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Friday, October 21, 2016

वाचिक परंपरा के साहित्यकार बॉब डिलन

किसे साहित्य कहा जाय किसे नहीं, यह बहस एकबार फिर शिखर पर है। कारण है गायक, गीतकार और संगीतकार व दुनियां भर में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलना। अमूमन उपन्यास, कविता, कहानी को ही साहित्य माना जाता है; इन सब में भी बहुत सारे भेद-विभेद हैं। वैसे वाचिक परंपरा साहित्य की सबसे पुरानी परंपरा है। इंसान निश्चित ही लिखने से पहले बोलना सिखाता है। हालांकि इससे पूर्व डिलन को ऑस्कर, ग्रेमी, गोल्डन ग्लोब अवार्ड, प्रेजिडेंट मेडल ऑफ फ्रीडमऔर पुलित्ज़र समेत अनगिनत सम्मान मिल चुका है और इन सबसे बड़ा सम्मान यह है कि 60 के दशक से आज तक वो दुनियां भर के संगीत प्रमियों में एक अत्यंत ही प्रतिष्ठित नाम हैं।
बॉब डेलेन "सार्थक" संगीत के क्षेत्र में मेरे पसंदीदा नामों में से एक हैं। मैंने उन्हें तब सुनना शुरू किया था जब अंग्रेजी मेरे लिए अमिताभ बच्चन वाली "फन्नी लैंग्वेज" हुआ करती थी। वैसे मेरी अंग्रेजी की हालत आज भी कोई गर्व करने लायक तो नहीं ही है। और जहाँ तक सवाल संगीत का है तो उसका भी कोई प्रकांड विद्वान तो नहीं ही है। हालांकि लोगों को यह भ्रम ज़रूर है कि मुझे संगीत की बेहतरीन समझ है। खैर, मेरे संगीत की समझ से जुड़ा एक किस्सा याद आ रहा है। सन् 1981 में एक फ़िल्म आई थी क्रांति। उसमें एक गाना था - "ज़िन्दगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर लो घड़ी दो घडी।" उन दिनों यह गाना खूब पॉपुलर हुआ था, आज भी है। अब मेरी समझ में यह नहीं आता था कि यह "घड़ी दो घड़ी" मतलब कि लोग घड़ी क्यों मांग रहे हैं और फिर कौन सी घड़ी मांग रहे हैं - हाथ वाली, टेबल वाली या फिर दिवार वाली?
संगीत के बारे में लगातार पढ़, सुन और यथासंभव रियाज़ करके कुछ हद तक साधने की कोशिश की। यदि मेरा मूड़ ठीक हो तो दिन भर हर तरह का संगीत गाते रहना या संगीत सुनते रहना - मेरी आदतों में शुमार है। इसी कोशिश में दुनियां भर का संगीत सुनने की कोशिश करता हूँ - अच्छा बुरा सब। किसी गुरु के जाकर संगीत नहीं सीखा लेकिन शायद लगातार विभिन्न प्रकार के संगीत सुनना और उसे गाने की कोशिश करना ही मेरी संगीत साधना है।
अब बात डिलन की - डिलन 22 वर्ष की उम्र से गा रहे हैं। उनका जन्म 1941 में रॉबर्ट ऐलेन जिमरमैन में हुआ था। डेलेन ने अपने म्यूजिकल करिअर की शुरुआत मिनिसोता के एक कॉफी हाउस से 1959 में की थी। 1960 में उनके गानों ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। मार्च ऑन वाशिंगटन फॉर जॉब्स एन्ड फ्रीडम में नस्लभेद के ख़िलाफ़ दिया गया मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण "आई हैव अ ड्रीम" ने डिलन की ज़िंदगी बदल दी फिर वो लग गए उस दौर के युवा असंतोष को आवाज़ देने में। उनका एल्बम ब्लोइंग विथ द विंड ने प्रतिरोध का स्वर मुखर कर दिया था और बॉब सफलता के चर्मोउत्कर्ष पर पहुँच गए। डेलेन के गाने 'ब्लोविन इन द विंड, ऐंड द टाइम्स दे आर ए चेजिंग' मानवाधिकार संगठनों और युद्ध विरोधी संगठनों के लिए एंथम साबित हुए। डेलेने ने पारंपरिक संगीत के अलावा संगीत की अन्य विधाओं में हाथ आजमाया जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। किसी गीतकार को संभवत: पहली बार उनके गीतों के लिए नोबेल दिया गया है। गीतों के लिए कवियों को नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।
बॉब डिलन के गीत पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में मिस्टर टैंबूरिन मैन से लेकर लाइक ए रोलिंग स्टोन, ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर चेजिंग शामिल हैं। बहरहाल, आज ज़रूरत है साहित्य के दायरे को विस्तार देने की और उसके प्रचलित परिपाटी, संस्कार और परिभाषाओं की सीमा को विस्तार देने की।
बहुत खूब मेरे पसंदीदा गायक डिलन। आपने विश्व संगीत, साहित्य और मानवीय जीवन को एक नया, लोकप्रिय और सार्थक आयाम दिया है।
बॉब डिलन के एक मशहूर गीत 'मिस्टर टम्बरिन मैन' का 'दैनिक हिन्दुस्तान' में छपा है. पढ़ा जाय। -

मिस्टर टम्बरिन मैन

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

मालूम है मुझे कल के महल आज बिखरे राखों में पड़े
धुंए के फाए से
अंधे कुएं में पड़ा मैं, गायब नींद है
पस्त मेरे हौसले, मेरी खामोश चीख से
न मिलना बाकी किसी से
जमीनें इतनी सूखी, न सपने उगे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

आ चल हम उडे़ं तेरी जादुई नाव में
होश गुम मेरे और दम खतम बाहों में
पांव भी सोए हैं
अपने आप आते, आवारा से पड़ते
हर मंजिल तक चलेंगे, बुझ गई वो लौ बनेंगे
अपनी नुमाइश में जलेंगे, कोई मंतर लगा, जाम दे
वादा है हम पियेंगे...

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

गूंजेंगी हंसी की, कुछ थिरकने की आवाजें, सूरज से भी आगे
ये कोई चुहल नहीं है, ये शोर है बच भागने का
और बढ़ने की हद केवल आसमां है
कोरस जुलूसों में एक नारा बेढंगा सा उठे
तेरी होशियार तालों में, वो बेहूदा बाजू में
उसे छोड़ो, बढ़ो आगे
वो पागल बस ढूंढ़ता है परछाइयां

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए।

और घोल दे मुझे मेरे मन के इस भंवर में,
सालों घनी तहों में, आगे झडे़ पत्तों से,
रोते पडे़ पेड़ों से, हवादार किनारों में
दूर और दूर उदासी की हदों से,
जहां तारों तले झूमें हम, लहराती फसल से
समंदर की गोदी में चमकीली रेतों से नहाते
सारी यादें सारी किस्मतें कर लहरों के हवाले
कल भर तक बस, आज को भूल जाने दे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए
(अंग्रेजी से अनुवाद: स्वप्निलकांत दीक्षित)
उनके द्वारा गाया और लिखा मेरा सबसे पसंदीदा गीत इस लिंक पर सुनिए।
 https://g.co/kgs/9QdVoI

