Sunday, August 2, 2015

आर्तो और क्रूरता का रंगमंच

आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों को समझने के लिए रंगमंच की प्राचीनतम अवस्था से लेकर बीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक रंगमंच तक की समझ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आर्तो का चिंतन एक पागलपन और प्रलाप से ज़्यादा शायद ही कुछ लगे। मोटे तौर पर बात इतनी है कि प्राचीन काल में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जुड़ा रंगमंच आर्तो से पहले एक समृद्ध मनोवैज्ञानिक रंगमंच के रास्ते, रंगमंच और समाज दोनों ही एक खास तरह की नैतिकता व शुद्धतावादी मानसिकता से ग्रस्त हो चुका था। पारंपरिक कलाएं हाशिए पर या संग्रहालय में स्थान पाने को अभिशप्त हो चुकी थी। और ओद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी मानसिकता की चपेट में आकर मानवसमाज विश्वयुद्ध की पागलपन भरी राह की ओर अग्रसर हो चुका था। पूँजी और रुतवा सफलता के मापदंड के रूप में स्थापित हो चुके थे और सार्थकता की परिभाषा चुनौतीपूर्ण रूप से सफलता में बदल दी जा रही थी। तो क्या आर्तो का रंगमंच सम्बन्धी चिंतन इन तमाम चीज़ों से एक विद्रोह था?
आर्तो एक असफलता का भी नाम है लेकिन सफल व्यक्ति ही सार्थक हो ज़रुरी नहीं, ठीक उसी प्रकार यह भी ज़रुरी नहीं कि हर असफलता अर्थहीन ही हो। यह संभव है कि अपने समय का असफल व्यक्तित्व भविष्य के लिए बहुत कुछ गढ़ रहा हो। वैसे भी एक सफलता के पीछे कई सारी असफलताएं होती हैं। सफलता और सार्थकता दो भिन्न बातें हैं, जो एक साथ भी हो सकती हैं और नहीं भी।
हर सदी में बहुत से सफल लोग होते हैं और ढेर सारे असफल। इन असफल लोगों की भी अपनी-अपनी उपलब्धियां और सफलताएं-असफलताएं होतीं हैं। बीसवीं शताब्दी बहुत सारी उपलब्धियों के साथ ही साथ आधुनिक और वैज्ञानिक नाट्य व अभिनय चिंतन में उल्लेखनीय योगदान के लिए भी जाना जाता है। जिनमें कॉन्स्तानतिन स्तानिस्लाव्स्की, व्सेवलोद मेयरहोल्ड, माइकेल चेखव, बर्तोल्त ब्रेख्त, जैक्स कॉप्यु, ली स्त्रासबर्ग, स्टेला एडलर, सेनफोर्ड, सेनफोर्ड माइज्नर, जौसफ शैकीन, जेर्जी ग्रोतोव्सकी, पीटर ब्रुक, युजिन बार्बा, व्लोदजिमिर्ज़ स्तानिएव्सकी आदि जैसे अभिनेता, निर्देशक व चिन्तकों के नाम प्रमुख हैं। इन सबसे इतर एक नाम और है क्रूरता के रंगमंच के जनक आर्तो का, जिनके लिए रंगमंच ताउम्र मुक्ति और आत्मशुद्धि का मार्ग बना रहा। आर्तो कहते हैं “मैं अपने को जीवित महसूस नहीं करता, लेकिन मंच पर मैं महसूस करता हूँ अपने अस्तित्व को।” आर्तो एक कठिन पहेली भी हैं। ग्रोतोव्स्की ने थी ही यह कहा है कि “एक तरह से देखें तो आर्तो ने अपने पीछे न कोई सिद्धांत छोड़ा है न कोई तयशुदा तकनीक किन्तु दूसरी तरह से देखें तो दी है अंतर्ज्ञान, दृष्टिगत समझ और रूपयुक्त छवियों की भाषा।”
आर्तो एक परिचय – ताउम्र मुफलिसी, अस्वीकार, विवाद, आलोचना, अकेलापन व जीवन के नौ साल पागलखानों में जबरन यातना झेलते हुए व्यतीत करनेवाले अभिनेता, कवि, निर्देशक, चित्रकार, नाट्य सिद्धांतकार के रूप में प्रसिद्ध आर्तो का पूरा नाम ओंतोनी मारी जोसेफ़ आर्तो है। इनका जन्म 4 सितम्बर 1896 को दक्षिण फ्रांस के मार्सेल में तथा मृत्यु 4 मार्च 1948 को पेरिस में हुआ। महज पांच साल की उम्र से मेनेंजाइटिस दौरा पड़ा। इस बीमारी की वजह से ताउम्र उन्हें यातनादायक सिरदर्द सहना पड़ा। इस पीड़ा से लड़ने के लिए नशीली दवाओं का सेवन मजबूरन उनकी ज़िंदगी का एक ज़रुरी हिस्सा बन गया। कई अन्य बीमारियाँ भी ताउम्र उनसे चिपकी रहीं। नींद में चलने की आदत की वजह से फ्रेंच आर्मी से निष्काषित हुए। सन 1920 में लेखक बनने के उद्देश्य से पेरिस आगमन व कलात्मक जीवन का प्रारंभ। 1924 से 1935 के बीच लगभग बारह फ़िल्में में अभिनय, जिनमें नेपोलियन व द पैशन ऑफ जोन ऑफ आर्क प्रमुख फ़िल्में हैं। सन 1931 में उन्हें बलिनिज़ नृत्य देखने का अवसर मिला। यह बालिस्लैंड इंडोनेसिया की एक अतिप्राचीन पारंपरिक नृत्य शैली है जिसमें ताल-लय युक्त शारीरिक भाव-भंगिमा का उर्जावान प्रयोग द्वारा कहानी कही जाती है। इस नृत्य और मार्क्स बंधुओं की फिल्म एनिमल क्रेकर्स व मोंकी बिज़नेस का आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों पर गहरा प्रभाव माना जाता है। आर्तो के रंगमंच में विद्रोही तत्व मार्क्स बंधुओं की फिल्मों की देन माने जाते हैं। इसी वर्ष First Manifesto for a Theatre of Cruelty नामक आलेख का प्रकाशन हुआ। उनकी प्रमुख रचना The Theatre and Its Double का प्रकाशन 1938 में हुआ। यह पुस्तक आर्तो के रंगमंचीय अवधारणा Theatre of Cruelty (क्रूरता का रंगमंच) का घोषणापत्र भी माना जाता है। आर्तो का मानना था कि रंगमंच को सच्चाई का पुनर्प्रदर्शन करके दर्शकों पर ज़्यादा से ज़्यादा प्रभावित करना चाहिए।
अमूमन यह ऐतिहासिक सच नज़रंदाज़ कर दिया जाता है कि आर्तो का काल विश्वयुद्धों (प्रथम 1914–1918, द्वितीय 1939–1945) का काल भी रहा है और दुनियां का कोई भी संवेदनशील कलाकार एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक घटनाक्रमों के प्रभाव से वंचित कैसे रह सकता है और वो भी फ्रांस जैसे देश का नागरिक होकर। रंगमंच और क्रूरता नामक अपने आलेख में आर्तो यूं ही नहीं कहते हैं कि “जिस वेदना और संकट के समय में हम रहते हैं, ऐसे में हम उस रंगमंच की ज़रूरत को तीब्रता से महसूस करते हैं, जो किसी घटना की छाया से प्रभावित न हो, जो उत्साहित कर सके हमारी गूंज को, जो उस अव्यवस्थित समय पर हावी हो जाए, उसको गहरे प्रभावित कर ले।” ज्ञातव्य हो कि अपने रंगमंच और प्लेग नामक आलेख में आर्तो मंच पर विकराल और डरावना समय में आपदा की स्थिति उत्पन्न कर क्रूरतम सच्चाई को उद्घाटित करने की बात करते हैं।
आर्तो और रंगमंच – रंगमंच एक स्वतंत्र अलौकिक कला है यह माननेवाले आर्तो के लिए रंगमंच की अवधारणा सच्चा है, जो सामाजिक अवधारणाओं को रद्द करने की बात करता है। यहाँ वैचारिक क्रांति के लिए जगह और नस्लवाद की मुखालफत है। रंगमंच पर विचार करते हुए आर्तो ने कई ऐसी बातें कही जिससे आजतक ना जाने कितनों ने प्रेरणा हासिल किया है। आर्तो कहतें है “हम रंगमंच के विचार से वेश्यावृत्ति जारी नहीं रख सकते जो सिर्फ़ उस नैतिक मूल्य के साथ बसती है। जो पीड़ा और संघर्ष से भरे जादुई अंतर्सबंधों के यथार्थ और खतरे में निहित है।”
सच्चा रंगमंच एक सृजनात्मक अनुभूति है जो ‘यथार्थ जगत’ की नक़ल नहीं हो सकता। यहाँ यथार्थ का पुनर्परीक्षण होता है। शब्द, संकेत, सार्थक सैधान्तिकी (Metaphysical) को सृजित करने के साथ ही साथ आर्तो रंगमंच की अपनी एक विशिष्ट भाषा तलाशने के पैरोकार थे, बने-बनाए आलेख से उनका मोह नहीं था बल्कि वो तो बार-बार आवरण रहित, जादुई, ताल-लय से भरपूर, काव्यात्मक, प्रतीकात्मक, अनुष्ठानिक, कोडिफाइड, सीमारहित और सपनों जैसा रंगमंच की बात करते हैं।
आर्तो रंगमंच में प्रभावशाली दृश्य और उत्तेजना को फिर से तलाश करने के पक्षधरता के साथ कहते हैं “रंगमंच में जीवन है, ऐसा जीवन जो अपनी प्रमाणिकता लिए हो, जिसमें कोई असत्य, कोई दिखावा और पाखंड न हो। जीवन, जो भूमिका खेलने के विपरीत है, जिसमें जीवन का पुनर्निर्माण होता है। किसी भी प्रदर्शन के मूल आधार में क्रूरता के तत्व के बिना कोई दृश्य प्रभावशाली नहीं हो सकता। हमारी गिरती संवेदनशीलता आज उस बिंदु तक आ पहुंची है जहाँ हमें यक़ीनन एक ऐसे रंगमंच की ज़रूरत है जो हमारी भावनाएँ और विचार दोनों को जाग्रत कर दे। हम ऐसा रंगमंच चाहते हैं जो विश्वसनीय सच्चाई की ठोस रूप से पड़ताल कर सके, जो भावनाओं के रूप में ह्रदय और इन्द्रियों में समा सके, ठीक उस तरह जिस तरह हमारे स्वप्न हमारे यथार्थ को उस हद तक प्रभावशाली रूप में अभिनीत करते हैं, जहाँ पहुंचकर वे उस हिंसा को महसूस करते हैं।”
आर्तो रंगमंच को किसी भी राजनैतिक विचार के प्रभाव से मुक्त रखने के पक्षधर थे। वे अपने लिखे को हमेशा अपर्याप्त और दोषपूर्ण मानते थे। उसकी एक वजह एक खास तरह की बेचैनी, उन्हें उचित स्थान व सम्मान न मिलना हो सकता है। पल-पल इम्तहानों से गुजरनेवाले आर्तो ने शायद विषाद से ग्रस्त होकर यह लिखा कि “दैत्याकार शक्तियों ने मुझे धकेल दिया है, इसलिए इसे स्वीकार करते हुए मैं क्या हूँ, मैंने यह तलाश छोड़ दी है।”
आर्तो प्राचीन रंगमंच के मिथकों, अनुष्ठानिकता, स्वप्नलोक से बड़े प्रभावित थे और उसे नए अर्थ में अपनाने की भी बात करते थे क्योंकि यदि इन चीज़ों को जैसे का तैसा रख दिया जाय तो वो अर्थहीन होगा। आर्तो रंगमंच में शब्दों से ज़्यादा मनोवृति और भावनाओं के समर्थक थे। वे मानते थे कि शब्दों का प्रभाव सामान्य सा होता है। उनका यह भी मानना था कि वास्तविक भावनाओं को मंच पर अभिनीत नहीं किया जा सकता है बल्कि ऐसा करने को वो एक धोखा भी मानते थे।
रंगमंच और प्लेग – आर्तो के इस बहुचर्चित व मुश्किल संभाषण का पाठ 1933 में आएन्दी के आयोजन में सर्बोन बौधिक श्रृंखला के तहत किया गया था। इसमें आर्तो रंगमंच की तुलना प्लेग जैसी महामारी से करते हुए कहते हैं – रंगमंच प्लेग जैसा है, एक ऐसा संकटकालीन चरमबिंदु जो स्वयं ही उसकी दवा है। प्लेग एक ऐसी निरंकुश संकट है जिसमें मौत, तबाही या सबकुछ पाक-साफ़ के अलावा तीसरा रास्ता नहीं होता। रंगमंच ऐसी ही स्थिति बनाता है। रंगमंच अपने में सर्वोत्कृष्ट संतुलन है, जो मस्तिष्क का आह्वान करता है, उसे सन्निपात की स्थिति तक ले जाकर उसकी सोचने की शक्ति तीव्रतर कर देता है और अंत में सब विध्वंस होने के बाद गहन मानवीय दृष्टिकोण उद्घाटित होता है : रंगमंच प्लेग जैसा है क्योंकि हमें यह देखने के लिए उकसाता है कि हम वास्तव में अंदर से कैसे हैं। यह हम पर दबाव डालता है ताकि हम बाहरी मुखौटे को गिराकर झूठ, पाखंड, पंगुपन का पर्दाफ़ाश होने दें।” आर्तो लिखते हैं “मैं दर्शकों को सीधी मुठभेड देना चाहता हूँ, प्लेग के लिए प्लेग ही देना चाहता हूँ, ताकि वे डर जाएँ, जाग जाएँ। मैं उनको जगाना चाहता हूँ। उनको यह एहसास नहीं कि वे मर चुके हैं। उनका मरना, उनका अंधा, उनका बहरा होना, यही मेरी व्यथा है जिसे मैंने सामने रखा है। हां मेरी और हर उसकी व्यथा जो ज़िंदा है।”
आर्तो रंगमंच की तुलना प्लेग से इसलिए नहीं करते कि यह एक संक्रमण और छूत की बिमारी है बल्कि उसके प्रभाव की बात करते हैं जो भड़कता है और फैलता चला जाता है। आर्तो के अनुसार प्लेग एक महामारी का रूप धारण कर तमाम सामान्य सामाजिक अनुशासन व्यवस्था को ध्वस्त कर देता है ठीक यही काम रंगमंच अपने दर्शकों पर करता है। आर्तो प्लेग की तरह रंगमंच के द्वारा समाज की सारी बीमारियाँ साफ़ करने की बात करते हैं। रंगमंच को प्लेग जैसा प्रभावकारी बनाना चाहते हैं। वे प्लेग की ही तरह रंगमंच में ऐसी ताकत देखते हैं जो अपने फैलाव में ऐसी ताकत पैदा करती है जो विचार (दिमाग) की तरफ़ लौटती है और अंदर चल रहे संघर्ष को प्रेरित करती है; और हम फैंटेसी को अपनी संवेदना में साफ़-साफ़ अनुभव करने लगते हैं। तब एक अवचेतन में खौफभरी स्थिति पैदा होती है जिसमें रहस्यमय स्थिति का भ्रम पैदा होता है, उसका सच सामने आने लगता है और अंधेरे में पुलकित होता दिखाई पडता है।
रंगमंच प्लेग जैसा ही लाभकारी है। यह हमें तमाम बाधाओं और भौतिक जड़ता को पार कर आमने आपको देखने-समझाने को बाध्य करता है, बने बनाए नियम-कायदे सब टूट जाते हैं और छिपे हुए अंधेरे के पीछे से इंसानी शक्ति उजागर होती है। यह शक्ति इंसान को साहस, नैतिकता के साथ परिस्थितियों के सामने सर उठाकर खड़ा होने की शक्ति देती है।
रंगमंच और क्रूरता – यह हर तरह के आधिपत्य से मुक्त और आडम्बरहीन रंगमंच की एक विद्रोही अवधारणा है, आर्तों के इस अवधारणा को हिंसा के सन्दर्भ में नहीं बल्कि नवीन सृजन के सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए। यहाँ क्रूरता का अर्थ कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे धरती का सीना फड़के कोई नया बीज पनपता है। आर्तो कहते हैं कि “किसी भी कर्म को अभिनीत करना क्रूरता है। क्रूरता के रंगमंच का विचार जनमानस के रंगमंच को प्रस्ताव देना है, उसको अपनाना है। इसलिए हमें रंगमंच का पुनर्निर्माण करना चाहिए। हम रंगमंच की समझ खो चुके हैं। हमारी मनःस्थिति उस छोर तक जा पंहुची है जहाँ उस रंगमंच की नितांत आवश्यकता है, जो हमारे दिलों की धडकन, हमारे धैर्य और हमारी इन्द्रियों को जागृत करता है। विरासत में मिले ध्यान को भटका देनेवाली आदतों के चलते हमने उस गहन सूक्ष्म रंगमंच के विचार को भूला दिया है जिसमें हमारे अपने पूर्व ज्ञान को नष्ट कर देने की शक्ति है। अपने आपमें उस गहन और उग्र विचार के साथ जिसको संकीर्ण कर सीमित कर दिया गया है। रंगमंच को एक विश्वास करनेवाली वस्तु बनाया जाय जो भावना और चेतना के स्तर पर आगे बढ़ाई जा सके। एक ऐसा रंगमंच जो अपने में पूरी कायनात समेटे नए बिम्बों के साथ दर्शकों से सीधा संवाद करे। यहाँ मंचीय घटनाओं में इतनी जीवन्तता हो कि वो पहले से नपी तुली तमाम तैयारियों को झटके में तोड़ दे। एक ऐसा रंगमंच जहाँ ज़िंदगी अपना सब कुछ खो दे और दिमाग सब पा ले।”
क्रूरता के अर्थ को प्रतिपादित करते हुए आर्तो का मानना है “क्रूरता मेरे विचार की सहयोगी नहीं यह तो हमेशा से ही रंगमंच मौजूद थी। मैं क्रूरता या निर्ममता का उपयोग, जीवन्तता की भूख, ब्रह्मांडीय पूर्णता, न चुकनेवाली अनिवार्यता, इस कायनात में बसे उसके रूप, अंधेरे में समेटे रहस्यमय भवंर के रूप में लेता हूँ। जहां जीवन के लिए अनिवार्य रूप में क्रूरता की आवश्यकता है। इस कष्ट को उठे बिना जीवन का चक्र चलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही अर्थों में क्रूरता का अर्थ प्रतिपादित किया जाना चाहिए। प्रत्येक वस्तु जिसका जीवन जड़ नहीं, वह क्रूरता के लिए है। उदाहरणार्थ : जब बच्चे का जन्म होता है तो पीड़ा क्या होती है, जन्मदाता जानती है। मृत्यु हो या जन्म, दोनों में सामान क्रूरता है। भूख, प्रेम, आग, वर्षा, इस पृथ्वी का स्वभाव सभी क्रूरता लिए हुए हैं। गति की ज़रूरत में परिवर्तनशीलता, अंधेरे के लिए रौशनी, पदार्थ के लिए जीवन भाव, जड़ से चेतन का भाव, संघर्ष से पीड़ा तक सभी में क्रूरता निहित है।”
क्रूरता का रंगमंच : पहला घोषणापत्र – 1933 से 34 के बीच लिखित आर्तो की यह रचना उनके रंगमंच सम्बन्धी खोजों को प्रस्तुत करती है जिसमें वे रंगमंचीय तकनीक, प्रयोग वस्तु, प्रदर्शन, अभिनय, भाषा, संगीत उपकरण, प्रकाश, वेशभूषा, मंच-सभागार, मंच सामाग्री, सजावट, सामयिकता, प्रस्तुति, अभिनेता, नाट्यलेख आदि विषय पर अपने विचार रखते हैं। क्रूरता का रंगमंच यह शीर्षक देने से पहले आर्तो सर्व रसायन रंगमंच (The all chemical Theatre), अधिभौतिक रंगमंच (The metaphysical theatre), सत्यपरिक्षा का रंगमंच (The theatre of the doily), विकास का रंगमंच (The theatre of evolution), चरम रंगमंच (The theatre of  the absolute) आदि नामों पर विचार कर रहे थे।
आर्तो और अभिनेता – अभिनेता एक क्रियाशील व्यायामी की अवधारणा आर्तो रेड इंडियंस के पयोते नामक नृत्य से प्रेरित होकर किया था। अभिनेता को आर्तो ने भावनात्मक स्तर पर कसरत करनेवाला व्यक्ति भी कहा है। वे अभिनेता को रंगमंच का एक प्रमुख कारक मानते हुए कहते हैं “क्योंकि प्रस्तुति की सफलता उसके अभिनय की प्रभावशीलता पर निर्भर करता है।” एक सच्चे अभिनेता का मकसद है मंच पर जीवन को जीवंत तरीके से जीना और उसे शाश्वत साकार करना है। आर्तो कहते हैं “अभिनेता मेरे लिए एक भावनात्मक व्यायामी की तरह है जो एक ही समय में भावों का संचार, उनका संचालन और अभिनय करता चलता है। मंच पर अभिनय करते समय वह अपने को विभाजित करता है और भावनात्मक संघटन की स्थिति प्राप्त करता है।”
आर्तो का नाटक द सेंसी – एल्फ्रेड जैरी थियेटर द्वारा क्रूरता के रंगमंच का एक मात्र प्रयोग नाटक द सेंसी असफल साबित होता है। यह नाटक सोलहवीं सदी की एक सत्य घटना पर आधारित थी। फ्रांको सेंसी (1549-1598) रोम का एक निर्दयी संभ्रांत व्यक्ति था। सात बच्चों की माँ बनने के पश्चात इसकी पत्नी का देहांत हो जाता है। तत्पश्चात वह एक अत्यंत ख़ूबसूरत महिला पेत्रोनी से ब्याह और अपने बेटों की हत्या और बेटी के साथ बलात्कार करता है। उसकी एक बेटी अपने बाकि बचे भाइयों तथा सौतेली माँ के साथ मिलकर सेंसी की हत्या की योजना बनाती है। अन्तः भाड़े के हत्यारों के द्वारा सेंसी की क्रूर हत्या कराई जाती है। साजिशकर्ता पकड़ लिए जाते हैं और उनपर मुकद्दमा चलाया जाता है। सेंसी की हत्या के जुर्म में रूढ़िवादी पोप सबका सिर कलम कर देने का हुक्म देता है।
इस नाटक के बारे में आर्तो का कथन था “यह नाटक दर्शकों के लिए आग के स्नान घर में घुसने के सम्मान होगा। दर्शक अपनी आत्मा और स्नायु के कंपन के साथ प्रदर्शन में भाग लें।” नाटक का पूर्वाभ्यास अत्यंत दैनीय स्थिति में चला रहा था। अभिनेताओं के समझ में ही नहीं आता कि आर्तो उनसे क्या चाहते हैं। बहुत सारी कठिनाइयों के बावजूद इस नाटक का प्रथम प्रदर्शन 7 मई 1935 हुआ, जो दर्शकों के लिए एक दुस्वप्न सबित हुआ और मात्र सत्रह प्रदर्शनों के पश्चात नाटक बंद हो गया।
द थियटर एंड इट्स डबल – आर्तो द्वारा रंगमंच पर लिखित निबन्धों का यह संग्रह मात्र नहीं बल्कि एक ऐसी दुर्लभ रचना है जो रंगमंच की नब्ज़ को पकड़ती है, पूर्वी रंगमंच की समझ और आधुनिक रंगमंच में मिथकों की अनिवार्यता पर ज़ोर देती है।
अंततोगत्वा -“यह है वह – अविश्वनीय, हां – अविश्वसनीय, यह अविश्वसनीय ही है, जो सच है।” जैसे ख़याल थे जो आर्तो के अकेलेपन की उपज थे। आर्तो अब अजीब हरकतें कर रहे थे। कभी डब्लिन की गलियों में अपनी छड़ी हिलाकर लोगों को अपने अभिनय में साथ देने की ज़िद्द करते तो कभी ईसा की शक्ति को आर्तो के अंदर समाहित करने का ख्याल करते। जीवन के अंतिम वर्षों में आर्तो बंदी बना लिए जाते हैं और लगभग नौ साल तक पागलखानों में इलाज के नाम पर बिना बेहोश किए बिजली के झटकों की यातना सहने पर मजबूर कर दिए जाते हैं। आर्तो ताउम्र अपने रंगमंच की खोज में लगे रहे। आर्तो अपने टूटे फूटे शब्दों में कहते हैं “मुझे मालूम है मेरा व्यवहार धीरे-धीरे खराब होता जा रहा है। मैं जब भी अपनी छड़ी का इस्तेमाल करता हूँ, मुझे अपने भीतर अयोग्यता और आत्मा में खालीपन का अनुभव होता है।”
आर्थर अदामव, मार्थ रॉबर्ट, ब्रेटो जूवे, ब्राक, पिकासो, गिआकोमेती, सार्त्र, सिमोन आदि के प्रयासों से आर्तो को पागलखाने से निकालकर एक निजी चिकित्सालय में रखा जाता है, जहाँ अपनी बची खुची उर्जा वो वॉनगॉफ के चित्रों के देखने के पश्चात एक महत्वपूर्ण आलेख लिखने में लगते हैं। 52 वर्ष की अवस्था में पीड़ा, यातना, अस्वीकार और अकेलपन से जर्जर हो गए आर्तो 4 मार्च 1948 को अपने पलंग के पास शांति से बैठे हुए पाए जाते हैं। यह मृत्यु और सुकून का आलिंगन था।
यह सबकुछ आर्तो का पागलपन था या वो कुछ कह रहे थे जिसे विश्वयुद्ध के दौरान कोई समझने को तैयार नहीं था ! आर्तो भौतिकता से आध्यात्मिकता, वास्तविकता से कल्पना की ओर उड़ान भरनेवाले जिस रंगमंच की परिकल्पना कर रहे थे उसके लिए शायद उस वक्त दर्शक और नाट्य समीक्षक तैयार नहीं थे। क्रूरता के रंगमंच के जनक के ऊपर क्रूरता के बावजूद विश्व रंगमंच के आकाश में आर्तो और उनका रंगमंचीय चिंतन आज एक ऐसी चमकती पहेली है जिन्हें सुलझाया और समझा जान अभी शेष है। 

