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Thursday, June 29, 2017

बाज़ार और स्वदेशी


Gadgets के बारे में पढ़ना और जानकारी इकट्ठा करना मुझे बेहद पसंद है। इसके पीछे शायद कारण यह है कि मुझे Gadgets सबसे क्रांतिकारी वैज्ञानिक अविष्कारों में से एक लगता है - ख़ासकर मोबाइल फोन। इस छोटी सी चीज़ ने अपने अंदर कितनी चिज़ों को समेट लिया है - इंटरनेट, फोन, घड़ी, म्यूज़िक प्लेयर, टाइप राइटर, कम्प्यूटर, कैलेंडर, चिट्ठी और पता नहीं कितनी चीज़ें इस छोटे से Gadget में समाहित हो गया है और आनेवाले दिनों में और पता नहीं क्या क्या इसमें जुड़ेगा। इस उपकरण के बिना आज शायद ही किसी का काम चलता हो - खासकर शहरों में। 

आज भारतीय बाजारों में एक से एक Gadgets उपलब्ध हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि ज़्यादातर बाजार पर विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा है। सिर्फ Gadgets Market ही नहीं वरण आज पूरे बाज़ार पर ही विदेशी कंपनियों ने कब्ज़ा जमा रखा है और स्वदेशी के नाम पर जो कंपनियां बाज़ार में हैं उनके Product ज़्यादातर निहायत ही घटिया हैं और जो कुछ बढ़िया और ठीक-ठाक हैं - उनकी क़ीमत ज़्यादा है। शायद इसीलिए उन्हें अपने Product बेचने के लिए धर्म, भारत, भारतीयता और देशप्रेम का सहारा लेना पड़ता है और हम भारतीय इस मामले में इतने मूढ़ हैं कि जाति, धर्म और देश की बात होते ही हमारे दिल, दिमाग और आंखें बंद हो जाती हैं और हम किसी भी अंधी गली में घुस पड़ने को तत्पर हो जाते हैं। 
भारत अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से इसलिए आज़ाद नहीं हुआ था कि विदेशी कंपनियां उसके बाज़ार पर कब्ज़ा कर लें या स्वदेशी के नाम पर रद्दी Product देशप्रेम की चाशनी में घोलकर परोसा जाए। हद तो यह है कि स्वदेशी का जाप करनेवाली हमारी सरकारें कोई मजबूत स्वदेशी infrastructure बनाने के बजाय विदेशियों और विदेशी कंपनियों को भारत आकर व्यापार करने का आमंत्रण देने में खुद को ज़्यादा सहज महसूस करती हैं। यह सबकुछ आज शुरू हुआ हो ऐसा नहीं है बल्कि इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि हम colonial मानसिकता से शायद कभी मुक्त ही नहीं हुए और फिर सामंती मानसिकता तो हमें विरासत में मिली ही है। 
East India Company के व्यापारी खुद व्यापार करने आए थे और हम अब आज Open Market के निहायत ही बकवास और बाज़ारू आइडिया का ग़ुलाम हो अपना बाज़ार खोलकर खुद बुलावा दे रहे हैं कि आओ और हमें आर्थिक रूप से फिर से ग़ुलाम बना लो। (शायद बहुत हद तक हम बन भी चुके हैं।) वैसे काफी हद तक बना भी चुके हैं। सनद रहे कि कोई भी व्यापारी अपना फायदा पहले देखता है और उसके लिए उसे कोई भी लेबल लगाने से कोई गुरेज नहीं होता। वैसे हम पता नहीं किस अंधी दौड़ में शामिल हैं कि हमें इन सब बातों से कोई खास फर्क पड़ता भी नहीं है।

Sunday, January 1, 2017

वर्ष 2017 : पूरा विश्व ही हमारा घर है।

नया वर्ष में केवल कलेंडर ही बदलता है बाकि सब जस का तस रहता है - प्यार, स्नेह, दुश्मनी, दोस्ती, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा सब। एक कलाकार ह्रदय संवेदनशील व्यक्ति के लिए प्यार, स्नेह, सम्मान, दोस्ती का साथ हर क़ीमत पर निभाना उसकी फ़ितरत है और दुश्मनी, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा, धंधेबाजी, गुटबाज़ी आदि से मुक्त हो निःस्वार्थ भाव से अपना काम करते रहना उसका जूनून। 
उन सबका आभार प्रकट क्या करूँ जो मेरी ताक़त हैं? एक साल ही ख़त्म हुआ है केवल, ज़िन्दगी अभी बहुत लंबी है और जितना कुछ किया गया है उससे बहुत ज़्यादा करने को बचा है - आपका साथ व भरोसा बना रहे और मुझमें सदा इतना होश और जोश रहे कि मैं अपने कर्म और व्यवहार से सदा आपके दिल में जगह पाता रहूं - यही आशा है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात में यकीन नहीं रखता कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है पूरा साल भी वैसा ही बीतेगा। दुःख, सुख जीवन के अंग है और पूरी दुनियां में यह सब एक साथ चलता रहता है। एक कलाकार की दुनियां केवल अपने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि पूरा विश्व उसमें समाहित होता है। नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित नाटककार दारियो फ़ो कहते हैं - "पूरा विश्व ही हमारा घर है और आज़ादी हमारा क़ानून। क्रांति हमारे दिल में बसे, हमारा बस यही एक विचार है।" 
भगवत गीता की यह पंक्ति भी आज के दिन याद करने योग्य है - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)
भारत, भरतीयता, हिंदुस्तान, भारतीय संस्कृति आदि के नाम पर भी मूढ़ता पसारने का खेल ख़तरनाक तरीके से खेला जा रहा है। विविधता इस देश की संस्कृति है और उसका सम्मान संस्कृतिक पहचान। भारत एक फुलवारी है जिसमें हर प्रकार के फूल खिलते और फलते फूलते हैं। इस पहचान की रक्षा करना प्रथम नागरिक कर्तव्य है। भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं - भारतीय भूमि, जन, संप्रभुता, भाषा एवं संस्कृति। इसके अतिरिक्त अंतःकरण की शुचिता (आंतरिक व बाह्य शुचिता) तथा सतत सात्विकता पूर्ण आनन्दमयता भी भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं। भारतीय जीवन मूल्यों से निष्ठापूर्वक जीना तथा उनकी सतत रक्षा ही सच्ची भारतीयता की कसौटी है। संयम, अनाक्रमण, सहिष्णुता, त्याग, औदार्य (उदारता), रचनात्मकता, सह-अस्तित्व, बंधुत्व आदि प्रमुख भारतीय जीवन मूल्य हैं। 
मूलतः नास्तिक आदमी हूँ किन्तु किसी भी किताब में कही गई किसी अच्छी बात से मुझे कोई परहेज नहीं। अच्छी बातों का उल्लेख करना भी कोई बुरी बात नहीं और ज्ञान कहीं से भी मिले उसे धारण करने में कोई बुराई नहीं। वैसे भी भारत, भारतीयता, राष्ट्रवाद, धर्म के नाम पर उन्माद फैलानेवालों की आज कोई कमी नहीं। वो हमें इसलिए भी मुर्ख बनाने में कामयाब होते हैं क्योंकि हम शायद खुद इन शब्दों का उचित अर्थ नहीं पहचानते। भारतीयता की प्रकृति से तात्पर्य उन मान बिंदुओं से है जिनकी उपस्थिति में भारतीयता का आभास होता है। भारतीयता निम्नांकित बिंदुओं/अवधारणाओं से प्रकट होती है-
वसुधैव कटुम्बकम् की अवधारणा : संपूर्ण विश्व को परिवार मानने की विशाल भावना भारतीयता में समाविष्ट हैं। 
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। 
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।
(यह मेरा है, यह पराया है, ऐसे विचार तुच्छ या निम्न कोटि के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति समस्त संसार को ही कुटुम्ब मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम का मन विश्वबंधुत्व की शिक्षा देता है।)

