Thursday, June 29, 2017

बाज़ार और स्वदेशी


Gadgets के बारे में पढ़ना और जानकारी इकट्ठा करना मुझे बेहद पसंद है। इसके पीछे शायद कारण यह है कि मुझे Gadgets सबसे क्रांतिकारी वैज्ञानिक अविष्कारों में से एक लगता है - ख़ासकर मोबाइल फोन। इस छोटी सी चीज़ ने अपने अंदर कितनी चिज़ों को समेट लिया है - इंटरनेट, फोन, घड़ी, म्यूज़िक प्लेयर, टाइप राइटर, कम्प्यूटर, कैलेंडर, चिट्ठी और पता नहीं कितनी चीज़ें इस छोटे से Gadget में समाहित हो गया है और आनेवाले दिनों में और पता नहीं क्या क्या इसमें जुड़ेगा। इस उपकरण के बिना आज शायद ही किसी का काम चलता हो - खासकर शहरों में। 

आज भारतीय बाजारों में एक से एक Gadgets उपलब्ध हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि ज़्यादातर बाजार पर विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा है। सिर्फ Gadgets Market ही नहीं वरण आज पूरे बाज़ार पर ही विदेशी कंपनियों ने कब्ज़ा जमा रखा है और स्वदेशी के नाम पर जो कंपनियां बाज़ार में हैं उनके Product ज़्यादातर निहायत ही घटिया हैं और जो कुछ बढ़िया और ठीक-ठाक हैं - उनकी क़ीमत ज़्यादा है। शायद इसीलिए उन्हें अपने Product बेचने के लिए धर्म, भारत, भारतीयता और देशप्रेम का सहारा लेना पड़ता है और हम भारतीय इस मामले में इतने मूढ़ हैं कि जाति, धर्म और देश की बात होते ही हमारे दिल, दिमाग और आंखें बंद हो जाती हैं और हम किसी भी अंधी गली में घुस पड़ने को तत्पर हो जाते हैं। 
भारत अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से इसलिए आज़ाद नहीं हुआ था कि विदेशी कंपनियां उसके बाज़ार पर कब्ज़ा कर लें या स्वदेशी के नाम पर रद्दी Product देशप्रेम की चाशनी में घोलकर परोसा जाए। हद तो यह है कि स्वदेशी का जाप करनेवाली हमारी सरकारें कोई मजबूत स्वदेशी infrastructure बनाने के बजाय विदेशियों और विदेशी कंपनियों को भारत आकर व्यापार करने का आमंत्रण देने में खुद को ज़्यादा सहज महसूस करती हैं। यह सबकुछ आज शुरू हुआ हो ऐसा नहीं है बल्कि इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि हम colonial मानसिकता से शायद कभी मुक्त ही नहीं हुए और फिर सामंती मानसिकता तो हमें विरासत में मिली ही है। 
East India Company के व्यापारी खुद व्यापार करने आए थे और हम अब आज Open Market के निहायत ही बकवास और बाज़ारू आइडिया का ग़ुलाम हो अपना बाज़ार खोलकर खुद बुलावा दे रहे हैं कि आओ और हमें आर्थिक रूप से फिर से ग़ुलाम बना लो। (शायद बहुत हद तक हम बन भी चुके हैं।) वैसे काफी हद तक बना भी चुके हैं। सनद रहे कि कोई भी व्यापारी अपना फायदा पहले देखता है और उसके लिए उसे कोई भी लेबल लगाने से कोई गुरेज नहीं होता। वैसे हम पता नहीं किस अंधी दौड़ में शामिल हैं कि हमें इन सब बातों से कोई खास फर्क पड़ता भी नहीं है।

