. ये हैं जनता की पार्टियों का हाल, अब आप खुद ही तय करिये कि ये घरानों की सुनें या जनता की. वर्तमान की ही अगर बात करें तो रोज़ एक से एक खुलासे हो रहें हैं कि किस-किस वैध-अवैध कंपनी को कैसे-कैसे कोल ब्लॉकों का आवंटन किया गया है.
आजादी से फौरन बाद ही देश ने घोटाले से अपना नाता जोड़ा लिया था. नीचे ( विकिपीडिया के सौजन्य से ) भारत में हुए बड़े घोटालों का संक्षिप्त विवरण है, घोटालों की पूरी लिस्ट तो इससे कई गुना बड़ी है. जिस तक आप इंटरनेट की सहायता से आराम से पहुँच सकतें हैं. किसी भी तरह का घोटाला प्रकाश में आते ही जाँच और कानून व्यवस्था पर भरोसा रखने का स्वर भी तेज़ हो जाता है. नीचे दिए लिस्ट आप खुद पढ़िए और तय करिये कि न्याय उतना निष्पक्ष नहीं है जितना कि दिखाया जाता है.
जीप खरीदी 1948 आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से 2000 जीपों को सौदा किया. सौदा 80 लाख रुपये का था. लेकिन केवल 155 जीप ही मिल पाई. घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई. लेकिन 1955 में केस बंद कर दिया गया. जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में भी शामिल हो गए.
साइकिल आयात 1951 तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली. इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा.
मुंध्रा मैस 1958 हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के 1.2 करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ. इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया. कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा.
तेजा ऋण 1960 में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने के लिए सरकार से 22 करोड़ रुपये का लोन लिया. लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया. उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और केवल छह साल की कैद हुई.
पटनायक मामला 1965 में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया. उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी ‘कलिंग ट्यूब्स’ को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था.
मारुति घोटाला मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया. मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी.
कुओ ऑयल डील 1976 में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की. इसमें भारत सरकार को 13 करोड़ का चूना लगा. माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है.
अंतुले ट्रस्ट 1981 में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं.
एचडीडब्लू दलाली 1987 जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया. मामला था कि उसने 20 करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं. 2005 में केस बंद कर दिया गया. फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा.
बोफोर्स घोटाला 1987 में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे. मामला था कि भारतीय 155 मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है. बोफर्स घोटाला- 64 करोड़ रु., मामला दर्ज हुआ - 22 जनवरी, 1990, सजा - किसी को नहीं, वसूली – शून्य, (सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है) सजा - किसी को नहीं, वसूली – शून्य. (1981 में जर्मनी से 4 सबमरीन खरीदने के 465 करोड़ रु. इस मामले में 1987 तक सिर्फ 2 सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग 32 करोड़ रु. की कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड) 1992 में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब 5000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ.
इंडियन बैंक 1992 में बैंक से छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब 13000 करोड़ रुपये उधार लिए. ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई. उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे.
चारा घोटाला 1996 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए 950 करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए. केस चल रहा है. चारा घोटाला- 950 करोड़ रुपए, मामला दर्ज हुआ - 1996 से अब तक कुल 64, सजा - सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी को, वसूली – शून्य (इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हालांकि 6 बार जेल जा चुके हैं.)
तहलका इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा. यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई 15 डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है.
स्टॉक मार्केट स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में 1,15,000 करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, 2002 में इन्हें गिरफ्तार किया गया. स्टाक मार्केट घोटाला- 4100 करोड़ रु., मामला दर्ज हुआ - 1992 से 1997 के बीच 72, सजा - हर्षद मेहता (सजा के 1 साल बाद मौत) सहित कुल 4 को, वसूली – शून्य  (हर्षद मेहता द्वारा किए गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने 6625 करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर पड़ा.)
स्टांप पेपर स्कैम यह करोड़ो रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था. इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था.
सत्यम घोटाला 2008 में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा 8000 करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया. राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की.
मनी लांडरिंग 2009 में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया. मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी.
एयरबस घोटाला- 120 करोड़ रु. मामला दर्ज हुआ - 3 मार्च, 1990, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली – शून्य (फ्रांस से बोइंग 757 की खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया.)
दूरसंचार घोटाला- 1200 करोड़ रुपए, मामला दर्ज हुआ – 1996, सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित, वसूली – 5.36 करोड़ रुपए (तत्कालीन दूरसंचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से 5.36 करोड़ रुपए नगद मिले थे, जो जब्त हैं। पर गाजियाबाद में घर (1.2 करोड़ रु.), आभूषण (लगभग 10 करोड़ रुपए) बैंकों में जमा (5 लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा. सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से 600 गुना अधिक सम्पत्ति मिली थी।)
यूरिया घोटाला- 133 करोड़ रुपए, मामला दर्ज हुआ - 26 मई, 1996, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली – शून्य ( प्रधानमंत्री नरसिंहराव के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया. )
सी.आर.बी- 1030 करोड़ रुपए, मामला दर्ज हुआ - 20 मई, 1997, सजा - किसी को नहीं, वसूली – शून्य (चैन रूप भंसाली (सीआरबी) ने 1 लाख निवेशकों का लगभग 1 हजार 30 करोड़ रु. डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है.)
केपी- 3200 करोड़ रुपए, मामला दर्ज हुआ - 2001 में 3 मामले, सजा - अब तक नहीं, वसूली – शून्य (हर्षद मेहता की तरह केतन पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया.)
एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ उनकी रिपोर्ट में यह कहा गया है कि भारतीय भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों एवं उद्योगपतियों के कुल 462 अरब डॉलर की रकम काले धन के रूप में स्विस बैंक में जमा हैं. इधर हमारे प्रधानमंत्री अपने तमाम दरवाज़ें विदेशियों के स्वागत में खोलने को बेचैन है कि प्लीज़ आओ हमें लूटो.

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