Wednesday, January 24, 2018

हिंदी रंगमंच की मूल समस्या !!!

हिंदी रंगमंच की मूल समस्या उसका गैरपेशेवर चरित्र है। दूसरे किसी भी पेशा को लीजिए, उस पेशे को अपना व्यवसाय बनानेवाला व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा वक्त उस पेशे में देता है और उस पेशे को व उस पेशे के लिए ख़ुद को बेहतर से बेहतर बनाने का प्रयत्न करता है।
जाड़ा हो, गर्मी हो, बरसात हो : एक चाय बेचनेवाला इंसान सुबह 6 बजे से पहले अपनी दुकान पर आ जाता है और देर रात तक चाय बेचता रहता है, तब वो उस पेशे से अपना और अपने परिवार का किसी प्रकार भरण-पोषण कर पाता है। वो पैसे के लिए सरकार या किसी और के पास हाथ नहीं फैलाता, किसी अड्डे पर जाकर समय काटने के लिए घंटे भर फालतू के गप्पें नहीं मरता बल्कि जो कुछ भी कमाना होता है, अपने पेशे से कमाता है। जितना भी वक्त बिताना होता है अपने पेशे के साथ बिताता है। दुनियां का वो कोई भी इंसान जो पेशेवर है उसके पास फालतू का वक्त होता ही नहीं। यहां तो आलम यह है कि फालतू के वक्त में से एकाध घंटे नाटक-वाटक भी कर लिए। 
कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी का अधिकार रंगकर्मी व्यवहारिक रूप से दिनभर में रोज़ 2 घंटे भी अपने पेशे को नहीं देता। ना ढंग का कोई अभ्यास करता है, ना प्रशिक्षण में रुचि है (बल्कि प्रशिक्षण और प्रशिक्षित लोगों के प्रति हेय दृष्टिकोण है) और ना ही शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास में (बल्कि अज्ञानता का घमंड है) : बस कुछ जुगाड़ और जोड़-तोड़ करके साल में जैसे-तैसे कुछ नाटक खेलना है। मेरा नाटक तुम देखो, तुम्हारा नाटक हम देखेंगे। मेरे नाटक में ताली तुम पीटो, तुम्हारे में हम पीटेंगे! मुझे तुम पुरस्कार दो, हम तुम्हें पुरस्कृत करेगें। अपने नाट्योत्सव में तुम हमें बुलाओ, हम तुम्हें बुलाएगें। तुम हमें महान घोषित करो, हम तुम्हें महानता का तमगा देगें। और कोई एकाध अगर कुछ थोड़ा बहुत बेहतर करने की चेष्टा कर रहा है तो उसे कुज़ात घोषित कर दो और ऐसे माहौल बना दो कि मानसिक टॉर्चर होता रहे। इससे क्या हासिल होगा - आत्ममुग्धता, कुछ तालियां, कुछ गालियां और कुछ झूठी - सच्ची हाय-हाय, वाह-वाह के सिवा ?
इस दृष्टिकोण को दूर कर पेशेवर बनने की दिशा में प्रयास होना चाहिए। जानता हूँ इसमें बहुत वक्त लगेगा लेकिन पूरी ईमानदारी से गंभीरतापूर्वक प्रयास हुआ तो कुछ भी असंभव नहीं। भले ही हम अपने लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाएं लेकिन हम भावी पीढ़ी के लिए एक सुंदर जगह ज़रूर छोड़ जाएगें जहां वो बड़ी आसानी से रंगमंच को अपना पेश बना सकते हैं। 24 घंटे में किसी तरह 2 घंटे रंगमंच करने को रंगमंच करना नहीं कहते। यह बदलाव रंगमंच को पेशा बनानेवाले लोग ही कर सकते हैं, इसे शौकिया तौर पर करनेवालों का इसमें कोई रुचि नहीं है और हिंदी रंगमंच व्यवसायिक हो ही नहीं सकता का जाप भी करने लगेंगे क्योंकि उनकी दाल-रोटी, चिकन-मटन, घर-गाड़ी का जुगाड़ कहीं और से हुआ रहता है। प्रसिद्द जर्मन कवि रिल्के कहते हैं - "अपनी सारी इच्छाओं और मूल्यों कला को अपना आप समर्पित किए बिना कोई भी व्यक्ति किसी ऊंचे उद्देश्य तक नहीं पहुंच सकता। मैं कला को एक शहादत की तरह नहीं - एक युद्ध की तरह मानता हूं जहां कुछ चुनिंदा लोगों को अपने और अपने परिवेश के विरुद्ध लड़ना है ताकि वे शुद्ध मन से उच्चतम उद्देश्य तक पहुंच सकें और अपने उत्तराधिकारियों को खुले हाथों से यह सम्पदा सौंप सकें। ऐसा करने के लिए एक इंसान के समग्र जीवन की ज़रूरत है न कि थकान से भरे कुछ फुर्सती घंटों की।"
इसलिए चाहे जैसे भी हो, रंगमंच को पेशा और पेशा को पेशेवर बनाने की ओर प्रयास होना चाहिए। कुछ चुनिंदा लोगों के गालों पर लाली और पेट पर चर्बी और एकाउंट में चंद रुपए आ जाने को पेशेवर होना नहीं कहते।
दूसरे का इंतज़ार मत कीजिए क्योंकि इस देश की एक और समस्या यह है कि यहां लगभग हर व्यक्ति दूसरे को बदलने में लगा है ख़ुद को नहीं। तो क्यों ना ख़ुद से ही शुरुआत हो और जो भी मुसीबत आए उससे सीना तानकर भीड़ जाया जाय। जो होगा देखा जाएगा; वैसे भी कौन सा भला हो रहा है ? रंगमंच का समृद्ध इतिहास का जाप किस काम का है, वो तो चटनी बनाने के भी काम नहीं आएगा !

