Saturday, December 7, 2013

इप्टानामा : हमें थोड़े लोगों का विशिष्ट रंगमंच नहीं चाहिए.

विगत दिनों मुकेश बिजौल (आवरण), रोहित रूसिय, पंकज दीक्षित के रेखाचित्रों से सुसज्जित रंगमंच पर केंद्रित पत्रिका ‘इप्टानामा’ (भारतीय जन नाट्य संघ की वेब-पत्रिका का प्रथम वार्षिकांक) का प्रकाशन हुआ. पत्रिका का सम्पादन अविनाश गुप्ता व अपर्णा के सहयोग से दिनेश चौधरी ने किया है. यह इप्टा के 70 साल पूरा होने का एक उपक्रम भी है. पत्रिका के केन्द्र में आम-जन से सरोकार रखकर किया जानेवाला रंगमंच हैं, जहाँ प्रोफेशनल होने का मतलब केवल आर्थिक नहीं हुआ करता है और उत्सवधर्मिता के नाम पर विचारों की बलि नहीं चढाई जाती. रंगमंच पर सदियों से ‘प्रवचन’ देते आ रहे तथाकथित मुख्यधारा के रंगमंच के महर्षि इस पत्रिका से नदारत हैं, यह ‘इप्टानामा’ की सार्थकता है और यही बात इसे रंगमंच की अन्य पत्रिकाओं से अलग भी करती है. ऐसी पत्रिकाएं सौंदर्य की दृष्टी से अमूमन काबिलेतारीफ नहीं होती हैं किन्तु ‘इप्टानामा’ इस मिथ का अपवाद है. भगवत रावत (वे इसी पृथ्वी पर हैं), केदारनाथ सिंह (बिना दुभाषिये के), गोरख पाण्डेय (कला, कला के लिए), विनोद दास (मे आई कम इन सर), स्वप्निल श्रीवास्तव (हत्या एक कला की), अली सरदार जाफरी (खूनी सरमाये का निवाला), कैफ़ी आज़मी (मकान), नरेश सक्सेना, आत्मा रंजन, धूमिल, विष्णु नागर आदि की कविता पोस्टरों व कविताओं से ‘इप्टानामा’ को बखूबी सुसाज्जित किया गया है. 
पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित ‘अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस 2013’  के अपने सन्देश में इटली के व्यंगकार, नाटककार, नाट्य-निर्देशक, संगीतकार, अभिनेता, नोबल पुरस्कार विजेता दरियो फ़ो तमाम ज़ोर ज़बरदस्ती के खिलाफ़ आवाज़ बुंलद करने के आह्वान के साथ कह्तें हैं “बहुत समय पहले सत्ता ने कामेडिया दे लार्ट के अभिनेताओं को देश से बाहर कर उसके विरुद्ध अपनी असहिष्णुता को संतुष्ट किया. आज ऐसे ही संकट के कारण अभिनेताओं और थियेटर कंपनियों के लिए सार्वजनिक मंचों, प्रेक्षागृहों और दर्शकों तक पहुंचना कठिन हो गया है. शासकों को अब उन लोगों से कोई समस्या नहीं, जो विडंबना और व्यंग की अभिव्यक्ति करते हैं क्योंकि न तो अभिनेता के लिए कोई मंच है और ना ही दर्शक, जिसे संबोधित किया जा सके.” रंगमंच की ताकत फ़ो इन पंक्तियों में व्यक्त करते हैं – आँखे जो देखती हैं, वह इन किताबों में पढ़ेजाने की तुलना में कहीं अधिक गहराई से आत्मा को प्रभावित करता है.” वहीं अन्तर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस 2013 के अपने सन्देश में ताइवान के विश्वविख्यात नृत्य प्रशिक्षक लिन व्हाई मिन कहतें हैं – “नृत्य एक शसक्त अभिव्यक्ति है, जो धरती और आकाश से संवाद करती है. हमारी खुशी, भय और आकांशाओं को व्यक्त करती है. नृत्य अमूर्त है, फिर भी जन के मन के संज्ञान और बोध को परिलक्षित करता है, मनोदशा को और चरित्र को दर्शाता है. आज के डिजिटल युग में, भाव-भंगिमाओं को छवियां लाखों रूप लेती हैं. वो आकर्षक होती हैं. परन्तु ये नृत्य का स्थान नहीं ले सकती क्योंकि छवियां साँस नहीं लेतीं. नृत्य जीवन का उत्सव है. आईये अपने टेलीविजन बंद कीजिये. कंप्यूटर शटडाउन कीजिये और नृत्य करने आईये. अपने आपको उस श्रेष्ट और सुन्दर वाद्य के माध्यम से अभिव्यक्त करिये, जो हमारा शरीर है.” इन दोनों आलेखों का हिंदी अनुवाद अखिलेश दीक्षित ने किया है.
सम्पादकीय आलेख में सम्पादक दिनेश चौधरी चिंता ज़ाहिर करते कि “अनेकानेक कारणों से थियेटर करना अब मुश्किल होता जा रहा है. अब राज्याश्रय केवल उन्हीं कलारूपों के लिए सहज हासिल है जो बाज़ारवादी व नवउदारवादी व्यवस्था के पोषण में निर्लज्ज सहमति प्रदान करते हों. इसके विपरीत प्रतिबद्द-शौकिया रंगमंच करनेवालों के लिए स्पेस छीनता जा रहा है और नुक्कड़ नाटक जैसे मारक विधा को सरकारी योजनाओं व गैर-सरकारी संगठनों ने हाइजैक कर लिया है. नाटकों को प्रतिबंधित व रंगकर्मियों को जेल भेजने का सिलसिला भी चल पड़ा है. यानी, किसी न किसी रूप में अपने शहर को थियेटर मुक्त करने की प्रक्रिया जारी है.”
दस्तावेज़ कॉलम के अंतर्गत कुल तीन लेख प्रकाशित हैं. इप्टा के पचास साल पुरे होने के उपलक्ष्य पर कैफी आजमी द्वारा दिए वक्तव्य को लेख की शक्ल में प्रकाशित किया गया है. कैफी आजमी उस वक्त इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, अपने इस वक्तव्य में वे उस वक्त के चुनौतियों के प्रति सजग और इप्टा को और ज़्यादा सरगर्म बनाने की वकालत करते हुए कहते हैं – “किसी भी थियेटर के लिए अहम् दिन वह होता है जिस दिन वह बामकसद और ख़ूबसूरत नाटक खेलने में कामयाबी हासिल करे.”  अगला आलेख रामविलास शर्मा के इप्टा, आगरा से जुड़ाव और उनकी रंग-गतिविधियों के बारे में हैं जिसे कलामबद्द किया है इप्टा से संस्थापक सदस्य राजेन्द्र रघुवंशी जी का है, प्रस्तुति सचिन श्रीवास्तव की है. सन 1955 में प्रकाशित बलराज साहनी का सिनेमा और नाटक शीर्षक आलेख भी यहाँ संलग्न है.
