Saturday, July 26, 2014

नाटक नटमेठिया के बारे में ---

नटमेठिया एक जीवनीपरक (Bio-graphical) नाटक है जिसके केन्द्र में हैं बिहार के लेखक, कवि, अभिनेता, निर्देशक, गायक, रंग-प्रशिक्षक भिखारी ठाकुर और भारतीय समाज की जटिल वर्गीय व जातीय बुनावट । भिखारी ठाकुर की संघर्षशील जीवनयात्रा का काल 1887 से 1971 रहा है यानि ब्रिटिश राज से लेकर आज़ाद भारत और भारत निर्माण तक का काल । यह वही काल है जिसमें दुनियां में क्रांतियों व विश्वयुद्धों का दौर चलता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है और भारत एक आज़ाद देश घोषित होता है । वैश्विक धरातल पर तेज़ी से घटित होता यह तमाम सामाजिक - राजनीतिक परिघटनाएं इस नाटक के विषय वस्तु को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं और कहीं-कहीं तो सीधे विषय-वस्तु ही बन जाती हैं । इस नाटक के केन्द्र में नाच जैसी इरोटिक और विशुद्ध मनोरंजन मात्र के रूप में लोकप्रिय विधा भी है जिसे परिष्कृत और कलात्मक बनाकर आज के आदमी का दुःख दर्द को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाकर प्रस्तुत करने की छटपटाहट भिखारी ठाकुर के अंदर साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है, जिसमें एक तरफ़ सामाजिक संघर्ष है तो दूसरी तरफ़ है एक कलाकार का अपना अंतर्जगत । कहीं परम्परा का निर्वाह है तो कहीं उसके घुटन भरे ताने-बाने से निकलने की चटपटाहट भी ।
यह नाटक नाट्यकला के प्रति पूर्णतः समर्पित भिखारी ठाकुर के जीवन, कला, नाट्यकर्म व लेखन के माध्यम से एक खास प्रकार का दलित व स्त्री विमर्श भी प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है । जिसमें उनके संघर्ष के साथ ही साथ भारतीय वर्ग-वर्ण व्यवस्था का सजीव, रोचक व क्रूर चित्रण भी सामने आता है ।
समाज में व्याप्त कुरीतिओं के खिलाफ़ जब कोई कलाकार पारंपरिक कलात्मक व सामाजिक तौर-तरीकों, प्रतीकों (Traditional artistic & Social Styles-Symbols) का इस्तेमाल सुधारवादी चिंतन के लिए करता है तो उसे लोकप्रियता के साथ ही साथ कला और मानव समाज के विचारों के अंतरद्वन्द का भी सामना करना पड़ता है । इस द्वन्द के सृजनात्मक और सार्थक इस्तेमाल से ही तो कला और समाज दोनों में निखार आता है और मानवीय संवेदनाएं वर्जनाओं और कर्मकांडों से ऊपर उठकर और ज़्यादा मानवीय होने की दिशा में अग्रसर होतीं हैं ।
तमाम वर्गों, वर्णों, जातियों, समुदायों में विभाजित, सामंती और उपभोक्तावादी मानसिकता से ग्रसित समाज में कला, कलाकार, वर्ग और समाज का संघर्ष युगों पुराना है । तिथियाँ बदली हैं, परिस्थितियां बदली हैं, स्वरुप बदला है, तरीका बदला है किन्तु यह संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ है । प्रस्तुत नाटक भिखारी ठाकुर के माध्यम से कला-कलाकार व समाज के बीच व्याप्त इसी द्वन्द व संघर्ष की भी एक व्यावहारिक गाथा प्रस्तुत करने का प्रयास है ।
नाटक का नाम - नटमेठिया, प्रस्तुति - रागा रंगमंडल, पटना, निर्देशक - रंधीर कुमार, नाटककार - पुंज प्रकाश; प्रथम प्रदर्शन दिनांक - 8 एवं 9 जुलाई 2014 स्थान - कालिदास रंगालय, पटना, समय - संध्या 7 बजे । अभिनेतागण - सुनील बिहारी, मनीष महिवाल, अजीत कुमार, बुल्लू कुमार, आशुतोष, रवि महादेवन, उदय, रवि कौशिक, शिल्पा भारती, निखिल व आकाश । पार्श्व सहयोग - भूपेंद्र कुमार, मार्कंडेय पाण्डेय, गुंजन कुमार, विनय आदि । नटमेठिया संजीव के उपन्यास सूत्रधार, भिखारी ठाकुर रचनावली, कबीर के निर्गुण, रामचरितमानस व दलित कविताओं को आधार बनाकर लिखा गया है । 

