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Saturday, July 6, 2013

त्रासदी, क्रिकेट, शैपेन की बोतल और क्रांतिकारी नैतिकता !

भारत उत्तराखंड प्राकृतिक सह मानवनिर्मित त्रासदी से गुज़र रहा है ठीक उसी वक्त भारतीय क्रिकेट टीम चमत्कारिक रूप से आखिरी चैम्पियंस ट्राफी जीत लेती है. इस बार की भारतीय क्रिकेट टीम को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसे रामायण के बाली जैसा वरदान मिला हो कि जो भी उसके सामने आएगा उसकी आधी शक्ति का हरण हो जाएगा. तभी तो अच्छी से अच्छी टीम भारतीय दल के सामने आके क्लब के टीमों जैसा व्यवहार करने लगी तो संदेह होने लगा कि टीम इंडिया को आखिर किसका बरदान प्राप्त हो गया जिसने ये लिख दिया कि चैम्पियंस ट्राफी की आखिरी चैम्पियन टीम इंडिया ही होगी.
सार्वजनिक है कि इंग्लैड की टीम क्रिकेट के लंबे फोर्मेट में ज़्यादा कम्फ्ट महसूस करती है, जिसे जबरन 20-20 का मुकाबला खेलवाया गया. उसी दिन ही विजेता का फैसला कर लेना क्या निहायत ज़रुरी ही था ? चैम्पियंस ट्रॉफी विश्व कप के आयोजन के बाद विश्व क्रिकेट के एकदिन प्रारूप का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन है. बरसात के सीजन ध्यान रखते हुए क्या यह ज़रूरी नहीं हो जाता है कि कम से कम फाइनल जैसे महत्वपूर्ण मुकाबले के लिए रिज़र्ब डे रखा जाता. 50 ओवर का मुकाबला 20-20 ओवर खेलकर कोई जीते यह बात आज के ज़माने में जब टी 20 का प्रारूप आ चुका है, पचा पाना किसी भी क्रिकेट प्रेमी के लिए ज़रा सांप-छुछुंदर हो जाता है. ध्यान रहे मैं क्रिकेट प्रेमियों की बात कर रहा हूँ, दीवानों और क्रिकेट से कमाई करनेवालों की नहीं.
“आईपीएल में जो कुछ भी हुआ उसका पाप धोने का एक संक्षिप्त तरीका था ये कि भारतीय टीम को किसी भी तरह चैम्पियंस ट्रॉफी जितवाया जाए, ताकि कमज़ोर यादाश्तवाले भारतीय जनता का विश्वास एक बार पुनः क्रिकेट में वापस लाया जा सके.” कुछ क्रिकेट प्रेमी आलोचकों का यह कथन अतिवाद हो सकता है पर विश्व क्रिकेट की वर्तमान हालत देखते हुए पूर्णतः निराधार नहीं माना जा सकता. किसे नहीं पता कि भारत आज क्रिकेट का सबसे बड़ा मार्केट है. हो सकता है कि यह मात्र एक शंका हो पर यह शंका अपने चाहनेवालों के दिल में किसने पैदा किया ? पैसे और शोहरत की लालच में कौन आज कुछ भी करने और कुछ भी बेचने को तैयार है ?
बहरहाल, विजेता टीम इंडिया ने शैंपेन की बोतलों के बीच बार्मिघम (इंग्लैड) के एक होटल में पुरी रात पार्टी में मस्त रही. जीत का जश्न मनाया, हिंदी-पंजाबी गानों पर नृत्य किया. यह सब उस वक्त हो रहा है जब केदारनाथ में हज़ारों लोग ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं. खैर यहाँ केवल क्रिकेटरों को दोष देना उचित नहीं सेना और कुछ एनजीओ को छोड़ दें तो समाज के लगभग सारे ही हिस्से का हाल यही है. जो जहाँ हैं वहीं से क्रांति, परिवर्तन और नैतिकता का कानफाडू ‘हुयां-हुयां’ जारी रखे है. सब अपने आपको नैतिकता का पुजारी घोषित करने में लगे हैं और नैतिकता की हालत अबरा की मौगी सबकी भौजी वाली ही गई है. कह सकते हैं कि उदारीकरण, बाज़ारीकरण, निजीकरण, तकनीकीकरण आदि कारणों के बीच यह नैतिकता के पतन का युग भी है. और इससे कोई भी अछूता नहीं है, कोई भी नहीं. नेता, अभिनेता, साहित्यकार, रंगकर्मी, फिल्मकार, पत्रकार, जज, वकील, बाबू आदि आदि. हर कोई अपने को नैतिक और दूसरे को अनैतिक मानकर चलता है. क्रांतिकारी जमात का ध्यान अब क्रांतिकारिता पर कम फ़तवेबाज़ी पर ज़्यादा है. वो अपने अलावा हर चीज़ को नकार देना चाहते हैं. इनके लिए केदारनाथ त्रासदी एक धार्मिक पागलपन और उन्माद और क्रिकेट एक बुर्जुआ खेल से ज़्यादा कुछ नहीं है. जो हज़ारों लोग मरे वो इनके लिए बुर्जुआ और सामंत, अंधविश्वासी आदि संज्ञाओं से ज़्यादा कोई महत्व नहीं रखते. किसी बुर्जुआ की कमाई पर पलते और क्रांति का रट्टा मारते-मारते ये बेचारे भूल जातें हैं कि इनका खुद का घर और भारत की ज़्यादातर जनता की मानसिकता आज भी बुर्जुआ और सामंती है. क्रांति के ये नए चितचोर जनता का विश्वास तर्क से कम बल से ज़्यादा हासिल करने में विश्वास करते हैं. अक्ल बड़ी की भैंस में अब इनका जवाब भैंस होता है क्योंकि भैंस तात्कालिक और शारीरिक रूप से ज़्यादा ताकतवर दिखाती है और उसका रंग भी काला है और काला अपने आपमें विरोध का प्रतीक है. लाल और काले के मिश्रण से ही तो क्रांति संभव है, अब !

Tuesday, May 28, 2013

क्रिकेट : दुखद है एक खेल का ब्रांड में बदलते जाना.

टीम इंडिया देश का नहीं बल्कि बीसीसीआई का प्रतिनिधित्व करती है. - सुप्रीम कोर्ट.

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब. 
यह एक पुरानी कहावत है जिससे खेल के प्रति भारतीय मानसिकता पता चलता है. बिना खेल के क्या किसी भी सभ्य और स्वस्थ समाज की कल्पना की जा सकती है ? क्रिकेट भी एक खेल है किन्तु विज्ञापन युक्त सीमा रेखा पर, चौको-छक्कों की गंगोत्री में कम से कम कपड़ों में डूबती, इतराती, ठुमके लगाती चियर्स गर्ल्स से सुशोभित जिस टूर्नामेंट की शुरुआत ही नीलामी, खरीद-फरोख्त से हो और जिसका मूल उद्देश्य ही खेल को एक ब्रांड के रूप में परिवर्तित करके खेलप्रेमियों को उसके नशे की गिरफ़्त में कैद करना और मुनाफ़ा कमाना हो वहां सट्टेबाज़ी, दारूबाजी, वेश्यावृत्ति, काले धन और अंडरवर्ल्ड की सत्ता नहीं तो क्या नैतिकता और नैतिक मूल्यों की प्रयोगशाला चलेगी ? यहाँ खिलाड़ी, अम्पायर, कोच, प्रशंसक, पूर्व खिलाड़ी, टीम मालिक आदि खेल से ज़्यादा मनोरंजन, नाईट पार्टियां, लड़कियां और पैसे की गिरफ़्त में हैं. आईपीएल में खेल और खेलभावना कितना है पता नहीं पर धंधा सौ प्रतिशत है ये बात तय है. धंधे में मुनाफ़ा प्रमुख होता है जहाँ भद्रता की आड़ में अभद्र का बोलबाला है और बड़े से बड़ा भद्र और लिजेंड खिलाड़ी मालिक के आगे दुम हिलाने को अभिशप्त है. ये है आज के क्रिकेट का सच. हाँ, जहाँ पुरी दुनियां नस्लवाद के खिलाफ़ आवाज़ उठा रही है वहीं आईपीएल में चियर्स गर्ल्स का चयन नसल के आधार पर होता है. क्या आपने आईपीएल में कोई काली चियर्स गर्ल्स देखी है और देखी भी होगी तो कितनी ?