Tuesday, August 9, 2016

एक मध्यवर्गीय लड़के का जन्मदिन

अपनेआप को लड़का क्यों कह रहा हूँ? तर्क तगड़ा है कि यदि पचास साल के कवि, कथाकार, रंगकर्मी आदि युवा कहलाते हैं तो उस हिसाब से तो मैं अभी लड़का ही हुआ न! तो जन्मदिन था। रंगकर्मी का जन्मदिन नाटकीय न हो तो लानत है। तो हुआ यह कि छः तारीख को रांची से पटना जाने का प्रोग्राम था लेकिन 3G, 4G और 5G वाले इस महान तंत्र में मेरे नेट की स्पीड इतनी अद्भुत थी कि कई दिनों से टिकट महोदय कट ही नहीं पा रहे थे। चार अलग-अलग कंपनियों से सिम कार्ड ट्राई किए परन्तु नेट आँख मिचौली कर रहा था और डमरू समय के रथ के पहिए के साथ घूमे ही जा रहा था। बीएसएनएल का तो मामला आज भी “भाई साहेब नहीं लगेगा” वाला ही है। अंततः तंग आकर रात अपने एक स्टूडेंट सुजीत को फोन किया कि मेरा टिकट कटा दो। सुजीत हैदराबाद में था, उसने भी कोशिश की, लेकिन वह भी सफलता हासिल नहीं कर पाया। थक-हारकर रात एक बजे सोने चला गया। तबतक विभिन्न सोशल साइट्स पर जन्मदिन की बधाई के सन्देश आने शुरू हो गए थे। साढ़े चार बजे सुबह के लगभग आँख खुली तो फिर स्मार्टफोन लेकर टिकट कटाने बैठ गया। इस बार सफलता मिली लेकिन तभी सुजीत का भी मैसेज आया कि उसने मेरा टिकट करा दिया है। अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि दोनों में से कौन सा टिकट कैंसल कराया जाय। कमाल यह कि दोनों ही टिकट एक ही बोगी में थे, बस एक नंबर के फर्क के साथ। अन्तः मैंने सुजीत को वाट्सअप किया कि उसने जो टिकट कराया है उसे कैंसिल कर दे। पुनः सोने जाने से पहले सोशल साईट खोला तो बधाई सन्देश के मैसेजों से इनबॉक्स गुलज़ार हुआ पाया।
सुबह – सुबह तीन साल की प्यारी सी बेटी को स्कूल ले जाने की ज़िम्मेदारी मेरी होती है। बेटी और उसकी माँ का उधम चालू हो चुका था लेकिन मेरी आँख खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। बहरहाल, बेटी और उसकी माँ के दुलार-पुचकार से आँख खुली। उठकर अखबार उठाया तो पहले ही पन्ने पर पूरे पन्ने के लेटेस्ट मोबाईल फोन के विज्ञापन ने तमाचा जड़ा और मेरा आधुनिक फोन मुझे किसी कचड़े के डब्बे में परिवर्तित होता प्रतीत होने लगा। स्मार्टफोन को लेकर मेरा पैशन भी कमाल है। मुझे यह दुनिया का सबसे चमत्कारी आविष्कार लगता है। एक छोटे से उपकरण ने अपने अंदर क्या कुछ नहीं समाहित कर लिया है। सो, यदि मेरा वश चले तो मैं रोज़ ही नया से नया मोबाईल फोन इस्तेमाल करूँ, ठीक उस पागल शहंशाह की तरह जो एक बार पहने कपड़े, जूते आदि इत्यादि को दुबारा इस्तेमाल नहीं करता। वैसे आज यह भी खबर कहीं पढ़ी कि हमारे देश के “साहेब जी" भी कपड़ों को लेकर कुछ ऐसे ही शौक रखते हैं।
तो भाग-भाग कर तैयार हुआ। स्कूटर पर हम और बेटी जी महराज निकले। दोनों ने बरसाती धारण कर रखा था। बेटी को पूरे रास्ते गाना, कविता और पापा, ये क्या है वो क्या है करने में बहुत ही मज़ा आता है। सो वो मगन थी। रास्ते भर अजीब सी बारिश हो रही थी – टिप, टिप टिप टिप टाइप और रांची की बारिश का मज़ा यह कि भींगे नहीं कि सर्दी-बुखार के प्यार में गिरफ्तार हुए। तो मैं सड़ा सा मुंह बनाए कछुए की गति से गाड़ी चला रहा था और मन ही मन मेघदूतम के रचयिता कालिदास को बुरा-भला भी कह रहा था। पक्का मिस्टर कालिदास कभी रांची के बारिश में नहीं भींगे होंगे। यदि भींगते और सर्दी-बुखार के प्यार में पड़ते तो मेघदूतम लिखने का रूमानी ख्याल शायद दूर-दूर तक नहीं आता। वैसे भी सर्दी बुखार में अच्छे से अच्छा रूमानी ख्याल अघोरपंथ में तबदील हो जाता है।
बेटी को स्कूल छोड़ने के बाद मुझे प्रसिद्द डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघनाथ दा के अखरा में जाना था। दादा इन दिनों राम दयाल मुंडा जी के ऊपर डाक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे हैं। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे प्रसिद्द फिल्म निर्देशक सत्यजित राय ने रविन्द्र नाथ ठाकुर के ऊपर बनाई थी। बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि राम दयाल मुंडा ने कुछ छोटे – छोटे नाटक भी लिखे थे – एकदम अनोखे तरीके से। हमें राम दयाल मुंडा लिखित नाटकों के फिल्मांकन के लिए जगह देखने संत जेवियर कॉलेज जाना था। मेघनाथ दा मेरी स्कूटी पर सवार हुए और हम फिल्म, रंगमंच और साहित्य पर बात करते हुए संत जेवियर कॉलेज के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने बताया कि आज उनकी बेटी का जन्मदिन है और उसके लिए उन्होंने बेटी के दोस्तों के आग्रह पर वाट्सअप पर सरप्राइज़ एलिमेंट के रूप में अपनी आवाज़ में बधाई सन्देश भेजा है। उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि आज मेरा भी जन्मदिन है। यदि पता होता तो वो मुझे पता नहीं क्या खिलाने – पिलाने लगते। और जहाँ तक सवाल मेरे बताने का है तो हमारे परिवार में कभी जन्मदिन को स्पेशल दिन की तरह मनाने का कभी रिवाज़ ही नहीं रहा इसलिए यह आज भी मेरे लिए किसी अन्य सामान्य दिन की तरह होता है। वैसे भी मध्यवर्गीय मानसिकता के अंतर्गत खोखली खुशी का प्रदर्शन, उसका दिखावा, बेवजह शोरगुल, रीति-रिवाज और खर्च – इन चीज़ों से कभी भी मेरा कोई खास जुड़ाव हुआ भी नहीं। खोखले आडम्बरों से एकांत मुझे ज़्यादा प्रिय है।
तो हम स्पेस देखकर वापस आए। दादा को अखरा में छोड़ा और अब बारी थी बेटी जी महराज को स्कूल से लेकर घर जाने की। इस बीच फेसबुक, वाट्सअप और एसएमएस के ज़रिए देश के कई भागों से जुड़े दोस्तों के बधाई सन्देश भी आ रहे थे और मैं मन ही मन गदगद होता हुआ सबको जवाब देने की कोशिश भी कर रहा था।
बाकि दिन भर के किस्से नहीं सुनाऊंगा। सुनाऊंगा तो क्या पता बहुत से लोग मेरा नाम भारतीय “मर्द” की श्रेणी से काट दें और बोलें हद है यह भी, घर में झाड़ू लगाना, पोंछा लगाना, बर्तन साफ़ करना, खाना पकाना और अपने बच्चे की पॉटी साफ़ करने जैसा “औरताना” का काम करता है। वैसे हद तो यह भी है जी हम इतने “महान” हैं कि काम का भी लिंग और जाति निर्धारण कर रखा है। खैर, जन्मदिन के मौके पर सुबह – सुबह पड़ोस से जो एक मात्र गिफ्ट मिला वो था मूली के पत्ते समेत चार पांच कुपोषित मूली। बाकि देश भर से खूब सोशल मिडिया पर खूब सारे सन्देश और फोन कॉल्स। सन्देश इतने ज़्यादा और प्यारे थे कि यदि बुद्धि -विवेक का चार चांटा न पड़े तो मध्यवर्गीय दिमाग आसमान में ही उड़ने लग सकता था। भाई, आसमान में उडो लेकिन पैर ज़मीन पर ही टिका रहे नहीं तो शुभचिंतक आसमान में उड़ाना जानते हैं तो उन्हें ज़मीन पर पटकना भी और मत भूलो कि संघर्ष ही जीवन है। सफलताएं दिमाग खराब करती है इसलिए सफलताओं को भूल जाओ और असफलताएं याद रखो। तो, कल तथाकथित जन्मदिन जैसा कुछ था नहीं हां बहुत सारे काम ज़रूर थे और शायद काम ही जीवन है। वाह, मज़ा आया न उपदेश नुमा भरत वाक्य पढ़कर? अब समाप्त।
पुनश्च – ऊपर लिखी सारी बातें झूठ हैं क्योंकि प्रगतिशील दिखना एक फैशन है। सच तो यह है कि कल सुबह से ही भव्य पार्टी शुरू हो गई थी। यो यो के गाने पर चियर्स गर्ल के साथ ही साथ यज्ञ और हवन का भी आयोजन था। जिसमें पुरी दुनियां भर के रथी-महारथी शामिल हुए। गरीबों को टेलीविजन के कैमरे के सामने दान दक्षिणा भी दिया जाया। बराक ओवामा और किशोर कुमार जन्मदिन के इस समारोह में इसलिए शामिल नहीं हो पाए क्योंकि कल उनका भी जन्मदिन था।  

Sunday, December 6, 2015

कम्युनिस्ट पार्टियां कभी ऐसा भी करतीं थीं, अब पता नहीं!