Thursday, July 24, 2014

बिहार संगीत नाटक अकादमी का सांस्कृतिक भ्रष्टाचार ।

पिछले दिनों बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता और अकलात्मक नज़रिए के प्रतिरोध स्वरुप पटना के संस्कृतिकर्मियों ने आंदोलन किया । धरना, मशाल जुलुस, नुक्कड़ नाटक, जनगीत तथा आम जनता के बीच पर्चा वितरण का कार्यक्रम चलता रहा और कला-संस्कृति से जुड़ा सरकारी महकमा चैन की नींद सोता रहा । इन्हें यह भरोसा था कि कुछ दिन ये लोग हल्ला-गुल्ला करेंगें फिर सब कुछ अपनी गति से चलता रहेगा । इस व्यवस्था में यही होता रहा है, यही होगा । वैसे, कला-संस्कृति के संरक्षण और विकास के नाम पर विभिन्न विभागों-अकादमियों में क्या कुछ चलता रहता है, यह अब छुपा नहीं रहा है । जिस देश में कला-संस्कृति किसी के एजेंडे में ही न हो वहां कला-संस्कृति की दशा क्या होगी, इस बात सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । क्या यह एक त्रासदी नहीं है कि आज तक हमारे देश में कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति नहीं बनी है । विक्टोरियन मापदंड को आज तक सिर-आँखों पर लगाए यह मुल्क कब अपनी ज़मीन पहचानेगा ? वैसे यह बात भी निरा बकवास है कि कलाकारों को केवल अपनी कलाकारी से मतलब होना चाहिए । ऐसा बोलनेवाले समुदाय अमूमन खाए-अघाए लोगों का होता है जो यह भूल जाते हैं कि कलाकार भी पहले एक सामाजिक प्राणी है, जो सामजिक चुनौतियों से परे होकर नहीं रह सकता; और यदि रहता है तो उसे यह भी याद रखना चाहिए कि शुतुरमुर्ग बनाने से समस्या हल नहीं हो जाती ।
चिंगारी जिसे फूटना ही था ।
किसी भी विद्रोह की जड़ में अमूमन एक छोटी सी चिंगारी होती है, जो धीरे-धीरे दावानल का रूप धारण करती है और एक सफल आंदोलन के इतिहास में कई सारे असफल आंदोलनों की उर्जा समाहित होती है । बिहार संगीत नाटक अकादमी के संदर्भ में आग में घी डालने का काम किया एक बिना तारीख और हस्ताक्षर वाले एक नोटिस ने जिसपर अंकित था “पूर्वाभ्यास करनेवाली सभी स्वैच्छिक संस्थाओं को सूचित किया जाता है कि प्रेमचंद रंगशाला परिसर में पूर्वाभ्यास करने हेतु संस्था को पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा । किसी भी संस्था को पूर्वाभ्यास से सम्बंधित सामग्री प्रथम तल लॉबी या भीतर भूतल तल में रखने की अनुमति नहीं है । आदेश का उल्लंघन करने पर नियमानुसार करवाई की जायेगी ।”  
इस देश में; खासकर हिंदी प्रदेश में, रंगमंच का चरित्र मूलतः अव्यवसायिक ही है, और संस्कृतिकर्म यहाँ पेशा से ज़्यादा पैशन है । जो लोग भी पटना रंगमंच को जानते है उन्हें यह मालूम है कि प्रेमचंद रंगशाला का प्रागंण दशकों से पटना के रंगकर्मियों की कार्यस्थली रहा है । पटना के रंगकर्मी तब भी इस रंगशाला को अपने पूर्वाभ्यासों से गुलज़ार रखे हुए थे जब यह सरकारी उदासीनता का शिकार हो एक खंडहर में तबदील हो गया था ।
बहरहाल, पता करने पर ज्ञात हुआ कि यह नोटिस बिहार संगीत नाटक अकादमी के प्रभारी सचिव विभा सिन्हा महोदया ने लगवाया था । वह यह तानाशाही प्रवृति अपनाकर रंगशाला से रंगकर्मियों को बाहर निकालने की साजिश कर रही थी । इस नोटिस के पश्चात लिखित सूचना देने के बावजूद भी वहां संस्थाओं को पूर्वाभ्यास करने से रोका गया । पटना की एक रंग संस्था का सामान अकादमी की प्रभारी सचिव द्वारा रंगशाला की सुरक्षा का हवाला देकर बाहर कर दिया गया । इस नाटक का प्रदर्शन गांधी मैदान स्थित कालिदास रंगालय में संपन्न होने के पश्चात पटना के संस्कृतिकर्मी इकठ्ठा होकर यह तय करते हैं कि कला संस्कृति एवं युवा विभाग के सचिव चंचल कुमार, जो अभिनय कार्यशाला का उद्घाटन करने प्रेमचंद रंगशाला आने वाले हैं, से इस विषय में बात की जाय । यह घटना 11 से 16, 2013 जुलाई के बीच की है । दूसरे दिन संस्कृतिकर्मी प्रेमचंद रंगशाला पहुंचे तो कला संस्कृति विभाग के निदेशक विनय कुमार सामने थे और उन्होंने पता नहीं क्या कहा-सुना कि सचिव का आना एकाएक टल गया । संस्कृतिकर्मी वार्ता की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए । इधर आनन-फानन में अभिनय कार्यशाला सहित पूरी अकादमी भारतीय नृत्य कला मंदिर में चली गई । अकादमी की “अभूतपूर्व” प्रभारी सचिव ने अपनी सामंती बौद्धिकता का परिचय देते हुए एक दैनिक अखबार के माध्यम से रंगकर्मियों पर आरोप लगाया कि “रंगकर्मी वहां देर रात तक लड़कियों के साथ बैठते हैं और पौलिथिन (देसी दारु) पीते हैं ।” किन्तु मैडम सचिव प्रेमचंद रंगशाला में हुए अश्लील कार्यक्रमों पर एक भी शब्द खर्च करना ज़रुरी नहीं समझतीं । ज्ञातव्य हो कि एक दवा बेचनेवाली कंपनी को प्रेमचंद रंगशाला किराये पर दिया गया था । इस कार्यक्रम में खुलेआम दारूबाजी हुई और फूहड़ गानों, आपत्तिजनक कपड़ों में लड़कियों को नचवाया गया, आयोजक स्वयं भी नाचे । महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बने इस रंगशाला में हुए उपरोक्त कार्यक्रम का पटना के संस्कृतिकर्मियों ने विरोध करते हुए सवाल खड़ा किया कि इस तरह के कार्यक्रम की अनुमति देकर अकादमी आखिर किस संस्कृति को बढ़ावा दे रही है और किसी भी राजकीय रंगशाला का निर्माण वहां की कला-संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से होता है या मुनाफ़ा कमाने के उद्देश्य से ? इस बाबत अकादमी के अध्यक्ष शंकर आशीष दत्त (जो अपने को कलाकार कहने से ज़रा भी नहीं हिचकते) और उपाध्यक्ष प्रो. शैलेश्वर सती प्रसाद को उक्त कार्यक्रम का वीडियो दिखाकर पूछा गया तो उनका जवाब था – “हमें इसकी कोई सूचना नहीं है । अगर ये हुआ है तो गलत है ।” अब क्या यहाँ यह सवाल नहीं बनाता कि जब आपको पता ही नहीं कि आपका विभाग क्या कर रहा है तो आप बड़े-बड़े पद पर विराजमान हो आखिर किस महान संस्कृति की सेवा कर रहे हैं । यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि जीर्णोधार के बाद प्रेमचंद रंगशाला, बिहार संगीत नाटक अकादमी की देखरेख में संचालित होता है ।
अभिनय कार्यशाला बाधित करने का बेबुनियादी आरोप भी संस्कृतिकर्मियों पर लगाया गया । वहीं आंदोलन के समर्थन में कुछ सजग रंगकर्मियों ने स्वेच्छा से अभिनय कार्यशाला यह कहते हुए छोड़ दिया कि हमारे मित्र संस्कृतिकर्मी जब सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं वैसे वक्त में रंगमंचीय तकनीक सिखने से ज़्यादा ज़्यादा ज़रुरी है आंदोलन की ताकत बढ़ाना । वहीं कार्यशाला संचालित कर रहे पटना के ही कुछ पुराने रंगकर्मियों, जो स्वयं कभी प्रेमचंद रंगशाला मुक्ति संघर्ष के अग्रिणी सिपाही रहे थे, ने आंदोलन कर रहे रंगकर्मियों को नीचा दिखने के लिए तरह-तरह के दुष्प्रचार किया । इसे एक ‘खास’ पार्टी द्वारा प्रायोजित आंदोलन तथा लौंडे-लपाड़ों का आंदोलन कहने में ज़रा भी शर्म नहीं आई । इस दौरान ये लोग लगातार अकादमी के अधिकारियों तथा सांस्कृतिक विभागों को लगातार आश्वस्त भी करते रहे कि कुछ रोज़ चुपचाप तमाशा देखिए, सब अपने आप ही ठीक हो जाएगा । खैर, समय सबका इतिहास लिखता है और कोई आज इसलिए महान नहीं माना जाता कि भूतकाल में वो एक बड़ा क्रांतिकारी था । वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आंदोलनरत संस्कृतिकर्मियों का आपसी विश्वास भी बार-बार बिखर रहा था । इधर, आंदोलन के बारह दिन बीत जाने पर एक अखबार में अकादमी के प्रभारी सचिव विभा सिन्हा की झूठी प्रतिक्रिया थी कि “मेरी बर्खास्तगी की मांग को लेकर चल रहे किसी भी आंदोलन की खबर मुझे नहीं है ।”
प्रेमचंद रंगशाला और पटना रंगमंच ।
