Wednesday, November 23, 2016

देशभक्ति, बदलाव और विकास उर्फ़ नोट छोड़ो paytm करो

देशभक्ति, बदलाव और विकास यह तीनों आजकल जादू की छड़ी का काम कर रहे हैं। आप कुछ भी कीजिए बस उसके ऊपर यह छड़ी घूमा दीजिए, आपके सारे कृत पाक-साफ। वर्तमान में नोटबंदी को भी इसी जादू से जोड़ दिया गया है। नोटबंदी से भ्रष्टाचार, गरीबी, कालाधन आदि ब्रह्मराक्षसों के शिकार करने की बात प्रचारित की जा रही है जबकि ज़रा सा भी सही से इतिहास और अर्थशास्त्र को जानने समझनेवाला व्यक्ति इसे भी ज़रूरत से ज़्यादा उछाला हुआ मामला ही मानेगा। दुनियां में इससे पहले भी नोटबंदी हुए हैं लेकिन आजतक किसी भी मामले में कोई स्थायी समाधान निकाला हो, ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिलता है। काला धन और भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए केवल नोटबंदी काफी नहीं। वैसे भी नगदी और गैर-नगदी (cash and cashless) व्यवस्था भ्रष्टाचार का एक पक्ष मात्र है, जड़ नहीं। सोना, रियल एस्टेट, हवाला, कर प्रणाली, प्रशासन, चुनाव में कालाधन आदि की भी बात होनी चाहिए।
वैसे, कल बड़ा ही बढ़िया वक्तव्य था - I am not for sale. वैसे भी sale होने के लिए कोई भी इंसान कभी पैदा नहीं होता। तो अब यह सवाल है कि जब आप बिकने के लिए नहीं हैं तो आपकी तस्वीर paytm के विज्ञापन में क्या कर रही थी?
सनद रहे कि नोटबंदी के बाद paytm की दैनिक खरीदारी 120 करोड़ रूपए को पार कर गई है वहीँ डॉलर के मुकाबले रूपए की हालत पिछले नौ महीने में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है अर्थात् 68.16 ₹ प्रति डॉलर।
हो सकता है यह भी देशहित में एक बदलाव ही हो कि प्रधानमंत्री का चेहरा केवल सरकारी विज्ञापनों में ही क्यों बल्कि गैर-सरकारी विज्ञापन में भी शान से छापे। आखिर "माल" तो बेचारा गैरसरकारी पूंजीपति ही प्रदान करता है - लगभग सारे राजनीतिक दल को, चंदे के रूप में।
यह paytm भी आजकल देश बदलने का नारा बुलंद कर रहा है। इसलिए उनका धंधा भी देशभक्ति और राष्ट्रहित से ही जुड़ा होगा बिल्कुल बाबा रामदेव की तरह जो देशभक्ति और स्वदेशी के नाम पर एक से एक रद्दी प्रोडक्ट बाज़ार में बेचे जा रहे हैं और बेचारे मासूम देशभक्त देशभक्ति और स्वदेशी के नाम पर अपनी मसुमियतयुक्त मूर्खता का एक से एक नमूना पेश कर रहे हैं!! यह देशभक्ति का बाजारवाद नहीं तो क्या है?
बहरहाल, नोटबंदी के दिन से ही paytm आक्रामक विज्ञापन कर रहा है और वर्तमान सरकार के डिजिटल इंडिया के नारे के साथ सुर में सुर मिलते हुए नोट छोड़ने और paytm अपनाने का राग "हुआँ, हुआँ, हुआँ" की तर्ज़ पर अलाप रहा है। नारा भी वैसा ही है अर्थात् देश बदलना है। नारे पर गौर कीजिए -
तुम बदलोगे, एक बदलेगा
सब बदलेंगें, देश बदलेगा
बस "हुआँ, हुआँ, हुआँ" लिखना भूल गए!!!
अब इस सवाल का क्या कोई औचित्य है कि सारे धंधेबाज आजकल देशभक्ति और देश बदलने का नारा क्यों बुलंद कर रहे हैं और जिनके ख़ून में देशभक्ति का एक कतरा तक नहीं वही देशभक्ति के प्रमाणपत्र के विक्रेता हो गए हैं और जो कोई भी इनके "हुआँ, हुआँ" में सुर नहीं मिलता उसे "देशद्रोही" का तमगा दे रहे हैं। नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को यह भ्रम हो जाना कि वही देश के पर्याय हैं कोई नहीं बात नहीं है इस देश के लिए। "madam is India and India is madam" का नारा भी खूब उछाला गया था किसी वक्त, आजकल हर हर और घर घर का दौर है। लेकिन पता नहीं क्यों लोग यह भूल जाते हैं कि इतिहास किसी को माफ़ नहीं करता। इतिहास सबका मूल्यांकन करता है, चाहे वो राजा हो या रंक।
सनद रहे, सत्ता जो राग अलाप कर सत्तासीन होता है आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुनाफाखोर और धंधेबाज़ भी फ़ौरन उसी सुर में सुर मिलाने लगते हैं।
फिर paytm कोई फ्री में अपनी सेवा नहीं देता है बल्कि हर लेन देन के बदले कमीशन लेता है। IRCTC का ऐप देखते ही देखते paytm की गोद में चला गया। पहले हम अपने बैंक खाते से डेविट या क्रेडिट कार्ड के द्वारा आसानी से टिकट कटा लेते थे लेकिन जबसे इसकी देख रेख का ज़िम्मा paytm को दिया गया है तबसे वहां बिना paytm के टिकट कटाना एक चुनौती हो गई है। क्या देश ने कहा कि IRCTC की देख रेख रेलवे के करने से देशभक्ति को खतरा है इसे फ़ौरन से पेश्तर peytm के हवाले किया जाय। हर लेन देन में paytm कमीशन खाता है उसका इस्तेमाल कोई पूंजीपति अपनी जेब भरने के लिए नहीं बल्कि हमारी राष्ट्रवादी सरकार देश सेवा में कर रही होगी - इस बात पर जिसे भी शक है वह दरअसल देशद्रोही है। वैसे सरकारी सेवाओं का निजीकरण भी उदारवाद का एक सड़ा और बकवास सा फार्मूला है। सरकारी तंत्रों को दुरुस्त करने के बजाय उसे किसी पूंजीपति या धंधेबाज के हाथों में सौंप दिया जाना देशभक्ति की किस किताब के कौन से अध्याय में उचित है और यह किताब कब और कहाँ छपी - यह एक खोज का विषय है। ज़रा हमारी भी जानकारी दुरुस्त किया जाय ताकि हम भी देशभक्ति का पाठ ज़रा पढ़ ले। इस नोटबंदी से आम आदमी की मुसीबत तो जो है सो है यदि बैंक कर्मचारी अपनी नौकरी का मोह त्यागकर अपनी मुसीबतें लिख दें तो भूचाल आ जाएगा। सरकार जिस तरह रोज़ नए नए फरमान सुना रही है इससे तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि दूरदर्शिता का पाठ पढनेवाले यह सरकार की तैयारी बहुत ही बचकानी थी।
paytm के लिए स्मार्टफोन चाहिए, फिर ठीक ठाक नेट कनेक्शन और नेट पैक चाहिए। अब इस देश के कितने प्रतिशत आबादी इस आफत को गले लगाने को तैयार है? खैर, आबादी की चिंता करे कौन? वैसे भी चुनाव में पैसा आबादी कम पूंजीवादी ज़्यादा लगाते हैं। तो जिसका खाया उसको चुकाना हमारा धर्म है। हम चाहे कुछ भी हों लेकिन नमक-हराम तो कतई नहीं है!!!
वोट विकास के नाम पर मिला था देश बदलने के नाम पर नहीं और कोई भी बदलाव ज़मीनी रूप से आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर से शुरू होता है जबरन थोपा नहीं जाता। असल बात मानसिकता है न कि भौतिकता।
इतिहास देख लीजिए, जिस किसी ने मानसिकता में बदलाव किए बिना जन पर किसी भी प्रकार का कोई दवाब बनाया है - उसका आज इतिहास में कोई नामलेवा तक नहीं बचा है, बड़ी-बड़ी सल्तनतें तबाह हो गईं; और जो कोई भी मानवीय चेतना से लैस होकर अपना लश्कर कठिन से कठिन वक्त में भी गतिमान रखा उसने भले ही कोई "बंदरी सेना" न बनाई हो लेकिन उनका नाम आज भी स्नेह से याद किया जाता है। यह लोकतंत्र है। इसमें नायक अन्तः जनता होती ही है। हालांकि नायकत्व का भ्रम बीच-बीच में अफसरों-नेताओं आदि को होता रहता है। किसी लोक गायक का एक गीत याद आ रहा है -
जनता की चले पल्टनियां
हिल्ले ले झकझोर दुनियां

दैनिक समाचार पत्र hindustan times का एक आर्टिकल संलग्न कर रहा हूँ और साथ में लिंक भी

Cash in circulation in an economy has little correlation with corruption, a comparative analysis of World Bank and Transparency International data suggests, deepening suspicion that those with black money prefer to keep their ill-gotten wealth in other forms of assets.

While figures show that India holds 11.8% of its economy in cash and is ranked a poor 76th in the global corruption ranking. Germany, at 9th in the graft ranking, has an 8.7% cash economy.

Sweden, one of the world’s top three least corrupt countries, and Nigeria, one of the worst, has near similar proportion of cash in their economies.

Hindustan Times analysed the cash in circulation and GDP of 26 countries – 12 top economies barring the US and China, 12 very corrupt countries with stable governments, and three mid-sized economies with varying corruption ranks.

The findings suggested India’s cash in circulation as a portion of GDP was near about international standards.

France, for example, holds 9.4% in cash and is ranked 23 by the anti-graft body, Transparency International. Experts said India’s marginally more cash proportion could be because a majority of Indians depend on cash for daily transactions in absence of inadequate banking facilities.

Japan, the world’s third largest economy and ranked 18th on the corruption index, has 20.7% cash economy.

The analysis of data showed up another interesting fact: Russia, the world’s 13 largest economy and Spain, the 14th largest, shared the same proportion of cash economy.