Thursday, July 30, 2015

प्रगतिशील और क्रांतिकारी लोग गलती नहीं बल्कि ऐतिहासिक गलतियां करते हैं!

कार्ल मार्क्स ने प्रिय कवि के रूप में ग्रीक नाटककार और कवि एक्सकिलस, विश्वप्रसिद्ध अँगरेज़ कवि व नाटककार शेक्सपियर, और गेटे का नाम लिया और प्रिय गद्य लेखक के रूप में दिदारो का। फ्रेडरिक ऐंगल्स कवि के रूप में दे वोस, शेक्सपियर, आरिओस्टो और गद्यकार के रूप में गेटे, लेसिंग, ड़ॉ. जामेलसन का ज़िक्र करते हैं। लेकिन "भारतीय अति-क्रांतिकारियों" और "ज़रूरत से ज़्यादा प्रगतिशील" लोगों को इन सभी के अलावे वेद, पुराण, बुद्ध, महाबीर, तुलसी, कबीर, सूर, व्यास, वाल्मीकि, भास, शूद्रक, कालिदास, ग़ालिब, मीर, मोमिन, भारतेंदु, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि से बिना जाने, पढ़े, गुने ही लगभग नफ़रत है। वे इन्हें बुर्जुआ, यथास्थितवादि, सामंती मानसिकता से ग्रसित और पता नहीं किन किन मूर्खतापूर्ण उपाधियों से बिना पढ़े ही नवाज़ देते हैं। वो यदा कदा पाश, मुक्तिबोध, धूमिल, परसाई, गोरख पांडे आदि के नाम तो ले लेते हैं लेकिन यहाँ भी लगभग एहसानी मुद्रा ही अपनाए रहते हैं; जैसे इनके प्रमाणपत्र के बिना उपरोक्त लेखकों की सार्थकता ही मैली हो जाएंगीं। वैसे प्रमाणपत्र बाँटते इन महानुभावों को इनकी बस उन चार-चार पंक्तियों से ही स्नेह है जो यदा-कदा इन्हें अपनी बात को सही साबित करने के लिए कोट करने के काम आते हैं। उदाहरणार्थ - अब उठाने ही होंगें अभिव्यक्ति के खतरे। इन पंक्तियों के अलावा मुक्तिबोध आज भी इनके लिए अँधेरे में ही हैं।
अब ऐसे महाविद्वान लोग यदि पंडित रविशंकर और कलाम को सशर्त श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने का सहस करते भी हैं तो इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पंडित रविशंकर इनके लिए एक कलाकार नहीं बल्कि सामन्ती कला के पोषक हैं और कलाम एक वैज्ञानिक, शिक्षक और भारत के राष्ट्रपति नहीं बल्कि मिडिया द्वारा प्रसिद्द किया गया नाम यानी मिसाइल मैन हैं।
मार्क्स सादगी और एंगेल्स प्रफुल्लता को इंसान का मूल्यवान गुण मानते हैं लेकिन यह बेचारे अतिक्रान्तिकारी-प्रगतिशील अपनी मूढ़ता और अज्ञानता में ही प्रसन्न हैं। उनके लिए मार्क्स का यह कथन कि Nihil humani a me alienum puto (सब मानवीय गुण-अवगुण मेरे लिए पराए नहीं हैं।) और एंगेल्स का यह कथन का कि "सब सहजता से ग्रहण करो।" का कोई अर्थ नहीं रह गया है शायद।
अब इन्हें कौन बताए कि बिना मानवतावादी हुए न तो कोई क्रांतिकारी हो सकता है ना ही प्रगतिशील। समय निकालकर भगत सिंह को ही पढ़ लेते तो यह छोटी सी बात न जाने कब की समझ में आ जाती। वैसे इनसे सार्त्र, कामू आदि पढने की चाहत भी रखना मूर्खता का ही परिचायक है। इन्होंने मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ भी पढ़ा होगा और पढ़ा तो समझा भी होगा, इसपर मुझे गहरा संदेह हैं।
मार्क्स ने सही कहा है - De omnibus dubitandum (सब कुछ संदेह योग्य है।) लेकिन यह तो मार्क्स के भी पिताश्री हैं। कहते हैं "सबकुछ संदेह योग्य है सिवाए मार्क्सवाद के। शायद ऐसे ही मूढ़ों पर खिन्न होकर मार्क्स को कहना पड़ा था - यदि ऐसे है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ।
बाकि अन्य लकीर के फ़क़ीर पिटनेवाले विचारों और व्यक्तियों की पूजा करनेवालों के लिए क्या कहा जाय उनके लिए तो महामूर्खता और पिछलग्गूपना ही सबसे बड़ा संविधान और देशभक्ति का प्रमाणपत्र है। जो इनसे अलग सोचता है वो देशद्रोही है और उसे फ़ौरन ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए!
खैर, अब यह किससे कहा जाय कि आलोचनात्मक समीक्षा एक निहायत ही ज़रूरी चीज़ है लेकिन उसके लिए सही समय, काल, परिस्थिति आदि का चयन करना ज़रूरी है। एक सीनियर कॉमरेड ने किस्सा सुनाया था - चीन में जैसे ही क्रांति हुई लाल सेना ने "धर्म जनता का अफ़ीम है" नामक सूक्ति से प्रेरणा लेकर तमाम धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। अपने पूजा और पूज्यनीय स्थलों को ध्वस्त होते देख स्थानीय जनता लाल सेना के विरुद्ध प्रतिकार करने को खड़ी हो गई। यह बात जब माओ को पता चली तो उन्होंने फ़ौरन इन स्थलों को तोड़ने से यह कहते हुए रोका कि इन स्थलों में जनता का विश्वास है। पहले एक लंबी प्रक्रिया में इनके मन में बसी सदियों पुरानी मान्यतायों और विश्वास को ख़त्म करो। यदि हम यह करने में सफल हुए तो जनता खुद ही इन स्थलों को ध्वस्त कर देंगीं। और यदि हम ऐसा न कर सके तो जनता हमारे विरुद्ध खड़ी हो जाएगी।
इतिहास हमें सुन्दर भविष्य गढ़ने की शिक्षा देता है और अपनी गलतियों से प्रेरणा भी। लेकिन इसके लिए खुले दिल और दिमाग से अध्ययन करने की आवश्यकता है। मूर्खतापूर्ण व्यवहार और वक्तव्य सनसनी तो पैदा कर सकते हैं लेकिन शायद ही कोई सुन्दर और सार्थक बदलाव का सहयात्री बन सके।
पुनश्च - माओ के बारे में उपरोक्त किस्सा सुना सुनाया है। इसकी ऐतिहासिक सत्यता का दावा करने में तत्काल मैं असमर्थ हूँ।

Wednesday, July 29, 2015

बिना मंच के भारतीय रंगमंच!

कला, संस्कृति और रंगमंच के विकास और बढ़ावा के नाम पर हर ना जाने कितने रूपए स्वाहा होते हैं; किन्तु विकास के सारे दावे ध्वस्त हो जातें हैं जब यह पता चलता है कि देश के अधिकांश शहरों में सुचारू रूप से नाटकों के मंचन के योग्य सभागार तक नहीं हैं. महानगरों में जो हैं भी वे या तो बहुत मांगें हैं या फिर जैसी-तैसी अवस्था में हैं। इसलिए इन पैसों से चंद गिने-चुने जुगाडू रंगकर्मियों और संगीत नाटक अकादमियों में बैठे बाबुओं के व्यक्तिगत विकास के अलावा शायद ही कुछ खास हो पता है। ऐसा कहा जाता है कि कला और संस्कृति किसी भी समाज का आईना होता है। यदि यह सच है तो वर्तमान में समाज और कला संस्कृति की स्थिति क्या है आप स्वयं ही अनुमान लगा सकतें हैं। हमारे भारतीय समाज की ज़रूरतों में रंगमंच का स्थान न्यूनतम से न्यूनतम है। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो पुरे देश का रंगमंच मूलभूत सुविधाओं तक से अब तक महरूम है।
मानकता के पैमाने पर भारत में बहुत ही कम ऐसे सभागार हैं जो रंगमंच की दृष्टि से एकदम सही माने जा सकतें हैं। जो भी हैं उनमें से ज़्यादातर सभागार जुगाड़ भिड़ाकर नाटक के लायक किसी तरह बना भर लिए गए हैं। यहाँ जितने भी सभागार बनाये गए हैं वे मूलतः बहुआयामी उपयोग के लिए हैं। भारत के चंद गिने चुने शहरों में जहाँ रंगमंच में एक निरंतरता है वहाँ की स्थिति आंशिक रूप से कुछ बेहतर कही जा सकती है, पर वहाँ भी केवल एक या दो सभागार ही काम लायक हालत में कहे जा हैं। कई सभागार तो रख-रखाव के आभाव में धूल के भंडार में तबदील हो गए हैं। प्रकाश के उपकरण इतने बेदर्दी से टंगे होतें हैं कि कब अभिनेताओं के ऊपर गिर पड़ें पता नहीं। जहाँ तक सवाल पूर्वाभ्यास के स्थलों का है तो कभी कोई पार्क, कोई मैदान, कोई सरकारी, गैर-सरकारी स्कूल का खाली कमरा, खँडहर पड़ा कोई मकान या किसी आस्थावान रंगकर्मी का घर ही अमूमन पूर्वाभ्यास स्थल बनते हैं। आइये कुछ शहरों का जायजा लिया जाय, हिन्दुस्तानी रंगमंच का नंगा यथार्थ भी इसी के आसपास है।
मध्यप्रदेश का शहर जबलपुर। तीन सक्रिय रंग-मंडलियां हैं। साल में तीन राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन होता है। समागम रंगमंडल द्वारा रंग-समागम, विवेचना द्वारा रंग-परसाई व विवेचना द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह। इन नाट्योंत्सवों में देश के अलग-अलग शहरों के नाट्यदल अपने नाटकों का प्रदर्शन करतें हैं। यहाँ कुल तीन सभागार हैं। पहला, शाहिद स्मारक ट्रस्ट का सभागार है, उसका किराया लगभग पन्द्रह हज़ार रूपया प्रतिदिन है। दूसरा, तरंग जो मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी का सभागार है, इसका किराया तीस हज़ार रुपये प्रतिदिन और तीसरा नगर निगम का सभागार मानस भवन है, जिसका किराया पच्चीस हज़ार रूपया प्रतिदिन है। किसी भी सभागार में प्रकाश और ध्वनि यंत्रों की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। जहाँ तक सवाल पूर्वाभ्यास के स्थानों का है तो उसका कोई निश्चित स्थान नहीं है। कभी किसी स्कूल का मैदान, कभी कोई हॉल यहाँ पूर्वाभ्यास स्थल बनता है।
डोंगरगढ़, मध्य प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा है। कोई सभागार नहीं है । मंच अस्थायी बनता है व पंडाल लगाना होता है । साउंड सिस्टम नजदीकी जिले से आता है तथा लाइट भिलाई से मंगाना पड़ता है। वास्तविक खर्च पचास हजार से ज्यादा बैठता है जो जनसहयोग से जैसे-तैसे जुटाया जाता है। पूर्वाभ्यास के लिए कोई जगह नहीं है।
रायगढ़, छतीसगढ़। चार-पांच लाख की आबादी वाले इस शहर में कोई रंगशाला नहीं है। पॉलिटेक्निक कॉलेज का ऑडिटोरियम है जिसे पक्के तौर पर एक सामान्य हॉल कहा जा सकता है। ऑडिटोरियम के निर्माण में किसी भी तरह की तकनीकी जरुरत का ध्यान नहीं रखा गया। वहाँ किसी भी कार्यक्रम का आयोजन आयोजक की मजबूरी है। आज उसे बने लगभग 30-32 वर्ष हुए। कभी कोई बड़ा मेंटेनेंस नहीं किया गया। सीट, ग्रीन रूम की हालत खराब है। लाइट, साउंड किसी तरह लगाया जाता है। सभागार में वेंटीलेशोंन भी नहीं है सो गर्मी के दिनों में अभिनेता-दर्शक सब पसीने में सराबोर होतें हैं। किराया है तीन हज़ार है लेकिन नाटक लायक बनाने में 12-15,000 पड़ता है। इन जुगाड़ को करने में जो मानसिक त्रास से आयोजकों को गुजरना पड़ता है उसकी कोई कीमत नहीं। इप्टा साल में दो एक आयोजन करती है , राष्ट्रीय नाट्योत्सव खुले मैदान में एक चालू हाल बना कर किया जाता है जिसमें 600-700 लोगों के बैठक व्यवस्था होती है। 5 दिनों का खर्च आता है 1,20,000 रु., याने एक दिन का खर्च 24,000 रु.। यह पूरा खर्च जन-सहयोग से जुटाया जाता है। यह आयोजन पिछले 17 साल से लगातार किया जा रहा है। जिस शहर में ऑडिटोरियम नहीं है तो पूर्वाभ्यास के लिए जगह की उम्मीद नही की जा सकती। वो तो भला हो नगर-निगम वालों का जिन्होंने अपना सभाकक्ष रिहर्सल के मुफ्त में उपलब्ध कराया है। जिस दिन इस सभागार में कोई कार्यक्रम होता है उस दिन रिहर्सल बंद। हाँ, अभी  6-7 माह पहले एक सरकारी सभागार के निर्माण का कार्य आरम्भ हुआ है।
रायपुर, छत्तीसगढ़ की राजधानी। पूरी दुनियां में भारतीय रंगमंच का परचम लहरानेवाले हबीब तनवीर की कर्मभूमि। सभागार के नाम पर महाराष्ट्र मंडल का प्रेक्षागृह, कालीबाड़ी का रवीन्द्र मंच, शहीद स्मारक का प्रेक्षागृह, मेडिकल कालेज का प्रेक्षागृह और रंगमंदिर है, किन्तु इनमें से एक भी तकनीकी दृष्टि से नाट्य मंचन के लिए उपयुक्त नहीं । उसका किराया और प्रबंधकों का व्यावसायिक नजरिया रंगकर्मियों को निराश करता  है।
राँची, झारखण्ड। खनिज पदार्थों से भरे इस राज्य की राजधानी में कोई लगातार सक्रिय रंगमंच की गतिविधि नहीं है ना ही रंगमंच के लिए कोई सभागार ही है। साल में दो-चार नाटक जैसे-तैसे, जिस तीस सभागार में किसी तरह हो जातें हैं। नाटकों के पूर्वाभ्यास अमूमन किसी के घर या किसी उपलब्ध जगह पर संपन्न किया जाता है। ऐसा सुनाने में आता है कि किसी ज़माने में राँची रगमंच काफी सक्रिय था। राँची का रंगमंच हर तरह से जर्जर हालत में है। किन्तु आज भी कुछ जुनूनी लोग जैसे-तैसे साल में एकाध नाटक कर लेतें हैं।
कोटा, राजस्थान में एक रिवोल्विंग स्टेज है जो पिछले कई सालों से बंद पड़ा है। कहा तो ये भी जाता है कि यह हिंदुस्तान का पहला रिवोल्विंग स्टेज था, किन्तु इस बात में कितनी सच्चाई है इसकी परख होनी अभी बाकि है। कोटा के पास ही जबलपुर सिटी है। यहाँ भवानी नाट्यशाला हैं। जिसकी स्थापना 1920 में हुई थी। आज ये भी बंद है। किसी ज़माने में यहाँ बड़े-बड़े नाटक और ऑपेरा का मंचन हुआ था। कोटा में कुल पांच सभागार हैं। सब के सब प्राइवेट। जिनका किराया 15,000 -30,000 रूपया प्रतिदिन है। वर्तमान में, केवल एक नाट्य दल एक्टिव है – पेरफिन। दर्शकों की कोई कमी नहीं है। रिहर्सल के लिए स्कूलों से मदद ली जाती है।
झाँसी और ग्वालियर, मध्यप्रदेश। झाँसी में केवल एक सभागार है जो रंगमंच क्या किसी भी कार्यक्रम के लिए उपयुक्त नहीं है। ग्वालियर में दो सभागार हैं – मेडिकल सभागार एवं एमएलबी सभागार। इनका एक दिन का किराया तीस से चालीस हज़ार रूपया है। उसपर भी लाईट और साउंड की कोई व्यवस्था नहीं है। जहाँ तक सवाल नाटकों के पूर्वाभ्यास का है तो वो किसी पार्क या किसी के घर पर की जाती है। सक्रिय नाट्य दल भी ज़्यादा नहीं हैं।
हिसार, कुरुक्षेत्र, सोनीपत हरियाणा। यहाँ जितने भी सभागार हैं वो सब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के हैं। दो-तीन के लाईट और साउंड ठीक हैं पर वो नाटकों के लिए बहुत कम ही उपलब्ध हो पातीं हैं। सभागार का किराया दस हज़ार है पर बहुत शिफारिश के बाद ही उपलब्ध हो पाती है। नाटकों के पूर्वाभ्यास किसी छत पर, स्कूल में या कुरुक्षेत्र में मल्टी आर्ट में होतें हैं। हरियाणा में कुल सात-आठ नाट्यदल हैं किन्तु स्थिति अनुकूल नहीं है। यहाँ किसी भी शिक्षण संस्थान में रंगमंच नहीं पढ़ाया जाता।
पटना और बेगुसराय, बिहार। बिहार आजकल सुशासन की आंधी में उड़ रहा है। बेगुसराय का रंगमंच का मुख्य केंद्र दिनकर भवन है। ये भी एक कामचलाऊ सभागार है जहाँ नाटकों के प्रदर्शन और पूर्वाभ्यास होता है। प्रकाश और ध्वनि की कोई व्यवस्था नहीं है। वैसे, रिफायनरी टाउनशिप में जुबली हॉल और ऑफिसर्स क्लब में एक सभागार है जहाँ कभी-कभी नाटक होतें हैं। दिनकर भवन का एक दिन का किराया एक हज़ार रुपया है जिसे अब प्रसाशन 5000 रूपया करने जा रहा था पर स्थानीय रंगकर्मियों के विरोध की वजह से ये फैसला वापस ले लिया गया। पटना में वैसे तो नवनिर्मित प्रेमचंद रंगशाला, भारतीय नृत्य कला मंदिर, रविन्द्र भवन आदि सभागार हैं किन्तु रंगमंच का केन्द्र अभी भी कालिदास रंगालय ही है। यहाँ प्रकाश और ध्वनि की सुविधा तो है किन्तु तकनीक बहुत पुरानी है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद बिहार आर्ट थियेटर का कालिदास रंगालय पटना रंगमंच को हर संभव सहायता प्रदान करता है। वहीं तमाम आधुनिक सुविधाओं और कलाकारों के एक लंबे संघर्ष के बाद मुक्त हुआ राजकीय प्रेमचंद रंगशाला इतना ज़्यादा मंहगा और रंगमंच के प्रति उदासीन है कि बहुत कम ही रंगकर्मी वहां अपने नाटकों के प्रदर्शन के बारे में सोचतें हैं।
ये विकास का नारा बुलंद किये हिंदुस्तान के कुछ शहरों की तस्वीर है। गाँव की स्थिति का अंदाज़ा अपने आप ही लगाया जा सकता है। हिंदुस्तान का रंगमंच आज कहाँ खड़ा है।
यह है कुछ शहरों में साभगारों की स्थिति। आप अपने शहर का हाल बताइए।
आलेख में सहयोग के लिए समागम रंगमंडल (जबलपुर), दिनेश चौधरी (डोंगरगढ़), अपर्णा श्रीवास्तव (रायगढ़), मोना सिन्हा (राँची), राजेन्द्र पंचाल (कोटा), हिमांशु द्विवेदी (झाँसी), रवि मोहन (हिसार), दीपक सिन्हा (बेगुसराय) को आभार.