समाज और संस्कृति कॉलम के तहत कुल तीन आलेख हैं. रनबीर सिंह का आलेख अंग्रेज़ी में है ‘कल्चर इन्स्योर्स यूनिटी एंड स्टेबलिटी आफ सोसाइटी’ तथा जयप्रकाश का ‘नव ओपनिवेशिक अतिक्रमण का सांस्कृतिक प्रोजेक्ट’ शीर्षक से प्रकाशित आलेख के केन्द्र में जयपुर साहित्य उत्सव 2012 है. वो सुबह कभी तो आएगी की घोषणा के तहत ज्ञानोदय से बाज़ारोदय नामक अपने बेहतरीन आलेख में अजय आठले छत्तीसगढ़ी संस्कृति के बहाने कला, समाज, विस्थापन, विकास, बाज़ारवाद, शहरीकरण आदि की बात करते हुए कहतें हैं कि “विजेता की संस्कृति हमेशा हावी रहती है, ऐसी बात नहीं है. वह विजित की संस्कृति से पहले टकराती है, फिर घुलमिलकर नया रूप धारण करती है.”
आमने-सामने कॉलम के तहत दो साक्षात्कारों का प्रकाशन किया गया है. वरिष्ट कवि व नाटककार राजेश जोशी का साक्षात्कार हरिओम राजोरिया, बसंत सकरगाय व सचिन श्रीवास्तव तथा इप्टा के महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी का साक्षात्कार सचिन श्रीवास्तव ने किया है. दोनों ही साक्षात्कार में जनपक्षीय रंगकर्म के व्यावहारिक-सैधांतिक पहलुओं पर बातें की गई है. राजेश जोशी कहतें हैं “अब कारपोरेट हाउस और सरकार यह बता रही है कि कैसा नाटक करें. अब थियेटर सजावटी सा हो गया है. इसमें न कोई सोशल मैसेज है, न पॉलिटिकल. ऐसे नाटक होने लगे हैं जो किसी के लिए असुविधा पैदा नहीं करते. ग्रांट लेकर थियेटर करनेवाले समूह से तो उम्मीद करना बेकार है. नाटक ऐसी विधा नहीं है कि इसे सरकारें कंट्रोल कर सकें.” अपने विस्तृत साक्षात्कार में जितेन्द्र रघुवंशी ज़मीनी स्तर पर रंगमंच के विस्तार को ज़ोर देते हुए कहतें हैं कि “थियेटर करना ज़्यादा मुश्किल होता जाएगा. रंगकर्मियों को अपनी आजीविका के प्रति सावधान रहना होगा.” नुक्कड़ नाटकों के संदर्भ में वे कहते हैं कि “आज इसका मुहाबरा बड़ा ही राटा-रटाया और स्टीरियोटाइप हो गया है, नए ढंग से बात करने की ज़रूरत है. रंग आंदोलनों को तो पॉपुलर कल्चर में भी हस्तक्षेप करना चाहिए. विचार और कला दोनों का प्रशिक्षण ज़रुरी है. सारा थियेटर क्रांतिकारी या सामाजिक हो जायेगा, इसकी उम्मीद बेमानी है. सभी तरह के फूल खिलें. लेकिन देश की बहुसंख्य गरीब जनता को संबोधित रंगमंच विकसित करना ज़रुरी है. वह रंगमंच जो सिर्फ आनंद ही न दे, बल्कि सोचने के लिए बाध्य करे. हमें थोड़े लोगों का विशिष्ट रंगमंच नहीं चाहिए.”
रंगकर्म और मिडिया विषय पर कुल दो आलेख और एक रिपोर्टिंग है; रंगमंच और मिडिया : विकास की उल्टी प्रक्रिया, रंगकर्म को अपनी आलोचना खुद गढ़नी होगी (संजय पराते) और हमें उनसे वफ़ा की है उम्मीद (रिपोर्ट – दिनेश चौधरी). इन तीनों को मिलाकर जो मूल स्वर उभरकर सामने आता है वो यह कि “मिडिया की चाहे जितनी भी आलोचना क्यों न की जाय, उसका सम्मोहन अपनी ओर खींचता ही है. आज मिडिया में रंगमंच को जो जगह मिल रही है वह समीक्षा नहीं मात्र रिपोर्टिंग है, जिसका आधार नाटक के ब्रोशर्स हैं. रंगमंच की खबरनवीसी, आलोचना, समीक्षा एक ऐतिहास महत्व का काम है. किन्तु एक ख़ास किस्म की मृगतृष्णा और हड़बड़ी की चपेट में आज रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक सब हैं. रंगमंच अपने-आपमें एक मिडिया है इसलिए इसे अपनी आलोचना खुद गढनी चाहिए.”
संगे-मील कॉलम के तहत कुल पांच आलेख हैं. ‘अच्छा इंसान ही बन सकता है अच्छा कलाकार’ शीर्षक के तहत रमेश राजहंस अदाकार एके हंगल से जुड़ी ज्ञानवर्धक यादों को साझा कर रहें हैं. एक वाक्या कुछ यूं है : “हंगल का मार्क्सवादी सिधान्तों पर अटूट आस्था थी, किन्तु वह कभी इसे दूसरों पर थोपने की कोशिश नहीं करते थे. उनके मित्र मज़ाक में कहते कि कम्यूनिस्टों को दुनियां बदलना है, अब आप ऐसे पैसिव रहेंगें, तो दुनियां कैसे बदलेगी सर !” हंगल साहेब का जवाब होता – “देखो जी, घोड़े को घास के पास ले जाया जा सकता है, ज़बरदस्ती खिलाया नहीं जा सकता.” चित्रकार व सामाजिक कार्यकर्त्ता चित्तप्रसाद को याद करते हुए अशोक भौमिक, बलराज साहनी को श्रद्धान्जली देता हुआ रश्मी दोरास्वामी, फोटोग्राफर सुनील जाना पर आधारित विनीत तिवारी एवं लेखक, नाटककार, अभिनेता कामतानाथ पर लिखा राकेश का आलेख पत्रिका की धरोहर है. इनके साथ ही साथ जन्मशती वर्ष के अवसर पर हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, विष्णु प्रभाकर, मख्दूम मोहिउद्दीन, मंटो, के.के.हैब्बार, अली सरदार जाफरी, असरार-उल-हक ‘मजाज’, हेमांग बिस्वास, अशोक कुमार, उपेन्द्रनाथ अश्क, प. नरेंद्र शर्मा का संक्षिप्त परिचय भी संलग्न है.
अनुदान और आयोजन कॉलम के तहत कुल दो आलेख हैं, उषा वैरागकर आठले का नाट्य समारोह और सांस्कृतिक राजनीति व हनुमंत किशोर का रंगमंच का मरण उत्सव. दोनों आलेख वर्तमान में चल रहे नाट्य समारोहों व अनुदान रुपी अनुष्ठानों की पड़ताल करते हुए सत्ता की वर्चस्ववादी व चाटुकारितापूर्ण उस सांस्कृतिक राजनीति की पड़ताल करती है जो रंगमंच से जनपक्षीय विचार को ख़ारिज कर एक ‘खास’ प्रकार की मानसिकता पूरी बेशर्मी से थोप रही है. इन दोनों आलेखों में कुछ भ्रामक तथ्य हैं जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए था.