Yet, Russia is ranked 119 on the corruption index while Spain is a lot cleaner at 36. Corruption, the data suggested, had little impact on their cash in circulation.

http://m.hindustantimes.com/business-news/little-connection-between-cash-in-economy-and-corruption/story-EthX7dL7j2m1szcQkPUi7N.html

Tuesday, November 15, 2016

गाँव में धूमिल की लंबी कविता पटकथा

जैसे ही पटकथा की प्रस्तुति गांव गोंदर बिगहा, हिसुआ, नवादा (बिहार) में करने की बात हुई एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि क्या धूमिल की कविता की यह विम्बत्मक प्रस्तुति गांव के दर्शकों की जिज्ञासा को शांत कर पाएगी? क्या वो इस प्रस्तुति को सहजतापूर्वक ग्राह्य कर समझ पाएगें? इस सोच के पीछे कई सारे पूर्वाग्रह थे। गांव को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, बौद्धिक आदि स्तर पर पिछड़ा मानने का प्रचलन इस कदर व्याप्त है कि इसी देश में देहाती और गंवार जैसे शब्दों को गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह भी सच है कि शिक्षा का अर्थ केवल किताबी और डिग्री नहीं होता।
कविता ज़्यादातर लोगों के समझ में नहीं आती। समझ में आएगी कैसे जबतक कि कविता पढ़ने या समझने की कोशिश न किया जाय, उसे आदत में शम्मिलित नहीं किया जाए। वैसे भी कोई भी चीज़ समझने से समझ में आती है, उसके लिए थोड़ा प्रयास खुद भी करना पड़ता है न कि यह मान लेने से कि वो चीज़ समझ में ही नहीं आती है।
बहरहाल, समझ में आने, न आने का भय तो हमें पटना जैसे शहर में पहली प्रस्तुति करने के दौरान भी था लेकिन प्रस्तुति प्रारंभ होने के कुछ मिनटों के पश्चात् ही यह भय जाता रहा था। कालिदास रंगालय में दर्शक जिस जीवंतता के साथ धूमिल की इस प्रतिष्ठित कविता पर एकल अभिनय कर रहे आशुतोष अभिज्ञ का साथ दे रहे थे; वह अद्भुत था। अब तो आशुतोष ने इस कविता और उसके रंगमंचीय विम्बों को इस तरह आत्मसात कर लिया कि उसे पटकथा में अभिनय करते देखना एक सुखद अनुभूति की तरह हो गया है। तकनीकी भाषा में इसे इज़ कहते हैं।
बहरहाल, हम पटना के चर्चित रंगमंच, टेलीविजन और फिल्म अभिनेता बुल्लू कुमार के गांव गोंदर बिगहा, हिसुआ, नवादा (बिहार) पहुंचे। राजगीर पर्वतमाला, नदी, खेत-खलिहान से शुशोभित यह एक अद्भुत गाँव है। कुछ ऐसा कि कोई भी कलाकार ह्रदय व्यक्ति यहाँ पहुंचकर आह्लादित हो उठे। अपने जूनून से इसी पहाड़ी का एक सिरा दशरथ मांझी ने काटकर रास्ता बना दिया था। कौन जाने हम में से किस-किसकी नियति कुछ ऐसी ही हो।
यहाँ छठ के अवसर पर हर वर्ष कम से कम संसाधनों में तीन दिन नाटक खेलने का प्रचलन है। चौकी जोड़कर टेम्प्रोरी मंच बनाया जाता है। माइक लगाए जाते हैं। दरी आदि बिछाए जाते हैं। ग्रामीण नाटकों की अपनी शैली और चुनौतियाँ हैं जिनपर बात फिर कभी। रात करीब 8 बजे के आसपास पटकथा की प्रस्तुति प्रारंभ हुई। शाम से ही लोग बोरा बिछाकर अपनी-अपनी सीट लूटने में व्यस्त थे। दर्शक दीर्घा में गांव के बच्चों से लेकर बूढ़े तक विराजमान थे। स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियां, लड़के-लड़कियां सब; और जिस शांत भाव से इन्होंने पटकथा और अन्य नाटक की प्रस्तुति देखी वह सच में कमाल है। उनकी जीवंतता किसी भी दर्शकों से कतई भी कम नहीं थी। बल्कि शालीनता में चार कदम आगे ही थे। धैर्य तो ऐसा कि कोई भी कलाकार फ़िदा हो जाए। लगता है जैसे गांव और गांववालों ने कला के नाम पर केवल स्वीकारना ही सीखा है, नकारना और पूर्वाग्रह शहरवालों के लिए छोड़ दिया है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद, गांव में आज भी चैन है, सुकून है, तकनीक से ज़्यादा बात का भाव है। कुछ बड़े महोत्सव में no entry का दंश झेलता हमारी पटकथा शहर-कस्बों के सभागारों, स्कुल-कॉलेजों से होता हुआ उनतक पहुंचकर जैसे थोड़ा और ज़्यादा सार्थक सा कुछ हो गया हो। पटकथा में वर्णित स्थितियों-परिस्थियों को सबसे ज़्यादा जनता को ही समझने की ज़रूरत है और गांव से बेहतरीन जनता और कहाँ मिलेगी। वैसे भी धूमिल दाद और वाह-वाह वाले कवि तो हैं नहीं।
अंत में, भिखारी ठाकुर की रचनाओं और जीवनवृत पर आधारित अपने ही लिखे नाटक "नटमेठिया" की एक लाइन याद आ रही है - "नाच न बंद होगा। नाच खातिर तो सबकुछ किया, अब कैसे छोड़ दें यह नाच।"
यह ज़िद्द है तो ज़िद्द ही सही। वैसे भी बिना ज़िद्द के कुछ हासिल भी तो नहीं होता। इसलिए जूनून कायम रहे और हौसला बुलंद। 

Friday, October 21, 2016

वाचिक परंपरा के साहित्यकार बॉब डिलन

किसे साहित्य कहा जाय किसे नहीं, यह बहस एकबार फिर शिखर पर है। कारण है गायक, गीतकार और संगीतकार व दुनियां भर में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलना। अमूमन उपन्यास, कविता, कहानी को ही साहित्य माना जाता है; इन सब में भी बहुत सारे भेद-विभेद हैं। वैसे वाचिक परंपरा साहित्य की सबसे पुरानी परंपरा है। इंसान निश्चित ही लिखने से पहले बोलना सिखाता है। हालांकि इससे पूर्व डिलन को ऑस्कर, ग्रेमी, गोल्डन ग्लोब अवार्ड, प्रेजिडेंट मेडल ऑफ फ्रीडमऔर पुलित्ज़र समेत अनगिनत सम्मान मिल चुका है और इन सबसे बड़ा सम्मान यह है कि 60 के दशक से आज तक वो दुनियां भर के संगीत प्रमियों में एक अत्यंत ही प्रतिष्ठित नाम हैं।
बॉब डेलेन "सार्थक" संगीत के क्षेत्र में मेरे पसंदीदा नामों में से एक हैं। मैंने उन्हें तब सुनना शुरू किया था जब अंग्रेजी मेरे लिए अमिताभ बच्चन वाली "फन्नी लैंग्वेज" हुआ करती थी। वैसे मेरी अंग्रेजी की हालत आज भी कोई गर्व करने लायक तो नहीं ही है। और जहाँ तक सवाल संगीत का है तो उसका भी कोई प्रकांड विद्वान तो नहीं ही है। हालांकि लोगों को यह भ्रम ज़रूर है कि मुझे संगीत की बेहतरीन समझ है। खैर, मेरे संगीत की समझ से जुड़ा एक किस्सा याद आ रहा है। सन् 1981 में एक फ़िल्म आई थी क्रांति। उसमें एक गाना था - "ज़िन्दगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर लो घड़ी दो घडी।" उन दिनों यह गाना खूब पॉपुलर हुआ था, आज भी है। अब मेरी समझ में यह नहीं आता था कि यह "घड़ी दो घड़ी" मतलब कि लोग घड़ी क्यों मांग रहे हैं और फिर कौन सी घड़ी मांग रहे हैं - हाथ वाली, टेबल वाली या फिर दिवार वाली?
संगीत के बारे में लगातार पढ़, सुन और यथासंभव रियाज़ करके कुछ हद तक साधने की कोशिश की। यदि मेरा मूड़ ठीक हो तो दिन भर हर तरह का संगीत गाते रहना या संगीत सुनते रहना - मेरी आदतों में शुमार है। इसी कोशिश में दुनियां भर का संगीत सुनने की कोशिश करता हूँ - अच्छा बुरा सब। किसी गुरु के जाकर संगीत नहीं सीखा लेकिन शायद लगातार विभिन्न प्रकार के संगीत सुनना और उसे गाने की कोशिश करना ही मेरी संगीत साधना है।
अब बात डिलन की - डिलन 22 वर्ष की उम्र से गा रहे हैं। उनका जन्म 1941 में रॉबर्ट ऐलेन जिमरमैन में हुआ था। डेलेन ने अपने म्यूजिकल करिअर की शुरुआत मिनिसोता के एक कॉफी हाउस से 1959 में की थी। 1960 में उनके गानों ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। मार्च ऑन वाशिंगटन फॉर जॉब्स एन्ड फ्रीडम में नस्लभेद के ख़िलाफ़ दिया गया मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण "आई हैव अ ड्रीम" ने डिलन की ज़िंदगी बदल दी फिर वो लग गए उस दौर के युवा असंतोष को आवाज़ देने में। उनका एल्बम ब्लोइंग विथ द विंड ने प्रतिरोध का स्वर मुखर कर दिया था और बॉब सफलता के चर्मोउत्कर्ष पर पहुँच गए। डेलेन के गाने 'ब्लोविन इन द विंड, ऐंड द टाइम्स दे आर ए चेजिंग' मानवाधिकार संगठनों और युद्ध विरोधी संगठनों के लिए एंथम साबित हुए। डेलेने ने पारंपरिक संगीत के अलावा संगीत की अन्य विधाओं में हाथ आजमाया जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। किसी गीतकार को संभवत: पहली बार उनके गीतों के लिए नोबेल दिया गया है। गीतों के लिए कवियों को नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।
बॉब डिलन के गीत पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में मिस्टर टैंबूरिन मैन से लेकर लाइक ए रोलिंग स्टोन, ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर चेजिंग शामिल हैं। बहरहाल, आज ज़रूरत है साहित्य के दायरे को विस्तार देने की और उसके प्रचलित परिपाटी, संस्कार और परिभाषाओं की सीमा को विस्तार देने की।
बहुत खूब मेरे पसंदीदा गायक डिलन। आपने विश्व संगीत, साहित्य और मानवीय जीवन को एक नया, लोकप्रिय और सार्थक आयाम दिया है।
बॉब डिलन के एक मशहूर गीत 'मिस्टर टम्बरिन मैन' का 'दैनिक हिन्दुस्तान' में छपा है. पढ़ा जाय। -

मिस्टर टम्बरिन मैन

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

मालूम है मुझे कल के महल आज बिखरे राखों में पड़े
धुंए के फाए से
अंधे कुएं में पड़ा मैं, गायब नींद है
पस्त मेरे हौसले, मेरी खामोश चीख से
न मिलना बाकी किसी से
जमीनें इतनी सूखी, न सपने उगे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

आ चल हम उडे़ं तेरी जादुई नाव में
होश गुम मेरे और दम खतम बाहों में
पांव भी सोए हैं
अपने आप आते, आवारा से पड़ते
हर मंजिल तक चलेंगे, बुझ गई वो लौ बनेंगे
अपनी नुमाइश में जलेंगे, कोई मंतर लगा, जाम दे
वादा है हम पियेंगे...

