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Wednesday, May 10, 2017

सफलता का रहस्य और सुकरात

एक विचित्र बात देखने को मिल रही है आजकल। नौजवान तबका जो कि कठोर श्रम और अपने बिंदासपने के लिए जगत प्रसिद्ध है बहुत जल्द ही निराश हो जा रहा है और कभी यह तो कभी वह के चक्कर में पड़कर अपना कीमती और बहुमूल्य समय बर्बाद कर दे रहा है। सफलता और असफलता को लेकर या तो जल्दबाज़ी का शिकार है या फिर सफलता का गूढ़ सूत्र से पूरी तरह अनभिज्ञ। यदि इंसान किसी चीज़ में असफल होते हैं इसका मतलब यह होता है कि उसने उस चीज़ में सफल होने के लिए उतना शिद्दत, ज़िद्द और सही दिशा में मेहनत नहीं दिखलाया जितने की ज़रूरत थी। सफलता-असफलता कई बार स्थितियों-परिस्थितियों पर निर्भर तो करती है लेकिन इसके ज़्यादातर ज़िम्मेदार हम खुद होते हैं, ना कि कोई दूसरा। सफलता-असफलता के सूत्र हमारे अंदर हैं, कहीं बाहर नहीं। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिन्होंने अपने जुनून से पहाड़ों का सीना चाक कर दिया है। आखिर गया के गहलौत गांव के दशरथ मांझी के पास वो क्या बात थी जिन्होंने अकेले पहाड़ काटके रास्ता बना दिया। कबीर कहते हैं -
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात के सील पर पड़त निशान
अर्थात् अभ्यास करते करते मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान हो सकता है जैसे कुएं में बार-बार रस्सी के आने-जाने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। इस संदर्भ में सुकरात से जुड़ी एक कथा याद आ रही है।
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है? सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल नदी के किनारे मिलो। वो लड़का अगले दिन नदी के किनारे सुकरात से मिला। फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा। वे दोनों नदी में आगे बढ़ने लगे और जब आगे बढ़ते बढ़ते पानी गले तक पहुंच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़ के पानी में डुबो दिया। लड़का पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे पानी में तबतक डुबोए रखा जबतक कि वो लड़का नीला नहीं पड़ गया। फिर सुकरात ने उसका सिर पानी से निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो काम जो काम उस लड़के ने सबसे पहले किया, वो था हांफते-हांफते तेज़ी से सांस लेना।
थोड़ा सामान्य होकर लड़के ने क्रोधित होकर सुकरात से पूछा - आप क्या मुझे मार डालना चाहते थे?
सुकरात ने शांत स्वर में पूछा - जब तुम पानी के भीतर थे तब तुम सबसे ज़्यादा क्या चाहते थे?
लड़के ने उत्तर दिया - सांस लेना।
सुकरात ने कहा - यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना कि तुम सांस लेना चाहते थे, तो वो तुम्हें मिल जाएगी। इसके अलावा इसे पाने का कोई रहस्य नहीं है।
पाब्लो कुइलो ने भी अपने विश्व प्रसिद्द उपन्यास अल्केमिस्ट में यह पंक्ति बार बार दुहराते हैं - किसी चीज़ को तुम दिल से चाहो तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की जिद्द ठान लेती है। इस लाइन को शाहरुख खान की एक हिंदी फिल्म ने भी खूब इस्तेमाल किया बिना पाब्लो को आभार बोले हुए।
सो निराश होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हर असफलता के भीतर सफलता के सूत्र छिपे होते हैं बस ज़रूरत है उसे पहचानने और सही व सार्थक दिशा में सतत प्रयत्न करते रहने की।
#सुकरात के किस्से के लिए साभार #प्रभात #ख़बर

Saturday, July 9, 2016

फुलसुंघी - पाण्डेय कपिल का भोजपुरिया उपन्यास

“बाबुसाहेब! फुलसुंघी के जनीले नू? उ पिंजड़ा में ना पोसा सके । ऊ एगो फूल के रस खींचके चल देले दोसरा फूल का ओर । हम त तवायफ के जात हईं । हमरी काम फुलसुंघी के लेखा एगो जेब से पैसा खींचके दोसर जेब के ओर चल दिहल ह । (बाबुसाहेब, फुलसुंघी को जानते हैं न? वो पिंजड़ा में नहीं पाली जा सकती । वो एक फूल से रस चूसकर दूसरी फूल की ओर चल देती है । हम तवायफ हैं । हमारा काम भी फुलसुंघी जैसा ही एक जेब से पैसा खींचकर दूसरी जेब की ओर चल देना है ।)  – फुलसुंघी”