Tuesday, July 28, 2015

अनुदान के अँधेरे का ब्रह्मराक्षस

अपवादों को छोड़ दिया जाय तो हिंदी समाज में रंगमंच आर्थिक मामलों में कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया और ना हीं कभी आवाम की ज़रूरतों में ही शामिल हो पाया है। इसीलिए टिकट खरीदकर नाटक देखने की प्रथा का विकास होना संभव ही नहीं हुआ। इसके केन्द्र में रंगमंच का अव्यावसायिक चरित्र के साथ ही साथ रंगकर्मियों के अंदर स्वयंतसूखाय विशिष्टताबोध है। वहीं कला और संस्कृति के प्रति समाज और सरकार का क्या नज़रिया है यह बात भी किसी से छुपी नहीं है।
तमाम खूबियों खामियों के बावजूद कभी पारसी रंगमंच और नौटंकी जैसी विधा अपने पैरों पर खड़े थे लेकिन सभ्य और आधुनिकता का चोला धारण किए महानगरीय रंगकर्मियों ने अमूमन इसे हेय दृष्टी से ही देखा और पश्चिम की हास्यास्पद और बेलगाम नक़ल करने में ही अपनी महानता समझी। हालांकि यह भी सच है कि व्यावसायिक कला की अपनी शर्तें, ज़रूरतें, जोड़-तोड़ और खूबियां-खामियां हैं जिसे स्वीकार करना सबके वश की बात नहीं। किन्तु समय-समय पर ऐसी नाट्य मंडलियां विकसित हुईं जिसने अपनी शर्तों पर भारतीयता से सराबोर रंगमंच किया और व्यावसायिक सफलता भी अर्जित किया। बिहार के लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के रंगमंच को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि देश भर में भीखारी ठाकुर जैसे अनगिनत कलाकार हुए। किन्तु समस्या यह है कि हमने रंगमंच की इस परम्परा को विकसित करना तो दूर, ओपनिवेशिक मानसिकता से सराबोर हो इसे ‘नचनियां-बजनियां’ जैसी घटिया उपाधियों से ज़्यादा भाव नहीं दिया।
जिस प्रकार भारतीय समाज में कई वर्ग, वर्ण आदि हैं ठीक उसी प्रकार भारतीय रंगमंच के अंदर ही अघोषित रूप से वर्गों वर्णों का निर्धारण है। यहाँ रंगमंच की कई धाराएं प्रवाहित होतीं हैं - कोई ब्रह्मण है, कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य तो कोई शुद्र। इन सबमें एक बात कॉमन है कि जितनी भी नाट्य संस्थाएं कार्यरत है उनका मूल चरित्र अमूमन व्यक्ति केंद्रित है। एक खास व्यक्ति उस संस्था पर मालिकाना हक रखता है और बाकि या तो वहां सहयोगी की भूमिका में होते हैं या फिर मज़दूर की भूमिका में। किसी ज़माने में उस व्यक्ति को मलिकजी की उपाधि प्राप्त थी और आज निर्देशक की। इनकी इच्छा ही संस्थाओं का संविधान है। जो इसका सम्मान करता है वह साथ है नहीं तो बाहर।
संस्कृत नाटकों के काल में कला और संस्कृति ‘राज’ के संरक्षण में पोषित था वहीं कुछ को धार्मिक स्थलों का संरक्षण भी मिला। बाकि जो पारंपरिक कलाएं थी उनके संरक्षण और विकास पर कभी ढंग से बात ही नहीं होती। अंग्रेज़ी राज में भारतीय कला-संस्कृति कलाकारों के जुनून के सहारे ज़िंदा रही और यही जूनून आज भी कायम है। किन्तु जहाँ तक अर्थ यानि मुद्रा का सवाल है वहां स्थिति आज भी दैनीय ही है। 1947 के बाद कई सारी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं अस्तित्व में आईं और कला-संस्कृति के विकास और प्रश्रय देने के लिए विभिन्न प्रकार के अनुदान देने की घोषणा की गईं। खैरात की तरह यह अनुदान बांटे जाने लगे और कमिशनखोरी नामक सांस्कृतिक भ्रष्टाचार बड़े ही शान से पनपने लगे। लोग बड़े गर्व के साथ अपने शिष्यों या शिष्य के शिष्यों को अनुदान से अनुग्रहित करने लगे और शिष्य इसे भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करने लगे। भगवान को प्रसाद चढ़ाने की महान भारतीय परम्परा का विकास यहाँ भी ज़ोर-शोर से होने लगा। जिन्हें प्रसाद मिला वो जय-जयकार में और जिन्हें नहीं मिला वो ‘मुर्दाबाद’ में व्यस्त हो गए। इस बात से भी कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ लोग और संस्थाएं आज भी है जो अनुदान के पैसे का समुचित और लोकतांत्रिक इस्तेमाल करतीं है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि एक अर्ध-सामंती, अर्ध-ओपनिवेशिक और पूंजीवादी समाज में पूँजी की भूमिका निर्णायक होती है। इस प्रभाव से हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध भी अछूते नहीं रहते। संस्थाएं चुकी व्यक्तिगत इच्छा से संचालित हैं इसलिए इनको मिला अनुदान पर भी किसी एक व्यक्ति का मालिकाना हक हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं। अब यह उस व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर होने लगा है कि वह ग्रांट रूपी प्रसाद का अकेले सेवन करे या सामूहिक। नैतिकता के पतन, सामूहिकता का गर्वपात और भ्रष्टाचार की सामूहिक स्वीकृति वाले वर्तमान समय में नाट्य संस्थानों का एक एनजीओ के रूप में परिवर्तित हो जाना दुखद तो है किन्तु आश्चर्यजनक नहीं।
ज्ञातव्य है कि भारतीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर दिए जा रहे यह सरकारी अनुदान जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा हैं जिन्हें चंद मौकापरस्त लोगों ने बंदरबांट का खेल बना रखा है। अनुदान किसे दिया जा रहा है और सही जगह पर खर्च हो रहें हैं या नहीं इसकी चिंता किसी को नहीं। जैसे-तैसे नाटक करके अनुदान ग्रहण करनेवाली संस्था कुछ प्रमाणों के साथ खर्चे का व्योरा भेज देतीं हैं और अगले अनुदान की चिंता में व्यस्त हो जातीं हैं। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार का बोलबाला नहीं तो और क्या होगा? आखिर यह किसकी ज़िम्मेदारी है कि वो यह देखे कि जिस व्यक्ति या संस्था ने अनुदान के लिए आग्रह किया है वह उसके योग्य भी है या नहीं। वैसे रंगकर्मियों के नैतिक पतन के उदाहरणों की भी आज कोई कमी नहीं है। जिस चीज़ के लिए अनुदान दिया गया है उसकी उस व्यक्ति या संस्था के पास कोई समझ हो न हो, जैसे तैसे नाटक करके, अखबार की कतरन, चंद फोटो, ब्रोशर आदि प्रमाणपत्र के रूप में संलग्न कर दिया जाता है, बस बन गया काम। कहने का अर्थ यह कि सारा काम कागज़ी और यथार्थ हवा-हवाई व कमाई करने का साधन बन गया है।
रंगमंडल अनुदान की हालत तो और भी खराब हैं। इसके तहत किसी समूह को रंगमंडल चलाने के लिए अनुदान दिया जाता है। जिसमें एक निर्देशक समेत कई कलाकारों को आर्थिक सहायता प्रदान किया जाता है। किन्तु कई समूहों में इस अनुदान की हालत यह कि निर्देशक छोड़ किसी भी अभिनेता या अन्य को उतने राशि का भुगतान नहीं किया जाता जितने पर कि वह हस्ताक्षर करता है। निर्देशक इतनी भी राशि इस गर्व के साथ अभिनेताओं को प्रदान करता है जैसे वो अपनी ज़मीन बेचकर दे रहा हो और यह एक एहसान है जिसे इन तुच्छ अभिनेताओं को जीवनभर याद रखना चाहिए। किसी ने मुंह खोला तो बाहर का दरवाज़ा खुला हुआ है। निर्देशक चंद पैसों पर किसी भी अभिनेता को नचा सकता है और अपनी मर्ज़ी सब पर लाद सकता है, ऐसी अघोषित संविधान है। वहीं ऐसे अभिनेताओं की भी कमी नहीं जो पैसे के लिए किसी के पास भी नाच सकते हैं। दुखद सच तो यह है कि इस खेल में राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गज और सम्मानित रंगकर्मी बड़े गर्व से शामिल हैं और नाट्यचिन्तक मौन। ऐसे समय में नैतिकता का सारा भार नई पौध पर नहीं थोपा जा सकता।
जिस समाज और व्यवस्था के कण-कण में भ्रष्टाचार का प्रवेश हो चुका है वहां कोई एक अंग दूध का धुला होगा ऐसा, यह संभव नहीं। इस व्यवस्था के कण-कण में दीमक लग चुका है जिसे केवल पूंजी और ताकत की भाषा सुनाई पड़ती है, बिना इसे बदले किसी भी प्रकार के बदलाव की आशा दिवास्वप्न होगा। जिनलोगों ने विकास का फरेब करके पुरे देश को विदेशी ताकतों के हाथों में गिरवी रख-रखा है उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। इतिहास गवाह है कि इस व्यस्था में चीज़ें ऐसी ही चली हैं और ऐसे ही चलेगीं। सरकारें या सरकारी पदों पर कुछ लोग बदल जाने ने व्यवस्था नहीं बदलती। मूल प्रश्न यह है कि क्या हमें इसी व्यवस्था में जोड़ तोड़ करके जीवनयापन और रंगकर्म करना है या इसे बदलने के लिए अपनी यथासंभव उर्जा लगानी हैं। भ्रष्टाचार का जिन्न ऊपर से नीचे की यात्रा करता है इसलिए जब तक कोई सामाजिक बदलाव नहीं होता तब तक कोई बड़ा बदलाव संभव नहीं। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए मठ और गढ़ तोड़ने होगें वरना जो कुछ चल रहा है उसे रोकना असंभव है। हां, छोटे-मोटे सुधार हो सकते हैं लेकिन सुधार का अर्थ फटे-सड़े कपड़े पर चिप्पी साटने से ज़्यादा कुछ नहीं होगा।

Monday, July 27, 2015

समकालीन रंगमंच से जुड़े कुछ सवाल-जवाब

मेरा यह साक्षात्कार इप्टानामा के सम्पादक दिनेश चौधरी द्वारा लिया गया। इसे इप्टानामा के नए अंक और कल के लिए नामक पत्रिका के अंक 87-88 में भी पढ़ा जा सकता है।

हिंदी रंगमंच के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
पूंजी, प्रशिक्षण, पूर्वाभ्यास की जगह, नाट्य प्रदर्शन के लिए उचित सभागार आदि मुलभुत ज़रूरतों की कमी एक चुनौती तो है किन्तु हमेशा से ही हिंदी रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह कभी भी जनता की ज़रूरतों में शामिल नहीं हो सका। तमाम वर्गों, वर्णों और जातियों में विभाजित, कला और संस्कृति के प्रति अति-उदासीन हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक नवजागरण के कुछ प्रयास निश्चित रूप से हुए भी लेकिन वह काफी नहीं थे। रंगमंच का यहाँ ऐसा कोई दर्शक वर्ग ही तैयार नहीं हुआ है जो अपनी बदौलत नाटकों और कलाकारों की ज़िम्मेवारी उठाने की क्षमता रखता हो। यहाँ रंगकर्म कभी राजाओं के प्रश्रय में चला तो कभी सामंतो के, तो कभी रंगकर्मियों के जूनून की बदौलत और आजकल सरकारी अनुदानों के तरफ़ हाथ फैलाया जा रहा है।
रंगकर्मी सक्रिय तो हैं किन्तु आज तक इस प्राथमिक सवाल का जवाब नहीं तलाश पाए हैं कि वो रंगमंच कर क्यों रहे हैं! इस महत्पूर्ण सवाल के जवाब के बिना कोई भी कला निरुद्देश्यता का ही शिकार होगा। जो रंगकर्मीं और समूह एक खास विचारधारा के कार्यकर्त्ता बन जनचेतना के लिए काम कर रहे थे, वहां भी बिखराव साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। पिछले कुछ दशकों में जब जन आंदोलनों की दिशा ही भटक गई वैसे में इनके मन में भी अपने वैचारिक आदर्शों और सुन्दर समाज रचने के सपनों को लेकर भटकाव होना स्वभाविक ही था।
व्यवहार की जड़ में विचार होता है। वैचारिकता का भटकाव व्यवहार में साफ़-साफ़ देखने को मिलता है। कला और समाज एक दूसरे के पूरक हैं और आज दोनों ही विकट रूप से वैचारिक संकट की चपेट में हैं। जबतक वैचारिक संकट व्यावहारिक रूप से दूर नहीं होता तबतक व्यवहारिक धरातल पर अराजकता का ही राज रहेगा।