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए

गूंजेंगी हंसी की, कुछ थिरकने की आवाजें, सूरज से भी आगे
ये कोई चुहल नहीं है, ये शोर है बच भागने का
और बढ़ने की हद केवल आसमां है
कोरस जुलूसों में एक नारा बेढंगा सा उठे
तेरी होशियार तालों में, वो बेहूदा बाजू में
उसे छोड़ो, बढ़ो आगे
वो पागल बस ढूंढ़ता है परछाइयां

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए।

और घोल दे मुझे मेरे मन के इस भंवर में,
सालों घनी तहों में, आगे झडे़ पत्तों से,
रोते पडे़ पेड़ों से, हवादार किनारों में
दूर और दूर उदासी की हदों से,
जहां तारों तले झूमें हम, लहराती फसल से
समंदर की गोदी में चमकीली रेतों से नहाते
सारी यादें सारी किस्मतें कर लहरों के हवाले
कल भर तक बस, आज को भूल जाने दे

हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
न ठौर है न ठिकाना, न ही नींद है
हे! साधो रे! एक गीत मेरे लिये
खनकती भोर जागे, तेरे संग हुए
(अंग्रेजी से अनुवाद: स्वप्निलकांत दीक्षित)
उनके द्वारा गाया और लिखा मेरा सबसे पसंदीदा गीत इस लिंक पर सुनिए।
 https://g.co/kgs/9QdVoI

Tuesday, August 9, 2016

एक मध्यवर्गीय लड़के का जन्मदिन

अपनेआप को लड़का क्यों कह रहा हूँ? तर्क तगड़ा है कि यदि पचास साल के कवि, कथाकार, रंगकर्मी आदि युवा कहलाते हैं तो उस हिसाब से तो मैं अभी लड़का ही हुआ न! तो जन्मदिन था। रंगकर्मी का जन्मदिन नाटकीय न हो तो लानत है। तो हुआ यह कि छः तारीख को रांची से पटना जाने का प्रोग्राम था लेकिन 3G, 4G और 5G वाले इस महान तंत्र में मेरे नेट की स्पीड इतनी अद्भुत थी कि कई दिनों से टिकट महोदय कट ही नहीं पा रहे थे। चार अलग-अलग कंपनियों से सिम कार्ड ट्राई किए परन्तु नेट आँख मिचौली कर रहा था और डमरू समय के रथ के पहिए के साथ घूमे ही जा रहा था। बीएसएनएल का तो मामला आज भी “भाई साहेब नहीं लगेगा” वाला ही है। अंततः तंग आकर रात अपने एक स्टूडेंट सुजीत को फोन किया कि मेरा टिकट कटा दो। सुजीत हैदराबाद में था, उसने भी कोशिश की, लेकिन वह भी सफलता हासिल नहीं कर पाया। थक-हारकर रात एक बजे सोने चला गया। तबतक विभिन्न सोशल साइट्स पर जन्मदिन की बधाई के सन्देश आने शुरू हो गए थे। साढ़े चार बजे सुबह के लगभग आँख खुली तो फिर स्मार्टफोन लेकर टिकट कटाने बैठ गया। इस बार सफलता मिली लेकिन तभी सुजीत का भी मैसेज आया कि उसने मेरा टिकट करा दिया है। अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि दोनों में से कौन सा टिकट कैंसल कराया जाय। कमाल यह कि दोनों ही टिकट एक ही बोगी में थे, बस एक नंबर के फर्क के साथ। अन्तः मैंने सुजीत को वाट्सअप किया कि उसने जो टिकट कराया है उसे कैंसिल कर दे। पुनः सोने जाने से पहले सोशल साईट खोला तो बधाई सन्देश के मैसेजों से इनबॉक्स गुलज़ार हुआ पाया।
सुबह – सुबह तीन साल की प्यारी सी बेटी को स्कूल ले जाने की ज़िम्मेदारी मेरी होती है। बेटी और उसकी माँ का उधम चालू हो चुका था लेकिन मेरी आँख खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। बहरहाल, बेटी और उसकी माँ के दुलार-पुचकार से आँख खुली। उठकर अखबार उठाया तो पहले ही पन्ने पर पूरे पन्ने के लेटेस्ट मोबाईल फोन के विज्ञापन ने तमाचा जड़ा और मेरा आधुनिक फोन मुझे किसी कचड़े के डब्बे में परिवर्तित होता प्रतीत होने लगा। स्मार्टफोन को लेकर मेरा पैशन भी कमाल है। मुझे यह दुनिया का सबसे चमत्कारी आविष्कार लगता है। एक छोटे से उपकरण ने अपने अंदर क्या कुछ नहीं समाहित कर लिया है। सो, यदि मेरा वश चले तो मैं रोज़ ही नया से नया मोबाईल फोन इस्तेमाल करूँ, ठीक उस पागल शहंशाह की तरह जो एक बार पहने कपड़े, जूते आदि इत्यादि को दुबारा इस्तेमाल नहीं करता। वैसे आज यह भी खबर कहीं पढ़ी कि हमारे देश के “साहेब जी" भी कपड़ों को लेकर कुछ ऐसे ही शौक रखते हैं।
तो भाग-भाग कर तैयार हुआ। स्कूटर पर हम और बेटी जी महराज निकले। दोनों ने बरसाती धारण कर रखा था। बेटी को पूरे रास्ते गाना, कविता और पापा, ये क्या है वो क्या है करने में बहुत ही मज़ा आता है। सो वो मगन थी। रास्ते भर अजीब सी बारिश हो रही थी – टिप, टिप टिप टिप टाइप और रांची की बारिश का मज़ा यह कि भींगे नहीं कि सर्दी-बुखार के प्यार में गिरफ्तार हुए। तो मैं सड़ा सा मुंह बनाए कछुए की गति से गाड़ी चला रहा था और मन ही मन मेघदूतम के रचयिता कालिदास को बुरा-भला भी कह रहा था। पक्का मिस्टर कालिदास कभी रांची के बारिश में नहीं भींगे होंगे। यदि भींगते और सर्दी-बुखार के प्यार में पड़ते तो मेघदूतम लिखने का रूमानी ख्याल शायद दूर-दूर तक नहीं आता। वैसे भी सर्दी बुखार में अच्छे से अच्छा रूमानी ख्याल अघोरपंथ में तबदील हो जाता है।
बेटी को स्कूल छोड़ने के बाद मुझे प्रसिद्द डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघनाथ दा के अखरा में जाना था। दादा इन दिनों राम दयाल मुंडा जी के ऊपर डाक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे हैं। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे प्रसिद्द फिल्म निर्देशक सत्यजित राय ने रविन्द्र नाथ ठाकुर के ऊपर बनाई थी। बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि राम दयाल मुंडा ने कुछ छोटे – छोटे नाटक भी लिखे थे – एकदम अनोखे तरीके से। हमें राम दयाल मुंडा लिखित नाटकों के फिल्मांकन के लिए जगह देखने संत जेवियर कॉलेज जाना था। मेघनाथ दा मेरी स्कूटी पर सवार हुए और हम फिल्म, रंगमंच और साहित्य पर बात करते हुए संत जेवियर कॉलेज के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने बताया कि आज उनकी बेटी का जन्मदिन है और उसके लिए उन्होंने बेटी के दोस्तों के आग्रह पर वाट्सअप पर सरप्राइज़ एलिमेंट के रूप में अपनी आवाज़ में बधाई सन्देश भेजा है। उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि आज मेरा भी जन्मदिन है। यदि पता होता तो वो मुझे पता नहीं क्या खिलाने – पिलाने लगते। और जहाँ तक सवाल मेरे बताने का है तो हमारे परिवार में कभी जन्मदिन को स्पेशल दिन की तरह मनाने का कभी रिवाज़ ही नहीं रहा इसलिए यह आज भी मेरे लिए किसी अन्य सामान्य दिन की तरह होता है। वैसे भी मध्यवर्गीय मानसिकता के अंतर्गत खोखली खुशी का प्रदर्शन, उसका दिखावा, बेवजह शोरगुल, रीति-रिवाज और खर्च – इन चीज़ों से कभी भी मेरा कोई खास जुड़ाव हुआ भी नहीं। खोखले आडम्बरों से एकांत मुझे ज़्यादा प्रिय है।
तो हम स्पेस देखकर वापस आए। दादा को अखरा में छोड़ा और अब बारी थी बेटी जी महराज को स्कूल से लेकर घर जाने की। इस बीच फेसबुक, वाट्सअप और एसएमएस के ज़रिए देश के कई भागों से जुड़े दोस्तों के बधाई सन्देश भी आ रहे थे और मैं मन ही मन गदगद होता हुआ सबको जवाब देने की कोशिश भी कर रहा था।
बाकि दिन भर के किस्से नहीं सुनाऊंगा। सुनाऊंगा तो क्या पता बहुत से लोग मेरा नाम भारतीय “मर्द” की श्रेणी से काट दें और बोलें हद है यह भी, घर में झाड़ू लगाना, पोंछा लगाना, बर्तन साफ़ करना, खाना पकाना और अपने बच्चे की पॉटी साफ़ करने जैसा “औरताना” का काम करता है। वैसे हद तो यह भी है जी हम इतने “महान” हैं कि काम का भी लिंग और जाति निर्धारण कर रखा है। खैर, जन्मदिन के मौके पर सुबह – सुबह पड़ोस से जो एक मात्र गिफ्ट मिला वो था मूली के पत्ते समेत चार पांच कुपोषित मूली। बाकि देश भर से खूब सोशल मिडिया पर खूब सारे सन्देश और फोन कॉल्स। सन्देश इतने ज़्यादा और प्यारे थे कि यदि बुद्धि -विवेक का चार चांटा न पड़े तो मध्यवर्गीय दिमाग आसमान में ही उड़ने लग सकता था। भाई, आसमान में उडो लेकिन पैर ज़मीन पर ही टिका रहे नहीं तो शुभचिंतक आसमान में उड़ाना जानते हैं तो उन्हें ज़मीन पर पटकना भी और मत भूलो कि संघर्ष ही जीवन है। सफलताएं दिमाग खराब करती है इसलिए सफलताओं को भूल जाओ और असफलताएं याद रखो। तो, कल तथाकथित जन्मदिन जैसा कुछ था नहीं हां बहुत सारे काम ज़रूर थे और शायद काम ही जीवन है। वाह, मज़ा आया न उपदेश नुमा भरत वाक्य पढ़कर? अब समाप्त।
पुनश्च – ऊपर लिखी सारी बातें झूठ हैं क्योंकि प्रगतिशील दिखना एक फैशन है। सच तो यह है कि कल सुबह से ही भव्य पार्टी शुरू हो गई थी। यो यो के गाने पर चियर्स गर्ल के साथ ही साथ यज्ञ और हवन का भी आयोजन था। जिसमें पुरी दुनियां भर के रथी-महारथी शामिल हुए। गरीबों को टेलीविजन के कैमरे के सामने दान दक्षिणा भी दिया जाया। बराक ओवामा और किशोर कुमार जन्मदिन के इस समारोह में इसलिए शामिल नहीं हो पाए क्योंकि कल उनका भी जन्मदिन था।  