विश्व कल्याण की अवधारणा :
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःख भाग्भवेत।।

भारतीय वांग्मय में सदा सबके कल्याण की कामना की गई है। उसे ही सार्वभौम मानवधर्म माना गया है।मार्कण्डेय पुराण में सभी प्राणियों के कल्याण की बात की गई है। सभी प्राणी प्रसन्न रहें। किसी भी प्राणी को कोई व्याधि या मानसिक व्यथा न हो। सभी कर्मों से सिद्ध हों। सभी प्राणियों को अपना तथा अपने पुत्रों के हित के समान वर्ताव करें।
विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प : ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ (सारी दुनिया को श्रेष्ठ, सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाएंगे।) यह संकल्प भारतीयता के श्रेष्ठ उद्देश्य को व्यक्त करता है।
सहिष्णुता : सहिष्णुता से तात्पर्य सहनशक्ति व क्षमाशीलता से है। धैर्य, विनम्रता, मौन भाव, शालीनता आदि इसके अनिवार्य तत्व हैं। भारतीयता का यह तत्व भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। यही कारण है कि भारत की कभी भी अपने राज्य विस्तार की इच्छा नहीं रही तथा सभी धर्मां को अपने यहां फलते-फूलने की जगह दी।
अहिंसात्मक प्रवृत्ति : अहिंसा से तात्पर्य हिंसा न करने से है। कहा गया है कि ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान मानो। महावीर, बुद्ध तथा महात्मा गांधी ने विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महाभारत में भी कहा गया है कि मनसा, वाचा तथा कर्मणा किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। हमारे ऋषियों ने अहिंसा को धर्म का द्वार बताया है। जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म बताया गया है।
आध्यत्मिकता : आध्यात्मिकता भारतीयता को अन्य संस्कृतियों के गुणों से अलग करती है। ईश्वर के प्रति समर्पण भाव ही आध्यात्मिकता है। भक्ति, ज्ञान व कर्म मार्ग से आध्यात्मिकता प्राप्त की जा सकती है। यह आत्मा के संपूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।पुरूषार्थ चतुष्टय आध्यात्म में संचालित, प्रेरित व अनुशासित होता है। आध्यात्म के क्षेत्र में भारत को गुरू मानता है।
एकेश्वरवाद की अवधारणा :
एकं सद् विप्राः बहुनाम वदन्ति। 
(ईश्वर एक है। विद्वान उसे अनेकों नाम से पुकारते हैं)

इस्लाम ने भी ईश्वर के एक होने की बात की है परंतु उसी सांस में यह भी कह दिया कि उसका पैगम्बर मौहम्मद है तथा उसके ग्रंथ कुरान में भी आस्था रखने की बात कही। यही बात ईसाइयत में है। भारत में ईश्वर को किसी पैगम्बर व ग्रंथ से नहीं बांधा है।
सर्वधर्म समभाव : भारत में सभी धर्म राज्य की दृष्टि में समान हैं। पूजा की सभी पद्धतियों का आदर करो तथा सभी धर्मां के प्रति सहिष्णुता बरतो।धर्म, मजहब, पंथ एक नहीं हैं। इस्लाम व ईसाइयत को पंथ/मजहब कह सकते हैं जबकि हिंदु धर्म 'जीवन पद्धति' है। कहा भी गया है कि-
‘‘धारयते इति धर्मः’’
अर्थात् जो धारण करता है, वहीं धर्म है। इसका अर्थ है पवित्र आचरण व मानव कर्तव्यों की एक आचार सहिंता। मनु ने धर्म के 10 लक्षण (तत्व) बताए हैं-

१. धृति - धैर्य / संतोष 
२. क्षमा - क्षमा कर देना 
३. दम - मानसिक अनुशासन 
४. अस्तेय - चोरी नहीं करना 
५. शौच - विचार व कर्म की पवित्रता 
६. इंद्रिय निग्रह - इंद्रियों को वश में करना 
७. धी - बुद्धि एवं विवेका का विकास 
८. विद्या - ज्ञान की प्राप्ति 
९. सत्य - सच्चाई 
१०. अक्रोध - क्रोध न करना