विविधा कॉलम के तहत प्रकाशित शकील सिद्धीकी का आलेख ‘एक आग जो जलती है’ अभी को एक तरह से भारतीय प्रगतिशील लेखक आंदोलन के उतार-चढाव का लेखा-जोखा कहा जा सकता है. अपने इस आलेख में शकील लिखतें हैं “एक हथौड़े वाले से कई हथौड़े वाले फौलादी हाथों वाले होते चले जाने के बावजूद पूंजीवाद का कुछ नहीं बिगड़ा. कई दिनों बाद घर में दाने आने की दारुन स्थिति अब भी शेष है. वाम दिशा विहान दिशा हो आई है. बावजूद इसके यह नहीं कहा जा सकता कि भोर का स्वपन अपना समूचा सम्मोहन खो चुका है. जो आग 1936 (प्रलेस का पहला अधिवेशन) में रौशन हुई थी, उसकी आंच कम हुई है पर वह बुझी नहीं है.” प्रबीर गुहा अपने आलेख को ‘मैं और मेरा रंगमंच’ तक ही सीमित रखते हैं. अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा करीब से पर नासिर अहमद सिकंदर की टिपण्णी व आत्मकथा का एक अंश भी प्रकाशित किया गया है.
नाट्यलेख कॉलम के तहत नाटक ‘अरण्य-गाथा’ प्रकाशित है. प्रेम साइमन लिखित यह नाटक एक ही साथ बहुत सारी विषयों को छू लेने, कथ्य-शिल्प के स्तर पर ढेर सारे प्रयोग कर देने की हड़बड़ी का शिकार है. यहाँ संस्कृत नाटकों से नुक्कड़ नाटक तक की तीब्र यात्रा है. वहीं ऐसे धार्मिक प्रतीकों का भी प्रयोग है जिनकी आज भी भारतीय जनमानस में अपनी एक ‘खास’ पहचान है. ऐसे प्रतीकों को लेकर आधुनिक नाटक रचा जा सकता है किन्तु जो सावधानी यहाँ बरती जानी चाहिए थी, वो गायब है. शायद इसिलिय यह नाटक सब कुछ कहने की पीड़ा से ग्रस्त होकर अन्तः यथास्थितिवाद का ही पोषक बन जाता है. नायक (राम) को जनता को कोई प्रतिकार नहीं दिखता और अन्तः “अभागों, उठो, जागो, साहस करो” जैसे निरा बौधिक और स्टीरियोटाइप प्रलाप करके नाटक समाप्त हो जाता है. विकल्पहीनता व जबरन का विकल्प, दोनों ही प्रकार की प्रवृति खतरनाक है.
‘इप्टानामा’ में कुछ आलेख अंग्रेज़ी में हैं. बहुभासिये पत्रिका का अपना एक महत्व हो सकता है किन्तु पत्रिका किसी एक भाषा में ही निकले तो ज़्यादा सहज है. कुल 250 पृष्ठों की यह पत्रिका संग्रहणीय है. इस तरह की पत्रिकाओं की आज सख्त ज़रूरत है. यदि चुनौती स्वीकार की जाय तो इप्टा जैसे संगठन, जिसकी पुरे देश में लगभग 600 इकाइयां हैं, के लिए इस पत्रिका को एक निरंतरता प्रदान करना कोई मुश्किल काम भी नहीं है. रंगमंच पर गंभीर चिंतन, लेखन, दस्तावेज़ीकरण आदि भी एक महत्वपूर्ण काम है, जिसे अब तक हम (लगभग) अनदेखा करते आए हैं. 
इप्टानामा, सहयोग राशि : 50 रूपये. सम्पादक : दिनेश चौधरी. प्रकाशक : इप्टा के लिए विकल्प, डोंगडगढ़ (छत्तीसगढ़). संपर्क : iptaindia@gmail.com.

Monday, December 2, 2013

गोदान में पांच किलो प्याज़ !

प्याज़ की कसम खाके विश्वास दिलाता हूं कि किसी बाबा के भक्तों या नेता के चमचों की तरह झूठ नहीं बोलूंगा. वैसे भी बड़े-बुजुर्गों का कहना था कि अन्न-जल की कसम खाकर कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए. शायद इसीलिए पुराने लोग खाते वक्त चुप रहते थे. आप चाहे तो पुरातनपंथी कह सकते हैं किन्तु खानेवाले चीज़ और वो भी प्याज़ की कसम खाके झूठ नहीं बोलूंगा. वैसे भी प्याज़ की कीमत आसमान छूकर खाने वालों का जिस प्रकार मुंह चिढ़ा रहीं हैं, आनेवाले दिनों में हो सकता है कि प्याज़ की कसम खाना भी इतना महंगा पड़े कि हिम्मत जवाब दे दे. वैसे आज के युग में ज़रूरत से ज़्यादा सत्यवादी लोग बेचारे कहलाते हैं और तत्काल मेरा मन बेचारा कहलाने का नहीं है.
जबसे कीमतें बढ़ी हैं तमाम मध्यवर्गीय परिवारों की तरह हमने भी तय किया कि बिना प्याज़ के खाना बनाएगें. कुछ दिनों तक यह सिलसिला चला भी. पर क्या करें जीभ जो न कराए. स्वाद कम हिंसक चीज़ नहीं है ! प्रतिष्ठा में प्राण गंवाने का कोई तुक नहीं है सो आखिरकार एक दिन किलो भर बड़े-बड़े प्याज़ ले आए. खरीदते वक्त सोना खरीदने जैसी खुशी मिल रही थी, जैसे कोई अनमोल खजाना हाथ लग रहा था. घर आके लगा कि कहीं छुपा के रखा जाय. चोर घर में आएगा तो सबसे पहले प्याज़ ही चुराएगा.
इन दिनों हमारे शहर में चोरियां बढ़ गई हैं, लोग या तो खुद जागकर पहरा दे रहें हैं या फिर किसी आदमी को नियुक्त कर रहे हैं जो रात भर सिटी बजाकर और डंडे पीटकर “शरीफों” को चैन की नींद सुलाता है. यह हाल पुरे देश का है. हां, देश के सन्दर्भ में अब यह फर्क करना मुश्किल हो गया है कि कौन पहरेदार है और कौन चोर ! वैसे, ‘शरीफों’ की नींद आज भी वैसे ही कायम है.
नींद बड़ी प्यारी चीज़ है. स्वस्थ रहने और सपने देखने के लिए सोना बहुत ज़रुरी है. हो सकता है कि सपनों में आप पचास किलो प्याज़ के मालिक हों, प्याज़ के कोट पहने हों, जूते, टोपी, टाई सब प्याज़ के हों और किसी प्याजू अप्सरा के साथ एक शानदार प्याजू होटल में, प्याज़ की पकौड़ी का आनंद तब तक ले रहे हों जब तक यथार्थ की कड़वी सच्चाई आपके सपनों का मुंह न नोच ले.  
