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Thursday, May 23, 2013

भैय्या लोकतंतर, तुम्हें कितने वशिष्ट नारायण सिंह का अंगूठा और चाहिए ?


सच्ची प्रतिभाएं जहाँ उपेक्षित हो, असली नायकों के स्थान पर नकली और कागज़ी नायकों के साथ जहाँ सहजता महसूस किया जाय और हर क्षेत्र में चापलूसों की चांदी हो, उस समाज को कैसा समाज कहा जाना चाहिए? लोकतंत्र के बड़े-बड़े और विचित्र दावे करने वाला यह देश और उसके शहीदों ने ऐसे दिन के सपने तो नहीं ही देखे होंगें. आज हमारे मुल्क के संचालक जिस बेशर्मी से ‘जनता शांति बनाये रखे- सब ठीक है’ का दावा ठोकते हैं वो या तो हमें शर्मिंदा करते हैं या फिर हमारा मजाक बनाते हैं. यह महान झूठ है जिसकी सच्चाई से सामना होते ही हम मजाक में परिवर्तित होने लगतें हैं. जिस राज्य में सुशासन का नारा बुन्लंद किया जा रहा हो वहाँ एक विश्व-प्रसिद्द प्रतिभा लगभग उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त हो, यह एक घटिया मज़ाक नहीं तो और क्या है? क्या हमारे घर की दीवारों पर सारी जगह सिनेमा के नकली नायक-नायिकाओं ने घेर लिया है?
एक बात यहाँ पहले ही साफ़ कर देना निहायत ही ज़रूरी लग रहा है कि हालात कमोवेश पूरे मुल्क के ऐसे ही हैं. पूँजी और पैरवी का वाद जोर-शोर से चल रहा है और जिनके पास इसकी ताकत नहीं है वो नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं.
डा. वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1946 को जिला भोजपुर के बसन्तपुर नामक गाँव में हुआ. उनके पिता का नाम लाल बहादुर सिंह तथा माँ का नाम लहसो देवी है. पिता पेशे से सिपाही थे. इनकी प्रारंभिक पढ़ाई गाँव के प्राथमिक विद्यालय में शुरू हुई; फिर नेतरहाट पहुंचे. सन 1961 में मैट्रिक की परीक्षा में पूरे राज्य में वे अव्वल आए  और 1962 में साइंस कॉलेज, पटना में दाखिल हुए. इनकी प्रतिभा के मद्देनज़र, पटना कॉलेज के इतिहास में पहली बार पीजी (स्नातकोत्तर) के लिए विशेष परीक्षा का आयोजन किया गया. मात्र 20 साल की उम्र में पीजी करने वाले पहले भारतीय होने का गौरव भी इनके नाम है. 1969 में बर्कली के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पीएचडी करने के बाद, कुछ सालों तक वे नासा में वैज्ञानिक (एसोसियेट साइंटिस्ट) के रूप में कार्यरत रहे. वहां इनसे जुडी कई कहानियां हैं.
गणित के क्षेत्र में चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत (Cycle Vector Special Theory) की खोज करने का गौरव भी इनके नाम है. पैसिफिक जर्नल आफ मैथेमेटिक्स में प्रकाशित अपने इस शोधपत्र के कारण ये पूरी दुनियां के महान गणितज्ञों की श्रेणी में शामिल हो गए. सन 1971 में वे भारत वापस आये. तत्पश्चात उन्होंने आईआईटी, कानपुर, टाटा इंस्टीटयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुम्बई तथा इन्डियन इंस्टीटयूट ऑफ स्टेटिस्टिक्स, कोलकत्ता में अध्यापन का कार्य किया. प्राप्त सूचनाओं के आधार पर वर्तमान में वे अपने गाँव में परिवार के सहारे जी रहें हैं.
घर का एक कमरा, कमरे में एक ब्लैक बोर्ड और उस पर चॉक के सहारे लिखे गणित के कुछ अनसुलझे सवाल, लिखे-अनलिखे कागज़ के कुछ पन्ने, कुछ पुरानी किताबें, दबाईयां और मौन - यही है अब इनकी दुनियां. किसी से कोई शिकायत नहीं. पढाई के दौरान इकठ्ठा की किताबें ट्रंकों में भरी पड़ी है, जिसका ताला कभी नहीं खुलता. परिवार को भरोसा है कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा और वे फिर से गणित के सवालों को सुलझाने लग जायेंगें ! काश, ऐसा हो पता ! जहाँ तक सवाल दुनियां का है तो उसे शायद ही कोई फर्क पड़ता है. पता नहीं कैसा समय है कि आज डॉक्टर वशिष्ट जैसे लोग जिंदा भी हैं, तो इनकी चिंता करनेवाला कोई नहीं. पत्नी तक ने ये कहते हुए कब का साथ छोड़ दिया कि आप जीनियस होंगें, किन्तु मेरे योग्य नहीं.
