Saturday, July 9, 2016

फुलसुंघी - पाण्डेय कपिल का भोजपुरिया उपन्यास

“बाबुसाहेब! फुलसुंघी के जनीले नू? उ पिंजड़ा में ना पोसा सके । ऊ एगो फूल के रस खींचके चल देले दोसरा फूल का ओर । हम त तवायफ के जात हईं । हमरी काम फुलसुंघी के लेखा एगो जेब से पैसा खींचके दोसर जेब के ओर चल दिहल ह । (बाबुसाहेब, फुलसुंघी को जानते हैं न? वो पिंजड़ा में नहीं पाली जा सकती । वो एक फूल से रस चूसकर दूसरी फूल की ओर चल देती है । हम तवायफ हैं । हमारा काम भी फुलसुंघी जैसा ही एक जेब से पैसा खींचकर दूसरी जेब की ओर चल देना है ।)  – फुलसुंघी”

“फुलसुंघी” भोजपुरी संस्थान, 2 ईस्ट गार्डिनर रोड़, पटना 800001 से सन 1977 में प्रकाशित एक भोजपुरी उपन्यास है । इसके पात्र एतिहासिक तो हैं लेकिन लेखक पाण्डेय कपिल एतिहासिकता और घटनाओं की विश्वसनीयता का दावा पेश नहीं करते । पात्र और स्थान यथार्थ जगत के तो हैं लेकिन उपन्यास में रचनात्मक कल्पनाएँ भी हैं । व्याकरण की भाषा में इसे मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया उपन्यास कहा जा सकता है । वैसे भी इतिहास की पढ़ाई इतिहास की किताबों से ही करनी चाहिए, उपन्यास, फिल्मों, कविता और कहानियों से नहीं; क्योंकि यहाँ रचनात्मक कल्पनाओं का स्थान हमेशा ही विद्दमान रहता है । वैसे इतिहास की किताबें भी पक्षधरता की मिलावट से परे है ऐसा दावा बहुत विश्वास के साथ तो नहीं ही किया जा सकता है ।
उपन्यास के पहले ही पन्ने पर लेखक लिखते हैं - “फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष कहे के नइखे । कहे के एतने भर बा कि एह उपन्यास के कथावस्तु कवनो इतिहास ना ह, एकर कवनो पात्र यथाचित्रित वास्तविक पात्र ना ह । एक में संदेह ना कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय आ रिवेल साहेब सांचो के हो चुकल बाड़े । बाकिर एह चरित्रन के कवनो प्रामाणिक ब्योरा सामने नइखे रहल, आ एह लोगन के किस्सा किवदंतीयन से भरल बा । अइसन कुछ किवदंतियन से सह पाके, एक उपन्यास के कथावस्तु कल्पना से खड़ा कइल गइल बा । बाकिर, एक उपन्यास में, एगो काल-विशेष के, क्षेत्र-विशेष के आ समाज विशेष के जवन तस्वीर उरेहल गइल बा, उ जरुर सही बा । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977” (“फुलसुंघी” के बारे में कुछ विशेष नहीं कहना है । कहना केवल इतना है कि इस उपन्यास का कथावस्तु इतिहास नहीं है, इसका कोई भी पात्र पुरी तरह से वास्तविक नहीं है । इसमें कोई सन्देश नहीं कि ढेला (बाई), महेंदर मिसिर, हलिवंत सहाय और रिवेल साहब वास्तविकता में भी हो चुके हैं । लेकिन इन चरित्रों का कोई प्रामाणिक ब्योरा सामने नहीं था, वैसे भी इन लोगों के किस्से किवदंतियों से भरा हुआ है । इन्हों किवदातियों के सहारे इस उपन्यास की कथा वस्तु टिकी है । बाकि एक उपन्यास में, एक काल विशेष के, क्षेत्र विशेष के और समाज विशेष के जो तस्वीरें अंकित हैं, वो ज़रूर सच हैं । – पाण्डेय कपिल 26 जनवरी 1977)
हमारे यहाँ इतिहास अंकित करने जैसे महत्वपूर्ण काम में शायद आलस्य का प्रकोप ज़्यादा है, इसीलिए बड़े से बड़े चरित्रों के बारे में अनुमान और किवदंतियां ज़्यादा हैं – सत्य कम । इसके पीछे मौखिक परम्परा का भी भरपूर योगदान है । हम बोल-बोलके महाकाव्य रच देते हैं लेकिन बात यदि अंकित-टंकित करने की आ जाए तो हाथों को लकवा मार जाता हैं । अब सुनने-सुनाने की परम्परा में समस्या यह है कि सुनानेवाला कथा में अपने हिसाब से जोड़-तोड़ करता है और सुननेवाला अपनी बुद्धि और विवेक से उसे ग्रहण करता है; कुछ याद रहता है, कुछ याद नहीं भी रहता । फिर जब सुननेवाला सुनी हुई कथा को अपने सुनाता है तो बीच-बीच में टूटे तारों को अपनी क्षमता, मान्यता और स्वार्थ से जोड़ता, तोड़ता, मरोड़ता है । इस प्रकार सत्य में कल्पना का समावेश होता है और इतिहास में गप्प का मिश्रण और फिर पैदा होतीं हैं सत्य की चाशनी से सनी किवदंतियां । वैसे भी किसी बड़े चरित्र के साथ चमत्कार न जुड़े तो हमें मज़ा ही नहीं आता । तभी तो विद्यापति के साथ उगाना (शिव) की कथा जुड़ता है । कुछ कुछ ऐसा ही इस उपन्यास के साथ भी है । हम खोजने निकलें तो इस उपन्यास के पात्रों की सच्ची कहानियां का अता-पता शायद ही कहीं मिले; और जो मिले उसमें कितना सत्य और कितना गप्प है, बता पाना शायद बहुत ही मुश्किल है । वो चाहें ढेलाबाई हों, महेंदर मिसिर हों, रेवल साहेब हो या कोई अन्य चरित्र ।
महेंदर मिसिर का जाली नोट छापने और गिरफ्तार होने की भी (दांत) कथा है लेकिन यहाँ देशभक्ति वाला एंगल नहीं है । यहाँ महेंदर मिसिर एक कलाकार मात्र हैं, महानता के बोझ से लदे पूर्वी गायकी और “मिसिर” सरमौर महेंदर मिसिर नहीं। यहां वो परिस्थियों से लड़ते कम, भागते हुए ज़्यादा पाए जाते हैं - कुछ-कुछ आवारा मसीहा की तरह । अब पाण्डेय कपिल की लेखनी में कितना हक़ीक़त और कितना फ़साना है यह तो कोई पारखी ही बता सकता हैं।
यह सत्य है कि ये लोग थे, लेकिन कैसे, क्यों कहाँ, कब, किस प्रकार आदि पर मामला आके फंस जाता है । बहरहाल, पात्रों को छोड़ भी दिया जाय तो भी इस उपन्यास के लेखक पाण्डेय कपिल के बारे भी साहित्य जगत लगभग अनभिग्य ही है, जबकि यह अभी हाल ही की बात है । तो सवाल यह बनता है कि क्या साहित्य में भी चर्चित होने के लिए किसी खेमे का खूंटा पकड़ना ज़रुरी है? अब इस सवाल का जवाब साहित्य के विद्वान ही दें तो बेहतर होगा ।
कुल 112 पन्ने का यह उपन्यास अपने अंदर एक लंबा कालखंड और कई पात्रों की जीवनयात्रा समेटे हुए बड़ी ही तीब्र गति से आगे बढ़ता है, कभी-कभी पीछे की ओर (फ्लैश बैक) भी आता है ताकि कई सारी स्थितिओं-परिस्थियों और घटनाक्रमों का अर्थ स्पष्ट हो जाएँ । यह पीछे आना एक रणनीति है, बिलकुल “दो कदम आगे और एक कदम पीछे” की तरह । अब यह स्पष्टता या रणनीति इतिहास जनित है या लेखकीय टिपण्णी; यह एक शोध का विषय है ।
“फुलसुंघी” गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी सामंती व्यवस्था का आडम्बर, उससे मोहभंग के साथ कोठा से लेकर लोकसंगीत पूर्वी आदि में लिपटी एक व्यावहारिक गाथा की तरह है; जहाँ एक जेब से दूसरी जेब तक की आज़ादी और स्वछंदता भरी यात्रा करनेवाली ढेलाबाई अन्तः कैद हो जाती या कर दी जातीं हैं । रवेल साहेब और हलिवंत सहाय का तमाम भौतिक सुख सुविधाओं से मोहभंग हो जाता है, महेंदर मिसिर आवारगी को अभिशप्त होते हैं और अन्य चरित्र कई अन्य नियति को प्राप्त होते हैं । इस बिलकुल पतले से उपन्यास की टहनियाँ और जड़ें किसी बरगद की तरह फैली हैं, जहाँ इसके हर चरित्र का क्रमिक विकास है; केसरबाई, मीनाबाई, राम नारायण मिसिर, बुलकान, मुंशी शिवधारीलाल, मनोरमा आदि जैसे उन चरित्रों का भी जो इस कथा के मुख्य चरित्र नहीं हैं । वहीं कुछ ऐसे एतिहासिक घटनाक्रमों का भी एक दूसरा ही नज़रिया सामने आता है जिसे लेकर आजतक तरह-तरह की कथा सुनी-सुनाई जातीं हैं । उन घटनाओं में महेंदर मिसिर का नोट छापने का धंधा करना, गुलजारीबाई बाई का ढेला बाई के रूप में परिवर्तित हो जाना, रिवेल साहब और हलिवंत सहाय भौतिकता से मोह भंग हो सन्यासी हो जाना आदि हैं । अब सारी घटनाओं/प्रसंगों का ज़िक्र कर पाना यहाँ संभव नहीं लेकिन एक प्रसंग का ज़िक्र करने का मोह त्याग पाना मुश्किल हैं । उपन्यास के शुरूआत के पन्ने पर पाण्डेय कपिल लिखते हैं – “सुनल जाला जे प्रयागराज के गणिका जानकीबाई के गवनई पर रीझके आपन सबकुछ निछावर क देवेवाला प्रेमी जब ओकर करिया-कलूट चेचक के दाग वाला चेहरा के देखलस त उ पगला गईल आ जानकीबाई के मार छुरी के गोद दिहलस । छुरी के छप्पन घाव खाइयो के जानकीबाई जीयत बांच गईली, आ नाम बदल गईल, हो गईल छप्पनछुरी । (सुनने में आता है कि प्रयागराज की गणिका जानकीबाई के गाने पर रीझकर अपना सबकुछ न्योछावर कर देनेवाला प्रेमी जब उनकी काली और चेचक से भरा चेहरा देखा तो पागल सा हो गया और उसने जानकीबाई को छोरी से गोद दिया । लेकिन जानकी बाई बच गईं और उनका नाम बदलकर छप्पनछुरी हो गया ।)”
ठीक इसी प्रकार गुलजारीबाई के ढेलाबाई के रूप में बदल जाने की कथा भी है – “उनका एगो महफिल में पगलाइल प्रेमियन के बीच चल गईल ढेला । अ इनकरी नाम बदल गइल । हो गइल ढेला यानी ढेलाबाई । (उनकी एक महफिल में पगलाए प्रेमियों के बीच ढेला चल गया और इनका नाम बदलकर हो गया ढेला अर्थात ढेलाबाई ।)”
बिहार के विख्यात/लोकप्रिय गायक और कवि महेंदर मिसिर और ढेलाबाई पर लिखित सामग्री बहुत ही कम है और जो कुछ भी लिखा गया है उसमें हकीकत और फ़साने को अलग-अलग कर पाना बहुत ही दुरूह कार्य है । यह काम साहित्य और साहित्यकारों का कम इतिहास, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का ज़्यादा है । जहाँ तक एक उपन्यास का सवाल है तो फुलसुंघी निश्चित ही भोजपुरी ज़मीन, भाषा, बोली, वाणी, संस्कारों, संस्कृति, उपमाओं, मान्यताओं, गीत आदि से लबरेज़ एक पढ़ने-पढ़ाने वाली रचना है ।
पटना के रंगकर्मी मित्र धर्मेश मेहता के सौजन्य से मैं पहली बार कोई भोजपुरी उपन्यास पढ़ रहा था । मुझे नहीं पता कि पाण्डेय कपिल कौन हैं और आज किस स्थिति में हैं, उनकी यह रचना “फुलसुंघी” आज बाज़ार में उपलब्ध भी है या नहीं; लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि भोजपुरी और भोजपुरी साहित्य से स्नेह रखनेवालों को यह उपन्यास ज़रूर ही पढ़ना-पढ़ाना चाहिए । यह अपने आपमें एक शानदार रचना हो, न हो लेकिन एक शानदार रचना का सुख और एहसास देनेवाला उपन्यास तो ज़रूर ही है ।