प्याज़, नींद, सपने और यथार्थ के साथ दादाजी की भी बात करते हैं. दादाजी जो एक किसान हैं, मंझोले किसान. ओह हैं नहीं थे. वो थे  और प्याज़ की भी खेती करते थे. प्याज़ की फसल जैसे ही खेत में तैयार होती उसे खरीदनेवाले व्यापारी घूमने और कीमत लगाने लगते थे. दादाजी पूरे घर में मचान बनाकर प्याज़ रखते. दादीजी और बुआजी का काम होता हर ओ-चार दिन में मचान पर चढ़कर प्याज को पलटना और सड़े हुए प्याज़ को निकालना. रोज़ व्यापारी दरवाज़े पर दस्तक देकर रेट बता जाता. दो-चार दिन और रखके देखते हैं, शायद दाम ज़रा और बढ़े – ऐसा पूरा गांव सोचता और रोज़ ढेर सारा प्याज़ कूड़े के ढेर में फेंका जाता. खेत से उखड़ते वक्त प्याज़ जिस दाम पर बिकता है उसे बता दूं तो उन नेताओं के चेहरों पर कालिख पुत जायेगी जो ये कहते हैं कि प्याज़ की कीमत बढ़ने से किसानों को फ़ायदा हो रहा है.
नेता चाहे जैसा भी हो चुकी वह चुनाव नामक जादुई और पहेलीनुमा प्रक्रिया को पार करके जनप्रतिनिधि का मुकुट पहनता है और जिसे लोकतंत्र का पर्याय माना जाता है. इसलिए इनके बारे में कुछ बोलने का कोई अर्थ ही नहीं बनता है. वे बोलें जो इन्हें चुनकर पुष्ट प्याज़ की तरह सीना फुलाकर घूमते हैं कि मेरा प्याज़ (नेता) जीत गया. और जश्न शांत पड़ते ही फिर कुढ़ते हुए कि हमने किस सड़े ‘प्याज़’ को चुन लिया, अगले चुनाव का इंतज़ार करते रहते हैं.
अलग-अलग रूप-रंग के बारह प्याजों के बीच मुकाबला है, इनमें से एक प्याज़ के चयन का हक़ प्रजातंत्र में प्रजा का नैतिक अधिकार है. उसे प्रतिनधि तय करने का अधिकार नहीं क्योंकि इसमें पार्टियों का आरक्षण है. पार्टियां प्यादों को खड़ा करती हैं और जनता उन्हें वोट देकर हराती-जिताती हैं. यह जादुई प्रक्रिया किसी सस्ते लाइन होटल के मिक्स वेज की तरह है, जिसमें कौन-कौन और कैसी-कैसी चीज़ पड़ी है “छोटू” के अलावे कोई नहीं जानता. होटलवाले को पता है कि खानेवाले को बस मज़ा आना चाहिए. जो होटल मज़ा देता है वहां खरीदारों की कतार लग जाती है और छोटू इन कतारों में खड़े “शरीफों” को मुस्कुराता हुआ पच से गुटखे की पीक सड़क पर थूकता है. वैसे जब प्याज़ में आग लगी है लोग होटलों में खाना कम प्याज़ ज़्यादा खाने लगे हैं. कुछ होटलवालों ने प्याज़ की जगह सेव का सलाद देना शुरू कर दिया है वहीं कुछ होटलों ने अपने मुख्य द्वार पर एक बोर्ड टंगवा दिया है जिस पर लिखा है कि यहां पांच सौ रूपये के खाने के साथ प्याज़ का सलाद भी मिलाता है.
प्याज़ और राजनीति में बहुत सारी समानताएं हैं. मसलन – दोनों के कई परतें होतीं हैं, दोनों के उपरी और अंदरूनी रंग में फर्क होता है, दोनों जैसे होते हैं वैसे दिखते नहीं, दोनों के परत दर परत निकालते जाने पर अनतः कुछ हासिल नहीं होता, दोनों एक खास मौसम में फलते-फूलते हैं पर मुनाफ़ा कमाने के लिए सालों भर सहेजकर रखे जाते हैं, दोनों जब लगाए जाते हैं तो हरियाली से भरपूर होते हैं पर जैसे-जैसे पकते हैं हरियाली सुखाने लगती है, दोनों को जमीन से उखाड़कर गोदाम में रखा जाता है और दोनों अपने पैदा करनेवालों के बजाय दूसरों को मुनाफ़ा देते हैं. सबसे ज़रुरी और अहम् बात यह कि दोनों ही अनतः इंसान को रुलाते हैं.
राजनीति में परिवार, चमचा-चमचीवाद और चिकन, मटन व सब्ज़ी में प्याज़ की उपयोगिता जायका बढ़ाती है. यह भी सच है कि प्याज़ की राजनीति भी होती है और राजनीतिक प्याज़ भी होता है.
दुनियां की महाशक्ति वाले देश में बच्चों से पूछा गया कि दूध कहां से आता है. बच्चों ने जवाब दिया दूध वाली मशीन से. इसलिए जो लोग प्याज़ नामक वस्तु, फल, जड़ से नावाकिफ हैं उनके लिए यह बता देना ज़रुरी है कि यह एक ऐसी चीज़ है जो अमूमन खेतों में उगाया जाता है और बाज़ार में बेचा जाता है. इसमें कई परत होते हैं और इसे बहुत दिनों तक साधारण वातावरण के नहीं रखा जा सकता है. इसके लिए अनुकूल वातावरण बनाना होता है. जो लोग भी अनुकूल वातावरण बनाकर प्याज़ को सहेजते हैं और मुनाफ़ा कमाते हैं उन्हें अमूमन जमाखोर कहा जाता है. जो एक संकीर्ण सोच माना जाना चाहिए. वे जमाखोर नहीं समाजसेवक हैं. क्योंकि वो इंसान के जीभ और जायका की सेवा के लिए दिन रात चिंतित हैं, कई बेरोजगारों को रोज़गार देते हैं और सरकारी व गैर-सरकारी तंत्रों को “वेतन” पहुंचाते रहते हैं. ये वेतन न दें तो सरकारी कारकून पता नहीं कबके सर्वहार हों गए होते. इस एवज में ज़रा सा मुनाफ़ा कमाना इनका नैतिक अधिकार बनता है. कम से कम ये सरकारी गोदामों की तरह अनाज को सड़ाते तो नहीं हैं. स्वाद के दीवानों को खुले दिल से इनकी तारीफ़ और धन्यवाद ज्ञापन करना चाहिए और इनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए.
सरकारी गोदामों की जो हालत है ये गैर-सरकारी जमाखोर न हों तो हमारे देश में साल में कुछ महीने ही प्याज़ के दर्शन हों. वैसे यह एक बहस का विषय है कि प्याज़ जड़ है, फल है, सब्ज़ी है या राजनीति. क्योंकि आजकल राजनीति की भी फसल बोई. उगाई और काटी जाती है ! यह एक सदाबहार फसल है जो हर मौसम, हर स्थान, हर दल बोता, सहेजता और काटता है.