एक पुरानी भारतीय कहावत है कि पैसा अपने साथ बहुत सारी बुराइयों को भी लाता है। एक समय ऐसा भी था जब बिहार के कम्युनिस्ट पार्टियों के पास पैसा था ही नहीं। लेवी और विभिन्न प्रकार के टेक्स लेने का पेशा अभी शुरू नहीं हुआ था। कैडरों की ईमानदार, प्रतिबद्धता और जूनून और मेहनतकश जनता की एकता और अपने नेता पर उनका विश्वास ही उनकी कुल जमा पूंजी थी। आज का हाल तो खैर सबको पता है ही।
तो उसी ईमानदार काल का एक किस्सा कुछ यूं है – किसी इलाके के में पर्चा छपना था। पहले पर्चे का ड्राफ्ट तैयार किया गया। उस ड्राफ्ट को कुछ लोगों के बीच (जिनमें ग्रामीण ज़्यादा थे, नेता एक या दो) पढ़ा गया। फिर जो सुधार लोगों ने सुझाया उसे ठीक लगने पर दुरुस्त किया गया। फिर गाँव में चंदा किया गया। गांव क्या था कुछ झोपड़ियों से सुशोभित दलितों की बस्ती थी। रोज़ कुआँ खोदना और रोज़ पानी पीना यही उनकी ज़िंदगी थी। तो ऐसी बस्ती में चंदे के रूप में नगदी की कल्पना तो किया ही नहीं जा सकता है। वहां चंदे के रूप में वह अनाज ही मिलता जो औरत, मर्द रोज़ कमाकर या मेहनत से कमाए पैसे से खरीदकर लाते थे।
हम बच्चों को यह ज़िम्मेवारी मिलती थी कि कई प्रकार का झोला लेकर शाम के समय बस्ती में दरवाज़े दरवाज़े जाते और लोग उसमें अपनी मुट्ठी से चावल, दाल, आंटा आदि चीजें डालते। फिर उसको दूकान में बेचा जाता और उससे जो पैसा मिलता उससे पर्चा छप के आता। पर्चा जब छपकर हाथ में आता तो वह किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं होता।
पर्चा चुकी बहुत ही कम छप पता था तो हर गांव के हिस्से कुछ दर्जन पर्चे ही आते; जिसे लोग किसी अमानत की तरह संभालकर पढ़ते। अमूमन कोशिश यह किया जाता कि शाम में सबको बुलाकर यह पर्चा पढ़कर सुनाया जाय और बाकि पर्चे को बांटने के काम में लाया जाय। फिर भी कुछ लोग ऐसे थे जो अपने हाथों से पढ़ते। जो पढ़ सकते थे खुद पढ़ते और जो नहीं पढ़ सकते थे वो हम जैसे किसी बच्चे को पकड़कर पढ़वाते और बीच-बीच में हां-हूँ करते रहते। कहीं कुछ नहीं समझ में आने पर उस पंक्ति को बार-बार पढ़वाते। जब पर्चा पढ़ लिया जाता तो उसे किसी और को पढ़ने के लिए सौंप दिया जाता।
उस काल में कोई पर्चा फेंका हुआ पा लिया जाना एक बहुत बड़ी घटना थी और ऐसी घटनाएं शायद ही कभी हुईं।
केवल पर्चा ही नहीं बल्कि बैनर और पोस्टर भी ऐसे ही बनाए जाते। कूट (गत्ता) पर सदा कागज़ चिपकाया जाता और उस पर दातुन की कुंची बनाकर नारे लिखे जाते और उसे बांस के फट्ठे या किसी सीधे डंडे में किसी पतली रस्सी की सहायता से बड़ी ही सफाई से बंधा जाता।
बैनर के लिए लाल कपड़ा और एल्युम्युनियम पेंट का छोटा सा डब्बा ख़रीदा जाता और उसे अपने हाथों से बनाया जाता। दीवाल लेखन भी कुछ ऐसे ही होता था। टीन के छोटे-छोटे डब्बे में होली में इस्तेमाल होने वाले रंगों को थोड़ा गढा मिलाया जाता और उसे बबूल के दातून की कुंची बनाकर दीवाल पर लिखा जाता।
अब तो पर्चा कौन लिखता है, कैसे छपता है और कब बाँट दिया जाता है, किसी को कुछ पता ही नहीं चलता। बैनर, पोस्टर तो अब प्रोफेशनल ही बनाते हैं। सबकुछ एक रहस्य की तरह हो गया है। पर्चे पर वाद-विवाद तो अब दूर की बात है। लेकिन यह परम्परा हार जगह से खत्म हो गई है; ऐसा भी नहीं है। खैर, सन 1985 से 95 के बीच घटित यह पुरी घटना सुनाने के पीछे मेरा स्वार्थ केवल इतना है कि इस पुरे प्रकरण से ही मैंने पेंट और ब्रश से लिखना (कैलीग्राफी) सीखा और आज तो काफ़ी ठीक-ठाक लिख लेता हूँ। मैंने अपने नाटकों में भी मैंने अपनी इस कला का खूब इस्तेमाल किया। शुक्रिया कॉमरेड्स और जनता। 