टीम चाहे कोई हो सब पियेंगें पेप्सी और कोक.
वो क्रिकेट प्रेमी जो खेल और खिलाड़ी के रोमांच में खो जाने को अभिशप्त और मजबूर हैं वो अब दया के पात्र बन गए हैं. अपनी सारी भावनाओं को समेटे, सारे कामधाम और भूख प्यास त्यागकर टीवी से चिपके इन बेचारों को इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं कि क्रिकेट के नाम पर इनकी भावनाओं से खिलवाड़ चल रहा है. टीवी के माध्यम से उन्हें खास किस्म के नशे की गिरफ़्त में लेने की यह एक विश्वव्यापी साजिश चल रही है. जहाँ नकली हीरो गढे जातें है और जहाँ दिन की शुरुआत और रात का अंत रिमोट का गला घोंटते होता है. सारी क्रांति और सूचनाएं समाचार चैनलों के हड-हड-कट-कट डिबेट में सिमट कर रह जाती है. बको, देखो, कमाओ, खाओ, बच्चे पैदा करो और पैग लगाकर या बिन लगाए देश की हालत पर हाय-हाय करते सो जाओ. ऐसी जनता से वर्तमान व्यवस्था को क्या आपत्ति हो सकती है ? आपत्ति तब होती है जब कोई इसे बदलने की बात करे. यह नशा है जिसकी गिरफ़्त में लोग मगन हैं. नशा चाहे किसी भी प्रकार का हो वो व्यक्ति को तर्कहीन और विवेकहीन बनती ही है.

बाज़ार से गुज़ारा हूँ खरीदार नहीं हूँ.  
क्रिकेट में पनप रही बुरी प्रवृतियों का खंडन करने का अर्थ खेल और खेल भावना का विरोध कतई नहीं होता. किसी भी चीज़ के प्रति अंधभक्ति उस चीज़ों के विनाश का कारण भी हो सकता है और कोई भी खेल उसका अपवाद नहीं होता. जिस खेल को पूर्व क्रिकेटरों ने अपने जूनून और खून-पसीने से सींचा आज उसका ऐसा पतन देखना किसी भी खेल प्रेमी के लिए पीड़ादायक है. इस खेल के एवज में उस वक्त उन्हें जितनी रकम और सुविधाएँ मिलती थी ? खेल को खेल की तरह खेलना चाहिए यानि खेलभावना से. पर यहाँ तो चीज़ें फिक्स और सेट होने लगी. जहाँ खेल की भावना ही नहीं हो वहां खेल का रोना क्यों ? माना कि अधिकतर खिलाड़ी अभी भी ईमानदार हैं किन्तु ऐसी इमानदारी किस काम की जो सही को सही और गलत को गलत न कह सके. मुट्ठीभर पूंजीपतियों और मुनाफाखोरों को ये अधिकार किसने दिया कि वो लोगों के जूनून, प्रेम और भावनाओं का ब्रांड बनाये, उससे मुनाफ़ा कमाए और ये महान खिलाड़ी इसका मौन समर्थन करें. इस सवाल का जवाब यदि वर्तमान व्यवस्था है तो इसे जनविरोधी माना जाना चाहिए. नहीं तो फिर सिद्धू की बात सही कही जायेगी कि “तमाम घोटालों के बाद भी सांसद पाक साफ़ है तो फिर आईपीएल क्यों नहीं.” वैसे 5300 करोड़ रुपये का बॉस बीसीसीआई के सौजन्य से सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री जैसे भूतपूर्व क्रिकेटर सालाना लगभग 3.6 करोड़ रूपया कमाते हैं. लगभग यही हाल कई अन्य भूतपूर्व क्रिकेटरों का है.

अभी तो ये अंगडाई है.      
आईपीएल के नाम पर जो कुछ भी चल रहा है उसमें चौकाने वाला तत्व कुछ नहीं है. इसके बीज इस आयोजन के अंदर ही व्याप्त है. यह सब तो एक नमूना मात्र है स्थिति इससे कहीं ज़्यादा बदतर है. इस खेल में बड़े-बड़ों की संलग्नता है जिसकी बात तक करने की हिम्मत किसी के पास नहीं. स्पॉट फिक्सिंग में संलग्न एक खिलाड़ी की फोन टेप में यह बात कि “क्या पिछले साल कोई दिक्कत हुई थी, जो इस बार परेशानी आ रही है.” आखिर किस ओर इशारा करती है ? या फिर चेन्नई टीम के मालिक की फिक्सिंग में संलग्नता ?
आईपीएल का कोई भी सीजन विवादों से परे नहीं रहा. हर बार विवादों का नया-नया अध्ययय जुड़ता रहा है जिस पर टोकन करवाई के अलावा कुछ खास नहीं हुआ. इस बार तो खिलाडियों का एमएमएस बनाकर ब्लैकमेल करने की कोशिश का भी खुलासा सामने आ रहा है. पहला सीजन (2007-08) में एक खिलाड़ी ने दूसरे खिलाड़ी को थप्पड़ मारा, एक खिलाड़ी डोप टेस्ट में पोजिटिव पाया गया, जी ग्रुप ने अपनी टी20 टूर्नामेंट इंडियन क्रिकेट लीग का आइडिया चुराने का आरोप लगाया तथा पंजाब में सर्विस टेक्स डिपार्टमेंट ने इसे एक तमाशा मानते हुए सर्विस टेक्स भरने का नोटिस भेजा. दूसरे सीजन में इसका आयोजन दक्षिण अफ्रीका में किया गया जिसके लिए वहां के तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष पर ललित मोदी से पैसा लेने के आरोप की जाँच अभी चल रही है, क्रिस केयेंर्स पर फिक्सिंग का आरोप लगाकर नीलामी में शामिल नहीं किया गया, पाकिस्तानी खिलाडियों को बैन किया गया, आईसीसी पर आईपीएल को क्रिकेट कैलेण्डर में जगह देने को लेकर दबाव बढ़ा जिसे आईसीसी ने मानने से इंकार कर दिया. तीसरा सीजन आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी विवादित रूप से आईपीएल से बाहर, आईसीसी के मैच फिक्सिंग निरोधी टीम ने आईपीएल एक और दो के मैचों पर सवालिया निशान लगाया, स्टार खिलाड़ी (सर) रविन्द्र जड़ेजा फ्रेंचाइजी से मोल भाव करता दिखा, इन्कमटेक्स डिपार्टमेंट ने टीम मालिकों द्वारा खिलाडियों को तय से ज़्यादा रकम देने की जाँच शुरू की. चौथा सीजन शशि थरूर विवाद, राजस्थान रॉयल्स के कप्तान शेन वार्न ने राजस्थान क्रिकेट संघ के सचिव के साथ सार्वजनिक स्थल पर झगड़ा तथा जुर्माना, क्रिस गेल ने आईपीएल में मिलनेवाली अपार पैसे के कारना अपने देश के क्रिकेट बोर्ड को ठेंगा दिखाया, दो टीमों के (राजस्थान, पंजाब) खिलाफ़ बीसीसीआई ने बैन लगाया किन्तु दोनों टीमें खेलीं. पांचवा सीजन एक बार फिर आईपीएल कमिश्नर का बदलाव, खिलाडियों को खरीदने में मदद करने की बात उभरकर सामने आई, पुणे वारियर्स का बीसीसीआई की नीतिओं का विरोध और गुप्त डील, केकेआर के मालिक नशे में धुत वानखेड के सुरक्षाकर्मी से झगड़ा किया, एक स्टिंग ऑपरेशन में स्पार्ट फिक्सिंग का खुलासा में बड़े बड़े खिलाडियों के नाम तथा दो टीम की मान्यता खत्म और अब वर्तमान सीजन में स्पार्ट फिक्सिंग कर लाखों कमाने और लड़किया मांगने का मामला.

आप कौन सा ब्रांड लेते हैं सर ?
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का आईपीएल खेल कम ब्रांड ज़्यादा है. इसके वर्तमान  संस्करण की ब्रांड वैल्यू 16,000 करोड़ रुपये का है जबकि सट्टे का कारोबार लगभग 40,000 करोड़ का अर्थात मूल कारोबार से ढाई गुना ज़्यादा. पिछले साल की अपेक्षा एक ओर जहाँ ब्रांड वैल्यू में केवल 4 फीसदी का इज़ाफ़ा है वहीं सट्टे के कारोबार में 25 फीसदी का. इसके पहले संस्करण में 6000 करोड़ रूपये की सट्टेबाजी हुई थी. सट्टेबाज़ी में शानदार इजाफे के पीछे जो वजह है सामने आती है वो ये कि आज समाज का कोई भी तबका पैसा सहज रूप से लगाने को तैयार है और सट्टे का कारोबार पान की दुकानों तक फैला है. यह रकम 100 रूपये तक से लेकर कितनी भी हो सकती है. बड़ा सट्टेबाज अपना फ़ायदा सुनिश्चित करने के लिए फिक्सिंग का सहारा लेते हैं और बदले में खिलाडियों को लाखों रुपये, महंगे तोहफे और लड़कियां उपलब्ध करवाते हैं. दूसरे, यह इतना लंबा टूर्नामेंट है कि सट्टेबाजों और बुकी दोनों को मुनाफ़ा कमाने का ज़्यादा से ज़्यादा अवसर मिल जाता है.