Saturday, July 9, 2016

फुलसुंघी - पाण्डेय कपिल का भोजपुरिया उपन्यास

“बाबुसाहेब! फुलसुंघी के जनीले नू? उ पिंजड़ा में ना पोसा सके । ऊ एगो फूल के रस खींचके चल देले दोसरा फूल का ओर । हम त तवायफ के जात हईं । हमरी काम फुलसुंघी के लेखा एगो जेब से पैसा खींचके दोसर जेब के ओर चल दिहल ह । (बाबुसाहेब, फुलसुंघी को जानते हैं न? वो पिंजड़ा में नहीं पाली जा सकती । वो एक फूल से रस चूसकर दूसरी फूल की ओर चल देती है । हम तवायफ हैं । हमारा काम भी फुलसुंघी जैसा ही एक जेब से पैसा खींचकर दूसरी जेब की ओर चल देना है ।)  – फुलसुंघी”

“फुलसुंघी” भोजपुरी संस्थान, 2 ईस्ट गार्डिनर रोड़, पटना 800001 से सन 1977 में प्रकाशित एक भोजपुरी उपन्यास है । इसके पात्र एतिहासिक तो हैं लेकिन लेखक पाण्डेय कपिल एतिहासिकता और घटनाओं की विश्वसनीयता का दावा पेश नहीं करते । पात्र और स्थान यथार्थ जगत के तो हैं लेकिन उपन्यास में रचनात्मक कल्पनाएँ भी हैं । व्याकरण की भाषा में इसे मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया उपन्यास कहा जा सकता है । वैसे भी इतिहास की पढ़ाई इतिहास की किताबों से ही करनी चाहिए, उपन्यास, फिल्मों, कविता और कहानियों से नहीं; क्योंकि यहाँ रचनात्मक कल्पनाओं का स्थान हमेशा ही विद्दमान रहता है । वैसे इतिहास की किताबें भी पक्षधरता की मिलावट से परे है ऐसा दावा बहुत विश्वास के साथ तो नहीं ही किया जा सकता है ।
उपन्यास के पहले ही पन्ने पर लेखक लिखते हैं - “फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष कहे के नइखे । कहे के एतने भर बा कि एह उपन्यास के कथावस्तु कवनो इतिहास ना ह, एकर कवनो पात्र यथाचित्रित वास्तविक पात्र ना ह । एक में संदेह ना कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय आ रिवेल साहेब सांचो के हो चुकल बाड़े । बाकिर एह चरित्रन के कवनो प्रामाणिक ब्योरा सामने नइखे रहल, आ एह लोगन के किस्सा किवदंतीयन से भरल बा । अइसन कुछ किवदंतियन से सह पाके, एक उपन्यास के कथावस्तु कल्पना से खड़ा कइल गइल बा । बाकिर, एक उपन्यास में, एगो काल-विशेष के, क्षेत्र-विशेष के आ समाज विशेष के जवन तस्वीर उरेहल गइल बा, उ जरुर सही बा । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977” (“फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष नहीं कहना है । कहना केवल इतना है कि इस उपन्यास का कथावस्तु इतिहास नहीं है, इसका कोई भी पात्र पुरी तरह से वास्तविक नहीं है । इसमें कोई सन्देश नहीं कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय और रिवेल साहब वास्तविकता में भी हो चुके हैं । लेकिन इन चरित्रों का कोई प्रामाणिक ब्योरा सामने नहीं था, वैसे भी इन लोगों के किस्से किवदंतियों से भरा हुआ है । इन्हों किवदातियों के सहारे इस उपन्यास की कथा वस्तु टिकी है । बाकि एक उपन्यास में, एक काल विशेष के, क्षेत्र विशेष के और समाज विशेष के जो तस्वीरें अंकित हैं, वो ज़रूर सच हैं । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977)
हमारे यहाँ इतिहास अंकित करने जैसे महत्वपूर्ण काम में शायद आलस्य का प्रकोप ज़्यादा है, इसीलिए बड़े से बड़े चरित्रों के बारे में अनुमान और किवदंतियां ज़्यादा हैं – सत्य कम । इसके पीछे मौखिक परम्परा का भी भरपूर योगदान है । हम बोल-बोलके महाकाव्य रच देते हैं लेकिन बात यदि अंकित-टंकित करने की आ जाए तो हाथों को लकवा मार जाता हैं । अब सुनने-सुनाने की परम्परा में समस्या यह है कि सुनानेवाला कथा में अपने हिसाब से जोड़-तोड़ करता है और सुननेवाला अपनी बुद्धि और विवेक से उसे ग्रहण करता है; कुछ याद रहता है, कुछ याद नहीं भी रहता । फिर जब सुननेवाला सुनी हुई कथा को अपने सुनाता है तो बीच-बीच में टूटे तारों को अपनी क्षमता, मान्यता और स्वार्थ से जोड़ता, तोड़ता, मरोड़ता है । इस प्रकार सत्य में कल्पना का समावेश होता है और इतिहास में गप्प का मिश्रण और फिर पैदा होतीं हैं सत्य की चाशनी से सनी किवदंतियां । वैसे भी किसी बड़े चरित्र के साथ चमत्कार न जुड़े तो हमें मज़ा ही नहीं आता । तभी तो विद्यापति के साथ उगाना (शिव) की कथा जुड़ता है । कुछ कुछ ऐसा ही इस उपन्यास के साथ भी है । हम खोजने निकलें तो इस उपन्यास के पात्रों की सच्ची कहानियां का अता-पता शायद ही कहीं मिले; और जो मिले उसमें कितना सत्य और कितना गप्प है, बता पाना शायद बहुत ही मुश्किल है । वो चाहें ढेलाबाई हों, महेंदर मिसिर हों, रेवल साहेब हो या कोई अन्य चरित्र ।
महेंदर मिसिर का जाली नोट छापने और गिरफ्तार होने की भी (दांत) कथा है लेकिन यहाँ देशभक्ति वाला एंगल नहीं है । यहाँ महेंदर मिसिर एक कलाकार मात्र हैं, महानता के बोझ से लदे पूर्वी गायकी और “मिसिर” सरमौर महेंदर मिसिर नहीं। यहां वो परिस्थियों से लड़ते कम, भागते हुए ज़्यादा पाए जाते हैं - कुछ-कुछ आवारा मसीहा की तरह । अब पाण्डेय कपिल की लेखनी में कितना हक़ीक़त और कितना फ़साना है यह तो कोई पारखी ही बता सकता हैं।
यह सत्य है कि ये लोग थे, लेकिन कैसे, क्यों कहाँ, कब, किस प्रकार आदि पर मामला आके फंस जाता है । बहरहाल, पात्रों को छोड़ भी दिया जाय तो भी इस उपन्यास के लेखक पाण्डेय कपिल के बारे भी साहित्य जगत लगभग अनभिग्य ही है, जबकि यह अभी हाल ही की बात है । तो सवाल यह बनता है कि क्या साहित्य में भी चर्चित होने के लिए किसी खेमे का खूंटा पकड़ना ज़रुरी है? अब इस सवाल का जवाब साहित्य के विद्वान ही दें तो बेहतर होगा ।
कुल 112 पन्ने का यह उपन्यास अपने अंदर एक लंबा कालखंड और कई पात्रों की जीवनयात्रा समेटे हुए बड़ी ही तीब्र गति से आगे बढ़ता है, कभी-कभी पीछे की ओर (फ्लैश बैक) भी आता है ताकि कई सारी स्थितिओं-परिस्थियों और घटनाक्रमों का अर्थ स्पष्ट हो जाएँ । यह पीछे आना एक रणनीति है, बिलकुल “दो कदम आगे और एक कदम पीछे” की तरह । अब यह स्पष्टता या रणनीति इतिहास जनित है या लेखकीय टिपण्णी; यह एक शोध का विषय है ।
“फुलसुंघी” गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी सामंती व्यवस्था का आडम्बर, उससे मोहभंग के साथ कोठा से लेकर लोकसंगीत पूर्वी आदि में लिपटी एक व्यावहारिक गाथा की तरह है; जहाँ एक जेब से दूसरी जेब तक की आज़ादी और स्वछंदता भरी यात्रा करनेवाली ढेलाबाई अन्तः कैद हो जाती या कर दी जातीं हैं । रवेल साहेब और हलिवंत सहाय का तमाम भौतिक सुख सुविधाओं से मोहभंग हो जाता है, महेंदर मिसिर आवारगी को अभिशप्त होते हैं और अन्य चरित्र कई अन्य नियति को प्राप्त होते हैं । इस बिलकुल पतले से उपन्यास की टहनियाँ और जड़ें किसी बरगद की तरह फैली हैं, जहाँ इसके हर चरित्र का क्रमिक विकास है; केसरबाई, मीनाबाई, राम नारायण मिसिर, बुलकान, मुंशी शिवधारीलाल, मनोरमा आदि जैसे उन चरित्रों का भी जो इस कथा के मुख्य चरित्र नहीं हैं । वहीं कुछ ऐसे एतिहासिक घटनाक्रमों का भी एक दूसरा ही नज़रिया सामने आता है जिसे लेकर आजतक तरह-तरह की कथा सुनी-सुनाई जातीं हैं । उन घटनाओं में महेंदर मिसिर का नोट छापने का धंधा करना, गुलजारीबाई बाई का ढेला बाई के रूप में परिवर्तित हो जाना, रिवेल साहब और हलिवंत सहाय भौतिकता से मोह भंग हो सन्यासी हो जाना आदि हैं । अब सारी घटनाओं/प्रसंगों का ज़िक्र कर पाना यहाँ संभव नहीं लेकिन एक प्रसंग का ज़िक्र करने का मोह त्याग पाना मुश्किल हैं । उपन्यास के शुरूआत के पन्ने पर पाण्डेय कपिल लिखते हैं – “सुनल जाला जे प्रयागराज के गणिका जानकीबाई के गवनई पर रीझके आपन सबकुछ निछावर क देवेवाला प्रेमी जब ओकर करिया-कलूट चेचक के दाग वाला चेहरा के देखलस त उ पगला गईल आ जानकीबाई के मार छुरी के गोद दिहलस । छुरी के छप्पन घाव खाइयो के जानकीबाई जीयत बांच गईली, आ नाम बदल गईल, हो गईल छप्पनछुरी । (सुनने में आता है कि प्रयागराज की गणिका जानकीबाई के गाने पर रीझकर अपना सबकुछ न्योछावर कर देनेवाला प्रेमी जब उनकी काली और चेचक से भरा चेहरा देखा तो पागल सा हो गया और उसने जानकीबाई को छोरी से गोद दिया । लेकिन जानकी बाई बच गईं और उनका नाम बदलकर छप्पनछुरी हो गया ।)”
ठीक इसी प्रकार गुलजारीबाई के ढेलाबाई के रूप में बदल जाने की कथा भी है – “उनका एगो महफिल में पगलाइल प्रेमियन के बीच चल गईल ढेला । अ इनकरी नाम बदल गइल । हो गइल ढेला यानी ढेलाबाई । (उनकी एक महफिल में पगलाए प्रेमियों के बीच ढेला चल गया और इनका नाम बदलकर हो गया ढेला अर्थात ढेलाबाई ।)”
बिहार के विख्यात/लोकप्रिय गायक और कवि महेंदर मिसिर और ढेलाबाई पर लिखित सामग्री बहुत ही कम है और जो कुछ भी लिखा गया है उसमें हकीकत और फ़साने को अलग-अलग कर पाना बहुत ही दुरूह कार्य है । यह काम साहित्य और साहित्यकारों का कम इतिहास, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का ज़्यादा है । जहाँ तक एक उपन्यास का सवाल है तो फुलसुंघी निश्चित ही भोजपुरी ज़मीन, भाषा, बोली, वाणी, संस्कारों, संस्कृति, उपमाओं, मान्यताओं, गीत आदि से लबरेज़ एक पढ़ने-पढ़ाने वाली रचना है ।
पटना के रंगकर्मी मित्र धर्मेश मेहता के सौजन्य से मैं पहली बार कोई भोजपुरी उपन्यास पढ़ रहा था । मुझे नहीं पता कि पाण्डेय कपिल कौन हैं और आज किस स्थिति में हैं, उनकी यह रचना “फुलसुंघी” आज बाज़ार में उपलब्ध भी है या नहीं; लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि भोजपुरी और भोजपुरी साहित्य से स्नेह रखनेवालों को यह उपन्यास ज़रूर ही पढ़ना-पढ़ाना चाहिए । यह अपने आपमें एक शानदार रचना हो, न हो लेकिन एक शानदार रचना का सुख और एहसास देनेवाला उपन्यास तो ज़रूर ही है ।