Sunday, November 15, 2015

दिवाली : एक कम्युनिस्ट के बेटे का मूर्खतापूर्ण इमोशनल पोस्ट

बात उस ज़माने की है जब कम्युनिस्ट पार्टी के पास जूनून था, हौसला था। उसके कार्यकर्ताओं की आँखों में नई दुनियां बसने और बनाने का सपना था। हां कुछ नहीं था तो - पैसा। यह बिहार के पृष्ठभूमि में 1974 के छात्र आंदोलन के बाद वाले काल की बात है। जब कम्युनिस्ट होलटाइमर अपना घर परिवार छोड़कर अपने-अपने इलाके में किसी फकीर की तरह रहते थे। जो मिलता वो खाते, जहाँ नींद लगती वहीं जनता के साथ ही किसी घर, दालान या खुले आकाश के नीचे में सो जाते। सम्पत्ति के नाम पर उनके पास बस एक सर्वोदयी झोला होता जिसमें कलम, कॉपी, किताब, एकाध कपड़े के अलावा यदि कुछ होता तो वह था नई दुनियां बनाने का सपना। इसी काल में शायद “झोलटंग” नामक शब्द भी प्रचालन में आया था, जो शायद इनका ही उपहास बनाने के लिए प्रचलित हुए होगा। वैसे भी झोला और दाढ़ी तो उन दिनों फैशन बन ही गया था। महिलाओं की दाढ़ी आती नहीं, हां महिला कार्यकर्त्ता भी होंगे ही उन दिनों, अब वो झोलटंगी करती थीं या नहीं यह एक अध्ययन का विषय है।
वह चिट्ठी युग था - मोबाईल और टेलीफोन युग नहीं। वे कार्यकर्त्ता घर से महीनों महीना गायब रहते और उनके घरवालों को उनकी कहीं कोई खोज-खबर नहीं मिलती। अब ज़रा कल्पना कीजिए उन पत्निओं की हालत का जो इनसे ब्याह दी गईं थी और जिन बेचारियों को यह समझ ही नहीं आता था कि उनका पति आखिर करता क्या है। भिखारी ठाकुर की नायिका प्यारी सुंदरी को तो कम से कम यह तो पता था कि उसका पति बिदेसी बिदेस गया है तो नगदा-नगदी दाम कमाने; लेकिन इन पत्नियों को तो यह भी पता नहीं था कि उसके अच्छे खासे पढ़े लिखे पति कोई ढंग की नौकरी करने के बजाय जाता कहाँ है और करता क्या है! नगदा-नगदी दाम की तो बात ही बेकार है। घर आते वक्त कभी पांच पैसे का एक लमचुस (उस वक्त का टॉफी) भी ले आए तो गनीमत। अब इन बेचारियों की किस्मत में इंतज़ार और घर और आस पड़ोस के ताने सुनने के सिवा शायद ही कुछ और था। इनके पति जब कभी पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिए जाते तब तो दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ता जैसे। क्योंकि मान्यता यह है कि पुलिस तो गुंडे मवाली को पकड़ती है! खैर ये बेचारी पत्नियाँ किसी बटोही के कंधे पर सिर रखके सरेआम – “पीया निपटे नादंवा ए सजनी” भी नहीं गा सकतीं थी।
यह महिलाएं सिमोन द बुवआर भी नहीं नहीं थी कि अपने इस क्रांतिकारी और समाज की चिंता में बेदर्द हो गए पति को त्याग कर अपनी आज़ादी को गले लगा लें। यह एकदम साधारण सोच रखने वाली औरतें थीं जिनके लिए शादी का अर्थ जन्म जन्मांतर का बंधन जैसा ही कुछ था। अब इनके सामने घर के किसी अंधेरे कोने में मुंह दबाते हुए रोने-सिसकने और चुपचाप घरवालों के ताने सुनते हुए घर के काम में व्यस्त रहने के सिवा कोई और चारा भी नहीं था। अपने पति के आगमन पर कितनी रातें इन्होनें मीना कुमारी अंदाज़ में बिताएँ होंगें, किसी सामाजिक विज्ञानी के पास शायद ही इसकी कोई जानकारी उपलब्ध हो!
इनके बच्चों का आलम तो पूछिए ही मत। परिवार यदि निम्न मध्यवर्गीय है तो ये कब खाए, क्या खाए, क्या पहने और कब कुपोषित होते हुए बड़े हुए – किसे पता? साल में एक नया कपड़ा मिल जाए तो गनीमत। ऐसे ही एक ग्यारह वर्षीय लड़के को एक बार दिवाली में दो उपहार मिले। पहला कि पापा/पिताजी/बाबू घर आए और साथ ही कुछ पटाखे भी लाए। पता चला कि पापा को पटना में कोई कम्युनिस्ट पार्टी के नौकरी पेशावाले समर्थक मिल गए थे। उन्हें जैसे ही पता चला कि कॉमरेड घर जा रहे हैं – खाली हाथ, तो बच्चों के लिए कुछ पटाखे खरीदकर पकड़ा दिए और शायद कुछ पैसे भी। पत्नी के लिए कुछ साड़ी – वाडी जैसा कोई उपहार तो शायद नहीं ही था।
अब उस बच्चे को बीड़ीया पड़ाका (पटाखा) और छुर्छुरी तो चलाना आता था लेकिन आसमान तारा कैसे चलाया जाय, पता ही नहीं था। तो गोतिया के एक चाचा आए और शीशे की एक खाली शीशी (बोतल) में रखके आसमान तारा चलाते रहे और वो लड़का उसे ही देखकर मस्त होता रहा।
कुछ साल बाद फिर दिवाली आई। तबतक वो लड़का अपने एक भाई, बहन और माँ के साथ अपने पापा के कार्यक्षेत्र में ही रहने लगा था। उसकी माँ ने अन्तः यह तय कर लिया था कि अब चाहे जो हो उसे अपने पति के साथ ही रहना है। वह एक दलित जाति की बस्ती थी जिसमें उसके पापा कार्यरत थे। उस दिवाली की रात बाकि सारे लड़के पांच-दस बीड़ीया पड़ाका (पटाखा) लेकर फोड़ रहे थे। चौदह साल का यह बच्चा खाली हाथ ललचाई नज़रों से उन्हें देख रहा था। फिर वो दौड़ता हुआ आया और पटाखे की ज़िद्द करने लगा। पापा की जेब खाली थी और माँ के पास पैसे कहाँ से आएगें? पापा ने पहले समझाया, लेकिन बच्चा ज़िद्द पर अडा रहा तो पापा का धैर्य जवाब दे दिया और अपनी मज़बूरी और लाचारी को गुस्से में बदलकर पहले तो बच्चे की पिटाई की फिर उसे घर से (जिस सार्वजनिक स्कूल के एक कमरे में वो रहते थे) बाहर निकाल दिया। बच्चा बाहर निकला और बस्ती के एक खाली पड़े झोपड़ी में घुसकर बहुत देर तक सिसकता रहा। गुस्सा शांत होने पर उसके पापा उसे खोजते हुए आए और गोद में उठाकर सीने से लगा लिया। बच्चा अब भी सिसक रहा था और शायद पिता के आँखों में भी आसूं थे लेकिन अँधेरा इतना ज़्यादा था कि उस बच्चे को उसके पिता के आसूं शायद दिखाई नहीं पड़े।
उस बच्चे ने उसी दिन पटाखा नहीं चलाने का कसम खाया और वो अपने इस कसम पर आज भी कायम है। उसके पिता आज 60 की उम्र पार कर चुके हैं और आज भी मार्क्सवाद में उनकी आस्था अटूट है। वो आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर हैं लेकिन आज पार्टी को उनकी कोई परवाह नहीं है। पिछले दिनों उसके पापा का एक गंभीर सड़क दुर्घटना हुआ था, जिसमें उनकी जान जाते जाते बची। लेकिन उनके कुछ व्यक्तिगत शुभचिंतकों के अलावा किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। पार्टी ने तो उन्हें न जाने कब का मृत मान चुकी है। कारण यह कि आज जिस लाइन पर उनकी पार्टी चल रही है उससे इनकी पूर्ण-सहमति नहीं है।
पार्टी के पास जब कुछ पैसा आया था तो उसने अपने होलटाइमरों के लिए महीने की उतनी राशि देने का वादा किया था जितने में कि इनका परिवार साधारण तरीके से खा-पी और जी सके लेकिन पिछले कई सालों से इस रकम पर बिना किसी कारण और वाद-विवाद के रोक लगा दी गई।
और बेटे का आलम यह है कि मार्क्सवाद में पूर्ण विश्वास होते हुए भी वह किसी पार्टी का सदस्य नहीं है क्योंकि वह सिद्धांत चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि वह व्यवहार में नहीं है तो उसका उसके लिए कोई महत्व नहीं है।
बेटा पापा को कहता है - "पापा आपने अपने पुरी ज़िंदगी कम्युनिस्ट पार्टी में लगा दी, इस दौरान आपने कई जेनरल सेक्रेटरियों के साथ काम किया और आज आप यहाँ अनवांटेड की श्रेणी में डाल दिए गए हैं। कुछ नहीं तो कम से कम अपनी पुरी ज़िन्दगी पर बेवाकी से संस्मरण ही लिख दीजिए ताकि आनेवाली पीढियां आपलोगों की गलतियों और अच्छाइयों से कुछ सीख ले।” पापा साफ़ माना करते हुए कहते हैं – “इससे कम्युनिस्ट पार्टी की बहुत बदनामी होगी और अभी वो समय नहीं है। हमारा कार्य अभी अधूरा है और अभी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य करने हैं।”
बेटा एकटक उनकी तरफ़ देखता और सोचता है कि ये लोग किस मिट्टी के बने हैं। इनका विश्वास क्या कभी थकेगा नहीं? हालांकि बेटा ऐसे कई पिताओं को जानता है जो आज अपनी ही पार्टी में अनवांटेड की श्रेणी में डाल दिए गए हैं कुछ तो न जाने कब के मौत के गर्त में समा गए जिनकी असमय और अवसादग्रस्त मौत पर कुछ व्यक्तिगत साथियों के अलावा किसी ने लाल सलाम तक पेश नहीं किया।
बहरहाल, परिस्थिति शायद अभी ज़्यादा अनुकूल नहीं हैं। चुनौतियाँ और अंदर-बाहर का संघर्ष भी खतरनाक रूप से बढ़ा है लेकिन सबसे अच्छी बात है सपनों का ज़िंदा रहना क्योंकि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।
पुनश्च – बेटे के पिता शायद इस पोस्ट को सबसे ज़्यादा नापसंद करें, लेकिन क्या किया जाय बेटे ने भी तो सत्य बोलना और उसके पक्ष में खड़ा होना अपने पिता से ही सिखा है। इसकी कीमत की परवाह जब पिता ने आजतक नहीं किया तो बेटा क्यों करे? वैसे भी सर्वहारा के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और पाने के लिए सारी दुनियां।