वैसे डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती कीमतों के मद्देनज़र प्याज़ की बढ़ती कीमतों से गर्व होना चाहिए कि कुछ तो है हमारे पास जो डॉलर का मुकाबला कर सकता है ! हमारा तंत्र ज़रा सी मेहनत और करें तो हम बहुत जल्द प्याज़ की बदौलत डॉलर को औकात बता सकते हैं और शान से कह सकते हैं कि हिम्मत है तो डॉलर से रोज़ाना सौ किलो प्याज़ खरीदके दिखाओ ! अमेरिकी राष्ट्रपति की हेंकड़ी झट न निकल जाए तो कहना !  
दुनियां में इंसान, इंसान में इंसानियत और किचन में प्याज़ अब खगोलशास्त्रियों के अध्ययन का विषय होना चाहिए क्योंकि अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में वाइरस का प्रकोप आजकल कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है. राजनीतिशास्त्र का सीपियो तो न जाने कब से चोर बाज़ार में धूल खा रहा है. एक से एक समाजवादी, साम्यवादी, दलितवादी, आदिवासीवादी, मनुवादी, इस्लामवादी, चर्चवादी, बुद्धिवादी इंजिनियर लगे पर मामले को सुलझाने के बजाय तारों को इतना ज़्यादा उलझा दिया कि इस सीपियो को ठीक करने से ज़्यादा बेहतर लगता है कि नया ही लगा लिया जाय. लेकिन नए के लिए अभी कोई तैयार नहीं. बुजुर्गों का कथन है कि ज़्यादा प्याज़ नहीं खाना चाहिए. इससे कोई भी समझ सकता है कि नया खिलाड़ी है.  
हम चीज़ें फेकते नहीं सहेज कर रखते हैं. न जाने कब कौन सी चीज़ कब काम आ जाए. इसीलिए हर घर में एक कबाड़ की जगह होती है. राजनीति का सीपियो भी इसी कबाड़ में कहीं पड़ा है !
लो प्याज़ पर बात करते-करते पता नहीं क्या-क्या बक गया. मूल मुद्दे से भटका देना भी एक शानदार कला है, जिसे नहीं आता उसे ज़रूर ही सिखाना चाहिए. वैसे यह विश्वास करना ज़रा मुश्किल है कि यह कला किसी को नहीं भी आता होगा ! हमारे यहाँ तो यह कला बचपन से ही रगों में डाल दिया जाता है. ये पोलियो के नाम पर जो ‘दो बूंद ज़िंदगी की’ पिलाई जाती है उसमें दरअसल पानी के साथ मुद्दे भटकानेवाले वाइरस ही पिलाया जाता है, विश्वास नहीं तो फोरेंसिक जांच करा लें !
एक हैं पोलियोग्रस्त बाबा खुरपेंची. जब ये बच्चे थे तो पोलियो की दावा नहीं पी पाए, सो उम्र कोई मायने नहीं रखता का सिद्धांत मानते हुए बुढ़ापे में पोलियो की एक पूरी खुराक खाने के बाद कहते हैं – “प्याज़ और लोकतंत्र एक मध्यवर्गीय समस्या है. सर्वहारा तमाम चीज़ों के बावजूद जन्मजात क्रांतिकारी होता है और क्रांतिकारियों लोग पेट भरने के लिए खाते हैं स्वाद के लिए नहीं, स्वाद के लिए खाना एक सामंतवादी प्रवृति हैं जिसका विरोध हर क्रांतिकारी को करना चाहिए. स्वाद व्यक्तिवाद का पोषक है. एक क्रांतिकारी समाज में व्यक्तिगत स्वाद की कोई जगह नहीं होती. बुर्जुआ और उच्चवर्ग को न प्याज़ की समस्या से मतलब है ना ही लोकतंत्र की समस्या से.” बोलते-बोलते बाबा खुरपेंची अन्तर्ध्यान हो जाते हैं. भक्त लोग कहते हैं कि बाबा चाइना चले गए माओवाद का ककहरा रटने. बाबा पहले रूस जाते थे - वाया जर्मनी, अब चाइना जाते हैं - वाया नेपाल. इधर  कदम के पेड़ के नीचे खादी का झोला और झोले के अंदर भारतीय संविधान की पुस्तक पर सर रखे एक ऊंघता हुआ आजनबाहू महात्मा सपना देख रहा है कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है और तमाम विकसित देश अपने-अपने फाईटर प्लेनों से पुरी दुनियां पर बमों की जगह प्याज़ बरसा रहें हैं और पूरी दुनिया के लोग अपने साड़ी, लुंगी, गमछों, मच्छरदानी में प्याज़ लूट रहें हैं ! महात्मा झट से चांद पर बैठ जाते हैं और धरती को निहारने लगते हैं जो लाल-लाल प्याजों से पटी पड़ी है. वहां से इंसान नहीं प्याज़ ही प्याज़ दिख रहे हैं.
ओह, दादाजी की कथा तो रह ही गई. विस्तार से क्या बताएं. एक साल जम के प्याज़ उपजा. कोई ढंग का खरीदार न मिला. क़र्ज़ के बोझ तले दबे दादाजी ने सारी फसल सड़क पर डाल दी और खुद अंधे कुएं में कूद गए. इस अंधे कुएं की उम्र और लोकतंत्र की उम्र एक है. भरोसा नहीं तो कुएं पर अंकित इसके उद्घाटन की तारीख आप खुद ही देख लें. 
अंत में एक बात और, चुकी सरकारी मुआवज़ा मिल चुका था इसलिए दादाजी का श्राद्ध बड़े-धूम धाम से किया गया. गोदान में पंडितजी ने बछिया लेने से मना कर दिया, बोले ई सब लेके क्या होगा, गोदान में यदि कुछ देना ही है तो पांच किलो प्याज़ दे दो !  

Wednesday, October 9, 2013

एक दाढ़ीवाला रंगकर्मी और वर्दीवाले गुंडे !


सोमवार,(7 अक्टूबर 2013), की रात करीब बारह बजे बेगुसराय (बिहार) के युवा रंगकर्मी प्रवीन कुमार गुंजन काम खत्म करने के पश्चात अपने सहकर्मी के साथ बेगुसराय रेलवे स्टेशन पर चाय पी रहे कि पुलिस की जीप आकर रुकी और पूछताछ करने लगी. हम कलाकार हैं, काम खत्म करके स्टेशन चाय पीने आए हैं (इतनी रात में स्टेशन के अलावा कहीं और चाय नहीं मिलाती.) चाय पीके अपने घर चले जाएंगे शायद यह बातें पुलिसवालों के किसी काम के नहीं थे तभी तो कुछ ही मिनटों के बाद आलम यह था कि गुंजन को सड़क पर पटक-पटक के पुलिसवाले किसी आतंकवादी की तरह मार रहे थे. उसे जिस बेदर्दी से पीटा गया उसकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप जाए.इतना ही नहीं जम के लात, घूंसा और डंडे बरसाने के बाद उसे लॉकअप में बंद भी कर दिया. प्रवीन गुंजन रंगमंच का एक जाना माना चेहरा न होता तो क्या पता आज उस पर क्या-क्या मुकद्दमें लादी जा चुकी होती. किसे नहीं पता कि पुलिस अपनी कामचोरी बेगुनाहों को झूठे मुकद्दमों में फंसाकर ढंकती रही है. 