ओह, हम जलेबी की तरह सीधे-साधे लोग हैं.
आज समाज का पब्लिक सेक्टर हो, प्राइवेट सेक्टर हो या फिर सरकारी विभाग सब भ्रष्टाचार की गिरफ़्त में हैं. जिसको जहाँ मौका मिलता है वहीं मुंह मार लेता है. लोग बालू तक से भी तेल निकालने में महारत हासिल कर चुके हैं. आईपीएल के खिलाड़ी और अधिकारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं और समाज की दशा यह है कि यहाँ लोभ, लिप्सा, पैरवी, घूसखोरी, परिवारवाद, भ्रष्टाचार आदि का अखंड राज है. तो खेल और खिलाड़ी इस अंधी दौर में क्यों पीछे रहें. खिलाड़ी को पैसा, शराब और लड़कियां मिले तो वो टीशर्ट उतरने, सोने की चेन घूमके या कमर में सफ़ेद रूमाल खोंसके करप्शन में संलग्न होने को उद्वेलित है. खेल प्रेमियों का उल्लू बनाता है तो बने इनकी परवाह किसे है !
मामला सार्वजनिक होते ही कुछ खिलाडियों (छोटी मछली) पर बैन-वैन टाईप कोई दिखावा होगा और लूट का खेल पुनः अपनी गति पर चल पड़ेगा. बड़ी मछली (टीम मालिकों) पर हाथ डालने की हिम्मत किसी के पास नहीं है. आईपीएल के टीमों के मालिकों का बायोडाटा उठाकर देखिये सबकुछ पानी की तरफ़ साफ़ हो जायेगा. ये वही वर्ग है जिसने कभी चंद रुपयों से अपना कारोबार शुरू किया था और आज अपार धन का मालिक हैं. कोई इनसे क्यों नहीं पूछता कि इतना रूपया किस पेड पर कैसे उगाया ? ये वही लोग हैं जिनके इशारों पर इस विचित्र और भ्रमित प्रजातंत्र की सरकारें बनती और चलती हैं. पैसा मेहनत से कमाया जाता है इस बात में अगर सच्चाई होती तो सबसे ज़्यादा पैसा उस वर्ग के पास होना चाहिए था जो सालों भर हाड़तोड़ मेहनत करने को अभिशप्त है. आज समाज, सरकार, कला-संस्कृति और खेल, हर जगह भ्रष्टाचार धीरे-धीरे एक सर्वस्वीकृत धारणा बन गई है, जिसे आम आदमी की मौन स्वीकृति प्रदान है.

नमक हराम नहीं हैं हम.
पिछले साल एक स्ट्रिंग ऑपरेशन में यह खुलासा हुआ था कि आईपीएल में फ्रेंचाइजी टीमें अपने खिलाडियों को तय सीमा से ज़्यादा रकम का भुगतान करती हैं और यह भुगतान काले धन के रूप में होता है. यह बात खुद एक खिलाड़ी ने अपने मुंह से कही पर इस बात पर आजतक कोई करवाई तो दूर ढंग से जाँच तक नहीं हुई. इसकी जाँच करने का अर्थ है भ्रष्टाचार के इस महासागरीय प्रजातंत्र में नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर पालना. आप जिसका भी खाते हैं उसके प्रति वफादारी बजा लाना हमारी ‘महान’ सभ्यता है नहीं तो लोग नामक हराम कहतें हैं. ये सबको पता है कि टीम मालिक आईपीएल में क्रिकेट प्यार की वजह से पैसा नहीं लगाते बल्कि इन्हें यहाँ मुनाफ़ा दिखता है. ये धंधा है, खेल का उत्थान नहीं. उनके मुनाफ़े को नुकसान पहुंचाए बिना अगर किसी खेल का भला हो जाता है तो इन्हें कोई खास आपत्ति भी नहीं है. वैसे खिलाड़ी की समृधि और खेल की समृधि, प्रतिभा का सम्मान और प्रतिभा का मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल क्या एक ही बात है ?
खेल में पैसा आए इस बात से किसी को भी शायद ही कोई आपत्ति हो सकती है पर कितना पैसा और किस तरह का पैसा ? जहाँ प्रजातंत्र की सरकार अपनी प्रजा को ज़्यादा से ज़्यादा शराब पिलाकर और बाज़ार को विश्व के लिए शर्मनाक तरीके से खोलकर रायल्टी पर रायल्टी कमाना चाहती है ताकि शासकों की गाड़ी बे-रोक टोक धकाधक चलती रही. वहां नैतिकता पर बड़े-बड़े प्रवचन एक ‘फार्स’ नहीं तो और क्या है.  

पैसा किसे काटता है दाउद मियां ?
केवल आईपीएल या टी20 ही नहीं बल्कि कमोवेश क्रिकेट का हर प्रारूप आज इन भ्रष्टाचार, सट्टेबाजी, फिक्सिंग आदि की गिरफ़्त में है. कमाल की बात ये है कि ऐसे विवादों से न इसके दर्शकों की संख्या पर असर पड़ता है ना ही इससे जुडे विज्ञापनदाताओं पर और न ही इसे प्रसारित करनेवालों चैनलों को ही. आश्चर्य तो ये है कि अपने को खेल प्रेमी कहनेवाले लोग सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता देने की बात तक उठाने लगने हैं. कहतें हैं जुआ तो भारतीय परम्परा है. परम्परा तो सती प्रथा भी थी तो क्या इसे फिर से शुरू किया जाय ? दरअसल ऐसे तर्क देने वाले लोग मजबूर हैं. वे ये स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि इस खेल का इतना पतन और पूंजीवाद का कब्ज़ा हो चुका है.
क्या यह नहीं माना लिया जाना चाहिए कि उत्सवधर्मी हिन्दुस्तानी समाज ने भ्रष्टाचार को मौन सहमति प्रदान कर रखी है और इसके समर्थन के लिए एक नैतिक कुतर्क गढ़ लिया गया है ! क्या हम खेल और पिकनिक, काले धन, शराब, शबाव, ड्रग्स और अंडर वर्ल्ड में अंतर करने का विवेक खो चुके हैं ?

ये फिक्सिंग-फिक्सिंग क्या है, ये फिक्सिंग-फिक्सिंग ?               
मैच फिक्सिंग में पुरे मैच का परिणाम फिक्स होता है वहीं स्पॉट फिक्सिंग में यह फिक्स किया जाता है कि बॉलर को किसी ओवर में नो बॉल, वाइड बॉल या कितने रन देने हैं. बल्लेबाज अपने आउट होने के बारे में फिक्सिंग करता है.
हिन्दुस्तान में सट्टेबाजी या फिक्सिंग रोकने के लिए कोई कारगर कानून नहीं है. इसके लिए आज भी गैब्लिंग एक्ट 1867 की धाराएँ ही लगाई जाती हैं. इसके तहत दोषी पाए जानेवाले पर अधिकतर तीन महीने की सज़ा या 200 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है. धारा 420 और 120 के तहत मुकद्दमा दर्ज किया गया है पर यह ठगी और धोखाधड़ी की धारा है, फिक्सिंग के सन्दर्भ में इसे साबित करना आसान नहीं है. इसिलिय आजतक किसी को कठोर सज़ा नहीं हुई. वैसे केवल कानून मात्र बना भर देने से कोई अपराध रुक जायेगा यह तो अब कोई मुर्ख भी मानने को तैयार नहीं.