Monday, June 6, 2016

नाट्य - संस्कृति

दुनियां में रहो ग़मज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ करके चलो जाके बहुत याद रहो। - मीर तकी मीर

एक ऐसे देश में जहाँ कोस-कोस पर पानी और वाणी बदल जाती है, जहां भिन्न - भिन्न प्रकार के धर्म, समुदाय, वर्ग, जाति, प्रजाति सदियों से विद्दमान है, वहां कोई भी सत्य सर्वमान्य हो ही नहीं सकता। कला - संस्कृति के परिवेश में तो यह बात और भी प्रखरता से लागू होती है। जब समाज का सत्य एक नहीं तो कला का सत्य एक कैसे हो सकता है? फिर कला, संस्कृति और समाज एक दूसरे की संगिनी हो न हो किन्तु एक दूसरे के पूरक तो अवश्य ही हैं। एक दूसरे से प्राण वायु ग्रहण करके ही यह न केवल अंकुरित होती हैं बल्कि पलती, फलती, फूलती और बढ़ती भी है। इसलिए कला का सत्य पहले स्थानीय होगा, तत्पश्चात वैश्विक। वैसे भी कोई भी कला स्थानीय हुए बिना वैश्विक हो ही नहीं सकती।
जहाँ तक सवाल नाट्य संस्कृति का हैं तो उसका जड़ तो समाज के अंदर ही होता है। नाट्य संस्कृति समाज से खाद, पानी और ऊर्जा लेकर ही अमूमन कलात्मक रूप धारण करके दर्शक समाज के सामने प्रस्तुत होती है। समाज में घटित घटनाएँ, विचार, संस्कार आदि न केवल इसके विषय वस्तु बनते हैं बल्कि कहीं परोक्ष तो कहीं प्रत्यक्ष रूप से नाट्यकला और उसकी विषय वस्तु को प्रभावित भी करते हैं। अतिशयोक्ति न होगी कि नाटक यथार्थ जगत की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्वरूपों, घटनाक्रमों और संवेदनाओं में यथार्थ और कल्पना की उचित मात्रा का सहारा लेकर चयनित एक कलात्मक अभिव्यक्ति है, जो केवल यथार्थ जगत तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि तमाम सामाजिक बंधनों को तोड़कर कलात्मक सौंदर्य के खुले आकाश में भी विचरण करता है। कला की दुनियां में ना कुछ वर्जित है और ना ही पूजनीय। न कोई राजा है न रंक। ना कोई स्त्री है न पुरुष। यहाँ कल्पना और यथार्थ दोनों ही का स्थान समान है। यह कल्पना से ज़्यादा काल्पनिक और यथार्थ से ज़्यादा यथार्थवादी सामाजिक वर्जनाओं के अतिक्रमण का एक ऐसा स्थान है जो न केवल यह बताता है कि क्या सही और क्या गलत है बल्कि यह भी जतलाने की हिमाकत करता है कि बहुतेरे सत्य सही – गलत के परे और प्राकृतिक व संवेदनात्मक भी है। प्रसिद्द नाट्य चिन्तक बर्तोल्त ब्रेख्त कहते हैं – “हमारे रंगमंच के लिए निहायत ज़रुरी है कि वह समझ से पैदा होनेवाले रोमांच को प्रोत्साहित करे और लोगों को यथार्थ में परिवर्तन करने से प्राप्त होनेवाले आनंद का प्रशिक्षण दे। हमारे प्रेक्षक सिर्फ यह नहीं सुनते रहें कि प्रोमेथियस को कैसे मुक्त किया गया, बल्कि वे स्वयं को भी मुक्त करने के आनंद का प्रशिक्षण दें। हमारे रंगमंच से उन्हें आविष्कारक तथा खोजकर्ता को अनुभव होनेवाले तमाम संतोष और सुख के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए; मुक्तिदाता द्वारा अनुभव की जानेवाली तमाम विजयों के अनुभव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।”
कला का एक पांव धरातल पर होता है वहीं दूसरा कल्पना के असीम संभावनाओं में। इसीलिए तो कहा जाता है कि कलाकार बनने के लिए अनुभव को पकड़ना, उसे पर अधिकार करना, उसे स्मृति में रूपांतरित करना, और स्मृति को अभिव्यक्ति में, वस्तु को रूप में रूपांतरित करना आवश्यक है। एक कलाकार के लिए भावना और यथार्थ जगत ही सबकुछ नहीं है, उसके लिए निहायत ही ज़रूरी है कि वह अपने काम को जाने और उसमें आनंद ले; उन सारे नियमों को समझे, उन तमाम कौशलों, रूपों और परिपाटियों को समझे, जिसमें प्रकृति रूपी चंडिका को वश में किया जा सके और कला के अनुशासन के अंतर्गत लाया जा सके। वह आवेग जो कलाप्रेमी को ग्रस लेता है, सच्चे कलाकार की सेवा करता है। कलाकार उस आवेग रूपी वन्य पशु के हाथों क्षत - विक्षत नहीं होता, बल्कि उसे वश में करके पालतू बनाता है।
भारतीय सन्दर्भ में यदि नाट्यकला की बात करें तो ऐसे तो नाटकीय तत्वों की शुरुआत तो पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति के के साथ ही शुरू हो गया होगा किन्तु यदि हम नाटक के आज के स्वरूप की बात करें तो जिस पुस्तक की सबसे अधिक प्रतिष्ठा आज भी है उसे हम नाट्यशास्त्र के नाम से जानते हैं। विश्वासों और मान्यताओं को यदि छोड़ दिया जाय तो एतिहासिक रूप से नाट्यशास्त्र की रचना कब हुई इसके बारे में कोई प्रामाणिक और वैज्ञानिक जानकारी नहीं है, बल्कि अलग-अलग विद्वानों का मत अलग-अलग है। माना यह जाता है कि ईसा से 200 वर्ष पूर्व से 200 वर्ष पश्चात् तक इसकी रचना प्रक्रिया चली। मतभेद इस बात पर भी है कि इसे किसी एक व्यक्ति ने लिखा या अलग-अलग काल खण्डों में अन्य लोग इसमें अध्याय जोड़ते गए। हालांकि ऐसा दावा भी है कि भरतमुनि ईसा पूर्व 322 से लेकर 500 के बीच पैदा हुए, उनका जन्म भाद्र पूर्णिमा में काशी में ईसा पूर्व 463 में हुआ, काशी में ही उन्होंने नाट्यशास्त्र की रचना की, लेकिन इन सब मान्यताओं में विश्वास ज़्यादा है प्रमाणिकता कम।
नाट्यशास्त्र का अध्ययन करते व इसके रचना के कालखंड और बृहदता को मद्देनज़र रखते हुए ऐसा सहज ही विश्वास करना उचित प्रतीत नहीं होता कि इसकी रचना किसी एक व्यक्ति ने की होगी। विद्वानों का ऐसा मत भी है कि भरत किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पद का नाम है। किन्तु यदि हम यह मानकर चलते हैं कि नाट्यशास्त्र की रचना ब्रह्मा (देवता) ने की है तो फिर तर्क की गुंजाईश ही कहाँ है? क्योंकि धर्म के मामले में तर्क नहीं बल्कि विश्वास का साम्राज्य चलता है।
कला का उत्कृष्ट रूप है काव्य और उत्कृष्टतम रूप है नाटक। नाट्यशास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें काव्य, संगीत, नृत्य, शिल्प तथा तमाम ललित कलाओं का कोष है। इस अकेले ग्रंथ में नाट्य विषयक विवरण जितनी समग्रता के साथ प्रस्तुत हुआ है वह किसी भी अन्य भारतीय ग्रंथ में तो दुर्लभ है ही, संसार के किसी अन्य ग्रंथ में भी प्राप्त नहीं। प्राचीन काल में इसे नाट्यवेद नाम से भी जाना जाता था। वैसे नाट्यशास्त्र का अध्ययन करने पर यह बात भी साफ़-साफ़ पता चल जाता है कि यह नाटककला के माध्यम से पूजापाठ का शास्त्र भी है। कब, कहाँ, किस देवी-देवता की पूजा होनी चाहिए इसकी भी बृहद चर्चा इस शास्त्र में है। नाट्यशास्त्र की रचना का कारण भी नाट्यकला के माध्यम से धर्मविमुख हुए लोगों को धार्मिक शिक्षा देना ही था। इसीलिए इसे पंचमवेद भी कहा जाता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि यह नाट्यकला का धार्मिक और राजनीतिक इस्तेमाल का भी शास्त्र है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि चूंकि नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति चारों वेदों से हुई है इसलिए इसे उपवेद कहा जा सकता है, वेद नहीं। अब चार वेदों के होते हुए उसके अंशों को निकालकर नाट्यशास्त्र नामक पांचवें वेद की रचना की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, यह बात आसानी से नाट्योत्पत्ति नामक अध्याय से समझा जा सकता है।