बड़ी पूंजी के आगमन से अन्य संचार माध्यमों की तरह क्या रंगकर्म और उसके सरोकारों को भी प्रभावित किया है?
अर्ध-सामंती, अर्ध-ओपनिवेशिक और पूंजी की महत्ता वाले समाज में पूंजी जब आपसी रिश्तों तक को प्रभावित करने की क्षमता रखती है तो ऐसे समय में यह नहीं कहा जा सकता कि इसने रंगमंच को प्रभावित नहीं किया है। लेकिन मैं अपनी बात को ज़रा दूसरे तरीके से कहना चाहूँगा। बल्कि मैं यह सवाल उठाना चाहूँगा कि जो भी लोग सरोकारों से सराबोर हो रंगमंच कर रहे हैं/थे क्या किसी ने उनका ख्याल रखा? क्या किसी ने यह सोचा की रंगकर्मीं भी इंसान होता है जिसकी कुछ मूलभूत ज़रूरतें हैं जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए। भूखे पेट लंबे समय तक किसी भी विचारधारा का झंडा नहीं ढोया जा सकता है। आज रंगकर्मी (खासकर सरोकारवाले) तमाम प्रकार के समझौते कर रहे हैं तो इसके लिए उन्हें दोष देने से पहले एक बार यह भी सोचना चाहिए कि क्या वो ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं या वो इसके लिए मजबूर हैं।
रंगकर्मी और समाज रंगमंच के दो पहिए हैं। किन्तु दुखद सच यह है कि समाज बीमार है और रंगकर्मी खाली पेट। जब अस्तित्व पर संकट हो तो ऐसे समय में सरोकार से पहले अस्तित्व की लड़ाई लड़ी जाती है। हां, उस लड़ाई की दिशा सार्थक भी हो सकती है और अराजक भी।

क्या “अच्छे दिनों” का राजनैतिक-सामाजिक परिदृश्य रंगकर्मियों के लिए अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का आह्वान नहीं कर रहा?
अच्छे दिनों का नारा एक राजनैतिक फार्स है और किसी भी सजग और सामाजिक सरोकार रंगकर्मीं का सरोकार केवल फार्स मात्र नहीं हो सकता। वैसे भी सार्थक रंगमंच का मूल स्वर ही विरोध का है और इस विरोध के दायरे में हर वो चीज़ आती है जो अप्राकृतिक, अमानवीय और झूठ है। सत्ता चाहे किसी के पास हो, संवेदनशील और सजग रंगकर्मियों ने तो हमेशा से ही अभिव्यक्ति के खतरे उठाए हैं; उठा रहे हैं और उठाते रहेंगें। शायद इसीलिए वो आज किसी के भी प्रिय नहीं हैं। सनद रहे कि मैं यह बात सजग और सामाजिक सरोकार से संपन्न कलाकारों के बारे में कर रहा हूँ लाशों की ढेर पर अपनी रोटी सेंकनेवाले कलाकारों के बारे में नहीं। वैसे भी परजीवी लोग दूसरों की खुराक चूसकर ज़िंदा रहते हैं अपनी खुराक खुद पैदा नहीं करते।

आधुनिक नाटकों में किए जानेवाले अधिकाधिक प्रयोगों ने क्या नाटक और दर्शक के बीच की खाई को और अधिक बढ़ा दिया है?
प्रयोगों के माध्यम से कोई भी कला अपने में नवीनता और प्रगति का समावेश करता है इसलिए प्रयोग को लोकप्रियता या स्वीकार्यता के दायरे से नहीं परखा जाना चाहिए। यदि नवीन प्रयोग न हों तो कला और समाज जड़ हो जायेगा। प्रयोग के विरोध का अर्थ यथास्थितिवादी और जो कुछ भी उपस्थित है वहीं अतिंम सत्य है जैसी अवैज्ञानिक विचार को मानना है। जहाँ तक सवाल प्रयोग की सफलता-असफलता का है तो यह कतई ज़रूरी नहीं कि हर प्रयोग सफल हो ही। केवल रंगमंच ही नहीं बल्कि कृषि, विज्ञान, साहित्य आदि अन्य क्षेत्रों में प्रयोग हो रहें हैं – सफल और असफल हर प्रकार के। प्रयोग होंगें तो वह सफल भी होंगें और असफल भी। इतिहास गवाह है कि मानव ने प्रयोगों के माध्यम से ही प्रगति का रास्ता तय किया है। दुनियां पाषाण युग, लौह युग, स्पेस युग से गुज़रती हुई आज डिजिटल युग में प्रवेश कर गई है। यदि यह प्रयोग नहीं होता तो क्या यह सबकुछ संभव था? मानव ने प्रयोग नहीं किया होता तो हम आज भी जंगलों में रह रहे होते, शिलालेख लिख रहे होते, नंगे घूमते और कच्चा मांस खा रहे होते। मानव पहली बार जो कुछ भी करता है वह प्रयोग ही तो होता है, जो सफल होने पर परम्परा बन जाता है।
जहाँ तक सवाल दर्शकों का है तो उसे अमूमन परिणाम से मतलब होता है प्रक्रिया से नहीं। इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं कि आप इसे दर्शकों तक पहुँचाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, कितना प्रयोग करते हैं; या करते भी हैं कि नहीं। वैसे भी उनके दिमाग में यह गलत धारण बैठा दी गई है कि कला का काम मनोरंजन मात्र करना है। यह सच है कि बोझिलता कोई झेलना नहीं चाहता लेकिन दर्शकों केवल मनोरंजन मात्र ही किसी सार्थक कला का उद्देश्य नहीं हो सकता और दर्शकों को भी इसके लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसा दर्शकवर्ग तैयार करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। यहाँ केवल लकीर के फकीर बनकर मनोरंजन-मनोरंजन और मनोरंजन रटने से काम नहीं चलेगा। मूल समस्या यह है कि हम आज भी नवीनता से खौफ खाते हैं और अमूमन आजमाई हुई चीज़ों को ही खाने, पहनने और देखने में सहजता महसूस करते हैं। वैसे भी जिसे आज हम परम्परा कहते हैं वे भी कभी प्रयोग ही थे। इंसान ने एकाएक ही कोट-पैंट धारण नहीं कर लिया बल्कि यह पत्ते, खाल आदि से होते हुए हज़ारों साल चले प्रयोग का नतीज़ा है। ठीक उसी प्रकार हर काल में रंगमंच ने अपने अंदर प्रयोग के माध्यम से सार्थक बदलाव किए हैं और यह बदलाव कथ्य और शिल्प दोनों ही स्तरों पर साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम आज भी किसी राजमहल में नाट्यशास्त्र में वर्णित बातों को ही अंतिम सत्य मानके कालिदास के नाटकों का ही मंचन कर रहे होते। इसीलिए कला और समाज दोनों में नवीन प्रयोग होते रहे इसी में सबकी भलाई है। वैसे भी जमा हुआ पानी सड़ने लगता है। इसलिए प्रयोगों से डरने की ज़रूरत नहीं है। जो प्रयोग सार्थक होंगे वह अपनेआप ही स्वीकार कर लिए जायेंगें और निर्थक प्रयोग का नकार भी स्वतः ही होता रहेगा।

बड़े शहरों का रंगकर्म छोटे शहरों और कस्बों में होनेवाले रंगकर्म की तरह जन्नोमुख क्यों नहीं है?
इस बात में कोई सच्चाई नहीं कि बड़े शहरों का रंगकर्म छोटे शहरों और कस्बों में होनेवाले रंगकर्म की तरह जन्नोमुख नहीं है। दर्शक हर जगह के रंगमंच का ज़रूरी अंग है और रहेगा। कहीं का भी रंगमच बिना जन (दर्शक) के संभव ही नहीं है। मैं इस बात को नहीं मानता कि कस्बों और छोटे शहरों में नाटक देखने आए लोग ही जन है बड़े शहरों और महानगरों में नाटक देखने आए लोग नहीं। क्या मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, ब्रेख्त, बर्नार्ड शॉ, सार्त्र, कामू आदि के नाटकों में जन सरोकार नहीं हैं? चरणदास चोर जैसा नाटक यदि छोटे शहरों और कस्बों में खेला जाता है तो जन्नोमुख रंगकर्म हो जाता है और वहीं नाटक बड़े शहरों और महानगरों में खेला जाता है तो विलासिता! यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से यह एक दोहरा मापदंड है जो संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। जन सरोकार का शहर, गांव, क़स्बा से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह एक प्रतिबद्धता और वैचारिकता का सवाल है जिसका अभाव कहीं भी हो सकता है – शहर, गांव, क़स्बा, महानगर कहीं भी।

क्या कहानी के रंगमंच ने हिंदी में पहले से ही दुर्लभ नाट्य लेखन की परम्परा को और क्षीण किया है?
बिलकुल नहीं। नाटक में दुनियां की सारी कलाएं समाहित हैं – गीत, संगीत, पेंटिंग, साहित्य सब। इससे नाटक समृद्ध होता है क्षीण नहीं। पेंटिग, संगीत, नृत्य की कई शैलियां हो सकती हैं तो रंगमंच की क्यों नहीं? यदि हम केवल नाटक की बात करें तो इसके भी प्रकार हैं। नाट्यशास्त्र में भारत ने इसे दसरूपक कहा है जिसमें नाटक, प्रकरण, प्रहसन, व्यायोग, भाण, डिम, वीथि, ईहामृग, समवकार, अंक नामक दसरूपकों का वर्णन है।

रंगकर्म को लेकर सरकार की सांस्कृतिक नीति क्या होनी चाहिए?
एक ऐसे देश में जहाँ कला और संस्कृति हासिए पर हो, बाज़ारवाद के प्रभाव में संस्कृतियां इतिहास में विलीन होने को अग्रसर हो, तमाम सरकारी नीतियां के कण-कण में भ्रष्टाचार का वास हो और संस्कृति के नाम पर अप-संस्कृति का बोलबाला हो व जहां हवा और सुनामी में सरकारों की अदलाबदली हो जाती हो वहां बिना किसी सांस्कृतिक नवजागरण के सांस्कृतिक नीति की उम्मीद कैसे की जा सकती है? केवल नीति बना भर देने से क्या होगा? मनरेगा जैसे नीति का क्या हाल हुआ क्या हम नहीं जानते?
क्या किसी भी पार्टी के प्रमुख एजेंडे में कला-संस्कृति नामक चीज़ है? यह विचार का दिवालियापन है कि आप नीति बनाने की बात करेंगें तो उनकी समझ में आर्थिक सहायता आता है! क्या केवल आर्थिक सहायता भर प्रदान कर देने से कला-संस्कृति का विकास हो जाएगा? बिलकुल नहीं, बल्कि इसके लिए एक ऐसा सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवेश बनाना होगा जहाँ कला-संस्कृति समाज का एक अभिन्न और ज़रूरी अंग बनकर कंधे से कंधा मिलाकर चले और सहज रूप से अपना विकास कर सके। जहाँ संस्कृतियों का आदान-प्रदान तो हो लेकिन लोगों को अपनी कला और संस्कृति पर भी गर्व हो, न कि इसे नचनियां-बजानियाँ का पेशा समझें।
अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद होने के इतने साल बाद भी यदि हमारे देश में कोई संस्कृति नीति नहीं है तो क्या किसी को इसकी चिंता भी है? लोकतंत्र के नाम पर यहाँ जो कुछ अलोकतांत्रिक चल रहा है क्या हम उससे अनजान हैं? क्या लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव का अधिकार होता है? क्या यह सच नहीं कि लोकतंत्र का नगाडा खूब ज़ोर-ज़ोर से पीटनेवाली पार्टियों की कार्यशैली इतनी ज़्यादा अलोकतांत्रिक कि वो अपने चंदा देनेवालों के नाम तक सावर्जनिक नहीं करना चाहती। तब क्या यह सवाल नहीं उठता कि आखिर यह पार्टियां किसके इशारे पर नाचतीं हैं? यदि इसका जवाब जनता है तो मुझे इस जवाब पर कतई यकीन नहीं।
आज सरकार जो रंगमंच को बढ़ावा देने के नाम पर अनुदान बांट रहीं है उससे रंगमंच का एनजीओ करण हो रहा है न कि विकास। जनता की गाढ़ी कमाई का (कुछ अपवादों को छोड़कर) कैसा बंदरबांट मचा है यह जग ज़ाहिर है। सांस्कृतिक संस्थानों में कैसे-कैसे असंस्कृतिक व्यक्तित्व विराजमान है यह भी अब किसी से छुपा नहीं हैं। किन्तु सबसे दुखद सच यह कि अब रंगकर्मी भी अपना हक़ नहीं बल्कि अपना हिस्सा मांगने तक में ही संतुष्ट होने लगे हैं।
इसलिए केवल सरकार के नीति बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि यह एक सांस्कृतिक क्रांति का विषय है, जो निश्चित रूप से सामाजिक क्रांति के साथ ही होगा। इसलिए बिना किसी सामाजिक व सांस्कृतिक क्रांति के किसी भी कला और समाज का भला नहीं होनेवाला। हां, भला होने का भ्रम ज़रूर फैलाया जा सकता है।