Wednesday, May 10, 2017

सफलता का रहस्य और सुकरात

एक विचित्र बात देखने को मिल रही है आजकल। नौजवान तबका जो कि कठोर श्रम और अपने बिंदासपने के लिए जगत प्रसिद्ध है बहुत जल्द ही निराश हो जा रहा है और कभी यह तो कभी वह के चक्कर में पड़कर अपना कीमती और बहुमूल्य समय बर्बाद कर दे रहा है। सफलता और असफलता को लेकर या तो जल्दबाज़ी का शिकार है या फिर सफलता का गूढ़ सूत्र से पूरी तरह अनभिज्ञ। यदि इंसान किसी चीज़ में असफल होते हैं इसका मतलब यह होता है कि उसने उस चीज़ में सफल होने के लिए उतना शिद्दत, ज़िद्द और सही दिशा में मेहनत नहीं दिखलाया जितने की ज़रूरत थी। सफलता-असफलता कई बार स्थितियों-परिस्थितियों पर निर्भर तो करती है लेकिन इसके ज़्यादातर ज़िम्मेदार हम खुद होते हैं, ना कि कोई दूसरा। सफलता-असफलता के सूत्र हमारे अंदर हैं, कहीं बाहर नहीं। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिन्होंने अपने जुनून से पहाड़ों का सीना चाक कर दिया है। आखिर गया के गहलौत गांव के दशरथ मांझी के पास वो क्या बात थी जिन्होंने अकेले पहाड़ काटके रास्ता बना दिया। कबीर कहते हैं -
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात के सील पर पड़त निशान
अर्थात् अभ्यास करते करते मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान हो सकता है जैसे कुएं में बार-बार रस्सी के आने-जाने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। इस संदर्भ में सुकरात से जुड़ी एक कथा याद आ रही है।
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है? सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल नदी के किनारे मिलो। वो लड़का अगले दिन नदी के किनारे सुकरात से मिला। फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा। वे दोनों नदी में आगे बढ़ने लगे और जब आगे बढ़ते बढ़ते पानी गले तक पहुंच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़ के पानी में डुबो दिया। लड़का पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे पानी में तबतक डुबोए रखा जबतक कि वो लड़का नीला नहीं पड़ गया। फिर सुकरात ने उसका सिर पानी से निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो काम जो काम उस लड़के ने सबसे पहले किया, वो था हांफते-हांफते तेज़ी से सांस लेना।
थोड़ा सामान्य होकर लड़के ने क्रोधित होकर सुकरात से पूछा - आप क्या मुझे मार डालना चाहते थे?
सुकरात ने शांत स्वर में पूछा - जब तुम पानी के भीतर थे तब तुम सबसे ज़्यादा क्या चाहते थे?
लड़के ने उत्तर दिया - सांस लेना।
सुकरात ने कहा - यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना कि तुम सांस लेना चाहते थे, तो वो तुम्हें मिल जाएगी। इसके अलावा इसे पाने का कोई रहस्य नहीं है।
पाब्लो कुइलो ने भी अपने विश्व प्रसिद्द उपन्यास अल्केमिस्ट में यह पंक्ति बार बार दुहराते हैं - किसी चीज़ को तुम दिल से चाहो तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की जिद्द ठान लेती है। इस लाइन को शाहरुख खान की एक हिंदी फिल्म ने भी खूब इस्तेमाल किया बिना पाब्लो को आभार बोले हुए।
सो निराश होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हर असफलता के भीतर सफलता के सूत्र छिपे होते हैं बस ज़रूरत है उसे पहचानने और सही व सार्थक दिशा में सतत प्रयत्न करते रहने की।
#सुकरात के किस्से के लिए साभार #प्रभात #ख़बर