धर्म की इस परिभाषा में कुछ भी सांप्रदायिक नहीं है। भारतीय दृष्टि से लोग अलग पंथ/मजहब/पूजा पद्धति में विश्वास करते हुए इस धर्म का अनुसरण कर सकते हैं। जीवन के प्रति संश्लिष्ट दृष्टि - चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मानव जीवन के प्रेरक तत्व।
धर्म राज्य / राम राज्य की अवधारणा : राजा या शासन लोकहित को व्यक्तिगत रूचि या अरूचि के उपर समझे। महाभारत में निर्देश हैं कि जो राजा प्रजा के संरक्षण का आश्वासन देकर विफल रहता है तो उसके साथ पागल कुत्ते का सा व्यवहार करना चाहिए।
अनेकता में एकता : भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि यहां अनेक जातियां, खान-पान, वेश-भूषा, भाषा, प्रांत होने के बावजूद भी राष्ट्र के नाम पर एकता है।
राष्ट्रीयता : भारतीयता राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने का ही दूसरा नाम है। राष्ट्रीयता में केवल राजनीतिक निष्ठा ही शामिल नहीं होती बल्कि देश की विरासत और उसकी संस्कृति के प्रति अनुशक्ति की भावना, आत्मगर्व की अनुभूति आदि भी शामिल है। भारतीयता सभी भारतीयों में राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने के सिवाय कुछ भी नहीं है।
राष्ट्रवाद और धर्म का मुखौटा पहनकर नफ़रत की राजनीति करनेवाले लोग और समूह मासूम आमजन और देश को बांटने का कार्य करती हैं, इसका भारतीयता और भारतीय संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। ये केवल सत्ता की राजनीति करना जानते हैं, इनका किसी भी प्रकार के विकास से कोई ख़ास मतलब भी नहीं होता। और जहाँ तक सवाल सेवा भाव का है तो यह भी इनका एक ढोंग ही होता है। पडोसी के घर में आग लगाकर कोई भी अमन पसंद व्यक्ति या समूह कभी भी चैन से नहीं रह सकता। आज़ादी और ख़ुशी अकेले में अकेले की नहीं बल्कि सामूहिक होती है।
बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है - "किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है"

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है, 
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है, 
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,
उसी की जनवरी छब्बीस,
उसी का पंद्रह अगस्त है !

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,
गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,
धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,
कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

Thursday, July 30, 2015

प्रगतिशील और क्रांतिकारी लोग गलती नहीं बल्कि ऐतिहासिक गलतियां करते हैं!