“फुलसुंघी” भोजपुरी संस्थान, 2 ईस्ट गार्डिनर रोड़, पटना 800001 से सन 1977 में प्रकाशित एक भोजपुरी उपन्यास है । इसके पात्र एतिहासिक तो हैं लेकिन लेखक पाण्डेय कपिल एतिहासिकता और घटनाओं की विश्वसनीयता का दावा पेश नहीं करते । पात्र और स्थान यथार्थ जगत के तो हैं लेकिन उपन्यास में रचनात्मक कल्पनाएँ भी हैं । व्याकरण की भाषा में इसे मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया उपन्यास कहा जा सकता है । वैसे भी इतिहास की पढ़ाई इतिहास की किताबों से ही करनी चाहिए, उपन्यास, फिल्मों, कविता और कहानियों से नहीं; क्योंकि यहाँ रचनात्मक कल्पनाओं का स्थान हमेशा ही विद्दमान रहता है । वैसे इतिहास की किताबें भी पक्षधरता की मिलावट से परे है ऐसा दावा बहुत विश्वास के साथ तो नहीं ही किया जा सकता है ।
उपन्यास के पहले ही पन्ने पर लेखक लिखते हैं - “फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष कहे के नइखे । कहे के एतने भर बा कि एह उपन्यास के कथावस्तु कवनो इतिहास ना ह, एकर कवनो पात्र यथाचित्रित वास्तविक पात्र ना ह । एक में संदेह ना कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय आ रिवेल साहेब सांचो के हो चुकल बाड़े । बाकिर एह चरित्रन के कवनो प्रामाणिक ब्योरा सामने नइखे रहल, आ एह लोगन के किस्सा किवदंतीयन से भरल बा । अइसन कुछ किवदंतियन से सह पाके, एक उपन्यास के कथावस्तु कल्पना से खड़ा कइल गइल बा । बाकिर, एक उपन्यास में, एगो काल-विशेष के, क्षेत्र-विशेष के आ समाज विशेष के जवन तस्वीर उरेहल गइल बा, उ जरुर सही बा । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977” (“फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष नहीं कहना है । कहना केवल इतना है कि इस उपन्यास का कथावस्तु इतिहास नहीं है, इसका कोई भी पात्र पुरी तरह से वास्तविक नहीं है । इसमें कोई सन्देश नहीं कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय और रिवेल साहब वास्तविकता में भी हो चुके हैं । लेकिन इन चरित्रों का कोई प्रामाणिक ब्योरा सामने नहीं था, वैसे भी इन लोगों के किस्से किवदंतियों से भरा हुआ है । इन्हों किवदातियों के सहारे इस उपन्यास की कथा वस्तु टिकी है । बाकि एक उपन्यास में, एक काल विशेष के, क्षेत्र विशेष के और समाज विशेष के जो तस्वीरें अंकित हैं, वो ज़रूर सच हैं । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977)
हमारे यहाँ इतिहास अंकित करने जैसे महत्वपूर्ण काम में शायद आलस्य का प्रकोप ज़्यादा है, इसीलिए बड़े से बड़े चरित्रों के बारे में अनुमान और किवदंतियां ज़्यादा हैं – सत्य कम । इसके पीछे मौखिक परम्परा का भी भरपूर योगदान है । हम बोल-बोलके महाकाव्य रच देते हैं लेकिन बात यदि अंकित-टंकित करने की आ जाए तो हाथों को लकवा मार जाता हैं । अब सुनने-सुनाने की परम्परा में समस्या यह है कि सुनानेवाला कथा में अपने हिसाब से जोड़-तोड़ करता है और सुननेवाला अपनी बुद्धि और विवेक से उसे ग्रहण करता है; कुछ याद रहता है, कुछ याद नहीं भी रहता । फिर जब सुननेवाला सुनी हुई कथा को अपने सुनाता है तो बीच-बीच में टूटे तारों को अपनी क्षमता, मान्यता और स्वार्थ से जोड़ता, तोड़ता, मरोड़ता है । इस प्रकार सत्य में कल्पना का समावेश होता है और इतिहास में गप्प का मिश्रण और फिर पैदा होतीं हैं सत्य की चाशनी से सनी किवदंतियां । वैसे भी किसी बड़े चरित्र के साथ चमत्कार न जुड़े तो हमें मज़ा ही नहीं आता । तभी तो विद्यापति के साथ उगाना (शिव) की कथा जुड़ता है । कुछ कुछ ऐसा ही इस उपन्यास के साथ भी है । हम खोजने निकलें तो इस उपन्यास के पात्रों की सच्ची कहानियां का अता-पता शायद ही कहीं मिले; और जो मिले उसमें कितना सत्य और कितना गप्प है, बता पाना शायद बहुत ही मुश्किल है । वो चाहें ढेलाबाई हों, महेंदर मिसिर हों, रेवल साहेब हो या कोई अन्य चरित्र ।
महेंदर मिसिर का जाली नोट छापने और गिरफ्तार होने की भी (दांत) कथा है लेकिन यहाँ देशभक्ति वाला एंगल नहीं है । यहाँ महेंदर मिसिर एक कलाकार मात्र हैं, महानता के बोझ से लदे पूर्वी गायकी और “मिसिर” सरमौर महेंदर मिसिर नहीं। यहां वो परिस्थियों से लड़ते कम, भागते हुए ज़्यादा पाए जाते हैं - कुछ-कुछ आवारा मसीहा की तरह । अब पाण्डेय कपिल की लेखनी में कितना हक़ीक़त और कितना फ़साना है यह तो कोई पारखी ही बता सकता हैं।
यह सत्य है कि ये लोग थे, लेकिन कैसे, क्यों कहाँ, कब, किस प्रकार आदि पर मामला आके फंस जाता है । बहरहाल, पात्रों को छोड़ भी दिया जाय तो भी इस उपन्यास के लेखक पाण्डेय कपिल के बारे भी साहित्य जगत लगभग अनभिग्य ही है, जबकि यह अभी हाल ही की बात है । तो सवाल यह बनता है कि क्या साहित्य में भी चर्चित होने के लिए किसी खेमे का खूंटा पकड़ना ज़रुरी है? अब इस सवाल का जवाब साहित्य के विद्वान ही दें तो बेहतर होगा ।
कुल 112 पन्ने का यह उपन्यास अपने अंदर एक लंबा कालखंड और कई पात्रों की जीवनयात्रा समेटे हुए बड़ी ही तीब्र गति से आगे बढ़ता है, कभी-कभी पीछे की ओर (फ्लैश बैक) भी आता है ताकि कई सारी स्थितिओं-परिस्थियों और घटनाक्रमों का अर्थ स्पष्ट हो जाएँ । यह पीछे आना एक रणनीति है, बिलकुल “दो कदम आगे और एक कदम पीछे” की तरह । अब यह स्पष्टता या रणनीति इतिहास जनित है या लेखकीय टिपण्णी; यह एक शोध का विषय है ।
“फुलसुंघी” गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी सामंती व्यवस्था का आडम्बर, उससे मोहभंग के साथ कोठा से लेकर लोकसंगीत पूर्वी आदि में लिपटी एक व्यावहारिक गाथा की तरह है; जहाँ एक जेब से दूसरी जेब तक की आज़ादी और स्वछंदता भरी यात्रा करनेवाली ढेलाबाई अन्तः कैद हो जाती या कर दी जातीं हैं । रवेल साहेब और हलिवंत सहाय का तमाम भौतिक सुख सुविधाओं से मोहभंग हो जाता है, महेंदर मिसिर आवारगी को अभिशप्त होते हैं और अन्य चरित्र कई अन्य नियति को प्राप्त होते हैं । इस बिलकुल पतले से उपन्यास की टहनियाँ और जड़ें किसी बरगद की तरह फैली हैं, जहाँ इसके हर चरित्र का क्रमिक विकास है; केसरबाई, मीनाबाई, राम नारायण मिसिर, बुलकान, मुंशी शिवधारीलाल, मनोरमा आदि जैसे उन चरित्रों का भी जो इस कथा के मुख्य चरित्र नहीं हैं । वहीं कुछ ऐसे एतिहासिक घटनाक्रमों का भी एक दूसरा ही नज़रिया सामने आता है जिसे लेकर आजतक तरह-तरह की कथा सुनी-सुनाई जातीं हैं । उन घटनाओं में महेंदर मिसिर का नोट छापने का धंधा करना, गुलजारीबाई बाई का ढेला बाई के रूप में परिवर्तित हो जाना, रिवेल साहब और हलिवंत सहाय भौतिकता से मोह भंग हो सन्यासी हो जाना आदि हैं । अब सारी घटनाओं/प्रसंगों का ज़िक्र कर पाना यहाँ संभव नहीं लेकिन एक प्रसंग का ज़िक्र करने का मोह त्याग पाना मुश्किल हैं । उपन्यास के शुरूआत के पन्ने पर पाण्डेय कपिल लिखते हैं – “सुनल जाला जे प्रयागराज के गणिका जानकीबाई के गवनई पर रीझके आपन सबकुछ निछावर क देवेवाला प्रेमी जब ओकर करिया-कलूट चेचक के दाग वाला चेहरा के देखलस त उ पगला गईल आ जानकीबाई के मार छुरी के गोद दिहलस । छुरी के छप्पन घाव खाइयो के जानकीबाई जीयत बांच गईली, आ नाम बदल गईल, हो गईल छप्पनछुरी । (सुनने में आता है कि प्रयागराज की गणिका जानकीबाई के गाने पर रीझकर अपना सबकुछ न्योछावर कर देनेवाला प्रेमी जब उनकी काली और चेचक से भरा चेहरा देखा तो पागल सा हो गया और उसने जानकीबाई को छोरी से गोद दिया । लेकिन जानकी बाई बच गईं और उनका नाम बदलकर छप्पनछुरी हो गया ।)”
ठीक इसी प्रकार गुलजारीबाई के ढेलाबाई के रूप में बदल जाने की कथा भी है – “उनका एगो महफिल में पगलाइल प्रेमियन के बीच चल गईल ढेला । अ इनकरी नाम बदल गइल । हो गइल ढेला यानी ढेलाबाई । (उनकी एक महफिल में पगलाए प्रेमियों के बीच ढेला चल गया और इनका नाम बदलकर हो गया ढेला अर्थात ढेलाबाई ।)”
बिहार के विख्यात/लोकप्रिय गायक और कवि महेंदर मिसिर और ढेलाबाई पर लिखित सामग्री बहुत ही कम है और जो कुछ भी लिखा गया है उसमें हकीकत और फ़साने को अलग-अलग कर पाना बहुत ही दुरूह कार्य है । यह काम साहित्य और साहित्यकारों का कम इतिहास, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का ज़्यादा है । जहाँ तक एक उपन्यास का सवाल है तो फुलसुंघी निश्चित ही भोजपुरी ज़मीन, भाषा, बोली, वाणी, संस्कारों, संस्कृति, उपमाओं, मान्यताओं, गीत आदि से लबरेज़ एक पढ़ने-पढ़ाने वाली रचना है ।
पटना के रंगकर्मी मित्र धर्मेश मेहता के सौजन्य से मैं पहली बार कोई भोजपुरी उपन्यास पढ़ रहा था । मुझे नहीं पता कि पाण्डेय कपिल कौन हैं और आज किस स्थिति में हैं, उनकी यह रचना “फुलसुंघी” आज बाज़ार में उपलब्ध भी है या नहीं; लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि भोजपुरी और भोजपुरी साहित्य से स्नेह रखनेवालों को यह उपन्यास ज़रूर ही पढ़ना-पढ़ाना चाहिए । यह अपने आपमें एक शानदार रचना हो, न हो लेकिन एक शानदार रचना का सुख और एहसास देनेवाला उपन्यास तो ज़रूर ही है ।