Sunday, May 7, 2017

नाची से बाँची : ज़िन्दगी नश्वर है, कला अमर।

5 मई को रांची के आर्यभट्ट सभागार में पद्मश्री डॉ राम दयाल मुंडा के कार्यों एवं जीवन पर आधारित फिल्म "नाची से बाँची" नामक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का प्रीमियर देखने का अवसर प्राप्त हुआ। जिस प्रकार पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ था वह अद्भुत था। भीड़ इतनी ज्यादा हो गई कि सभागार के बाहर एक अलग स्क्रीन की व्यवस्था की गई। मेघनाथ दा और उनकी टीम के दो साल के मेहनत का प्रमाण था यह फ़िल्म। अब दर्शकों का यह उत्साह रामदयाल मुंडा के प्रति था, मेघनाथ दा और बीजू टोप्पो के प्रति इस बात से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता बल्कि मूल बात यह है कि एक डाक्युमेंट्री फ़िल्म को देखने के लिए हज़ार के ऊपर लोग पहुंचे थे।
रामदयाल मुंडा झारखंड के शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में आदर से याद किए जाने वाले व्यक्तिव हैं जो आदिवासी जीवन शैली और आदिवासियों के हक़ की पुरज़ोर वकालत करते हैं। मुंडाजी ऊपर से थोपी जा रही विकास के उस अवधारणा के कट्टर विरोधी थे जो स्थानीय निवासियों को उनके जल, जंगल और ज़मीन से बेदखल कर उजाड़ दे और उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर करे। विकास एक अंदरूनी प्रक्रिया है जो कि सामाजिक ज़रूरत से पैदा होती है। बाहर से थोपा गया विकास लुभावना होने के साथ ही साथ सामंती, औपनिवेशिक और पूंजीवाद का पोषक है जिसके चंगुल में फंसकर स्थानीय लोग दर दर की ठोकरें खाने और विरोध करने पर आतंकवादी या नक्सल करार देकर राजकीय हिंसा का शिकार होने को अभिशप्त हुए हैं। वैसे भी आदिवासी समाज स्वयं में खुश और संतुष्ट रहने का प्रेमी है, उसको जल, जंगल और ज़मीन के अलावा और कुछ नहीं चाहिए। उनपर विकास का मध्यवर्गीय और पूंजीवादी मॉडल थोपना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं कि आदिवासी लोग बड़ी बेहतरीन ज़िन्दगी जी रहे हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए बल्कि यह है कि उनके लिए विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो ना केवल उनकी संस्कृति को प्राकृतिक प्रवाह प्रदान करे बल्कि उनके जीवन शैली (जो कि प्रकृति के ज़्यादा करीब है) को और ज़्यादा कुशल और प्राकृतिक बनाए। धोती-साड़ी हटाकर विदेशी जीन्स थोप देने को विकास मानना मूर्खता है।
प्रसिद्द फ़िल्मकार सत्यजीत राय ने रवींद्रनाथ के ऊपर एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी कुछ ऐसा ही प्रयास और स्नेह मेघनाथ दा का रामदयाल मुंडा के प्रति रहा है। मुंडा जी के ऊपर डाक्युमेंट्री फ़िल्म बनाना मेघनाथ दा के एक गुरु के प्रति एक सच्चे दोस्त शिष्य का समर्पण जैसा ही कुछ है। मुंडाजी एक विशाल व्यक्तित्व के स्वामी थे, उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को 70 मिनट की डाक्यूमेंट्री में समेटना एक दुरूह कार्य है। वैसे भी जीवनी परक कार्य एक ऐसा जाला है जिसका एक छोर पकड़ो तो कई छोर पकड़ना बाकी रह जाता है। मेघनाथ दा और बीजू कितना सफल और कितना असफल हुए हैं यह तो कोई वैसा  जानकार व्यक्ति ही बता सकता है जो रामदयाल मुंडा के जीवन और कार्यों से भली-भांति परिचित हो।
लेकिन तत्काल इतना तो कहा ही जा सकता कि यह दुनियां तथाकथित मुख्यधारा के शोर में इतना संलग्न है कि उसके इंद्रियों तक रामदयाल मुंडा जैसे व्यक्तित्वों की गूंज पहुंची ही नहीं है, यदि इस डाक्युमेंट्री को देखने के बाद मुंडाजी के बारे में जानने-समझने की ललक ही पैदा हो जाय तो इस फ़िल्म को सार्थक माना जाना चाहिए।
रामदयाल मुंडा "अखरा" प्रेमी एक ऐसे व्यक्ति थे जो काम या पढ़ाई के वक्त भी मांदल और ढोल लेकर जाने को प्रेरित करते थे ताकि जब काम करते हुए या पढ़ाई करते हुए मन ऊबने लगे तो इन पर थाप मारकर और इनकी धुनों पर पैर थिरकाकर तरोताज़ा हो फिर से काम में लग जाएं। मुंडाजी चिंतक होने के साथ ही साथ खुद भी एक अच्छे गायक, वादक और नर्तक थे। उन्होंने आदिवासी संस्कृति का न केवल पुरज़ोर अध्ययन किया बल्कि उसपर कई किताबें भी लिखी। मुंडाजी का कथन था "जे नाची उहे बाँची (जो नाचेगा वही बचेगा)" से प्रभावित होकर इस फ़िल्म का शीर्षक रखा गया है। नाचने गाने का सीधा संबंध उत्साह, उमंग और अपनी संस्कृति से है और उत्साह, उमंग और संस्कृति बचेगी तभी समाज बचेगा, अपनी एक विशिष्ट पहचान के साथ क्योंकि संस्कृतियां मानव समाज की आत्मा हैं। तमाम किन्तु-परंतु के बावजूद विविधता इस देश की संस्कृति है और जो सबको एक ही रंग में रंग देने और एक ही संस्कृति को सब पर जबरन थोप देने को तत्पर हैं, दरअसल असली उग्रवादी व देशद्रोही वो ही लोग, विचार और पार्टी है, ना कि वे लोग जो अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं।
रामदयाल मुंडा मानवीय हितों के प्रबल समर्थक के रूप में विख्यात थे। इसके लिए उन्हें अपनी संस्कृति से लेकर उन सारे देसी-विदेशी नामों की शरण में जाने से कोई परहेज नहीं था जिनके पास मानव के हित में कोई भी ज्ञान हो।
सरल स्वभाव और व्यक्तित्व के मेघनाथ दा और बीजू दोनों पिछले लगभग ढाई-तीन दशक से डाक्युमेंट्री फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। इस दौरान इन्होंने गाड़ी लोहरदग्गा मेल, एक रोपा धान, गाँव छोडब नाहीं, development flows from the barrel of the Gun आदि नामक चर्चित और पुरस्कृत फिल्में बनाई हैं। कल जिस प्रकार रांची के निवासी इनकी नई फिल्म "नाची से बाची" देखने लोग उमड़ पड़े, यह इनकी सार्थकता का प्रमाण है।
डाक्युमेंट्री फ़िल्म इस देश में सहिए पर पड़ी एक विधा है जिसकी परवाह करनेवाले लोग बहुत कम हैं। लेकिन इस फ़िल्म के प्रति लोगों का उत्साह और समर्पण आशान्वित करती है और साथ ही यह भी कहती है कि थोड़ा प्रयास कलाकारों को करना है और थोड़ा समाज व सरकारों को। कलाकार लोगों तक पहुंचें, लोग कलाकार की कला तक टिकट खरीदकर पहुंचे और सरकारें व सरकारी संस्थानें कला को संरक्षण और प्रशिक्षण देने के लिए उचित रूप से फलने-फूलने का स्वस्थ्य वातावरण के निर्माण की ओर अग्रसर हो; इन बातों में ही सबकी सार्थकता है।
#नाची से #बाची
निर्देशक - Biju Toppo एवं Meghnath
निर्माता - फ़िल्म डिवीजन
अवधि - 70 मिनट
प्रस्तुति - अखरा
दिनांक - 5 मई 2017
स्थान -आर्यभट्ट हॉल, मोरबादी, रांची