1977 में जब इन्हें सिजोफ्रेनियाँ का पहला दौरा पड़ा तो रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अगस्त 1989 में उनके छोटे भाई इलाज के लिए पुणे ले जा रहे थे कि खंडवारा (मध्यप्रदेश) स्टेशन पर वो गुम हो गए. चार साल तक कुछ पता नहीं चला. लोगों ने उन्हें भिखारी और पागल समझा. उस दौरान इन्होनें कैसी ज़िन्दगी बिताई होगी इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. फिर एक दिन गाँव के एक युवक की नज़र इन पर पड़ी और इन्हें पुनः गाँव वापस ले आया गया. फिर छपने-छपाने और सरकारी आश्वासनों का कोरा दौड़ शुरू हुआ जिसकी हवा न जाने कब की फुस्स हो चुकी है. सरकारों को वोट दिलवाने वाले दबंग चाहिए - एक बीमार, जहीन गणितग्य भला इनके किस काम का ! जहाँ तक सवाल मीडिया और आमजन का है तो उसे किसी फिल्म स्टार व मॉडल के पागलपन को अपने ज़ेहन में बसाना सुखदायक लगता है - बजाय किसी गणितग्य, रंगकर्मी, साहित्यकार या लोक-कलाकार के. 
हर वर्ष 24 मई को सिजोफ्रेनिया दिवस के रूप में मनाया जाता है. सिजोफ्रेनिया यानि एक ऐसी मानसिक बीमारी जिसमें व्यक्ति अपना सुध-बुध खो देता है. उसकी सोचने समझाने की शक्ति का ह्रास हो जाता है. इंसान कई तरह की भ्रांतिओं का शिकार हो जाता है. इसे दुनियां की कुछ खतरनाक बिमारियों में से एक माना जाता है. एक आंकड़े के अनुसार दुनियां की लगभग एक प्रतिशत आबादी इस बीमारी से पीड़ित है. हमारे यहाँ इस बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों का प्रतिशत पांच है. मनोचिकित्सक सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याओं को इस बीमारी का कारण मानतें हैं. यह एक लाइलाज बीमारी नहीं है.  
हर राष्ट्र के कुछ राष्ट्रीय धरोहर होतें हैं, जो राष्ट्रीय संपत्ति मानी जातीं हैं और जिसकी देखभाल का पूरा ज़िम्मा अमूमन राष्ट्र के कन्धों पर होता है. कई बार यह जिम्मेवारी कोई गैर-सरकारी संस्थान भी निभाती है. किसी लोकतान्त्रिक देश में क्या केवल राजाओं और सामंतों के महल या मकबरे, नेताओं की समाधियाँ ही राष्ट्रीय संपत्ति हो सकतें हैं, एक गणित को कई तरीके से हल करके दिखाने वाले डा. वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे जीनियस नहीं? वैसे एक कहावत याद आ रही है – बन्दर क्या जाने आदी का स्वाद. कठोर सच यह भी है कि मुर्दों की पूजा करनेवाले राष्ट्र की गिनती जिंदादिल राष्ट्रों में नहीं होती और वैसा मुल्क और समाज कभी सभ्य नहीं कहा जा सकता जिसमें सच्चे नायकों के साथ चलने का साहस नहीं होता. सच्ची प्रतिभा का सम्मान करने से स्वयं राष्ट्र भी सम्मानित होता है और अपमान से अपमानित. पर पूंजीवाद की अंधी दौड़ में इस बात की चिंता कितनो को है ? पता नहीं, देश के द्रोणाचार्यों को और कितने एकलव्य का अंगूठा चाहिए !...!!...!!! 

1 comment:

  1. dhikaar hai is desh ke budhhijiviyo va media par jo sachi ko bhagvaan va amitabh ko mahanaayak ki sangya deta hai va kaside kadhata rahata hai

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