Sunday, April 17, 2016

राग दरबारिया प्रेमपत्र

श्रीलाल शुक्ल लिखित उपन्यास - राग दरबारी । एक ऐसी “कल्ट” किताब कि जिसे मैं कभी भी, कहीं भी, कहीं से भी पन्ने पलटकर पढ़ सकता हूँ । इस पुस्तक के एक एक शब्द और शैली से मुझे जानलेवा मुहब्बत है । नकली आदर्शवाद और वाहियात क्रांतिकारिता के पेचीस से पूरी तरह मुक्त “राग दरबारी” भारतीय ग्रामीण जीवन का किसी भी बाइबल से कम नहीं है; और इसी पुस्तक में दर्ज़ निम्नलिखित प्रेम पत्र विश्व साहित्य के किसी भी महान प्रेम पत्र नुमा रचना से पाठ और उप-पाठ और शैली (Text, Sub-Text, Style) आदि इत्यादि के स्तर पर बीस ही ठहरता है, उन्नीस तो हरगिज़ नहीं । शायद यही वजह है कि हिन्दी की प्रख्यात विद्वान फ्रेंचेस्का ओरसिनी ने अपनी किताब ‘Love in South Asia’ में इसका खास जिक्र किया है । बहरहाल, उपन्यास के पात्र बेला द्वारा रूप्पण बाबू को लिखा प्रेम पत्र का रसावादन कीजिए । जिसे इसी उपन्यास का किताबी (लगभग) क्रांतिकारी रंगनाथ “सिनेमा का संस्कृति के अध:पतन मे योगदान” का जुमला साबित करने की मंशा रखता है । 
सुना है किसी जमाने मे लोग गुनाहों का देवता तकिये के नीचे रखके सोते थे; आज वक्त है राग दरबारी को दिल दिमाग मे बैठने का, क्योंकि वैदजी अब गावों की नहीं देश की राजनीति करते हैं ।
ओ सजना, बेदर्दी बालमा,
तुमको मेरा मन याद करता है । पर ... चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर । वह बेचारा दूर से ही देखे करे न कोई शोर । तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो । याद मे तेरी जाग-जाग के हम रात – भर करवटें बदलते हैं । 
अब तो मेरी यह हालत हो गई है कि सहा भी न जाए, रहा भी न जाए । देखो न मेरा दिल मचल गया, तुम्हें देखा और बदल गया । और तुम हो कि कभी उड जाए, कभी मुड़ जाए, भेद जिया का खोले ना । मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको छिपाने की बुरी आदत है । कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख तो आके परवाने ।
तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं । ये सुलगते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ । मुहब्बत लूटाने को जी चाहता हैं । पर मेरा नादान बलमा न जाने दिल की बात । इसलिए मैं उस दिन तुमसे मिलने आई थी । पिया मिलन को जाना । अंधेरी रात । मेरी चाँदनी बिछुड़ गई, मेरे घर पे पड़ा अँधियारा था । मैं तुमसे यही कहना चाहती थी, मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए । बस, एहसान तेरा होगा मुझ पर मुझे पलकों की छाँव में रहने दो । पर जमाने का दस्तूर है यह पुराना, किसी को गिराना किसी को मिटाना । मैं तुम्हारी छत पर पहुंचती पर वहाँ तुमरे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था । मैं लाज के मारे मर गई । आंधियों, मुझ पर हंसों, मेरी मुहब्बत पर हंसों । 
मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो । तुम कबतक तड़पाओगे ? तड़पाओगे ? तड़पा लो, हम तड़प-तड़पके भी तुम्हारे गीत गाएँगे । तुमसे जल्दी मिलना है । क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मंदिर सूना है । अकेले हैं, चले आओ जहां हो तुम । लग जा गले से फिर ये हंसी रात हो न हो । यही तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए, हाय । हम आस लगाए बैठे हैं । देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना ।
तुम्हारी याद मे,
कोई एक पागल ।

Friday, December 4, 2015

कोठागोई : यथार्थ का किस्सागोई

संगीत और कला को जब-जब बाँधने की कोशिश की जाती है वह बाँध तोड़कर आगे बढ़ जाती है । - कोठागोई 