Thursday, February 23, 2017

विकास और Bert Haanstra निर्देशित विश्वप्रसिद्ध शॉट फिल्म है Glass

नीदरलैंड के निर्देशक Bert Haanstra निर्देशित एक विश्वप्रसिद्ध शॉट फिल्म है Glass. इस फिल्म का निर्माण सन 1958 में हुआ था, फिल्म कि अवधी मात्र 10 मिनट है। फिल्म दो भागों में है। पहले भाग में बड़ी ही सुंदरतापूर्वक कारीगर की कारीगरी से एक से एक रंगीन ग्लास को अलग-अलग शेप लेते हुए दिखाया गया है, वहीं दूसरे भाग में मशीन के द्वारा बड़े ही तकनीकी ढंग से ग्लास शेप ले रहा होता है। हालांकि इससे इंकार नहीं कि दूसरे भाग में काम बड़ी ही तेज़ी से हो रहा होता है लेकिन कोई गडबड़ी होने पर नुकसान भी ज़्यादा दूसरे भाग में होता है। फिल्म का पार्श्व संगीत (Background Music) भी कमाल का है और दृश्य के साथ ना केवल प्रभाव उत्पन्न कर रहा होता है बल्कि अपने आपमें एक भाषा का निर्माण भी बखूबी कर रहा होता है। पहला भाग मानव और मानवीय कला का प्रतीक है तो दूसरा भाग मशीन और उद्योगिक क्रांति की ताकत का। विश्व भर में बहुचर्चित इस फिल्म ने 1959 में Academy Award for Documentary Short Subject का पुरस्कार भी जीता था।
इस बात से इनकार नहीं कि औधोगिक क्रान्ति ने मशीनीकरण को बढ़ावा दिया है और बहुत सारी चीज़ों के उत्पादन में तेज़ी, सहजता और गुणवत्ता के साथ ही साथ समय की बचत का नायब नमूना पेश किया है, लेकिन साथ ही साथ यह भी सच है कि बहुत सारी मानवीय हस्त कलाओं का बड़ी ही बेदर्दी से गला भी घोंटा है। इंसान इनके लिए कलाकारी और उसका रसास्वादन करनेवाला कलाकार और कलाप्रेमी नहीं बल्कि एक उपभोक्ता मात्र है, जो पैसे खर्च करके उत्पाद का उपभोग मात्र करता है।
एतिहासिक सच है कि मानव के विकास में श्रम की भूमिका अतुलनीय रही है। लेकिन यदि बाज़ारवाद के क्रूर चंगुल में फंसकर मानव केवल एक उपभोक्ता मात्र के रूप में परिवर्तित हो जाए तो उसकी विकास प्रक्रिया में अप्राकृतिक अवरोध पैदा होता है, और इससे केवल शारीरिक ही नहीं वरण मानसिक, मानवीय और बौधिक विकास भी प्रभावित होता है।
आज कई ऐसी कलाएं हैं जो मशीनीकरण और बाज़ारवाद का शिकार होकर का या तो खत्म हो गईं  या खत्म होने के कगार पर हैं। इन कलाओं की चिंता ना सरकारों को है, ना उद्योगपतियों को और ना ही समाज के ज्यादतर तबकों (जाति, धर्म, समुदाय) को ही। समाज तो पता नहीं किस बात की तेज़ी में जी रहा है कि उसके पास सही-गलत सोचने तक का वक्त अब नहीं रह गया है। कलाओं की बात की जाय तो वहां सामाजिक स्तर पर बड़ी ही खतरनाक उदासीनता है।
Bert Haanstra निर्देशित एक और शॉट फिल्म Zoo भी एक कमाल की फिल्म है लेकिन इस फिल्म पर बात फिर कभी। अभी आप ग्लास नामक यह फिल्म इस लिंक को क्लिक करके देख सकते हैं – अगर नहीं देखें हैं तो। फिल्म देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.