Sunday, January 21, 2018

अघोरी : जो घोर नहीं बल्कि सरल हैं।

भारत एक बहुलतावादी संस्कृति का देश है। यहां पग-पग पर पानी और वाणी बदल जाता है। कोई अगर किसी एक संस्कृति को ही भारतीय संस्कृति मानता है तो यह उसकी मूढ़ता है या फिर वो बाकियों में मूढ़ता का प्रचार करके अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहता है। नफ़रत के बीज के पोषक अमूमन यह कार्य करते हैं।
इस मुल्क़ में बहुत से समुदाय एकदम भिन्न हैं। इन समुदायों के बारे में तथाकथित सभ्य समाज की जानकारी बहुत ही कम है और वो अमूमन उन्हें हीन भावना से भी देखता है। वैसे बिना जाने समझे पूजने या नफ़रत करने की एक समृद्ध भारतीय परम्परा रही है। विचार और व्यवहार का फर्क समझने की शक्ति तो कमतर है ही। हम कुतर्क करना तो बख़ूबी जानते हैं लेकिन मिथ्या भाषण या प्रचार और व्यवहारिक कार्य में फ़र्क को बड़ी मुश्किल से ही समझ पाते हैं। हमें ज्ञान के बजाय मूढ़ता का ही गुमान होता है और इसी मूढ़ता का फ़ायदा चंद चालक लोग बड़ी ही आसानी से उठा लेते हैं। बहरहाल, बात तो रही थी सांस्कृतिक भिन्नता की तो एक समुदाय है मसान योगियों का।
जो मशान जगाता (कम से कम मान्यता तो यही है) है उसे मशान जोगी कहते हैं। हम अमूमन इन्हें अघोरी के नाम से जानते हैं और इनसे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि काल भैरव के ये उपासक तंत्र-मंत्र के काली विद्यायों में महारत हासिल रखते हैं। वैसे ऐतिहासिक रूप से इन योगियों की उत्पत्ति हैदराबाद के पूर्व निजाम के शासनकाल में माना जाता है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से अंत्योष्टि से जुड़े धार्मिक कर्मकांड करनेवाला वर्ग माना जाता है। श्मशान ही इनका ठिकाना होता है और इनका जीवन दान-दक्षिणा से ही चलता है। श्मशान के उपासक मसान योगी श्मशान के देवता माने जाते हैं। ये ज्वालामुखी (चिता) की आग का इस्तेमाल करते हैं, इसीलिए कुछ समय पहले तक रसोई की आग इनके लिए पूर्णतः प्रतिबंधित थी। वैसे इनको लेकर आज भी एक रहस्यमय वातवरण ही है। वर्ष 2011 की जनगणना में इनकी कुल संख्या 27,000 दर्ज़ की गई है। वैसे बदले समय में इस समुदाय के कुछ लोग अब आम ज़िन्दगी का हिस्सा भी बनने लगे हैं।
इस समुदाय के बारे में आज भी कई तरह की भ्रांतियां हैं। जिसका मूल आधार धर्म और अंधविश्वास ही है। अब एक भ्रांति यह है कि ये श्मशान को जागृत करते हैं और ये अपनी शक्ति से मृत व्यक्ति को भी जीवित कर सकते हैं। तंत्र-मंत्र साधना भी इनकी क्रियायों में शामिल हैं। जिसका लाभ किसको कैसे मिलता है, यह एक विचित्रता भरी परिकल्पना है। बहरहाल, इनके अनुसार शमशान को निम्नलिखित दस प्रकारों से जागृत किया जाता है -सफेदा ,यमदंड, सुकिया, फुलिया, हल्दिया कमेदिया, कीकिचिया, मिचमिचिया, सिलासिलिया, पिलिया। ये नाम उन 10 शक्तिशाली प्रेत शक्तियों के हैं जो कि शमशान साधना के अधिपति होते हैं। इनकी मान्यता के अनुसार इन्ही प्रेत शक्तियों के बल के माध्यम से श्मशान की ख़ामोशी में अभिचार कर्म, भूतप्रेत , पिशाच, बेताल, भैरव, आदि के मंत्र सिद्ध किये जाते हैं।
इनके अनुसार शमाशान के सेनापति महिषासुर और धूम्रलोचन को माना जाता है और मुख्य गणश्मशान भैरव और रक्त चामुण्डा काली होती है। वैसे और मशान वीरों की भी सिद्धि की जाती हैं जिनका स्वरुप घनश्याम, भयानक, दीर्घ देह, बड़े बड़े केश और सघन बड़ी लोम्राशी, हाथ में वज्र और पाश, नग्न पाद, चमड़े की लंगोट धारण किये हुए है। ये दुनियां के बने बनाए नियम नहीं मानते और निषिद्ध से निषिद्ध चीज़ों को अपने भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।
ये कई प्राकर के विचित्र साधना करते हैं। इनके अनुसार अघोर साधना, काल भैरव साधना, श्मशान जागरण साधना, आसन कीलने की साधना, उग्र काली साधना, 52 भैरव और 52 वीर और 56 कलुवा वीरों की  साधना, महाउग्र तारा साधना, श्मशान काली साधना, मरघट चंडी साधना, तांत्रिक षट्कर्म आदि श्माशान में की जाने वाली प्रमुख साधनाएं है। इनके अतिरिक्त वीर साधन एक अति महत्वपूर्ण साधना है।
फिल्मों, सीरियलों, दंतकथाओं आदि ने इनके बारे में इतने डरवाने छवि प्रस्तुत किए हैं कि किसी भी साधारण इंसान को इनके आस पास फटकने में भी भय घेर लेता है लेकिन कुछ समय इनके पास गुजारिए तो इनके आसपास रचा झूठ का तिलिस्म खंडित होने लगता है और पता चलता है कि ये भी हम और आपकी तरह एक साधारण मानव ही हैं और बड़े-बड़े तंत्र-मंत्र जानने और विचित्र-विचित्र कार्य को सम्पन्न करने का दावा प्रस्तुत करनेवाले इन अजीब वेशभूषा धारियों के आडम्बर के नीचे एक साधारण मानव का ही निवास है। वैसे भी अघोर का अर्थ समझाते हुए एक अघोरी कहते हैं - जो घोर नहीं बल्कि सरल हो।

Monday, November 13, 2017

पद्मावती : नकली आहत भावनाएं

जो समाज जितना ज़्यादा डरा, सहमा, सामंती, नकली और कूढ़-मगज होता है; उसकी भावनाएं उतनी ज़्यादा आहत होती है। ज्ञानी आदमी कौआ और कान वाली घटना में पहले अपना कान छूता है ना कि कौए के पीछे दौड़ पड़ता है ।
फ़िल्म इतिहास की किताबें नहीं होती। कोई भी सिनेमा कितना भी ऐतिहासिक होने का दवा प्रस्तुत करे लेकिन वो पूर्णरूपेण ऐतिहासिक तो कदापि नहीं हो सकती। क्योंकि कोई भी कला चाहे वो कितना भी यथार्थवादी होने का भ्रम पैदा करे, यथार्थ और कल्पना के प्रयोग से जन्म लेता है। बिना काल्पनिकता का सहारा लिए किसी भी कला की उत्पत्ति संभव ही नहीं है, और फ़िल्म जैसी विधा का तो बिल्कुल ही नहीं। फ़िल्म का एक एक फ्रेम कल्पित किया जाता है और फिर अभिनय सहित कई अन्य माध्यमों से हर दृश्य में प्रभाव पैदा करने की चेष्टा की जाती है। इसलिए सिनेमा पूरी तरह से एक काल्पनिक माध्यम है। चरित्रों के नाम ऐतिहासिक रखना और कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को आत्मसाथ कर लेने मात्र से सिनेमा इतिहास की किताब नहीं हो जाती। जो लोग सिनेमा में इतिहास खोजते हैं वो मूढ़ हैं। इतिहास इतिहास की किताबों में खोजो, अगर किताबों से वास्ता हो तो। कुछ नहीं तो कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी भाषा में पद्मावत ग्रंथ रूप में लिखी है, वही पढ़ लिया जाए। यह गर्व नहीं बल्कि शर्म की बात है कि अपने इज़्ज़त(?) की रक्षा के लिए किसी देश में स्त्रियों को जौहर (ख़ुद को ज़िंदा जला देना) करना पड़े। क्या किसी ने कभी यह सुना है कि किसी मर्द ने जौहर किया हो या अपनी पत्नी से साथ सती/सता हो गया हो? तो क्या इज़्ज़त केवल औरतों के पास होती हैं और मर्द इज़्ज़त का घोषित रखवाला या लूटेरा होता है? वैसे पद्मावती का इतिहास मिलना मुश्किल है। 1540 में लिखित जायसी के काव्य में इनका ज़िक्र आता है लेकिन यह इतिहास है या मिथ, पता नहीं। वैसे भी जायसी खिलजी के 240 साल बाद इस काव्य की रचना कर रहे होते हैं। लेकिन एक ऐसे देश में जहां ऐतिहासिक प्रमाणिकता के बजाय मिथ और विश्वास का स्थान ज़्यादा पवित्र माना जाता है वहां तर्क से ज़्यादा भक्ति का राज चलता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भक्ति के लिए मनुष्य मूर्खता की पराकाष्ठा पार कर सकता है।
कोई भी फ़िल्म किसी ऐतिहासिक चरित्र, घटना आदि से जुड़ा नहीं कि इस देश में कोई ना कोई तबका हाय-हाय करने लगता है। इसीलिए आजतक इतिहास, ऐतिहासिक चरित्रों और घटनाओं पर अमूमन लोग फ़िल्म या कलात्मक अभिव्यक्ति से बचते हैं। भैंस के आगे कौन बीन बजाए!
वैसे दशरथ मांझी के ऊपर फ़िल्म बनी। निश्चित रूप से फ़िल्म एक फैंटेसी ही थी लेकिन किसी ने सुना कि माझी लोगों ने तलवार निकाल ली हो या फ़िल्म के ख़िलाफ़ कोई फतवा जारी किया हो या फ़िल्म के सेट को तोड़ा हो या कोट कचहरी के चक्कर लगाए हों। सच ही कहा है किसी ने कि रस्सी जल गई लेकिन ऐंठन नहीं गई। वैसे पता नहीं किस बात का ऐठन है? कई सौ साल मुगल राज किए, तो कई सौ साल अंग्रेज लूटते रहे देश को!!! आज भी भारत का लगभग पूरा मार्केट विदेशी कब्ज़े में है। सब इतने ही "सुपरहीरो" होते हैं तो फिर यह सब क्यों हुआ ?
वैसे इस फ़िल्म के ट्रेलर देखें हैं। एक से एक वाहियात डॉयलोग हैं। माना कि सिनेमा लार्जर देन लाइफ़ माध्यम है लेकिन इतना संवादों भी वाहियातपना उचित नहीं।