क्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान और वहां के प्रशिक्षित एक बड़ी जमात ने देशभर में चल रहे शौकिया रंगमंच को नकारने का काम किया है?
जिसे यहाँ बड़ी जमात कहा जा रहा है उसकी संख्या कितनी है? बल्कि बड़ी जमात उनकी है जिसे आप शौकिया रंगकर्मीं कह रहे हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंगकर्मियों की संख्या अल्पमत वाली है। तो क्या उनके पास इतनी शक्ति है कि वो बहुमत को नकार सकें? रंगमंच में आखिरी फैसला दर्शकों का होता है। इसलिए किसी भी अन्य के नकारने या स्वीकारने से कुछ नहीं होता। देश भर में ऐसे रंगकर्मियों की कोई कमी नहीं जिन्होंने दर्शकों के दिलों पर राज किया और आज भी कर रहे हैं। दर्शक डिग्री नहीं नाटक देखने आते हैं। नाट्य-प्रस्तुति यदि अच्छी है तो किसी के भी व्यक्तिगत कुंठा का वहां कोई स्थान नहीं होता। इसलिए हमें किसी के स्वीकार-नकार से ज़्यादा दर्शकों की प्रतिक्रियायों को सम्मान देना चाहिए। रंगमंच मेहनत और लगन के द्वारा सतत “करते हुए सिखाने और सिखाते हुए करने” की चीज़ है। इस विधा में व्यक्तिगत कुंठाओं का कोई स्थान नहीं है। इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमारे पसंद-नापसंद से समय का बहुआयामी सच नहीं बदल जाता।
हमारी मूल समस्या यह नहीं है कि कौन हमें स्वीकार रहा है या कौन नकार रहा है बल्कि हमारी मूल समस्या यह है कि हमारे अंदर आलोचनाओं को सुनने और समझाने की इच्छा शक्ति का ह्राश हुआ है और हम ज़रूरत से ज़्यादा आत्ममुग्ध हो गए हैं। जो निश्चित रूप से एक खतरनाक बात है। आत्ममुग्धता किसी भी कला का शत्रु होता है। इसलिए हमें यथाशीघ्र ही अपनी-अपनी आत्ममुग्धता पर काबू पा लेना चाहिए और सकारात्मक आलोचनाओं को यथोचित सम्मान देना सिखाना चाहिए। इसी में रंगकर्म और रंगकर्मीं दोनों का भला है। इसलिए कौन हमने स्वीकार रहा है कौन नहीं इसका ग़म नहीं होना चाहिए। मेहदी हसन के एक गज़ल का शेर कुछ यूं है -
जो ग़में हबीब से दूर थे वो खुद अपनी आग में जल गए
जो ग़में हबीब को पा गए वो ग़मों से हंसके निकल गए।

Sunday, July 26, 2015

बिहार का रंगमंच : एक संछिप्त टिप्पणी

"बिहार की पहली शौक़िया नाट्य-संस्था की स्थापना केशवराम भट्ट ने 1876 में पटना नाटक मंडली के नाम से गठित की थी। उन्होंने बिहारबंधु पत्रिका के छापाखाने में बने अस्थाई रंगमंच पर इसी मंडली द्वारा अपने दो नाटकों - शमशाद सौसन और सज्जाद सुंबुल को प्रदर्शित किया था। कई वर्षों बाद आरा में जैन नाटक मंडली (1918-19), सार्वजनिक नाट्य मंडली (उन्नीसवीं सदी का अंतिम दशक), मनोरंजन नाटक मंडली (1918-19), छपरा क्लब (1919) और शारदा नाट्य समिति (बीसवीं सदी का दूसरा दशक) आदि नाट्य-संस्थाएं बनी। इन मंडलियों के गठन और रंगकार्यों के पीछे पारसी कंपनियों द्वारा प्रदर्शित नाटकों का प्रभाव था। .... इन्ही कंपनियों के अनुकरण पर यहाँ पहली व्यवसायिक नाट्य-मंडली बिहार थियेट्रिकल ट्रूप (1884) की स्थापना हुई। ... किन्तु एक महीने के बाद ही कम्पनी के कर्मचारियों और किसी दर्शक के बीच मारपीट हो हुई और फ़ौजदारी का मुकद्दमा दायर हो गया।"
(रंग दस्तावेज़, सौ साल, 1850-1950, संपादक - महेश आनंद, प्रकाशक - राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय)
पुस्तक से उपरोक्त जानकारी प्राप्त होने पर दो बातें मेरे मन में घुमड़ रही हैं। पहली यह कि नाटक देखने का संस्कार आज भी बिहार में शैशव अवस्था में ही है और दूसरी वह जिसका संकेत महेश आनंद सर प्रस्तुत पुस्तक की भूमिका में हीं कर देते हैं कि हिंदी के नाट्य-दस्तावेज़ीकरण का मामला अधर में ही लटका पड़ा है।
उदाहरणार्थ; बिहार का एक कस्बा है पंडारक। वहां हिंदी नाटक समाज नामक नाट्यदल सन् 1922 से आजतक लगातार कार्यरत है। हर वर्ष दुर्गापूजा के अवसर पर नाटकों का मंचन आज भी करती है। किन्तु दस्तावेज़ों की ख़ाक छानने के पश्चात् भी इनकी कोई जानकारी शायद ही मिलती है। ऐसे न जाने कितने इतिहास के अनमोल पन्ने बिखरे पड़े हैं बिहार की धरती पर। पता नहीं कब होगा इनका दस्तावेज़ीकरण।
वैसे दस्तावेज़ीकरण के मामले में पूरा हिंदी समाज ही आलसी है। हां बक बक करने और अपनी महानता साबित करने में कोई किसी से एक सूत भी कम नहीं। लिखने बोलिए तो नानी याद आने लगती है। कोई बहुत उदार हो भी जाता/ती हैं तो कह देगें हम बोलते हैं तुम लिख लो या फिर ऐसा करो तुम लिखके ले आओ हमको सुना देना फिर जो कम बेसी होगा हम बता देंगें।
सरकारों की बात क्या किया जाय! उसको नाटक-नौटंकी, कल्चर-कल्चरल से क्या मतलब! उसे तो अग्रिकलचल नहीं बुझाता तो कल्चर और कल्चरल क्या बुझाएगा? आप चिल्लाईएगा कल्चर-कल्चरल तो सरकार बोलेगी ग्रांट ले लो और जो करना है करो और चुप रहो।
नाट्य चिंतक कोंस्तांतिन स्तानिस्लावसकी 'actors without makeup' नामक आलेख में कहते हैं -"जो हो, मैं समझता हूँ हर कला साधक को लिखना चाहिए, केवल आम शब्दावली में अपनी जीवन गाथा नहीं, बल्कि अपने कलाकर्म को व्यवस्था देने की कोशिश में लिखना चाहिए। उसे अपनी रचना और रचना प्रक्रिया का विश्लेषण प्रस्तुत करना चाहिए। इन्हीं विश्लेषणों से रचना प्रक्रिया के संसार की गुत्थियां सुलझाएगी और ठोस सूत्र हाथ आएंगें। इस काम में पुराने महारथियों की जवाबदेही बहुत ज़्यादा है - उन्हें अपने धंधे (पेशे) का राज छुपाने और उन पर अपना स्वत्वाधिकार बनाने का कोई अधिकार नहीं। उन्हें अपने सारे गोपन सत्य उजागर करने चाहिए, क्योंकि चाहे अनचाहे नई पीढ़ी देर-सबेरे इन सभी नतीजों को हासिल कर ही लेगी।" (स्तानिस्लावस्की-अवचेतन के मुहाने पर अभिनय, लेखक - श्रीकान्त किशोर)
बहरहाल, उपरोक्त पुस्तक हर रंगकर्मी को एक बार ज़रूर ही पढ़नी चाहिए।