अपने अंदर बृहद कालखंड समेटे वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रभात रंजन की किताब कोठगोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से) एक ही बैठकी में पढ़ी जानेवाली एक ज़रुरी रचना है । समाज और समाजिकता के स्याह और धूसर पन्नों के इतिहास और किस्सागोई में लेखक की विभिन्न लोगों से साक्षात्कारों, गप्पों, स्मृतियों और तमाम इन्द्रियों के सहारे गोते लगाती यह एक सामाजिक विज्ञान की पुस्तक भी बन जाती है । जिसमें इतिहास का स्याह और सफ़ेद अध्याय है, किस्सा है, कहानी है, गप्प है, गल्प है, उपन्यास है, निबन्ध है, कवित्त है, गीत है, आत्मकथा है, संस्मरण आदि है । तो मूल बात यह कि इस पुस्तक को किस स्थापित श्रेणी में रखा जाय ? शायद कहीं नहीं या शायद हर जगह । वैसे भी कुछ चीज़ें और कुछ इंसान ऐसे होते हैं जो बने बनाए किसी भी खांचे और सांचे में फिट नहीं बैठते । वैसे सच कहूँ तो मेरे व्यक्तिगत अनुभव और समझ उतनी उन्नत भी नहीं है कि इसे किसी खांचे में डालके पैक कर दूँ । और फिर लोक इतिहास यथार्थ और कल्पना के सटीक मेल से ही तो बनता है; नहीं क्या ? यह सुनी, सुनाई और इस सुनने सुनाने से बनाई गई कथागोई है । “जितनी उसने सुनाई थी, जितनी मैंने उसके सुनाए से बनाई थी ।” – (कोठागोई, पृष्ठ – 169) क्या इसे ही रिसर्च वर्क कहा जाता है ? यदि नहीं तो किसे कहा जाएगा  ?
वैसे पुस्तक की जड़ में मुज़फ्फरपुर (बिहार) का चतुर्भुज स्थान तो है लेकिन यहाँ मन में आनेवाले विचारों की तरह उन्मुक्त फैलाव भी है । जिसमें “अंधेरे-उजाले के बीच संगीत इबादत से पहले !”, “सुना गुना समझा जाना बुना !”, “ज़िंदगी उस पार जितनी ज़िंदगी उस पार है”, “गुमनाम कवि बदनाम गायिका, बाकि बाजत रसनचौकी”, “इज्ज़त उसे मिली जो वतन से निकल गया”, “दर्द का किस्सा यार बहुत है”, “पढ़ कर आगे जाना है अपना दाग मिटाना है”, “दर मिला मुझको दरबदर होकर”, “ब्लू कलर का पैंट पहनकर हैंड कमर में लाती हो”, “दुनियां दुनियां जीवन जीवन”, “अंतिम प्रणाम लोक देवता को”, आखिरी बात आदि कुल तेरह शीर्षकों के सहारे किस्से स्वतंत्र, रोचक और सहज तरीके से विचरण करते है; बिलकुल दादी, नानी और लोक कथाओं के कहानियों की तरह । यहाँ कथा है तो कथा कि परिकथा और उपकथा भी । कला है तो नंगा और क्रूर यथार्थ भी है, विषय है तो विषयान्तर भी, “विषय के नाम पर विषयान्तर, कथा के नाम पर कथान्तर !” (कोठागोई, पृष्ठ – 96), या “क्या कीजिएगा विषय के नाम पर विषयान्तर हो ही जाता है ।” (कोठागोई, पृष्ठ - 73) कई स्थान पर तो एक ही कथा के कई वर्जन भी हैं । बिलकुल वैसे ही जैसे एक ही घटना पर अलग-अलग व्यक्ति का वर्जन थोड़ा अलग होता है । सच्चाई, सहजता और यथार्थ भी तो यही है । यथार्थ के धरातल पर भी सच है तो उसमें कल्पना का मिश्रण भी कम नहीं । तो फिर ? सच-झूठ से ज़्यादा ज़रूरी नज़रिया हो जाता है । नजरिया समझ, अनुभव और ज्ञान से ही बनता है; तब जब दिल-दिमाग खुले हों और मन में सवाल उत्पन्न होते हों, दिल में बैचैनी का घर हो । साधारण जीवन जीना और बने बनाए ढर्रे पर रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह चलते चले जाना मुश्किल हो सकता है, मज़ेदार तो कतई नहीं है । ठीक वैसे ही जैसे कान तो सबके पास होते ही हैं लेकिन सब “कनरसिया” नहीं होते । वैसे यहाँ कथाओं का अंत गुमनाम है या फिर अंत के कई किस्से ।
साधारण जिंदगियों की कहानियां भी बड़ी ही साधारण होतीं हैं । शायद जीवन भी अति साधारण ही होता होगा । चुनौतियों का क्या, वो तो हर किसी की सहयात्री होती ही हैं । अलग-अलग रुतवे के लोग अपनी अलग-अलग ज़रूरतों के लिए अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं । इसमें कोई खास बात नहीं । तो  ? कहानियां होती हैं उनकी जो दुनियां के बीच रहकर भी कुछ अलग जीते हैं । अब यह जीवन खुशी से स्वीकारते हैं या मज़बूरी से यह बात और है । वैसे भी मनपसंद जीवन जीने का मौका और ज़ज्बा मिलाता ही कितने लोगों को है  ?
किस्सागोई एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है गाने-बजाने, सीखने-सीखने, सुनने-सुनाने, गुनने-गुनाने, बेचने-खरीदने, प्रसिद्धि और फिर गुमनामी के अंधेरे कोने में दफ़न हो जाने को अभिशप्त ना जाने कितने लोगों और संस्कृतियों का । लेकिन जैसा की प्रामाणिक सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह से कभी खत्म नहीं होता, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है । यह बदलाव अच्छा भी हो सकता है और अच्छा नहीं भी हो सकता है । बदलाव के बहुत से कारक होते हैं – सांस्कृतिक, एतिहासिक, आर्थिक, राजनैतिक और पता नहीं क्या क्या ! बदलाव कभी अंदरूनी होता है तो कभी बाहरी, लेकिन दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित तो करते हैं, इस तथ्य से कैसे इनकार किया जा सकता है । इस प्रकार कोठागोई चतुर्भुज स्थान की स्थापना से लेकर और न जाने कितने किस्से समेटते हुए उसके उत्थान-पतन की भी कथा कहता है ।
कोठागोई इस पुस्तक के लिए एकदम अनुकूल शीर्षक है । भाषाशास्त्री, भोलानाथ तिवारी, “शब्दों का जीवन” नामक पुस्तक में लिखते हैं – “शब्द जनमते हैं । जी हां, शब्द जनमते हैं । नयी घटनाएँ, नए विचार, नयी परम्पराएं, नयी वस्तु, प्रायः नए शब्द को जन्म देते हैं । पाकिस्तानियों ने 1965 में भारत में घुस-पैठ की और हिंदी में ‘घुस-पैठिया’ शब्द ने जन्म लिया । विभिन्न प्रलोभनों ने हमारे विधायकों को दल बदलने को मजबूर किया जिसका परिणाम था ‘दलबदलू’ शब्द का जन्म ।” कोठों का किस्सा सुनाने के लिए लेखक ने किस्सागोई नामक शब्द से प्रेरणा लेकर कोठागोई नामक शब्द की रचना की होगी या क्या पता यह शब्द पहले से प्रचलन में हो । लेकिन क्या कोठागोई केवल कोठे के किस्से तक ही सीमित है । नहीं, हरगिज़ नहीं । कथा का सूत्र किसी बरगद की जड़ की तरह चतुर्भुज स्थान से होकर ना जाने कितने देस-परदेस तक का सफ़र तय कर विभिन्न जाने अनजाने चरित्रों और घटनाओं के माध्यम से शब्दों के मार्फ़त अपनी यात्रा तय करता है ।
कोठागोई का किस्सा सूत्रधारात्मक (Narrative) है सदियों पुरानी प्रथा किस्सागोई की तरह । जिसका सूत्रधार निश्चित रूप से लेखक ही हैं । हलांकि यह भी विश्वास से कहना उचित नहीं होगा । हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि किस्से लेखक के मार्फ़त ही आते हैं । अब लो यह भी कोई बात हुई, किस्से लेखक के मार्फ़त ही तो आएंगें ना ! खैर, पुस्तक के शुरुआत ही में लेखक ने यह दावा पेश किया है कि “मैं चतुर्भुज की शपथ लेकर कहता हूँ कि इस पुस्तक में जो लिखा है सब झूठ है । इसमें झूठ के सिवा कुछ नहीं है ।” यह बड़ा अटपटा है । दरअसल, लेखक का यह कथन ही इस पुस्तक का सबसे बड़ा झूठ है । वही कुछ और विचार पुस्तक में बार-बार अन्य-अन्य तरीके से दुहराए जाते हैं जो निश्चित ही उपरोक्त कथन की बार-बार पुष्टिकरण ही करते हैं । वो भी इतनी बार की कई बार तो इस पुष्टिकरण पर ही संदेह होने लगता है । किसी ने सच ही कहा है कि इंसान एक बार झूठ का सहारा ले ले तो उसे बरकरार रखने के लिए बार-बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है और हो सकता है कि अगला झूठ पिछले झूठ से बड़ा झूठ हो । इस प्रक्रिया में भय यह रहता है कि झूठ का एक बड़ा पुलिंदा ही न बन जाए । लेकिन इंसान की बात अलग है और लेखक की अलग । लेखक झूठ में सच और सच में झूठ की मिलावट न करे तो शायद कोई किस्सा ही न बने । इसी को नाट्यशास्त्र में भरतमुनि कथावस्तु (Plot) कहते हैं । जिसके तीन श्रोत होते हैं - प्रख्यात यानि किसी प्रसिद्द कथा को विषय बनाकर लिखा गया । उत्पाध यानि किसी काल्पनिक कथा वस्तु को आधार बनाकर लिखा गया । मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया । हालाकिं भरतमुनि यह बात नाटक के सन्दर्भ में कह रहे हैं लेकिन क्या कथा, कहानियों व उपन्यासों आदि का भी सच यही या इसी के आसपास नहीं है ? वैसे “सच - झूठ होता क्या है ? अपना अपना नज़रिया है । --- जो हमें अच्छा लगता है हम उसे सच मान लेते हैं । --- सच असल में कुछ होता नहीं, अपने-अपने सोच की सुविधा होती है ।” (कोठागोई, पृष्ट - 57)
तो क्या कोठागोई का सच फार्स और काल्पनिकता है ? नहीं, हरगिज़ नहीं ! बल्कि यहाँ रचनात्मक सच है । भारतीय परम्परा में जिसे काव्यात्मक सच (Poetic Truth) कहा गया है । यह सच झूठ से परे एक विश्वास है । जिसकी अन्तःप्रेरणा है कथ्य । इसी कथ्य को अभिव्यक्त करने के लिए रचनाकार रचनात्मक सच रचता है । इसे सच नहीं, सच का एहसास (Sense of Truth) कहें तो ज़्यादा बेहतर होगा । यहाँ पाठ नहीं बल्कि समय, काल, स्थिति और परिवेश आदि ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं । यहाँ जितना इतिहास है उतना ही गप्प भी । जितना सच लगभग उतनी ही गल्प । निरा गप्प भी नहीं बल्कि चुन-चुनकर सजाया हुआ, इतिहास के पन्नों से निकाला और कुरेदा हुआ गप्प । जिसके केन्द्र में हैं एक पूरी की पूरी कला और पल-पल बदलता, टूटता, बिखरता और समृद्ध होता या तबाह होता नंगा यथार्थ । सामाजिक मान्यताओं ने जिसे बदनाम का नाम दे रखा था लेकिन उसका रस भी इसी समाज ने जम के चूसा और जब सारा गूदा खत्म हो गया तो आम की गुठली की मानिंद चतुर्भुज स्थान से बाहर फेंक दिया और किसी नए मनबहलाव की खोज में व्यस्त हो गया । वैसे कुछ आमों की किस्मत में चूसा जाना भी नहीं होता बल्कि वो वही पड़े-पड़े कुढ़ते-खीजते और अंततः कुम्हलाते हुए किसी अंधेरे कोने में गुम हो जाते हैं; तो कुछ चुसे जाने के बाद ज़मीन के सहारे एक नया पौधा बन जीवन प्राप्त करते हैं । यह सच है कोई हैरत की बात नहीं । वैसे भी “जब यथार्थ ही इतना अविश्वसनीय हो चला हो तो ऐसे में किसी भी बात पर हैरत नहीं होना चाहिए ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 184)
कोठागोई, कोठे के मार्फ़त समाज की कथा कहता है । इसे ऐसे भी कहें तो गलत नहीं कि कोठागोई समाज के मार्फ़त कोठे की कथा कहता है । या फिर इसे यूं भी कहा जा सकता है कि कोठागोई कथाएँ कहता है जिसमें इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान, कोठा, सांस्कृतिक परम्परा, कला, देह, रुतबा, रूपया आदि और पता नहीं क्या-क्या समाहित होता जाता है । नहीं; इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि कोठागोई एक पेड़ है जिसकी जड़ तो एक है, लेकिन कई टहनियाँ हैं और अनगिनत नए, पुराने, सूखे, हरियाते, गिरे तुड़े पत्ते हैं ।
बाकी इस किताब के बारे में और क्या-क्या और लिखा जाना चाहिए मुझे नहीं पता । निश्चित रूप से इस पुस्तक में भी कई छेद होंगे ही, होने भी चाहिए । सम्पूर्ण तो आजतक कुछ हुआ ही नहीं है । लेकिन अभी तो इसके पहले प्यार में अभिभूत हूँ और प्यार जब नया नया होता है तो बस खुमारी ही खुमारी होती है । वहां कमजोरियों और बेतुकेपन पर भी प्यार ही आता है । जैसे प्रूफ की गडबड़ी के कारण शारदा सिन्हा, शारदा सिंह हो जाती हैं । अच्छा, क्या यह बात हमारे समय की सच्चाई बन चुकी है कि अब अच्छे प्रूफ रीडर बहुत ही कम हैं और प्रकाशकों ने लेखक को ही यह सारा काम करने को अभिशप्त कर दिया है ? वही एकाध जगह नैरेशन में अंगेजी के शब्दों का प्रयोग भी खटकता है । लेकिन यह सब छोटी-मोटी बातें हैं जिसे अगले संस्करण (यदि छपा तो !) में आराम से दुरुस्त किया जा सकता है ।
कोठागोई गुमनाम जगहों और लोगों का किस्सा है । जो काल्पनिक नहीं बल्कि यथार्थ है – नंगा यथार्थ । हम इसे स्वीकारें न स्वीकारें यह अलग बात है । वैसे भी “शाम होते ही मर्द बाहर निकल आते हैं और घर बाज़ार बन जाते हैं । दिन में वे घर होते हैं, पुरुष होते हैं, बच्चे होते हैं, शाम को बस बाज़ार । कुछ खरीदार होते हैं, कुछ तफरीहदार ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 91) सच यह है कि दुनियां बाज़ार में तेज़ी से तबदील होती जा रही है और इंसान उपभोक्ता के रूप में परिवर्तित होने को अभिशप्त । लेकिन इस सच को स्वीकारने के लिए बहुत कम लोग तैयार है । अब यह अज्ञानता है, अनभिज्ञता, तटस्था, अक्खड़ता, अहम् या कुछ और या सब कुछ, या कुछ भी नहीं; कौन जाने  ? बहरहाल –
शोहरत-वोहरत इज्ज़त-विज्जत जिसको चाहे मिल जाये
चादर-वादर दौलत-वौलत जिसको चाहे मिल जाए
सच्चे फनकारों को कदरदां हर टेशन पर मिल जाए
बाकि तो सब फाव की दौलत जिसको चाहे मिल जाए
तो अंत में बस इतना ही कि कोठागोई पढ़िए और मेरी लिखी सारी बातों को सिरे से ख़ारिज कर दीजिए मुझे ज़रा भी दुःख नहीं होगा – सच्ची-मुच्ची । चतुर्भुज स्थान की कसम । लेकिन बिना पढ़े खारिज़ करेंगें तो किसी का भला नहीं होनेवाला, आपका भी नहीं । वैसे लगे हाथ यह भी बता ही दूँ कि कसम उसम पर मेरा कोई यकीन नहीं है । वैसे भी “जीवन के उमंग से जगानेवाली आवाज़ें कभी अमर नहीं होतीं । उनका मरना ही उनकी नियति है शायद । जिनका कोई नाम नहीं होता उनका गुम हो जाना ही उनकी नियति होती है । हम बस खोज सकते हैं । उनको जो गुम हो गए ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 65)

कोठागोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से), लेखक – प्रभात रंजन, प्रकाशक – वाणी प्रकाशन, मूल्य 295 रुपया  
                                                       पाखी में प्रकाशित 

Saturday, August 30, 2014

एक मठ का जवाब एक और मठ नहीं हो सकता

किसी भी सार्थक साहित्य का दायरा इतना सीमित कभी हो ही नहीं सकता कि वह एक खास वर्ग,जाति, समुदाय द्वारा ही लिखा-पढ़ा, समझा-समझाया जाय। यदि कोई समूह या व्यक्ति ऐसा करता है तो यह उसकी संकीर्णता है, उसकी मंशा पर संदेह किया जाना चाहिए। इन दिनों ऐसे फतवे देने वाले, विचार-प्रक्रिया को एकालाप या स्वगत कथन में परिवर्तित करनेवाले लोगों की कोई कमी नहीं जो यह कहते हुए पाए जाते हैं कि जो लोग जन्मजात बहुजन समुदाय (दलित-आदिवासी) से नहीं हैं वो इनके सवालों पर सच्चा साहित्य रच ही नहीं सकते, यदि रचते हैं तो वो “टॉप एंगल साहित्य” या “मर्सी-पिटीशन” होता है। ऐसे विचार उसी ब्राह्मणवादी मानसिकता के परिचायक नहीं तो और क्या है? इस प्रकार के सिद्धांत के समर्थक अमूमन नफ़रत का बीजारोपण कर मुहीम को वैचारिक के स्थान पर व्यक्ति केंद्रित करने का काम ज़्यादा करते हैं।
यह संभव है कि व्यक्तिगत अनुभव साहित्य को और ज़्यादा धनी बनाता हो किन्तु केवल अनुभव मात्र से ही साहित्य सृजन संभव नहीं। साहित्य में शिल्पगत रूप से व्यक्तिगत सच सामूहिक सच में भी परिवर्तित होता है। जहाँ यह प्रक्रिया घटित नहीं होती वहां साहित्य व्यक्तिगत प्रलाप-एकालाप बनकर रह जाता है। यह अपने आप में एक असाहित्यिक वक्तव्य है कि किसी चीज़ पर रचना करने से पहले रचनाकार का उस विषय का व्यक्तिगत अनुभव होना ज़रुरी है। यह तर्क ज्ञान, बुद्धि, विवेक, कल्पना और प्रतिभा के विरुद्ध है। क्या मनुष्य केवल अनुभव मात्र से ही पीड़ा, संघर्ष, सुख-दुःख आदि की अनुभूति करता है? यदि ऐसा होता तो मानव एक चेतनशील प्राणी नहीं माना जाता। साहित्य क्या कोई भी कला केवल अनुभव मात्र की मोहताज़ कभी नहीं रही। यहाँ ज्ञान, कल्पना, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक आदि-आदि का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। ऐसे उदाहरणों से विश्व साहित्य भरा पड़ा है जहाँ लेखकों ने अपने समुदाय, वर्ग, लिंग आदि से परे जाकर कालजई और प्रेरक रचनाएँ रची हैं। अनुभव से एक खास प्रकार का साहित्य (आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा वृतांत इत्यादि) रचा जाता है किन्तु इसके लिए भी लेखकीय प्रतिभा का होना अनिवार्य है।
साहित्य की कलात्मकता और रचना प्रक्रिया पर बहुत सी बातें हो चुकी है, होती रहती हैं, यहाँ अलग से उस विषय पर बात करना ज़रुरी नहीं। साहित्य की सार्थकता को हम ओ हैनरी  की एक विश्वप्रसिद्ध कहानी आखिरी पत्ता  से समझ सकते हैं जहाँ रचनाकार स्वयं होम होकर एक मानवीय मास्टरपीस रचता है। जो साहित्य समाज के लिए आशा की किरण और संघर्ष की शक्ति को प्रस्फुटित नहीं करता, उसकी सार्थकता संदेहास्पद है। उसे समाज का हर तबका रचे इसमें क्या बुराई है। आज इसका साहित्य, उसका साहित्य, उसके लिए साहित्य नाम पर जितने भी मठ-गढ़ चल रहे हैं, उससे रचनाकार का भला भले ही हो जाय, रचना और समाज का भला शायद ही होगा। दूसरे को कमतर और अपने और अपने जैसों को श्रेष्टतर मानने की प्रवृति से न समाज अछूता है ना ही रचनाकार। मेरी कमीज़ तेरी कमीज़ से सफ़ेद है के व्यर्थ प्रलाप से ज़्यादा ज़रुरी है अमानवीयता के विरुद्ध सृजनात्मक योगदान की दिशा में रचना और रचनाकार को प्रयासरत होना। नए मापदंडों और व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण के साथ अनेकता में एकता भी साहित्यिक आंदोलन का उद्देश्य हो सकता है। बांटों और राज करो का नारा तो सदियों से बुलंद है ही।
यह सच है कि बहुजन साहित्य को पढ़ने, समझने के लिए साहित्य के नैतिकतावादी और बने-बनाए मापदंडों को चुनौती देना पड़ेगा, इस साहित्य की अपनी ही एक भाषा, शिल्प, सौंदर्यशास्त्र आदि है। बकौल राजेन्द्र यादव “दलित लेखन को गुस्ताखी का साहित्य कहा जा सकता है जिसका प्रमुख स्वर है गुस्सा या आक्रोश : यह आक्रोश जहाँ एक ओर सवर्ण व्यवस्था को लेकर है तो दूसरी ओर अपनी स्थिति, नियति और लाचारी को लेकर। यह आरोपपत्र भी है और मांगपत्र भी।” वहीं शरण कुमार लिम्बाले अपने संग्रह का नाम दलित ब्राहमण  रखते हैं। इस संग्रह कीआत्मकथा नामक कहानी में लिम्बाले लिखते हैं “दलित साहित्य पर बेहिसाब बहसें हो रही हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं की बड़ी प्रसिद्धि हो रही है। कोई एक आत्मकथा प्रकाशित हो जाती है और रातोंरात वह लेखक महान बन जाता है। उसे पुरस्कार मिलने लगते हैं। उसके सत्कार-समारोह संपन्न होते हैं। उसकी तारीफ़ में लेख छपने लगते हैं। फिर शासन की समितियों में उसकी नियुक्ति होने लगती है। उसकी पोशाक बदल जाती है। उसकी भाषा बदल जाती है। उसका रहन-सहन बदल जाता है।जो लिखता है लेखक बन जाता है।” यहाँ लिम्बाले जिस प्रवृति का ज़िक्र कर रहें हैं यह प्रवृति किसी भी साहित्य के लिए घातक है। अफ़सोस; आजकल ऐसी ही प्रवृतियों की चपेट में रचनाएं और रचनाकार दोनों हैं।
इससे कतई इनकार नहीं कि साहित्य की बहुजन धारा ने कई कड़वे सच से पर्दा हटाकर एक ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज़ की, नई बहसों को जन्म दिया। किन्तु तमाम वर्गों, वर्णों, समुदायों, संप्रदायों आदि में विभक्त बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज में आज बहुजन हिताय के संघर्ष को सर्वजन हिताय में परिवर्तित कर उसकी सार्थकता के दायरे का और ज़्यादा विस्तार हो तो क्या कुछ गलत होगा? क्या इसी में साहित्य और समाज की भलाई नहीं है? एक मठ का जवाब एक और मठ नहीं हो सकता। जिस मानसिकता के विरुद्ध यह आंदोलन खड़ा हुआ वही मानसिकता अगर इसे अपनी चपेट में ले ले इससे दुखद बात और क्या हो सकती है। दुखद है कि आज वैसे लोगों की कमी नहीं जो दलित-आदिवासी के नाम पर ‘अपनी डफली-अपना राग’ अलाप रहे हैं।