Monday, June 6, 2016

नाट्य - संस्कृति

दुनियां में रहो ग़मज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ करके चलो जाके बहुत याद रहो। - मीर तकी मीर

एक ऐसे देश में जहाँ कोस-कोस पर पानी और वाणी बदल जाती है, जहां भिन्न - भिन्न प्रकार के धर्म, समुदाय, वर्ग, जाति, प्रजाति सदियों से विद्दमान है, वहां कोई भी सत्य सर्वमान्य हो ही नहीं सकता। कला - संस्कृति के परिवेश में तो यह बात और भी प्रखरता से लागू होती है। जब समाज का सत्य एक नहीं तो कला का सत्य एक कैसे हो सकता है? फिर कला, संस्कृति और समाज एक दूसरे की संगिनी हो न हो किन्तु एक दूसरे के पूरक तो अवश्य ही हैं। एक दूसरे से प्राण वायु ग्रहण करके ही यह न केवल अंकुरित होती हैं बल्कि पलती, फलती, फूलती और बढ़ती भी है। इसलिए कला का सत्य पहले स्थानीय होगा, तत्पश्चात वैश्विक। वैसे भी कोई भी कला स्थानीय हुए बिना वैश्विक हो ही नहीं सकती।
जहाँ तक सवाल नाट्य संस्कृति का हैं तो उसका जड़ तो समाज के अंदर ही होता है। नाट्य संस्कृति समाज से खाद, पानी और ऊर्जा लेकर ही अमूमन कलात्मक रूप धारण करके दर्शक समाज के सामने प्रस्तुत होती है। समाज में घटित घटनाएँ, विचार, संस्कार आदि न केवल इसके विषय वस्तु बनते हैं बल्कि कहीं परोक्ष तो कहीं प्रत्यक्ष रूप से नाट्यकला और उसकी विषय वस्तु को प्रभावित भी करते हैं। अतिशयोक्ति न होगी कि नाटक यथार्थ जगत की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्वरूपों, घटनाक्रमों और संवेदनाओं में यथार्थ और कल्पना की उचित मात्रा का सहारा लेकर चयनित एक कलात्मक अभिव्यक्ति है, जो केवल यथार्थ जगत तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि तमाम सामाजिक बंधनों को तोड़कर कलात्मक सौंदर्य के खुले आकाश में भी विचरण करता है। कला की दुनियां में ना कुछ वर्जित है और ना ही पूजनीय। न कोई राजा है न रंक। ना कोई स्त्री है न पुरुष। यहाँ कल्पना और यथार्थ दोनों ही का स्थान समान है। यह कल्पना से ज़्यादा काल्पनिक और यथार्थ से ज़्यादा यथार्थवादी सामाजिक वर्जनाओं के अतिक्रमण का एक ऐसा स्थान है जो न केवल यह बताता है कि क्या सही और क्या गलत है बल्कि यह भी जतलाने की हिमाकत करता है कि बहुतेरे सत्य सही – गलत के परे और प्राकृतिक व संवेदनात्मक भी है। प्रसिद्द नाट्य चिन्तक बर्तोल्त ब्रेख्त कहते हैं – “हमारे रंगमंच के लिए निहायत ज़रुरी है कि वह समझ से पैदा होनेवाले रोमांच को प्रोत्साहित करे और लोगों को यथार्थ में परिवर्तन करने से प्राप्त होनेवाले आनंद का प्रशिक्षण दे। हमारे प्रेक्षक सिर्फ यह नहीं सुनते रहें कि प्रोमेथियस को कैसे मुक्त किया गया, बल्कि वे स्वयं को भी मुक्त करने के आनंद का प्रशिक्षण दें। हमारे रंगमंच से उन्हें आविष्कारक तथा खोजकर्ता को अनुभव होनेवाले तमाम संतोष और सुख के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए; मुक्तिदाता द्वारा अनुभव की जानेवाली तमाम विजयों के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।”
कला का एक पांव धरातल पर होता है वहीं दूसरा कल्पना के असीम संभावनाओं में। इसीलिए तो कहा जाता है कि कलाकार बनने के लिए अनुभव को पकड़ना, उसे पर अधिकार करना, उसे स्मृति में रूपांतरित करना, और स्मृति को अभिव्यक्ति में, वस्तु को रूप में रूपांतरित करना आवश्यक है। एक कलाकार के लिए भावना और यथार्थ जगत ही सबकुछ नहीं है, उसके लिए निहायत ही ज़रूरी है कि वह अपने काम को जाने और उसमें आनंद ले; उन सारे नियमों को समझे, उन तमाम कौशलों, रूपों और परिपाटियों को समझे, जिसमें प्रकृति रूपी चंडिका को वश में किया जा सके और कला के अनुशासन के अंतर्गत लाया जा सके। वह आवेग जो कलाप्रेमी को ग्रस लेता है, सच्चे कलाकार की सेवा करता है। कलाकार उस आवेग रूपी वन्य पशु के हाथों क्षत - विक्षत नहीं होता, बल्कि उसे वश में करके पालतू बनाता है।
भारतीय सन्दर्भ में यदि नाट्यकला की बात करें तो ऐसे तो नाटकीय तत्वों की शुरुआत तो पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति के के साथ ही शुरू हो गया होगा किन्तु यदि हम नाटक के आज के स्वरूप की बात करें तो जिस पुस्तक की सबसे अधिक प्रतिष्ठा आज भी है उसे हम नाट्यशास्त्र के नाम से जानते हैं। विश्वासों और मान्यताओं को यदि छोड़ दिया जाय तो एतिहासिक रूप से नाट्यशास्त्र की रचना कब हुई इसके बारे में कोई प्रामाणिक और वैज्ञानिक जानकारी नहीं है, बल्कि अलग-अलग विद्वानों का मत अलग-अलग है। माना यह जाता है कि ईसा से 200 वर्ष पूर्व से 200 वर्ष पश्चात् तक इसकी रचना प्रक्रिया चली। मतभेद इस बात पर भी है कि इसे किसी एक व्यक्ति ने लिखा या अलग-अलग काल खण्डों में अन्य लोग इसमें अध्याय जोड़ते गए। हालांकि ऐसा दावा भी है कि भरतमुनि ईसा पूर्व 322 से लेकर 500 के बीच पैदा हुए, उनका जन्म भाद्र पूर्णिमा में काशी में ईसा पूर्व 463 में हुआ, काशी में ही उन्होंने नाट्यशास्त्र की रचना की, लेकिन इन सब मान्यताओं में विश्वास ज़्यादा है प्रमाणिकता कम।
नाट्यशास्त्र का अध्ययन करते व इसके रचना के कालखंड और बृहदता को मद्देनज़र रखते हुए ऐसा सहज ही विश्वास करना उचित प्रतीत नहीं होता कि इसकी रचना किसी एक व्यक्ति ने की होगी। विद्वानों का ऐसा मत भी है कि भरत किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पद का नाम है। किन्तु यदि हम यह मानकर चलते हैं कि नाट्यशास्त्र की रचना ब्रह्मा (देवता) ने की है तो फिर तर्क की गुंजाईश ही कहाँ है? क्योंकि धर्म के मामले में तर्क नहीं बल्कि विश्वास का साम्राज्य चलता है।
कला का उत्कृष्ट रूप है काव्य और उत्कृष्टतम रूप है नाटक। नाट्यशास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें काव्य, संगीत, नृत्य, शिल्प तथा तमाम ललित कलाओं का कोष है। इस अकेले ग्रंथ में नाट्य विषयक विवरण जितनी समग्रता के साथ प्रस्तुत हुआ है वह किसी भी अन्य भारतीय ग्रंथ में तो दुर्लभ है ही, संसार के किसी अन्य ग्रंथ में भी प्राप्त नहीं। प्राचीन काल में इसे नाट्यवेद नाम से भी जाना जाता था। वैसे नाट्यशास्त्र का अध्ययन करने पर यह बात भी साफ़-साफ़ पता चल जाता है कि यह नाटककला के माध्यम से पूजापाठ का शास्त्र भी है। कब, कहाँ, किस देवी-देवता की पूजा होनी चाहिए इसकी भी बृहद चर्चा इस शास्त्र में है। नाट्यशास्त्र की रचना का कारण भी नाट्यकला के माध्यम से धर्मविमुख हुए लोगों को धार्मिक शिक्षा देना ही था। इसीलिए इसे पंचमवेद भी कहा जाता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि यह नाट्यकला का धार्मिक और राजनीतिक इस्तेमाल का भी शास्त्र है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि चूंकि नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति चारों वेदों से हुई है इसलिए इसे उपवेद कहा जा सकता है, वेद नहीं। अब चार वेदों के होते हुए उसके अंशों को निकालकर नाट्यशास्त्र नामक पांचवें वेद की रचना की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, यह बात आसानी से नाट्योत्पत्ति नामक अध्याय से समझा जा सकता है।