एक दूजे के लिए : दुनियां में प्यार की एक है बोली

फिल्में ट्रेंड पैदा करती हैं। किसी ज़माने में नाटक भी ट्रेंड पैदा किया करते थे। जगह-जगह अर्थात ऐतिहासिक इमारत, पहाड़, पेड़ आदि पर प्रेमी-प्रेमिका का नाम लिखा होने का ट्रेंड शायद जिस फ़िल्म ने पैदा किया वो फ़िल्म थी - एक दूजे के लिए। अब यह नोट पर फलां बेवफ़ा है लिखने का ट्रेंड किसने पैदा किया यह एक खोज का विषय हो सकता है। 
पता नही यह विचार सही है या ग़लत कि नई के साथ-साथ पुरानी फिल्मों पर भी बात होनी चाहिए; क्योंकि नया जो कुछ भी होता है उसकी ज़मीन पुराने ने ही तैयार की होती है। वैसे कला में नया पुराना एक भ्रम मात्र ही है। चाहत तो यह भी है कि सिनेमा हॉल में नई के साथ ही साथ पुरानी फिल्मों का भी प्रदर्शन हो, क्योंकि सिनेमा हॉल में ही फ़िल्म देखने का असली मज़ा है, जैसे नाटक का असली मज़ा लाइव देखने में है रिकॉडिंग में नहीं। क्योंकि नाटक वाइड विजन का जीवंत और थ्री डी माध्यम है जबकि रिकॉर्डिंग में यह सब चीज़ें ग़ायब हो जातीं हैं।
कमल हसन भारतीय सिनेमा के मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक हैं, तो क्यों ना बात हिंदी फिल्म "एक दूजे के लिए" की कर ली जाय। इस फ़िल्म से कमल हसन, रति अग्निहोत्री, माधवी और गायक एस. पी. बालासुप्रमन्यम बतौर कलाकार हिंदी सिनेमा में पदार्पण कर रहे थे। कमल हसन भारत के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं, लेकिन कुछ साल हिंदी फिल्मों में काम करने के पश्चात उन्होंने वापस साउथ लौटने में ही भलाई समझी। हिंदी फिल्म उद्योग ने इस कमाल के अभिनेता और प्रतिभा का उचित सम्मान नहीं किया। वैसे भी उस समय एक एक से वाहियात फिल्मों का बोलबाला था और स्टार कल्चर के चक्कर में एक से एक बेसिरपैर की फिल्मों का निर्माण हो रहा था। कह सकते हैं कि हिंदी सिनेमा का डार्क एज चल रहा था। ऐसे में कोई भी संवेदनशील और सम्भवनाओं से भरा कलाकार स्वर्ग की गुलामी से नर्क की पहरेदारी करने को ज़्यादा सम्मान देता। इस फ़िल्म के अन्य कलाकर थे सुनील थापा, रज़ा मुराद, अरविंद देशपांडे, राकेश बेदी, शुभा खोटे, मधु मालिनी, गीता, असरानी, सत्येन्द्र कपूर आदि। 
90 के दशक में फाइट मास्टर वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन की फ़िल्म आई थी - फूल और कांटे। इस फ़िल्म के बाइक स्टंट ने सबको स्टंट कर दिया था क्योंकि यह बाइक स्टंट खुद अजय देवगन ने किए थे। लेकिन जिन्होंने एक दूजे के लिए फ़िल्म देखी है वो यह बात भली-भांति जानते हैं कि कमल हसन 1981 में बुलेट से एक से एक स्टंट दिखा चुके हैं। हॉलीवुड की फिल्मों में तो इस तरह के स्टंट कब के पुराने पड़ चुके थे।
जैसा कि "एक दूजे के लिए" नाम से ही ज़ाहिर है कि यह फ़िल्म एक प्रेम कहानी है जिसके निर्देशक थे के. बालचंद्र। राष्ट्रीय सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित इस फ़िल्म को स्वयं निर्देशक बालचंद्र और कमल हसन ने लिखा था। पद्मश्री सहित बहुत सारे सम्मानों से सम्मानित बालचंद्र अपनी फिल्में में नवाचार और स्त्री चरित्रों के छुईमुई और हीरो की कठपुतली बनाने के बजाय एक मजबूत इंसान के रूप में चित्रित करने के लिए जाने जाते हैं। इस फ़िल्म में भी सारे स्त्री चरित्र बहुत ही मजबूत हैं और किसी भी मर्द (पिता, भाई, पति, प्रेमी आदि) के सामने अपने फैसले पर अडिग रहने के साहस से लबरेज़ तथा तमाम चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत के साथ अकेली उपस्थित हैं। इनकी फिल्मों में कोई भी स्त्री चरित्र अपने को "मैं तुलसी तेरे आंगन की" के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। 
एक दूजे के लिए इनके द्वारा निर्देशित तेलगु फ़िल्म मारो चरित्रा (1978) का हिंदी पुनर्निर्माण था। फ़िल्म ने ख़ूब व्यवसाय किया तो उसे हिंदी में भी बनाने का निर्णय किया गया। हिंदी में भी यह फ़िल्म बहुत बड़ी हिट थी। कमल हसन और माधवी तेलगु और हिंदी दोनों में उपस्थित थे। कहा जाता है फ़िल्म ने उस वक्त लगभग 100 करोड़ का कारोबार किया था, लेकिन उस वक्त 100 करोड़ का इतना भयंकर शोर मचाने वाले लोग नहीं थे। शायद उस वक्त शोर से ज़्यादा शालीनता को तबज़्ज़ो दी जाती रही हो। वैसे भी कलात्मक मानसिकता यह कहता है कि सफल होने पर शालीनता और बढ़ जानी चाहिए जैसे मीठे फल से लदा पेड़ थोड़ा झुक जाता है। हाँ, खजूर हमेशा तना रहता है। कबीर कहते हैं - 
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर 
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर 
यह एक मल्टीलिंगुअल फ़िल्म भी थी जिसका अंत दुखांत है। यानी नीम और करेला एक साथ परोसने का साहस, वो भी उन दर्शकों के समक्ष जिन्हें सुखांत अंत और सतही मनोरंजन की "स्पून फीडिंग" का रोग लगा दिया गया हो। वैसे तमाम विश्व प्रसिद्द प्रेम कहानियों का अंत दुखांत और अधूरापन ही है। ठीक अमीर खुसरो की इन पंक्तियों की तरह - 
खुसरो दरिया प्रेम का जो उल्टी वाकि धार 
जो उबरा सो डूब गया जो डूबा सो पार 
फ़िल्म में भारतीयता में उपस्थित भाषा और संस्कृति की टकराहट भी है। साथ ही कठोर सच यह भी है कि राधा-कृष्ण को पूजानेवाला देश अपने व्यवहार में कितना प्रेम विरोधी है। फ़िल्म में प्रेम है, प्रेम की पराकाष्ठा आई और है एक दूसरे पर पुरज़ोर भरोसा के साथ मानवीय कमज़ोरियाँ भी। अंततः यह फ़िल्म ग़ालिब के एक शेर को भी साक्षात सिनेमाई रूपांतरण प्रदान करता है। शेर है - 
आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब 
दिल का क्या रंग करूं ख़ून जिगर होने तक
और फ़िल्म जब समाप्त होती है तो देखनेवाले किसी भी संवेदनशील हृदय में एक हूक सी पैदा कर जाती है और "हम तुम दोनों जब मिल जाएगें, एक नया इतिहास बनाएगें" नामक गीत को चरितार्थ कर जाता है। वैसे, फ़िल्म के संगीत में इस फ़िल्म की आत्मा बसी हुई है। क्या ख़ूब अमर गाने हैं - एक से एक। 
#तेरे मेरे बीच में कैसा है बंधन अनजाना 
#हम तुम दोनों जब मिल जाएगें 
#मेरे जीवन साथी प्यार किए जा 
#हम बने तुम बने एक दूजे के लिए 
#तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना 
#सोलह बरस की बाली उमर को सलाम 
इन गानों को लता मंगेश्कर, एस. पी. बालासुप्रमान्यम, अनुराधा पौडवाल और अनूप जलोटा ने आवाज़ दी थी। संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का था और गीत लिखे थे आनंद बक्षी ने। क्या ख़ूब अमर गीत लिखे थे जैसे फ़िल्म की आत्मा निचोडकर रख दिया हो आनंद बक्षी साहेब ने। कुछ पंक्तियों पर ग़ौर कीजिए - 