हे भ्रष्टाचार देव, तुम्हारी सदा जय हो ?
सन 2000 से ही क्रिकेट अपराध की गिरफ़्त में जाने लगा था. इससे पहले यह पाक साफ़ था यह दावा कोई नहीं कर सकता. अभी समाचार चैनल में अपने एक साक्षत्कार में डी कंपनी का एक मुरीद कह रहा था कि वो अच्छा खेलने पर पहले भी कई क्रिकेटरों को गिफ़्ट देता रहा है. अजहरुद्दीन, अजय शर्मा, मनोज प्रभाकर, अजय जड़ेजा आदि भारतीय सन्दर्भ में क़ानूनी रूप से इसके जन्मदाता माने जा सकतें हैं. आज अजहरुद्दीन बड़े राजनेता हैं और अपनी पहुँच के आधार पर तमाम आरोपों से बा-इज्जात बारी होकर इस बात पर और एक मुहर लगा चुके हैं कि भारत में राजनेताओं को सजा नहीं होती. बाकि सब क्रिकेट के विश्लेषक बनके विभिन्न समाचार चैनलों पर विराजमान हो शान से ‘माल’ बना रहें हैं और हमें क्रिकेट के गुढ़ रहस्यों से परिचित कराने का बेशर्म प्रयास कर रहे हैं. बीसीसीआई तो न जाने कब से बेशर्मी का ताज़ पहने विश्व की सबसे संपन्न क्रिकेट संस्था होने के दंभ में मग्न है. आईसीसी की एंटी करप्शन यूनिट के आईपीएल के प्रति चेतावनियों से भी इसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. इन सब बातों को प्रमुखता से उठानेवालों को क्रिकेट विरोधी का तमगा पहना दिया. माल, बोनस, मुफ़्त का खाना-शराब और मस्ती लूट रहे भूतपूर्व-अभूतपूर्व और वर्तमान खिलाड़ी भी बीसीसीआई के समर्थन में एक सूर से हूआं हूआं करने लगतें हैं और क्रिकेट प्रेमी भी उनके उटपटांग तर्कों से प्रभावित हो हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं. यह भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकृति नहीं तो क्या है ?

प्रतिभावान से ज़्यादा कमाऊ पूत की सेवा करते हैं हम.
जो लोग क्रिकेट प्रेमी होने का दावा ठोकते हैं वो तक कहाँ गायब होतें हैं जब महिला क्रिकेट, राज्य क्रिकेट, ज़िला क्रिकेट व अन्य क्रिकेट चल रहा होता है ? ये केवल बीसीसीआई वाली कथित राष्ट्रीय टीम के क्रिकेट के दौरान ही क्यों जागृत होतें हैं ? दरअसल बीसीसीआई ने क्रिकेट प्रेम के नाम पर जनता को बाज़ार का हिस्सा बना दिया गया है.
इस मुल्क में उदारीकरण, भूमंडलीकारण, विकास आदि बड़े-बड़े विश्लेषणों के नाम पर एक खास प्रकार की साजिश चल रही है. जिसके निशाने पर हर वो वर्ग और व्यक्ति है जिसके पास उपभोक्ता बनने लायक धन या समय है. जिसके पास नहीं भी है वे गुलाम बनाये जायेंगें. सही तथ्यों को दबाकर एक खेल के नाम पर खास किस्म का उन्माद बनाया जाता है. याद कीजिये कि टीम इंडिया किसी टूर्नामेंट का विज्ञापन कितने हिंसक तरीके से करती है और मिडिया भी इस काम में उनका भरपूर सहयोग प्रदान करती है. ऐसा माहौल बना दिया जाता है जैसे कोई खेल नहीं बल्कि विश्वयुद्ध शुरू होनेवाला हो.

पतन का ये आलम और गिरवी जमीर.
बाज़ार और क्रिकेटर की बेशर्मी का एक नमूना और देखिये. इतना सब उथल-पुथल चल रहा है इसे भी लोग कैच करना चाहते हैं. सिन्थौल डियो के अपने नए विज्ञापन में घोषणा करते हुए भारतीय क्रिकेट के नए स्टार विराट कोहली घोषणा करतें हैं – मैं खेलता हूँ तिरंगे के लिए, फैन्स के लिए, हौसलाअफजाई के लिए, आंसुओं के लिए, टीम के लिए, कप के लिए, जीत के लिए, ख्वाबों के लिए, सम्मान के लिए, स्वाभिमान के लिए, जोश के लिए, जूनून के लिए, चुनौती के लिए, विश्वास के लिए. मैं खेलता हूँ जिंदादिली के लिए. क्रिकेट को इस समय आपकी ज़रूरत है, पहले से ज़्यादा.
इतना सब लिखते हुए बेचारे ये लिखना भूल जातें हैं कि मैं खेलता हूँ लिकर किंग मालिक और पैसे के लिए. यह तो एक उदाहरण है. बाकि आज हिन्दुस्तान का हर खिलाड़ी किसी भी तरह का विज्ञापन करके माल बना रहा है. प्रतिभावान लोगों को स्टार और आइकन बनाया जाता है और जो खेल के साथ ही साथ अपनी बीमारी, सफलता-असफलता को भुनाते हुए पूंजीपतियों का समान बेचतें हैं, बेचने में मदद करतें हैं. इसमें हर वो खिलाड़ी शामिल है जिसकी किसी भी प्रकार की मार्केट वैल्यू है. एक शतक लगाते या किस मैच में दो-चार विकेट लेते ही मिडिया और उसके पेड एक्सपर्टस किसी खिलाड़ी की तुलना इतिहास के महान खिलाडियों से करने लगते हैं और विज्ञापन के दरवाज़े उनके वास्ते अपने आप ही खुलने लग जाते हैं. आईपीएल के वर्तमान अध्यक्ष राजीव शुक्ला जी की मासूमियत देखिये कहते हैं “खिलाडियों के पास सारी सुविधाएँ है और उन्हें अच्छा पैसा मिलाता है, तो उससे ऐसा कुछ करने की उम्मीद नहीं की जा सकती.” अब इस बेहूदा बयान का क्या मतलब निकला जाय ? यह कि जिसके पास सुविधा और पैसा नहीं होता उससे बईमानी की उम्मीद की जा सकती है ?
जहाँ बीसीसीआई अध्यक्ष खुद ही एक टीम का मालिक और दामाद सहित शक के दायरे में हो वहां ‘सब ठीक है’ का राग बार-बार अलापते रहना बेशर्मी नहीं तो और क्या है? तभी तो छुट्टी माना रहे अध्यक्ष महोदय एन श्रीनिवासन कहतें हैं “यह कहा जा सकता है कि आईपीएल फिक्स्ड है. यह सही नहीं है. लोगों का क्रिकेट में विश्वास कायम है. इतिहास में ऐसा होता रहा है.”

तू जंगल की मोरनी मैं जंगल का मोर कि लुक-छुप चोरी-चोरी.
संचार क्रांति के इस युग ने दर्शकों को आश्चर्यजनक रूप से उपभोक्ता के रूप में ढला है. इस पुरे प्रकरण में दर्शक (उपभोक्ता) दूध के धुले हो ऐसा नहीं है. हम आपको एक असंवेदनशील उपभोक्ता और मुनाफ़ाखोरों का आसान शिकार बनकर मग्न हो रहें हैं. हमारी दृष्टि केवल खेल तक ही पहुंचकर तृप्त हो जाती है और उसकी आड़ में यह सारा प्रपंच बड़े ही आराम से चल रहा होता है. हम कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप में क्रिकेटमोनियाँ नामक बीमारी के शिकार हो चुके हैं. जिसका यदि समय रहते इलाज न किया गया तो खिलाड़ी और दर्शक तो बचे रहें किन्तु शायद खेल दम तोड़ दे. ठीक उसी प्रकार जैसे प्रजा रोटी, कपड़ा, मकान और मैथुन की तलाश करती बची रहती है और प्रजातंत्र पल-पल दम तोड़ देता है.
कोई भी मुल्क सजग और संवेदनशील नागरिकों और शासन के दम पर मानवीयता और मानवीय प्रवृतियों का पोषक बनता है, जिस समाज में इसका आभाव हो वहां अराजकतावादी प्रवृतियों का ही साम्राज्य होगा. जैसा समाज वैसी सरकार और वैसी ही उसकी अन्य संस्था, यह कल भी सच था और आज भी सच है. संवेदशील होने के लिए किसी भी कौम का ज़िंदा होना एक अनिवार्य शर्त है और ज़िंदा होने का अर्थ साँस लेने, खाना खाना और नित्य क्रिया मात्र को संपन्न करना कदापि नहीं होता.