हम किस वर्ग-समुदाय के हैं से ज़्यादा ज़रुरी सवाल यह है कि रचनाकर्म का उद्देश्य और रचनाकार की मानसिकता क्या है और इससे किसको लाभ मिल रहा है। संघर्ष मानसिकता से होना चाहिए।जाति से जाति, समुदाय से समुदाय का संघर्ष किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति का मूल लक्ष्य हो भी नहीं सकता और यदि होता है वो वह अमानवीय है। इस अमानवीयता के खिलाफ़ संघर्ष ही मानव और मानवीय अभिव्यक्तियों का अंतिम लक्ष्य हो सकता है और मानवीय कला-साहित्य की सार्थकता भी। डॉ. अम्बेडकर का सन्देश था “बड़ी कठनाई के साथ इस कारवां को यहाँ तक लाया हूँ, इसे आगे बढ़ाना। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो इसे यहीं छोड़ देना, पीछे न धकेलना।” 

Thursday, July 31, 2014

प्रेमचंद रंगशाला, प्रेमचंद गोलंबर और प्रेमचंद जयंती

इसमें कोई संदेह नहीं कि मुंशी प्रेमचंद के नाम पर ही पटना के राजकीय प्रेमचंद रंगशाला का नामांकन किया गया है । रंगशाला से सटे एक चौराहा है । इस चौराहे को प्रेमचंद गोलंबर कहते हैं । इस गोलंबर के एक तरफ़ मोइनुल हक स्डेडियम है और दूसरी तरफ़ प्रेमचंद रंगशाला । गोलंबर के बीचो-बीच मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति लगी है । कहा जाता है कि पटना शहर के संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों आदि के मांग पर यह मूर्ति स्थापित हो पाई थी । लोग तो यह भी कहते हैं कि एक बार किसी कार्यक्रम में प्रेमचंद के पुत्र और साहित्यकार अमृतराय पटना आए हुए थे । उन्होंने इस बात पर राय ज़ाहिर करते हुए कुछ ऐसा वक्तव्य दिया था कि एक बेटे के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है कि वो अपने पिता की मूर्ति लगाने की मांग सरकार से करे ।
अमृतराय पटना कब आए थे और उन्होंने ये बातें कब और कैसे कही थी, यह बात कही भी थी कि नहीं, इस बारे में कोई सटीक जानकारी कम से कम मेरे पास नहीं है । यह सुनी सुनाई बातें हैं । जो सच हो भी सकतीं हैं और मनगढंत भी हो सकता है । बहरहाल, आज भी प्रेमचंद की मूर्ति के नीचे एक पट्टिका लगी है जिस पर यह अंकित है कि “उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की इस प्रस्तर प्रतिमा का अनावरण 8 अक्टूबर 1980 को महादेवी वर्मा ने किया । संयोजक साहित्यकार रमण” । गोलंबर चारो तरफ़ से लौह-उक्त दीवार से घिरा है और प्रवेश द्वार अमूमन सालों भर बंद ही रहता है । इसकी देखरेख का ज़िम्मा किसके ऊपर है, पता नहीं । वैसे गांधी मैदान की दीवार भी ऊँची कराई गई है और उसमें लोहे के भाले लगाए जा रहे हैं और सुना है कि वहां भी ताला लगनेवाला है । आनेवाले दिनों में यह भी हो सकता है कि गांधी मैदान में घुसने लिए कीमत अदा करना पड़े ! रूपक, अप्सरा, उमा सहित कई सिंगल स्क्रीन के सिनमाघरों में ताले तो झूल ही रहे हैं ।
31 जुलाई 2013, यानि प्रेमचंद की जयंती का दिन । बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ़ समस्त संस्कृतिकर्मी का आन्दोलन चल रहा था । 31 जुलाई को प्रेमचंद रंगशाला चलो का आह्वान किया जा चुका था । तय हुआ कि 30 जुलाई को प्रेमचंद गोलम्बर की सफ़ाई भी की जाय । तय कार्यक्रम के अनुसार कुछ संस्कृतिकर्मी प्रेमचंद गोलम्बर के अंदर झाड़ू और कुदाल लेकर घुस गए और गोलंबर के अंदर से पौधों, लत्तर, दारु की बोतलें, फटे पुराने कपड़े और पता नहीं क्या-क्या को निकल-निकालकर बाहर जलाने और फेंकने लगे । कूड़ा और गन्दगी इतनी ज़्यादा थी कि अपनी तमाम चाहतों के बावजूद संस्कृतिकर्मी आगे का आधा भाग ही साफ़ कर पाए । लगता था जैसे वर्षों से यहाँ सफाई नहीं हुई थी ! गोलंबर के अंदर दो पोल गड़े थे । इन पोलों पर अनगिनत विज्ञापनों के बैनर टगें पड़े थे, जिसे संस्कृतिकर्मियों ने डंडे से खींच-खींचकर हटाया । सफाई के पश्चात बगल से पानी लाकर गोलंबर की धुलाई की गई । मुंशी जी की मूर्ति की भी सफाई हुई जो उजाले से काले रूप में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर था ।
दूसरे दिन यानि 31 तारीख की सुबह संस्कृतिकर्मी जब माल्यार्पण के लिए पहुंचे तो पाया कि कुछ लोग पहले से ही उस जगह पर कब्ज़ा जमा लिया है और मुंशी जी की मूर्ति पर गेंदे की मालाओं का ढेर लगाने के पश्चात् उपस्थित छात्रों को मुंशी प्रेमचंद के बारे में बड़े गर्व से व्याख्यान भी चल रहा था । आसपास गाडियां शोर मचाती निकाल रही थीं और संस्कृतिकर्मी सोच रहे थे कि वो लोग हटें तो हम भी मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करें । किन्तु उपस्थित सज्जनों के मिज़ाज को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था कि वो जल्द हटानेवाले हैं । अन्तः संस्कृतिकर्मी किसी प्रकार माल्यार्पण करके प्रेमचंद रंगशाला की ओर चल पड़े जहाँ दिन भर सांस्कृतिक प्रतिरोध होना था । इस पूरे आयोजन में पटना के कुल दो साहित्यकारों ने शिरकत की और बिहार संगीत नाटक अकादमी को तो प्रेमचंद से कोई सरोकार ही नहीं । ज्ञातव्य हो कि पटना के संस्कृतिकर्मी हर साल प्रेमचंद की जयंती मनाते रहे हैं ।
प्रेमचंद गोलंबर की आधी सफाई करते-करते संस्कृतिकर्मियों में सो कोई मज़ाक में बोल उठा कि गोलंबर की आधी सफाई तो हमने कर दी बिहार संगीत नाटक अकादमी और संस्कृति-साहित्यिक-जनवादी विभागों और दलों की सफाई कौन करेगा ? 

Tuesday, August 27, 2013

कथाकार मधुकर सिंह एक सपना देखते हैं.