कार्ल मार्क्स ने प्रिय कवि के रूप में ग्रीक नाटककार और कवि एक्सकिलस, विश्वप्रसिद्ध अँगरेज़ कवि व नाटककार शेक्सपियर, और गेटे का नाम लिया और प्रिय गद्य लेखक के रूप में दिदारो का। फ्रेडरिक ऐंगल्स कवि के रूप में दे वोस, शेक्सपियर, आरिओस्टो और गद्यकार के रूप में गेटे, लेसिंग, ड़ॉ. जामेलसन का ज़िक्र करते हैं। लेकिन "भारतीय अति-क्रांतिकारियों" और "ज़रूरत से ज़्यादा प्रगतिशील" लोगों को इन सभी के अलावे वेद, पुराण, बुद्ध, महाबीर, तुलसी, कबीर, सूर, व्यास, वाल्मीकि, भास, शूद्रक, कालिदास, ग़ालिब, मीर, मोमिन, भारतेंदु, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि से बिना जाने, पढ़े, गुने ही लगभग नफ़रत है। वे इन्हें बुर्जुआ, यथास्थितवादि, सामंती मानसिकता से ग्रसित और पता नहीं किन किन मूर्खतापूर्ण उपाधियों से बिना पढ़े ही नवाज़ देते हैं। वो यदा कदा पाश, मुक्तिबोध, धूमिल, परसाई, गोरख पांडे आदि के नाम तो ले लेते हैं लेकिन यहाँ भी लगभग एहसानी मुद्रा ही अपनाए रहते हैं; जैसे इनके प्रमाणपत्र के बिना उपरोक्त लेखकों की सार्थकता ही मैली हो जाएंगीं। वैसे प्रमाणपत्र बाँटते इन महानुभावों को इनकी बस उन चार-चार पंक्तियों से ही स्नेह है जो यदा-कदा इन्हें अपनी बात को सही साबित करने के लिए कोट करने के काम आते हैं। उदाहरणार्थ - अब उठाने ही होंगें अभिव्यक्ति के खतरे। इन पंक्तियों के अलावा मुक्तिबोध आज भी इनके लिए अँधेरे में ही हैं।
अब ऐसे महाविद्वान लोग यदि पंडित रविशंकर और कलाम को सशर्त श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने का सहस करते भी हैं तो इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पंडित रविशंकर इनके लिए एक कलाकार नहीं बल्कि सामन्ती कला के पोषक हैं और कलाम एक वैज्ञानिक, शिक्षक और भारत के राष्ट्रपति नहीं बल्कि मिडिया द्वारा प्रसिद्द किया गया नाम यानी मिसाइल मैन हैं।
मार्क्स सादगी और एंगेल्स प्रफुल्लता को इंसान का मूल्यवान गुण मानते हैं लेकिन यह बेचारे अतिक्रान्तिकारी-प्रगतिशील अपनी मूढ़ता और अज्ञानता में ही प्रसन्न हैं। उनके लिए मार्क्स का यह कथन कि Nihil humani a me alienum puto (सब मानवीय गुण-अवगुण मेरे लिए पराए नहीं हैं।) और एंगेल्स का यह कथन का कि "सब सहजता से ग्रहण करो।" का कोई अर्थ नहीं रह गया है शायद।
अब इन्हें कौन बताए कि बिना मानवतावादी हुए न तो कोई क्रांतिकारी हो सकता है ना ही प्रगतिशील। समय निकालकर भगत सिंह को ही पढ़ लेते तो यह छोटी सी बात न जाने कब की समझ में आ जाती। वैसे इनसे सार्त्र, कामू आदि पढने की चाहत भी रखना मूर्खता का ही परिचायक है। इन्होंने मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ भी पढ़ा होगा और पढ़ा तो समझा भी होगा, इसपर मुझे गहरा संदेह हैं।
मार्क्स ने सही कहा है - De omnibus dubitandum (सब कुछ संदेह योग्य है।) लेकिन यह तो मार्क्स के भी पिताश्री हैं। कहते हैं "सबकुछ संदेह योग्य है सिवाए मार्क्सवाद के। शायद ऐसे ही मूढ़ों पर खिन्न होकर मार्क्स को कहना पड़ा था - यदि ऐसे है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ।
बाकि अन्य लकीर के फ़क़ीर पिटनेवाले विचारों और व्यक्तियों की पूजा करनेवालों के लिए क्या कहा जाय उनके लिए तो महामूर्खता और पिछलग्गूपना ही सबसे बड़ा संविधान और देशभक्ति का प्रमाणपत्र है। जो इनसे अलग सोचता है वो देशद्रोही है और उसे फ़ौरन ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए!
खैर, अब यह किससे कहा जाय कि आलोचनात्मक समीक्षा एक निहायत ही ज़रूरी चीज़ है लेकिन उसके लिए सही समय, काल, परिस्थिति आदि का चयन करना ज़रूरी है। एक सीनियर कॉमरेड ने किस्सा सुनाया था - चीन में जैसे ही क्रांति हुई लाल सेना ने "धर्म जनता का अफ़ीम है" नामक सूक्ति से प्रेरणा लेकर तमाम धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। अपने पूजा और पूज्यनीय स्थलों को ध्वस्त होते देख स्थानीय जनता लाल सेना के विरुद्ध प्रतिकार करने को खड़ी हो गई। यह बात जब माओ को पता चली तो उन्होंने फ़ौरन इन स्थलों को तोड़ने से यह कहते हुए रोका कि इन स्थलों में जनता का विश्वास है। पहले एक लंबी प्रक्रिया में इनके मन में बसी सदियों पुरानी मान्यतायों और विश्वास को ख़त्म करो। यदि हम यह करने में सफल हुए तो जनता खुद ही इन स्थलों को ध्वस्त कर देंगीं। और यदि हम ऐसा न कर सके तो जनता हमारे विरुद्ध खड़ी हो जाएगी।
इतिहास हमें सुन्दर भविष्य गढ़ने की शिक्षा देता है और अपनी गलतियों से प्रेरणा भी। लेकिन इसके लिए खुले दिल और दिमाग से अध्ययन करने की आवश्यकता है। मूर्खतापूर्ण व्यवहार और वक्तव्य सनसनी तो पैदा कर सकते हैं लेकिन शायद ही कोई सुन्दर और सार्थक बदलाव का सहयात्री बन सके।
पुनश्च - माओ के बारे में उपरोक्त किस्सा सुना सुनाया है। इसकी ऐतिहासिक सत्यता का दावा करने में तत्काल मैं असमर्थ हूँ।

Friday, January 4, 2013

सुशासन का गुटखा, तम्बाकू और शराब.