ये तो कहो कौन हो तुम उर्फ़ प्ले डाउन.
बीसीसीआई एक निजी संगठन है. जो आरटीआई और खेल मंत्रालय के दायरे से बाहर है. खेल मंत्रालय ने इसे आरटीआई के दायरे के अंतर्गत लाने की कोशिश की पर केंद्रीय मंत्रियों के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका. विरोध करनेवाले मंत्री सहित सरकार और विपक्ष के कई नेता बीसीसीआई के पदाधिकारी हैं और जम के माल बना रहें हैं. बीसीसीआई का कथन है कि “चुकी वह सरकार से कोई मदद नहीं लेता, इसलिए उसे खेल मंत्रालय की मान्यता की ज़रूरत नहीं है.” इसी वजह से अपने-आपको किसी भी चीज़ के प्रति जवाबदेह भी नहीं मानता. पता नहीं क्यों सरकार बीसीसीआई को बिना मान्यता के वो सारी सुविधाएँ देती हैं जो केवल राष्ट्रीय खेल संगठन को मिलनी चाहिए. उदाहरणार्थ – बोर्ड की शिफारिश पर क्रिकेटरों को अर्जुन अवार्ड तथा उन्हें सरकार संस्थानों में नौकरियों पर रखना. यह पैसे की ताकत नहीं तो और क्या है कि सरकार उसे मान्यता नहीं होने के बावजूद राष्ट्रीय खेल संगठन मानती है और उसके जीत हार पर देश के आम आदमी से लेकर प्रधान आदमी तक के सन्देश प्रसारित होतें हैं. ममता दीदी जैसे कुछ महान लोग तो बस कुर्बान ही हो जातीं हैं. वैसे खेल मंत्रालय के अंदर जितने खेल हैं उनकी स्थिति देखते हुए किसी बेहतर की उम्मीद करना उचित नहीं लगता. “टीम इंडिया देश का नहीं बल्कि बीसीसीआई का प्रतिनिधित्व करती है.” सात साल पहले यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी दलीलों और तर्कों के आधार पर सुनाया था. जिसे पलटने की बड़ी कोशिश की गई, कानून में बदलाव तक किया गया पर वो फैसला अब भी कायम है. कुल मिलाकर लबोलुआब ये कि क्रिकेट पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और सट्टेबाज़ी पर बीसीसीआई. वर्तमान बीसीसीआई अध्यक्ष ये साफ़ कह ही चुके हैं कि “हम सरकारी संस्था नहीं हैं. सट्टेबाजी रोकना हमारे बस में नहीं है. इतना सबकुछ होने के बाद भी देखिए, लोग बड़ी संख्या में स्टेडियम पहुँच रहें हैं. मैं इससे खुश हूँ और दर्शकों का आभारी भी. इससे साफ़ है कि आईपीएल में खोट नहीं है.”

अनैतिकों की नैतिकता बड़े माल की चीज़.
यह कोई नहीं कहता कि बीसीसीआई में सारे के सारे बेईमान लोग ही बैठे हैं. वहां भी निश्चित रूप से अपवाद स्वरुप कुछ ऐसे लोग होंगें ही जो ईमानदार और खेल से प्यार करनेवाले होंगें किंतु इसके अधिकांश कर्ता-धर्ता राजनीतिक और आर्थिक रूप से इतने दबंग हैं कि वे तमाम किस्म के विवादों के बावजूद किसी भी किस्म की जवाबदेही, पारदर्शिता और जाँच को पहली नज़र में दुत्कार देतें हैं. बीसीसीआई की कार्यशैली नियमों और कानून के मुताबिक कम पैसे और रसूक के सहारे ज़्यादा चलता है. यहाँ नैतिकता का स्थान किसी दरबान से ज़्यादा नहीं है. क्रिकेट में अकूत धन है इस वजह से ज़्यादातर राज्य क्रिकेट संघों पर पक्षीय अथवा विपक्षिय ‘रावड़ी’ नेताओं का पभुत्व है. बीसीसीआई ने धीरे-धीरे अपने आपको एक अहंकारी और स्वार्थी संस्थान में परिणत कर लिया है. जो किसी की भी बात मानने को तैयार नहीं चाहें वो सरकार हो या आईसीसी. जहाँ तक सवाल पूर्व और वर्तमान स्टार खिलाडियों का है तो बीसीसीआई ने उनके मुंह में पैसा ठूंसकर उनकी ज़बान बंद कर रखी है. जिसने भी मुंह खोला उसका नाम काली सूचि में दर्ज़ हो जायेगा. ऐसी प्रवृति तथा पूंजी और पहुँच की इस आंधी में एक अच्छे खासे खेल का सत्यनाश होना लगभग तय है और जब खेल ही नहीं बचेगा तो खिलाडियों की व्यक्तिगत क्षमता, इमानदारी और महानता का क्या खेलप्रेमी समाज अचार डालेगा ? इस खेल के रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं.

खतरनाक है मुर्दा शांति से भर जाना.  
जब पुरे का पूरा तालाब गन्दा होने लगे तो चंद मछलियों को कुर्बान करके सफाई का भ्रम पैदा किया जा सकता है, बेहतर वातावरण का निर्माण नहीं. वर्तमान में मुल्क के जो हालात हैं उसमें कोई भी समस्या के मूल पर बात करने को तैयार नहीं. भ्रष्टाचार एक मानसिकता है जिसकी जड़े आज समाज के हर हिस्से में व्याप्त है और वर्तमान व्यवस्था इससे लड़ने में अक्षम है. केवल कानून बना भर देने और कुछ लोगों को सज़ा की सूली पर कुर्बान देने से इसका निवारण हो जायेगा ऐसा सोचना जागती आँखों का सपना ही माना जायेगा.
स्थिति कितनी भी भयावह क्यों न हो दुनियां विकल्पहीन न कभी हुई है न होगी. ये बात और है कि हम विकल्प और बदलाव के लिए तैयार भी हैं या नहीं. आज भी विश्व क्रिकेट में ऐसे खिलाड़ी हैं जो विज्ञापनों, आइपीएलों और किसी भी तरह पैसा कमाने से कहीं ज़्यादा क्रिकेट को तहजीब देतें हैं, वो केवल अपने देश के लिए खेलतें हैं और खुश हैं. इन जैसों के आगे सचिन, लक्षमण, द्रविड जैसे महानतम और चरित्रवान खिलाड़ी का नायकत्व किसी आदर्शविहीन फ़िल्मी नायक जैसा ही प्रतीत होता है, जो फ़िल्मी खलनायकों से तो लड़ सकता है किन्तु वास्तविक खलनायकों का मौन समर्थन करता है.
एक प्रजातान्त्रिक देश में अपने नायकों को किसी अमीर घराने के लिए नीलाम होते देखने में जिन्हें आनंद और मज़ा आता हो उन्हें एक बार पुनः अपने और अपनी उपयोगिता के बारे में विचार करना चाहिए. धन की मीनार पर बैठी बीसीसीआई इतनी नादान नहीं कि किसी का निःस्वार्थ मनोरंजन करें. किसी के त्यागपत्र देने से कोई बुनियादी परिवर्तन हो जायेगा ऐसा नहीं है जब तक की मूल समस्या पर चिंतन-मनन करके उसका निवारण करने का प्रयत्न न किया जाय. व्यक्ति बदलने से ज़्यादा ज़रुरी है प्रवृति में बदलाव करने की. किन्तु तत्काल ऐसा कोई प्रयास नज़र नहीं आ रहा. बीसीसीआई का सच, व्यक्ति का सच, सरकार का सच, इन सब सच से बड़ा होता है सामाजिक सच, जिसकी अनदेखी एक ऐतिहासिक भूल ही मानी जायेगी.

Tuesday, January 29, 2013

झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन का क्रिकेट !