नाट्योत्पत्ति नामक इस अध्याय में भरतमुनि से आत्रेय आदि ऋषियों द्वारा नाट्यवेद के विषय में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न किये गए कि नाट्यवेद कि उत्पत्ति कैसे हुई? किसके लिए हुई? इसके कौन – कौन से अंग हैं? इसकी प्राप्ति के उपाय तथा इसका प्रयोग कैसे हो? जवाब में भरतमुनि ने बताया – “नाट्यवेद की उत्पत्ति ब्रह्मा ने किया। सतयुग बीत चुका था, वैवस्वत मनु का त्रेता युग प्रारंभ हो चुका था। प्रजाजन काम, लोभ, इर्ष्या, क्रोध से अभिभूत हो चुकी थी। तब महेन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि हम ऐसा मनोविनोद का साधन चाहतें हैं जो देखने और सुनने के योग्य हो। आप सभी वर्गों  के लिए उपयोगी एक पांचवे वेद की और रचना कीजिये। तब चारों वेद का स्मरण कर ब्रह्मा ने पंचमवेद अर्थात नाट्यशास्त्र की रचना की। जो धर्म, अर्थ, यशप्रदाता, उपदेश, सभी कार्यों का पथ प्रदर्शक, सभी शास्त्रों के अर्थ से परिपूर्ण तथा सभी शिल्पों को प्रदर्शित करने वाला था। इसमें ऋग्वेद से पाठ्यांश, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस को लेकर प्रणयन किया।” ब्रह्मा के कथनानुसार नाट्य में दानवों और देवताओं दोनों के अच्छे बुरे कर्मों ही नहीं बल्कि तीनों लोकों के चरित्रों का समवेश होगा और इसमें कहीं धर्म, कहीं क्रीड़ा, कहीं राजनीति, कहीं अर्थनीति, कहीं श्रम, कहीं हास्य, कहीं युद्ध, कहीं काम तो कहीं वध को दिखाया जायेगा। नाट्य में सारी विद्याओं, कलाओं, योग सहित सांसारिक सुख-दुःख का समावेश होगा।
तो क्या यह धार्मिक संस्कृति के फैलाव का भी शास्त्र नहीं है? परम्पराशील नाट्य नामक पुस्तक में जगदीशचंद्र माथुर लिखते हैं “भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र को पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठा करते हुए तीन बातों पर ज़ोर दिया। एक तो यह कि चूंकि शुद्र तथा वन्य जातियों के लोग वेद-पाठ से वंचित थे, इसलिए ऐसे वेद की आवश्यकता पड़ी, जो सभी वर्गों की जनता के लिए उपादेय हो। दूसरी बात यह कि नाट्य में ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस का संग्रह किया। भरत की तीसरी स्थापना यह थी कि नाट्य सभी प्रकार की कलाओं, शिल्प तथा ज्ञान से संपन्न होने के कारण पंचम वेद कहलाने योग्य है।” अब इसे पंचमवेद कहें या उपवेद लेकिन नाट्यशास्त्र को आज तक वह स्थान प्राप्त नहीं है जो अन्य चारों वेदों को है।
नाट्यशास्त्र के अध्ययन से एक बात साफ़ हो जाती है कि इसका प्रयोग स्वंय देवताओं ने नहीं किया बल्कि इसे भरतमुनि और अप्सराओं से करवाया। नाट्यशास्त्र की रचना करने के पश्चात ब्रह्मा में इंद्र से देवताओं द्वारा इसका प्रयोग करने को कहा। इंद्र ने आग्रह किया कि “देवताओं में अभिनय करने का समर्थ नहीं है। इसलिए आप वेदों को जानने वाले और उत्तम चरित्र के ऋषियों से नाट्यशास्त्र का प्रयोग करवाईए।” तब ब्रह्मा ने भरत को बुलाकर यह काम सौंपा। भरत अपने सौ पुत्रों (शिष्यों) के साथ नाट्यशास्त्र के प्रयोग में लग गए। नाट्य में सौंदर्य और श्रृंगार को जोड़ने हेतू ब्रह्मा ने चौबीस अप्सराओं का नाट्य में समवेश कराया। इस प्रकार देवासुर-संग्राम नामक नाट्य तैयार हुआ। इस नाटक में देवताओं की विजयी गाथा व असुरों को खलनायक के रूप में चित्रण किया गया था।
महाजन जिधर जाएँ, सही रास्ता वही है नामक वाक्य को माननेवाला समाज में सामाजिक स्तर पर बिलकुल यही स्थिति आज भी विद्दमान है। यहाँ आज भी नाटक करनेवाले कम हैं और उन्हें नचनियां – बजानियाँ नामक शब्दों के मार्फ़त उपहास का पात्र भी बनाया जाता है। ऐसे परिवारों की संख्या अपवाद स्वरुप ही है जो अपने घर के लड़के – लड़कियों को खुशी से नाटक करने की छूट देते हैं। समाज में आज भी भरतपुत्रों की स्थिति किसी अछूत जैसी ही है, जिसे कुछ आरक्षण और दया तो मिलती है लेकिन अमूमन उचित सम्मान और स्थान नहीं। वैसे आधुनिक नाटक न जाने कब का नाट्यशास्त्र की अवधारणाओं और उद्देश्यों से आगे निकल चुका है। अब वह केवल धार्मिक प्रचार प्रसार का माध्यम न होकर आम आवाम के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मानसिक आदि सवालों से ही दो-चार नहीं हो रही है बल्कि उसका बौधिक परिवेश भी तैयार करने की फिराक में रहता है। इसके नायक - खलनायक अब देवता और दानव नहीं हैं बल्कि हार ओर मानव ने कब्ज़ा कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज का नाटक किसी भी अमानवीय सत्ता और विचार को चुनौती देने का कलात्मक मिशन पर लग गया हो। हालांकि इसकी शुरुआत की झलक नाट्यशास्त्र का पृथ्वी पर अवतरण नामक कथा में ही दिखाई पड़ जाती है जब एक हास्य भरा प्रहसन देखकर एक ऋषि क्रोधित हो जाते हैं और उन्होंने भरतपुत्रों को शाप देते हुए कहते हैं - “भरतपुत्रों। तुम्हारा यह हास्य से भरा हुआ प्रहसन, भद्दा, क्रूर और अमंगलकारी है। तुम लोग नाट्यवेद के ज्ञान के कारण इतने अहंकारी हो गए हो कि अब तुम ऋषियों का भी अपमान कर रहे हो इसलिए भरतपुत्रों कालान्तर में तुम्हारा वेद ज्ञान नष्ट हो जाएगा। ऋषियों और ब्राह्मणों की सभा में तुम्हारा सम्मान नहीं होगा। जो तुम्हारे वंश में जन्म लेगा वह भी अपवित्र - आचरणहीन माना जाएगा। तुम्हारी संतान नर्तक-नाचनेवाली कहलाएगी जो दर्शकों पर आश्रित होकर, अपना जीवन यापन करेगी।” भरतपुत्रों ने शयद इस नाटक में ऋषियों को हास्य और व्यंग्य का पात्र बनाया था। बहरहाल, इस शाप को सुनकर भारतपुत्र ने आत्महत्या करने का विचार किया तो भरत ने अपने पुत्र को प्रयत्नपूर्वक अपने शिष्यों और अप्सराओं को नाट्यवेद की शिक्षा देने और नाट्य के विकास कार्यरत होकर ही इस शाप से मुक्ति की बात समझाई। ऐसा प्रतीत होता है जैसे भरतपुत्र आज भी अपने इस निहायत ही ज़रुरी पर लगे हों और आज के समाज के प्रतिष्ठित ऋषि और ब्राहमण आज भी शाप पर शाप दिए जा रहे हैं।
नाटक को अंग्रेज़ी में प्ले कहते हैं जिसका हिंदी में अर्थ होता है खेल। खेल अर्थात एक ऐसी चीज़ जिसमें ना केवल शारीरिक एकाग्रता की ज़रूरत होती है बल्कि दिल, दिमाग और मन की एकाग्रता भी अति आवश्यक पहलू है। वैसे भी कोई भी खेल केवल शारीरिक ताकत और उर्जा के सहारे कुशलतापूर्वक नहीं खेला जाता है। लेकिन समाज में प्रचलित कथनों से खेल के प्रति समाज के नज़रिए का पता चलता है। यहाँ आज भी बात – बात में नाटक मत करो, बहुत नौटंकी किया जैसे वाक्य बोले जाते हैं वहीं “पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब! खेलोगे, कूदोगे होगे खराब!!” जैसे वाक्य भी लोकप्रिय हैं। यहाँ पढ़ाई, लिखाई से विद्वता का कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि अमूमन लोग उतनी ही पढ़ाई करने की सलाह देते हैं जितने से कि अच्छी नौकरी प्राप्त की जा सके। अच्छी नौकरी – पेशा का अर्थ नवाबी से जोड़ना सामंती मानसिकता का परिचायक हो न हो लेकिन “ज़्यादा पढ़ने से दिमाग खराब हो जाता है” जैसी मान्यता तो है ही। क्योंकि विद्या ज्ञान का मार्ग दिखता है और ज्ञान सत्य का। एक बार जिसे सत्य का आभास हो गया फिर उसके लिए तो यह जगत मिथ्या ही है। बहरहाल, प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पढ़ाई - लिखाई करने का अर्थ सरस्वती के माध्यम से लक्ष्मी पर अधिकार प्राप्त करना है। ऐसा ज्ञान जिससे धन की प्राप्ति न हो पागलपन की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे समय और समाज में कला और कलाकार जैसी पागलपन भरी राह की प्रतिष्ठा कितनी होगी, यह बात अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी जब भौतिकता सुख – सुविधाएँ ही जीवन हो जाए तब मानसिकता भौतिकता का गुलाम बनकर रह जाती है और भौतिकता को ही सफल जीवन का पर्याय मान लिया जाता है। यहाँ आध्यात्मिक (धार्मिक नहीं) और मानसिक विकास फालतू और भोग - विलास की वस्तु मान लिया जाता है।