मधुकर सिंह 
वैसे तो हिंदी साहित्य में रुचि रखनेवाले लोग मधुकर सिंह के नाम से भली भांति परिचित होगें ही फिर भी संभव है कि कुछ लोग यह सवाल करें कि ये कौन हैं बिहार के भोजपुर जिला के धरहरा गाँव के निवासी मधुकर सिंह कई प्रसिद्ध कहानियां और उपन्यास लिख चुके हैं. 2 जनवरी, 1934 को बिहार के एक ग्रामीण अंचल में जन्मे मधुकर सिंह की प्रमुख कृतियां पूरा सन्नाटाभाई का जख्मअगनुकापड़पहला पाठमाई (कहानी संग्रह)सबसे बड़ा छल, ‘सोनभद्र की राधासीताराम नमस्कारसहदेव नाम का इस्तीफाजंगली सूअरमनबोध बाबूबेमतलब बदनाम ज़िन्दगियाँउत्तरगाथाआगिन देवी (उपन्यास) तथा सन् साठ के बाद की कहानियॉंग्राम्य जीवन की श्रेष्ठ कहानियॉं का संपादन सहित कई नाटक भी इनके नाम हैं. लेखन के लिए कई सम्मान से सम्मानित भी हैं. देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी है. इस बार नामक पत्रिका का संपादन भी किया.
यही मधुकर सिंह पिछले कई साल से लापता ज़िंदगी जी रहे थे. एकाएक राजभाषा विभाग द्वारा जोहांसबर्ग में आयोजित हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने के लिए इनके नाम का चयन किया जाता है और अधिकारीगण मधुकर सिंह नामक व्यक्ति की खोज में निकाल पडतें हैं. तमाम खोजबीन करने के बाद जब ये मिलते हैं तो पता चलता है कि इनकी हालत विदेश क्या किसी भी यात्रा के लायक नहीं है. आगे की कथा आप मधुकर सिंह की ही ज़ुबानी सुनिए – “मैं सात साल से बिस्तर पर पड़ा हूं. पैसे के अभाव में इलाज नहीं हो पा रहा है. मैं साहित्यकार हूं. भारत का प्रतिनिधित्व भी करना चाहता हूं. लेकिन साहित्यकारों को आज पूछ कौन रहा है. केवल हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही साहित्यकारों को सरकारें याद करती हैं. यदि मेरी खोज-खबर राज्य सरकार ने पहले की होतीतो आज मैं विदेश जाने में सक्षम होता. सरकार विदेश भेजने के प्रक्रम में जो राशि मुझ पर खर्च करना चाहती हैवह मुझे दे दे. ताकि मैं अपना इलाज करा सकूं.
इस घटना के बाद जब मीडिया ने बिहार के कुछ साहित्यकारों के मुंह से बात निकलवाई तो बेचारे प्रगतिशीलता का मुखौटा ओढने की मजबूरी से कैसे बच सकते थे. झट से व्यवस्था और समाज को कोसने लगे ये भूलकर कि स्वयं इन्होनें भी इतने सालों में मधुकर सिंह की कोई खोज खबर नहीं ली. कुछ नहीं तो कम से कम मधुकर जी के ये महान समकालीन प्रगतिशील मित्रगण इनके बारे में एक आलेख तो लिख ही सकते थे या किसी प्रकार की कोई अपील कर हिंदी साहित्य जगत और आम जन से कोई मदद तो मांग सकते थे. पर लिखे तब न जब कुछ पता होकोई खोज खबर ली हो, और अगर पता होते हुए भी जिन्होंने चुप्पी साध रखी हो, वे किसी मिट्टी के बने हैं, वही बता सकते हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि सब जैसे हाथ में गेंदे का फूल लेकर लोगों के मृत्यु का इंतज़ार कर रहे हों, ताकि तस्वीर पर पुष्प अर्जित करते इनकी तस्वीर अखबारों में छपे. क्या श्रद्धांजलि सभाओं में मरनेवाले से जुड़े संस्मरणों को सुनाने में इन जैसे साहित्यकारों को शर्म नहीं आनी चाहिए ? कहा जाता है कि कला और साहित्य समाज का दर्पण होते हैं और कलाकार, साहित्यकार दुनियां की सबसे संवेदनशील विरादरी होती हैं. जिस समाज के साहित्यकारकलाकार इतने संवेदनहीन हों वहाँ कैसी कला और साहित्य की रचना होगी इसका अनुमान आराम से लगाया जा सकता है. जब हमारे अंदर इतनी भी संवेदना नहीं है तो क्या कला और क्या साहित्य ! दुनिया में परिवर्तन जब होना होगा तब हो जायेगा पर संवेदनशीलता, प्रगतिशीलता आदि का दावा करनेवाले लोग आज कहाँ हैं और क्या कर रहें हैं ?
पटना के अखबारों में इससे संबंधित सूचना प्रकाशित हुई तो मदद के नाम पर कुछ खानापूर्ति भी हो गई. निश्चित रूप से कुछ लोग ऐसे भी होंगें ही जो तहे दिल से मधुकर सिंह की मदद में लगे होंगें. मुझे उनकी जानकारी नहीं है. ब्लॉग और फेसबुक पर इनको लेकर कुछ लोगों ने चिंताएं ज़ाहिर की हैं और मदद की गुहार भी लगाई है. एक ब्लॉगर ने सहायता के लिए इनका बैंक एकाउंट भी डाला है. किसने कितनी सहायता की, की भी या नहीं मुझे इसकी जानकारी नहीं है. मैं एक रंगकर्मी हूँ, मधुकर को कई साल पहले पटना में नाटक व साहित्यिक आयोजनों में आते जाते देखा है. व्यक्तिगत रूप से हम एक दूसरे से परिचित नहीं हैं, ना ही उनसे मेरा कोई सीधा संपर्क ही है.  
सरकारों की बात क्या करे कोई ! सरकारें ऐसे मामलों में कितनी संवेदनशील है ये बात किसी से छुपी नहीं है. ज़्यादा दवाब होगा तो भिखारी की तरह चंद रुपये फेंककर मुक्त हो जायेगी या जुगाड़ होगा तो कोई सम्मान पकड़ा देगी. मात्र पेट चलाने के लिए किसी कलाकार व साहित्यकार को कैसे-कैसे काम करने पडते हैं, यह हम सब जानते हैं. आज़ादी और प्रजातंत्र के बड़े-बड़े दावे के बीच कला और साहित्य की सेवा करते हुए कितनो का पेट भरा है ? आज देश के कितने मंत्री, विधायक, अधिकारी को कला-संस्कृति-साहित्य की चिंता है ? कला-साहित्य के बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों में पैसे का बंदरबांट के अलावा होता क्या है ? जिन कलाकार, साहित्यकार का जुगाड़ है वो सालों भर मलाई का मज़ा लें, किसी को कोई आपत्ति नहीं ! बाकि जाएँ भाड़ में ! अभी पिछले दिनों हिंदी दिवस के मौके पर झारखण्ड के विधायकों से उनकी व्यक्तिगत रुचि जानने के लिए उनके पसंदीदा लेखक का नाम बताने को कहा गया तो अधिकतर लोगों ने प्रेमचंद का नाम बताकर खानापूर्ति भर करके किसी प्रकार अपनी जान बचाई.
बहरहाल, वर्तमान में मधुकर सिंह पैरालिसिस से ग्रस्त हो अपने गांव में रह रहे हैं और तमाम उपेक्षाओं और शारीरिक कष्टों के बावजूद अपनी आत्मकथा ‘आवारा मसीहा का सफरनामा’ लिखने की कोशिश में लगे हैं. सिजोफ्रेनिया नामक बिमारी से पीड़ित महान गणितग्य वशिष्ट नारायण सिंह का हाल भी किसी से छुपा नहीं है. वर्तमान में वे अपने गाँव (बसंतपुर, भोजपुर) में परिवार के सहारे किसी तरह जीवनयापन रहें हैं. भारतीय सिनेमा की अज़ीम-ओ-शान फिल्म मदर इंडिया में ज़मींदार की ये छोटी-सी भूमिका निभाने वाला अभिनेता संतोष कुमार खरे लखनऊ की सड़कों पर और भिखारी ठाकुर जैसे भारतीय पारंम्परिक रंगमंच के अग्रणी कर्ता के नाट्य दल का एक सदस्य सीताराम पासवान भीख मांगकर गुज़ारा करने को अभिशप्त हैं. वो ज़िंदा भी हैं या नहीं ये जानने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं. ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं.
आम जनता सहित, पता नहीं कितने साहित्यकाररंगकर्मीलोक-कलाकारसमाजसेवी आदि आज इस प्रकार की ज़िंदगी जीने को अभिशप्त हैं. कम से कम इनकी खोज खबर लेते रहने का नैतिक दायित्व के निर्वाह करने की चेष्ठा तक अब नहीं रही ? क्या आज हम इतने मजबूर हैं कि केवल हाथ पर हाथ धरे और कभी-कभार फेसबुक और ब्लॉग पर ज़िक्र भर कर देने के सिवा कुछ नहीं कर सकते ? ये मानने को दिल नहीं करता कि हम सच में इतने मजबूर हैं. हाँ, ये माना जा सकता है कि हमारी संवेदना को किसी की नज़र लग गई है, शायद अपनी ही. तभी तो ऐसी बातें भी हमें उद्वेलित नहीं करती. या करती भी हैं तो हम कुछ खास नहीं करते. हम अपने लिए जब संघर्ष करने से कतराने लगे हैं तो दूसरों और समाज के लिए क्या खाक लड़ेंगें. हम व्यक्तिगत सच से ही भय खा जाते हैं सामाजिक सच तो दूर की बात है. शर्मनाक है. साथ ही जिस देश का साहित्यकार, कलाकार भूखो मरने को अभिशप्त है वहां कला-साहित्य के बड़े-बड़े जलसों के नाम पर उत्सवधर्मिता इनकी हालत और गरीबी का मजाक नहीं तो और क्या है और हमारा मौन एक प्रकार से सहमति और मजबूरी का ही घोतक है. इस खतरनाक मौन का नाश हो. खैर, मधुकर सिंह एक सपना देखते हैं कि उन्हें साहित्य अकादमी की ओर से दस लाख का पुरस्कार मिला है और पुरस्कार समारोह में शीला दीक्षित भी हैं.

Friday, February 8, 2013

महुआ माजी प्रकरण के साये में...

मनुष्य स्वभाव नापसंद बात को सदा झूठी मान लेना चाहता है, और इसके बाद इसके खिलाफ़ दलीलें भी आसानी से तलाश कर लेता है | इस प्रकार समाज जो बात नहीं मानना चाहता, उसे झूठी बताता है | - सिगमंड फ्राइड जनरल इंट्रोडक्शन टु साईको एनैलिसिस’.