सन 1971–72 में यह रंगशाला बनकर तैयार हुआ । अपने पहले ही कार्यक्रम में ही इसे हिंसा की आंधी में झुलसना पड़ा । आपातकाल के दौरान सीआरपीएफ का कब्ज़ा रहा । जिसे मुक्त कराने का बीड़ा पटना के संस्कृतिकर्मियों ने उठाया । कलाकार संघर्ष समिति के बैनर तले पुलिस की लाठियां खाई । कवि कन्हैया जी की शहादत तक हुई । रंगशाला जब मुक्त हुआ तो खंडहर में बदल चुका था । पटना के नाट्य दलों ने इस खंडहरनुमा रंगशाला की साफ़-सफाई की और पूर्वाभ्यास के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया । बीच-बीच में प्रायोगिक स्पेस बनाकर कुछ नाटकों का मंचन भी किया गया । इधर कलाकारों का संघर्ष जारी था । आखिरकार 1987 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को इसके पुनरोद्धार की घोषणा करनी ही पड़ी । जो आखिरकार 14 जनवरी 2012 में जाकर पूरा हुआ । किन्तु साल भर में ही आलम यह है कि कुर्सियां टूट रही है, छत टपक रहे हैं, लाइटों से बल्ब गायब हैं, मंच की बुरी हालत हो चुकी है और आधुनिकतम मशीनें खराब हो रही हैं ।
‘समस्त संस्कृतिकर्मी’ के इस आंदोलन में प्रेमचंद रंगशाला मुक्ति की लड़ाई के कुछ पुराने सिपाहियों का भी आगमन हुआ । उनके अनुसार प्रेमचंद रंगशाला का मुक्ति संघर्ष अभी अधूरा है । हमारी लड़ाई इसे सीआरपीएफ के कब्ज़े से मुक्त करके सरकार के कब्ज़े में डालने के लिए नहीं थी । यह जब तक संस्कृतिकर्मियों के लिए सुलभ नहीं हो जाता तब तक इसकी लड़ाई अधूरी ही रहेगी । खेद है कि उस वक्त के मुक्ति संघर्ष के कुछ अग्रणी योद्धा आज संस्कृतिकर्मी के नाम पर धब्बा बन गए हैं और इस आंदोलन के खिलाफ़ लगातार दुष्प्रचार कर रहे हैं । वहीं जनसंघर्षों में बिना शर्त शिरकत करनेवाले लोग अब या तो अपनी अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं या नियम, शर्तें तय करते हुए निमंत्रण-पत्रों का इंतज़ार करने में लगे हैं ।
बिहार संगीत नाटक अकादमी का पंचनामा ।
राज्य सरकार द्वारा चाक्षुष कला और प्रदर्शनात्मक कला के लिए राज्य कला अकादमी का गठन 26 मार्च 1981 को किया गया । राज्य सरकार का पत्र, पत्रांक 213 दिनांक 16 अप्रैल 1982 से यह जानकारी मिलती है कि कला अकादमी के गठन के साथ ही अराजकता शुरू हो गई थी । तत्कालीन सचिव-सह संयोजक ने बिना विज्ञापन कराये, बिना कार्यकारी परिषद् या सामान्य परिषद् से सहमति लिए, बिना आवेदकों से आवेदन प्राप्त किये, बिना योग्यता का निर्धारण आदि किये स्वयं ही न केवल कर्मचारियों की नियुक्ति की बल्कि उनका वेतन दर और महंगाई भत्ता भी तय कर दिया, तत्पश्चात कार्यकारी परिषद् और सामान्य परिषद् में प्रस्ताव पेश कर स्वीकृत करके इसे वैध व संवैधानिक भी बना दिया ।   
वित्तीय वर्ष 1986-87 में राज्य कला अकादमी को समाप्त कर चाक्षुष कला के लिए बिहार ललित कला अकादमी और प्रदर्शन कला के लिए बिहार संगीत नाटक अकादमी का गठन हुआ । दस्तावेजों के अनुसार 1981 से लेकर 2002 तक अकादमी में वित्त समिति के गठन की अधिसूचना तक जारी नहीं हुई । अकादमी में वित्तीय और प्रशासनिक अराजकता और सरकारी नियमों का उल्लंघन खुलेआम होता रहा । दिनांक 16 नवम्बर 2002 को कार्यकारी परिषद् और सामान्य परिषद् की बैठक में अकादमी के अध्यक्ष डा । शंकर प्रसाद लिखते हैं - “अकादमी कार्यालय पूरी तरह से अपने दायित्व के प्रति असावधान, बेफिक्र और मर्यादा की रक्षा में अक्षम है ।” 28 सितम्बर 1994 को अकादमी में सरकारी कोष के दुरूपयोग की जाँच की मांग करते हुए वित्त विभाग, बिहार सरकार को लिखे एक गोपनीय पत्र (पत्रांक – बि.सा.ना.अ./01 गो./94 ) में श्री प्रसाद लिखते हैं - “अकादमी में वेतन भत्तों आदि मद में बड़ी राशियां बिना समुचित आदेश के निकाले जाने के कई मामले प्रकाश में आए थे जिनकी जाँच के लिए अकादमी ने कई बार आपके विभाग से समय-समय पर आग्रह पहले भी किया है । संस्कृति निदेशालय/विभाग को भी कई पत्र इस सन्दर्भ भेजे गए हैं, लेकिन विशेष कारणों से संस्कृति विभाग अकादमी में हुई वित्तीय अनियमिताओं/संभावित गबन के मामलों की जाँच करने से कतरा रही है ।” इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं “संस्कृति विभाग बार-बार पूछे जाने पर भी अकादमी के पत्रों का जवाब नहीं देता । इसका लाभ उठाकर बिना प्राधिकृत सरकारी आदेश के उक्त मनोनीत असंवैधानिक पदधारी व्यक्ति (सचिव) ने इन ग्यारह-बारह वर्षों में पूर्णकालिक सचिव के टाइमस्केल वेतनमान पर स्वयं ही आदेश प्रदानकर अब-तक 8-9 लाख से ऊपर की राशि की निकासी भी कर ली है ।” पत्र में आगे है “कई कार्यक्रमों के मद में अकादमी को भेजी गई राशि को संस्कृति निदेशालय सीधे आदेश देकर निदेशालय के अधिकारियों को भी चेक के माध्यम से राशि देने के लिए मजबूर कर राशि प्राप्त करता रहा है और अपने ढंग से कार्यक्रम आयोजित कर राशियों को खर्च करता रहा है । इन राशियों का भी हिसाब बार-बार मांगने पर भी सम्बंधित अधिकारियों से प्राप्त नहीं हुए हैं ।” पत्र में अकादमी कार्यालय से सम्बंधित संचिकाओं और लेखा पंजियों को गायब करने में दोषी लोग सफल हो जाएंगे ऐसी आशंका के साथ ही निष्पक्ष जांच की मांग भी की गई है ।
‘संवैधानिक वित्तीय एवं प्रशासनिक अराजकता के कारण बंद होने की कगार पर पहुँची अकादमी को सशक्त बनाना’ शीर्षक के तहत 30 मई 2002 को वे एक और पत्र (पत्रांक बि.स.ना.अ/अ.को./232) मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को लिखते हैं जिसका लब्बोलुआब यह है कि 1981 से लेकर आजतक अकादमी में लाखों रुपये की अनिमिततायें प्रकाश में आई हैं । जानबूझकर वित्तीय अंकेक्षण नहीं कराए जा रहे हैं । अकादमी के कार्य संचालन के लिए नियमावली का गठन अब तक नहीं हो पाया है । 1981 से लेकर आजतक संस्कृति विभाग को पच्चीसों पत्र लिखने के बावजूद यहाँ कुछ कर्मचारी सचिव के संरक्षण में कार्यरत हैं और मनमानी राशि उठा रहे हैं । सबकुछ जानते हुए भी संस्कृति विभाग की ख़ामोशी संस्कृति-धन घोटाले में कतिपय अधिकारियों की संलिप्तता की ओर संकेत करती है ।
वर्तमान में भी अकादमी का हाल इन बातों से इतर नहीं है । उपरोक्त बातें स्याह अध्याय के चंद पन्ने मात्र हैं, न जाने और कितने काले अध्यायों को अपने अंदर छुपाए यह अकादमी बिहार के संगीत-नाटक का सूत्रधार होने का दंभ भरती है । वहीं इसके कुर्सियों पर आसीन लोग कलाकार कम कला के दुकानदार ज़्यादा है, जहाँ परसेंटेज का खेल धरल्ले से चलता है और चुकी हर किसी का हिस्सा तय है इसलिए स्थिति “सूरज अस्त, सब मस्त” वाली है । ऐसी भ्रष्ट अकादमियों से किसी भी देश-राज्य के कला का भला नहीं हो सकता । लेकिन सवाल तो यही पैदा होता है कि शिकायत करें तो किससे ? जिधर देखो उधर ही दुकानदारी चालू है, जो अपना मुनाफा देखता है, कला और कलाकारिता का उत्थान पतन देखने का समय और ज़रूरत ही नहीं है ! इस खेल में कलाकार वर्ग शामिल नहीं है, कोई यह कहता है तो सच नहीं है । उपरोक्त स्थिति केवल बिहार संगीत नाटक अकादमी की हो, ऐसा नहीं है । देश की ज़्यादातर अकादमियां इसी पथ के अनुगामी हैं ।
सपने ज़िंदा रहते हैं, मरते नहीं ।
संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भूमिका के साथ बिहार संगीत नाटक अकदमी का पुनर्गठन, नियमावली का निर्माण व प्रेमचन्द रंगशाला को बिहार के सांस्कृतिक वर्तमान, भविष्य तथा इतिहास का साक्षी बनाने के लिए प्रांगण में पूर्वाभ्यास स्थलों का निर्माण, नाट्य साहित्य की प्रमुखता वाला एक पुस्तकालय, क्लासिक फ़िल्में, गीत-संगीत, रंग-संग्रहालय, शोध केन्द्र, नुक्कड़ नाटकों और विचार-गोष्ठियों की एक जगह, रंगमंडल सहित बिहार में एक नाट्य विद्यालय की परिकल्पना व बिहारी अस्मिता तथा बिहार की लोक कलाओं और कलाकारों का संरक्षण - ये कुछ ऐसे सपने हैं जो हर सजग रंगकर्मी देखता है । कला को संरक्षण देने का अर्थ केवल पैसे बांटना नहीं होता । किन्तु हकीकत यह कि फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी भवन में आज साहित्य नहीं, प्रबंधन की पढ़ाई होती है, प्रेमचंद रंगशाला अप-संस्कृति का केन्द्र बनने की ओर अग्रसर है और अकादमी की कारगुजारी जग ज़ाहिर है ।
66 वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ‘राष्ट्र के नाम संदेश में’ माननीय राष्ट्रपति कहते हैं कि “हमें अपने देश में शासन व्यवस्था एवं संस्थाओं के कामकाज के प्रति चारों ओर निराशा का वातावरण दिखाई दे रहा है ।” ऐसी निराशा किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए चिंता का विषय होना चाहिए ।