ऐसे समय में कलाकार बनने और वह भी नाटक का कलाकार बनने का निर्णय, और वह भी ईमानदार और सच्चा कलाकार बनने का निर्णय लेना दहकते अंगारों से खेलने के समान है। लेकिन हर काल में कुछ विरले होते हैं जिन्हें अंगारों से ही खेलने में मज़ा आता है। वैसे भी आधुनिक नाट्य – संस्कृति तमाम दुनियावी मान्यताओं का अतिक्रमण करता है, वह न जाति मानता है, न धर्म और ना ही किसी अन्य प्रकार का भेद भाव। यहाँ सब केवल और केवल कलाकार हैं और कला की उत्पत्ति ही इनका धर्म है। ऐसी संस्कृति का समर्थन करने की हिमाकत कोई भी वर्ग – वर्ण में विभाजित, ईश्वरवादी, सामंती और गुलाम मानसिकता से ग्रसित समाज कर ही नहीं सकता बल्कि उल्टे मौके – बे-मौके उसका नुकसान पहुँचाने और मजाक बनाने से कतई परहेज़ नहीं करेगा। आए दिन कलाकारों पर हमले होना और उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा का शिकार बनाना, कलाकारों को समाज से अलग मानना, कला और कलाकारों की कोई परवाह या चिंता न करना, समाज के इसी सामंती और यथास्थितिवादी नज़रिए को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम अनुभूतियों, ज्ञान और विवेक को विकृत करनेवाले अति-असंवेदनशील और क्रूर युग में जी रहे हैं अथवा जीने को अभिशप्त हैं। यहाँ किसी नेता की छींक राष्ट्रीय समाचार बन जाती है और किसी कलाकार और किसान की मौत केवल एक दुर्घटना मात्र मान लिया जाता है। कोई सुपरस्टार किसी गुनाह में जेल जाने के मुहाने पर पहुंचाता है तो पूरा देश उसके लिए दुआ मांगने लगता है लेकिन वहीं किसी अच्छे – सच्चे कलाकार का खाली पेट किसी की चिंता का कारण नहीं बनता। ऐसे समय में यदि यह सच है कि कला और संस्कृति समाज का आइना होता है तो उतना ही सच यह भी प्रतीत होता है कि इस आईने पर सदियों पहले ही कालिख पुत गई है। बिना इसकी गहन सफाई के इस आईने में कोई भी अश्क नहीं देखा जा सकता। लेकिन बाज़ार का अंधा खरीदार बना आदमी अश्क – वश्क की नहीं बल्कि माल, जेब और भौतिक सुख – सुविधाओं की चिंता करता है। वैसे भी आज तो पुरी दुनियां हीं बाज़ार बनने को बैचैन है और राजनीति व राजनीतिक पार्टियां इस बाज़ार में ग्राहक पटाने और अपने कारपोरेटिया मालिकों को ज़्यादा से ज़्यादा सुविधा में व्यापार करने देने और सत्ता सुख का आनंद प्राप्त करने की अंधी गली के रूप में परिवर्तित हो गईं हैं। इन्हें न प्रजा की चिंता है, न तंत्र की। कला और संस्कृति तो इनके लिए आज भी एक अबूझ पहेली ही है। धूमिल ने कुछ यूं कहा था  – न प्रजा है, न तंत्र है। आदमी के खिलाफ़, आदमी का षडयंत्र है। इस षड्यंत्र से बाहर निकलने में मदद करने का कार्य करता है कला। क्योंकि, कला और संस्कृति ही मानव जीवन के मूलाधार हैं। कला इसलिए ज़रुरी है कि आदमी दुनियां को समझ सके और इसे और ज़्यादा सुन्दर, कोमल, तार्किक और संवेदनशील बना सके। बिना इन सबके कोई भी दुनियां मानवीय हो ही नहीं सकती होगी।
वर्तमान समय में भारतीय समाज का मूल चरित्र अर्ध – सामंती और अर्ध – ओपनिवेशिक है, जिसमें यदा कदा प्रजा, प्रजातंत्र, जनवाद, समाजवाद, साम्यवाद, प्रगतिशीलता, बौधिकता, मूर्खता आदि - इत्यादि की खिचड़ी पकती रहती है। ऐसे समाज में कला या तो बे-सिर पैर के मनोरंजन के रूप में लोकप्रिय होती या की जाती है अथवा एक संदिग्ध, कुत्सित और तुच्य चीज़ मान ली जाती है। वैसे भी पूंजीवाद मुक्त बाज़ार का पोषक होता है जिसमें उद्देश्यपूर्ण कला का स्थान “गैरज़रूरी और बिना किसी लाभ वाली” चीज़ के रूप होती है। वही सामंती मानसिकता चीज़ों का उपभोग तो करती है लेकिन केवल उनका जो बिना श्रम और दिमाग लगाए हासिल किया जाय।
कला और कलाकार का एतिहासिक अध्ययन करने से एक बात जो साफ़ – साफ़ समाज में आती है वो यह कि इसे सदा ही प्रश्रय की ज़रूरत पड़ती रही है। भारतीय सन्दर्भ में कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी कि कोई कला अपनी बदौलत अपने कलाकारों का भरण – पोषण करता हो। कला कभी उत्पाद बन ही नहीं सका और जो बना उसमें कला का अंश कम से कम और बिना सिर – पैर का “खतरनाक” मनोरंजन ज़्यादा हावी रहा। कभी यह प्रश्रय जनता ने दिया, कभी राजाओं ने, कभी धार्मिक संस्थानों ने तो कभी सरकारों ने। लेकिन इन प्रश्रयों ने कला और कलाकार के लिए कोई आदर्श माहौल बनाया हो, ऐसा नहीं है। प्रजतंत्र के आगमन के साथ तो स्थिति यह है कि प्रजातंत्र के सबसे बड़े प्रहरी के रूप माने जानेवाले विभिन्न दल और उसके नेतागणों की प्राथमिकता में ना कभी कला रही और ना ही संस्कृति। इसका कारक भी समाज ही है। यह पार्टियां और उसके नेता भी इसी समाज के अंग हैं और जब समाज ही अपने कला – संस्कृति के प्रति गंभीर नहीं है तो कोई पार्टी और नेता क्यों हों? कालांतर में कला और संस्कृति के नाम पर जो कुछ हुआ उसका सगूफा ना जाने कब का फूट चुका है और वर्तमान में कला और कलाकार को प्रश्रय देने के नाम पर जो सरकारी योजनाएं और अनुदान चलाए या दिए जा रहे हैं वह प्रक्रिया ही इतना अनैतिक और पंगु बनाने के विष से परिपूर्ण हैं कि उससे किसी कला और कलाकार को आज़ादीपूर्वक साँस लेने जीने की मिलेगी, इसमें संदेह है। बल्कि यहाँ तो ऐसा बंदरबांट मचा है कि जिसकी जितनी पहुँच, उसका पलड़ा उतना भरी। चारों तरफ़ खानापूर्ति का मौहौल है। हो सबकुछ रहा है लेकिन निरुद्देश्य और लगभग बकवास।
इन सब बातों के बावजूद कला और संस्कृति के क्षेत्र में जूनून और जुनूनी लोगों की भी कोई कमी नहीं, जो तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए कार्यरत और संघर्षरत हैं। क्योंकि दुनियां चाहे जैसी भी हो वह केवल बाज़ार और खरीदारों की तो कभी नहीं रही। कुछ लोग हमेशा रहे ही जो इस सारे आडम्बर पर ठहाका लगाते रहे। कला ज़रुरी है, इसलिए कि आदमी दुनियां को समझ सके और उसे बदल सके। कला के अंदर दुनियां बदलने की ताकत हो - न हो, लेकिन इसके बिना किसी भी मानव समाज का काम न आजतक चला है न चलेगा। ज्याँ कॉक्टो के शब्दों को उधार लेकर कहा जा सकता है कि नाटक के बिना किसी भी मानवीय समाज काम नहीं चल सकता, लेकिन मैं यह नहीं बता सकता कि उसका काम क्या है।
मनुष्य प्राकृतिक और प्रवृतिगत रूप से उस व्यक्ति से बढ़कर कुछ और भी है, जो वह बना दिया गया है। कला व्यक्ति के मैं को समष्टिगत अस्तित्व से जोड़ता है और उसकी वैक्तिकता को सामाजिकता से। एक ऐसे समय में जब तमाम ताकतें व्यक्ति को अकेला, स्वर्थी और आत्मकेंद्रित बनाने की साजिश में लगीं हैं वैसे समय में किसी भी सार्थक सामूहिक कला की ज़रूरत और ज़्यादा बढ़ जाती है। किन्तु यह क्रिया तबतक अपने आगाज से अंजाम तक नहीं पहुँच सकता जबतक सामाजिक स्तर पर इसकी ज़रूरत न महसूस किया जाय। हाथ पर हाथ धरे ऐसे समय का इन्तजार करने से बेहतर है उसकी दिशा में अपने कदम बढ़ाए जाएँ। एक सुदृढ़ और निश्चय भरा – सार्थक कदम। वैसे भी बिना कला, संस्कृति और ज्ञान के मनुष्य और मनुष्यता एक कदम आगे और दस कदम पीछे चलता है। एक ऐसे समय में जब किसी लेखक को अपनी मृत्यु की घोषणा करना पड़ता है और वो अपने पाठकों और प्रकाशकों से अपनी किताबें जला देने को कहने पर मजबूर किया जाता है, किसी व्यक्ति की निर्मम हत्या केवल इसलिए कर दी जाती है कि उसका धर्म और खान-पान अलग है, सत्ता का सर्वोच्य संस्थान अहम् की भेंट चढ़ जा रहा है और बाकि सलाम बजा लाने को अभिशप्त है, रचना और रचनाकार, कला और कलाकार या तो हासिए पर धकेले जा रहे हैं या फिर मानसिक गुलाम की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाने को अभिशप्त हैं, हवा और सुनामी चलाकर सरकारें बनाई और गिराई जाने लगी हैं; ऐसे समय में सार्थक और सृजनात्मक कला और कलाकार का महत्व और भी बढ़ जाता है। अरस्तु ने ठीक ही कहा था - नाटक का काम भावनाओं को परिशुद्ध करना है, आतंक और दया पर विजय प्राप्त करना है, ताकि ओरेस्टिज अथवा ईडिपस से तादात्म्य करनेवाला प्रेक्षक उस तादात्म्य से मुक्त हो सके और भाग्य की अंधी कारगुज़ारियों से ऊपर उठ सके।