Saturday, February 4, 2017

अनिल ओझा : गुरु वह जो शालीनता से चुपचाप गढ़ता हो।

हम सबकी ज़िन्दगी में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो लगते साधारण हैं लेकिन वो बड़ी ही शालीनता और निःस्वार्थ भाव से आपकी ज़िंदगी को एक सार्थक दिशा देते हैं। किसी ने सही ही कहा है कि हर व्यक्ति गुरु होता है, हम हर किसी से सीख सकते हैं। कोई हमें यह सिखाता है कि क्या करना चाहिए तो कोई हमें यह सीखा जाता है कि क्या नहीं करना चाहिए।
सच्चा गुरु वह है जो आपकी आज़ादी (अराजकता नहीं) और प्रतिभा को विस्तार दे, सत्य का मार्ग दिखाए और सही राह पकडाकर अपने पैरों से चलने को स्वतंत्र कर दे, वह नहीं जो किसी भैंस-गाय की तरह आपके गले में पगहा डाल दे और कहे कि कोल्हू के बैल की तरह ज़िन्दगी भर मेरे आगे पीछे गोल-गोल घूमते रहो।
बाबा कबीर कहते हैं गुरु बिना ज्ञान संभव नहीं। नाट्यकला के क्षेत्र में रंग-चिंतक और प्रशिक्षक स्तानिस्लावस्की का यह कथन न केवल मार्गदर्शन करता हैं बल्कि हार्ड कोर संविधान जैसा ही है। वो कहते हैं - "अध्यापक या प्रशिक्षक को, चाहे वह कितना भी पढ़ा - लिखा क्यों न हो और रंग - प्रदर्शन के विविध स्वरूपों का चाहे उसने कितना ही अभ्यास क्यों न कर रखा हो, चाहे वह रंगकर्मी वयोवृद्ध क्यों न हो गया हो, यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वह कोई बहुत बड़ा अथवा महामहीम व्यक्ति है। उसे छात्र अभिनेताओं को अपना मित्र, अपना बंधु, अपना आत्मीय समझना चाहिए। उसके विचार और आचार में सहज सामंजस्य होना चाहिए। यह ज़रूरी है कि वह अपने कार्य के प्रति पूर्णतः समर्पित हो। उसके छात्र अभिनेताओं को यह कभी नहीं लगना चाहिए कि कोई वरिष्ठ व्यक्ति आदेशात्मक रूप में उनसे कुछ कराना चाहता है। उसके कथन और कार्य में कुछ ऐसा समन्वय होना चाहिए कि जो कुछ पढ़ाया जा रहा है, वह दूर से चलकर आए और छात्रों के मन में सहज रूप से संप्रेषित हो जाए।" (स्तानिस्लावस्की peoples and method of creative art.)
सही उम्र, सही स्थान और सही समय पर कोई सच्चा मार्गदर्शक मिल जाए तो ज़िन्दगी सार्थक हो जाती है और कहीं गुरु-घंटालों के चंगुल में फंस गए तो गई भैंस पानी में।
अनिल ओझा मुझे उस उम्र में मिले जब मैं अराजकता की ओर क़दम बढ़ा रहा था। उन्होंने मुझे मानव जीवन और मानवीय व वैज्ञानिक विचार का सही अर्थ केवल प्रवचन मात्र से नहीं बल्कि साथ जी कर बताया। जब लगा कि मैं समझने लगा हूँ तो सही राह दिखाई और बिना कुछ बोले ही कह दिया कि चलते जाओ साथी। इस संघर्ष की शायद कोई मंज़िल नहीं बल्कि रस्ते ही रास्ते हैं। वैसे जब कभी परेशान होता हूँ तब पापा कहते हैं - "संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष करो और आगे बढ़ो।"
अनिल की ज़िंदगी बड़ी छोटी थी और एक सड़क दुर्घटना ने उन्हें हम सबसे शारीरिक रूप से जुदा कर दिया लेकिन विचार कभी नहीं मरता, यह भी सच है।अनिल के विचार हम जैसे अनगिनत लोगों के अंदर आज भी ज़िंदा हैं और हर मुश्किल में राह दिखाता है और मुश्किल से मुश्किल समय में भी शालीनता से संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। आज भी जब कभी स्वार्थी बनकर सोचता हूँ तो अनिल फटकार लगा देता है जैसे बोल रहा हो फिर तुम वो नहीं रह जाओगे जो तुम हो। गांधीजी का अंतिम जन ही मार्क्स का सर्वहार है, उसकी फ़िक्र किए बिना दुनियां की कोई भी कला व्यर्थ जैसा ही कुछ है। दारियो फ़ो कहते है - जो कला अपने समय से साक्षात्कार नहीं करता, वह निरर्थक है।
अनिल की ज़िंदगी लम्बी के हिसाब से बड़ी ही छोटी थी लेकिन ज़िन्दगी कितनी लंबी है यह ज़रूरी बात नहीं है बल्कि ज़रूरी यह है कि वह कितनी सार्थक है।
अनिल, निःस्वार्थ और बिंदास जिए और अपने निहायत ही छोटे से जीवन में मुझ जैसे ना जाने कितनों को सही राह दिखा गए। सलाम साथी। तुम हमारे दिलों पर राज करते हो। तुम हमारे अंदर सांस लेते हो।

Monday, January 23, 2017

दस्तक पटना का नाट्योत्सव : रंग दस्तक 2017

नाट्य दल दस्तक की स्थापना 15 साल पहले हुई थी. तब से लेकर अब तक इस नाट्यदल ने कई नाटकों का मंचन कुशलतापूर्वक किया है. अब दस्तक के अध्याय में एक नया आयाम अब जुड़ने जा रहा है. इस तीन दिवसीय नाट्योत्सव का नाम “रंग-दस्तक -2017” है. इस उत्सव में दस्तक के तीन नाटकों – पटकथा (धूमिल की लंबी कविता) का मंचन प्रेमचंद रंगशाला, पटना में 24 जनवरी 2017 को संध्या 6:30 बजे, भूख और किराएदार नामक नाटक का मंचन क्रमशः 25 व 26 जनवरी 2017 को कालिदास रंगालय, पटना में संध्या 6:30 बजे से किया जाएगा.

नाट्य दल दस्तक के बारे में

रंगकर्मियों को सृजनात्मक, सकारात्मक माहौल एवं रंगप्रेमियों को सार्थक, सृजनात्मक, नवीन और उद्देश्यपूर्ण कलात्मक अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से “दस्तक” की स्थापना सन 2 दिसम्बर 2002 को पटना में हुई. दस्तक ने अब तक मेरे सपने वापस करो (संजय कुंदन की कहानी), गुजरात (गुजरात दंगे पर आधारित विभिन्न कवियों की कविताओं पर आधारित नाटक), करप्शन जिंदाबाद, हाय सपना रे (मेगुअल द सर्वानते के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास Don Quixote पर आधारित नाटक), राम सजीवन की प्रेम कथा (उदय प्रकाश की कहानी), एक लड़की पांच दीवाने (हरिशंकर परसाई की कहानी), एक और दुर्घटना (दरियो फ़ो लिखित नाटक) आदि नाटकों का कुशलतापूर्वक मंचन किया है.

दस्तक का उद्देश्य केवल नाटकों का मंचन करना ही नहीं बल्कि कलाकारों के शारीरिक, बौधिक व कलात्मक स्तर को परिष्कृत करना और नाट्यप्रेमियों के समक्ष समसामयिक, प्रायोगिक और सार्थक रचनाओं की नाट्य प्रस्तुति प्रस्तुत करना भी है.