Tuesday, February 17, 2015

डोंगरगढ़ : मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी और रंगमंच

सभागार
अमेरिकी नाटककार व रंग-चिन्तक डेविड ममेट ने अपनी किताब “सत्य और असत्य” (true and false : heresy and common sense for the actors) में लिखा है कि “आपका काम नाटक को दर्शकों तक पहुंचना है, इसलिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा लेने या विद्वता मात्र से काम नहीं बनेगा।" वैसे कुछ अति-भद्रजनों को शीर्षक से आपत्ति हो सकती है कि मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी के साथ रंगमंच की बात! तो अर्ज़ है कि मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी खाने की लजीज़ चीज़ें हैं और रंगमंच खेलने और देखने की। जब हम कोई चीज़ खेलते हैं तो सब कुछ भूलकर उसी में मस्त हो जाते हैं, भूख-प्यास तक गायब हो जाती है। इंसान की बनावट ऐसी है कि वह खाए और खेले बिना ज़्यादा दिन तक नहीं रह सकता है। खाना और खेलना आदिम प्रवृति है। जो बिना खाए और बिना खेले जीवित रहते हैं वह निश्चित रूप से किसी और ही ग्रह के प्राणी होगें। उन्हें भ्रम है कि वो इंसान हैं। खैर, बात को जलेबी की तरह गोल गोल घुमाने से अच्छा है कि सीधे-सीधे मुद्दे की बात की जाय।
छत्तीसगढ़ राज्य का एक कस्बा है डोंगरगढ़। डोंगर का मतलब पहाड़ होता है। यह स्थान हर तरफ़ से डोंगर से घिरा है तो नाम पड़ा डोंगरगढ़। यहां डोंगर की हर चोटी पर भांति-भांति के देवी, देवता और अवतारों के माध्यम से विभिन्न समुदायों, धर्मों का कब्ज़ा है। इसलिए इसे धार्मिक नगरी का भी प्रमाण-पत्र प्राप्त है। धर्म और पंथ के नाम पर पहाड़ काटकर ढ़ेरों क़ानूनी-गैरक़ानूनी निर्माण हुए और हो रहे हैं। किन्तु धर्म और पंथ के मामले में कोई भी टांग नहीं अड़ाना चाहता, सरकारें और प्रशासन भी नहीं। जहां तक सवाल प्रकृति का है तो उसकी चिंता किसे है! वैसे स्टेशन के भोंपू से मां बम्बलेश्वरी देवी का नाम बार-बार उच्चारित किया जाता है। अब रेलवे के द्वारा इस प्रकार की धार्मिक उद्घोषणा “अच्छे दिन” के हवाबज़ी के साथ आए या पहले यह एक खोज का विषय हो सकता है। धर्मनिरपेक्ष के आवरण वाले इस देश में इस प्रकार की उद्घोषणाएं कितनी उचित है आप इस पर आप धर्मनिरपेक्षतावादी होकर विचार कर सकते हैं तो करें, नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं क्योंकि जो हो रहा है वो तो होगा ही। मेरे, आपके या किसी और के शुतुरमुर्ग बन जाने से इतिहास की गति न रुकी है, न रुकेगी। फिलहाल हम इतिहास, भूगोल आदि आदि के बजाय मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी की बात कर लेते हैं। हां रंगमंच की बात तो होगी ही होगी।
यह क़स्बा छोटा है लेकिन ज़रूरत का लगभग हर सामान उपलब्ध है। हां यदि कुछ नहीं है तो वो है नाटक करने के लिए कोई उचित सभागार। तथाकथित हिंदी पट्टी में वैसे भी कला-संस्कृति आदि को शूद्रों का पेशा ही माना जाता है इसलिए यह चीज़ें अभी तक इंसान और सामज की ज़रूरतों में शामिल नहीं हुई हैं। गौर फरमाइए हिंदी क्षेत्र नाटक, नौटंकी, नाच, गाना को आज भी गाली के रूप में इस्तेमाल करता है। कहा जा सकता है कि राजनीतिक उठा-पटक तो होती ही रहती है लेकिन सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण काम अभी बाकि है। बिना कला-संस्कृति का मानव समाज कितना मानवीय होगा इस बात का साक्षात् प्रमाण हम रोज़ ही देखते हैं।
तो शादी ब्याह के लिए बने पंडाल से ही यहां तात्कालिक सभागार का निर्माण होता है। इसलिए नाटक के लिए मुहूर्त देखना एक अनिवार्य शर्त बन जाता है कि उस दिन लगन इतनी तेज़ न हो कि पंडाल और नाटक के लिए बम्बलेश्वरी मंदिर का प्रागंण और मंच ही उपलब्ध न हो और दर्शक भी शादी-ब्याह में व्यस्त रहें। आबादी इतनी है कि कितनी भी कोशिश करो किसी न किसी की शादी बीच में पड़ ही जाती है। नाटकों के आयोजन में मौसम का ध्यान रखना भी अनिवार्य होता है। मौसम ऐसा हो जिसमें ना ठंड अधिक हो, न गर्मीं और बरसात तो नहीं ही हो। इस लिहाज से भारतीय परिवेश में फ़रवरी के मौसम को हम माकूल कह सकते हैं। और फिर बसंत भी तो है मन को प्रफुल्लित करने के लिए। आम के पेड़ों पर मंजर लग चुके हैं और कोयल की कूक ने कानों में मधुर रस घोलना शुरू कर दिया है।
इप्टा डोंगरगढ़ और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से विकल्प नामक संस्था द्वारा इस बार नाट्योत्सव 7 से 9 फरवरी 2015 को आयोजित किया गया। इस तीन दिवसीय इस आयोजन में अनुकृति रंगमंडल, कानपुर द्वारा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना लिखित व डॉ ओमेंद्र कुमार निर्देशित नौटंकी शैली में बकरी, इप्टा चंडीगढ द्वारा अपूर्वानंद लिखित व बलकार सिद्धू निर्देशित एके दा मन्त्र उर्फ़ मदारी आया, पाकिस्तानी कथाकार लाली चौधरी की कहानी का गुरशरण सिंह द्वारा नाट्य-रूपांतरित मेरा लौंग गवाचा, इप्टा डोंगरगढ़ द्वारा राधेश्याम तराने निर्देशित पहाड़पुर की कथा (कहानी – तजिंदर सिंह भाटिया, संगीत – मनोज गुप्ता, नाट्यलेख – दिनेश चौधरी), मरवा थियेटर पुणे द्वारा ओजस एस वी निर्देशित व रेखा ठाकुर अभिनीत एकल ले मशालें तथा इप्टा भिलाई द्वारा निशु पांडे निर्देशित नाटक सुन्दर (लेखक – मोहित चट्टोपाध्याय, हिंदी अनुवाद – रणदीप अधिकारी) के अलावे अनुकृति रंगमंडल, कानपुर द्वारा दस दिन का अनशन और इप्टा चंडीगढ़ द्वारा ए लहू किस दा है व गड्ढा (लेखक – गुरशरण सिंह) नामक नुक्कड़ नाटक, लोकगीत, लीक-नृत्य आदि की भी प्रस्तुति तय है। इस बार आयोजन नाट्योत्सव के मुख्य मंच के अलावा स्थानीय नुक्कड़, खालसा स्कूल और नवोदय विद्यालय में भी होगा। सुबह इन स्कुलों में और शाम को मुख्यमंच पर नाटक से कस्बे की फिज़ां नाटकमय होना स्वभाविक ही था। हां, इप्टा डोंगरगढ़ के कलाकारों द्वारा मनोज गुप्ता के नेतृत्व में जनगीतों का गायन हर साल की भांति इस साल भी आयोजन का मुख्य आकर्षण था। वहीं उचित माहौल देखकर स्थानीय लेखक तजिंदर सिंह भाटिया ने भी अपनी गीतों की प्रदर्शनी लगा दी।
स्टेशन से उतारते ही गेस्ट हॉउस जाने के रास्ते में इप्टा और 10वें नाट्य समारोह के पोस्टर और होडिंग स्वागत के लिए तैयार मिलते हैं। गेस्ट हॉउस पहुंचने से पहले हम चाय-नाश्ते की एक दूकान में पहुंच जाते हैं। कार में नाटक के ब्रोशर पर नज़र पड़ती है। वैसे रंगमंच का जितना ज़्यादा प्रचार प्रसार हो उतना ही उचित। शालिग्राम बनके एक स्थान पर स्थापित हो जाने से क्या लाभ? बहरहाल, इस दूकान को महिलाएं चलाती हैं। चाय की एक प्याली के साथ चटनी और गर्मागर्म मंगौड़ी हाज़िर है। सामने देशबंधु नामक अखबार है। जिसे हाथ में लेते ही हरिशंकर परसाई की याद आना स्वभाविक है। यह वही अखबार है जिसमें परसाईजी वर्षों तक व्यंग्य लिखा करते थे। मंगौड़ी मुंह में डालते हुए सम्पादकीय पन्ना खोलने पर मुक्तिबोध की कविता की कुछ पंक्तियां प्रमुखता से नज़र आतीं हैं। मन में लड्डू फूट पड़ता है कि आज के चटनीवादी पत्रकारिता वाले समय में कोई अखबार तो है जो बिना जन्मदिन-मरणदिन के मुक्तिबोध जैसे लेखकों की रचनाओं को छापने का माद्दा रखता है।
आज के तथाकथित संचार क्रांति वाले समय में गेस्टहाउस में टीवी और कस्बे में शोर का ना होना किसी भी शांतिप्रिय इंसान के लिए किसी वरदान से कम नहीं। कमरे में यदि टीवी हो तो चाहे अनचाहे चालू हो ही जाता। चाहकर भी इसके जादुई आभामंडल से बचा नहीं जा सकता। फिर रिमोट का गला घोंटते-घोंटते वक्त कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता। वैसे दिल्ली चुनाव और क्रिकेट का विश्व कप चरम पर है और सारे समाचार चैनल एक मिनट में दस-दस ब्रेकिंग न्यूज़ उगलकर किसी भी मसालेदार फिल्म को मात देने में लगे हैं।
बगल के गेस्ट हॉउस में रामलीला जैसे नाटक के नाटककार राकेश, नाट्य निर्देशिका वेदाजी और चर्चित फिल्म और रंगमंच के अभिनेता, शिक्षक व भारतेंदु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक युगल किशोर जी उपस्थित हैं। दोपहर में उनसे परिचय होता है और हम एक साथ भोजन स्थल की ओर प्रस्थान करते हैं। भोजन का इंतज़ाम सामूहिक रूप से प्रदर्शन स्थल पर ही है और हर साल की भांति इस साल भी भोजन की ज़िम्मेवारी है इप्टा डोंगरगढ़ के बेहतरीन अभिनेता मतीन भाई (अहमद) के पास है। मेहमान-मेजबान सब एक साथ भोजन करते हैं। भोजन स्थल पर पहुंचने पर इप्टा डोंगरगढ़ के बबली, टिंकू, निश्चय व्यास आदि कलाकार मुख्य गेट बनाने में व्यस्त हैं। यह देखकर प्रसन्नता दुगुना हो जाती है कि पिछले दो सालों में हमने वर्कशॉप के माध्यम से जिन किशोर-किशोरियों को रंगमंचीय शिक्षा प्रदान करने का प्रयास किया है वे भी पुरे जोश से समारोह की तैयारी में व्यस्त हैं। अमन नामदेव, प्रतिज्ञा व्यास, शुभम, अखिलेश, दिव्या आदि किशोर-किशोरियों को रंगमंच की ज़िम्मेवारी निभाते देख अपनी सार्थकता का एहसास होना स्वभाविक ही है। उनके मुंह से “सर, अब हमलोग आपके साथ फिर कब नाटक करेंगें?” सुनके अंदर ही अंदर जो खुशी महसूस होती है उसे शब्दों में कैसे बयान करूँ? यह बच्चे हमारी विरासत हैं, कल यही रंगकर्म के स्तंभ होगें।
तैयारी ज़ोरों पर है। पहला दिन है इसलिए मेहमानों की चिंता के बजाय तैयारी पर ज़्यादा ध्यान देना एक लाजमी सी बात हो जाती है। यहां कोई अलग-अलग विभाग नहीं है अमूमन सारे काम स्थानीय रंगकर्मियों को ही करना है। करते हुए सीखना और सिखाते हुए करना, यही मूल मन्त्र है। कुछ तकनीकी दिक्कतें भी पेश आतीं है इस कारण कार्यक्रम निर्धारित समय से ज़रा बिलम्ब से शुरू हो पाता है। मनोज गुप्ता अपने साथियों के साथ जनगीतों का गायन शुरू करते हैं। दर्शकों की संख्या देखकर निराशा हो रही है, लेकिन जनगीतों की समाप्ति तक लगभग पूरा सभागार भर जाता है। समारोह के विधिवत उद्घाटन के लिए मंच पर अतिथियों को बुलाया जाता है। संबोधित करते हुए नाटककार राकेश कहते हैं कि “एक ऐसे समय में जब इस देश में लोगों को बांटने की राजनीति चरम पर है वैसे समय में कला का इस प्रकार का आयोजन सराहनीय है। क्योंकि कला इंसान को जोड़ने का काम करती है।” वेदाजी कई बार आग्रह करने पर संकोच के साथ वक्तव्य के लिए तैयार होतीं हैं और डोंगरगढ़ की खूबसूरती की तारीफ़ के साथ ही साथ आयोजन के लिए आयोजक और दर्शक दोनों को बधाई देतीं हैं। अनुभवी युगल किशोर सर को पता है कि लोग यहाँ नाटक देखने आए हैं वक्तव्य सुनने नहीं। वह अपनी बात काम से काम समय में यह कहते हुए समाप्त करते हैं कि “डोंगरगढ़ जैसे कस्बे में रंगमंच के प्रति ऐसा स्नेह सराहनीय है। ऐसे आयोजन न केवल एक कलाकार को उत्साहित करते हैं बल्कि समाज में स्वस्थ्य एवं अर्थपूर्ण मनोरंजन की परम्परा का भी विस्तार करते हैं।” अब नाटकों के मंचन की बारी आती है और अनुकृति रंगमंडल, कानपुर नौटंकी शैली में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की चर्चित नाट्य नाटक बकरी का मंचन शुरू करती है। करीब डेढ़ घंटे की इस प्रस्तुति के बाद इप्टा चंडीगढ़ द्वारा एके दा मन्त्र उर्फ़ मदारी आया की प्रस्तुति होती है। आधी रात के बाद नाटक का मंचन समाप्त होता है और हम सब एक साथ खाना खाकर गेस्ट हॉउस पहुंचते हैं। मुझे प्रेस नोट्स बनाने का कार्यभार सौंपा गया है। एक नोटपैड भी दिया है। गूगल महराज का हिंदी इनपुट लोड़ किया है लेकिन वह फायर करने से इनकार कर रहा है। रात डेढ़ बजे लेटकर मोबाईल में शब्द अंकित करने की कोशिश करता हूं तो निंदिया कब अपनी आगोश में जकड़ लेती है पता भी नहीं चलता। मोबाइल गीता की तरह दिल के पास हैं और मैं सुकून से नींद की आगोश में। सुबह युगल सर, राकेश सर और वेदा मैम के साथ चाय पीने वादा था। लेकिन प्रेस नोट्स भी तो बनाना है और फिर आज आज तो 10 बजे सुबह से ही खालसा स्कूल में नाटकों का मंचन शुरू हो जाएगा इसलिए मैं चाय का मोह त्यागकर प्रेस नोट्स बनाने में लग जाता हूँ।
कल, प्रस्तुति के दौरान मैं मनोज गुप्ता के साथ बैठा था कि एक व्यक्ति बाहर निकलते वक्त रुक गए। वे हमारे पास आए और मनोज भाई से शिकायत करने लगे कि इस बार उनसे इस आयोजन के लिए सहयोग राशि क्यों नहीं ली गई। मनोज भाई के पास मुस्कुराते हुए यह कहने के सिवा और कोई रास्ता नहीं था कि ले लेंगें, आप चिंता न करें। आज हम जब गेस्ट हॉउस से निकल रहे कि मोटरसाईकल सवार एक सज्जन ने आवाज़ दी। दिनेशजी ने गाड़ी रोक दी, वो मोटरसाईकल सवार हमारे पास आए और 500 रूपए का नोट थमाते हुए एक का सिक्का खोजने लगे। मैंने गौर किया कि यह वही सज्जन हैं जिन्होंने मनोज भाई से चंदा की शिकायत दर्ज़ किया था। डोंगरगढ़ के रंगकर्मियों के पास चंदा के ऐसे अनेकों अनुभव हैं – कुछ मीठे, कुछ तीखे, कुछ नमकीन, कुछ कुरकुरे, कुछ नर्म-मुलायम और कुछ खट्टे भी; बिलकुल मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी की तरह। बाद में मैंने उन सज्जन का नाम पता किया – राजेश मिश्रा। ऐसा अपनापा गांव-कस्बे में ही बचा है अब। लेकिन यहाँ भी यह विलुप्त होने के ही कगार पर है।