आखिर क्या गुनाह था गुंजन का ? यह कि वो रात के बारह बजे चाय पीने निकला ? उसने हाफ़ पैंट पहन रखी थी ? उसकी दाढ़ी बढ़ी थी कि पुलिसवालों से बराबरी से बात कर रहा था ? क्या रात में दोस्तों के साथ मोटरसाइकल से निकलना, हाफ़ पैंट पहनना, दाढ़ी बढ़ाना और पुलिसवालों से बराबरी से बात करना गुनाह है ?यदि इसका जवाब हां है तो यह मान लेना चाहिए कि हम एक बहुत ही खतरनाक समय में रह रहें हैं. साथ ही एक सवाल यह कि बिना किसी अपराधिक रिकॉर्ड, कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित रंगकर्मी को जब इस प्रकार मार-मारके बुरी हालत बनाई जा सकती है तो आम नागरिक इस तंत्र में किस भय में जी रहे हैं इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.
प्रवीन गुंजन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का पूर्व छात्र होने के साथ ही साथ वर्तमान में तेज़ी से उभरता हुआ एक रंग-निर्देशक है. जिसके नाटक देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शित हो प्रसंशा आर्जित कर चुके हैं. लेकिन बंदूक के साए में दिन रात रहनेवाले, बारूद और डंडे की भाषा समझनेवाले,किसी प्रकार रट-रटके, घूस के बल पे नौकरी हासिल करनेवाले इन वर्दीधारियों को इस मुल्क की कला-संस्कृति, कलाकार, मानवऔर मानवीय संवेदना से क्या मतलब! भौतिक सुख के भ्रष्टाचार में नाक तक डूबे इन पुलिसियों के लिए ये सब बातें काले अक्षर भैंस बराबर हैं !वैसे जब कला को समर्थन देने के लिए बनी तमाम राजकीय अकादमियां भी जब कलाकार को गली के कुत्ते से ज़्यादा भाव नहीं देती तो किसी और महकमें से क्या उम्मीद करे कोई !किसी ने सच ही कहा है कि पुलिस महकमा सबसे संगठित और संरक्षित गुंडावाहिनी है. तभी तो लोगों को पुलिस और गुंडों से एक सामान डर लगता है.
प्रवीन गुंजन के सन्दर्भ में सवाल केवल दोषी और अपराधी प्रवृति के पुलिसकर्मियों के तत्काल निलंबन का तो है हीकिन्तु मूल बात यह है कि जिस प्रकार पुलिस महकमा में अपराधी मानसिकतावाले, असंवेदनशील और अ-कलात्मक प्रवृति के लोग भरे पड़े हैं वे आखिर कैसी जन सेवा करेंगें ? किन नागरिकों के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा करेंगा या कर रहे हैं ? जिन्हें पकड़कर हाजत में बंद करना चाहिए उनकी तो सुरक्षा में तैनात रहते हैं और जो अपनी कला से जन में संवेदना का संचार करते हैं उन्हें कानून पालन और प्रजातंत्र की रक्षा के नाम पर अपने फ्रस्टेशन का शिकार बनाते हैं.
यह भी सच है कि इंसाफ के नाम पर ऐसे मामलों में अमूमन क़ानूनी प्रक्रिया के घुमावदार रास्ते पर ऐसा चक्कर लगवाया जाता है कि व्यक्ति गश खाके गिर पड़े. वहीं कई तात्कालिक हल निकलकर मामले की लीपापोती भी कर दी जाती है. मूल बात यह है कि वो कौन सी प्रवृति है जो खाकी धारण करते ही इंसान अपने को सर्वशक्तिमान मान बैठता है और कानून-व्यस्था उसकी रखैल बन जाती है.रक्षक से भक्षक बनाने की इस प्रक्रिया पर लगाम लगाने की ज़रूरत है, न कि जैसे तैसे मामले को सुलटा भर देने की. समस्यायों के तात्कालिक हल से समस्या नहीं हल नहीं होती बल्कि उस पर लीपापोती होती है और लीपापोती से दीर्घकालिक परिणाम नहीं हासिल किए जा सकते. लीपापोती से क्षणिक सत्ता और सफलता पाई जा सकती है आज़ादी नहीं और अगर आज़ादी मिल भी गई तो उसका चरित्र बहुजन हिताय नहीं होगा.
माना कि पुलिसकर्मियों को बड़ी ही अमानवीय और घुटन भरे परिस्थितियों में कार्य करना पड़ता है लेकिन क्या इससे इन्हें यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वे अमानवीय क्रियायों को अंजाम दें. हरगिज़ नहीं. दुखद सच यह है कि इस प्रकार की घटनाएंपुरे देश में दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं. जो किसी भी प्रकार के लोकतान्त्रिक मुल्क के लिए शर्मनाक है !पुलिस की नौकरी का अर्थ केवल अपना और अपने परिवावालों के पेट पालना और रिटायरमेंट के बाद पेंशन पाने के लिए नहीं होता, यह एक ज़िम्मेदारी है, एक गंभीर ज़िम्मेदारी. कर्तव्य, निष्ठा और संविधान की रक्षा की झूठी कसमें खानेवाले इन महानुभावों ने शायद ही संविधान और नागरिक अधिकारों की पुस्तकों को पलटा हो. वो कौन सा अपराध है जो ये पुलिसवाले नहीं करते ?लोगों को जूठे मुकद्दमे में फंसाना, हाजत में मासूमों का रेप, हफ्तावसूली, शराब पीकर पेट्रौलिंग, आदि ख़बरें तो आम हैं.
जिस बेगुसारय की धरती पर कानून के दानवी अवतारों ने एक युवा रंगकर्मी की पीट-पीटकर बुरी गत बना दिया गया वह स्थान कभी बिहार की साहित्यिक राजधानी मानी जाती थी. मुझे तो शक है कि पुलिसवालों ने राष्ट्रकवि दिनकर का नाम भी सुना होगा कि नहीं ! कोई दरोगा यह न कह बैठे कि कौन है दिनकर उसे थाने में पकड़ लाओ, उसको राष्ट्रकवि कहनेवाला चोर होगा. क्योंकि जब गुंजन पुलिसवालों को यह बताने की कोशिश कर रहा था कि वो भारत के राष्ट्रपति के हाथ से सम्मनित हो चुका है तो पुलिसवालों ने जवाब में जो कुछ कहा वो जस का तस यहाँ लिख देने पर राष्ट्रपति महोदय के सम्मान में ‘चार-चांद’ लग जायेगें और मुझपर मुकद्दमा ! ताकत के मद में चूर ये वर्दीवाले गुंडे हैं आखिर, उन्हें किसी देश-राष्ट्र से क्या मतलब ! वैसे भी आतंकवादियों का कोई देश, जात, धर्म और चेहरा नहीं होता, मानवता तो होती ही नहीं. ज़रा सा शर्म होती तो गुंजन के शरीर और मन पर लगी चोट को देखते हुए तत्काल इन पुलिसवालों के खिलाफ़ करवाई की जाती. पुलिस के डंडे किसी संवेदनशील इंसान के शरीर पर पड़ें तो उसकी अंतरात्मा और आत्मसम्मान तक ज़ख़्मी हो जाता है. क्या यही है मेरा भारत महान की परिकल्पना ? क्या हमें इस तंत्र का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने गुंजन को बिना किसी मुकद्दमे में फंसाए छोड़ दिया ! उसे जिस तरह से पीटा जा रहा था, कोई आश्चर्य नहीं कि पुलिसवाले उसे जान से मार देते.