इधर झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगने की घोषणा हुई उधर झारखण्ड की राजधानी राँची में झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एशोसिएशन ( जेएससीए ) के स्टेडियम का सामूहिक उद्घाटन किया गया | भारतीय क्रिकेट महानगरों से निकलकर छोटे शहरों की ओर उन्मुख हो रहा है ये कितना शुभ और अशुभ संकेत है ये तो समय ही बताएगा लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं अत्याधिक क्रिकेट खेलना और छोटे शहरों को भी क्रिकेट बाज़ार की गिरफ़्त में लेकर अपना साम्राज्य स्थापित करना भी है | कारपोरेट क्लब क्रिकेट के आज के युग में ये कहना कि क्रिकेट केवल एक खेल है बाकी कुछ नहीं, समसामयिक वक्तव्य नहीं लगता | अब यहाँ अर्थ, काम, मदिरा, सट्टेबाजी के साथ जोड़-तोड़ की एक सामानांतर सत्ता है और महिला क्रिकेट - पुरुष क्रिकेट, लोकल क्रिकेट - कारपोरेट क्रिकेट - अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का भेद भाव भी है |
एक क्षेत्रीय पार्टी के दिवासपनों की वजह से अगर सरकार न गिरी होती तो इस स्टेडियम का उद्घाटन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के महान ‘उदारवादी’ नेता करनेवाले थे ! भारतीय राजनीति में इधर कुछ ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व और वर्चस्व बढ़ा है जिनका मूल सिद्धांत सत्ता सुख भोगना है | इसके लिए वे किसी से भी हाथ मिला सकते हैं | ज्ञातव्य हो कि विधायकों की खरीद फरोख्त और बंधक बनाने का हास्यापद खेल भी यहाँ खेला जा चुका है | बहरहाल, आज से बारह साल पहले झारखंडी अस्मिता के नाम पर बिहार से अलग होकर झारखण्ड अस्तित्व में आया था | इस दौरान कुल आठ सरकारें बनी और अब तक तीन बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है, वहीं एक से एक बड़े नेताओं ने छोटे-बड़े घोटालों में अपना नाम शामिल करके दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं है | राष्ट्रपति शासन लगने के साथ ही साथ भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और झारखण्ड के ‘सपूत’ महेंद्र सिंह धोनी ने टॉस जीता और भारतीय दल के फिल्डिंग करने के फैसले के साथ ही राँची में नवनिर्मित स्टेडियम में क्रिकेट का जूनून भरा खेल शुरू हो गया |
हेवी इंजीनियरिग कारपोरेशन ( एचआईसी ) द्वारा प्रदत् ज़मीन पर निर्मित इस स्टेडियम के उद्घाटन कार्यक्रम में स्टेडियम का शिलान्यास करने वाले झारखण्ड के एक कद्दावर नेताजी तक को नज़रंदाज़ कर दिया गया | हाईकोर्ट का निर्देश था कि इस स्टेडियम से आम जन को दूर नहीं रखा जायेगा और उन्हें भी अभ्यास करने दिया जायेगा |  स्टेडियम के नामकरण में एचईसी और उसके लोगो के प्रयोग किये जाने का भी वादा था, पर वादे हैं वादों का क्या ! अब वर्तमान व्यवस्था में जो संस्थान नेताओं और एचईसी जैसों को भाव नहीं देता वो गरीबी, भुखमरी, शोषण की मार झेलते आमजन को कितना भाव देगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है | जिस राज्य के हुक्मरानों को मुफ़्तखोरी की आदत पड़ चुकी हो वहाँ आमजन की चिन्ता है ही किसे !
मुफ़्त के टिकट और पास पाके अपने को विशिष्ट समझना एक बीमार समाज और मानसिकता का घोतक है | राँची स्टेडियम की कुल क्षमता करीब 38,000 दर्शकों की है जिसमें लगभग आधी सीटों की मुफ़्तखोरी हुई | इस मुफ़्तखोरी में शासक वर्ग बेशर्मी की हद तक शामिल हुआ | जैसा कि ज़ाहिर है कि शासकवर्ग की अय्याशियों की कीमत भी आम आदमी ही चुकता है सो जो टिकट बेचे गए वो ज़रूरत से ज़्यादा मंहगे थे | ऐसी ख़बरें भी आई कि कुछ लोगों ने अपने पासों की कालाबाज़ारी भी की और उन्हें कई गुना बढ़ी कीमत पर बेचा | इस कृत में  कुछ मीडियाकर्मियों के संलग्न होने की खबरें भी आईं |
क्रिकेट के लिए ये भी सही 
दफ्तर, स्कूल, कॉलेज आदि में छुट्टी का माहौल रहा, जैसे कोई राष्ट्रीय पर्व हो | राष्ट्रपति शासन के लिए न सही क्रिकेट मैच के लिए ही सही | छुट्टी तो छुट्टी होती है | चाहे जिस भी एवज में हो ! जन्मदिन पर हो या मरणदिन, क्रिकेट हो या राष्ट्रपति शासन | 
सरकार गिर गई, राष्ट्रपति शासन लग गया, क्रिकेट मैच के लिए जनता दीवानी हो गई पर आश्चर्य कि इस मुद्दे पर किसी तरह की कोई प्रखर जन प्रतिक्रिया देखने या सुनने को नहीं मिली ! तो क्या यह जनता की सरकार नहीं थी, या क्रिकेट का जूनून किसी भी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक मुद्दे से बड़ा है | इस प्रजातंत्र में विश्वास करने वाले तो चुनाव से जीती सरकार को अंधभक्त की तरह जनता की सरकार मानतें हैं और सरकार की जनविरोधी नीतियों के लिए नेताओं और तंत्र को दोषी मानतें हैं, व्यवस्था को नहीं ! तो क्या प्रजातंत्र के वर्तमान बुनावट में ही कोई खतरनाक समस्या नहीं है कि जहाँ जनता की ज़रूरत वोट बैंक और यदा-कदा जनसेवा करके जनता की सरकार कहलाने की मान्यता के लिए है ! जनता भी समय-समय पर कुछ कम कमाल नहीं करती ! क्रिकेट सितारों को देखने और क्रिकेट मैच के टिकट कटाने के लिए तो कड़कड़ाती ठण्ड को भी मात दे देती है पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक मुद्दे पर यही जूनून बेचारगी में बदल जाती है | प्रतिरोध के स्थान पर कोरी भावुकता और मासूमियत का बोलबाला हो जाता है और हम निरीह आमजन क्या कर सकतें हैं का एकालाप शुरू हो जाता है | वर्तमान समय में भारतीय राजनीति ( संसदीय व गैर संसदीय ) ने जनता का विश्वास खो दिया है ? वर्तमान में ऐसी हवा भी चलने लगी है जहाँ लोग बिना किसी पार्टी के झंडे के सड़कों पर उतारे, पुरज़ोर आंदोलन भी किया और पार्टियों के पास अंगूर खट्टे हैं का जाप करने के सिवा और कोई चारा नहीं बचा |
माना की राँची में पहली बार क्रिकेट मैच का आयोजन हो रहा था पर लोगों ने जिस तरह से इस हाड़ कांपती कडकती सर्दी में टिकट के लिए आधी रात को कम्बल लेकर और आग जलाकर लाईन लगाया वो अपने-आप में अद्भुत और अविश्वसनीय था | नेतागन भी पास और टिकट के जुगाड़ में रूठते और मानते रहे बजाय झारखण्ड और राजनीति की चिंता करने के | टिकट काउंटर खुलने के दिन से लेकर मैच के दिन तक प्रशासन के सामने ही खुलेआम टिकटों की कालाबाज़ारी चलती रही | 1200 रु. के टिकट 5000 रु. तक में बेचे गए | वहीं लोकतंत्र के चौथे खम्भे ने इन दिनों अपने पन्नों पर लोक की जगह क्रिकेट का जूनून और तंत्र की जगह पर गिल्ली, डंडा, बल्ले और गेंद को बैठा दिया है | जब से भारत और इंग्लैड के खिलाड़ी राँची में आए तब से पल-पल की खबरों और क्रिकेट के दीवानों की तस्वीरों से भर गया है सारा अखबार और राष्ट्रपति शासन समेत तमाम ख़बरों ने विज्ञापनों से बची जगहों को भरने का काम किया | यहाँ तक कि बलात्कार का मुद्दा भी गेंद और बल्ले की कशमकश में गुम हो गया |
कोई किसी से कम नहीं 
यह कैसा संकेत है ? जीवन की मूलभूत समस्यायों के प्रति एक तरफ इतनी उदासीनता वहीं उन्माद में इतनी संलग्नता से क्या कोई संकेत नहीं मिल रहा कि समाज आज किस दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है ? भारतीय राजनीति मानवता के किस धरातल पर खड़ी है | वोट बैंक वाली जैसी राजनीति आज हमारे मुल्क में हो रही है उससे एक न एक दिन मोहभंग होना ही है | पर निराशावादी राजनीति का जवाब आशावादी राजनीति से दिया जाना चाहिए नहीं तो जो चीज़ मुल्क को गिरफ़्त में लेगी उसे दुनियां अराजकता के नाम से जानती है और अराजकता किसी भी समाज के लिए एक अभिशाप हो सकता है आदर्श नहीं ? जहाँ उन्माद तो बनाया जा सकता है पर जन की मूलभूत समस्याएं को सुनाने वाला कोई नहीं होगा | जहाँ तिरंगा लहराकर स्टेडियम शोर पैदा करनेवाले को देशभक्त और तटस्थ होकर खेल का आनंद लेनेवाले को देशद्रोही करार दिया जाएगा |
बहरहाल, राँची में भारतीय क्रिकेट टीम ने शानदार तरीके से जीत दर्ज़ किया और एक बार फिर दुनियां में नंबर एक बन गयी | इस उपलब्धि को हासिल करने के एवज में लोगों ने जम के जश्न मनाया, नागरिकों ने अखंड कीर्तन तक का आयोजन कर डाला | वहीं देसी-विदेशी खिलाडियों को एक नज़र देख भर लेने के लिए लोगों ने पत्थर फेकें, पुलिस के डंडे खाए | धोनी के घर के आगे भीड़, होटल के आगे भीड़, रास्ते में भीड़, भीड़ ही भीड़ | जिसकी जैसे चली सबने अपना रोब चलाया | आरक्षित सीटों पर सेना ने रिज़र्व का स्टिकर चिपकाया और दूसरों के उधर आने पर जमकर रोब कटा | मंत्री-विधायक, अख़बारों के सम्पादक, पत्रकार, अधिकारीगण, ठेकेदार, उद्योगपति आदि पास के लिए मुंह फुलाए रहे | बिना इस बात की चिंता किये कि गरीबी, बदहाली, कुशासन, राष्ट्रपति शासन आदि झेलता झारखण्ड दिन ब दिन किस अँधेरी गुफा में जा रहा है | बहरहाल, क्रिकेट टीम झारखण्ड से फुर्र हो चुकी है और राष्ट्रपति शासन को सुचारू रूप में चलाने के लिए अधिकारियों का आगमन हो चुका है | इधर नेताओं के लिए अब भी रास्ता खुला है कि बहुमत साबित करें और सत्ता सुख का आनंद लें |