बहरहाल, ‘समस्त संस्कृतिकर्मियों’ के इस आंदोलन के समर्थन में दिल्ली के रंगकर्मियों और रंगप्रेमियों ने बिहार भवन पर प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री बिहार के नाम एक ज्ञापन भी दिया, वहीं देश भर के संवेदनशील संस्कृतिकर्मियों का समर्थन मिला । प्रतिरोध का मूल्याकंन सफलता और असफलता के पैमाने से न होता है, न होना चाहिए । बात बस इतनी सी है कि ज़िंदा कौमें प्रतिरोध करती है और करती रहेंगी । प्रतिरोध पर किसी भी वाद, पार्टी, संगठन या व्यक्ति का एकाधिकार नहीं होता । 
अंत में :- कुछ कुर्सियों पर नाम और चेहरे बदल देने से बदलाव नहीं बल्कि बदलाव का नाटक होता है. 

Monday, March 31, 2014

चुनाव प्रचार में कला और कलाकार

देखता हूँ कि एक चौराहे पर एक कलाकार माइक पर स्थानीय भाषा में किसी लोकगीत की पैरोडी गा रहा है, उसके बगल में दो स्त्रियां कठपुतलियों को नचाने की कोशिश में लगी है, एक नाल वादक ज़मीन पर उकडू सा बैठा गीत के साथ ताल मिला रहा है और पीछे पार्टी का बड़ा सा बैनर लगा है जिसमें एक खास पार्टी के उम्मीदवार को (बिना कोई खास कारण बताए) वोट देने का निवेदन है । फैशन के अनुसार बैनर पर उम्मीदवार की हाथ जोड़े फोटू भी है । बगल में एक छोटी ट्रक नुमा गाड़ी खड़ी है जिस पर जनरेटर और माइक सेट लगा है । कलाकार इसी में बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचता है । हां, कुछ पानी के पुराने बोतल और कपड़े भी रखे हैं । गाड़ी बाहर से पुरी तरह से बैनर से सजी है । कलाकार वहां कुछ गीत गाता है, बीच में एक छुटभैया नेता गीत सुन रहे लोगों के रस में अपने भाषण से विघ्न डालता है । भाषण से लोग जैसे ही बोर होते हैं कि गीत और कठपुतली नाच शुरू हो जाता है । अलग-अलग चौराहे पर यह पूरा दिन चलता रहेगा । इन कलाकारों को देखकर ही यह साफ़ पता लगाया जा सकता है कि उन्हें यह काम करते हुए बहुत मज़ा नहीं आ रहा हैं !   
चुनाव का वक्त है, हर पार्टी प्रचार-प्रसार में लगी है । अखबार, टीवी, रेडियो, अखबार, इंटरनेट आदि के अलावा नुक्कड़ नाटकों, गीतों आदि का सहारा भी लिया जा रहा है । कुछ पार्टियों के पास अपने सांस्कृतिक दल है जिसे चुनाव के दिनों में पार्टियां अपने चुनाव प्रचार में लगाती हैं, यह बात इतर है कि बाकि दिनों इन पार्टियों को कला-संस्कृति से कोई ख़ास मतलब नहीं होता । पार्टियों के सांस्कृतिक प्रकोष्ठों में अनुशासन और विचारधारा के नाम अकलात्मक माहौल बनाया जाता है लेकिन यह पार्टियां अमूमन अपने किसी भी सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता का दायित्व उठाने को तैयार नहीं होती । ऐसे में इन कलाकारों के पास निम्न रास्ते बचते हैं -  ये पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता बन जाएँ और सांस्कृतिक दायित्वों के अलावा भी कई सारे और कामों में अपने को उलझा ले, पेट चलाने के लिए कोई और काम करें और साथ में अपने कलात्मक जूनून को ज़िंदा रखें और यह सब त्यागकर या तो किसी एनजीओ में चला जाएं या फिर मुंबई की गाड़ी पकड़ लें और फ़िल्मी दुनियां में दोयम दर्ज़े के नागरिक बन जाएं ।
जिन पार्टियों के पास अपना सांस्कृतिक प्रकोष्ठ नहीं है वे प्रोफेशनल्स या स्थानीय कलाकारों को बुलाकर चुनाव प्रचार में लगा रहे हैं । इन कलाकारों को न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं दी जाती । कहीं कहीं तो मामला केवल खाने-पीने तक सिमट जाता है तो कहीं यह भी ठीक से नहीं दिया जाता । तो कई कोई व्यक्ति इन कलाकारों का मुखिया बन जाता है और कलाकारों को प्रसादनुमा कुछ खिला-पिलाकर सारा पैसा खुद डकार जाता है । यह स्थिति तब है जब एक पार्टी चुनाव प्रचार पर करोड़ों रूपया तक खर्चा कर रही है । पार्टियां एलबम निकाल रहीं है, विज्ञापन बना रही हैं लेकिन उसमें काम करनेवाले कलाकार उपेक्षित हैं ।
देश और समाज में, खासकर हिंदी प्रदेशों में कला और कलाकार की स्थिति लगभग अनचाहे बच्चे जैसी ही है । यह कलाकारों का जूनून ही है जो इन प्रदेशों में आजतक कला का वजूद है । सरकारें और सरकारी नीतियों ने तो इन्हें लुप्त प्रजाति में शामिल करने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोडीं हैं । यहाँ पारम्परिक और रंगमंच के कलाकारों की बात हो रही है, फ़िल्मी कलाकारों का मामला एकदम दूसरा है । वैसे अभी हाल ही की तो बात है जब रैली और रैला में रात-रात भर लौंडा और बाईजी का नाच होता था । बदले में इन कलाकरों को क्या मिलता है, यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं ।
कला और संस्कृति का दायरा व्यापक है इसे केवल नाटक, नृत्य, संगीत, साहित्य आदि के ही संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए । कला और संस्कृति किसी भी सभ्य समाज का आईना होता है । अब किसी भी पार्टी का चुनाव घोषणापत्र उठाकर देखिए क्या कला और संस्कृति का कहीं ज़िक्र तक है ? यदि नहीं तो क्या यह एक खरतनाक बात नहीं है ? बिना कला-संस्कृति के क्या मानव और मानवीय जीवन की परिकल्पना की जा सकती है ? इन बातों की चिंता किसे है, नेता और पार्टियां तो परिवारवाद, अवतारवाद, जातिवाद, ग्लैमरवाद, क्षेत्रवाद, व्यक्तिवाद, समुदायवाद, सम्प्रदायवाद, सेकुलरवाद आदि की लहर चलाने में व्यस्त है और जनता इन लहरों में गोते लगाने को !
विभिन्न पार्टियों की सांस्कृतिक शून्यता का एक और नमूना देखना हो तो इनके भाड़े या जबरन के प्रचार गाड़ियों पर बजनेवाले गीतों को ज़रा गौर से सुनिए । यह अमूनन किसी फ़िल्मी या पारंपरिक गीतों की तुच्छ सी पैरोडी होती है । कई बार तो ऐसे-ऐसे गानों की पैरोडी सुनने में मिलती है जिसका मूल गाना याद आते ही हंसी छूट जाती है । इन पार्टियों के पास एक अच्छा गीतकार, संगीतकार तक नहीं जो मूल रच सके । सुना है चुनाव के समय छोटे-छोटे स्टूडियो सीडी तैयार करने का ठेका लेते हैं । कई बार तो एक ही स्टूडियो में कई-कई पार्टी का प्रचार सीडी तैयार होता है । तो कई बार एक ही एंकर की आवाज़ दो अलग-अलग पार्टियों की सीडी में पाई जाती हैं । बहरहाल, केवल राजनीति को कोसने से क्या होगा ? समाज और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक हैं । जैसा समाज वैसी व्यवस्था और जैसी व्यवस्था वैसा समाज । समाज की ज़िम्मेदारी केवल वोट देना नहीं होता वहीं व्यवस्था का काम केवल राज करना नहीं होता बल्कि सुन्दर, कलात्मक, मानवीय और वैज्ञानिक समाज गढ़ने की दिशा में अग्रसर होना भी होता है । यदि ऐसा नहीं हो रहा तो आखिर ज़िम्मेदार कौन है ? सारी ज़िम्मेदारी किसी और पर डाल देने से पहले एक सवाल अपनेआप से भी करना चाहिए कि क्या हमने कभी कला-संस्कृति की कभी चिंता की ? चीज़ें विलुप्त हो जाएं उससे पहले हम सचेत हो जाएं तो अच्छा है, नहीं तो “अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गई खेत ।”   

Monday, March 24, 2014

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय निदेशक, अध्यक्ष व रंगमंडल प्रमुख के नाम खुली चिट्ठी.