कितनी ज़ुबाने बोले लोग हमजोली
दुनियां में प्यार की एक है बोली
बोले जो शमां परवाना 
वैसे संगीत का असली मज़ा तो सुनने में हैं। केवल "तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन" नामक गीत सुन लीजिए, फ़िल्म के बाकी संगीत अपने आप सुनिएगा - दावा है। वैसे यह गीत भारतीय फिल्म संगीत के महानतम गीतों में से एक है। यकीन नहीं है तो लता जी की आवाज़ में एक बार सुन भर लीजिए। पसंद ना आए तो आप अपना नाम संगीत प्रेमी की लिस्ट से फौरन काट लीजिए। एक बात और, इस गीत के लिए बक्षी साहब को फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला था। फ़िल्म में गैर-हिन्दीभाषी गायक एस. पी. बालासुप्रमन्यम से गाना गवाने के पीछे भी तर्क है। फ़िल्म का नायक दक्षिण भारतीय है और वो पहले के घंटे तो हिंदी में कुछ बोलता ही नहीं है। तो ऐसे चरित्र के लिए गायक भी कोई ऐसा चाहिए था जिसकी हिंदी फिल्म के चरित्र के मेल खाती हो। इसलिए एस. पी. बालासुप्रमन्यम का चयन किया गया था। 
यह वैसी बेसिरपैर की फ़िल्म नहीं थी कि फ़िल्म के नायक-नायिका का वैसे तो नाचने गाने का कोई चारित्रिक संस्कार नहीं होता लेकिन गाना आते ही सुरीली आवाज़ निकलने लगती है और ख़ूब जम के नृत्य भी करने लगते हैं। कह सकते हैं कि अमूमन फिल्मों में गाने के दौरान अच्छे से अच्छा "स्टार" अपने चरित्र को छोड़ देता है। वैसे हिंदी फिल्मों में चरित्र कम लटके-झटके ज़्यादा देखने को मिलता है।
फ़िल्म का एक और गीत "मेरे जीवन साथी प्यार किए जा" का अलग से ज़िक्र करना ज़रूरी है। इस गीत के बोलों में एक बहुत ही ख़ास बात यह है कि उसके बोल हिंदी फिल्मों के नाम (Title) लेकर लिखे गए हैं। यह अपनेआप में एक अनूठी बात है। भारतीय इतिहास में इस तरीक़े की मात्र एक रचना ही और मिलती है (कम से कम मेरी जानकारी में); वो है हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध रचनाकार श्रीलाल शुक्ल की अद्भुत कृति "राग-दरबारी" के नायिका बेला की रुप्पन बाबू को लिखी चिट्ठी। सच चिट्ठी की बात बाद में पहले फ़िल्म का यह गीत पढ़िए और सोचिए कि ऐसा क्या कोई दूसरा गीत है? 
मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा 
वाह! वाह! स: हाँ हाँ ! 
मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा 
जवानी दीवानी 
खूबसुरत, ज़िद्दी पड़ोसन 
सत्यम शिवम सुंदरम, 
सत्यम शिवम सुंदरम सत्यम शिवम सुंदरम 
झूठा कहीं का! 
हाँ, हरे रामा हरे कृष्ना 
धत! चार सौ बीस, आवारा! 
दिल ही तो है 
है! 
आशिक़ हूँ बहारों का, 
तेरे मेरे सपने, 
तेरे घर के सामने, 
आमने सामने, 
शादी के बाद! 
शादी के बाद? 
ओ बाप रे! 
हां हां हां, हां! 
हमारे तुम्हारे! 
क्या? 
मुन्ना, गुड्डी, टिंकू, मिली, शिन शिनाकी बूबला बू, खेल खेल में शोर! 
शोर, शोर ... 
भूल गये? 
जाॅनी मेरा नाम 
अच्छा? 
चोरी मेरा काम, जाॅनी मेरा नाम, ओ, चोरी मेरा काम 
ओ! 
राम और श्याम 
धत, बंडलबाज़! 
लड़की, मिलन, गीत गाता चल, प्यार का मौसम 
बेशरम! 
आहा हाहाहाहा! प्यार का मौसम 
बेशरम ... स: सत्यम शिवम सुंदरम, सत्यम शिवम सुंदरम सत्यम शिवम सुंदरम मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा अनु: जा जा! 
हा हा! इश्क़ इश्क़ इश्क़ 
Bluff master. 
ये रास्ते हैं प्यार के, चलते चलते, मेरे हमसफ़र 
आह! स: हमसफ़र, दिल तेरा दीवाना, दीवाना मस्ताना, छलिया, अंजाना पगला कहीं का! 
छलिया, अंजाना, आशिक़ बेगाना, लोफ़र, अनाड़ी बढ़ती का नाम दाढ़ि, चलति का नाम गाड़ी - जब प्यार किसी से होता है, ये सनम 
ओ हो! 
जब याद किसी की आती है, जनेमन 
सच? 
बंधन, कंगन, चंदन, झूला, चंदन, कंगन, बंदन, झूला, बंदन झूला, कंगन झूला, चंदन झूला, झूला झूला झूला झूला दिल दिया दर्द लिया, झनक झनक पायल बाजे, छम छमा छम गीत गाया पत्थरों ने, सरगम, सत्यम शिवम सुंदरम सत्यम शिवम सुंदरम, सत्यम शिवम सुंदरम स: मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा अनु: चल चल! 
जवानी दिवानी, खूबसुरत, ज़िद्दी, पड़ोसन सत्यम शिवम सुंदरम, सत्यम शिवम सुंदरम Sing with me come on! 
ला ला ला ला ला ला स: come on! good! 
स: ला ला ला ला ला ला
अब बताइए, गाने की ऐसी लिरिक्स कहीं पढ़ी है? अब रही राग दरबारी की यह चिट्ठी। इस चिट्ठी में शुक्ल जी ने फ़िल्मी गीतों के बोल का प्रयोग किया है। जो भी लोग राग दरबारी पढ़ चुके हैं वो इस चिट्ठी से भली परिचित हैं। जो नहीं पढ़ें हैं उनके लिए वो चिट्ठी यह रही - 
ओ सजना, बेदर्दी बालमा, 
तुमको मेरा मन याद करता है। पर ... चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर। वह बेचारा दूर से ही देखे करे न कोई शो। तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो। याद मे तेरी जाग-जाग के हम रात – भर करवटें बदलते हैं।
अब तो मेरी यह हालत हो गई है कि सहा भी न जाए, रहा भी न जाए। देखो न मेरा दिल मचल गया, तुम्हें देखा और बदल गया। और तुम हो कि कभी उड जाए, कभी मुड़ जाए, भेद जिया का खोले ना। मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको छिपाने की बुरी आदत है। कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख तो आके परवाने। 
तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं। ये सुलगते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ। मुहब्बत लूटाने को जी चाहता हैं। पर मेरा नादान बलमा न जाने दिल की बात। इसलिए मैं उस दिन तुमसे मिलने आई थी। पिया मिलन को जाना। अंधेरी रात। मेरी चाँदनी बिछुड़ गई, मेरे घर पे पड़ा अँधियारा था। मैं तुमसे यही कहना चाहती थी, मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए। बस, एहसान तेरा होगा मुझ पर मुझे पलकों की छाँव में रहने दो। पर जमाने का दस्तूर है यह पुराना, किसी को गिराना किसी को मिटाना। मैं तुम्हारी छत पर पहुंचती पर वहाँ तुमरे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था। मैं लाज के मारे मर गई। आंधियों, मुझ पर हंसों, मेरी मुहब्बत पर हंसों।
मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो। तुम कब तक तड़पाओगे? तड़पाओगे? तड़पा लो, हम तड़प-तड़पके भी तुम्हारे गीत गाएँगे। तुमसे जल्दी मिलना है। क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मंदिर सूना है। अकेले हैं, चले आओ जहां हो तुम। लग जा गले से फिर ये हंसी रात हो न हो। यही तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए, हाय। हम आस लगाए बैठे हैं। देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना। 
तुम्हारी याद में, 
कोई एक पागल।