व्यवस्था का यह असंवेदनशील चेहरा कोई नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि जन संस्कृति के निर्माण में कार्यरत लोग पर इस तंत्र ने कैसी क्रूरता नहीं बरती हैं, झूठे मुकद्दमें लादकर वर्षों जेलों में कैद रखा है, गोलियां बरसाई, फर्जी इनकाउंटर तक कर दिया. कानून व्यवस्था के नाम पर यह प्रक्रिया आज भी निरंतर जारी है. आज यह व्यवस्था इतनी ज़्यादा अराजक हो चुकी है कि वो हर उस व्यक्ति को अपनी चपेट में लेकर कुचल डालना चाहती है जो किसी भी वजह से इससे आंख मिलाकर बात करने की हिम्मत करता है. हमारी मजबूरियां, हमारा विशिष्ट होने का दंभ और हमारा मौन ऐसी कारवाइयों का मौन समर्थन हैं. आज ज़रूरत है तमाम अंतर्विरोधों को दरकिनार कर, अपने बने-बनाए दायरों और सफलता-असफलता के बने बनाए मापदंडों से परे हटकर सामाजिक सच से साक्षात्कार करने की, नहीं तो वह समय दूर नहीं जब सारे कोमल और सुगन्धित फूल या तो कुचल दिए गए होंगें या फिर सत्ता के गलियारे में पेशाबघर के पास सजाए जा रहे होंगें. समाज ज्वलंत सवालों से टकरा रही है ऐसे समय में समाज में चल रहे उथल पुथल से कोई सरोकार न रखते हुए केवल कला की बात करना आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है. हम कलाकार हो, कवि हों, कथाकार हो, फिल्मकार हो या जो भी हो, समाज व्याप्त अच्छाई-बुराई से बचे नहीं रह सकते, चुकी हम सब भी इसी समाज के हिस्से हैं इसलिए आज नहीं तो कल तमाम तरह के सामाजिक अच्छाई-बुराई हमारे दरवाज़ों पर भी दस्तक देगा ही.गुंजन के साथ जो कुछ भी हुआ वो कल हम सबके साथ भी हो सकता है, हो रहा है. एक सार्थक कलाकार का दायित्व है कि वो अपनी कला और कला की सामाजिक स्वीकारोक्ति के साथ ही साथ सामाजिक बुराइयों के लिए भी आवाज़ बुलंद करे.
ईमानदार लोग हर जगह हैं, निश्चित रूप से पुलिस में भी होंगें ही. किन्तु ईमानदार लोग की इस देश में क्या दशा है यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. ईमानदार आदमी के साथ “बेचार” नामक टैग लगा दिया जाता है. अभी पिछले दिनों झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगा था. राज्यपाल महोदय ने पुलिस के तमाम बड़े अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई और सबसे पहला सवाल यह किया कि कौन-कौन ईमानदार हैं ? केवल एक अफसर ने हाथ उठाया और रोने लगा. बाद में उसने बताया कि उसे इमानदारी की क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ती है. बेचारा ईमानदार आदमी !

Saturday, August 31, 2013

रंगमंच और मीडिया : विकास की उल्टी प्रक्रिया !

मीडिया मूलतः दो प्रकार का है - प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक | रंगमंच के बारे में विद्वानों का मत है कि यह भी मूलतः दो प्रकार का ही है – शौकिया और व्यावसायिक | जात्रा, पारसी, नौटंकी के साथ ही साथ पारंपरिक रंगमंच लगभग लुप्तप्राय हो चुके हैं | भारत में व्यावसायिक रंगमंच कहाँ और कितना है यह एक शोध का विषय हो सकता है ! भारतीय रंगमंच का मूल स्वरुप शौकिया ही है | मीडिया का दायरा जहाँ दिन-प्रतिदिन और ज़्यादा विस्तृत हो रहा है वहीं रंगमंच का दायरा तमाम सरकारी सहयोगों के बावजूद दिन-प्रतिदिन सिमट रहा है | कैरियरिज़म के वर्तमान दौर में यह सिमटन वैचारिक, सामाजिक, राजनैतिक, व्यक्तिगत आदि स्तरों पर देखी जा सकती है | रंगमंच क्यों ? इस छोटे से सवाल का जवाब आज बड़े-बड़े रंगकर्मियों और समाज के पास नहीं है ! शायद इसीलिए नाट्य विद्यालयों से निकलनेवाले छात्र एकाएक बेमकसद होकर खाक छानने को अभिशप्त हैं, क्योंकि रंगमंच करने के पीछे उनका उद्येश्य नाट्य विद्यालय में दाखिला लेना था | दाखिला मिल गया, पास आउट भी हो गए, अब ? बिना मकसद के संचालित होने वाला कलाकर्म हर स्तर पर अराजकता और व्यक्तिवाद को ही बढ़ावा देगा, ये तय है |
रंगमंच एक समय में एक स्थान पर होनेवाला कलाकर्म है और मीडिया एक चीज़ को घर-घर पहुंचानेवाला माध्यम | सूचनाएं, न्यूज़ और व्यूज़ के सहारे चलनेवाला मीडिया रंगमंच से और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जोड़ने, इसके दस्तावेज़ीकरण, समीक्षात्मक चिंतन में एक प्रखर भूमिका का निर्वाह कर सकता है | उपरोक्त बातें हम केवल प्रिंट मिडिया के सन्दर्भ में कर रहें हैं क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मिडिया ने अभी तक रंगमंच को कोई खास जगह नहीं दिया है | भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अभी नया है और फिलहाल पेड न्यूज़, ब्रेकिंग न्यूज़ और टीआरपी की चपेट में फंसकर गलाकाट प्रतियोगिता में संलग्न है | हमारे यहाँ लगभग हर चीज़ का एक अलग चैनल है सिवाय पारंपरिक कला और रंगमंच के | वैसे प्रिंट मीडिया की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है | विज्ञापनों के साथ ही साथ क्रिकेट और सिनेमा की खबरें हर अखबार को अपने कब्ज़े में जकड़ चुकी है वहीं नाटकों के मंचन से लेकर प्रतिबंध जैसी ख़बरें बमुश्किल ही यहाँ स्थान बना पातीं हैं |
मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्भा है लेकिन भारतीय सन्दर्भ में यदि लोकतंत्र की बात करें तो ये साफ़ लगता है कि यह अभी वयस्क नहीं हुआ है बल्कि दिन-प्रतिदिन खतरनाक रूप से अराजक होता जा रहा है | असहमति का स्वर अब विद्रोह माना जाता है | क्रिकेट के एक शतक से एक व्यक्ति लखटकिया नायक हो जाता है वहीं पूरा जीवन कला, साहित्य, रंगमंच की सेवा करनेवाला कलाकार और आम आवाम जीवन की मूलभूत सुविधाओं तक से महरूम है | ऐसी स्थिति में लोकतंत्र के खम्भों की क्या हालत होगी इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है | चंद बड़े नामों को छोड़ दें तो पत्रकारों की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है |  
एक वक्त था जब अधिकतर प्रतिष्ठित अखबारों में साप्ताहिक कला और संस्कृति नामक पन्ना प्रकाशित हुआ करता था जिनमें नाटकों, गीत, संगीत, नृत्य आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर समीक्षात्मक व सूचनात्मक आलेखों का प्रकाशन होता था |  तब समाचार का मूल माध्यम अखबार, रेडियो तथा दूरदर्शन हुआ करता था | फिर विचार के अंत (Post Modernism) की घोषणा के साथ उदारीकरण, निजीकरण और बाज़ारवाद का ऐसा दौर आया और उसी के साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया की कुछ ऐसी आंधी चली कि लगा अखबार के दिन गए ! पर ऐसा हुआ नहीं | हाँ, अखबारों ने इस दौरान अपना स्वरूप बदला और धीरे- धीरे उन खबरों को विलुप्त करता गये जो ‘गंभीर’ की श्रेणी में आती थीं | कला-संस्कृति भी यहाँ से विलुप्त हो गई और किसी ने मीडिया के इस कुकर्म का सामूहिक विरोध नहीं किया ! अख़बारों के सम्पादक अब केवल सम्पादक नहीं रहे बल्कि नफ़े-नुकसान का बही-खाता संभालने वाले एक ऐसे जीव के रूप में परिवर्तित हो गए हैं जिन्हें अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए मुनाफ़े का मंजन घिसते रहना था | नीति साफ़ थी कि अखबार अब उन्हीं ख़बरों को छापेगा जो सनसनी पैदा करे | कला-संस्कृति की ख़बरें कौन पढ़ता है ?