नाट्योत्पत्ति नामक इस अध्याय में भरतमुनि से आत्रेय आदि ऋषियों द्वारा नाट्यवेद के विषय में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न किये गए कि नाट्यवेद कि उत्पत्ति कैसे हुई? किसके लिए हुई? इसके कौन – कौन से अंग हैं? इसकी प्राप्ति के उपाय तथा इसका प्रयोग कैसे हो? जवाब में भरतमुनि ने बताया – “नाट्यवेद की उत्पत्ति ब्रह्मा ने किया। सतयुग बीत चुका था, वैवस्वत मनु का त्रेता युग प्रारंभ हो चुका था। प्रजाजन काम, लोभ, इर्ष्या, क्रोध से अभिभूत हो चुकी थी। तब महेन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि हम ऐसा मनोविनोद का साधन चाहतें हैं जो देखने और सुनने के योग्य हो। आप सभी वर्गों  के लिए उपयोगी एक पांचवे वेद की और रचना कीजिये। तब चारों वेद का स्मरण कर ब्रह्मा ने पंचमवेद अर्थात नाट्यशास्त्र की रचना की। जो धर्म, अर्थ, यशप्रदाता, उपदेश, सभी कार्यों का पथ प्रदर्शक, सभी शास्त्रों के अर्थ से परिपूर्ण तथा सभी शिल्पों को प्रदर्शित करने वाला था। इसमें ऋग्वेद से पाठ्यांश, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस को लेकर प्रणयन किया।” ब्रह्मा के कथनानुसार नाट्य में दानवों और देवताओं दोनों के अच्छे बुरे कर्मों ही नहीं बल्कि तीनों लोकों के चरित्रों का समवेश होगा और इसमें कहीं धर्म, कहीं क्रीड़ा, कहीं राजनीति, कहीं अर्थनीति, कहीं श्रम, कहीं हास्य, कहीं युद्ध, कहीं काम तो कहीं वध को दिखाया जायेगा। नाट्य में सारी विद्याओं, कलाओं, योग सहित सांसारिक सुख-दुःख का समावेश होगा।
तो क्या यह धार्मिक संस्कृति के फैलाव का भी शास्त्र नहीं है? परम्पराशील नाट्य नामक पुस्तक में जगदीशचंद्र माथुर लिखते हैं “भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र को पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठा करते हुए तीन बातों पर ज़ोर दिया। एक तो यह कि चूंकि शुद्र तथा वन्य जातियों के लोग वेद-पाठ से वंचित थे, इसलिए ऐसे वेद की आवश्यकता पड़ी, जो सभी वर्गों की जनता के लिए उपादेय हो। दूसरी बात यह कि नाट्य में ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस का संग्रह किया। भरत की तीसरी स्थापना यह थी कि नाट्य सभी प्रकार की कलाओं, शिल्प तथा ज्ञान से संपन्न होने के कारण पंचम वेद कहलाने योग्य है।” अब इसे पंचमवेद कहें या उपवेद लेकिन नाट्यशास्त्र को आज तक वह स्थान प्राप्त नहीं है जो अन्य चारों वेदों को है।
नाट्यशास्त्र के अध्ययन से एक बात साफ़ हो जाती है कि इसका प्रयोग स्वंय देवताओं ने नहीं किया बल्कि इसे भरतमुनि और अप्सराओं से करवाया। नाट्यशास्त्र की रचना करने के पश्चात ब्रह्मा में इंद्र से देवताओं द्वारा इसका प्रयोग करने को कहा। इंद्र ने आग्रह किया कि “देवताओं में अभिनय करने का समर्थ नहीं है। इसलिए आप वेदों को जानने वाले और उत्तम चरित्र के ऋषियों से नाट्यशास्त्र का प्रयोग करवाईए।” तब ब्रह्मा ने भरत को बुलाकर यह काम सौंपा। भरत अपने सौ पुत्रों (शिष्यों) के साथ नाट्यशास्त्र के प्रयोग में लग गए। नाट्य में सौंदर्य और श्रृंगार को जोड़ने हेतू ब्रह्मा ने चौबीस अप्सराओं का नाट्य में समवेश कराया। इस प्रकार देवासुर-संग्राम नामक नाट्य तैयार हुआ। इस नाटक में देवताओं की विजयी गाथा व असुरों को खलनायक के रूप में चित्रण किया गया था।
महाजन जिधर जाएँ, सही रास्ता वही है नामक वाक्य को माननेवाला समाज में सामाजिक स्तर पर बिलकुल यही स्थिति आज भी विद्दमान है। यहाँ आज भी नाटक करनेवाले कम हैं और उन्हें नचनियां – बजानियाँ नामक शब्दों के मार्फ़त उपहास का पात्र भी बनाया जाता है। ऐसे परिवारों की संख्या अपवाद स्वरुप ही है जो अपने घर के लड़के – लड़कियों को खुशी से नाटक करने की छूट देते हैं। समाज में आज भी भरतपुत्रों की स्थिति किसी अछूत जैसी ही है, जिसे कुछ आरक्षण और दया तो मिलती है लेकिन अमूमन उचित सम्मान और स्थान नहीं। वैसे आधुनिक नाटक न जाने कब का नाट्यशास्त्र की अवधारणाओं और उद्देश्यों से आगे निकल चुका है। अब वह केवल धार्मिक प्रचार प्रसार का माध्यम न होकर आम आवाम के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मानसिक आदि सवालों से ही दो-चार नहीं हो रही है बल्कि उसका बौधिक परिवेश भी तैयार करने की फिराक में रहता है। इसके नायक - खलनायक अब देवता और दानव नहीं हैं बल्कि हार ओर मानव ने कब्ज़ा कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज का नाटक किसी भी अमानवीय सत्ता और विचार को चुनौती देने का कलात्मक मिशन पर लग गया हो। हालांकि इसकी शुरुआत की झलक नाट्यशास्त्र का पृथ्वी पर अवतरण नामक कथा में ही दिखाई पड़ जाती है जब एक हास्य भरा प्रहसन देखकर एक ऋषि क्रोधित हो जाते हैं और उन्होंने भरतपुत्रों को शाप देते हुए कहते हैं - “भरतपुत्रों। तुम्हारा यह हास्य से भरा हुआ प्रहसन, भद्दा, क्रूर और अमंगलकारी है। तुम लोग नाट्यवेद के ज्ञान के कारण इतने अहंकारी हो गए हो कि अब तुम ऋषियों का भी अपमान कर रहे हो इसलिए भरतपुत्रों कालान्तर में तुम्हारा वेद ज्ञान नष्ट हो जाएगा। ऋषियों और ब्राह्मणों की सभा में तुम्हारा सम्मान नहीं होगा। जो तुम्हारे वंश में जन्म लेगा वह भी अपवित्र - आचरणहीन माना जाएगा। तुम्हारी संतान नर्तक-नाचनेवाली कहलाएगी जो दर्शकों पर आश्रित होकर, अपना जीवन यापन करेगी।” भरतपुत्रों ने शयद इस नाटक में ऋषियों को हास्य और व्यंग्य का पात्र बनाया था। बहरहाल, इस शाप को सुनकर भारतपुत्र ने आत्महत्या करने का विचार किया तो भरत ने अपने पुत्र को प्रयत्नपूर्वक अपने शिष्यों और अप्सराओं को नाट्यवेद की शिक्षा देने और नाट्य के विकास कार्यरत होकर ही इस शाप से मुक्ति की बात समझाई। ऐसा प्रतीत होता है जैसे भरतपुत्र आज भी अपने इस निहायत ही ज़रुरी पर लगे हों और आज के समाज के प्रतिष्ठित ऋषि और ब्राहमण आज भी शाप पर शाप दिए जा रहे हैं।
नाटक को अंग्रेज़ी में प्ले कहते हैं जिसका हिंदी में अर्थ होता है खेल। खेल अर्थात एक ऐसी चीज़ जिसमें ना केवल शारीरिक एकाग्रता की ज़रूरत होती है बल्कि दिल, दिमाग और मन की एकाग्रता भी अति आवश्यक पहलू है। वैसे भी कोई भी खेल केवल शारीरिक ताकत और उर्जा के सहारे कुशलतापूर्वक नहीं खेला जाता है। लेकिन समाज में प्रचलित कथनों से खेल के प्रति समाज के नज़रिए का पता चलता है। यहाँ आज भी बात – बात में नाटक मत करो, बहुत नौटंकी किया जैसे वाक्य बोले जाते हैं वहीं “पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब! खेलोगे, कूदोगे होगे खराब!!” जैसे वाक्य भी लोकप्रिय हैं। यहाँ पढ़ाई, लिखाई से विद्वता का कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि अमूमन लोग उतनी ही पढ़ाई करने की सलाह देते हैं जितने से कि अच्छी नौकरी प्राप्त की जा सके। अच्छी नौकरी – पेशा का अर्थ नवाबी से जोड़ना सामंती मानसिकता का परिचायक हो न हो लेकिन “ज़्यादा पढ़ने से दिमाग खराब हो जाता है” जैसी मान्यता तो है ही। क्योंकि विद्या ज्ञान का मार्ग दिखता है और ज्ञान सत्य का। एक बार जिसे सत्य का आभास हो गया फिर उसके लिए तो यह जगत मिथ्या ही है। बहरहाल, प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पढ़ाई - लिखाई करने का अर्थ सरस्वती के माध्यम से लक्ष्मी पर अधिकार प्राप्त करना है। ऐसा ज्ञान जिससे धन की प्राप्ति न हो पागलपन की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे समय और समाज में कला और कलाकार जैसी पागलपन भरी राह की प्रतिष्ठा कितनी होगी, यह बात अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी जब भौतिकता सुख – सुविधाएँ ही जीवन हो जाए तब मानसिकता भौतिकता का गुलाम बनकर रह जाती है और भौतिकता को ही सफल जीवन का पर्याय मान लिया जाता है। यहाँ आध्यात्मिक (धार्मिक नहीं) और मानसिक विकास फालतू और भोग - विलास की वस्तु मान लिया जाता है।