यह दोनों रचनाएं भारतीय साहित्य (फिल्मी लेखन भी साहित्य है) की अद्भुत और अनूठी रचना है। राग दरबारी 1968 में लिखी गई थी और एक दूजे के लिए फ़िल्म बनी 1981 में। अब फ़िल्म के यह गाना राग दरबारी की उस चिट्ठी से प्रभावित थी या नहीं इसका शायद ही। कहीं कोई प्रमाण मिले! वैसे थी तब भी अच्छी और नहीं थी तब भी। रचनात्मक लोगों का एक-दूसरे से प्रभावित होने कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 
बहरहाल, इस फ़िल्म पर कहने को बहुत सारी बातें और हैं मसलन संपादन, गोवा का सुंदर और खतरनाक फिल्मांकन, संवाद और अभिनय आदि। लेकिन बात उतनी ही करनी या कहनी चाहिए जितने में कि बात की शालीनता बनी रहे। तो अब बात बंद और आपने यदि यह फ़िल्म नहीं देखी है तो देख लीजिए यूट्यूब पर मुफ़्त में उपलब्ध है, और यदि देखी है तो एक बार और देख लीजिए शायद कुछ नया मिल जाए।

फ़िल्म इत्तेफ़ाक : हर इत्तेफ़ाक़ महज इत्तेफाक नहीं होती !