महोदय,
सुना कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल अपने स्थापना का 50 वां वर्ष मना रहा है । बड़ी हर्ष की बात है । जहाँ तक मेरी जानकारी है कुछ महीने पहले भी 50 वर्ष का एक आयोजन किया गया था । बहरहाल, दुबारा इस आयोजन को करने के पीछे क्या मंशा है यह आपलोग बेहतर जानते होंगे । मैंने सुना कि इस आयोजन के लिए रंगमंडल के तमाम पुराने सदस्यों को इक्कठा करने का प्रयत्न भी किया गया ।
किन्तु इन्हें बुलाने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई उम्मीद है इसकी खबर आपको ज़रूर होगी । इसके लिए एक चिट्ठी का फोटो कॉपी करके उपलब्ध किसी भी पते पर पोस्ट कर दिया गया होगा । यह जानने की कोशिश भी नहीं की गई होगी कि वो व्यक्ति अभी तक उस पते पर रहता भी है कि नहीं । मोबाइल, इमेल, सोशल नेटवर्क के युग में मात्र चिट्ठी पर भरोसे के पीछे निश्चित ही कोई ‘महान’ योजना रही होगी ! जो हम जैसे साधारण बुद्धिवाले मनुष्य की समझ से परे है !
मैं भी लगभग पांच साल तक रंगमंडल का सदस्य रहा हूँ और घोर आश्चर्य कि मुझे इस आयोजन के बारे में जानकारी अपने एक मित्र के माध्यम से उस दिन होता है जिस दिन यह आयोजन शुरू हुआ । मैंने फ़ौरन कुछ अन्य पूर्व रंगमंडल सदस्यों को फोन किया तो पता चला कि उन्हें भी इस आयोजन की या तो कोई जानकारी नहीं या है भी तो सही तरीके से नहीं है । वैसे सुना है कुछ ‘खास’ लोगों को फोन भी किया गया और हवाई यात्रा का खर्च भी प्रदान किया गया । वहीं कुछ सीनियर तो दिल्ली में रहते हुए इस आयोजन का हिस्सा नहीं बनना चाहते । पूछने पर कहते हैं “कोई उपयोगिता ही नहीं है, केवल खाना खाने और टीए-डीए का फॉर्म भरने के लिए मैं नहीं जाना चाहता ।” यह स्थिति क्यों है क्या इसकी चिंता करनेवाला रानावि में आज कोई है ? आप सब बड़े कलाकार हैं, यक़ीनन यह बात आपको भी पता होगा ही कि कलाकार सम्मान चाहता है अशोका होटल का कमरा, हवाई सफ़र और टीए-डीए उसकी प्राथमिक ज़रूरतों में नहीं आता ।
वैसे लगभग पांच साल रंगमंडल में बतौर अभिनेता काम करते हुए मैंने अपनी आँखों से देखा है कि रंगमंडल के पास लगभग 12 कम्प्युटर है और सबमें नेट का कनेक्शन है और सबलोग इसका भरपूर सेवन भी करते हैं । टोरेंट, यू-ट्यूब और फेसबुक जैसे साईट भी चलती रहती है । रंगमंडल में कई सारे फोन के कनेक्शन भी है जिससे फोन किया जाता है । किन्तु रंगमंडल के पूर्व सदस्यों को सूचना देने के लिए आज भी बाबा आदम के ज़माने की तकनीक का सहारा लिया गया, क्यों ? क्योंकि Old is Gold !
वैसे कितने पूर्व सदस्य पहुंचे और जो नहीं पहुंचे वो क्यों नहीं पहुंचे, क्या यह बात की चिंता किसी की प्राथमिकता में है ? खबर है कि कुल 150 के आसपास लोग आए । तो क्या पचास सालों में केवल इतने ही लोग रंगमंडल से जुड़े थे ?  
आज रानावि रंगमंडल की क्या स्थिति है वह किसी से छुपा नहीं है । मेरे सहित कई लोगों ने ऐसी ही ‘असंवेदनशीलता’ का प्रतिकार करते हुए रंगमंडल से त्यागपत्र दिया था । शिक्षा का कोई भी संस्थान यदि असंवेदनशीलता का दामन थाम लेता है तो वहां कला की सेवा होगी इस पर मुझे गहरा संदेह है । चीज़ों को दबा देने से सुधार नहीं होता बल्कि प्रवृतियों को छुपाकर हम उसे प्रश्रय देने का ही काम करते हैं ।
आशा थी कि रानावि निदेशक और अध्यक्ष के बदलने से परिस्थितियों में सुधार होगा किन्तु हाय रे रानावि की किस्मत, फिर वही ढाक के तीन पात । रानावि से जुड़ाव की वजह से बड़े ही दुःख और क्षोभ में यह खुला पत्र प्रेषित कर रहा हूँ और आशा करता हूँ कि पत्र को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार किया जाएगा । हां, रानावि हमारा मदर इंस्टीटयूट है, था और रहेगा, इसमें कहीं कोई संदेह नहीं । ओह, मैं यह तो बताना भूल ही गया कि मेरा नाम पुंज प्रकाश है और मैं सत्र 2004-07 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का छात्र रहा तत्पश्चात 2012 तक रंगमंडल का सदस्य और रंगमंडल के असंवेदनशीलता के विरोध में मैंने दिनांक 12 मार्च 2012 को त्यागपत्र दिया । मैंने अपने त्यागपत्र में जिन मुद्दों को उठाया था उसका जवाब आज तक मुझे नहीं दिया गया है । यकीन है कि मेरा पत्र आज भी किसी फ़ाइल में पड़ा धूल खा रहा होगा ।
सादर,
पुंज प्रकाश
पूर्व छात्र व रंगमंडल सदस्य
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली ।

Friday, March 21, 2014

भारतीय नाट्य परम्परा : नेमीचन्द्र जैन

नेमीचन्द्र जैन की पुस्तक भारतीय नाट्य परम्परा के आधार पर बनाया गया संछिप्त नोट  
  
आदिम या पौराणिक युगों से ही किसी न किसी तरह का रंगमूलक कार्यकलाप भारतीय जीवन का एक अनिवार्य अंग रहा है । कई शताब्दियों तक वह सामान्य लोक जीवन में केवल अनुष्ठानमूलक, गीत-नृत्य, कथा गायन अथवा विशेष अवसर पर निकलनेवाली झांकियों के रूप में ही मौजूद रहा, बाद में उच्च अभिजात्य वर्गों में इसके विभिन्न रूप प्रतिष्ठित हुए । जो करीब एक-डेढ़ हज़ार वर्ष तक रहे, इसे हम संस्कृत नाटक/रंगमंच के रूप में जानते हैं ।
ईसा से पांचवीं-छठी सदी तक भारतीय नाट्य का इतिहास मिलता है । वैदिक युग के यज्ञों से सम्बंधित कर्मकांडों में नाट्य जैसी कई स्थितियां और क्रियाएँ मौजूद हैं । वैदिक साहित्य में गीत, नृत्य, वाद्यों तथा नेपथ्य की सामग्रियों का प्रचुर उल्लेख मिलता है । ऋगवेद में यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी, विश्वामित्र-नदी, अगस्त्य-लोपामुद्रा, इंद्र-अदिति आदि सूक्तियां संवाद मूलक हैं । जो एक नाटकीय संयोजन का आभास देते हैं ।
रामायण में नर्तक, गायक, कुश-लव की नाटकीयता की सूचना है । बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में भी नाटक का ज़िक्र मिलता है । कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में रंगोपजीवी पुरुषों तथा नाट्य, नृत्य, गीत, वाद्य आदि की चर्चा है ।
नाट्यशास्त्र : नाटक और रंगमंच से सम्बंधित ऐसा कोई पक्ष/विषय नहीं है जिसपर इसमें गंभीरतापूर्वक एवं विस्तार से तथा सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से विचार न किया गया हो ।  
संस्कृत नाटकों की छवि : संस्कृत नाटकों में भारतीय जीवनदृष्टि का एक बड़ा विलक्षण और प्रभावशाली रूप मिलता है । वे दिखलाते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव, स्वधर्म और पुरुषार्थ के अनुसार जीवन की विभिन्न अवस्थाओं से विभिन्न भावों, आवेगों, विकारों और स्थितियों से गुज़रता हुआ, उनके बीच अपना निर्धारित कर्तव्य पूरा करता हुआ अंत में जिस सामंजस्य और संतुलन की स्थिति में पहुंचता है वही जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य है और काम्य तथा वांछनीय भी ।
संस्कृत नाटक जीवन का कोई सतही यथार्थवादी प्रतिविम्ब नहीं प्रस्तुत करते । उनमें एक गहरे नैतिक और सौन्दर्यमूलक विवेक से मनुष्य के कार्यों और भावों की, जीवन की विभिन्न अवस्थाओं की, कलात्मक कल्पनाशील अनुकृति (तस्वीर) दिखाई गई है जिससे दर्शक को रसात्मक अनुभव से मिलनेवाला आनंद के द्वारा सत्य का बोध हो ।
भारतीय जीवनदृष्टि : यह स्वीकार नहीं करती कि आदमी किन्हीं अज्ञात रहस्यमय अंधी दैवी शक्तियों के हाथों का खिलौना है जिनके विरुद्ध संघर्ष करने को तो वह अभिशप्त है पर उसकी नियति पूर्व निर्धारित त्रासदी ही है ।
इसीलिए संस्कृत नाटकों में पात्रों की वास्तविक अथवा कल्पित निजी यातना, पीड़ा या पापबोध का क्रमशः उत्तरोत्तर सघन उद्घाटन करने की बजाय, विभिन्न वैयक्तिक और सामाजिक स्थितियों में मनुष्य के सुख-दुःख, सफलता-असफलता, प्रेम-करुणा, मिलन-वियोग, हंसी-रुदन को उसके सहज मानवीय आचरण को प्रस्तुत किया गया है ।
संस्कृत नाटकों का वर्गीकरण त्रासदी और कामदी नहीं बल्कि प्रमुख पात्रों की सामाजिक और मानसिक स्थितियां तथा उसके अनुकूल होनेवाले कार्यकलापों के आधार पर है ।
संस्कृत नाटकों में : स्वतंत्र और सम्पूर्ण नाट्यशिल्प तथा विशिष्ट सौंदर्य-दृष्टि उभरती है । उनका संघटन और वस्तुविन्यास लचीला और काल्पनिक है । नाट्य रचनाओं में विन्यास की अलग-अलग पद्धति है । कार्य व्यापार की निरंतरता पर बल दिया गया है । कथा सूत्र स्पष्ट हैं । विभिन्न पात्रों द्वारा समय-समय पर अलग-अलग होनेवाले या हो चुके घटनाप्रसंगों और स्थान/समय परिवर्तन की जानकारी/सूचना दी जाती है । यह अभिनेता केंद्रित रंगमंच है । उपकरणों का न के बराबर प्रयोग होता है । गद्य, पाठ्य पद्य, काव्यात्मक पद्य और गेय छंद सभी का प्रयोग होता है । प्राकृत, रोचक युक्तियाँ, स्वागत, नेपथ्य से पात्रों का कथन एवं आकाशवाणी, संगीत, नृत्य का भी प्रयोग होता है । चरित्रों में अलग-अलग भावों की प्रधानता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है ।
अभिनय का उद्देश्य : किसी पात्र के विभिन्न भावों के उद्घाटन से दर्शक के मन में रस की श्रृष्टि द्वारा आनंद की अनुभूति पैदा करना होता है । दर्शक रसानुभूति द्वारा आनंद की प्राप्ति करते हैं । अभिनय के लिए अभिनेताओं से समग्र अभिनेता का आग्रह यानि अभिनेता को नृत्य, गायन, भाषा, छंद, लय, काव्य की गहरी जानकारी व अभ्यास की प्रमुखता अनिवार्य मानी गई है । अभिनेता के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के हिसाब से वेशभूषा, रूपसज्जा, व्यवहार में आनेवाले उपकरणों को आहार्य के रूप में शामिल किया जाता है । अभिनय परम्परा में यथार्थ के अनुरूप नहीं बल्कि यथार्थ को दिखाने, उसे व्यंजित करने का प्रयास किया जाता है । सहृदय दशकों के लिए नाट्यप्रदर्शन किया जाता था । सूत्रधार/नट-नटी, विदूषक के माध्यम से नाट्य प्रयोग को दर्शकों से जोड़ने की कोशिश की जाती थी । विदूषक हास्य विनोद का संवाहक है । कक्षा विभाग व रंगपट्टी (प्रवेश-प्रस्थान हेतू) का प्रयोग किया जाता है ।