ऐसे समय में कलाकार बनने और वह भी नाटक का कलाकार बनने का निर्णय, और वह भी ईमानदार और सच्चा कलाकार बनने का निर्णय लेना दहकते अंगारों से खेलने के समान है। लेकिन हर काल में कुछ विरले होते हैं जिन्हें अंगारों से ही खेलने में मज़ा आता है। वैसे भी आधुनिक नाट्य – संस्कृति तमाम दुनियावी मान्यताओं का अतिक्रमण करता है, वह न जाति मानता है, न धर्म और ना ही किसी अन्य प्रकार का भेद भाव। यहाँ सब केवल और केवल कलाकार हैं और कला की उत्पत्ति ही इनका धर्म है। ऐसी संस्कृति का समर्थन करने की हिमाकत कोई भी वर्ग – वर्ण में विभाजित, ईश्वरवादी, सामंती और गुलाम मानसिकता से ग्रसित समाज कर ही नहीं सकता बल्कि उल्टे मौके – बे-मौके उसका नुकसान पहुँचाने और मजाक बनाने से कतई परहेज़ नहीं करेगा। आए दिन कलाकारों पर हमले होना और उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा का शिकार बनाना, कलाकारों को समाज से अलग मानना, कला और कलाकारों की कोई परवाह या चिंता न करना, समाज के इसी सामंती और यथास्थितिवादी नज़रिए को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम अनुभूतियों, ज्ञान और विवेक को विकृत करनेवाले अति-असंवेदनशील और क्रूर युग में जी रहे हैं अथवा जीने को अभिशप्त हैं। यहाँ किसी नेता की छींक राष्ट्रीय समाचार बन जाती है और किसी कलाकार और किसान की मौत केवल एक दुर्घटना मात्र मान लिया जाता है। कोई सुपरस्टार किसी गुनाह में जेल जाने के मुहाने पर पहुंचाता है तो पूरा देश उसके लिए दुआ मांगने लगता है लेकिन वहीं किसी अच्छे – सच्चे कलाकार का खाली पेट किसी की चिंता का कारण नहीं बनता। ऐसे समय में यदि यह सच है कि कला और संस्कृति समाज का आइना होता है तो उतना ही सच यह भी प्रतीत होता है कि इस आईने पर सदियों पहले ही कालिख पुत गई है। बिना इसकी गहन सफाई के इस आईने में कोई भी अश्क नहीं देखा जा सकता। लेकिन बाज़ार का अंधा खरीदार बना आदमी अश्क – वश्क की नहीं बल्कि माल, जेब और भौतिक सुख – सुविधाओं की चिंता करता है। वैसे भी आज तो पुरी दुनियां हीं बाज़ार बनने को बैचैन है और राजनीति व राजनीतिक पार्टियां इस बाज़ार में ग्राहक पटाने और अपने कारपोरेटिया मालिकों को ज़्यादा से ज़्यादा सुविधा में व्यापार करने देने और सत्ता सुख का आनंद प्राप्त करने की अंधी गली के रूप में परिवर्तित हो गईं हैं। इन्हें न प्रजा की चिंता है, न तंत्र की। कला और संस्कृति तो इनके लिए आज भी एक अबूझ पहेली ही है। धूमिल ने कुछ यूं कहा था  – न प्रजा है, न तंत्र है। आदमी के खिलाफ़, आदमी का षडयंत्र है। इस षड्यंत्र से बाहर निकलने में मदद करने का कार्य करता है कला। क्योंकि, कला और संस्कृति ही मानव जीवन के मूलाधार हैं। कला इसलिए ज़रुरी है कि आदमी दुनियां को समझ सके और इसे और ज़्यादा सुन्दर, कोमल, तार्किक और संवेदनशील बना सके। बिना इन सबके कोई भी दुनियां मानवीय हो ही नहीं सकती होगी।
वर्तमान समय में भारतीय समाज का मूल चरित्र अर्ध – सामंती और अर्ध – ओपनिवेशिक है, जिसमें यदा कदा प्रजा, प्रजातंत्र, जनवाद, समाजवाद, साम्यवाद, प्रगतिशीलता, बौधिकता, मूर्खता आदि - इत्यादि की खिचड़ी पकती रहती है। ऐसे समाज में कला या तो बे-सिर पैर के मनोरंजन के रूप में लोकप्रिय होती या की जाती है अथवा एक संदिग्ध, कुत्सित और तुच्य चीज़ मान ली जाती है। वैसे भी पूंजीवाद मुक्त बाज़ार का पोषक होता है जिसमें उद्देश्यपूर्ण कला का स्थान “गैरज़रूरी और बिना किसी लाभ वाली” चीज़ के रूप होती है। वही सामंती मानसिकता चीज़ों का उपभोग तो करती है लेकिन केवल उनका जो बिना श्रम और दिमाग लगाए हासिल किया जाय।
कला और कलाकार का एतिहासिक अध्ययन करने से एक बात जो साफ़ – साफ़ समाज में आती है वो यह कि इसे सदा ही प्रश्रय की ज़रूरत पड़ती रही है। भारतीय सन्दर्भ में कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी कि कोई कला अपनी बदौलत अपने कलाकारों का भरण – पोषण करता हो। कला कभी उत्पाद बन ही नहीं सका और जो बना उसमें कला का अंश कम से कम और बिना सिर – पैर का “खतरनाक” मनोरंजन ज़्यादा हावी रहा। कभी यह प्रश्रय जनता ने दिया, कभी राजाओं ने, कभी धार्मिक संस्थानों ने तो कभी सरकारों ने। लेकिन इन प्रश्रयों ने कला और कलाकार के लिए कोई आदर्श माहौल बनाया हो, ऐसा नहीं है। प्रजतंत्र के आगमन के साथ तो स्थिति यह है कि प्रजातंत्र के सबसे बड़े प्रहरी के रूप माने जानेवाले विभिन्न दल और उसके नेतागणों की प्राथमिकता में ना कभी कला रही और ना ही संस्कृति। इसका कारक भी समाज ही है। यह पार्टियां और उसके नेता भी इसी समाज के अंग हैं और जब समाज ही अपने कला – संस्कृति के प्रति गंभीर नहीं है तो कोई पार्टी और नेता क्यों हों? कालांतर में कला और संस्कृति के नाम पर जो कुछ हुआ उसका सगूफा ना जाने कब का फूट चुका है और वर्तमान में कला और कलाकार को प्रश्रय देने के नाम पर जो सरकारी योजनाएं और अनुदान चलाए या दिए जा रहे हैं वह प्रक्रिया ही इतना अनैतिक और पंगु बनाने के विष से परिपूर्ण हैं कि उससे किसी कला और कलाकार को आज़ादीपूर्वक साँस लेने जीने की मिलेगी, इसमें संदेह है। बल्कि यहाँ तो ऐसा बंदरबांट मचा है कि जिसकी जितनी पहुँच, उसका पलड़ा उतना भरी। चारों तरफ़ खानापूर्ति का मौहौल है। हो सबकुछ रहा है लेकिन निरुद्देश्य और लगभग बकवास।
इन सब बातों के बावजूद कला और संस्कृति के क्षेत्र में जूनून और जुनूनी लोगों की भी कोई कमी नहीं, जो तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए कार्यरत और संघर्षरत हैं। क्योंकि दुनियां चाहे जैसी भी हो वह केवल बाज़ार और खरीदारों की तो कभी नहीं रही। कुछ लोग हमेशा रहे ही जो इस सारे आडम्बर पर ठहाका लगाते रहे। कला ज़रुरी है, इसलिए कि आदमी दुनियां को समझ सके और उसे बदल सके। कला के अंदर दुनियां बदलने की ताकत हो - न हो, लेकिन इसके बिना किसी भी मानव समाज का काम न आजतक चला है न चलेगा। ज्याँ कॉक्टो के शब्दों को उधार लेकर कहा जा सकता है कि नाटक के बिना किसी भी मानवीय समाज काम नहीं चल सकता, लेकिन मैं यह नहीं बता सकता कि उसका काम क्या है।
मनुष्य प्राकृतिक और प्रवृतिगत रूप से उस व्यक्ति से बढ़कर कुछ और भी है, जो वह बना दिया गया है। कला व्यक्ति के मैं को समष्टिगत अस्तित्व से जोड़ता है और उसकी वैक्तिकता को सामाजिकता से। एक ऐसे समय में जब तमाम ताकतें व्यक्ति को अकेला, स्वर्थी और आत्मकेंद्रित बनाने की साजिश में लगीं हैं वैसे समय में किसी भी सार्थक सामूहिक कला की ज़रूरत और ज़्यादा बढ़ जाती है। किन्तु यह क्रिया तबतक अपने आगाज से अंजाम तक नहीं पहुँच सकता जबतक सामाजिक स्तर पर इसकी ज़रूरत न महसूस किया जाय। हाथ पर हाथ धरे ऐसे समय का इन्तजार करने से बेहतर है उसकी दिशा में अपने कदम बढ़ाए जाएँ। एक सुदृढ़ और निश्चय भरा – सार्थक कदम। वैसे भी बिना कला, संस्कृति और ज्ञान के मनुष्य और मनुष्यता एक कदम आगे और दस कदम पीछे चलता है। एक ऐसे समय में जब किसी लेखक को अपनी मृत्यु की घोषणा करना पड़ता है और वो अपने पाठकों और प्रकाशकों से अपनी किताबें जला देने को कहने पर मजबूर किया जाता है, किसी व्यक्ति की निर्मम हत्या केवल इसलिए कर दी जाती है कि उसका धर्म और खान-पान अलग है, सत्ता का सर्वोच्य संस्थान अहम् की भेंट चढ़ जा रहा है और बाकि सलाम बजा लाने को अभिशप्त है, रचना और रचनाकार, कला और कलाकार या तो हासिए पर धकेले जा रहे हैं या फिर मानसिक गुलाम की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाने को अभिशप्त हैं, हवा और सुनामी चलाकर सरकारें बनाई और गिराई जाने लगी हैं; ऐसे समय में सार्थक और सृजनात्मक कला और कलाकार का महत्व और भी बढ़ जाता है। अरस्तु ने ठीक ही कहा था - नाटक का काम भावनाओं को परिशुद्ध करना है, आतंक और दया पर विजय प्राप्त करना है, ताकि ओरेस्टिज अथवा ईडिपस से तादात्म्य करनेवाला प्रेक्षक उस तादात्म्य से मुक्त हो सके और भाग्य की अंधी कारगुज़ारियों से ऊपर उठ सके।