यह नाट्योत्सव के आयोजन का 10वां वर्ष है। कई सालों तक यह आयोजन चंदे की राशि द्वारा ही किया जाता रहा लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि रंगकर्मियों के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया कि या तो सरकारी अनुदान लिया जाय या फिर इस आयोजन को बंद कर दिया जाया। बंद करने से ज़्यादा बेहतर है अनुदान लेना है सो विगत कुछ वर्षों से यह आयोजन चंदे के साथ ही साथ संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सौजन्य से आयोजित हो रहा है। वैसे इस बात से भी इनकार नहीं कि स्थानीय लोग को इस आयोजन का इंतज़ार रहता है। इसकी सबसे प्रमुख वजह शायद यह हो सकती है कि डोंगरगढ़ में नाटकों का यह एकलौता आयोजन है। वैसे जो लोग भी नाट्य-प्रदर्शन में दर्शकों की कमी का एकालाप प्रस्फुटित करते रहतें हैं उन्हें किसी गांव या कस्बेनुमा जगह में जाकर नाटकों के प्रति लोगों की दीवानगी का दीदार करना चाहिए। उनके दिव्य चक्षु खुल जाएंगें। यहां तकनीकी तौर पर नाटकों के स्तर भले ही सर्वश्रेष्ठ न हो लेकिन नाटक देखने का अनुशासन अनुकरणीय है। रंगमंच के बड़े – बड़े स्थापित नाम यदि ज़रा सा वक्त इन जगहों के लिए निकालें तो यहां भी श्रेष्ठतम रंगमंच संभव है।
मनोज गुप्ता जनगीत शुरू करनेवाले हैं। माइक सजाया जा रहा है। कल इसकी सेटिंग सही नहीं थी इस वजह से जनगीतों में उचित रस की उत्पत्ति नहीं हो सकी आज भी आलम ऐसा ही है। नाटक के लिए यह एक तात्कालिक सभागार बनाया गया है जहां साउंड सिस्टम की उपस्थिति किसी लोक नाटक की याद ताज़ा करती है। मंच पर दर्जन भर चोंगे लटक रहे हैं। याद होगा कि गांव-कस्बे में खेला जानेवाला शौकिए नाटकों ने माइक वाली एक्टिंग नामक एक अघोषित शैली का निर्माण किया है। वहां कोई साउंड प्रूफ सभागार नहीं होता इसलिए अभिनेताओं द्वारा माइक पर जाकर ही संवाद बोलना एक अत्यंत ज़रुरी क्रिया सह मजबूरी बन जाती है। यहां कोई वाल नहीं होता, न फोर्थ वाल न फर्स्ट वाल, सब खुल्ला खेल है। यहां दर्शकों का रंगमंच होता है दर्शकों के लिए। कलाकार का सुख दर्शक के सार्थक आनंद और सुख के साथ है उससे इत्तर नहीं। बहरहाल, दो प्रतुतियां प्रदर्शित होती हैं – इप्टा चंडीगढ़ द्वारा मेरा लौंग गवाचा और स्थानीय नाट्य संस्था इप्टा डोंगरगढ़ द्वारा पहाड़पुर की कथा।
नाटक से समाज बदलता है या नहीं यह तो बहुत बड़ा और पेचीदा सवाल है जिस पर आए दिन विद्वान लोग बहस करते ही रहते हैं किन्तु यह सत्य है कि कला का प्रभाव दीर्घकालीक होता है। मणिपुर में “Indian Army Rape Us” का बैनर लगाए मणिपुर की महिलाओं ने भारतीय सेना के खिलाफ जो ऐतिहासिक प्रतिरोध दर्ज़ किया था उसकी प्रेरणा एच कान्हाई लाल निर्देशित व सावित्री जी अभिनीत एक नाटक ही था। नाटक यदि प्रभावहीन होते तो सफदर हाश्मी जैसे लोगों की हत्या क्यों होतीं? अंग्रेज़ों कई सारे नाटक बैन क्यों करते? वैसे नाटक और नाट्यदल प्रतिबंधित हो रहे हैं। भारत ही नहीं वरन विश्व में ऐसी कई घटनाएं आज भी गठित हो रहीं हैं। रंगमंच कोई मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी नहीं कि जिसे खाकर आराम से हजम किया जा सके। वैसे मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी भी सबको आराम से हजम नहीं होता।
डोंगरगढ़ रेलवे फाटक से उत्पन्न हुई समस्या को केन्द्र में रखकर पहाड़पुरा की कथा नामक नाटक का प्रभाव साफ़-साफ़ देखा व महसूस किया जा सकता है। हास्य और व्यंग्य को अपने अंदर समेटे यह नाटक अपने दो ही प्रस्तुति से (पहली 26 जनवरी और दूसरी आज) डोंगरगढ़ रेलवे की आंख में किरकिरी बनकर उभरा है। उसका सीधा प्रमाण यह है कि इस प्रस्तुति को देखने के बाद लोगों ने रेलवे फाटक पर इतनी शिकायतें दर्ज़ की कि वहां से शिकायत पुस्तिका ही गायब कर दी गई हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब इस नाटक के प्रभाव से शहर को जोड़नेवाली इस रेलवे फाटक के खिलाफ़ कोई जनांदोलन उभर आए। ऐसे व्यस्ततम स्थानों पर रेलवे को एक पुल का निर्माण करने में पता नहीं कौन रोकता है! 
शाम में मारवा थियेटर पुणे द्वारा रेखा ठाकुर अभिनीत व ओजस एस वी निर्देशित एकल नाटक ले मशालें की प्रस्तुति होनी है। इस नाटक को लेकर मन में थोड़ी शंका है। क्या पता एकल नाटक इस स्थान पर अपना रंग जमा पाएगा या नहीं। दर्शकों के बारे में अमूमन यह धारणा है कि लोग हल्का-फुल्का, हास्य-व्यंग्य ज़्यादा पसंद करते हैं। यह नाटक मणिपुर समस्या और मूलतः इरोम शर्मिला को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत होनेवाला एक गंभीर नाटक है। ऐसे नाटकों का उपदेशात्मक हो जाने का डर ज़्यादा होता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि उपदेश अब दिलों तक पहुँचाने की क्षमता खो चुके हैं। प्रस्तुति शुरू होती है। यह नाटक कोई उपदेश नहीं देता बल्कि बड़ी ही सादगी से चीज़ों को सामने रखते हुए दर्शकों के अन्तःमन में कई सवाल की उत्पत्ति करने में सफलता प्राप्त करता है। यह कोई अद्भुत नाटक नहीं था और सच कहूँ तो मुझे पता भी नहीं कि अद्भुत नाटक होता कैसा है लेकिन यह बड़ी सादगी से रंगमंच की शक्ति और गरिमा का एहसास ज़रूर कराता है, और अर्थपूर्ण रंगमंच की अवधारणा को भी सार्थकता प्रदान करता है। डोंगरगढ़ के लोग अच्छे नाटकों पर खूब चर्चा करने और उसकी प्रस्तुति बार-बार देखने के लिए तत्पर रहते हैं इसलिए पुरे यकीन से यह कहा जा सकता है कि ले मशालें पर खूब चर्चा होगी। यह प्रस्तुति अगले साल भी इस नाट्य समारोह का हिस्सा बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पूर्व में ऐसे कई नाटक हैं जिनकी प्रस्तुति यहां बार-बार की गई है और लोगों ने हर बार पहले से ज़्यादा उत्साह से उसे देखा है। राई नामक प्रस्तुति इस बात का साक्षात् प्रमाण है। वैसे भी अच्छे नाटकों को दर्शक हमेशा पसंद करते हैं। इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह नाटक किस रस का है।
अर्थवान, सादगीपूर्ण और गंभीर रंगमंच एक चुनौती है इससे बचने के लिए लोग हल्केपन का सहारा लेते हैं। वैसे यह भी एक प्रकार का भ्रम ही है कि हास्य-व्यंग्य गंभीर काम नहीं है। ले मशालें की अभिनेत्री रेखा ठाकुर कहतीं हैं – “मैं जानती हूँ कि मेरा यह नाटक अपने बूते सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता पर मैं इरोम शर्मिला के संघर्ष के प्रति लोगों की संवेदनाओं को तो छू ही सकती हूँ।" समारोह की अंतिम प्रस्तुति इप्टा भिलाई का नाटक सुन्दर था। हाँ, शाम में अविनाश भाई (गुप्ता) के घर एक शानदार चटनी के इतनी मंगौड़ी खाई की अब पेट में किसी और चीज़ के लिए कोई जगह नहीं है। 
डेविड ममेट कहते हैं - “जिन चीज़ों को लेकर हम ज़्यादा सावधान होते हैं उन्हें हम सजाते-संवारते नहीं। हम चीज़ों को किस प्रकार पेश करते हैं महत्व इसका नहीं है बल्कि महत्व इस बात का है कि हम प्रकट क्या करना चाह रहे हैं। जो बात दिल से निकलती है वह सीधी दिल में उतर जाती है।” यही बात हम डोंगरगढ़ नाट्य समारोह के बारे में कह सकतें है और जहां तक सवाल मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी और जलेबी का है तो इतना ही कहना उचित होगा कि आप जब भी यहां आएं इसका स्वाद ज़रूर लें। अच्छी कला के साथ इन चीज़ों का मज़ा दुगुना हो जाता है।
समारोह का दूसरा दिन। नास्ता करके हम खालसा स्कूल के प्रागंण में पहुंचाते हैं। आश्चर्य; एक भी दर्शक नहीं! केवल स्कूल प्रशासन, आयोजक और नाटक खेलनेवाले। हद है, हमने तो सोचा था कि बहुत भीड़ होगी। कुछ समय पश्चात इप्टा चंडीगढ़ के अभिनेता, निर्देशक बलकार सिद्दू मोर्चा संभालते हैं और माइक पर मुहल्लावासियों को नाटक और रंगारंग पंजाबी कार्यक्रम देखने का नेवता भेजते हैं। कविता पाठ और पंजाबी गीतों का दौर शुरू होता है और धीरे-धीरे दर्शकों की संख्या बढ़ने लगती हैं। कुछ ही मिनटों में कुर्सियां इंसानों की उपस्थिति से सज जातीं हैं। दर्शकों में महिलाऐं और बच्चे ज़्यादा, दिन का समय है लगता है पुरुष अपने-अपने रोज़गार में व्यस्त हो गए हैं। इप्टा चंडीगढ़ के कलाकार ए लहू किसदा है और गड्ढा नामक नुक्कड़ नाटक और पंजाबी नृत्य-संगीत का लगभग तीन घंटे तक प्रस्तुति करते हैं। कार्यक्रम के अंत में मेहमान कलाकारों को खालसा स्कूल की तरह से पुस्तक भेंट किया जाता है। तत्पश्चात सामूहिक रूप में नाश्ता भी है। नाश्ता पेट भरने के लिए काफी है इसलिए हम वहां से सीधे गेस्ट हॉउस चले जाते हैं ताकि थोड़ा आराम करने के पश्चात शाम को तरोताज़ा होकर नाटक देख सकें। शाम को जैसे ही हम प्रदर्शन स्थल के सभागार में प्रवेश करते हैं कि कबीर की “मन लागो यार फकीरी में” का अत्यंत ही सुन्दर गायन सुनाई पड़ता है। हम सब चुप हो जाते हैं – इतनी सुकून भरी गायन और मधुर आवाज़ किसकी है? हम आगे की कुर्सियों में बैठकर माइक पर बज रहा यह गीत सुनने लगते हैं। युगल किशोर सर उठते हैं और ध्वनि संचालक के पास जाकर इसे पुनः बजाने को कहते हैं और साथ में यह भी निवेदन करते हैं कि क्या उन्हें यह गाना मिल सकता है? संचालक उनसे पेन ड्राइव या सीडी की मांग करता है। तब तक मैं भी वहां पहुँच जाता हूं और यह जानने की कोशिश करता हूं कि इसे गाया किसने है। संचालक अमज़द अली खान साहेब का नाम लेता है किन्तु यह उस्ताद सुजात हुसैन खान की आवाज़ है। संगीत पेन ड्राइव को एक लेपटॉप के माध्यम से बजाया जा रहा था। हमने झट से यह और इनकी गई सारी रचना कॉपी करने को कहा और दूसरे दिन उसे अपने मोबाईल में डाल लिया, तो कुछ ऐसा एहसास हो रहा था जैसे कोई अनमोल खजाना हाथ लग गया हो। कान में इयर फोन लगाए उस दिन यह रचना कितनी दफ़ा सुन गया, पता नहीं।
नज़र बांस की बनाई हुई लैम्प पर पड़ती है। इसे खास रुप से महोत्सव के लिए बनाया है डोंगरगढ़ इप्टा से ही जुड़े एक कलाकार ने। इन लैम्पों को लाल-लाल कुर्सियों को दो तरफ बांटनेवाले रास्ते में रखकर कील से फिक्स किया जा रहा है। फिक्स क्यों? इस सवाल का जवाब तब मिलता है जब समारोह के दूसरे दिन बिना फिक्स किया एक लैम्प गायब हो जाता है। राधेश्याम तराने बताते हैं कि “कुछ साल पहले ऐसा ही लैम्प बनवाया था, जिसे शादियों के अवसर पर लोग सजावट के लिए मांगकर ले जाते थे। लोग इस बार भी ज़रूर मांगेंगे! नहीं, इसे अच्छे से पैक करके रख दिया जाएगा ताकि अगले साल भी काम आ जाए।” वैसे इसकी पुरी संभावना है कि कोई न कोई इस लैम्प को मांगने पहुँच ही जाएगा और इप्टा के लोग बड़े हर्ष के साथ इसे दे भी देंगें।
आखिरी दिन। सुबह जल्दी जल्दी प्रेस नोट्स लिखा। एक दिन पहले जो प्रेस नोट्स मेल किया था उसका चंद हिस्सा एकाध अखबारों ने किसी तरह छाप भर दिया। आज सुबह नवोदय विद्यालय में नाटकों की प्रस्तुति होनी है। हम नवोदय पहुंचाते हैं। विद्यालय की बैंड पार्टी हमारे स्वागत में मार्चिंग बीट बजाती है। अंदर फुल-पत्ती से हमारा स्वागत होता है और फिर मंच पर बुलाकर बच्चों को संबोधित करने का दुरूह कार्य सौंपा जाता है। नवोदय के बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा ही अनुशासन में हमारी तरफ़ टकटकी लगाए देख रहे हैं। राकेश जी संबोधित करते हैं बीच में वेदा जी बच्चों को एक प्यारा सा गीत यह कहते हुए सुनातीं हैं कि वो गायिका नहीं हैं। अब युगल किशोर सर की बारी है। युगल सर की फिल्म (पिपली लाइव) का कुछ अंश दिखाया जाता है और फिर युगालजी बच्चों से थोड़ी बातचीत करते हैं। हम सब मंच पर खड़े हैं यह भान होते ही कुर्सियों का आगमन शुरू हो जाता है। मेरे बगल में राधेश्याम तराने खड़े थे। जैसे ही मेरे आगे कुर्सी रखी जाती है मैं तरानेजी को छेड़ते हुए धीरे से कहता हूँ – “आप बुज़ुर्ग है, आप बैठिए। मैं खड़ा रहता हूँ।” तराने जी मुस्कुराते हुए जवाब देते हैं – “अब मैं हरगिज़ नहीं बैठाने वाला।” युगल सर बच्चों से बात कर रहे हैं, मैं और तरानेजी कुर्सी के पीछे मंद-मंद मुस्कुराते हुए खड़े हैं। इसके बाद इप्टा चंडीगढ़ द्वारा नाटकों और संगीत का कार्यक्रम शुरू होता है। बच्चे अत्याधिक शालीनता से पुरे कार्यक्रम को देखते हैं। कार्यक्रम की समाप्ति के उपरांत स्कूल के भोजनालय में सामूहिक भोज का इंतज़ाम है। इप्टा चंडीगढ़ की टीम को आज ट्रेन से वापस जाना है। देर हो रही है और इधर आयोजक की बेचैनी बढ़ रही है। बहरहाल, हम सब चडीगढ़ के मित्रों से विदा लेते हैं।