संस्कृत नाटकों के विघटन के कारण : एक सैद्धांतिक और व्यावहारिक बुनियाद पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद भी संस्कृत नाटक का दसवीं शताब्दी तक विघटन हो गया । इसके कुछ प्रमुख कारण विदेशी आक्रमणों और आंतरिक विग्रह से पैदा होनेवाली राजनैतिक-सामाजिक अस्थिरता, संस्कृत भाषा के क्रमशः अभिजात वर्ग तक सीमित होते जाने से उसमें सृजनात्मक उर्जा की क्षीणता, नाट्य रचना के स्तर पर प्रतिभा कई कमी, सामान्य दर्शकों के लिए उनकी लोकप्रियता में कमी आदि हैं ।

Thursday, February 6, 2014

विज्ञापनों का भ्रमजाल और दायरा।

सेन्ट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन काउन्सिल (सीसीपीसी) ने यह निर्णय किया है कि झूठे विज्ञापनों और विज्ञापन करनेवाले सेलिब्रिटीज़ पर नकेल कसने के लिए जल्द ही एक कमिटी का गठन किया जाएगा और उपभोक्ताओं को यह अधिकार होगा कि विज्ञापन में किए दावे पूरे न होने पर वो सेलिब्रिटी और कंपनी दोनों के खिलाफ हर्जाना के लिए मुकद्दमा दायर कर सकते हैं। तो, आनेवाले दिनों में बहुत सारे सेलिब्रिटी, जिनमें फिल्म स्टार और खिलाडियों की संख्या ज़्यादा होगी, के ऊपर हर्ज़ाने का मुकद्दमा होना तय है। चूंकि लोकप्रियता के पैमाने पर सबसे ऊपर यही लोग होते हैं इसलिए विज्ञापन के लिए अमूमन कंपनियों की पहली प्राथमिकता में यही रहते हैं। सेलिब्रिटीज़ के लाइफस्टाइल की नक़ल करना एक परम्परा है इस बात को जानते हुए ये सेलिब्रिटीज़ विभिन्न विज्ञापनों को ऐसे पेश करते हैं जैसे यह विज्ञापन उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हों, जबकि सच्चाई इसके एकदम उलट होती है। अब कोई करोड़ों में खेलनेवाला शख्स भारतीय मध्यवर्ग को टारगेट करके बनाए उत्पादों का इस्तेमाल क्यों करेगा भला। चाहे खाने, पीने, पहनने की चीजें हों, सौंदर्य प्रसाधन हों, या कुछ और हो।  
पेप्सी और कोक के कैसे-कैसे विज्ञापन हैं हम सब जानते हैं, तो डर आगे जीत है वाला डरावना स्टंट भी है। सोडा के नाम पर शराब का विज्ञापन भी होता ही है। मोबाइल फोन के विज्ञापन भी याद कीजिए और जूतों, बाल उगाने-कलर करने, टूथपेस्ट, ब्रश के विज्ञापन भी। भारत जैसे देश में गोरे रंग के लेके जो पागलपन है उसे कैश करने में कोई किसी से कम नहीं। औरतों के गोरेपन के लिए अलग और मर्दों के गोरेपन के लिए अलग-अलग क्रीम है। वहीं “मर्द होकर औरतोंवाली क्रीम लगाते हो” जैसी वाहियात टिपण्णी भी है। त्वचा को निखारने का दावा करने में साबुन भी किसी से पीछे नहीं हैं। लगे हाथ नहाने के साबुनों के विज्ञापन भी याद कर लीजिए। दमकती त्वचा, महकती त्वचा और पता नहीं क्या-क्या। साबुन या तो रूप निखारने के काम आते हैं या फिर कीटाणु मारने के। कुछ साबुन तो ऐसे दावे के साथ बाज़ार में उपलब्ध हैं जैसे वो साबुन नहीं बल्कि कोई जादू हों। डियो और परफ्यूम के विज्ञापन तो लड़के-लड़कियों के पटने-पटाने और बिस्तर तक घसीट ले जाने की गारंटी का पर्याय ही बन गए हैं। लगे हाथ डिटरजेन्ट पाउडरों और टिकिया के विज्ञापन भी याद कर लीजिए। क्या-क्या और कैसे कैसे दाग छुड़ाने के दावे नहीं किए जाते। टीवी पर टिकिया इधर से उधर गई नहीं कि कपड़े झकाझक सफ़ेद। सीमेंट के विज्ञापन देखिए, ट्रक दिवार से टकरा जाती है पर दिवार नहीं टूटती। मोबाइल, टेलीफोन, इंटरनेट सेवा प्रदान करने वालीं कम्पनियां उपभोक्ता से जैसे-जैसे दावे करती हैं कि क्या कहना। हवा की रफ़्तार से इंटरनेट ब्राउज़िंग का विज्ञापन करनेवाली कंपनी अन्तः रुलाकर रख देने वाली कंपनी ही साबित होती हैं। कार और मोटरसाइकल्स के विज्ञापन रफ़्तार और माइलेज का स्टंट पेश करता है। मर्दानगी और संतानोत्पत्ति की गारंटी वाले विज्ञापन तो हैं ही।
ज़माना सूचना-तकनीक का है तो इस पर बात किए बिना बात कैसे पूरी हो सकती है। टीवी उद्योग टीआरपी का रट्टा मारकर अपने और सिर्फ अपने कार्यक्रम को नम्बर एक, सबसे आगे, सबसे तेज़ आदि होने का विज्ञापन करता है जबकि टीआरपी का पूरा खेल ही फरेब है और यदि इसमें सच्चाई है भी तो अंश मात्र की। टीवी, अखबार, इंटरनेट, मोबाइल और पत्र-पत्रिकाएँ ही आज विज्ञापन को आम जनता तक पहुँचाने का प्रमुख माध्यम हैं पर ये खुद विज्ञापन पर किसी प्रकार की कोई जवाबदेही तो दूर नैतिक ज़िम्मेदारी तक का निर्वाह करने से कतराते हैं। अख़बारों में बलात्कार की खबरों के नीचे ही अंग मोटा-पतला करने के विज्ञापनों का मिलना और बाबाओं के पोल खोलने वाले न्यूज़ चैनल पर रोज़ किसी बाबा का प्रवचन होना एक आम बात है। वैसे, आजकल एक नया ट्रेंड भी देखने को मिलता है रियल लाइफ हीरोज़ से विज्ञापन करने का जो आसानी से अपनी हीरोपन को चंद पैसों के चक्कर में आके विज्ञापनों के सुपुर्द कर देते हैं।
होडिंग, पंफलेट, पोस्टर, बैनर, समाचार पत्र, पत्रिकाएं, इंटरनेट, रेडियो, टेलिविज़न आदि के मार्फ़त विज्ञापन हम तक पहुंचाते हैं। आज हर वो चीज़ विज्ञापन के दायरे में है जो बाज़ार का हिस्सा बन बिक सकती है। विज्ञापन हमारी इन्द्रियों से होते हुए हमारे दिल-दिमाग पर राज़ करते हुए हमारे चयन को भी प्रभावित करने लगे हैं। बाज़ार अब मदर डे, फादर डे, वेलेंटाइन डे, ये डे, वो डे के विज्ञापन करके हमारी संवेदनाओं को कैश करने तक से नहीं चूकता।
विज्ञापनों से परहेज़ नहीं, लेकिन विज्ञापनों का उद्देश्य उत्पादन व चीज़ों के बारे में लोगों को सही-सही जानकारी देना है ना कि भ्रम और आकर्षण फैलाकर अपनी गिरफ़्त में लेना। सच है कि कुछ विज्ञापन सुन्दर, संवेदनशील और सच्चे भी हैं किन्तु यह भी सच है कि ज़्यादातर झूठ का मायाजाल व वस्तुओं को ज़रूरत से ज़्यादा चमकदार बनाकर प्रस्तुत करते हुए तिलस्म बुनने का काम कर रहे हैं। यह किसी सेलिब्रिटी के माध्यम से एक झूठ को बार-बार और अलग-अलग तरीके से बोलकर सच बनाने की साजिश है जिस पर निश्चित रूप से लगाम लगनी ही चाहिए। साथ ही जिस माध्यम से यह विज्ञापन आम जनता तक पहुंचाते हैं उनकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए । पत्र-पत्रिकाओं, टेलिविज़न आदि के मामले में यह भी तय होना चाहिए कि विज्ञापनों का अनुपात क्या होगा, न केवल तय बल्कि उसका कड़ाई से पालन भी होना चाहिए। वैसे विज्ञापनों का यह दायरा केवल बाज़ार और उत्पादों तक ही सीमित नहीं है। सत्ता पाने के लिए अधिकतर राजनीतिक पार्टियां भी एक से एक भ्रामक और लोकलुभावन दावे करती रहीं हैं। जो भ्रामक विज्ञापन नहीं तो और क्या हैं ? इस पर कौन रोक लगायेगा ? 
उत्पादों, सेवाओं और विचारों को बढ़ावा देने के नाम पर 1 जुलाई 1941 से शुरू हुआ विज्ञापन नामक चीज़ आज एक बृहद कारोबार की शक्ल ले चुकी है, जिसका दायरा आज इतना व्यापक है कि कई उद्योग इस विज्ञापन उद्योग पर निर्भर हैं। पत्र-पत्रिकाएँ, चैनल्स आदि तो विज्ञापनों के सहारे ही चलते हैं यदि विज्ञापन न हों तो यह सब वर्तमान मूल्य से काई गुना ज़्यादा कीमत पर ही आम जन को उपलब्ध हो पाएगें। इन विज्ञापनों के मायाजाल से नियम, कानून, कमिटी आदि बना देने मात्र से मुक्ति मिल जायेगी, यह सच नहीं है। जनजागृति के बिना यह काम अधूरा ही रहेगा। जब तक उपभोक्ता भ्रम के शिकार होते रहेगें इस गलाकाट प्रतियोगिता के समय में लोग भ्रम का मायाजाल रचते रहेंगें।     