आलेख मुन्ना कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक "संस्कृति : विविध परिवेश" में संलग्न

Tuesday, May 10, 2016

हर आत्महत्या एक विद्रोह है : अपने और अपनों के विरुद्ध

पंजाबी साहित्य के जाने माने नाम और सामाजिक कार्यकर्त्ता सतनाम ने आत्महत्या (?) कर ली। सतनाम जो माओवादी आंदोलन को ठीक से जानने समझने के लिए बस्तर के जंगलों में जाते हैं। वहां उनके बीच रहकर जो अनुभव प्राप्त करते हैं उसे वो अपनी प्रसिद्द किताब जंगलनामा में दर्ज़ करते हैं। आज जंगलनामा - बस्तर के जंगलों मेंअपने तरह की अनूठी रचना है। जंगलनामा - बस्तर के जंगलों मेंमूलतः पंजाबी में लिखी गई थी। जिसका अब तक छः भाषाओं में अनुवाद हो चुका है जिसमें अंग्रेज़ी भी शामिल है। अंग्रेज़ी में इसका अनुवाद पेंगुइन (शायद) ने किया है। इसी सतनाम ने आत्महत्या कर ली कहीं कोई खबर - नहीं वाह !!! 
एक ऐसे समय में जब एक लेखक को अपनी रचनात्मकता के मृत्यु की घोषणापत्र लिखने को विवश होना पड़ रहा है और किसी व्यक्ति की हत्या केवल इस वजह से कर दिया जाता है कि उसका धर्म और खाना (?) हमसे अलग है, ऐसे वक्त में कोई आश्चर्य नहीं कि सतनाम जैसे लोगों की मौत किसी के लिए कोई अर्थ भी नहीं रखता हो ! वैसे शायद ऐसी आत्महत्याओं (?) का कभी भी कोई महत्व नहीं रहा, वक्त चाहे जैसा भी रहा हो ।
बहरहाल, अलग अलग वजहों से माओवादी आंदोलन पर बहुत से लोगों ने कई किताबें लिखी हैं। कुछ चर्चित हुए, कुछ शायद न भी हुए। सतनाम की किताब जंगलनामा - बस्तर के जंगलों मेंका हिंदी अनुवाद पलटने पर न सतनाम का न कोई परिचय आदि मिलता है, ना तस्वीर और ना ही उनकी महानता का परिचय करता हुआ कोई भूमिका ही। यह पुस्तक उन सच्चाइयों से परिचय करने का एक प्रयास भर कराती है, जिनसे हम या तो अब तक महरूम हैं या फिर गलत जानकारी के शिकार। इस पुस्तक के बारे में हरिपाल त्यागी लिखते हैं – “अपनी अनूठी विषय वस्तु और सहज-सरल लेखन शैली की वजह से तो यह पुस्तक खास अहमियत रखती ही है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत आम आदमी की संघर्षपूर्ण ज़िंदगी के प्रति लेखक का लोकहितकारी नज़रिया, इन्साफ और हक की लड़ाई में उसकी जनपक्षधरता, घटनाओं की तह तक पहुंचकर वास्तविक सच्चाइयों को खोजने की गहरी और प्रबल जिज्ञासा व इसके लिए लेखकीय इमानदारी को प्रमुखता देते हुए अभिव्यक्ति का खतरा उठाना। यह महज एक जगह से दूसरी जगह का सफ़र तैय करने और उसका रोचक ढंग से वर्णन कर देना ही नहीं है, बल्कि इससे भी ज़्यादा आदमी से आदमी तक की यात्रा है। एक दिल से दूसरे दिल के जुड़ने को बयान करनेवाली यह बड़े मकसद का सफरनामा है। 
पुस्तक में तआरुफ़ के नाम पर सतनाम लिखते देते हैं कि – “जंगलनामा, जंगलों के बारे में कोई खोज पुस्तक नहीं है। न ही किसी कल्पना में से पैदा हुई, आधी हकीकत और आधा अफ़साना बयान करने वाली कोई साहित्यिक कृति है। यह बस्तर के जंगलों में क्रियाशील कम्युनिस्ट गुरिल्लों की रोज़ाना ज़िंदगी की एक तस्वीर और वहां के कबायली लोगों की जीवन-हालातों का विवरण है, जिसको मैंने अपनी जंगल यात्रा के दौरान देखा। पाठक इसे किसी डायरी के पन्ने कह सकते हैं। 
इसके पात्र हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान हैं जो अपने सपनों को हकीकत में ढालना चाहते हैं। हुकूमत की तरह से बागी और पाबंदीशुदा करार दी गए ये पात्र नए युग, नई ज़िंदगी को साकार होता देखना चाहते हैं। इतिहास उनके लिए क्या समेटे हुए है, ये तो बननेवाला इतिहास ही बताएगा, लेकिन इतिहास को वो किस तरह मोड़ देना चाहते हैं; उसकी व्याख्या उन्हीं की जुबानी में पेश की गई है। अपने अकीदों के लिए जान की बाज़ी लगाने को तैयार ये लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं, इसका अंदाज़ा पाठक इस किताब को पढ़कर आसानी से लगा सकते हैं। 
अक्टूबर 2003, सतनाम। 
सतनाम यानि गुरमीत - जिनका जंगल में प्रवेश करते ही पांव मोच खा जाता है। 
हमारी आँखे मिलीं, मुस्कुराकर एक दूसरे को स्वभाविक सलाम किया और फिर उससे हाथ मिलाने के लिए उठाने लगा, मगर मेरे पैर ने मेरा साथ नहीं दिया और एक टीस ने मुझे वहीं दबोच लिया।” “क्या हुआ?” “पैर मोच खा गया ! हो गई मुसीबत।मेरे मुंह से निकला। - (जंगलनामा - बस्तर के जंगलों में) जंगलनामा - बस्तर के जंगलों मेंका दूसरा भाग उनके दिमाग में था लेकिन जबतक लिखते तबतक लिखने की प्रेरणा ही खत्म हो चुकी थी। माओवादी आन्दोलनों के नाम पर जो कुछ भी चल रहा है/था उसने ही सबसे बड़ी भूमिका निभाई उनके मोहभंग में। वैसे भी जहाँ सवाल करने पर दरकिनार कर दिया जाय और तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नाम पर मूढ़ता की हरी-हरी फसल लहलहाने रही हो, वहां और उम्मीद ही क्या किया जा सकता है. सतनाम जैसे लोग मूढ़ बनने को कतई तैयार नहीं थे और ना ही विचारधारा के नाम पर किसी जंगली पशु के हाथों चरे और लीदे जाने को ही तैयार थे। 
आजादी से मोहभंग के साथ ही, हर प्रकार के शोषण के मुक्त, नई दुनियां बनाने और गढ़ने का सपना दिल में पाले नौजवानों का एक पूरा का पूरा हुजूम 70 और 80 के दशक में भारतीय पटल पर सक्रिय हुआ। किसी की परिणति सुधारवादी अराजकता के साथ समाप्त हो जाती है तो कोई नक्सलबाड़ी आंदोलन को आदर्श मानते हुए दीर्घकालीन लोक युद्ध के रास्ते पर निकल पड़ता है जिसकी आंच 80 के दशक के अंत आते-आते ही अराजक और बोझिल होने लगती है। 90 के दशक तक आते-आते तो यह अराजकता और बोझिलता एक खतरनाक रूप धारण कर लेती है। फिर तो बिना दिमाग लगाए जो धंधे, वसूली और वाद का चोला धारण किए थे - उनकी तो बल्ले-बल्ले हो जाती है लेकिन जो अपने सपने के साथ अभी भी ईमानदारी और संवेदनात्मक रूप से जुड़े होते थे/हैं, वो एक अवसादग्रस्त की श्रेणी में खड़े होने को अभिशप्त हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं। 
कोई भी जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलन जब अराजकता और वैचारिक दिवालिएपन का शिकार होता है तो संवेदनशील कार्यकर्ताओं और वाद के सच्चे और ईमानदार सिपाहियों का सहारा या तो परिवार बनता है या फिर दोस्तों का जिंदादिल समूह। समाज की संवेदना और संवेदनशीलता पर कुछ भी कहना वक्त ज़ाया करना है। बात को सकारात्मक बनाते हुए बस इतना कहा जा सकता है कि परिवार और दोस्तों का समूह भी इसी समाज का अंग होता हैं। 
उम्र के लगभग आखिरी पड़ाव पर पहुंचे ये लोग पार्टी के लिए अनवांटेड हुए तो मजबूरन वहां से परिवार की तरफ़ लौटे या लौट रहे हैं। और जहाँ तक सवाल मित्र मंडलियों का है तो अमूमन सब ही तो अवसाद के दौर से गुज़र रहे हैं, तो कौन किसका और कब तक और कितना ख़याल रखे! समाज को समाज की चिंता में लगे किसी सामाजिक कार्यकर्त्ता, लेखक, कलाकार आदि की कितनी चिंता है यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं। तो अब सवाल यह है कि इनकी चिंता करे तो कौन? ऐसे समय में अब इनके पास दो ही रास्ते बचतें हैं एक कि बाकि बची ज़िंदगी जैसे-तैसे खींच तानकर गुज़ार दें या फिर -------! 
सतनाम ने दूसरा रास्ता चुना। नहीं, चुना नहीं बल्कि चुनने को मजबूर हुए। ऐसा नहीं कि जो उन्होंने किया उसका अंदाजा किसी को नहीं था। बल्कि समयसमय पर वो यह बात कहते भी थे। लेकिन उनके इस कथन को झूठा साबित करने के लिए जो प्रयत्न किए जाने चाहिए थे वह नहीं हुए शायद ! नतीज़ा सामने हैं सतनाम, कानू सान्याल, गोरख पांडे, सीताराम शास्त्री, रोहित और ना जाने कितने और नामों के रूप में। 
तो क्या सतनाम और इन जैसे लोगों ने आत्महत्या की है? नहीं...। यह हत्या है और उसके जिम्मेवार निश्चित रूप से वे लोग और पार्टियां हैं जिनके कंधे से कंधा मिलाकर इन्होनें समाज परिवर्तन का सपना देखा था। बदले में ये लोग वैचारिक और सैधांतिक मतभेदों के नाम लगभग अलगथलग कर दिये गए और ये लोग या तो अवसादग्रस्तता में जाने को मजबूर हुए या फिर निर्थक हो गए। यह सबकुछ वैचारिकी और सिद्धांत का झगड़ा कम और क्रांति के नाम पर दादागिरी का प्रकोप ज़्यादा है। शायद यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति लगे लेकिन ऐसी सारी पार्टियां अब अप्रासंगिकता की कगार पर हैं। यहाँ अब विचार के नाम पर धंधा होता है। सतनाम जैसे लोग शायद इस पतन को बर्दाश्त नहीं कर पाए, और --- । 
अब; सतनाम के नाम पर भाषणबाजी, रोनागाना, कसमें खाना, फूल-माला चढ़ाना, लाल सलाम बजाना - सब होगा; होना भी चाहिए। लेकिन उन सबसे ज़रुरी सवाल यह है कि... आखिर वो कौन सी स्थितियांपरिस्थितियां हैं जिसमें एक कोमल हृदय क्रांतिकारी लेखक के अंदर आत्महत्या का विचार पनपता है? सवाल करना ज़रुरी है ताकि कई और सतनामों को बचाया जा सके। आत्महत्या कायरता नहीं, बल्कि हर आत्महत्या एक विद्रोह है: अपने, अपनों और अपने सपनों के विरुद्ध।
वैसे भी जो विचार या पार्टी या लोग अपने साथियों की भी रक्षा न कर सके, वह देश, दुनियां और समाज का कितना भला करेगा, संदेह है। वहां विचार की प्रमाणिकता और वैज्ञानिकता का दावा एक ढकोसला ही प्रतीत होने लगता है जहाँ चीजें व्यवहार से सही न हों। सनद रहे कि जब कोई सवाल नहीं करता तो सड़क से गुज़रता मुर्दा यह सवाल करता है कि आदमी मरता क्यों है? 
सतनाम ने शायद कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा। अगर छोड़े भी हैं, तो किसके लिए?
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने कह तो दिया है - 


अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता 



सुनना चाहता हूँ 



एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो । 



अन्यथा 



इसके पूर्व कि 



मेरा हर कथन 



हर मंथन 



हर अभिव्यक्ति 



शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए



उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ 



जो मृत्यु है !
वह बिना कहे मर गया’ 