साम्प्रदायिकता के रथ पर सवार होकर भारतीय राजनीति के शीर्ष पर काविज होते ही फिलगुड फैक्टर में फुस्स हुई एनडीए अभी कुछ राज्यों में सत्ता सुख का आनंद भोग रही है | बिहार के गाँव में इसे राज भोगना कहतें हैं | ये लगभग उन्हीं राज्यों में राज भोग रही है जिनमें कांग्रेस के दफ्तरों में चार-चार मुख्यमंत्री अपने अभूतपूर्व कारनामों के साथ गैस, बदहजमी और बबासीर से शिकार हो खैनी फंकिया कर थू-थू कर रहें हैं | इन्हीं राज्यों में से एक है बिहार | यहाँ आज़ादी के बाद कांग्रेस ने हुम्मच के राज किया, लालू-राबड़ी और फेमली ने खूब माल चभाके नख-दांत विहीन किया और अब एनडीए की सरकार है, नितीश कुमार का नेतृत्व है और सुशासन का नारा है | ये सुशासन का नारा लगभग हर उस राज्य में पसीने की बदबू की तरह विराजमान है जहाँ एनडीए की सरकार है | रामराज, फिल गुड और मंदिर फैक्टर तो चला नहीं अब इन राज्यों में अलोकतांत्रिक गतिविधियों और आए दिन एक से एक घोटालों की रपट पढ़कर ऐसा कुछ कमाल जैसा तो नहीं लगता जैसे कोई सुशासन चल रहा हो | कुछ दिन पहले खबर आई कि जो राज्य बात-बात पर विशेष राज्य का दर्ज़ा पाने के लिए हुयां-हुयां करने लगता है वहाँ आज देश के किसी भी राज्य से ज़्यादा अनाज सड रहा है | ये सुशासन का नारा कुछ-कुछ हिंदुत्ववादियों के रामराज जैसा ही आभास देता है | अब चुकी एनडीए के घटकों में हिंदुत्वादियों के साथ ही साथ आदणीय जयप्रकाश जी के शिष्य भी हैं तो सम्पूर्ण क्रांति का रूपांतरण सुशासन हो गया होगा | ये बात जनता पार्टी सरकार के चंद महीने चला शासनकाल का अध्ययन करने के बाद गलत भी नहीं लगता | उपरोक्त बातों को एक अनुमान माना जाना चाहिए इतिहास नहीं |
विगत दिनों बिहार सरकार ने गुटखे पर पावंदी लगाई | पर राजधानी पटना सहित राज्य के गाँव तक में आराम से और खुलेआम गुटखा उपलब्ध है | वहीं गुटखा कंपनी इतनी चालाक है कि वो गुटखा तो बना ही रही है साथ ही साथ उसने उसी गुटखे का पान मसाला और तम्बाकू अलग-अलग कर बेचना शुरू किया है | जो गुटखा पहले एक रुपये का मिलाता था वो अब दुगुनी से ज़्यादा कीमत वसूल रहा है | कानून है तो उसे तोड़ने का तरीका भी है इसी को शायद लोकतंत्र कहतें हैं हिंदी में | हद तो ये है कि रेलवे स्टेशनों पर भी आप खुलेआम इन गुटखों, पान मसालों आदि के दर्शन और रसास्वादन कर सकतें हैं | पिछले दिनों मैं रेलमार्ग से पटना से बेगुसराय गया | गाड़ी जितने भी स्टेशनों, शहरों, कस्बों, गाँव से गुज़री हर कहीं गुमटियों पर ये गुटखे अपनी दुगनी कीमत के साथ विराजमान थे | कई स्थानों पर तो इसने प्लेटफार्म पर भी अपना कब्ज़ा जमा रखा था, पूर्वत | जहाँ तक सवाल तम्बाकू का है तो भैय्या पान, खैनी तो बिहारी संस्कृति की पहचान है | कमर में चुनौटी और मुँह में पान ( अब गुटखा ) यहाँ श्रृंगार की तरह है | बड़ा से बड़ा राज आया और चला गया पर किसी में इतना दम नहीं दिखा की कैंसर के इस सौदे को जड़ से खत्म कर सके | सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर अधिकतर रस्मी नशाबंदी का अभियान चलता तो रहता है पर न सरकार के हुक्मरान को इससे कोई व्यक्तिगत फायदा नज़र आता है न ही आम आवाम को | इसे इस तरह भी कह सकतें हैं कि नशे का विज्ञापन जितना ग्लैमरस होता है, उसे छुडाने का प्रयास उतना ही नीरस और रूटीनी | एक तरफ़ तम्बाकू-शराब की दुकाने दनादन बढ़ रही हैं और आमजन को बड़ी ही आसानी से उपलब्ध हो जा रहीं हैं ये की जा रहीं हैं वहीं इसे प्रतिबंधित और त्याग देने की कवायत बीच-बीच में करते रहना जनपक्षीय सरकार के छवि को बरक़रार रखने की मजबूरी भर है | अगर हमारे मुल्क की सरकारें इन सवालों पर इतनी ही गंभीर हैं तो क्यों नहीं एक ही साथ पुरे देश से इसे और तमाम नशीली पदार्थों को बैन कर दिया जाता है ? अगर कर दिया जाता है तो सरकारी राजस्व, सरकारी कारकूनों और नशे के सौदागरों के अलावा किसी को कोई नुकसान होगा ? अवाम को बीमार और उसकी सेहत से खिलवाड़ करके राजस्व का रोना-रोना किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार को शोभा देता है ? पर यहाँ बात तो फिर वहीं आती है कि आवाम की चिंता है ही किसे ? गर होती तो क्या यही हाल होता ? अगर जनता के बिना कोई सरकार बन सकती तो जनता का वजूद कब का खत्म कर दिया गया होता | लोकतान्त्रिक सरकार का तमगा बनाये रखने के लिए लोक का होना ज़रूरत और मजबूरी दोनों है ! अब ये लोक स्वस्थ हो या अस्वस्थ क्या फर्क पड़ता है |