Wednesday, August 19, 2015

कबीरा इस संसार में भांति भांति के भक्त

हटिया पटना एक्सप्रेस में रांची में एक सज्जन हमारी कम्पटमेंट में चढ़े - साईं भक्त। सज्जन क्या हैं पूरी चर्बी के चलते फिरते नमूने थे। आते ही उन्होंने अपने 4 बड़े बड़े लगेज सीट के नीचे जय साईं राम करते हुए घुसेड़ दिए और चेन के सहारे एक बड़ा सा ताला भी यह कहते हुए जड़ दिया कि ट्रेन में "साले" चोर बदमाश भी बहुत घुसने लगे हैं। यह कहते हुए भाई साहेब महीने भर पहले घटित किसी चोरी की कथा का गालियों सहित वाचन भी करने लगे। सीट के नीचे उन्होंने इतना सामान भर दिया कि अब किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची थी। वो तो खैर मनाइए कि मिडिल का दो बर्थ खाली था नहीं तो महाभारत तय थी। फिर मोबाइल पर साईं भजन बजाते हुए यह बखान करने लगे कि वो साईं के कितने बड़े भक्त हैं। फिर योगा (जो निश्चित ही यह व्यक्ति कभी न करता होगा) पर प्रवचन देने लगे। फिर ट्रेन, बर्थ आदि की समस्या पर भी अपने ज्ञान बांटने लगे जैसे हम सब चाँद से आए हो और हमें इस दुनियां के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं है। उनकी सबसे बड़ी शिकायत बर्थ की चौड़ाई है जिसकी वजह से जनाब करबट तक नहीं बदल पाते हैं। इनकी साइज देखकर शिकायत जायज भी है लेकिन इन्हें कौन समझाए कि समस्या बर्थ का साइज नहीं बल्कि ये खुद हैं। फिर तकिया कम्बल के लिए झिक झिक करने लगे और आखिरकार दो तकिया और एक कम्बल सिर के नीचे अपनी ऊपरवाली सीट पर लगा के विंडो सीट पर विराजमान हो गए। बेचारे सरकार को कोस भी रहे थे कि लोयर सीट नहीं दिया।
खैर, जैसे ही सामने वाले एक सज्जन ने लैपटॉप ऑन किया भाई ने प्रभु प्रभु यदि आपकी आज्ञा हो तो -- करते हुए अपना मोबाइल का केबल उसमें घुसेड़ दिया और तब तक चार्ज करते रहे जब तक लेपटॉप ने दम न तोड़ दिया। फिर वो फोन पर व्यस्त हो गए और बहुत देर तक आपकी कृपा, आपका आशीर्वाद, प्रभु की कृपा जैसे वाक्यों से सहयात्रियों को कृतार्थ करते रहे। मुझे मोबाइल पर फ़िल्म देखनी थी तो मैंने कहा प्रभु लाइट बंद कर दें? उनका रुखाई से जवाब आया - नहीं मैं अभी फ़ोन कर रहा हूँ। फिर वो प्रभु तबतक फोन करते रहे जबतक कि फोन की बैट्री ने दम न तोड़ दिया।
अभी सुबह उठे हैं और प्रभु मैं आपका चार्जर इस्तेमाल कर सकता हूँ कहते हुए एक सहयात्री का चार्जर अपने मोबाइल में घुसेड़के बकबक किए जा रहे हैं। जनाब कपड़ा भी खुलेआम बदल रहें हैं और बातें तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं। हाँ वैसे इनकी भाषा बड़ी अच्छी हैं। हिंदी, अंग्रेजी और मगही दनादन बोले जा रहे हैं। और मैं यह सोच रहा हूँ कि साईं तो ताजीवन दूसरों की सेवा में लगे रहे लेकिन साईं के ये भक्त ---? पूजने मात्र से क्या होता है जी? संवेदनशीलता और सेवाभाव पूजने से नहीं आती। साईं भी सोच रहे होगें भांति भांति के भक्त हैं मेरे। वैसे कल जो इन्होंने बड़ा सा टिका अपने माथे पर सजा रखा था उसका अब कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। बिस्तर ने इनका टीका तो पोंछ दिया लेकिन मन? मुझे बाबा कबीर की याद आ रहे हैं।

Friday, April 19, 2013

रामनौमी की पूर्वसंध्या और धर्म की स्थापना !

भारत विचित्रताओं से भरा देश है इसलिए भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक अध्ययन करना एक ज़रुरी अंग बन जाता है | किताबों में बातें जितनी कोमल और सुन्दर लगती हैं, ऐसा हो सकता है कि यथार्थ जगत में मामला एकदम ही उल्टा हो | इतिहास पलटके देखें तो हमारे देश की सबसे बड़ी सेकुलर ताकतों और पार्टियों के हाथ भी मासूमों के खून से सने हैं | जिन्हें इस बात पर ज़रा भी संदेह है वो 1947 के बाद के भारतीय इतिहास के पन्ने पलट के नज़र डाल लें !
कल रामनौमी है अर्थात आज उसकी पूर्व संध्या कही जा सकती है | रामनौमी अर्थात बजरंगबली का दिन | रामनौमी अर्थात धर्मध्वजा की स्थापना का दिन | बचपन को याद करता हूँ तो यह दिन दो वजहों से खास तौर पर याद आता है | पहला कि उस दिन किसी भी घर में मांस-मछली नहीं बनता था और दूसरा कि पूजा के बाद खाने के लिए लडुआ ( एक खास प्रकार का घर में बनाया लड्डू ) मिलाता था | इन दोनों वजहों में धर्म कहाँ है, मुझे नहीं मालूम | तब कहाँ पता था कि धर्म इतना मासूम नहीं होता |
अन्य धर्मों के मुकाबले हिंदू धर्म ज़्यादा सहिष्णु है ऐसा अक्सर ही पढ़ने-सुनने में आता है | ये बात और है कि हर धर्म के अनुयायी उस धर्म को सबसे ज़्यादा सहिष्णु और यहाँ तक कि वैज्ञानिक घर्म तक घोषित करने में तनिक भी नहीं हिचकते | टीवी डिबेट देखिये लोग आतंकवाद तक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने से नहीं शर्माते ! कहा भी गया है – जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी !!
एकाएक मन किया चलो कल रामनौमी है तो आज शहर घूमा जाय | देखें तो सही आदिवासी लैंड झारखण्ड की राजधानी इस पर्व को कैसे मनाती है | बाहर निकला तो कांके रोड से बिरसा कृषि विश्विद्यालय की तरफ़ चल पड़ा | मुझे बताया गया कि बीच में कहीं अस्त्र-शस्त्र संचालन प्रतियोगिता का आयोजन होता है, जहाँ अलग-अलग दल आके अस्त्र-शस्त्र संचालन का प्रदर्शन करते हैं और  पुरस्कृत होते हैं | लगभग ग्यारह बजे प्रातः का समय था | वैसे गर्मी के दिन में इसे प्रातः कहना उचित नहीं | मैं अपने दुपहिया का कान ज़ोर से अमेठता अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता आयोजन स्थल की ओर चल पड़ा | रास्ते में लाल रंग के बड़े-बड़े पताके (तिकोना झंडा) बड़े-बड़े और ऊँचे बांस के सहारे खूब ऊँचे हवा में फहरा रहे थे और उन पर राम भक्त हनुमान विराजमान हो हवा में फुर्र-फुर्र उड़ रहे थे |  मुझे अपना गाँव याद हो आया जहाँ रामनौमी की शाम किसी ऊँची छत से गाँव को निहारना एक अलग ही अनुभूति का हिस्सा हुआ करता था | लगभग हर घर में खूब ऊँचे-ऊँचे बांस के सहारे पताका फहरा रहा होता था | खुला आसमान, फहराते लाल-लाल पताके और खपड़ैल घरों से उठता धुआं | उसे निहारना एक काव्यात्मक अनुभव हुआ करता था और इस काव्यात्मकता में धर्म कहीं नहीं था |
खैर, आगे बढ़ा तो पाया कि झंडे तो एक से एक हैं पर रंग बहुतेरे हो गए हैं | हनुमान अब केवल लाल रंग के नहीं रहे | वो केसरिया, नीला, पीला आदि पता नहीं कितने रंग से भर गए थे पर हरा नहीं था कहीं भी | अब ये हरे रंग का झंडा कहीं क्यों नहीं लगा था इस सवाल का जवाब देनेवाला कोई नहीं था | वैसे शायद जवाब की ज़रूरत नहीं है, हम सब जानतें हैं | अब जानबूझकर अनजान बने रहने का अभिनय करें तो बात और है |
बड़े-बड़े कटआउट में हनुमान अपनी छाती फड़के राम और सीता का दर्शन करा रहे थे | तो कहीं राम बाल लहराते राम जन्मभूमि – बाबरी मस्ज़िद विवाद की याद ताज़ा कर रहे थे | कल एक बुज़ुर्ग कह रहे थे कि अब अयोध्या नाम लेते ही डर लगता है | रुकिए एक बहुत पुराना चुटकुला याद आ रहा है | एक ने पुछा – सबसे पहला मार्क्सवादी कौन था ? दूसरे ने जवाब दिया – हनुमान, क्योंकि वो कच्छा भी लाल रंग का पहनते थे |
अस्त्र-शास्त्र प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचकर जो कुछ भी देखा उसे कैसे परिभाषित करूँ समझ में नहीं आ रहा | ढेर सारे लोग एक बड़े से गोल दायरे में जमा थे और बीच में नुक्कड़ नाटक के प्रदर्शन नुमा एक परफोर्मेंस चल रहा था | जिसका मूल मन्त्र ये था कि पाप और शैतान से मुक्ति चाहिए तो बजरंगबली का मंदिर बनाना और उनकी आराधना करना ज़रूरी है | इस आग्रह से मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई आपत्ति नहीं पर यहाँ यह बात आग्रह पूर्वक नहीं बल्कि डराकर कही जा रही थी | जो प्रस्तुति दिखाई जा रही थी वो पूरी तरह से अंधविश्वासों पर आधारित थी | एक बीस साल का लड़का इस प्रदर्शन में शैतान बना था | उसके पूरे शरीर पर काला रंग पोत दिया गया था और उसे सांप खाते हुए दिखलाया जा रहा था | जी हां, ज़िंदा सांप, सचमुच का सांप | उसने मेरी आँखों के सामने दो ज़िंदा सांपों को अपने दांतों से काट दिया | एक सांप के कुछ टुकड़ों को तो वो खा भी गया | फिर आम आदमी बने कुछ अभिनेताओं ने हनुमान से गुहार लगाई | हनुमान प्रकट हुए और उसने उस शैतान का वध कर दिया और धर्म की स्थापना कर दी | फिर कुछ देर तक तलवार और लाठी के सहारे असत्य पर सत्य की विजय की कहानी दिखाई गई | वहां बहुत कुछ और चल रहा था | लगे हाथ उस प्रस्तुति में इस्तेमाल की जा रही भाषा पर भी कर लेतें हैं | उस पर बस इतना कह देना काफी होगा कि संवादों में कब हनुमान स्त्रीलिंग और कब पुल्लिंग हो जा रहे थे पता ही नहीं चल रहा था | वैसे हम कह सकतें हैं कि भाषा हिंदी थी | सबका निचोड़ ये कि धर्म के नाम पर की गई हत्या, हत्या नहीं कहलाती |
एक नाटक खुलेआम लोगों में अंधविश्वास को बढ़ावा और धर्म के नाम पर हत्या करने की प्रेरणा दे रहा था और किसी को इसकी कोई चिंता नहीं | वहां न प्रशासन का कोई आदमी था ना ही समाज का ठेका अपने सड़े कंधों पर उठाये कोई समाज का ठेकेदार | अरुण गोबिल को राम माननेवाली जनता तो हिंसा और नफ़रत से भरे इस प्रदर्शन को देखकर गदगद थी | कैसे इस मुल्क में किसी एक व्यक्ति के आह्वान पर लोग रामराज स्थापित करने के लिए एक खास समुदाय को समूल नष्ट करने को तत्पर हो जातें है, ये सब देखने के बाद बहुत कुछ समझ में आ जाता है |
क्या यह शक्ति प्रदर्शन था ? क्या यह भक्ति प्रदर्शन था ? क्या ऐसे आयोजन अन्य धर्म या समुदाय के लोग नहीं करते ? गौर करिये, दूध का धुला कोई नहीं है | बहरहाल, कल रामनौमी है और शहर के पुलिसकर्मियों को तैनात रहने को कह दिया गया है कि कहीं कुछ गडबड न हो जाए ! पर्व चाहे हिंदू का हो, मुसलमान का हो, आदिवासी का हो या किसी और का, गडबड़ी की संभावना रहती ही है !