यह अधिक गौरवशाली है 



यह कहे जाने से – 



कि वह मरने से पहले 



कुछ कह रहा था 



जिसे किसी ने सुना नहीं ।

अभिनेता, अभिनेत्री और आज का रंगमंच

प्रचलित मान्यता यह है कि रंगमंच के केंद्र में अभिनेता- अभिनेत्री हैं। यह बात आज सुनने में भले ही बहुत सुकूनदायक लगे किन्तु इस कथन में जितनी सच्चाई है, उससे कहीं ज़्यादा मात्रा झूठ का है। रंगमंच के मंच के आगे (दर्शकदीर्घा) से यह बात पूर्ण सत्य का आभास देता है क्योंकि दर्शक दीर्घा से रंगमंच के मंच पर अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का जीवंत अभिनय सबसे ज़्यादा प्रभावशाली और जादुई प्रतीत होता है। दर्शक इन्हीं के साथ भावों, संवादों और संवेदनाओं के मर्म को पकड़कर रंगमंच के जादुई यथार्थ में गोते लगाते हैं लेकिन मंच के परे, रंगमंच के पुरे चक्रव्यूह में प्रवेश कर यदि झांके तो स्थिति की दयनीयता और क्रूरता बिलबिला कर सामने आ जाती है; और हम देखते हैं कि जिस चीज़ को हम रंगमंच का केंद्र बिंदु मान रहे हैं दरअसल उसकी स्थिति प्रजातंत्र के उस जनता से कुछ ज़्यादा अच्छी नहीं है जो अपनी दयनीय स्थिति और अमानवीय दरिद्रता से मुक्ति हेतू तमाम प्रकार के लुभावने नारों के शोर में दिग्भ्रमित हो इस डर से एवीएम मशीन का बटन दबा आता है कि कहीं उसकी अंतरात्मा चुनाव नामक पवित्र और कर्तव्यनिष्ठ पर्व में सम्मिलित न होने के लिए उसे दुतत्कारने न लगे। यहाँ भी जनता को नायकत्व का टैग लगा है ठीक उसी प्रकार जैसे कि रंगमंच में अभिनेता-अभिनेत्री को केंद्र-बिंदु का। जबकि दोनों की स्थिति किसी कठपुतली जैसी ही है।
यह कब हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ - यह एक इतिहासिक अध्ययन का विषय है लेकिन यह सच है कि रंगमंच में अभिनेता पहले आया बाकि चीज़ें बाद मे। अब बाद मे आए प्राणी ने चुपके से कैसे और क्यों अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया, यह भी खोज का विषय है। लेकिन एक बात तो सच है कि सारा खेल सत्ता और धन का है। तभी तो सबकुछ झेल कर संघर्ष कर रहा अभिनेता निर्देशक बनते ही ठीक उसी सत्तावादी की तरह व्यवहार करने लगता है, जिससे कि कभी वह स्वयं त्रस्त रहा है। यह शायद पूंजीवाद का ही गोल पहिया है जो घूमता रहता है - गोल गोल। अर्थात हालत ठीक संसद वाली ही है जहाँ सत्ता पक्ष सत्तावादी और विरोध पक्ष विरोधवादी प्रवृति का शिकार होता है और सत्ता पक्ष का विरोध में या विरोध पक्ष का सत्ता में आ जाने से कोई ख़ास मुलभुत और नीतिगत बदलाव प्रत्यक्षतः देखने को नहीं मिलता।
रंगमंच एक सामूहिक कार्य है यदि यह सच है तो सामूहिकता का सिद्धांत यह कहता है कि समूह में कोई छोटा - बड़ा, कमज़ोर - मजबूत, ज़रूरी - गैरज़रूरी, फ़ालतू - महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि सब बराबर होते हैं। सबकी अपनी - अपनी भूमिका होती है और सामूहिकता का वजूद एक दूसरे के परस्पर सहयोग और विश्वास पर टिका होता है। लेकिन जब रंगमंच करते हुए एक व्यक्ति दूसरे पर मालिकाना हक जताने लगता है और दूसरे के मुकाबले में पहला आर्थिक और प्रसिद्धि के रूप में सम्पन्नता की ओर अग्रसर होने लगता है तो संदेह होना लाजमी है। वैसे ह्रास तो पुरे समाज में हुआ है फिर रंगमंच उससे अछूता कैसे रह सकता है? क्या श्रम के ऊपर पूंजी और सत्य के ऊपर फरेब, ईमादारी के ऊपर बेईमानी की सत्ता समाज में और प्रखरता से स्थापित नहीं हुई है? तो यही हाल रंगमंच का भी है, क्योंकि रंगकर्मी कोई आसमान से तो टपके नहीं हैं बल्कि वो भी इसी समाज के ही अंग हैं।
भारतीय रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना होने के पश्चात भी उसका मूल स्वरुप अभी भी शौक़िया ही है और सामाजिक स्तर पर उसकी स्वीकृति लगभग उपेक्षित वाली ही है। कुछ राज्यों में अपवाद स्वरुप स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन वहां भी आदर्श स्थिति तो नहीं ही है। हिंदी क्षेत्र की मध्यवर्गीय और सामंती मानसिकता आज भी इसे अधिकांशतः नाचनियां - बजनियां का ही पेश मानती है। फिर यह भी धारणा प्रखर रूप से विद्दमान है कि नाटक का कार्य उत्सवधर्मिता और मनोरंजन मात्र है। ऐसे माहौल में वर्तमान में ग्रुप थियेटर का लुप्त होना और लगभग एनजीओ के जैसा व्यक्ति-केंद्रित नाट्य दलों का अस्तिव में आ जाना एक कठिन समस्या है। वहीँ ग्रांट कल्चर भी ज़ोरो पर है। तो अब अमूमन नाटक कम प्रोडक्ट ज़्यादा तैयार हो रहे हैं। ग्रुप थियेटर जहाँ अपने तमाम खूबियों-खामियों के बावजूद एक अनुशासन सिखलाता था वही व्यक्ति केंद्रित रंगमंच जोड़-तोड़ के सहारे अपना काम निकलना और जैसे-तैसे एक नाटक को निपटा भर देना सिखला रहा है। ऐसे में जो थोड़ी बहुत प्रशिक्षण की प्रक्रिया चलती भी थी वह भी लगभग बंद हो गई है। नाटकों की संख्या में तो इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन गुणवत्ता घोर रूप से प्रभावित हुई है। प्रोफेशनल्स के नाम पर ऐसी व्यूह रचना देखने को मिलती है जो अपने ही नाटकों में कही बातों को खुद नहीं मानता। ऐसे समय में सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी की बात, शराब के उस बोतल की तरह हो गई है जिसके अंदर बस महक बची है। अपने नए रंगकर्मियों का सही मार्गदर्शन करने का वक्त अब शायद ही किसी के पास है। सबको फोकटिया कलाकार चाहिए। हद तो यह है कि जनवादी संस्कृति के वाहक होने का दावा ठोकनेवाले कई दल भी इस बहती गंगा में किस्मत आजमाने में ज़रा सा भी संकोच नहीं कर रहे हैं।
गत कुछ वर्षों से विभिन्न प्रकार के अनुदानों के नाम पर कुछ पैसा रंगमंच के हिस्से भी आया है लेकिन इस पैसे के आगमन से बुरे और अ-कलात्मक परिणाम ही ज़्यादा देखने को मिला है। यहाँ समस्या पैसे के आगमन का नहीं बल्कि उसके उपयोग का है। ज़्यादा से ज़्यादा पैसा बचा लेने की बेचैनी ने जहाँ एक तरह झूठ और फरेब का खेल रचा है वहीँ रंगकर्मियों का आपसी वैमनस्य भी बढ़ा है। निर्देशक अब एक कलाकार कम दुकानदार ज़्यादा प्रतीत होने लगा है। बही खाते के खर्च के कॉलम में जिस मद में जितना रुपया भरा जाता है उतना गिने-चुने लोग ही खर्च करते हैं। जहाँ तक सवाल नाटक में कार्य कर रहे अभिनेताओं के मानदेय का है तो किसी भी एक नाटक में उनके मानदेय की सही राशि जानकार कोई भिखारी भी उनका उपहास उड़ा सकता है। लगभग यही दशा विभिन्न प्रकार के कुकुमुत्ते जैसे उग आए NGO जैसे सरकारी अनुदानधारी रंगमण्डलों के अभिनेता-अभिनेत्रियों की है। महोत्सव अनुदान की हालात तो यह है कि तीसरे दर्ज़ का इंतज़ाम के साथ वह नाटकवालों पर चंद हज़ार भी बड़े सोच-सोचकर खर्च करते हैं वही उस नाटक में यदि फ़िल्म में काम करनेवाला/वाली कोई कलाकार हो तो फिर लाखों रुपए हंस-हंसके उड़ा दे सकते हैं। हो सकता है कि एक नाटक करनेवाले दल के कुल खर्च के बराबर एक फ़िल्म कलाकार वाले नाट्यदल की शराब का बिल हो।
यदि सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अभिनेताओं के नाम पर केवल रद्दी मालही बचेगा रंगमंच के पास।अभी के समय का तो क्रूरतम सत्य है कि क्या अभिनेता-अभिनेत्री रंगमंच में अभिनय करते हुए अपना व अपने परिवार का जीवकोपार्जन कर सकता है? इस सवाल का जवाब है नहीं, बिलकुल ही नहीं। कम से कम हिन्दी रंगमंच मे तो नहीं ही।

                                                      आलेख “आजकल” मई २०१६ अंक में प्रकाशित  

Sunday, April 17, 2016

राग दरबारिया प्रेमपत्र

श्रीलाल शुक्ल लिखित उपन्यास - राग दरबारी । एक ऐसी “कल्ट” किताब कि जिसे मैं कभी भी, कहीं भी, कहीं से भी पन्ने पलटकर पढ़ सकता हूँ । इस पुस्तक के एक एक शब्द और शैली से मुझे जानलेवा मुहब्बत है । नकली आदर्शवाद और वाहियात क्रांतिकारिता के पेचीस से पूरी तरह मुक्त “राग दरबारी” भारतीय ग्रामीण जीवन का किसी भी बाइबल से कम नहीं है; और इसी पुस्तक में दर्ज़ निम्नलिखित प्रेम पत्र विश्व साहित्य के किसी भी महान प्रेम पत्र नुमा रचना से पाठ और उप-पाठ और शैली (Text, Sub-Text, Style) आदि इत्यादि के स्तर पर बीस ही ठहरता है, उन्नीस तो हरगिज़ नहीं । शायद यही वजह है कि हिन्दी की प्रख्यात विद्वान फ्रेंचेस्का ओरसिनी ने अपनी किताब ‘Love in South Asia’ में इसका खास जिक्र किया है । बहरहाल, उपन्यास के पात्र बेला द्वारा रूप्पण बाबू को लिखा प्रेम पत्र का रसावादन कीजिए । जिसे इसी उपन्यास का किताबी (लगभग) क्रांतिकारी रंगनाथ “सिनेमा का संस्कृति के अध:पतन मे योगदान” का जुमला साबित करने की मंशा रखता है । 
सुना है किसी जमाने मे लोग गुनाहों का देवता तकिये के नीचे रखके सोते थे; आज वक्त है राग दरबारी को दिल दिमाग मे बैठने का, क्योंकि वैदजी अब गावों की नहीं देश की राजनीति करते हैं ।
ओ सजना, बेदर्दी बालमा,
तुमको मेरा मन याद करता है । पर ... चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर । वह बेचारा दूर से ही देखे करे न कोई शोर । तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो । याद मे तेरी जाग-जाग के हम रात – भर करवटें बदलते हैं । 
अब तो मेरी यह हालत हो गई है कि सहा भी न जाए, रहा भी न जाए । देखो न मेरा दिल मचल गया, तुम्हें देखा और बदल गया । और तुम हो कि कभी उड जाए, कभी मुड़ जाए, भेद जिया का खोले ना । मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको छिपाने की बुरी आदत है । कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख तो आके परवाने ।
तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं । ये सुलगते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ । मुहब्बत लूटाने को जी चाहता हैं । पर मेरा नादान बलमा न जाने दिल की बात । इसलिए मैं उस दिन तुमसे मिलने आई थी । पिया मिलन को जाना । अंधेरी रात । मेरी चाँदनी बिछुड़ गई, मेरे घर पे पड़ा अँधियारा था । मैं तुमसे यही कहना चाहती थी, मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए । बस, एहसान तेरा होगा मुझ पर मुझे पलकों की छाँव में रहने दो । पर जमाने का दस्तूर है यह पुराना, किसी को गिराना किसी को मिटाना । मैं तुम्हारी छत पर पहुंचती पर वहाँ तुमरे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था । मैं लाज के मारे मर गई । आंधियों, मुझ पर हंसों, मेरी मुहब्बत पर हंसों । 
मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो । तुम कबतक तड़पाओगे ? तड़पाओगे ? तड़पा लो, हम तड़प-तड़पके भी तुम्हारे गीत गाएँगे । तुमसे जल्दी मिलना है । क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मंदिर सूना है । अकेले हैं, चले आओ जहां हो तुम । लग जा गले से फिर ये हंसी रात हो न हो । यही तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए, हाय । हम आस लगाए बैठे हैं । देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना ।
तुम्हारी याद मे,
कोई एक पागल ।

Wednesday, March 23, 2016

हिंदी रंगमंच : अब खैनी, गुटखा और पान के लिए भी मिलेगा सांस्कृतिक अनुदान !!!