Tuesday, December 11, 2012

उपजाऊ भूमि पर राख की परत


आजतक परती से काम लायक भूमि बनाने की कथा चलती थी पर जब से उद्योगीकरण का बाज़ार गर्म हुआ है तब से काम लायक भूमि पर ईमारत की कथा भी आम हो गई है. आए दिन भूमि अधिग्रहण की ख़बरों और जान देंगें ज़मीन नहीं देगें के नारों से सुचना तंत्र पटा रहता है. ध्यान से देखा जाय तो भारत का शायद ही ऐसा कोई शहर-कस्बा हो जहाँ इस तरह की बात न हो रही हो. विकास से किसी को क्या परहेज हो सकता है पर साथ ही ये भी ध्यान देने की बात है कि इस विकास की शर्तें क्या हैं.
मोकामा टाल क्षेत्र ( जिला-पटना, बिहार ) एशिया के सबसे बड़े टालों में से एक है. जो लोग भी मोकामा टाल क्षेत्र को जानतें हैं उनको ये बात भली भांति पता है कि खेती के लिहाज से यहाँ की भूमि बेहद ही उपजाऊ भूमि है साथ ही वातावरण भी अनुकूल है. यहाँ की मिट्टी के बारे में एक उपकथा ये है कि यहाँ किसान को केवल दो बार खेत जाने की ज़रूरत है – एक बार फसल बोने के लिए और दूसरी बार फसल काटने के लिए. कहने का तात्पर्य ये कि यहाँ की ज़मीन उर्वरक है और प्राकृतिक रूप से कई सारी फसलों के लिए पूरी तरह से अनुकूल भी. यहाँ ईख, प्याज़, मिर्च, गेहूं, धान, मक्का, दलहन, तेलहन सब उपजाया जाता रहा है. एक समय था कि जिस फसल का मौसम होता पूरा गाँव उस फसल के पैदावार से पट जाता. मिट्टी के इतना ज़्यादा उपजाऊ होने के लिए एक तत्व जो सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है वो ये कि लगभग हर साल यहाँ कुछ दिनों के लिए बाढ़ का पानी आता है और पूरे इलाके की ज़मीन को तारो-ताज़ा करके चला जाता है. ये क्रिया दशहरे के आसपास होती है. उस दौरान अमूमन खेत परती हो जाता है या कुछ खेतों में कुछ ऐसी फसल होती जिसे पानी से कुछ ज़्यादा नुकसान नहीं सहना पड़ता. बाढ़ की धार बहुत तेज़ नहीं होती है और अगर ये ज़्यादा दिनों तक न टिके तो फसल को कोई ज़्यादा नुकसान भी नहीं पहुंचाती.
किसी ज़माने में खेती के लिए इस इलाके में राज्य सरकार द्वारा एक ताकतवर ट्यूबेल लगाया गया था. जिसे आज भी यहाँ ‘स्टेट बोरिंग’ के नाम से जाना जाता है. इससे ही दूर-दूर तक खेतों में पक्के सोतों के माध्यम से पानी पहुँचाया जाता था, बदले में किसानों को शायद कुछ मामूली रकम देनी होती थी. ये वो ज़माना था जब यहाँ लोग खुद हल बैल से खेती करते थे और ट्रैक्टरों ने इस इलाके के खेतों का सीना चीरना नहीं शुरू किया था. जिनके पास ज़्यादा ज़मीन थी वो एकाध सहायक रखते थे, जिसे उस इलाके में हरवाहा (हलवाहा) कहा जाता था. ये हलवाहे गाँव के आस पास के भी होते और दहेज में भी आते थे. आज ये ट्यूबेल कई सालों से बंद पड़ा है पर इसका खँडहर इसके हुकूमत की कथा आज भी कहता है. इस ट्यूबेल के बंद होने के पीछे कृषि के प्रति सरकार के निराशाजनक रवैये के साथ ही साथ ये कारण भी है कि अस्सी के दशक में यहाँ बिजली के तारों की भयंकर चोरी हुई. रातों-रात बिजली के तार काट लिए गए और उसे गलाकर एल्यूमीनियम के बर्तन बनाने के कारोबार ने ज़ोर पकड़ा. हर गाँव में तार चोर सक्रिय हुए और हर गाँव में बच्चे बच्चे को ये खबर थी कि ये काम कौन लोग कर रहें हैं. पर प्रशासन ने शायद ही किसी को सजा दी हो. कभी रौशनी में चमचमानेवाला ये इलाका एकबार फिर लालटेन युग में जीने को अभिशप्त हो गया. ये वही समय था जब लालटेन बिहार में सीना ठोककर राज कर रहा था और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लोकतंत्र का एक मसखरा राज कर रहा था.
पिछले कई दशकों से इस उपजाऊ भूमि के लिए कोई नीति बनाई गई हो ऐसा सुनने में नहीं आया. खेती पूरी तरह से किसान और प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया गया. आज जगह जगह प्राइवेट बोरिंग देखने को मिल जातें हैं साथ ही पिछले कुछ दशकों में यहाँ भी छोटे किसान भूमिहीनों में परिवर्तित हुए और अपने हाथ से हर गाँव में कोई एकाध किसान ही खेती कर पा रहा है. सबका रोना एक कि खेती से गुज़ारा अब संभव नहीं. जिनके पास थोड़े-बहुत खेत बचे भी है तो वो या तो पट्टे पर चढें हैं या बटाईदारी पर. पलायन वैसे भी बिहार की त्रासदी रही है सो ये त्रासदी आज भी जारी है. पहले लोग कलकत्ता जाते थे आज दिल्ली-मुंबई.
अभी कुछ साल पहले एक बड़ी हलचल शुरू हुई इस इलाके में. एनटीपीसी ने अपना एक ब्रांच यहाँ खोलने का फैसला लिया. काम शुरू हुआ. भूमि का अधिग्रहण किया गया. सबको ज़मीन की उचित कीमत अता की गई. कुछ आस पास के लोगों को दैनिक मज़दूरी का काम भी मिला और ठेकेदारी भी. आज सबकुछ यहाँ बनके तैयार है. टेस्टिंग हो चुकी है. एनटीपीसी का कोयला से बिजली बनाने का कारखाना शुरू होने ही वाला है. सारी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है. कोयला लाने के लिए रेलवे का ट्रैक बिछाया जा रहा है. कुछ ही महीने बाद यहाँ रोज़ाना सैकड़ों टन कोयला ( लगभग 18 रैक ) जलेगा जिससे लगभग 36,000 मेगाहर्ट्ज बिजली का उत्पादन होगा और एनटीपीसी की चिमनियां धुंए के साथ सैकड़ों टन कोयले की राख वहाँ  के वायुमंडल में फैलाएंगी जो अंततः वहाँ की भूमि पर रख की एक परत बनाएगी. किसी उर्वर भूमि पर कोयले की राख की परत का अर्थ है साल दर साल उस उपजाऊ भूमि का बंजर भूमि के रूप में परिवर्तन. यह एक धीमी प्रकिया के अंतर्गत होगा और आश्चर्य नहीं कि आनेवाले चंद दशकों में यहाँ की सैकड़ों एकड़ उपजाऊ भूमि बंजर हो जाए. एक कृषिप्रधान देश में कृषि योग्य भूमि की ये दशा अब कोई नई बात भी नहीं.

Sunday, September 23, 2012

लहरें गिनकर माल बनाते हैं साहेब !