Tuesday, August 21, 2012

लन्दन ओलम्पिक में भारत : खर्च एक सौ बयालीस करोड़ पदक कुल छह !


चार साल में एक बार होनेवाले ओलम्पिक मुकाबले इस बार लन्दन में आयोजित हुए | 17 दिनों तक चले इस आयोजन में 204 मुल्क, 10,490 खिलाड़ी शामिल हुए, 302 गोल्ड मेडल और लाखों दर्शकों से सुसज्जित लन्दन ओलम्पिक के उद्घाटन पर 235 रुपये खर्च किये  गए | इस उद्घाटन समारोह का लेना देना खेल से कम खेल के ग्लैमर से ज़्यादा था | यह कोई खेल नहीं बल्कि एक इवेंट था जो फिल्म निर्देशक डैनी बोएल की देख रेख में किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह तैयार किया गया था | समापन समारोह भी उद्घाटन समारोह की तरह ही भव्य और खर्चीला था | मगर इन चकाचौंध भरे समारोहों के बीच ये बात कतई नहीं भूलनी चाहिए कि ओलम्पिक के सितारे जब सन्यास लेते  हैं तो उनकी आर्थिक हालत क्या होती है | जो मैडल वो जीतते हैं उनकी स्थिति ये है – केवल 6 ग्राम सोने से सजी गोल्ड मेडल की वर्तमान कीमत 36,400 रुपये है जबकि सिल्वर की 18,000 रुपये व ब्रॉन्ज मेडल की कीमत महज 165 रूपये है | अब ओलम्पिक के कुल खर्च के सामने इन मेडल्स की क्या कीमत है आप खुद ही तय करें तो ज़्यादा बेहतर होगा | खेल के नाम पर खर्च का जो आलम है उससे खेल और खेल को खेल भावना से खेल रहे खिलाड़ी कितना लाभान्वित हो रहें हैं ? यह बात खर्च में कटौती के सन्दर्भ में नहीं बल्कि फिजूलखर्ची के सन्दर्भ में कही जा रही है | क्रिकेट में कालेधन की बात खुद खिलाड़ी ही कहते पाए जा रहे हैं, ओलम्पिक में डोपिंग और खिलाडियों के चयन (भारतीय सन्दर्भ में ) का मामला उठता ही रहा है | इसी ओलम्पिक में चीन, इंडोनेशिया और कोरिया के महिला बैडमिंटन खिलाडियों द्वारा अपने-अपने मुकाबले जानबूझकर हारने का मामला सामने आ चुका है | दिखावा हर जगह बढ़ रहा है और खेल के आयोजन भी दिखावे के इस खेल से अछूते नहीं | ऐसे में खेल को केवल खेल भावना से देखने की वकालत ज़रा आदर्शवादी कल्पना लगती है |
आज तक के ओलम्पिक इतिहास में कुल बीस पदकों के साथ भारत का सफ़र कोई ऐसा खास नहीं रहा है जिस पर अलग से कुछ कहा जाय | कारण शायद ये भी हो सकता है कि हमारे मुल्के में खेलना कूदना समय की बर्बादी मानी जाती है | सदियों पुरानी कहावत आपने भी सुनी ही होगी –पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब, खेलोगे कूदेगे होगे खराब | ये कहावत खेल के प्रति भारतीय नज़रिये को भी दर्शाती है | सन 1952 में दो पदक जीते थे और सन 2008 में किसी तरह यह संख्या तीन तक पहुँच पाया | इस तरह मात्र छह पदकों के साथ, जिसमें एक भी स्वर्ण नहीं है, इस बार का प्रदर्शन अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन माना जा सकता है | मगर आज भी स्थिति ऐसी नहीं है  कि हम वैश्विक स्तर पर खेलकूद में एक सम्मानित स्थान प्राप्त कर सकें | शायद इसीलिए हम खेलकूद में भाग लेकर ( क्वालीफाई होकर ) ही ऐसे खुश हो जातें हैं जैसे मैदान मार लिया हो और अगर कांस्य पदक भी जीता तो उसकी खुशी सोना जीतने के बराबर होती है | यहाँ हम क्रिकेट की बात नहीं करेंगें क्योंकि उसकी तुलना बाकि खेलों से करना भारतीय परिदृश्य में न्यायसंगत नहीं जान पड़ता | क्योंकि विश्व में क्रिकेट खेलने वाले देश दर्जन से भी कम हैं और वहाँ भी हमारी स्थिति इधर कुछ सालों में सुधारी है | विश्व चैम्पियन बनने से पहले हमारी गिनती फिसड्डी टीमों में ही होती थी |
आइये अब ज़रा इस बार के ओलम्पिक में भारत की बात करें | 17 दिनों तक चलानेवाले इस मुकाबले में इस बार रिकार्ड 82 खिलाड़ियों के दल के अलावा सरकारी पैसे से लन्दन घूमने की तमन्ना के साथ पता नहीं कितने अफसर-मंत्रियों के दल के साथ भारत ने कुल तेरह खेलों में हिस्सा लिया और निशानेबाज़ी, मुक्केबाज़ी, बैडमिंटन और कुश्ती में कुल 6 पदक जीते | वो भी चार कांस्य और दो रजत | खेल मंत्री जी के अनुसार  लन्दन ओलम्पिक की तैयारी पर सरकारी खर्च का आंकड़ा है 142.43 करोड़ रूपया | ये एक योजना के तहत खर्च किया गया था जिसका नाम है “ऑपरेशन एक्सीलेंस फॉर लन्दन ओलंपिक्स-2012” | अब अंग्रेज़ी में नामांकित यह जादुई ऑपरेशन कैसे चलाया गया उसकी कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है | हाँ, इस योजना के तहत खिलाड़ियों तथा एथलीटों के लिए देश में प्रशिक्षण शिविरों पर 61 करोड़ 65 लाख तथा विदेशों में प्रशिक्षण पर 70 करोड़ 55 लाख रूपया खर्च किया गया | इतना पैसा सरकारी खजाने से निकला इस पर किसी को कोई संदेह नहीं पर ये सारा का सारा पैसा प्रशिक्षण पर खर्च हुआ, खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देखते हुए ये बात पचा पाना ज़रा मुश्किल ही लग रहा है |
कांस्य पदक जीतते ही हम जैसे खुश होते हैं, हमारा दिवालियापन इसी बात से पता चलता है | जबकि विश्व की नंबर एक हमारी सुपरस्टार तीरंदाज़ दीपिका हँसते-मुस्कुराते रैकिंग में 37वें स्थान की ब्रिटिश खिलाड़ी एमी ओलिवर से मुकाबला हार जाती है | हद तो तब हो जाती है जब हार का सारा दोष तेज़ हवाओं और लन्दन के मौसम, वातावरण को देती है | माना कि हवा चल रही थी और मौसम भी मनोनुकूल नहीं था | पर यह बात सारे खिलाडियों के लिए थी केवल विश्व चैम्पियन के लिए नहीं | माना कि दीपिका स्थानीय खिलाड़ी से हारी पर उसके फ़ौरन बाद एक विदेशी खिलाड़ी ने उसी स्थानीय खिलाड़ी को जिससे दीपिका हारी थी, हरा दिया | अब साल भर लन्दन में रहने के बाद ही अगर कोई विश्व चैम्पियन तीरंदाज़ सही निशाना लगा पाने में सक्षम है तो फिर कहना पड़ेगा कि चमत्कार बार-बार नहीं होते.  
शर्मनाक हार के बाद जब ये तीरंदाज़ स्वदेश लौटे तो बयान सुनिए – “भारतीय तीरंदाज़ मानसिक रूप से पिछड़ गए, साथ ही क्राउड प्रेशर और मौसम का भी प्रदर्शन पर विपरीत प्रभाव पड़ा | भविष्य में एक साइक्लाजिस्ट या मेंटल ट्रेनर को टीम के साथ जोडा जाना चाहिए |” दीपिका आगे कहती है – “ओलम्पिक मेडल कोई भूत नहीं है | ऐसा नहीं कि इसे हासिल नहीं किया जा सकता | मैं विश्व की नंबर एक तीरंदाज़ हूँ | भविष्य में ओलम्पिक में मेडल जीतकर दिखा दूंगी | मुझमें आत्मविश्वास आज भी बरक़रार है |”