यह सच है कि कलाकार एक दूसरे की कला से प्रभावित होते हैं, यह एक स्वाभविक प्रक्रिया है; लेकिन प्रभाव के साथ ही साथ चुपके से नकल कर लेना हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण आदत रही है। यह सब आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से हो रहा है। तब इंटरनेट का ज़माना नहीं था, और आम दर्शकों की पहुंच विश्व सिनेमा तक नहीं थी। उनके सामने जो कुछ भी परोसा जाता था, वो उसे ही असली मानकर देखने या झेलने को अभिशप्त थे। जहां तक सवाल फ़िल्मी पत्रकारिता का है तो वहां अमूमन मूढ़ता की स्थिति ही है, उसे सच्चाई से ज़्यादा गॉशिप से प्यार है और समीक्षा का है और वो भी हिंदी में तो उसकी हालत गंभीर रूप से नाजुक है। ख़ैर, इंटरनेट के आगमन ने बड़े - बड़ों की पोल खोलके रख दी है; वो चाहे लेखक हों, निर्देशक हों, संगीत परिकल्पक हों, या अभिनेता। अब तो फ़िल्म प्रदर्शित होते ही कथा-कहानी ही नहीं बल्कि फ्रेम तक कहाँ से कॉपी मारा गया है - ट्रोल करने लगता है।
हॉलीवुड में सन 1965 में George Englundand के निर्देशन में Signpost to Murder नामक एक सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म बनती है। यह फ़िल्म Monte Doyle नामक एक नाटककार के नाटक से प्रेरित था, जिसे Sally Benson नामक लेखक ने लिखा था। इस फ़िल्म में Joanne Woodward, Stuart Whitman, Edward Mulhare, Alan Napier, Joyce Worsley and Leslie Denison नामक कलाकारों ने अभिनय किया था। 
यह फ़िल्म सन 1969 में हिंदी में बनी इत्तेफ़ाक नाम से। फ़िल्म के निर्माता थे बी. आर. चोपड़ा और निर्देशक थे यश चोपड़ा। अब यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि आज चोपड़ा फैमली हिंदी सिनेमा में एक प्रतिष्ठित घराने का नाम है! बहरहाल, इस फ़िल्म में राजेश खन्ना के साथ नंदा, मदन पूरी, बिंदु,सुजीत कुमार और इफ़्तिख़ार आदि ने काम किया था। फ़िल्म में सबने एक से एक वाहियात अभिनय किया है। किन्तु वो राजेश खन्ना के दौर था और संस्पेंस-थ्रिलर का तड़का तो फ़िल्म साधारण कामयाबी हासिल करने में सफल रही थी। वैसे इस फ़िल्म को देखने के बाद यह यक़ीन करना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वो वही राजेश खन्ना हैं जो आनंद और बाबरची जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय करेंगें। पूरी फिल्म अजीब है और अंत तो सबसे अजीब। फिल्म में एक भी गाना नहीं था जबकि फ़िल्म के संगीत निर्देशक थे मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी और लेखक के रूप में G.R. Kamath का नाम भी आता है। फ़िल्म 10 नवम्बर 1969 को प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म ने बेहतरीन निर्देशन और पार्श्वसंगीत का अवार्ड भी जीता था! अब यह पता लगाना चाहिए कि फ़िल्म में शानदार निर्देशन के नाम पर ऐसा क्या था कि उसे बेहतरीन निर्देशन का सम्मान मिला। वैसे इस फ़िल्म का पार्श्वसंगीत निहायत ही ख़राब है और संगीत के नाम पर बड़ा ही बचकाना शोर पैदा किया गया है। उस वक्त का तो पता नहीं लेकिन आज जब वो फ़िल्म देखिए तो कई जगह पार्श्व संगीत के आने पर शोर इस क़दर बढ़ जाता है कि कान बंद करना पड़ता है। वैसे इस फ़िल्म से पहले इस कथ्य पर आधारित एक गुजराती नाटक भी खेला गया था। अब इस फ़िल्म और नाटक ने हॉलीवुड की फ़िल्म Signpost to Murder के राइट्स ख़रीदे थे या नहीं, इसकी कोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती। ख़ैर, अपने यहां तो नक़ल को भी एक कला ही माना जाता है और ऐसे निर्माताओं-निर्देशकों की कोई कमी नहीं जो किसी फ़िल्म की सीडी या कैसेट पकड़कर लेखक को पटकथा और संवाद लिखने को कहते हैं और फिर उसे लगभग फ्रेम बाई फ्रेम शूट कर लेते हैं। और लेखक इतने बेशर्म कि पटकथा केके नीचे अपना नाम लिखते हैं। यह सब इत्तेफ़ाक से नहीं बल्कि जानबूझकर किया जाता है। कई बार प्रभावित होने की बात को स्वीकार कर लिया जाता है तो कई बार निर्माता-निर्देशक बेशर्मी से कह देता है कि मैंने फलां फ़िल्म अबतक देखी ही नहीं है और यदि मेरी फिल्म से उस फिल्म का कोई मेल है तो वह महज एक इत्तेफ़ाक है। गुलज़ार जैसे संवेदनशील कवि भी अपनी फिल्म परिचय को हॉलीवुड की फ़िल्म Sound of music के प्रभाव को आजतक स्वीकार नहीं करते। ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। बहरहाल, वर्तमान में उस पुराने इत्तेफ़ाक का भी पुनर्निर्माण हुआ है, जिसका प्रदर्शन गत 3 November 2017 को हुआ है। इस बार निर्माता हैं प्रतिष्ठित शाहरुख खान, गौरी खान और कारण जौहर, और इसे निर्देशित किया है अभय चोपड़ा (चौपड़ा फैमिली) ने। फ़िल्म में अक्षय खन्ना, सोनाक्षी सिन्हा और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने काम किया है। 
फ़िल्म उद्योग में लेखकों और मूलकथा का घोर अभाव है; जबकि भारत किस्से-कहानियों और एक से एक साहित्य के भंडार का देश है। इस बीमारी के लिए कई सारे कारक हैं, जिसमें सबसे बड़ी बीमारी है लकीर का फ़क़ीर होना। 
पटकथा किसी भी फ़िल्म कला की रीढ़ होती है लेकिन यहां कला किसको निर्मित करना है? अमूमन सबको बस हिट फ़िल्म बनानी है, जैसे भी। वैसे एक टैग याद आ रहा है - नकल से सावधान!