अंतराष्ट्रीय हिंदी रंगमंच दिवस, होलीपुर। अंतराष्ट्रीय हिंदी रंगमंच दिवस के अवसर पर जम्बो देश के होलीपुर नामक कुख्यात स्थान पर महिला वस्त्र धारी बाबा कामदेव की अध्यक्षता में विश्वभर के हिंदी रंगकर्मी, नाट्यलोचक, दर्शक आदि-इत्यादि बिना दारु, भांग, खैनी, गुटखा, गांजा आदि के इक्कठा हुए। हालांकि इन पावन वस्तुओं के आभाव में उन्हें एकाग्रचित होने में तनिक कठिनाई का सामना करना पड़ा, रात के आठ बजते ही कुछ रंगकर्मी और नाट्यलोचक लोग तो इन पावन और पवित्र वस्तुओं के आभाव में बेहोशी और मिर्गी का शिकार होते भी पाए गए। एक प्रख्यात नाट्यलोचक ने तो इन वस्तुओं के आभाव में पुरे आयोजन को ही कूड़ा बता दिया। उन्होंने रंगकर्मियों पर नाट्यलोचकों का हक़ छीन लेने का आरोप लगते हुए निम्न बातें कहीं - "हिंदी रंगमंच दरअसल नाट्य - आलोचना और नाट्यलोचक विरोधी रंगमंच है। एक तो पहले से ही यहां नाट्यलोचक और आलोचना की हालत खराब है ऊपर से कभी-कभी मुफ़्त में मिल जानेवाली पावन पेय "मदिरा" व अन्य पुजनीय वस्तुओं का भी निषेध करने की साजिश की गई है। जो लोग भी इस घिनौने कृत्य में शामिल हैं उन्हें दरअसल भारतीय नाट्य परम्परा का ज्ञान ही नहीं है। वो दरअसल भारतीय संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। देशद्रोही हैं - सब के सब। ऐसे लोगों यथाशीघ्र ही रंगमंच क्या उस देश की परिधि से बाहर फेंक देना चाहिए।" अपनी बात समाप्त करते हुए इन्होंने साढ़े सात बार "भारत माता की जय" का जयकारा भी लगाया और धरने पर बैठ गए। स्थिति को सामान्य करने के लिए अन्तः बाबा कामदेव के आदेश पर इन नाट्यलोचकों के लिए चार-चार बून्द अल्कोहल का प्रबंध किया गया। नाट्यलोचक ने होमियोपैथिक दावा की तरह इस चार बून्द अल्कोहल का दो पैग बनाकर नमक और सत्तू की गोली के साथ गले के नीचे उतारा और स्वदेशी बीड़ी के सुट्टे मारे तब जाकर उनकी जान में जान आई और फिर उन्होंने सारे हिंदी रंगकर्मियों को "देशप्रेमी कलाकार" का सर्टिफिकेट दिया। ड्राई डे के दिन मदिरा का प्रबंध करनेवाले एक चालीस वर्षीय युवा रंगकर्मियों का नाम तो उन्होंने शहनाई खां युवा पुरस्कार के लिए उसी वक्त प्रस्तावित कर दिया है और यदि कोई अन्य इनकी भक्ति में इससे ज़्यादा लीन न हुआ तो यह पुरस्कार इन युवा रंगकर्मी को ही मिलेगा।
समारोह का उद्घाटन करते हुए एक केंद्रीय सह-राज्य मंत्री ने बिना फेंकते हुए कहा कि "उनकी सरकार की योजना कला (काला नहीं) संस्कृति नामक परजीवी पौधा को पुरज़ोर खाद - पानी देने की है। इसके लिए हर शहर, गाँव, कस्बा में मुफ्तखोरी का इंतज़ाम किया जाएगा। इस योजना के तहत कमीशन खाकर विभिन्न प्रकार का अनुदान तो मिलेगा ही, साथ ही साथ हर जगह बहुत सारा प्रेक्षागृह भी खोला जाएगा, जिसमें शादी - ब्याह से लेकर मुंडन - छेदन तक की बुकिंग की जाएगी। लोग चाहें तो नैतिक-अनैतिक सुहागरात की बुकिंग भी कर सकते हैं। इन आयोजनों के बाद भी यदि प्रेक्षागृह खाली पड़े रहे तो वह नाटक - नौटंकी करनेवाले भांड - मिरासियों को भी सम्मानित तरीके से लगभग मुफ़्त में उपलब्ध करा दिया जाएगा। इस कार्य को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए इस देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय के सबसे बेईमान चपरासी को समीति का चेयरमैन बनाया गया है क्योंकि उसकी मूँछ मिलीमीटर से नापने पर फ़िल्म शराबी के नत्थूलाल जी की मूँछो से ज़्यादा बड़ी पाई गई है।
मंत्रीजी की युक्त घोषणा को सुनने के पश्चात् कुछ चम्पक और अतिक्रान्तिकारी और महामूर्ख टाइप के रंगकर्मियों को छोड़कर बाकी सबलोग ग्रांट की फ़ाइल भरने और उसे स्पीड पोस्ट करने और हॉल की बुकिंग में व्यस्त देखे गए हैं। कुछ ने तो चट मंगनी पट ब्याह के तर्ज़ पर नाटक के मंचन की योजना भी बना डाली है। वहीँ कुछ वरिष्ठ रंगकर्मियों ने मांग की है कि कला और कलाकारों के लिए इतने ही अनुदान मात्र से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार कलाकारों को मदिरा, चखना और धूम्रपान के लिए भी ग्रांट दे, जिससे कि कलाकारों को इसके जुगाड़ के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़े। कुछ रंगकर्मियों ने हर नाट्यगृह में ग्रीनरूम, टॉयलेट के साथ ही साथ एक ऐसा कमरा भी बनाने का प्रस्ताव दिया है जहाँ बैठकर आराम से मांस, मदिरा और धूम्रपान आदि किया जा सके। वहीँ बिहार के कुछ रंगकर्मियों ने विशेष राज्य का दर्जा माँगते हुए मदिरा के साथ ही साथ खैनी, गुटखा और पान पर भी अनुदान देने की मांग रखी है। बिहार के रंगकर्मियों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को अनसुना किया गया तो वो सरकार को ही बिहार और बिहारी विरोधी घोषित करके दर्शकों के सामने विरोध स्वरुप "अच्छे नाटक" करने लगेगें। बिहार के रंगकर्मियों की अगुआई कोई एक व्यक्ति नहीं कर रहा था क्योंकि बिहार महापुरुषों की भूमि है और यहाँ हर कोई जन्मजात महापुरुष होता है और महापुरुषों की ख़ासियत यह होती है कि वो किसी को भी अपना नेता नहीं मानते बल्कि अपना नेता वो स्वयं होते हैं। इसलिए बिहार में जनता का कॉंसेप्ट सम्राट अशोक के समय ही खत्म हो गया है। अब यहाँ सब नेता हैं, जनता कोई नहीं।
वहीँ सभागार में उपस्थित कुछ नाट्यप्रेमी दर्शकों ने हिंदी नाटक देखने के लिए भी अनुदान देने की बात कही है। उनका तर्क यह है कि हिंदी के अमूमन नाटक इतने उच्च कोटि के घटिया, उबाऊ और रटंत विद्या के होते हैं कि उसे बिना अनुदान के झेल पाना संभव ही नहीं। वहीँ नाट्यप्रेमी गुलाबी लाल चौहान ने प्रेक्षागृह के सीटों को आरामदायक बनाने और नाटक के पश्चात् नाटक करनेवाले दल की और से दारु के साथ भोज-भात का इंतज़ाम करने की भी मांग की है ताकि नाट्यप्रेमी आराम से पूरा नाटक देखें और चैन से खा-पीकर झूमते हुए अपने - अपने घर को जाएं।
देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय के दरबान से सभा को संबोधित करते हुए कहा कि नाट्य विद्यालय ने प्रतिभा के आधार पर विद्यार्थियों का चयन करना अब बंद कर दिया है। क्योंकि जो प्रतिभावान हैं उन्हें कोई सिखाए, न सिखाए - वो तो अपनी मेहनत और लगन से सीख ही जाएगें किन्तु जो प्रतिभा के धनी नहीं हैं अब विद्यालय उनका साथ देगी क्योंकि कमज़ोर का साथ देना ही सच्ची देशभक्ति है।
उन्होंने तमाम कमज़ोरों से निवेदन किया कि चुकी प्रतियोगिता काफी कड़ी है और कमज़ोरों की संख्या ज़्यादा व सीटें कम इसलिए कमज़ोर विद्यार्थी विद्यालय में प्रवेश पाने हेतू हर प्रकार के तिकड़म अपनाएं। यह तिकड़म किस - किस प्रकार के हो सकते हैं उसे सिखाने के लिए इन्होंने "नाट्य विद्यालय प्रवेश तिकड़म संघ" की स्थापना करने बात कही जिसमें वरिष्ट तिकड़मबाज़ रंगकर्मी लोग नियमित क्लास लेकर कनिष्ठों को तिकड़म के पैंतरे कानूनी रूप से सिखाएगें। कुछ कनिष्ठ रंगकर्मी तो मक्खन भरे ड्रम के साथ अपने वरिष्ठों की आराधना में लीन भी देखे गए।
नाट्य विद्यालय के इस घोषणा के साथ ही पुरे देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है। इस फैसले का स्वागत करते हुए युवा रंगकर्मी और रंगचिंतक चम्पक कुमार ने कहा कि "यह एक अति-लोकतान्त्रिक और क्रांतिकारी फैसला है। आजतक लोग तिकड़मबाजी और मक्खनबाजी को गन्दी नज़र से देखते थे लेकिन अब यही कानून होगा। वैसे भी कला के क्षेत्र में ईमानदारी एक महामारी है। एक कलाकार को तभी तक ईमानदारी की बीन बजानी चाहिए जब तक उसे बेईमानी का मौका न मिले। कलाकारिता झूठ और सच से परे का पेशा है इसलिए कलाकार ईमानदारी और नैतिक ज़िम्मेदारी नामक रोग से जितनी जल्दी मुक्त हो जाए कला के लिए उतना ही अच्छा है।"
महिलावादी निर्देशक व नाट्याधेता मुद्रा कुमारी ने सरकार के सामने यह भी मांग रखी कि महिला कलाकारों के लिए अलग से कॉस्मेटिक ग्रांट की व्यवस्था की जाय ताकि अभिनेत्रियों मंच पर सुन्दर और हॉट दिख सकें, न कि कुपोषित और उपेक्षित। उन्होंने महिला रंगकर्मियों को रिहर्सल यात्रा भत्ता, आई लाइनर भत्ता और लिपस्टिक व रूज़ भत्ता भी देने की मांग की।
वहीँ देश के कुछ प्रतिष्ठित नाट्य परिकल्पकों और निर्देशकों से सरकार मांग की है कि उन्हें फ्री लेपटॉप और वाईफाई की सुविधा प्रदान की जाय ताकि वो अपने नाटकों की विभिन्न प्रकार की परिकल्पना (मसलन - लाइट, साउंड, कास्ट्यूम, पोस्टर आदि) इंटरनेट की दुनियां से प्रभावित, चोरी या नक़ल करके आसानी से करें। वैसे भी चोरी कोई ग़लत बात नहीं है बल्कि बड़े - बड़े महापुरुष (महा केवल पुरुष होते हैं स्त्रियां नहीं!) कह गए हैं - नक़ल के लिए भी अक़ल चाहिए। वैसे भी हमारे देश में चोरी की पुरानी परम्परा है और जो चीज़ परम्परा में हो उसे संस्कृति कहते हैं। तात्पर्य यह कि नक़ल या चोरी हमारी संस्कृति है और कलाकार वैसे भी संस्कृति का अगुआ होता है। वर्तमान समय में हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं इसलिए आज ज़रूरत है कि चोर पुराण को पुनर्जीवित और प्रतिष्ठित किया जाय।
इस महासभा का समापन विश्व-कुख्यात नाट्य-चिंतक चखना दादा ने किया। इस अवसर पर समापन भाषण देते हुए उन्होंने उपरोक्त सारी मांगों का समर्थन करते हुए यह भी कहा कि यह एक भ्रम है कि रंगमंच एक गंभीर और समाज को दिशा प्रदान करने वाला पेशा है। बल्कि सच यह है कि रंगमंच झूठ को सच और सच को झूठ साबित करनेवाला एक ऐसा पेशा है जहाँ जो जितना बड़ा बेईमान है वह दरअसल उतना ही बड़ा महान है। लोकतान्त्रिक कार्य प्रणाली को रंगमंच विरोधी करार देते हुए उन्होंने सामंतवाद को ही रंगमंच का सच्चा साथी बताया क्योंकि यदि नाट्य समूह लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से संचालित होने लगे और सबको बराबर का हक़ और "माल" में बराबर का हिस्सा मिलने लगा तो तमाम मठ और मठाधीश दिवालिया हो जाएगें। यह न केवल रंगमंच के लिए घातक है बल्कि समाज के लिए भी। समाज और कला दोनों को सुचारू रूप से कार्यरत रहने के लिए वर्णाश्रम का सही - सही पालन होना एक अनिवार्य शर्त है। यही भारतीयता है और भारतीय संस्कृति भी। जो कला या समाज अपनी संस्कृति से कट जाए उसकी हालात धोबी के उस कुत्ते के जैसी होती है, जो न घर का होता है न घाट का।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए स्वर्गीय रंगकर्मी चम्मच प्रसाद ने विश्व भर के संस्कृतिकर्मियों का आह्वान करते हुए कहा कि नैतिक ज़िम्मेवारी के नाम का माला जपके संस्कृतिकर्मियों ने अपना कबाड़ बना लिया है। जब पूरा विश्व पूंजीवादी संस्कृति का उपासक बन खाने पीने और खिलाने में मस्त है, ऐसे समय में नैतिकता और आदर्शवाद एक मज़ाक से ज़्यादा और कुछ नहीं है। भूख से बिलबिलाते समय में अपनी रोटी, मटन और दारु की चिंता करना ही असल जनवाद है। क्योंकि दूसरे की चिंता करने के लिए अपना पेट भरा होना आज की एक अनिवार्य ज़रूरत है। इसके लिए अनुदान क्या, ज़रूरत पड़े तो उधार, चोरी, डैकैती - सब चलेगा।
जनवादी संस्कृति का नाश हो और जुगाड़ू संस्कृति ज़िंदाबाद के नारे के साथ अन्तः सबने जमकर स्वदेसी पीया और मुर्गा पुलाव का सेवन के पश्चात् विश्व बंधुत्व का नारा बुलंद किया। कार्यक्रम की समाप्ति "नाथुनिए पे गोली मारे, सैयां हमार हो" नामक भक्ति संगीत से हुआ।
आयोजन में नाटककार नामक अवांछित तत्व का प्रवेश वर्जित था।
- फेसबुकिया क्रांति के लिए यह रिपोर्ट भकचोन्हर प्रकाश ने बनाई है। *Happy Holi - बुरा न मानो होली है?