नाटक पटकथा के बारे में                                                                  

दस्तक, पटना की प्रस्तुति

सुदामा पांडेय “धूमिल” लिखित लंबी कविता

पटकथा

आशुतोष अभिज्ञ का एकल अभिनय

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

ध्वनि संचालन – आकाश कुमार

प्रस्तुति प्रबंधन –  सुजीत कुमार, मंज़र हुसैन

प्रस्तुति संचालक – रेखा सिंह

सहयोग – अरुण कुमार, राहुल कुमार

परिकल्पना व निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – प्रेमचंद रंगशाला, पटना

दिनांक – 24 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

पटकथा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लंबी कविताओं में से एक है जो भारतीय आम अवाम के सपने, देश की आज़ादी और आज़ादी के सपनों और उसके बिखराव की पड़ताल करती है. देश की आज़ादी से आम आवाम ने भी कुछ सपने पाल रखे थे किन्तु सच्चाई यह है उनके सपने पुरे से ज़्यादा अधूरे रह गए. अब हालत यह है कि अपनी ही चुनी सरकार कभी क्षेत्रीय हित, साम्प्रदायिकता, तो कभी धर्म, भाषा, सुरक्षा, तो कभी लुभावने जुमलों के नाम पर लोगों और उनके सपनों का दोहन कर रही है. इस कविता के माध्यम से धूमिल व्यवस्था के इसी शोषण चक्र को क्रूरतापूर्वक उजागर किया है और लोगो को नया सोचने, समझने तथा विचारयुक्त होकर सामाजिक विसंगतियो को दूर करने की प्रेरणा भी देते हैं. कहा जा सकता है कि पटकथा प्रजातंत्र के नाम पर खुली भिन्न – भिन्न प्रकार के बेवफाई की बेरहम दुकानों से मोहभंग और कुछ नया रचने के आह्वान की कविता है. यह कविता बेरहमी, बेदर्दी और बेबाकी से कई धाराओं और विचारधाराओं और उसके नाम के माला जाप करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का काम करती है; वहीं आम आदमी की अज्ञानता-युक्त शराफत और लाचारी भरी कायरता पर भी क्रूरता पूर्वक सवाल करती है.

नाटक- ‘किराएदार’ के बारे में

यह फ़्योदोर दोस्तोव्येसकी की लंबी कहानी “रजत रातें” से प्रभावित नाटक है जो एक लड़का, एक लड़की और एक आदमी के माध्यम से प्रेम की संवेदनाओं सम्बन्धों की पड़ताल दुनियावी मान्यताओं से परे जाकर करता है. यहाँ प्रेम पाने, खोने, यथार्थवादी, आध्यात्मवादी मान्यताओं के परे जाकर एहसासों की बात करता है. यहाँ प्रेम एक मनःस्थिति है न कि खोना, पाना या हासिल करना.

मंच पर – रेखा सिंह, पुंज प्रकाश और आकाश कुमार

प्रकाश परिकल्पना – सुमन सौरव

सहयोग – अरुण कुमार, राहुल कुमार

ध्वनि – सुजीत कुमार

सहायक निर्देशक – अमन कुमार

पूर्वाभ्यास प्रभारी – बादल कुमार

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

प्रस्तुति प्रभारी – सुधांशु शेखर

प्रस्तुति संचालक – मंज़र हुसैन एवं नीतीश कुमार

सानिध्य – ऋचा शर्मा एवं मुन्ना कुमार पांडेय

नाट्यालेख, परिकल्पना और निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – कालिदास रंगालय, पटना

दिनांक – 25 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

नाटक भूख के बारे में

हाल ही की एक सच्ची घटना है जब एक महानगर में तीन बहनों ने अपने आपको घर के अंदर क़ैद कर लिया था और अपने आपको मजबूरन भूखों मरने के लिए छोड़ दिया था. इस क्रम में छोटी बहन की मौत हो गई और किसी प्रकार दो बहनों को ज़िंदा बचा लिया गया. इस पूरी घटना की पड़ताल करने पर कई पहलू निकलकर सामने आते हैं और हमें देश, समाज, सामाजिक – राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था समेत मानवता के क्रूरतम पक्ष से साक्षात्कार कराते हैं. एक ऐसे देश में जिसकी पहचान ही कृषि प्रधान देश के रूप में हो, वहां इंसानों का भूख से दम तोड़ देना एक भयानक घटना और क्रूरतम सच्चाई नहीं तो और क्या है? सच्ची घटना पर आधारित इस नाटक का लेखन पुंज प्रकाश ने किया है. इस वृतचित्रात्मक नाटक में रेखा सिंह, अरुण कुमार, राहुल कुमार, सुजीत कुमार, मंज़र हुसैन, अमन कुमार, बादल कुमार आदि अभिनेता/अभिनेत्री काम कर रहे हैं.

मंच परे :-

ध्वनि संचालन – आकाश कुमार

सहयोग – सुधांशु शेखर

प्रकाश परिकल्पना – पुंज प्रकाश

सहायक निर्देशक – अमन कुमार

मंच सामग्री – दस्तक परिवार

पूर्वाभ्यास प्रभारी – बादल कुमार

सानिध्य – ऋचा शर्मा व मुन्ना के. पांडेय

प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार

नाटककार, परिकल्पना एवं निर्देशन – पुंज प्रकाश

स्थान – कालिदास रंगालय, पटना

दिनांक – 26 जनवरी 2017

समय – संध्या 6:30 बजे

इस उत्सव का कोई स्पॉन्सर/ग्रांट नहीं है. रंगप्रेमियों से उचित सहयोग की कामना के साथ टिकट के द्वारा शो करने का एक प्रयास है. टिकट दर 50रू प्रतिदिन है.