Sunday, April 14, 2013

आखों देखा पहला सरहुल !


सुबह-सुबह बिजली गायब | पता चला कि आज सरहुल है इसलिए बिजली नहीं रहेगी | हर बार ऐसा होता है | पर्व-त्यौहार के दिन बिजली न रहे, आश्चर्य है | बताया गया कि  चूंकि आज के दिन आदिवासी लोग बड़े-बड़े बांस में सरना झंडा लेके निकलतें है जो बिजली के तार में फंस सकतें हैं | कोई दुर्घटना न हो इसलिए पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है | बिजली की कटाई रामनवमी और मुहर्रम में भी होती है | लोग इन पर्वो में भी लंबे और बड़े झंडों को लेकर जुलूस निकालते हैं | अच्छी बात है, फिर भी पर्व-त्यौहार के दिन बिजली का न होना पता नहीं क्यों मुझे सामान्य नहीं लग रहा था | मैं बड़े शिद्दत से सोच रहा था कि क्या सावधानी के नाम पर बिजली काटने के अलावा कोई और व्यवस्था नहीं हो सकती !
सरहुल आदिवासियों के दो मुख्य पर्वों में से एक है | सरहुल पर राँची में रहने का पहला मौका था तो सरहुल देखने का लोभ त्याग पाना संभव न था | सो निकल पड़ा | दिन के लगभग तीन बजे मैं सड़क पर था | सड़क पर इक्का दुक्का वाहन और खूब सारे सरना झंडे के अलावा था केवल सन्नाटा | एकदम रोज़ाना की तरह | जो दुकाने दोपहर में खुलती थी वो खुली थीं | कोई अलग दिन का आभास अभी तक नदारत था | मुझे तो बताया गया था कि पारंपरिक परिधानों में मांदल और नगाडे की धुन पर खूब सारे लोग नाचते गाते सड़कों पर निकलतें हैं | पर यहाँ तो दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं | चल पड़ा फिरायलाल चौक की तरफ़ | शहर का मुख्य चौराहा फिरायलाल चौक |
रातु रोड़ से सिधु-कानू पार्क फिर आदिवासी छात्रावास | स्थिति जस की तस | आदिवासी हॉस्टल के मैदान में लगा पंडाल पूरी तरह खाली पड़ा था | आगे बढ़ाने पर राजभवन के पास भीड़ दिखी | थोड़ा करीब जाने पर सबसे पहले जो साफ़-साफ़ दिखा वो अत्याधुनिक हथियारों से लैश जवान | महिला-पुरुष दोनों | दर्जन भर आगे और लगभग उतने ही पीछे और बीच में ताल पर थिरकते आदिवासी हॉस्टल के लड़के-लड़कियां | सच कहिये तो भयभीत हो गया कि इतने सारे बंदूकों के बीच में कोई उत्सव कैसे मना सकता है ? क्या उन्हें इस प्रकार बंदूकों के साये में सरहुल मनने पर मजबूर करना ठीक है ?
मैं आगे जाऊं कि नहीं | भय के कारण ज़रा असमंजस में था | मैंने अपने को समझाया चल भाई दुनिया इतनी बुरी भी नहीं है कि एक जुलूस को पार करने के एवज में तुम्हें जान गवानी पड़े | गुजरने के क्रम में देखा कि सारे लड़के-लड़कियां आम पहनावे (पैंट, शर्ट, सलवार सूट) में अपने में मगन होकर एक दूसरे को कमर से पकड़े नाचने में मस्त हैं | यहाँ कोई भी डंडा लेकर आनेजाने वालों को धमका नहीं रहा था | जैसा कि पार्टी की रैलियों में होता है | लोग आराम से वाहन ले कर गुज़र रहें हैं और नाचनेवाले गाड़ियों को निकल जाने की जगह भी दे रहे हैं | एक बार मैं दशहरे में राँची में निकला था सडकों पर आस्था के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी थी कि कई बार जी किया कि सीधी गाड़ी उन पर चढा दूँ | कोई कहीं भी बैरिकेट लगा के रास्ता बंद किये बैठा था |
आगे राजभवन के मुख्य द्वार के पास जा कर रुक गया | आदिवासी संस्कृति के पारम्पिक परिधान में सजा धजा एक विशाल समूह राजभवन के द्वार पर नाच रहा था | राजभवन के गेट के ठीक सामने के स्टैंड पर एक साधु लेटा था | उसके पैर के पास एक छोटा सा बोर्ड तिरछा खड़ा था | उस बोर्ड को पढ़कर ये पता चला कि ये कोई बाबा हैं जो धरती पर बढ़ते पाप से बड़े ही उद्वेलित हैं और 16 या 17 साल के मौन व्रत पर हैं | ये उनका पन्द्रहवां साल चल रहा है | बोर्ड पर लिखा था कि रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई ! अब मुझ जैसे नास्तिक को ये कभी समझ में नहीं आएगा कि मौन रहने से पाप कैसे कम हो जायेगा ! खैर, राजभवन वाला दल इतना ज़्यादा सजा धजा था कि मुझे सहज ही यकीन नहीं हुआ, लगा जैसे कोई अभिनेता बना ठना अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है | हॉस्टल वाला समूह जब करीब पहुँचने ही वाला था कि ये जोश से भरके नाचने लगे | इन्होंने नाचते-नाचते हॉस्टलवाले समूह का स्वागत किया, फिर थोड़ी देर दोनों मिलकर नाचे, उसके बाद हॉस्टलवाला समूह कचहरी की तरफ़ बढ़ चला और राजभवन वाला समूह वहीं रुक गया | शायद किसी दूसरे समूह का स्वगत करने के लिए | सवाल ये कि ये कौन लोग थे और किसके द्वारा नियुक्त ? खैर मैं इनके वीडियो बनाने में मस्त था, इस क्रम में एक एके 47 वाला मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं यहाँ बम लगाने आया हूँ |  मैंने भी डरने का अभिनय बखूबी किया | वो खुश हो गया | उसकी आत्मा तृप्त हो गई |
मैं अपने दोपहिये का कान तेज़ी से अमेठ रहा था | गाड़ी तेज़ी से फिरायलाल चौक की तरफ़ जा रही थी | रास्ते में हॉस्टल वाला समूह फिर मिला | जगह जगह लोग चना, गुड़ और शरबत बाँट रहे थे | ये सब किसी न किसी कमिटी के लोग थे | मैंने जीवन में पहली बार इतने आदिवासी लोगों को थिरकते देखा | एकदम साक्षात् | एकाएक मेरे जेहन इनकी दशा-दुर्दशा का ख्याल आया और आँखें नम होते होते बची | ऐसा पूरे दिन में कई बार हुआ | आज कौन चिंता करता है आदिवासी संस्कृति की ? जो भी चिंता करने का दावा करते हैं सब नकली हैं और अपनी अपनी दुकान चला रहें हैं |