दीपिका के ओलम्पिक में प्रदर्शन को देखते हुए और उस पर इस तरह की बयानबाज़ी को पढ़के, साथ ही जिस प्रकार वो ओलम्पिक में गेम के दौरान हंस रही थी उसको मद्देनज़र रखते हुए उसकी इस मांग का समर्थन किया जाना चाहिए कि साइक्लाजिस्ट की ज़रूरत है | साथ ही उन्हें यह बात भी बताए जाने की ज़रूरत है कि खेल में हार जीत तो लगी रहती है परन्तु हार पर बहानेबाज़ी करने के बजाय उसे स्वीकार करने की कला भी एक विश्व चैम्पियन को आनी चाहिए | ऐसा कहके किसी भी खिलाड़ी की व्यक्तिगत प्रतिभा पर सवाल उठाने का मकसद कतई नहीं समझा जाना चाहिए, पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर केवल प्रतिभा के सहारे लंबे अरसे तक सफलता नहीं पाई जा सकती | साथ ही यहाँ सवाल केवल हार जीत का भी नहीं है | खेल में हार जीत खेल का हिस्सा है | पर जब हार शर्मनाक होने लगे और विश्व चैम्पियन खिलाड़ी पूरी स्पर्धा में एक भी परफेक्ट टेन न मर पाए और दोष हवा और दर्शकों को दे तो सवाल उठेगा ही और उठाना भी चाहिए |
लन्दन ओलम्पिक में सितारों से भरी भारतीय तीरंदाजी टीम का घटिया प्रदर्शन पहले दिन से ही शुरू हो गया था | रैकिंग राउंड में पुरुष दल को बारहवां और महिला दल को नौवां स्थान प्राप्त हुआ था | जिसमें विश्व चैम्पियन दीपिका व्यक्तिगत रूप से 8वें तथा भारत के नंबर एक पुरुष तीरंदाज़ जयंत तालुकदार साहेब 53वें स्थान पर रहे थे | जहाँ तक खर्च का सवाल है तो भारतीय तीरंदाजों की कोचिंग और उपकरण आदि पर लगभग सात करोड़ खर्च किये गए, इस खर्च में भारतीय तीरंदाजों के विदेशी एक्स्पोज़र के लिए 12 विदेशी मुद्राओं में खर्च हुई राशि 3.57 करोड़ भी शामिल है | यानि की कुल सात करोड़ में से लगभग आधी राशि विदेशी एक्स्पोज़र के नाम पर खर्च हुई | लियंडर पेस, महेश भूपति, सानिया मिर्ज़ा आदि स्टार खिलाडियों वाले भारतीय टेनिस दल की हालत भी कुछ ऐसी ही थी | बैडमिंटन में सायना ने कांस्य पदक तो जीता पर खेल का केवल एक ही सेट पूरा किया जा सका था जिसमें सयाना अपने विरोधी से 18 – 21 से मुकाबला हार रही थी | परन्तु घुटने की चोट के कारण सायना के विरोधी ने मुकाबला बीच में ही छोड़ दिया और सायना विजेता घोषित की गई |
बाकी खेलों का हाल तो और भी कमाल है | बीजिंग ओलम्पिक के स्वर्ण पदक विजेता और भारतीय दल के स्टार निशानेबाज अभिनव बिंद्रा को लन्दन ओलम्पिक के लिए जर्मनी में रहकर 155 दिन की ट्रेनिंग कैम्प कराया जाता है जिसका कुल खर्च लगभग 1 करोड़ 31 लाख रूपया आता है | नतीज़ा – दस मीटर एयर रायफल राउंड के लिए अन-क्वालिफाइड | हार का कारण दर्शकों के शोर की वजह से एकाग्रता भंग होने को माना गया !  टेबल टेनिस ( महिला एकल ) में अंकिता दास पहले ही राउंड में बाहर हो गईं | हाई जंप में हमारे जम्पर क्वालीफाई भी नहीं कर पाए | एथलेटिक्स की तिहरी कूद स्पर्धा में भारत की तरफ़ से रंजीत महेश्वरी का प्रदर्शन इतना खराब था कि क्वालीफाई राउंड में अपने तीनों जंप फाउल कर शानदार और एतिहासिक तरीके से लन्दन ओलम्पिक को अलविदा कहा | मुक्केबाज देवेंद्रो ने आगाज़ तो धमाकेदार किया पर उसे किसी अंजाम तक न पहुंचा सके | तैराकी में एकमात्र भारतीय खिलाड़ी एपी गगन ने क्वालीफाई राउंड में ही शर्मनाक तरीके से आखरी स्थान प्राप्त किया | वो 1500 मीटर फ्रीस्टाईल स्पर्धा में शीर्ष स्थान पानेवाले तैराक से लगभग 2 मिनट बाद फिनिशिंग लाईन तक पहुँच सके | तीरंदाज़ी समेत, टेनिस, टेबल टेनिस, जूडो, नौकायन, हाकी और भारोतोलन में भारतीय चुनौती कब आई और कब खत्म हुई पता भी नहीं चला | जीवट महिला मुक्केबाज मेरी कॉम ने और आखिरी के दो दिनों में सुशील कुमार और योगेश्वर भट्ट ने कुश्ती में पदक दिला कर कुछ लाज रखी |
अब हाकी चूंकि भारत का राष्ट्रीय खेल है ( कम से कम लिखित रूप में तो है ही ) तो इस पर ज़रा अलग से बात न की जाय तो राष्ट्र के साथ न्याय न होगा | तो आइये हाकी की बात करतें हैं | ओलम्पिक के इतिहास में भारतीय टीम ने ऐसा प्रदर्शन पहले कभी नहीं किया | भारतीय हाकी टीम ने अपने ग्रुप के कुल पांच मैच नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और बेल्जियम के खिलाफ़ खेले और पांचों में शानदार पराजय की उपाधि पाई | बल्कि सभी टीमों में से आखिरी स्थान पर रही | ये बात और है कि ओलम्पिक शुरू होने से पहले दावों की कोई कमी नहीं थी | अब जब टीम हारकर फिसड्डी सावित हो चुकी है तो लोग टीम चयन में राजनीति और सिफारिश की बात (जो भारतीय हाकी के लिए आम बात सी हो गई है ) उठनी शुरू हो गई है |
भारत में खेलों के हुक्मरानों को ये बात पता नहीं कब समझ में आएगी कि विजेता केवल कुछ महीनों में तैयार नहीं होते |  भारत में खेलों का मूलभूत ढांचा ( अगर कभी था तो ! ) कब का चरमरा चुका है | प्रशिक्षण केन्द्र या तो हैं ही नहीं या जहाँ हैं वहाँ (अधिकतर) करप्शन के अड्डों में तबदील हो चुके हैं | केवल जुनून के सहारे चैम्पियन नहीं पैदा होते बल्कि तकनीक की अहमियत भी समझनी होगी | तकनीक जिसको निरंतर पूर्वाभ्यास से साधा जाता है और इसके लिए समुचित स्थानों का निर्माण, संचालन व तमाम प्रकार की सामग्रियों की उपलब्धता, खेल संघों का विकेन्द्रीकरण, खिलाडियों के चयन में पारदर्शिता और एक अनुशासन में खिलाडियों के मानसिक, शरीरिक, बौधिक विकास को संचालित करना होता है | ये कार्य केवल कुछ शहरों या महानगरों में चलाने से नहीं होगा बल्कि इसे पूरे देश में एक मुहिम के तहत ईमानदारी से चलाना होगा | चैम्पियंस पैदा नहीं होते, वो प्रतिबद्धता, इमानदारी, अनुशासन और महत्वाकांक्षा के धरातल पर लंबे समय तक तपाकर गढे जातें हैं  

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...