Sunday, January 1, 2017

वर्ष 2017 : पूरा विश्व ही हमारा घर है।

नया वर्ष में केवल कलेंडर ही बदलता है बाकि सब जस का तस रहता है - प्यार, स्नेह, दुश्मनी, दोस्ती, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा सब। एक कलाकार ह्रदय संवेदनशील व्यक्ति के लिए प्यार, स्नेह, सम्मान, दोस्ती का साथ हर क़ीमत पर निभाना उसकी फ़ितरत है और दुश्मनी, साजिश, दो-मुंहापन, धोखा, धंधेबाजी, गुटबाज़ी आदि से मुक्त हो निःस्वार्थ भाव से अपना काम करते रहना उसका जूनून। 
उन सबका आभार प्रकट क्या करूँ जो मेरी ताक़त हैं? एक साल ही ख़त्म हुआ है केवल, ज़िन्दगी अभी बहुत लंबी है और जितना कुछ किया गया है उससे बहुत ज़्यादा करने को बचा है - आपका साथ व भरोसा बना रहे और मुझमें सदा इतना होश और जोश रहे कि मैं अपने कर्म और व्यवहार से सदा आपके दिल में जगह पाता रहूं - यही आशा है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात में यकीन नहीं रखता कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है पूरा साल भी वैसा ही बीतेगा। दुःख, सुख जीवन के अंग है और पूरी दुनियां में यह सब एक साथ चलता रहता है। एक कलाकार की दुनियां केवल अपने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि पूरा विश्व उसमें समाहित होता है। नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित नाटककार दारियो फ़ो कहते हैं - "पूरा विश्व ही हमारा घर है और आज़ादी हमारा क़ानून। क्रांति हमारे दिल में बसे, हमारा बस यही एक विचार है।" 
भगवत गीता की यह पंक्ति भी आज के दिन याद करने योग्य है - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)
भारत, भरतीयता, हिंदुस्तान, भारतीय संस्कृति आदि के नाम पर भी मूढ़ता पसारने का खेल ख़तरनाक तरीके से खेला जा रहा है। विविधता इस देश की संस्कृति है और उसका सम्मान संस्कृतिक पहचान। भारत एक फुलवारी है जिसमें हर प्रकार के फूल खिलते और फलते फूलते हैं। इस पहचान की रक्षा करना प्रथम नागरिक कर्तव्य है। भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं - भारतीय भूमि, जन, संप्रभुता, भाषा एवं संस्कृति। इसके अतिरिक्त अंतःकरण की शुचिता (आंतरिक व बाह्य शुचिता) तथा सतत सात्विकता पूर्ण आनन्दमयता भी भारतीयता के अनिवार्य तत्व हैं। भारतीय जीवन मूल्यों से निष्ठापूर्वक जीना तथा उनकी सतत रक्षा ही सच्ची भारतीयता की कसौटी है। संयम, अनाक्रमण, सहिष्णुता, त्याग, औदार्य (उदारता), रचनात्मकता, सह-अस्तित्व, बंधुत्व आदि प्रमुख भारतीय जीवन मूल्य हैं। 
मूलतः नास्तिक आदमी हूँ किन्तु किसी भी किताब में कही गई किसी अच्छी बात से मुझे कोई परहेज नहीं। अच्छी बातों का उल्लेख करना भी कोई बुरी बात नहीं और ज्ञान कहीं से भी मिले उसे धारण करने में कोई बुराई नहीं। वैसे भी भारत, भारतीयता, राष्ट्रवाद, धर्म के नाम पर उन्माद फैलानेवालों की आज कोई कमी नहीं। वो हमें इसलिए भी मुर्ख बनाने में कामयाब होते हैं क्योंकि हम शायद खुद इन शब्दों का उचित अर्थ नहीं पहचानते। भारतीयता की प्रकृति से तात्पर्य उन मान बिंदुओं से है जिनकी उपस्थिति में भारतीयता का आभास होता है। भारतीयता निम्नांकित बिंदुओं/अवधारणाओं से प्रकट होती है-
वसुधैव कटुम्बकम् की अवधारणा : संपूर्ण विश्व को परिवार मानने की विशाल भावना भारतीयता में समाविष्ट हैं। 
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। 
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।
(यह मेरा है, यह पराया है, ऐसे विचार तुच्छ या निम्न कोटि के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति समस्त संसार को ही कुटुम्ब मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम का मन विश्वबंधुत्व की शिक्षा देता है।)

विश्व कल्याण की अवधारणा :
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःख भाग्भवेत।।