फिरायलाल चौक, भीड़, पुलिस, पत्रकार, फोटोग्राफर, नाचनेवाले, बजानेवाले, देखनेवाले, आदिवासी, गैर-आदिवासी | वाहनों का आवागमन भी अपनी गति से चल रहा था | सबका अपना-अपना अस्तित्व और सहअस्तित्व भी | एकाध को समस्या हो रही थी, वो खीज रहा था, मगर ये लोग झारखण्ड के नहीं हैं | बाहर से आके बसे हैं या किसी ज़रूरी काम से कहीं जा रहे होंगें | किन्तु अधिकतर मज़े में मस्त | तीन चार बड़े-बड़े मंच बने हैं | बड़ा-बड़ा हिंदी में बैनर बना है | खूब तेज़-तेज़ आवाज़ में भोंपू बज रहा है, इतना तेज़ की उसमें नगाड़े की आवाज़ का कुछ पता ही नहीं चल रहा | नाचनेवाले किस ताल पर नाचे ? जितने मंच उतना संगीत | सबका अपना ही राग | उद्घोषणा की भाषा हिंदी साथ में कुछ अंग्रेज़ी के शब्दों का तड़का | गुलाब के फूलों से स्वागत |  घोटालों में फंसे नेता भी बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर प्रकृति पर्व सरहुल की बधाई दे रहें हैं, इन होर्डिंग्स की भाषा भी हिंदी है | यहाँ की अपनी भाषा और लिपि में कोई कुछ क्यों नहीं कर रहा | सारी दुकाने खुली थी | किताब की दूकान पर गया, वो पत्रिका उपलब्ध नहीं जो मुझे चाहिए | दूसरी दुकान बंद है | एक व्यक्ति पुलिसवाले के सामने अकेले झूम-झूमके नाच रहा है | देखनेवाले मुस्कुरा रहे हैं | व्यक्ति मासूम हो और नशे में हो फिर वो किसी की परवाह नहीं करता | बहुत देर तक मेरा ध्यान उस व्यक्ति पर लगा रहा बहुत सारे वीडियो भी बनाये और फिर चल पड़ा मोरहबादी मैदान की तरफ़ | हां, इस बीच दो बार दो महिलायों ने मेरे सामने सूप कर दिया | सूप कपड़े से ढंका था और उसमें चंद सिक्के भी पड़े थे | महिलाएं गैर आदिवासी थीं | सरहुल से इसका क्या कोई सम्बन्ध है ? कैसे हो सकता है भीख मागने की यहाँ परम्परा नहीं है ! फिर एकाएक याद आया ओ हो चैती छठ ! मामला कुछ कुछ पिरान्दलो जैसा होने लगा | यथार्थ कल्पना और कल्पना यथार्थ में गडमड होने लगी | खैर, शाम होने को आ रही थी और हर तरफ़ जुलुस ही जुलुस | अपने में मस्त | हां एक स्थान पर एक नशे में धुत व्यक्ति टेम्पो चालाक का कॉलर पकड़के कुछ बोल रहा था और कुछ पुलिसवाले उस व्यक्ति को प्यार से समझा रहे थे | आज पुलिस भी ज़रूरत से ज़्यादा सभ्य लग रही थी | वैसे बड़ी मेहनत लग रही थी बेचारों को सभ्य लगने का अभिनय करने में | कोई और दिन होता तो डंडे कब के चल चुके होते |
मोराबादी मैदान में कोई अलग मेला चल रहा था तभी रास्ते में एक जुलुस आता दिखाई पड़ा | पर ये क्या बिना मांदर के | वैसे इससे पहले भी कई ऐसे समूह मिले जो मंदर के थाप पर नहीं बल्कि एक बड़े से टेम्पो या छोटे से ट्रक या ट्रेक्टर पर जनरेटर सहित रखे लाउडस्पीकरों और साउंड-बॉक्स के मार्फ़त बजाये जा रहे गीतों पर थिरक रहे थे | कई लड़के लड़कियां काफी मॉडर्न कपड़ों में थे | कुछ लोग पारंपरिक कपड़ों के साथ कला चश्मा धारण किये हुए थे | परम्परा एक बहती हुई नदी की तरह है जिसमें बहुत सी चीज़ों का समावेश होता रहता है इसमें कोई आश्चर्य नहीं | किन्तु जब चीज़ों का स्वरूप विकृत होने लगता है तब दुःख होना स्वभाविक है | पर कोई करे भी तो क्या जब सबको विकृति में ही आनंद मिल रहा हो तो ! लोग कहते हैं कि यह विकृति कहीं और से आई है | हो सकता है कि मेरा चश्मा खराब हो गया हो | चश्में में एक समस्या ये है कि जिस रंग का पहनों दुनिया उसी रंग की दिखती है | वैसे कोई भी संस्कृति आज अप-संस्कृति से अछूती नहीं है |
मोराबादी मैदान के एक कोने पर पहुँचा | सामने पेड़ों के झुरमुट और कई जगह पर चार पेड के बीच में बांधकर बनाया गया प्लास्टिक की छत और उस छत के नीचे रोज़ की तरह आज भी हडिया बेचती एक महिला और हडिया पीते लोग | परम्परा है |
मैं वापस चल पड़ा | रास्ते में जुलुस ही जुलुस | सन्नाटा अब इलेक्ट्रोनिक संगीत के शोर में उत्सव मनाते समूहों में परिवर्तित हो चुका थी | नगाड़े और मांदल की आवाज़ से मन जिस प्रकार उद्वेलित हो रहा था कानफाडू इलेक्ट्रोनिक संगीत सुनकर उतना ही कुढ़ भी रहा था | क्या यह आनेवाले वक्त का संकेत नहीं है कि हमारी अगली पीढियां इतिहास की किताबों में ये पढ़े कि सरहुल नामक पर्व किस प्रकार से मनाया जाता था |
दुखी मन से सब्ज़ी की दूकान पर गया | आदिवासी महिला थी | रोज़ सब्ज़ी बेचती हैं | पर आज सरहुल के दिन भी ? मैं झूठ मूठ बौधिकता बखान रहा था वो महिला तो मस्त थी अपने काम में | खैर, मैंने उनसे पांच रुपये का पचास ग्राम मिर्च ख़रीदा और मन में बहुत सारा उत्साह और सवाल लिए वापस आ गया | हां, बिजली रात में दस बजे आई और फिर देर रात आई आंधी के कारण पूरी रात आँख मिचौली खेलती रही | उसे सामान्य होने में लगता है अभी और वक्त लगेगा |  

Monday, September 3, 2012

जेब भले खाली थी, उसके खयालों में कंगाली नहीं थी!