Wednesday, February 10, 2016

एच कन्हाईलाल को पद्मभूषण

एच कन्हाईलाल का पूरा नाम हैसनाम कन्हाईलाल है। इनका जन्म 17 जनवरी 1941 में कैसंथोंग थान्ग्जाम लाइरक इम्फाल में हुआ। सन 1969 में उन्होंने मणिपुर में कलाक्षेत्र की स्थापना की। उन्हें अब तक निर्देशन के लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान 1985, संगीत नाटक अकादमी रत्न पुरस्कार 2011 सहित पता नहीं कितने सम्मान मिल चुके हैं। इससे शायद ही किसी को इनकार हो कि आज एच कन्हाईलाल का नाम भारतीय रंगमंच का पर्याय बन चुका है।
2007 - 08 की बात है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से बतौर छात्र मैं और मेरे कुछ बैचमेट पढाई पूरी करने के पश्चात् राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में प्रशिच्क्षु (Apprentice) कलाकार के रूप में कार्यरत थे। रंगमंडल में प्रशिक्षुओं की स्थिति किसी मुहाजिर की तरह ही होती है, जो किसी देश में रहते हुए भी उस देश का शरणार्थी होता है। हमारी भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। हम शरणार्थियों के लिए रंगमंडल में तत्काल कोई योजना नहीं थी तो एच कन्हाईलाल को बुला लिया गया कि वो आएं और हमारे साथ “कुछ” काम करें। तीन साल के प्रशिक्षण के पश्चात् भी यह “कुछ” काम वाला तर्क हमारे गले से उतरना आसान नहीं था। लेकिन यह रंगमंडल हैं स्कूल नहीं। यहाँ विरोध का कोई स्थान नहीं है। हमें ऐसा लगा जैसे हमारी पढ़ाई तीन साल में खत्म नहीं हुई बल्कि चौथे साल में भी शुरू हो गई थी।
बहरहाल, कन्हाईलाल आए तो उनके साथ सावित्री जी और उनका पुत्र तोम्बा भी आए। तीनों ने हमारे साथ अभ्यास आरम्भ किया। तीनों व्यवहार में इतने सहज कि लगता ही नहीं था कि हम भारतीय रंगमंच के एक लिजेंड्री जोड़ी और परिवार के साथ काम कर रहे थे। कन्हाईलाल जी और सावित्री जी की जोड़ी को रंगमंचीय कलाकार की आदर्श जोड़ी है। दोनों एक दूसरे के पूरक जैसे ही हैं। कन्हाईलाल जी थ्योरी हैं तो सावित्री जी उस थ्योरी की व्यावहारिक आत्मा।
उन्होंने हमारे साथ कई सारे अभ्यास किए। अपनी रंगमंचीय तकनीक से अवगत करवाया और रंगमंचीय अभिनय को लेकर कई सारे जाले भी साफ़ किए। खोखली बौधिकता और जादुई शब्दावलियों से परे स्वतः और स्वभाविक मानवीय इंस्टिंक्ट को फिजिक्लाइज करना सिखाया। शुरू में हमें दिक्कत हुई क्योंकि आधुनिकता, विकास और बौद्धिकता के नाम पर हमने हमने इन्हीं चीज़ों का ही तो त्याग किया है। शारीरिक अभ्यास किए और शब्दों से ज़्यादा ध्वनियों पर काम किया। शुरूआती असफलताओं के बाद एक बार सूत्र पकड़ में आ गया और हमने "इसे ही रंगमंच कहते हैं" की बनी बनाई मान्यता को त्यागकर अपने को कन्हाईलाल जी के हवाले कर दिया तो फिर तो मज़ा ही मज़ा था। अभिनेता का शरीर ही उसका मूल अस्त्र है तो हमने सर्वप्रथम शरीर को साधना सीखा ताकि उससे संवेदना का सतत संचार हो सके। यह सब अभ्यास हमारे लिए बिलकुल भी नए थे ऐसा भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तीन वर्ष के पाठ्यक्रम में अभिनय के कई सारे रूप और प्रकार से परिचय तो प्राप्त हो ही जाता है।
कन्हाईलाल जी ने हमारे साथ कुछ डेमोस्ट्रेशन भी तैयार किया। वो चाहते थे कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के सामने इस डेमोस्ट्रेशन को प्रदर्शित करेगें ताकि कन्हाईलाल जी कैसे काम करते हैं यह समझ में आए और यह भी समझें कि उनके काम को तथाकथित शहरी रंगकर्मी भी आराम से आत्मसाथ कर सकते हैं जो यह कहके उनके काम को खारिज़ कर देते हैं कि उसके लिए एक खास प्रकार की ट्रेनिग की ज़रूरत है और उसे हर कोई नहीं अपना सकता। लेकिन डेमोस्ट्रेशन के दिन कोई भी नहीं आया - न कोई छात्र, न शिक्षक और ना ही कोई अन्य। किसी के भी पास इनके काम को देखने के लिए एक घंटा नहीं था। कन्हाईलाल और सावित्री जी इस बात से विचलित नहीं हुए बल्कि वो तो शायद यह जानते थे कि यही होनेवाला है। बहरहाल, उन्होंने हमें चाय समोसा की एक छोटी पार्टी और हमें खूब सारा प्यार दिया।
इस कार्यशाला के दौरान हमें उनके जीवन संघर्षों की गाथा सुनने का अवसर भी मिला। हम कभी दुखी, कभी आश्चर्यचकित भाव से उनकी कहानी सुनते रहे। मणिपुर जैसे राज्य में रहकर आज के खाऊ - पकाऊ और आत्ममुग्धता भरे दौर में कोई तो है जो जीवन के तमाम दुःख-सुख को आत्मसाथ करते हुए पूरी जीवटता, सहजता और लगन के साथ रंगमंच को न केवल खेलता है बल्कि जीता भी है।
यह तो सर्वविदित है कि कन्हाईलाल जी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र थे लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पुरी नहीं की। उसका सबसे बड़ा कारण भाषा तो था ही साथ ही साथ जो कुछ भी वहां पढ़ाया जा रहा था वह शायद उनके काम का ज़्यादा कुछ था नहीं। कुछ लोग इस घटनाक्रम को पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी जोड़ कर देखते हैं। असली करण चाहे जो भी ही किन्तु यह सच है कि स्थिति आज भी कुछ ज़्यादा बेहतर नहीं है। जो छात्र हिंदी भाषी नहीं होते वह कैसे धीरे – धीरे तनाव का शिकार होते हैं यह हम सबने खुद अपने बैच में महसूस किया है। अच्छे से अच्छा अभिनेता ठीक से हिंदी न बोल – समझ पाने से की वजह से कुंठाग्रस्त होने को अभिशप्त होते हैं क्योंकि राष्ट्रीय के नाम पर यहाँ आज भी अमूमन हिंदी का ही बोलबाला है।
कन्हाईलाल जी ने अपनी जीवन संगनी सावित्री जी के साथ मिलकर न केवल रंगमंच की अपनी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा खोजी बल्कि उसे किसी भी भाषा से ऊपर उठाकर समसामयिक और सार्थक भी बनाया। यह कहा जाय तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका रंगमंच किसी प्रकार के तड़क – भड़क से परे मूलतः अभिनेता – अभिनेत्री केंद्रित एक ग्लोबल रंगमंच है जहाँ भाषा से ज़्यादा भाव, भंगिमाओं, गतियों और ध्वनियों आदि जैसे वैश्विक चीज़ों का इस्तेमाल ज़्यादा है। इससे कथा का प्रवाह वाधित नहीं होता बल्कि वो और ज़्यादा व्यापक और वैश्विक होकर मुखर हो जाता है। यह वजह है कि कुछ लोग यह मानते हैं कि कन्हाईलाल जी जैसे लोगों का रंगमंच राष्ट्रीय रंगमंच है। एच कन्हाईलाल को वर्ष 2016 का पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा हुई है। वर्तमान सरकार और उसकी नीतियों से सहमति – असहमति के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एच कन्हाईलाल जैसे लोगों का सम्मान राष्ट्रीय रंगमंच का उचित सम्मान है। 

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...