रिबन : एक अनछुआ प्रयास

हिंदी सिनेमा की मूल समस्या कथ्य की है। यहां अमूमन वही घिसा पीटा फॉर्मूला थोड़े फेर बदल के साथ चलता/बनता है और अमूमन फिल्में उसके आस पास गोल-गोल चक्कर काटती रहती हैं; जबकि भारत में इतने किस्से कहानियां हैं और इतना घटनाप्रधान देश है कि लाखों फिल्में बने तो भी कहानी का ख़जाना ख़त्म ना हो कभी; और रही सही कसर स्टार कल्चर ने पूरी कर दी है। वो अमूमन लटके झटकों को ही कलाकारी मनवा बैठे हैं। ऐसे वक्त में किसी भी अनछुए पहलु पर फ़िल्म बनाने की परिकल्पना ही अपने आप में एक साहसिकता भरा क़दम है और रिबन हर प्रकार से एक साहसिक प्रयोग है। यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है कि "मनोरंजन, मनोरंजन और मनोरंजन" के वाहियात कसौटी ने सिनेमा के दर्शकों का जायका इतना ख़राब कर दिया है कि उसे कोई भी अर्थवान सिनेमा "बोर" करने लगा है। रिबन के साथ भी यदि भारतीय दर्शक यही व्यवहार करें तो आश्चर्यजनक बात नहीं होगी। रिबन की गति मंथर है और फिल्मांकन सादगीपूर्ण तथा रोज़मर्रा के संवाद और संवेदना। ना कोई स्टार कास्ट है और ना ही हीरो-हीरोइन के लटके झटके और आइटम नंबर और ना ही तालीबजाऊ कोई संवाद या दृश्य। फ़िल्म और फिल्मांकन की आत्मा ही यह सादगी और उसके पीछे छोटे-बड़े तनाव है। इसकी कथा बहुआयामी और नवाचार से परिपूर्ण है और नवाचार का स्वागत करने का साहस अभी बहुत ही कम लोगों में है। सिनेमा के "भीड़" दर्शकों में तो बिल्कुल ही नहीं और उनके पास तो एकदम ही नहीं जो रोज़ एक प्रकार की चीज़ें देखने, सुनने और महसूस करने में सहज महसूस करते हैं। इसलिए ऐसी फिल्में "भीड़" के स्नेह से वंचित रहती हैं और वो अपना लागत भी बड़ी मुश्किल से निकाल पातीं हैं। वैसे भी कुछ कला भीड़ को संबोधित करती है तो कुछ इंसान के दिल, दिमाग और संवेदनाओं को कुरेदने का कार्य करती हैं। रिबन आपसे दिल, दिमाग, संवेदनशीलता और इत्मिनान की मांग करती है। यह हाजमोला नहीं कि मुंह में डाला, चटखारा लगाया और गैस निकाल दिया।
रिबन संयुक्त परिवार के बिघटन, औधोगिकरण और बाज़ारवाद के दवाब में दड़बे जैसे फ्लैट में रहने वाले एक ऐसे कामकाज़ी जोड़े की व्यथा है जिसकी एक बेटी है लेकिन बच्चे की देखभाल करने के लिए भी आया रखना पड़ता है। यहां तमाम भौतिक सुविधाएं खरीदी जाती हैं लेकिन कोई भी ख़ूब जमकर ठहाका लगाता हुआ नहीं दिखता बल्कि यहां बच्चे भी समय से पहले बड़े होते हैं। यहां कुत्ते को डॉग, डॉक्टर को डॉक और मम्मी को मॉम बोला जाता है। यहां ना कोई स्थानीय बोली-भाषा है और नाहीं बच्चों के लिए लोरी और दादी नानी के किस्से, है तो बस शोर करता हुआ मशीन। यहां चैन से फिंगर चिप तक खाने का वक्त नहीं है। 
यह कथा है एक ऐसी स्त्री की जो अपने काम में महारत रखती है किंतु गर्भावस्था के कारण उसे छुट्टी लेनी पड़ती है और जब वो काम पर वापस लौटती है तो मुनाफ़ा मात्र कमाने के लिए चल रहे कारपोरेट ऑफिस में सबकुछ बदल चुका होता है। इन दफ्तरों में ना कोई संवेदनशीलता होती है और ना ही कोई मानवता। ये बस प्रतिभा का दोहन करने के लिए चल रहे मशीन हैं। वैसे समाज कितना संवेदनशील है खासकर स्त्री के सवालों पर? समाज तो रेप के लिए भी स्त्री पर ही दोष मढ़ता है और दुनियाभर के वाहियात सवाल करता है। स्त्री के कार्य, अधिकार और गर्वाधरण को तो आजतक हमने शायद ही वो महत्व दिया है, जो उसे मिलना चाहिए और एक पुरुषप्रधान समाज में यह संभव भी नहीं है - बिल्कुल भी नहीं। रिबन में भी मेल इगो और फीमेल सेंसिबिलिटी का एहसास लगभग हर जगह है - कभी मौन तो कभी मुखर। यहां भौतिकता की तलाश में चिंताग्रस्त नायक, एक पुरुष गुस्से में घर से बाहर निकल जाता है, सड़क पर सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए अपनी चिंता का प्रदर्शन करता है, होटल में खाता और कॉफी पीता है लेकिन नायिका, स्त्री अपनी बेटी से चिपककर सोती है। यह इमेजेज बिना शोर किए बहुत कुछ कहतीं हैं बशर्ते उसे देखने समझने की दृष्टि हमारे पास हो। फ़िल्म ऐसी ही इमेजेज से परिपूर्ण है। किन्तु हम एक ऐसे पुरुषप्रधान समाज में जीते हैं जहां गर्भवती पत्नी को घर से निकाल देनेवाले पुरुष को मर्यादापुरुषोत्तम का स्थान प्राप्त होता है और हम चीज़ों को समझने में कम मानने और पूजने में ज़्यादा सहजता महसूस करते हैं और नतीज़ा वहीं गोलचक्कर होता है।
एकल परिवार में बहुत ही कम महिलाएं बच्चा पैदा करने के बाद काम पर वापस लौट पातीं है। एक आंकड़े के अनुसार केवल 34 प्रतिशत। इस फ़िल्म की नायिका भी इसलिए लौट पाती है क्योंकि वो 15 हज़ार रुपए महीने के आया का भार वहन कर सकती हैं। यह कहानी औरत और उसके शरीर पर उसके अधिकार की झलक की कहानी भी है। एकल परिवार में बच्चे की परवरिश की चुनौती की व्यथा है तो बाल शोषण और उस पर सबके (खासकर स्कूल के) पल्ले झाड़ लेने की कथा भी है। वो केवल कागज़ों पर यक़ीन करते हैं और कागज़ (डिग्री) ही बांटते हैं। संवेदनहीनता की हद तब पर हो जाती है जब एक मासूम बच्ची से यह सवाल होता है कि तुम्हें कहाँ कहाँ छुआ गया। फ़िल्म में बहुत कुछ और है, फ़िल्म जितना कुछ कहती है उससे कहीं ज़्यादा चीज़ें नहीं कहती हैं लेकिन यह नहीं कहना ही दरअसल कह देना है बशर्ते कि हमारे पास वह दृष्टि हो कि हम उस अनकहे तक शालिनता से पहुंच सकें। हां नहीं है तो सतही मनोरंजन और ताली बजाऊ लटके झटके और संवाद। यहां मौन है, जिसकी भाषा समझने की संवेदना हम भाग दौड़ के चक्कर में पता नहीं कब की खो चुके हैं। फ़िल्म समाधान का क्षणिक सुख नहीं बेचती बल्कि बड़ी ही शालिनता से सवाल करती है, वो भी बिना जवाब की उम्मीद में, बिल्कुल मध्यवर्गीय मानसिकता की तरह जो जीवन में शायद ही कोई साहसिक फैसला करने की कुब्बत करता है। क्योंकि इस क्लास में भय सबसे ज़्यादा होता है और अमूमन किन्तु-परंतु ही मुखर होकर निकलता है। हम ऐसी कला से बचते हैं क्योंकि यह हमें हमारे ही सामने नंगा करता है और हम बगले झांकने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसी चीजों में आंख बचा लेना अब हमारी आदतों में शुमार हो गया है।
यह मूलतः उच्च मध्यवर्ग के जीवन की जद्दोजहद ही सादगीपूर्ण प्रस्तुति की व्यथा है लेकिन फिल्मों में अफ़ीम का नशा जैसा मनोरंजन तलाशनेवालों के पास ऐसे सिनेमा और कला के लिए वक्त कहाँ है? बाकी ज़्यादा बताऊंगा तो सिनेमा का मज़ा किरकिरा हो सकता है हां बस इतना ज़रूर कहूंगा कि हर बार मज़े और मनोरंजन या सिनेमाई आंनद की बात नहीं होनी चाहिए कभी-कभी गंभीरता भी ज़रूरी है क्योंकि कला एक गंभीर विषय है, चुटकुला नहीं। वैसे भी जीवन हमेशा एक ही ताल, लय, गति या संवेदना में संचालित नहीं होता। जीवन बहुरंगीं है और उसी बहुरंगीं के एक रंग की सादगीपूर्ण प्रस्तुति है रिबन।
रिबन की पूरी टीम को बधाई इस साहसिक प्रयास के लिए। बधाई राखी सांडिल्य (निर्देशिका)। ऐसी फ़िल्म कोई स्त्री ही निर्देशित कर सकती है। बधाई एडिटर राजीव उपाध्याय Rajeev Upadhyay. अब बड़े हो गए हो बच्चा तुम। बधाई Shardendu Priyadarshi और Ajit मुझे इस अवसर का साक्षी बनाने के लिए। 
साथ ही निवेदन यह कि बुरे को कोसने के साथ ही साथ बेहतर या कम बेहतर का समर्थन भी आज के वक्त में एक ज़रूरी पहल बन जाती है। तो जाइए, यह फ़िल्म देखिए। शायद कुछ नया देखने का एहसास मिले।

नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876 अर्थात एक काला अध्याय अब समाप्त होगा।