पुंज प्रकाश

एक कहानी है. बचपन में सुनी थी. किसी मुल्क का एक कारकून घूसखोर हो गया. राजा बड़ा परेशान हुआ कि इसका क्या किया जाय. उसे जहाँ भी लगाये वो वहीं घूसखोरी शुरू कर देता. राजा उसे निकाल सकता नहीं था और कठोर सजा भी नहीं दे सकता था क्योंकि रिश्ते में वो राजा का साला लगता था. साले के आगे तो बड़े बड़ों की नहीं चलाती फिर राजा की क्या औकात. साला को कुछ बोले तो पटरानी का मुंह लटक जाता. राजा ने अपने सबसे काबिल मंत्रियों की सभा बुलाई और अपनी ये समस्या सह-मजबूरी शरमाते हुए उनके सामने रखी. मंत्रियों ने काफी माथापच्ची के बाद ये तय किया कि राजा के साले की पोस्टिंग ऐसी जगह कर दी जाय कि जहाँ से किसी प्रकार की उपरी आमदनी की उम्मीद ही न हो. सोच विचार कर तय किया गया कि उसे समुद्र की लहरों को गिनने का काम में लगा दिया जाय. वहाँ कोई इंसान होगा नहीं तो राजा का साला घूस किससे लेगा! राजा को ये सुझाव अच्छा लगा और अन्तः राजा के साले को समुद्र की लहरों को गिनने के काम में लगा दिया गया. राजा का साला अपने इस तबादले से ज़रा दुखी तो हुआ पर काम पर लग गया. एक दिन वो लहरें गिन रहा था कि उधर से एक नाव गुज़रने लगी. राजा के साले ने चिल्लाकर उस नाव को रोका और उधर से गुज़रने को मना किया कारण पूछने पर बताया कि राजा ने उसे लहर गिनने के काम में लगाया है. नाविक ने अपनी मजबूरी ज़ाहिर किया कि उसे तो इसी रास्ते से जाना है. राजा के साले ने कहा ठीक है जाओ पर चढावा चढ़ाते जाओ. नाविक ने चढ़ावा चढ़ाया और आगे बढ़ गया. अब जो भी वहाँ से गुज़रता चढ़ावा चढ़ा के ही आगे बढ़ता. इस तरह ये तय हुआ कि एक सच्चा घूसखोर लहरें गिनकर भी माल बना सकता है.
ये एक ईमानदार राजा और उसके एक घूसखोर साले की कहानी है. आज तो न राजा ईमानदार रहा ना ही उसके सालों की संख्या एक रही. आज जिस विभाग में जाएँ वहीं राजा के साले भरे पड़े हैं या यूँ कहें कि राजा आज खुद इन सालों की बहाली करता है. इस सठियाये लोकतंत्र में और कोई तरक्की हुई हो या न हुई हो राजा के सालों की जनसंख्या में दिन दुगनी रात चौगुनी उन्नति हुई है और राजा भी प्रसन्न है इनकी संख्या देखकर. राजा को भी पता है कि इन्हीं सालों की बदौलत तो उसकी सत्ता है नहीं तो ऐसे ऐसे देशद्रोही पैदा हो चुके हैं इस पवित्र धरती पर कि पल भर में वो राजा की सत्ता की नीव हिला दें.
अब वक्त है इसी कहानी को रीमेक करके आज के सन्दर्भ में व्यक्त करने की. चलन के हिसाब से ज़रा नया मसाला भी डालना पड़ेगा तो चलिए कोशिश करतें हैं. आप अगर महिला हैं तो किसी पुरुष और पुरुष हैं तो किसी महिला ‘मित्र’ के साथ किसी न किसी पार्क, मैदान या किसी सार्वजनिक जगह पर ज़रूर ही बैठे होंगें. पुरुष से पुरुष और महिला से महिला ‘मित्रों’ पर अभी बात नहीं करेगें नहीं तो झूठ मूठ का दिशा भ्रम हो जायेगा और दिशा भ्रम का शिकार होना कोई अच्छी बात नहीं. हाँ तो पार्क की बात हो रही थी. आप अपने मित्र के साथ पार्क में बैठे होतें हैं. थोड़े दूर, थोड़े पास. हल्की मुस्कुराहट के साथ बातों का सिलसिला नज़रें नीची किये हुए चलता है, दूरी ज़रा कम होती है कि कहीं से ताली पीटता हुआ “उनलोगों” का दल आ धमकाता है और आपके गाल छूकर एक खास अंदाज़ में ताली पिटते हुए आपको लाख-लाख दुआएं देने लगता(ती) है. उनकी दुआओं को सुनकर आप और मित्र दोनों एक दूसरे को कनखियों से देखकर मुस्कुराने लगतें हैं. फिर आप या मित्र दोनों में से कोई एक अपने पर्स से दस-बीस का नोट निकालकर ताली पीटनेवाले (वाली) को थामतें हैं और वो खुशी से उस नोट को अपने पसीने से लथपथ ब्लाउज के अंदर डालके आपको पुनः ढेर सारी दुआएं देते हुए अगली जोड़ी की तरफ़ बढ़ जातें हैं. ये सारा काम (कुछ अपवादों को छोड़कर) अमूमन बड़े ही प्यार से अंजाम दिया जाता है. उनकी दुआएं सच हो न हो, आपकी जोड़ी सलामत रहे न रहे पर उन ताली पीटनेवालों का स्नेह हर जोड़ी पर रोजाना ऐसे ही फुहार बनके दुआओं के रूप में बरसता है. जिसे याद करके आपके होठों पर मुस्कान अपने आप ही आ जाती है.