शाम में मारवा थियेटर पुणे द्वारा रेखा ठाकुर अभिनीत व ओजस एस वी निर्देशित एकल नाटक ले मशालें की प्रस्तुति होनी है। इस नाटक को लेकर मन में थोड़ी शंका है। क्या पता एकल नाटक इस स्थान पर अपना रंग जमा पाएगा या नहीं। दर्शकों के बारे में अमूमन यह धारणा है कि लोग हल्का-फुल्का, हास्य-व्यंग्य ज़्यादा पसंद करते हैं। यह नाटक मणिपुर समस्या और मूलतः इरोम शर्मिला को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत होनेवाला एक गंभीर नाटक है। ऐसे नाटकों का उपदेशात्मक हो जाने का डर ज़्यादा होता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि उपदेश अब दिलों तक पहुँचाने की क्षमता खो चुके हैं। प्रस्तुति शुरू होती है। यह नाटक कोई उपदेश नहीं देता बल्कि बड़ी ही सादगी से चीज़ों को सामने रखते हुए दर्शकों के अन्तःमन में कई सवाल की उत्पत्ति करने में सफलता प्राप्त करता है। यह कोई अद्भुत नाटक नहीं था और सच कहूँ तो मुझे पता भी नहीं कि अद्भुत नाटक होता कैसा है लेकिन यह बड़ी सादगी से रंगमंच की शक्ति और गरिमा का एहसास ज़रूर कराता है, और अर्थपूर्ण रंगमंच की अवधारणा को भी सार्थकता प्रदान करता है। डोंगरगढ़ के लोग अच्छे नाटकों पर खूब चर्चा करने और उसकी प्रस्तुति बार-बार देखने के लिए तत्पर रहते हैं इसलिए पुरे यकीन से यह कहा जा सकता है कि ले मशालें पर खूब चर्चा होगी। यह प्रस्तुति अगले साल भी इस नाट्य समारोह का हिस्सा बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पूर्व में ऐसे कई नाटक हैं जिनकी प्रस्तुति यहां बार-बार की गई है और लोगों ने हर बार पहले से ज़्यादा उत्साह से उसे देखा है। राई नामक प्रस्तुति इस बात का साक्षात् प्रमाण है। वैसे भी अच्छे नाटकों को दर्शक हमेशा पसंद करते हैं। इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह नाटक किस रस का है। 
अर्थवान, सादगीपूर्ण और गंभीर रंगमंच एक चुनौती है इससे बचने के लिए लोग हल्केपन का सहारा लेते हैं। वैसे यह भी एक प्रकार का भ्रम ही है कि हास्य-व्यंग्य गंभीर काम नहीं है। ले मशालें की अभिनेत्री रेखा ठाकुर कहतीं हैं – “मैं जानती हूँ कि मेरा यह नाटक अपने बूते सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता पर मैं इरोम शर्मिला के संघर्ष के प्रति लोगों की संवेदनाओं को तो छू ही सकती हूँ।" समारोह की अंतिम प्रस्तुति इप्टा भिलाई का नाटक सुन्दर था। 
डेविड ममेट कहते हैं - “जिन चीज़ों को लेकर हम ज़्यादा सावधान होते हैं उन्हें हम सजाते-संवारते नहीं। हम चीज़ों को किस प्रकार पेश करते हैं महत्व इसका नहीं है बल्कि महत्व इस बात का है कि हम प्रकट क्या करना चाह रहे हैं। जो बात दिल से निकलती है वह सीधी दिल में उतर जाती है।” यही बात हम डोंगरगढ़ नाट्य समारोह के बारे में कह सकतें है और जहां तक सवाल मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी और जलेबी का है तो इतना ही कहना उचित होगा कि आप जब भी यहां आएं इसका स्वाद ज़रूर लें। अच्छी कला के साथ इन चीज़ों का मज़ा दुगुना हो जाता है।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...