Sunday, February 2, 2014

गुरुशरण सिंह : इन्कलाब का जुझारू संस्कृतिकर्मी .

गुरुशरण सिंह
जन्म - सन 1929, निधन - 28 सितम्बर 2011

हमारे समाज की यह कठोर, दुखद और त्रासदपूर्ण सच्चाई है कि जिन्हें हमारा आदर्श होना था उनकी स्थिति अधिकांशतः या तो दयनीय है, या हास्यास्पद या फिर उपेक्षित ! सदियों से वर्गों-वर्णों में विभाजित, रोटी-कपड़ा-मकान की जद्दोजहद में पिसता, पूंजी से संचालित होता तथा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की तरफ़ ललचाई दृष्टि से देखता अर्ध-सामंती और अर्ध-उपनिवेशिक मानसिकता वाले भारतीय समाज में दोष किसका कितना है, ये बताने की आवश्यता नहीं।
जहाँ तक सवाल मनुष्य की संवेदना का है तो वो हुकमरानों की साजिश का शिकार होकर क्षणिक सुख के चक्कर में यांत्रिकता की ओर अग्रसर है। आज लगभग हर गतिविधि बस एक खबर है। ख़बरों के इस मायाजाल में सिनेमा के किसी नायक के मुकाबले जीवन के नायक की छवि धुंधली हो चुकी है या कर दी गई है। तमाम नैतिकताएं सिक्के की खनक की गुलामी में कैद की जा रहीं हैं। समाज का अधिकतर तंत्र तमाम जनपक्षीय आदर्श और सोचने-समझने के खिलाफ़ साजिश में लगा है। इन तमाम नैतिक पतनों के बीच कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनमें समाज की बनी-बनाई सफलता के मापदंडों की धारा के विपरीत अपना रास्ता तय करने का माद्दा, जूनून और जज्बा होता है। जो समाज से जितना लेतें हैं उससे कहीं ज़्यादा समाज को वापस करतें हैं। ये समाज पर अपनी विद्वता और ज्ञान का आतंक नहीं फैलाते बल्कि समाज से सीखते हुए सिखाने और सिखाते हुए सीखने की एक खूबसूरत प्रकिया का पथ चुनते हैं। ऐसे ही कुछ दुर्लभ नामों में से एक नाम थे गुरुशरण सिंह।
कला को राजनीति से दूर रखो। जबकि आज की कठोर सच्चाई ये है कि मानव से जुड़ा कोई भी पहलू राजनीति से अलग हो ही नहीं सकता। क्या यह भी एक राजनीति नहीं है कि राजनीति से कला और कला से राजनीति का कोई सरोकार नहीं ? ऐसा मानने वाले लोग क्या यथास्थिवाद के पोषक नहीं होते ? मुखर रूप से न भी हों पर मौन रूप से होते ही हैं। ज्ञातब्य हो कि राजनीति का अर्थ केवल बुराई ही नहीं होती। वहीं अपने को क्रांतिकारी कहनेवाली जमात नाटक, गीत, नृत्य आदि को राजनीति से जुड़ा कार्य तो मानती है पर दोयम दर्ज़े का काम ही मानते हुए। ये पार्टी सर्कुलर में भले ही सांस्कृतिक क्रांति की बात पुरजोर तरीके से उठाते हों परन्तु व्यावहारिक धरातल पर मामला दयनीय ही है। कारण साफ़ है कि इन दलों के कार्यकर्त्ता भी इसी समाज से ही आतें हैं और जब तक उनका सांस्कृतिक विकास नहीं होता, तब तक बुनियादी तौर पर कुछ खास नहीं बदलने वाला। नाटक या सांस्कृतिक कर्म के दौरान पार्टी का झंडा लहराने से चीज़ें क्रांतिकारी नहीं होती, कोई भी कला अपने विचार की वजह से क्रांतिकारी होतीं हैं प्रतीकों के वजह से नहीं।
मार्क्स, भगत सिंह के विचारों को अपना आदर्श मानने वाले और तमाम सीमाओं और उतार चढावों के वावजूद वाम राजनीति में सक्रिय जुड़ाव रखनेवाले गुरुशरण सिंह ये माननेवालों में से थे कि अगर कोई कला समाज के ज्वलंत सवालों से रू-ब-रू  और जन संघर्षों के साथ कलात्मक और वैचारिक रूप से खड़ी नहीं होती तो वो निरर्थक है, विलासिता है। कला की सार्थकता भव्यता, वैभव तथा सजावट के आडम्बरों से नहीं विचारों से होती हैं, उससे पैदा होने वाले सवालों से होती है। ऐसा कहते हुए उन्होंने रंगमंच के कलात्मक पक्ष को कभी नकारा नहीं। अगर ऐसा होता तो वो पंजाब में इप्टा के संस्थापकों में से न होते। न नाट्य आंदोलन को संगठित व संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने 1964 में अमृतसर नाटक कला केन्द्र का गठन किया होता। न ही कलाकारों को शिक्षित, प्रशिक्षित तथा शौकिया कलाकार से पूर्णकालिक कलाकार में बदलने तथा उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करते हुए उनके पलायन को रोकने के दिशा में ही कार्यरत हुए होते।
अपने समय और परिवेश से सीधा साक्षात्कार करती गुरुशरण सिंह के नाटकों और गीतों में राजनीति कूट-कूट कर भरी है। कई बार तो अतिरेक की हद तक, पर उनके राजनीति लकीर के फकीर वाली नहीं है। उनकी राजनीति को उनके नाटकों के माध्यम से अगर समझा जाय तो स्थिति कुछ यूँ बनेगी। उनका एक बहुचर्चित नुक्कड़ नाटक है “गड्ढा”। उसमें एक साधारण व्यक्ति गड्ढे में गिर जाता है। वो बिना किसी के सहायता के वहाँ से निकल नहीं सकता। एक पत्रकार उससे सवाल करता है – “ आप किसे अपना मानते हैं ?” गड्ढे में गिरा आदमी जवाब देता है – “जो मुझे इस गड्ढे से बाहर निकल दे।” कहने का अर्थ साफ़ है जो आम जन के साथ कदम दर कदम मिला के चले सच्ची कला और सच्चा राजनीति और सच्चा विचार वही है।
अपने करीबी साथियों के बीच 'गुरुशरण भ्राजी' नाम से चर्चित पंजाब के नाटककार, संस्कृतिकर्मी और सामाजिक कार्यकर्त्ता गुरुशरण सिंह का जन्म सन 1929 में मुल्तान में हुआ था। अपने छात्र जीवन में ही वे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गये। विज्ञान के विद्यार्थी गुरुशरण सिंह का नाटक के क्षेत्र में आना भी एक मुहिम के तहत ही था। सीमेन्ट टेक्नोलाजी से एम.एस.सी. करने के पश्चात् पंजाब में भाखड़ा नांगल बाँध बनने के दौरान वे इसकी प्रयोगशाला में बतौर अधिकारी कार्यरत थे। कुछ गिने चुने दिन ही वहाँ छुट्टी दी जाती थी। लोहड़ी ( पंजाब का एक प्रमुख पर्व ) का त्योहार आया। मजदूरों ने छुट्टी मांगी, नहीं मिलने पर हड़ताल का रास्ता अख्तियार किया। गुरुशरण सिंह भी इन मजदूरों के साथ थे, इन्होने इन मजदूरों की भावनाओं को आधार बनाकर एक नाटक तैयार किया, खेला जिससे मजदूरों की भावनाओं का प्रचार के साथ ही साथ संघर्ष को भी बल मिला। अंततः मजदूरों की जीत हुई। इस पूरी प्रकिया में गुरुशरण सिंह एक कार्यकर्त्ता और संस्कृतिकर्मी के तौर पर जुड़े थे। पहली बार नाटक लिखा, निर्देशित किया, अभिनय किया और शायद पहली बार ही नाटक की ताकत के सक्रिय परिचय से भी रू-ब-रू हुए ।