झारखण्ड की राजधानी राँची में आजकल यही काम पुलिस द्वारा अंजाम दिया जा रहा है. बस अंदाज़ ज़रा बदला है. बाकि सारा सेटअप वैसे का वैसा है बस ताली पीटनेवालों की जगह ले ली है झारखण्ड पुलिस ने. अब पुलिस आएगी तो काम करने का अंदाज़ भी निश्चित है बदलेगा ही. आप वैसे ही हंसते, मुस्कुराते, शरमाते आदि आदि राँची के किसी पार्क में बैठे हैं कि एक हवलदार आपके पास आता है और कहता है कि साहेब बुला रहें हैं. आप सवालिया नज़रों से अपने मित्र की तरफ देखतें हैं और उस हवलदार के साथ चल पड़ते हैं. साहेब अपनी जिप्सी में तोंद निकले कचर-कचर पान के साथ काला, पीला, तीन सौ ( ज़र्दा ) की खुशबूदार बदबू छोड़ते विराजमान हैं. आप पहुंचतें है. साहेब कड़क आवाज़ में आपको नैतिकता का पाठ पढाते है, आपको थाने चलने को कहते हुए जीप में बैठने को भी कहते हैं. आपकी सारी दलील वर्दी के पसीने की बदबू में बाप-बाप करते हुए वहीं की वहीं आत्महत्या कर लेती है. तभी एक सिपाही साहेब का इशारा पाकर आपकी जेब में हाथ डालता की कोशिश करता है. डर के मारे आप खुद ही पर्स निकालकर सामने रख देतें हैं. खुदरा-खुदरी मिलाकर जितना भी होता है सब साहेब की जेब में चला जाता है और बदले में आपको नसीहत मिलती है कि आज छोड़ रहा हूँ फिर दिखा तो अंदर कर दूँगा. आप अपने मित्र के साथ वहाँ से निकलने में हीं अपनी भलाई समझतें हैं और यहाँ के बाद जो पिज्ज़ा खाने का प्लान था वो पैसे के लूट जाने के कारण दम तोड़ देता है इसे आप अपनी इच्छाओं की भ्रूण हत्या भी कह सकतें हैं. आप दोनों मुंह लटकाए अपने अपने घर पहुंचतें हैं पुनः कभी उस पार्क या मैदान में न बैठाने की कसम खाते हुए.
अब ज़रा लगे हाथ कुछ नैतिक बातें कर लेना ही चाहिए. क्या ज़रूरत है लड़के-लड़किओं को ऐसे खुलेआम बैठाने की, पता नहीं वहाँ बैठके क्या-क्या कर रहे होंगें. क्या ज़रूरत है पुलिस से डरने की और पुलिस को पैसा देने की. अड जाना चाहिए. आप पैसा देतें हैं तभी तो कोई लेता है आदि आदि. इन नैतिक तर्कों का जवाब आपको भी पता है. हमारा अर्ध-सामंती मानसिकता वाला समाज प्रेम को कितना मान्यता देता है वो अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. आए दिन ऑनर किलिंग की खबरें कई बातों की पुष्टि करने के लिए काफी है. समाज अगर किसी लड़का-लड़की के मिलाने, बात करने, एक दूसरे के प्रति स्नेह ज़ाहिर करने को सहजता पूर्वक स्वीकार करता तो इनको पार्कों, साईबरकैफ़े, सुनसान जगहों, झाडियों, मकबरों, किलों आदि में मिलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. लगे हाथ ये जानकारी भी जोड़ लें कि राँची में पार्कों, डैमों, झरनों के आसपास खुलेआम कानूनी और गैरकानूनी शराबें मिलाती और सेवन की जातीं हैं. पुलिस की गश्त भी रूटीनीरूप से चलती ही रहती है. इन जगहों पर हर तरह की देसी विदेशी बोतलें सरेआम मिल जायेगी. साथ ही साथ शोहदों की नज़रें तो हर जगह की तरह यहाँ भी अक्सर ही लड़कियों के उदभव और विकास का रसास्वादन करती ही रहतीं हैं. नैतिकता का इतना तड़का काफी है अब ज़रा बात मुद्दे की.
इसमें ऊपर जो राजा वाली घटना है वो कहानी है और नीचे जो साहेबवाली घटना है वो हकीकत. वैसे कहानी कब हकीकत और हकीकत कब कहानी बन जाए कहना मुश्किल है. हकीकत है तो कहानी है, कहानी है तो हकीकत. दोनों एक दूजे से अलग भी है और एक दूसरे में पूरक और समाहित भी.
यहाँ एक तरफ़ है वो समाज जो सदियों से हमारे सभ्य समाज से वहिष्कृत है और दूसरी तरफ़ है समाज का वो अंग जो पढ़ लिखकर, कम्पटीशन देकर बहाली पाता है और जिसपर कानून व्यवस्था बनाये रखने की ज़िम्मेदारी है. दोनों में कौन ज़्यादा असहनीय और सामंती मानसिकता से सराबोर है ये बताने की ज़रूरत नहीं. एक प्यार को दुआएं देता है तो दूसरा अंदर डाल देने के नाम पर वसूली करता है. आए दिन शहर में ‘मजनू भगाओ’ कार्यक्रम के नाम पर किसी भी नौजवान पर डंडा बरसाने से ज़रा भी नहीं हिचकती. अब बेचारे मजनू को क्या पाता था कि प्यार के बदले उसका नाम एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जायेगा वो भी 21वीं सदी में. वैलेंटाइन डे के दिन अमूमन इनका रवैय्या किसी कठमुल्ले से कम नहीं होता. ये यही पुलिसिये हैं जो अपने भूख हड़ताल के आंदोलन के दिन जमके खाते हुए कैमरे में कैद होतें हैं. रात को थानों में ताला मरके जमके सोतें हैं और तब तक उस स्थान पर नज़र नहीं आते जबतक कोई घटना घट न जाय. बात ज़रा फ़िल्मी लग सकती है पर इनकी सच्चाई ज़रा फिल्मी ही है या ये कह सकतें हैं कि फ़िल्मी हो गई है. तभी हमारे देश का एक मशहूर टेक्स्ट बुक लेखक भी इन्हें वर्दी वाला गुंडा कहता है. ये होते जन सेवा के लिए हैं पर जनता की ये कैसे सेवा करतें हैं वो आप भी जानतें हैं. सरकारी संरक्षण प्राप्त इन महानुभावों की कथा का सागर अथाह और सर्वव्यापी है. वैसे बात केवल इस विभाग की ही क्यों, हिंदुस्तान का कोई भी कोना और विभाग आज लहर गिनकर माल कमा लेने वालों से खाली नहीं. 
आखिरी बात ये कि लहरें गिनने वाले इन पुलिसवालों की कुछ तस्वीरें लहरें गिनते हुए एक अखबार में छप गई है सो पुलिस डिपार्टमेंट की भी कुछ नैतिक ज़िम्मेदारी बनाती है. सो दो लोगों को निलंबित किया गया है तत्काल. मामला शांत पड़ते ही हो सकता है इन्हें फिर से लहरें गिनने के काम पर लगा दिया जाय. 

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...