शशिभूषण 
आज से ठीक दो साल पहले (चार नवम्बर दो हज़ार नौ ) सुबह के लगभग ग्यारह बजे शशि भूषण ने किडनी चोरी की वजह से विख्यात हुए नोएडा मेडिकल सेंटर अस्पताल में मेरी आँखों के सामने आपनी अंतिम सांसें भरी थीं. वो तीन चार दिनों से वहाँ भर्ती था. डाक्टर उसकी बीमारी पहचाने बिना ही उसका इलाज कर रहे थे. जिस दिन उसकी मौत हुई उसकी सुबह डाक्टर उसे ये कहकर डिसचार्ज कर चुके थे कि तुम पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हो. वो अस्पताल के रिशेप्सन तक आ भी गया था कि उसे चक्कर आया और वो बेहोश होकर गिर पड़ा. उसे सीधे आईसीयू में ले जाया गया जहाँ से उसका मृत शारीर ही बाहर निकला. इस पूरी घटनाक्रम के दौरान आईसीयू में बिताए आखरी चंद घंटे के अलावे शशि के साथ कोई नहीं था . वो अकेला था नितांत अकेला. मुझ जैसे दोस्तों को पता नहीं था और स्कूल से किसी को साथ जाने कि परंपरा न थी. कागजों में मौत की क़ानूनी वजह डेंगू को ही होना था सो वही हुआ भी. सबने मना डेंगू के कारण जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित और रुपये की ढेर पर बैठी देश की सबसे बड़ी ड्रामा स्कूल के एक छात्र की मौत हो गई है. थोडा रोना धोना परिस्थिति की मांग थी और नाटक वाले परिस्थिति के अनुसार व्यवहार न करें ये संभव नहीं था तो यथा संभव परिस्थिति की मांग को पूरा किया गया. आंसू चाहे मंच पर बाहे या यथार्थ के धरातल पर उसका असर तो पडता ही है.
आदमी का शरीर जबतक जिंदा रहता है समाज कि संपत्ति है मरा तो परिवार की. सो आनन् फानन में उसके छोटे भाई को हवाई जहाज के द्वारा पटना से दिल्ली ये कहकर बुलाया गया कि तुम्हारे भाई की तवियत थोड़ी (?) खराब है. लाश (अपने किसी खास करीबी मित्र के लिए यह शब्द लिखना कितना कठिन होता है ना !) को कुछ नैतिक जिम्मेदारिओं के साथ परिवार के हवाले किया गया और हो गया नैतिक ज़िम्मेदारी का पूरा पूरा निर्वाह. पर क्या दायित्व सिर्फ नैतिक ज़िम्मेदारी पर आके खत्म हो सकती है ?
रंगमंच का कार्यकर्ता होने के नाते इन शब्दों को लिखते हुए स्वंय मुझे भी संदेह हो रहा है कि दिन रात मानवीय संवेदनायों की वकालत करने वाले कलाकारों की कौम क्या सच में इतनी संवेदनहीनता कि ऊचाई को प्राप्त कर चुकी है. हो सकता है कि मैं गलत होऊं पर बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इसका जबाब अधिकांशतः हाँ ही है. प्रोफेसनल रंगमंच की पढाई करते करते हम कितने तकनीकी हो गए हैं की हमारा दायरा धीरे धीरे सिकुड़ता ही जा रहा है. एक तरफ जहाँ हम मंच पर फटाफट संवेदनायों का प्रवाह करने में महारत हासिल कर रहें हैं वहीँ हमारे जीवन में संवेदनायों की कंगाली साफ साफ देखी जा सकती है. नाटकों में रोशनी दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है पर हमारे जीवन में ?
कलाकार समाज का सबसे संवेदनशील कौम है ऐसा हम सुनतें और मौका मिलने पर कहतें भी आयें हैं. इस बात कि सच्चाई परखने का समय शायद आ गया है. इंसान कलाकार पैदा नहीं होता बनाता है, बनाया जाता है, गढा जाता है. हम आज कैसा कलाकार बन रहे हैं, बना रहे हैं और पैदा कर रहें हैं – हम कैसा बीज डाल रहे हैं, विचार करने का समय आ गया है. दनादन मात्र बढ़ाने से कुछ हासिल नहीं होगा और गौर से देखें तो हो भी नहीं रहा है.
खैर, तो बात हो रही थी शशि की. अत्यंत ही साधारण घर और कद काठी के लड़के के अंदर कितनी प्रतिभा भरी थी. शशि ने मंच पर गाया, बजाय, नचा, अभिनय किया, निर्देशन किया, संगीत बनाये पर अभिमान कभी उसे छु तक न पाया. वो दोस्तों का दोस्त था. दोस्ती कि बात चली है तो बताता हूँ कि शशि कभी इंसान कि परख करके दोस्ती नहीं करता था. शायद यही वो वजह थी कि उसके  दोस्तों कि संख्या हम सबमें सबसे ज्यादा थी चाहे वो पुरुष हों या स्त्री. पटना रंगमंच हमेशा से हीं महिला रंगकर्मिओं की कमी से जूझता रहा है. हमारे नाट्य दल में भी स्थाई रूप से एक से ज्यादा अभिनेत्री कभी नहीं रही पर एक शशि था कि उसके हर नाटक में महिला अभिनेत्रियों कि संख्या एक से ज्यादा होती थी. चाहे उसके द्वारा मंच पर पहला निर्देशित नाटक काल कोठारी हो, जनपथ किस हो, उमराव जान हो या कोई अन्य. हम जहाँ चार पांच पत्रों का नाटक करते वहीँ शशि मंच पर अभिनेताओं का पुरे का पूरा हुजूम एकत्रित कर देता.
शशि के चेहरे पर शिकन देखने का अवसर बहुत कम ही होता था. जेब खाली हो कोई बात नहीं पर उसके ख्यालों में कंगाली कभी नहीं रही. वो पूरी उर्जा से भरा एक जिंदादिल इंसान था जो जिंदगी का भरपूर दोहन करने कि छमता रखता था और जो दूसरों के चेहरों पर हंसी की एक फुहार लाने के लिए मजाक के किसी भी सीमा का उल्लंघन बड़ी आसानी से कर सकता था. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप स्त्री हैं या पुरुष. हालाकिं पढ़ने लिखने से कोई खास लगाव उसे नहीं था पर इतना भी नहीं कि वो चीजों के बुनियादी अधूरेपन से पूरी तरह से अनजान हो रहे.
बिहार के ठेंठ मगही इलाके के एक साधारण परिवार में जन्में फक्कड स्वाभाव के शशि को रंगमंच से जोड़ने का मुख्य श्रेय जन संस्कृति मंच के पटना इकाई हिरावल के अनिल अंशुमन को जाता है. बाद में वो विजय कुमार द्वारा संचालित मंच आर्ट ग्रुप का एक मुख्य स्तंभ बना जिसमें पंकज त्रिपाठी, सुनील बिहारी, रंधीर कुमार, भूपेंद्र कुमार, हेमशंकर हेमंत और मैं भी था. यहाँ कार्य करते हुए उसने रेनू के रंग. किस्सा ठलहा राम की, राग दरबरी, ये आदमी ये चूहे आदि नाटकों में यादगार भूमिकाओं को पुरजोर तरीके से अभिनीत किया. खासकर रेनू के रंग, जो की रेनू जी की तीन कहानिओं, न जाने केहि वेश में, पंचलाइट और रसप्रिया कि नाट्य प्रस्तुति थी, में मूंछ दाढ़ी वाली काकी, मद्रासी यात्री और मृदंगिया के किरदार तथा राग दरबारी में सनीचर आदि चरित्रों में शशि को जिसने भी देखा वो बस उसकी जादू में खो गया. हालाँकि उसे संवाद याद करने में थोडा ज्यादा वक्त लगता था पर एक बार याद हो जाये तो फिर देखिये उसका कमाल. मंच पर उसकी टाइमिंग कमाल की थी बस जीवन की ही टाइमिंग ज़रूरत से बहुत ज्यादा तेज निकली.
चाहे वो मंच नाटकों पर काम कर रहा हो या नुक्कड़ पर, उसकी प्रतिबद्दता सामान रहती. वो नुक्कड़ नाटकों के लिए उतना ही उपयोगी था जितना मंच के लिए. विजय कुमार के हरिशंकर परसाई के व्यंग पर आधारित एकल नाटक हम बिहार में चुनाव लड़ रहें हैं का शशि भी एक अभिन्न्य अंग बन गया था. उसकी ढोलक की थाप इस नाटक को एक अलग ही आयाम देता था. वो इस नाटक के सौ से भी ज्यादा प्रस्तुतिओं में सहभागी रहा. तभी तो उसकी कमी आज भी विजय कुमार को सालती है. खासकर तब और भी ज्यादा जब वो इस नाटक को प्रस्तुत कर रहे होते हैं.
बिहार के धनरुआ थाना अंतर्गत एक छोटे गांव से निकलकर पटना , मुंबई और फिर राष्ट्रीय नाट्य विधालय, नई दिल्ली तक की उसकी जीवन यात्रा जीवन्तता से सराबोर थी. सच कहा जाये तो वो मुंबई में काम कर रहा था, खुश था. वो रानावि आना भी नहीं चाहता था. पर दोस्तों के दवाव ने आख़िरकार उसे यहाँ आने को एक तरह से कहा जाये तो मजबूर किया. किसे पता था कि हम शशि को जहाँ भेज रहें हैं वहाँ से वो कभी वापस ही नहीं लौटेगा.
तुम आओ न आओ तुम्हारी याद हमेशा ही आती है... आती रहेगी. सिर्फ मुझे ही नहीं मेरे जैसे कई और भी हैं. हम दुनियां की नज़र में मजे हुए कलाकार हैं पर तुम्हें भूलने की कला हमें नहीं आती दोस्त.   

    

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...