मंच और नुक्कड़ नाटकों की विभाजन रेखा को पाटने का काम समय-समय पर रंगकर्मी करते रहें हैं। इनके लिए दर्शक पैसा कमाने और हॉउसफुल के बोर्ड लगाकर निर्देशक का कॉलर खड़ा करने अर्थात अहम् की तुष्टि का साधन नहीं बल्कि सोचने-समझने और चिंतन करनेवाला विवेकशील प्राणी होता है। वो अवाम की ताकत, जो खुद पर  आ जाए तो बड़े से बड़े तख़्त को पलट कर रख दे, पर पुरज़ोर भरोसा रखतें हैं। यहाँ नाटक आत्ममुग्धता या दिखावे का साधन नहीं बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम होता है। इन्हीं चंद लोगों में गुरुशरण सिंह का नाम भी शामिल है। इन्होनें गीत लिखे, उसकी धुन बनाई, उसे अपने दल के साथियों के साथ गाया। सादगीपूर्ण तरीके से गीतों के एलबम भी निकाले, जिसे पुरे भारत के संघर्षशील आवाम ने पुरे शिद्दत से सुना और गया। इनके लिखे व मंचित किये गए लगभग पचास नाटकों में ‘जंगीराम की हवेली’, ‘हवाई गोले’, ‘हर एक को जीने का हक चाहिए’, ‘इक्कीसवीं सदी’, ‘तमाशा’, ‘गड्ढ़ा’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ हैं , जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया और इन नाटकों ने देश के विभिन्न जनांदोलनों को एक कलात्मक सहयोग भी प्रदान किया। शायद यही वो वजह थी कि ये नाटक पूरे देश में विभिन्न इंसाफ पसंद, प्रगतिशील सांस्कृतिक समूहों द्वारा खूब मंचित किये गए और आज भी किये जा रहें हैं। 
अस्सी के दशक में भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना नक्सलबाड़ी के किसान आंदोलन का गहरा असर देश के अन्य कई राज्यों की तरह पंजाब में भी था। उन्हीं दिनों गुरुनानक देव का 500 वाँ जन्म दिन आया। इस मौके पर गुरुशरण सिंह ने नानक के प्रगतिशील विचारों को आधार बनाकर गुरुदयाल सिंह सोढ़ी लिखित नाटक ‘जिन सच्च पल्ले होय’ को समसामयिक परिवेश से जोड़ते हुए, मंचित किया।  नाटक इतना लोकप्रिय हुआ कि पंजाब के करीब 1600 गाँवों में इसका मंचन हुआ। पंजाब और भारत के रंग-इतिहास में इस नाटक का अपना ही एक अनूठा इतिहास है।
इमरजेंसी काल के दौरान इन्होनें अपने नाटक ‘मशाल’ के द्वारा तानाशाही का विरोध किया। इस कारण इन्हें दो बार गिरफ्तार भी किया गया। अस्सी के दशक में जब पुलिस ने एक बार फिर उन्हें गिरफ्तार किया तो उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और एक पूर्णकालिक रंगकर्मी बनने का निर्णय लिया। इसी दशक में पंजाब जब दहक रहा था तो गुरुशरण सिंह को भी धमकियाँ मिल रही थी पर वे इन धमकियों से बेपरवाह हो काम करते रहे और मासिक पत्रिका ‘समता’ में आतंकवाद के विरोध में लगातार लिखते रहे। उन्हीं दिनों आतंकवाद के विरोध में उनका चर्चित नाटक ‘बाबा बोलता है’ लिखा। उन्होंने न सिर्फ इसके सैकड़ों मंचन किये बल्कि भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च पर आतंकवाद के विरोध में भगत सिंह के जन्म स्थान खटकन कलां से 160 किलोमीटर दूर हुसैनीकलां तक सांस्कृतिक यात्रा निकाली जिसके अन्तर्गत जगह-जगह उनकी टीम ने नाटक व गीत पेश किये। यह साहस व दृढता जनता से गहरे लगाव, उस पर भरोसे तथा अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण से ही संभव है।
गुरुशरण सिंह का कार्यक्षेत्र भले ही पंजाब रहा पर समय – समय पर तमाम जनवादी ताकतों के आह्वान पर जन-संघर्षों पर तमाम प्रकार के दमन के खिलाफ अपनी आवाज़ पंजाब के बाहर भी बुलंद करते रहे। भारतीय आवाम को जब भी ज़रूरत पड़ी गुरुशरण सिंह उनके साथ खड़े मिले। गुरुशरण सिंह की मूल उर्जा भारत की शोषित-पीड़ित जनता और देश की प्रगतिशील आवाम थी। वो इसी से अपनी उर्जा प्राप्त करते और इसे ही वापस अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से उर्जान्वित और तमाम प्रकार के शोषण-दमन के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए आंदोलित करते।
समय के साथ-साथ शरीर भले ही कमज़ोर पड़ा पर लगन नहीं। आवाज़ की बुलंदी और बुराई के खिलाफ़ लड़ने की उनकी ताकत कभी कमज़ोर न हुई। तमाम प्रगतिशील ताकतों को एक मंच पर आने की अपील और कोशिश उन्होंने ता-उम्र जारी रखी। कला के क्षणिक और भौतिक सुख – सुविधा से इतर उन्होंने जनता के साथ का रास्ता चुना। हाल के दिनों में झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न प्रकार के अभियानों के नाम पर हुए जन विरोधी कार्यवाईयों के खिलाफ़ उनका साफ़ आह्वान था कि अगर सरकार जन विरोधी अभियान चला सकती है तो जनता को भी चाहिए कि वो सरकार के खिलाफ़ जन-युद्ध छेड दे।
वे पंजाब इप्टा के संथापक सदस्यों में से एक थे। जन संस्कृति मंच के गठन में भी इनका प्रमुख योगदान रहा। जसम के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुने गये। साथ ही समय-समय पर विभिन्न प्रकार के जनवादी सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ते रहे। जन संघर्षो के साथ अक्सर खड़े रहने का जज्बा दिल में समेटे इस जन संस्कृतिकर्मी का निधन 28 सितम्बर 2011 को 82 साल की अवस्था में हुआ। वो बीमार चल रहे थे। गुरशरण सिंह पूरी जिंदगी कम्युनिस्ट बने रहे। इंकलाब ही उनके जीवन का उद्देश्य था।
दुखद और शर्मनाक स्थिति ये है कि हमारे देश में जितने भी नाट्य विद्यालय चल रहें हैं उनमें से किसी में भी गुरुशरण सिंह जैसे लोगों के बारे में लगभग कुछ नहीं पढ़ाया या बताया जाता है। गुरुशरण सिंह ही क्यों जन सरोकार से जुड़े किसी भी देसी आदमी की बात नहीं की जाती। ये स्कूल्स केवल तकनीक पढाने को ही अपना उद्येश्य मान बैठे हैं। ऐसा नहीं कि ये सब अनजाने में हो रहा है बल्कि ये उदासीनता जानबूझ पैदा की गयी है, की जा रही है। इसके पीछे कौन सा उद्येश्य काम करता है ये समझना कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं।
हर समाज अपना नायक खुद गढ़ता है। आज हमारे समाज में जो नायक-महानायक थोपे या गढे जा रहें है या जो नायकत्व का चोला धारण किये कुटिल मुस्कान बिखेर रहें हैं, क्या वे सच में नायक बनने के लायक हैं या आम जन को तसल्ली देकर धोखा देने के वास्ते, सूचना और संचार क्रांति के इस तथाकथित उत्तर-आधुनिक युग ने नायक, खलनायक, विदूषक को मिलाकर कुछ नया मसाला तैयार कर लिया है ? जन नायक और माल बेचने के लिए पैदा किये जा रहे नायकों में आसमान-जमीन का फर्क हैं और सरकारी ग्रांट के भरोसे आत्म-मुग्धता का ज़्यादा और जनता का संस्कृतिकर्म कम ही होता है। 
गुरुशरण सिंह ता-उम्र अपने विश्वास पर अडिग रहे और अपने नाटकों के द्वारा जनता की आवाज़ को बुलंद करते रहे। भले ही इन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया हो पर इनके लिए सबसे बड़ा सम्मान जनता की कराहों और मजबूरियों को ताकत और एकता में बदलकर क्रांति की आवाज़ को सच्चे संघर्ष में बदलना है। गुरुशरण सिंह के सपनों का भारत अभी भी सपना ही है पर हर हकीकत पहले सपना ही तो होती है।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...