सबसे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि नाटय प्रदर्शन अधिनियम 1876 क्या है? इस का निर्माण क्यों किया गया? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतांत्रिक देश की मूलभूत ज़रूरतों में से एक है और जहां तक सवाल कला और संस्कृति का है तो उसे तो फलने-फूलने के लिए पूणतः स्वतंत्र वातावरण ही चाहिए। लेकिन समय समय पर विभिन्न रूप से इसे नियांत्रिक करने का भी प्रयास होता ही रहता है। सरकार, समाज, परिवार, विभिन्न संस्थाएं और व्यक्ति भी कला और संस्कृति पर अपना ज़ोर आजमाते रहे हैं।
1876 में ब्रिटिश राज ने भारतीय रंगमंच पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के लिए नाटय प्रदर्शन अधिनियम पारित किया था । नाट्य प्रदर्शन अधिनियम’ 16 दिसंबर 1876 को प्रचलन में आया, जिसका प्रारूप थामस बेरिंग ने तैयार किया था और यह वायसराय नार्थब्रूक के समय में अमल में लाया गया था। देश के आजाद होने के 70 वर्ष बाद भी यह कानून विद्यमान है. 
भारत देश ब्रिटिशसमाज का उपनिवेश था अत: ब्रिटिश राज की जातीय विरोध में रंगमंच को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा । क्रांति एवं विरोध की इस नई धारा को रोकने और इस पर नियंत्रण स्थापित करने की दृष्टी से ब्रिटिश सरकार ने इस अधिनियम की स्थापना की अत: इस अधिनियम को वक्त पूर्वक स्थापित किया । तत्कालीन वायसराय की “नर्थ बूक” की राय में इस अधिनियम के द्वारा भारत में रंगमंच पृदृश्य को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है इस अधिनियम के संबंध में उनके निम्न विचार जो इस प्रकार है :- 
#इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के द्वारा किसी भी नाटक सार्वजनिक प्रावधान को रोका जा सकता ।
नाटक के क्षेत्र में मूका अभिनय एवं अन्य नाटय रूपों को भी शामिल कर लिया गया था। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ये अधिकार प्राप्त हो गये थे कि वह किसी भी नाटय प्रदर्शन का :-
(क) षड्यंत्रकारी प्रकृती का ।
(ख) सामाजिक मूल्यों को ध्वस्त करने का ।
(ग) कानून द्वारा स्थापित सरकारी नियमों एवं संस्थाओ के विरूद्ध असंतुष्टी एवं विरोध उत्पन्न करने वाला।
व्यक्तियों को भ्रम उत्पन्न करने वाला घोषित किया जा सकता था तथा एसे प्रदर्शन को निषिद्ध किया जा सकता था ।
#इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अनुसार उपनियमों के अवहेलना करने वाले व्यक्तियों के समूह को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है जिसके अंदर तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता था या दोनों । 
#इस अधिनियम के अंतर्गत सरकारी एजेंसी या अधिकारी को यह अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी नाटक या नाटकों की संतुष्टी एवं सत्यापन कर सकता था ।
#पुलिस को यह भी अधिकार था कि वह नाटक कि प्रस्तुती के दौरान उस प्रेक्षागृह में जा कर वह उस नाटक को रुकवा भी सकती थी साथ ही दृश्य सज्जा, वस्त्र एवं अन्य सामग्री को जब्त भी कर सकती थी ।
#सरकारी की अनुमती के बिना किसी भी सार्वजनिक स्थल पर नाटक प्रस्तुत करने की अनुमती नहीं थी ।
इस क्रम में 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात भी इस अधिनियम को वापस नहीं लिया गया अपितु विभिन्न प्रांतो की सरकारों ने अपनी-अपनी नीतियों एवं आवश्क्ताओं के आधार पर उपअधिनियम में संशोधन कर लागू कर दिया जिनके कारण अधिकांश प्रान्तों में रंगमंच की गतिविधियों का प्रशासन का और अधिक नियंत्रण स्थापित हो गया । 
आजादी के आंदोलन में लोक नाटकों और कलाओं के मंचन की ताकत को भांपकर ब्रिटिश सरकार ने इनके मंचन को निषिद्ध करने के लिए राजद्रोह और मानहानिकारक कानून बनाया था। इस कानून को ख़तम करने की मांग बहुत ही पुरानी है। 
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों में आजादी की अलख जगाने में नाटकों की महत्चपूर्ण भूमिका रही थी। इस श्रृंखला में गिरीश चंद्र घोष ने ‘सिराज उद दौला’ और ‘मीर कासिम’ नाट्य श्रृंखला लिखी जो अंग्रेजी शासनकाल के दमन चक्र को दर्शाती थी. इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. ऐसे नाटकों में ‘मृणालिनी’, ‘छत्रपति शिवाजी’, ‘कारागार’ जैसे नाटक प्रमुख हैं.
इसी प्रकार बंगाल में महत्वपूर्ण नाटक ‘नील दर्पण’ पर भी प्रतिबंध लगाया गया जिसे दीन बंधु मित्रा ने लिखा था. 
साल 1870 के बाद राष्ट्रवाद की भावना की अभिव्यक्ति वाले कई नाटक आए जिनमें अंग्रेजों के शासनकाल के दमन चक्र को प्रतिबिंबित किया गया था और जनमानस में इनका व्यापक प्रभाव देखा गया.
सरकार ने संसद के मानसून सत्र में निरसन और संशोधन (दूसरा) विधेयक 2017 पेश किया था जिसके माध्यम से 131 पुराने और अप्रचलित कानूनों को समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया था.
अंग्रेजों शासनकाल में प्रदर्शित ऐसे ही नाटकों की श्रृंखला में ‘चक्र दर्पण’ और ‘गायकवाड दर्पण’ का प्रमुख स्थान हैं. इन नाटकों को मानहानिकारक, राजद्रोहात्मक बताकर प्रतिबंध लगाया गया था.
इसके साथ ही ‘गजदानंद एवं युवराज’, ‘हनुमान चरित्र’ पर भी प्रतिबंध लगाया गया. ‘द पुलिस आफ पिग एंड शीप’ भी ऐसे ही नाटक हैं. इसे तत्कालीन पुलिस कमीश्नर हाग और उस समय के पुलिस अधीक्षक लैम्ब के संदर्भ में पेश किया गया था. तब नाटक के निर्माता उपेंद्र नाथ दास एवं थियेटर से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था.
नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876 में प्रवधान किया गया था कि जो कोई भी इस आदेश की अधिसूचना के बाद उसके प्रदर्शन में, प्रदर्शन संचालन में या उसके किसी भाग के दर्शक के रूप में उपस्थित रहेगा अथवा गृह, कमरे या स्थान को प्रदर्शन के लिये खोलेगा…. उसे दोष सिद्ध होने पर तीन माह का कारावास या जुर्माना या दोनों दंड प्रदान किया जाएगा.
औपनिवेशिक काल के इस कानून के अनुसार, राज्य सरकार यह आदेश भी दे सकती है कि ऐसे क्षेत्र के भीतर सार्वजनिक मनोरंजन के किसी स्थान में कोई भी नाट्य प्रदर्शन तक तक नहीं किया जायेगा, जब तक कि उस कृति की…… लिखित प्रति या मूक अभिनय का विवरण तीन दिन पहले नहीं दे दिया जाता है। 
इस काले कानून को अब समाप्त किया जा रहा है, जो निश्चित ही एक स्वागतयोग्य क़दम है। बस कला और संस्कृति के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण (ख़ासकर हिंदी में) भी ज़रा सम्मानित भाव वाला हो जाए तो आनंद आ जाए।
#कुछ शब्द द वायर, हिंदी से उधार लिया गया है।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...