आलेख मुन्ना कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक "संस्कृति : विविध परिवेश" में संलग्न

Tuesday, May 10, 2016

हर आत्महत्या एक विद्रोह है : अपने और अपनों के विरुद्ध

पंजाबी साहित्य के जाने माने नाम और सामाजिक कार्यकर्त्ता सतनाम ने आत्महत्या (?) कर ली। सतनाम जो माओवादी आंदोलन को ठीक से जानने समझने के लिए बस्तर के जंगलों में जाते हैं। वहां उनके बीच रहकर जो अनुभव प्राप्त करते हैं उसे वो अपनी प्रसिद्द किताब जंगलनामा में दर्ज़ करते हैं। आज “जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में” अपने तरह की अनूठी रचना है। “जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में” मूलतः पंजाबी में लिखी गई थी। जिसका अब तक छः भाषाओं में अनुवाद हो चुका है जिसमें अंग्रेज़ी भी शामिल है। अंग्रेज़ी में इसका अनुवाद पेंगुइन (शायद) ने किया है। इसी सतनाम ने आत्महत्या कर ली – कहीं कोई खबर - नहीं – वाह !!! 
एक ऐसे समय में जब एक लेखक को अपनी रचनात्मकता के मृत्यु की घोषणापत्र लिखने को विवश होना पड़ रहा है और किसी व्यक्ति की हत्या केवल इस वजह से कर दिया जाता है कि उसका धर्म और खाना (?) हमसे अलग है, ऐसे वक्त में कोई आश्चर्य नहीं कि सतनाम जैसे लोगों की मौत किसी के लिए कोई अर्थ भी नहीं रखता हो ! वैसे शायद ऐसी आत्महत्याओं (?) का कभी भी कोई महत्व नहीं रहा, वक्त चाहे जैसा भी रहा हो ।
बहरहाल, अलग – अलग वजहों से माओवादी आंदोलन पर बहुत से लोगों ने कई किताबें लिखी हैं। कुछ चर्चित हुए, कुछ शायद न भी हुए। सतनाम की किताब “जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में” का हिंदी अनुवाद पलटने पर न सतनाम का न कोई परिचय आदि मिलता है, ना तस्वीर और ना ही उनकी महानता का परिचय करता हुआ कोई भूमिका ही। यह पुस्तक उन सच्चाइयों से परिचय करने का एक प्रयास भर कराती है, जिनसे हम या तो अब तक महरूम हैं या फिर गलत जानकारी के शिकार। इस पुस्तक के बारे में हरिपाल त्यागी लिखते हैं – “अपनी अनूठी विषय वस्तु और सहज-सरल लेखन शैली की वजह से तो यह पुस्तक खास अहमियत रखती ही है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत आम आदमी की संघर्षपूर्ण ज़िंदगी के प्रति लेखक का लोकहितकारी नज़रिया, इन्साफ और हक की लड़ाई में उसकी जनपक्षधरता, घटनाओं की तह तक पहुंचकर वास्तविक सच्चाइयों को खोजने की गहरी और प्रबल जिज्ञासा व इसके लिए लेखकीय इमानदारी को प्रमुखता देते हुए अभिव्यक्ति का खतरा उठाना। यह महज एक जगह से दूसरी जगह का सफ़र तैय करने और उसका रोचक ढंग से वर्णन कर देना ही नहीं है, बल्कि इससे भी ज़्यादा आदमी से आदमी तक की यात्रा है। एक दिल से दूसरे दिल के जुड़ने को बयान करनेवाली यह बड़े मकसद का सफरनामा है।” 
पुस्तक में तआरुफ़ के नाम पर सतनाम लिखते देते हैं कि – “जंगलनामा, जंगलों के बारे में कोई खोज पुस्तक नहीं है। न ही किसी कल्पना में से पैदा हुई, आधी हकीकत और आधा अफ़साना बयान करने वाली कोई साहित्यिक कृति है। यह बस्तर के जंगलों में क्रियाशील कम्युनिस्ट गुरिल्लों की रोज़ाना ज़िंदगी की एक तस्वीर और वहां के कबायली लोगों की जीवन-हालातों का विवरण है, जिसको मैंने अपनी जंगल यात्रा के दौरान देखा। पाठक इसे किसी डायरी के पन्ने कह सकते हैं। 
इसके पात्र हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान हैं जो अपने सपनों को हकीकत में ढालना चाहते हैं। हुकूमत की तरह से बागी और पाबंदीशुदा करार दी गए ये पात्र नए युग, नई ज़िंदगी को साकार होता देखना चाहते हैं। इतिहास उनके लिए क्या समेटे हुए है, ये तो बननेवाला इतिहास ही बताएगा, लेकिन इतिहास को वो किस तरह मोड़ देना चाहते हैं; उसकी व्याख्या उन्हीं की जुबानी में पेश की गई है। अपने अकीदों के लिए जान की बाज़ी लगाने को तैयार ये लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं, इसका अंदाज़ा पाठक इस किताब को पढ़कर आसानी से लगा सकते हैं।“ 
–
अक्टूबर 2003, सतनाम। 
सतनाम यानि गुरमीत - जिनका जंगल में प्रवेश करते ही पांव मोच खा जाता है। 
“
हमारी आँखे मिलीं, मुस्कुराकर एक दूसरे को स्वभाविक सलाम किया और फिर उससे हाथ मिलाने के लिए उठाने लगा, मगर मेरे पैर ने मेरा साथ नहीं दिया और एक टीस ने मुझे वहीं दबोच लिया।” “क्या हुआ?” “पैर मोच खा गया ! हो गई मुसीबत।” मेरे मुंह से निकला। - (जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में) “जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में” का दूसरा भाग उनके दिमाग में था लेकिन जबतक लिखते तबतक लिखने की प्रेरणा ही खत्म हो चुकी थी। माओवादी आन्दोलनों के नाम पर जो कुछ भी चल रहा है/था उसने ही सबसे बड़ी भूमिका निभाई उनके मोहभंग में। वैसे भी जहाँ सवाल करने पर दरकिनार कर दिया जाय और तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नाम पर मूढ़ता की हरी-हरी फसल लहलहाने रही हो, वहां और उम्मीद ही क्या किया जा सकता है. सतनाम जैसे लोग मूढ़ बनने को कतई तैयार नहीं थे और ना ही विचारधारा के नाम पर किसी जंगली पशु के हाथों चरे और लीदे जाने को ही तैयार थे। 
आजादी से मोहभंग के साथ ही, हर प्रकार के शोषण के मुक्त, नई दुनियां बनाने और गढ़ने का सपना दिल में पाले नौजवानों का एक पूरा का पूरा हुजूम 70 और 80 के दशक में भारतीय पटल पर सक्रिय हुआ। किसी की परिणति सुधारवादी अराजकता के साथ समाप्त हो जाती है तो कोई नक्सलबाड़ी आंदोलन को आदर्श मानते हुए दीर्घकालीन लोक युद्ध के रास्ते पर निकल पड़ता है जिसकी आंच 80 के दशक के अंत आते-आते ही अराजक और बोझिल होने लगती है। 90 के दशक तक आते-आते तो यह अराजकता और बोझिलता एक खतरनाक रूप धारण कर लेती है। फिर तो बिना दिमाग लगाए जो धंधे, वसूली और वाद का चोला धारण किए थे - उनकी तो बल्ले-बल्ले हो जाती है लेकिन जो अपने सपने के साथ अभी भी ईमानदारी और संवेदनात्मक रूप से जुड़े होते थे/हैं, वो एक अवसादग्रस्त की श्रेणी में खड़े होने को अभिशप्त हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं। 
कोई भी जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलन जब अराजकता और वैचारिक दिवालिएपन का शिकार होता है तो संवेदनशील कार्यकर्ताओं और वाद के सच्चे और ईमानदार सिपाहियों का सहारा या तो परिवार बनता है या फिर दोस्तों का जिंदादिल समूह। समाज की संवेदना और संवेदनशीलता पर कुछ भी कहना वक्त ज़ाया करना है। बात को सकारात्मक बनाते हुए बस इतना कहा जा सकता है कि परिवार और दोस्तों का समूह भी इसी समाज का अंग होता हैं। 
उम्र के लगभग आखिरी पड़ाव पर पहुंचे ये लोग पार्टी के लिए अनवांटेड हुए तो मजबूरन वहां से परिवार की तरफ़ लौटे या लौट रहे हैं। और जहाँ तक सवाल मित्र मंडलियों का है तो अमूमन सब ही तो अवसाद के दौर से गुज़र रहे हैं, तो कौन किसका और कब तक और कितना ख़याल रखे! समाज को समाज की चिंता में लगे किसी सामाजिक कार्यकर्त्ता, लेखक, कलाकार आदि की कितनी चिंता है यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं। तो अब सवाल यह है कि इनकी चिंता करे तो कौन? ऐसे समय में अब इनके पास दो ही रास्ते बचतें हैं – एक कि बाकि बची ज़िंदगी जैसे-तैसे खींच – तानकर गुज़ार दें या फिर -------! 
सतनाम ने दूसरा रास्ता चुना। नहीं, चुना नहीं बल्कि चुनने को मजबूर हुए। ऐसा नहीं कि जो उन्होंने किया उसका अंदाजा किसी को नहीं था। बल्कि समय–समय पर वो यह बात कहते भी थे। लेकिन उनके इस कथन को झूठा साबित करने के लिए जो प्रयत्न किए जाने चाहिए थे वह नहीं हुए – शायद ! नतीज़ा सामने हैं – सतनाम, कानू सान्याल, गोरख पांडे, सीताराम शास्त्री, रोहित और ना जाने कितने और नामों के रूप में। 
तो क्या सतनाम और इन जैसे लोगों ने आत्महत्या की है? नहीं...। यह हत्या है और उसके जिम्मेवार निश्चित रूप से वे लोग और पार्टियां हैं जिनके कंधे से कंधा मिलाकर इन्होनें समाज परिवर्तन का सपना देखा था। बदले में ये लोग वैचारिक और सैधांतिक मतभेदों के नाम लगभग अलग–थलग कर दिये गए और ये लोग या तो अवसादग्रस्तता में जाने को मजबूर हुए या फिर निर्थक हो गए। यह सबकुछ वैचारिकी और सिद्धांत का झगड़ा कम और क्रांति के नाम पर दादागिरी का प्रकोप ज़्यादा है। शायद यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति लगे लेकिन ऐसी सारी पार्टियां अब अप्रासंगिकता की कगार पर हैं। यहाँ अब विचार के नाम पर धंधा होता है। सतनाम जैसे लोग शायद इस पतन को बर्दाश्त नहीं कर पाए, और --- । 
अब; सतनाम के नाम पर भाषणबाजी, रोना–गाना, कसमें खाना, फूल-माला चढ़ाना, लाल सलाम बजाना - सब होगा; होना भी चाहिए। लेकिन उन सबसे ज़रुरी सवाल यह है कि... आखिर वो कौन सी स्थितियां– परिस्थितियां हैं जिसमें एक कोमल हृदय क्रांतिकारी लेखक के अंदर आत्महत्या का विचार पनपता है? सवाल करना ज़रुरी है ताकि कई और सतनामों को बचाया जा सके। आत्महत्या कायरता नहीं, बल्कि हर आत्महत्या एक विद्रोह है: अपने, अपनों और अपने सपनों के विरुद्ध।
वैसे भी जो विचार या पार्टी या लोग अपने साथियों की भी रक्षा न कर सके, वह देश, दुनियां और समाज का कितना भला करेगा, संदेह है। वहां विचार की प्रमाणिकता और वैज्ञानिकता का दावा एक ढकोसला ही प्रतीत होने लगता है जहाँ चीजें व्यवहार से सही न हों। सनद रहे कि जब कोई सवाल नहीं करता तो सड़क से गुज़रता मुर्दा यह सवाल करता है कि आदमी मरता क्यों है? 
सतनाम ने शायद कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा। अगर छोड़े भी हैं, तो किसके लिए?
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने कह तो दिया है - 


“अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता 



सुनना चाहता हूँ 



एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो । 



अन्यथा 



इसके पूर्व कि 



मेरा हर कथन 



हर मंथन 



हर अभिव्यक्ति 



शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए, 



उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ 



जो मृत्यु है !
‘वह बिना कहे मर गया’ 



यह अधिक गौरवशाली है 



यह कहे जाने से – 



‘कि वह मरने से पहले 



कुछ कह रहा था 



जिसे किसी ने सुना नहीं ।“

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...