भारतीय वांग्मय में सदा सबके कल्याण की कामना की गई है। उसे ही सार्वभौम मानवधर्म माना गया है।मार्कण्डेय पुराण में सभी प्राणियों के कल्याण की बात की गई है। सभी प्राणी प्रसन्न रहें। किसी भी प्राणी को कोई व्याधि या मानसिक व्यथा न हो। सभी कर्मों से सिद्ध हों। सभी प्राणियों को अपना तथा अपने पुत्रों के हित के समान वर्ताव करें।
विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प : ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ (सारी दुनिया को श्रेष्ठ, सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाएंगे।) यह संकल्प भारतीयता के श्रेष्ठ उद्देश्य को व्यक्त करता है।
सहिष्णुता : सहिष्णुता से तात्पर्य सहनशक्ति व क्षमाशीलता से है। धैर्य, विनम्रता, मौन भाव, शालीनता आदि इसके अनिवार्य तत्व हैं। भारतीयता का यह तत्व भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। यही कारण है कि भारत की कभी भी अपने राज्य विस्तार की इच्छा नहीं रही तथा सभी धर्मां को अपने यहां फलते-फूलने की जगह दी।
अहिंसात्मक प्रवृत्ति : अहिंसा से तात्पर्य हिंसा न करने से है। कहा गया है कि ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान मानो। महावीर, बुद्ध तथा महात्मा गांधी ने विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महाभारत में भी कहा गया है कि मनसा, वाचा तथा कर्मणा किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। हमारे ऋषियों ने अहिंसा को धर्म का द्वार बताया है। जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म बताया गया है।
आध्यत्मिकता : आध्यात्मिकता भारतीयता को अन्य संस्कृतियों के गुणों से अलग करती है। ईश्वर के प्रति समर्पण भाव ही आध्यात्मिकता है। भक्ति, ज्ञान व कर्म मार्ग से आध्यात्मिकता प्राप्त की जा सकती है। यह आत्मा के संपूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।पुरूषार्थ चतुष्टय आध्यात्म में संचालित, प्रेरित व अनुशासित होता है। आध्यात्म के क्षेत्र में भारत को गुरू मानता है।
एकेश्वरवाद की अवधारणा :
एकं सद् विप्राः बहुनाम वदन्ति। 
(ईश्वर एक है। विद्वान उसे अनेकों नाम से पुकारते हैं)

इस्लाम ने भी ईश्वर के एक होने की बात की है परंतु उसी सांस में यह भी कह दिया कि उसका पैगम्बर मौहम्मद है तथा उसके ग्रंथ कुरान में भी आस्था रखने की बात कही। यही बात ईसाइयत में है। भारत में ईश्वर को किसी पैगम्बर व ग्रंथ से नहीं बांधा है।
सर्वधर्म समभाव : भारत में सभी धर्म राज्य की दृष्टि में समान हैं। पूजा की सभी पद्धतियों का आदर करो तथा सभी धर्मां के प्रति सहिष्णुता बरतो।धर्म, मजहब, पंथ एक नहीं हैं। इस्लाम व ईसाइयत को पंथ/मजहब कह सकते हैं जबकि हिंदु धर्म 'जीवन पद्धति' है। कहा भी गया है कि-
‘‘धारयते इति धर्मः’’
अर्थात् जो धारण करता है, वहीं धर्म है। इसका अर्थ है पवित्र आचरण व मानव कर्तव्यों की एक आचार सहिंता। मनु ने धर्म के 10 लक्षण (तत्व) बताए हैं-

१. धृति - धैर्य / संतोष 
२. क्षमा - क्षमा कर देना 
३. दम - मानसिक अनुशासन 
४. अस्तेय - चोरी नहीं करना 
५. शौच - विचार व कर्म की पवित्रता 
६. इंद्रिय निग्रह - इंद्रियों को वश में करना 
७. धी - बुद्धि एवं विवेका का विकास 
८. विद्या - ज्ञान की प्राप्ति 
९. सत्य - सच्चाई 
१०. अक्रोध - क्रोध न करना

धर्म की इस परिभाषा में कुछ भी सांप्रदायिक नहीं है। भारतीय दृष्टि से लोग अलग पंथ/मजहब/पूजा पद्धति में विश्वास करते हुए इस धर्म का अनुसरण कर सकते हैं। जीवन के प्रति संश्लिष्ट दृष्टि - चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मानव जीवन के प्रेरक तत्व।
धर्म राज्य / राम राज्य की अवधारणा : राजा या शासन लोकहित को व्यक्तिगत रूचि या अरूचि के उपर समझे। महाभारत में निर्देश हैं कि जो राजा प्रजा के संरक्षण का आश्वासन देकर विफल रहता है तो उसके साथ पागल कुत्ते का सा व्यवहार करना चाहिए।
अनेकता में एकता : भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि यहां अनेक जातियां, खान-पान, वेश-भूषा, भाषा, प्रांत होने के बावजूद भी राष्ट्र के नाम पर एकता है।
राष्ट्रीयता : भारतीयता राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने का ही दूसरा नाम है। राष्ट्रीयता में केवल राजनीतिक निष्ठा ही शामिल नहीं होती बल्कि देश की विरासत और उसकी संस्कृति के प्रति अनुशक्ति की भावना, आत्मगर्व की अनुभूति आदि भी शामिल है। भारतीयता सभी भारतीयों में राष्ट्रीयता की सशक्त भावना पैदा करने के सिवाय कुछ भी नहीं है।
राष्ट्रवाद और धर्म का मुखौटा पहनकर नफ़रत की राजनीति करनेवाले लोग और समूह मासूम आमजन और देश को बांटने का कार्य करती हैं, इसका भारतीयता और भारतीय संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। ये केवल सत्ता की राजनीति करना जानते हैं, इनका किसी भी प्रकार के विकास से कोई ख़ास मतलब भी नहीं होता। और जहाँ तक सवाल सेवा भाव का है तो यह भी इनका एक ढोंग ही होता है। पडोसी के घर में आग लगाकर कोई भी अमन पसंद व्यक्ति या समूह कभी भी चैन से नहीं रह सकता। आज़ादी और ख़ुशी अकेले में अकेले की नहीं बल्कि सामूहिक होती है।
बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है - "किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है"

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है, 
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है, 
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,
उसी की जनवरी छब्बीस,
उसी का पंद्रह अगस्त है !

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,
गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,
धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,
कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...