मौखिक इतिहास ये प्रमाणित करता है कि साहित्यिक फिजाओं में महुआ माजी विवाद काफी अरसे से गुलज़ार था | पाखी नामक पत्रिका ने अपने दिसम्बर अंक से इसे शब्दों में कैद करने का काम किया है | पर इसका असली श्रेय शायद नया ज्ञानोदय को जाना चाहिए | यह कितना सही, गलत हौसले का काम है इस पर तत्काल कोई भी राय देना उचित नहीं | सारे आलेख पढ़ने के पश्चात् जो एक बात समझ में आती है वो ये कि यहाँ साहित्य सेवा की भावना उतनी नहीं है जितनी की दिखाई जा रही है | एक दूसरे के खिलाफ़ जमके शब्दों के बाण चलाये जा हैं | बकौल फ्राइड शब्दों द्वारा एक आदमी दूसरे को अधिक से अधिक सुख भी पहुंचा सकता है और उसे घनी से घनी निराशा में भी डाल सकता है; शब्द भावों को जगातें हैं |
तर्क और अपना पक्ष रखने के नाम पर एक दूसरे को शब्दों के माध्यम से ललकारा जा रहा हैं | एक ऐसा वाक् युद्ध चल रहा है जहाँ हर चीज़ जायज है | इस महाभारत में राँची के कुछ बुद्धिजीवियों ने बलराम ( तटस्थ ) बनना स्वीकार कर लिया है तो कुछ इतने ज़्यादा उत्तेजित हैं जैसे आज ही धर्म की स्थापना कर देंगें | खैर, समय लिखेगा सबका इतिहास | वैसे छोटे शहर की अपनी ही विडम्बना और पीड़ा होती है |
जब हम किसी चीज़ से तटस्थ होने का निर्णय करतें हैं तो क्या हम सच में तटस्थ होते हैं या कोई भय अथवा सुविधा है जो हमें तटस्थ होने पर मजबूर करती है ? यह भय मर्यादा रुपी भी हो सकता है और लिहाज रुपी भी ! यह कहना पूर्णसत्य नहीं होगा कि महुआ माजी प्रकरण फालतू, गैरसाहित्यिक और निहायत ही व्यक्तिगत विछोभ से पैदा हुआ है | साहित्य और समाज का रिश्ता समय के हिसाब से बदला है | साहित्यिक संगठन कमज़ोर पड़े हैं वहीं आज का साहित्य केवल लेखक-पाठक संबंधों पर ही केंद्रित नहीं है | यह एक व्यवसाय भी है और इस बात की खुलेआम घोषणा करनेवाले प्रकाशक भी है कि लेखक की मार्केटिंग करना प्रकाशक के काम का हिस्सा है | मार्केटिंग में क्या-क्या तत्व आतें हैं यह कौन तय करेगा ? जवाब साफ़ हैप्रकाशक ! आपका पैसा है, आपका पुरस्कार और आपका प्रकाशन, तो जो आप समझतें हैं, कीजिये |” साहित्य में मार्केट या मार्केट में साहित्य, दोनों में से कौन ज़्यादा साहित्यिक होगा ? प्रकाशक की निगाह में सारे लेखक बराबर नहीं हैं | खैर हिंदुस्तान के सन्दर्भ में कला और साहित्य में मर्यादा की सीमा से लेकर क़ानून तक अभी बहुत कुछ तय होना बाकी है |
यह पूरा प्रकरण जिस तरह से चल रहा है वो शरद जोशी का नाटक अन्धों का हाथी की याद दिलाता है जिसमें हर किसी का अपना-अपना सच होता है | पर सामूहिक सच कई सारे व्यक्तिगत सच को मिलाकर ही बनेगा, अकेले नहीं | सच बहुआयामी होता है और सामूहिक सच तक पहुँचाना इतना आसान भी नहीं है |
इस प्रकरण की शुरुआत नया ज्ञानोदय में राँची के ही एक साहित्यकार द्वारा महुआ माजी के दूसरे उपन्यास पर लिखी गई टिपण्णी से हुई, जिसमें मोड़ देने का काम पाखी के दिसम्बर अंक के आलेख ने किया | उसके बाद तो जैसे जंगल में आग लग गयी, पूरा माहौल ही मेलोड्रामानुमा हो गया जिसमें सत्य, असत्य, ईर्ष्या, जलन, द्वेष, अहम्, नक़ल, असल, सम्मान, असम्मान, आरोप, प्रत्यारोप, रूप, अरूप, सेक्स, स्त्री, पुरुष, भाषा, भाषी, इलाका, पक्ष, विपक्ष, शब्द, अपशब्द, जनवाद, माओवाद, प्रचार, चोरी, हिंसा, अहिंसा, इतिहास सबकी खिचड़ी तैयार होने लगती है, बिलकुल किसी मसालेदार फिल्म की तरह | यह किसी नाटक, उपन्यास, फिल्म का एक शानदार कच्चा माल है जिसमें सारे पत्र ग्रे शेड के होंगे, नायक-खलनायक-विदूषक के मापदंडों से परे, एकदम यथार्थवादी | वैसे भी वास्तविक चरित्रों का शेड ग्रे ही होता है | क्यों महुआ माजी का अगला उपन्यास इसी प्लॉट पर केंद्रित हो !
महुआ माजी प्रकरण किसी न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम डिबेट की तरह चल रहा है जहाँ सारे विद्वान अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं | यहाँ जो जितना ज़ोर से बोल सकता है वो उतना ही सच्चा जैसा लगता है | यहाँ कौन कितना सच बोल रहा है वो तो बोलनेवाला ही जाने पर इस विवाद को प्रकाशित करनेवाली पत्रिका आजकल राँची के लिए हॉट केक बनी हुई है | पाठक और साहित्यिक समाज दोनों आजकल पाखीमय है | लोग चटखारे लेकर इस व्यंजनयुक्त प्लेट का भरपूर रसास्वादन कर रहें हैं, करा रहें हैं | अच्छा है इसी बहाने साहित्यिक समाज का सच भी सबके सामने रहा है | दोस्तोयेव्स्की ने कहा था कि अगली शताब्दी में नैतिकता जैसी कोई चीज़ नहीं होगी | कहनेवाले ये भी कह रहें हैं कि दिल्ली के लोग झारखण्ड में मुर्गा लड़ाकर मज़ा ले रहें हैं जिसमें कुछ राँचीवासी भी भरपूर मदद कर रहें हैं |
शब्दों का कमाल इस्तेमाल तो पहले से ही आलेखों में हो रहा था इस बार महुआ माजी के जन्मदिन ( उम्र) तक का खुलासा ( ब्रेकिंग न्यूज़ ) है ( हद है !) साथ ही यशपाल की एक कहानी का अंश भी है जहाँ से महुआ माजी पर अपने उपन्यास में एक प्रकरण कॉपी करने का आरोप है | महुआ माजी ने साहित्यिक पंचायत की बात कही तो स्टिंग ऑपरेशन, गुप्त कैमरे, ब्रेन मैपिंग तक की बात भी होने लगी | शुक्र है किसी ने सच का सामना ( एक लोकप्रिय टेलीविजन शो ) और पुलिस की थर्ड डिग्री के इस्तेमाल की बात नहीं कही | आश्चर्य नहीं होगा कि किसी दिन राँची की सड़कों पर साहित्यिक युद्ध का ऐलान हो जाए ! आक्रमण !!
इस बार महुआ माजी प्रकरण पर कुछ पाठकों ने भी राय व्यक्त की है | पाठक क्यों पीछे रहें भला ? बहरहाल, इस प्रकरण के मद्देनज़र धर्मवीर भारती लिखित नाटक अंधायुग की कुछ पंक्तियाँ याद रहीं हैं -
टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा
यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है
यह अजब युद्ध है नहीं किसी की भी जय
दोनों पक्षों को खोना ही खोना है
अन्धों से शोभित था युग का सिंहासन
दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा
दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन...
विष उगलने से कोई नीलकंठ नहीं होता, नीलकंठ होने के लिए विष का पान करना पड़ता है | बात हो, जमके हो पर व्यक्ति केंद्रित नहीं, प्रवृति केंद्रित | तभी इस उथल-पुथल से कुछ सार्थक चीज़ें निकल पाएंगी वरना भूकंप केवल तबाही मचाता है कुछ नया नहीं रचता | तत्काल यहाँ कड़वाहट के सिवा किसी के भी हिस्से में कुछ नहीं रहा | इस पूरे प्रकरण में रसास्वादन करना स्वस्थ मानसिकता का परिचायक नहीं है और राँची ऐसे रोग के इलाज के लिए प्रसिद्ध है |
शैलियरी और मोज़ार्ट के रिश्ते पर पिटर शैफर का एक विश्वप्रसिद्ध नाटक है एमेडियस, जिस पर मिलोन फिर्मन ने इसी नाम से एक विश्वप्रसिद्ध फिल्म का निर्माण किया | जिसमें शैलियरी अपने सपने और ईर्ष्यावश मोज़ार्ट को मार तो देता है किन्तु मोज़ार्ट के संगीत से हार जाता है और विक्षिप्त जैसा हो जाता है | फिल्म की शुरुआत में ही बूढा शैलियरी आत्महत्या की कोशिश करता है, उसे उठाकर ले जाया जा रहा है रास्ते में शैलियरी देखता है कि लोग मोज़ार्ट के धुन पर नाच रहें हैं | किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि चालीस ऑपेराओं के लेखक महान रॉयल संगीतकार शैलियरी आज किस हालत में है | उम्मीद है यहाँ ऐसा कुछ नहीं चल रहा होगा |

विवाद निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है http://www.pakhi.in

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...