भारत में रंगमंच का इतिहास सदियों पुराना है पर रंगमंच पर कोई निष्पक्ष और निरंतर पत्रिका नहीं है, जो हैं उनकी स्थिति न होने जैसी ही है | जहाँ तक सवाल साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का है तो सिनेमा पर तो वे बड़े ही गर्व के साथ विशेषांक निकालते हैं किन्तु रंगमंच व अन्य कलाओं के लिए यहाँ अघोषित रूप से प्रवेश निषेध है ! वहीं संगीत नाटक अकादमियां न जाने कब की भ्रष्ट, अराजक और दिशाहीन हो चुकीं हैं | यहाँ अब कला-संस्कृति के नाम पर पैसों के बंदरबांट, कमीशनखोरी के सिवा कुछ नहीं होता है |
यह एक तरफ़ चीज़ों के तकनीकीकरण का दौर है वहीं सामाजिक चिंतन के स्तर पर व्यक्तिवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, समुदायवाद, आत्ममुग्धता, वैचारिक दिवालियेपन और सामूहिकता के ह्रास का काल भी है | इससे कोई नहीं बचा – न नाटक, न मीडिया, न परिवार और ना ही समाज | नाटक करने के लिए नाटक करने और उद्देश्पूर्ण नाटक करने में बहुत फर्क है | ग्रांट और महोत्सव आधारित रंगमंच के वर्तमान युग में गंभीर चिंतन-मनन, आलोचना-समालोचना, बात-विचार, प्रतिबद्धताएं अब रंगकर्मियों के सिर में दर्द पैदा करने लगी हैं | रंगमंच का सरोकार समाज से हो या न हो किन्तु रंगमंच सामाजिक परिघटनाओं से अछूता रह पायेगा ऐसा सोचना मूर्खता है |
रंगमंच का एक अति महत्वपूर्ण अंग है – नाट्यालोचना, जो अमूमन पत्र-पत्रिकाओं के मार्फ़त ही होती है | वर्तमान में नाट्यालोचना की स्थिति ये है कि नाटकों पर आलोचनात्मक टिपण्णी करने पर रंगकर्मियों ने समीक्षक/आलोचक को सैधांतिक या शारीरिक हिंसा से साक्षात्कार करवाया और बहिष्कार तक की घोषणा कर दी ! वहीं दूसरा सच ये कि वो लोग भी नाटकों पर अपनी कलम चलाने से बाज नहीं आते जिनको रंगमंच के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं की उतनी समझ नहीं कि वो रंगमंच की समीक्षा करें | रंगकर्म वर्तमान में घटित होनेवाला कलामाध्यम है, इसलिए नाट्यालोचना की प्रवृति अन्य कला माध्यमों से ज़रा अलग होती है | साहित्य, फिल्म, चित्रकला, मूर्तिकला ऐसी विधाएं हैं जो अपने पाठकों, दर्शकों, रसिकों के लिए सदा उपलब्ध रहतीं हैं | कोई भी इन्हें पढ़, देखकर इनकी समीक्षा से इतर अपने विचार बना सकता है, किन्तु किसी भी नाट्य प्रस्तुति के प्रदर्शन को उसी स्वरुप में चिरकाल तक जारी रखना संभव नहीं | एक ही दल द्वारा किया गया एक से दूसरा प्रदर्शन कम से कम संवेदनात्मक स्तर पर एक दूसरे से अलग होता है | नाट्य-साहित्य, नाट्य प्रदर्शन का स्वरूप ग्रहण करके ही अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है | अगर हम पूर्व प्रदर्शित नाटकों के बारे में जानकारी चाहते हैं तो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उस नाटक की समीक्षा और समाचार महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं | इसीलिए नाटकों की खबरनवीसी, आलोचना, समीक्षा आदि एक ऐतिहासिक महत्व का काम हो जाता है | किन्तु यथार्थ ये है कि एक ख़ास तरह की मृगतृष्णा और हड़बड़ी की चपेट में आज रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक सब हैं |
भारत एक ऐसा कृषि प्रधान सांस्कृतिक देश है जिसके हुक्मरानों और आवाम को न तो कृषि की चिंता है ना ही संस्कृति की | जिस देश की जनता अनगिनत मजबूरियों का बोझ लादे केवल वोट डालके अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाय वहां इससे बेहतर स्थिति की उम्मीद भी नहीं की जा सकती | औद्योगिक विकास के पागलपन में एग्रीकल्चर (कृषि) की बात तो खींच तानके कभी-कभार हो भी जाती है पर कल्चर (संस्कृति) की बात ? समाज का कोई भी अंग यदि अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह नहीं करता तो निरर्थक है | सार्थक मीडिया और सार्थक रंगमंच का मूल काम व्यवसाय से ज़्यादा लोगों की चेतना जागृत और कोमल करने का होता है, यह पारस्परिक सहयोग से चलनेवाली प्रक्रिया है | निरपेक्षता का भाव समर्थन होता है और विरोध भी | इतिहास किसी को माफ नहीं करता, चाहें वो रंगकर्मी हो, समाज हो या मीडियाकर्मी | विकास का आधार केवल आर्थिक नहीं होता बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक भी होता है जिसकी प्रक्रिया अंदर से शुरू होती है, जो विकास बाहर से थोपा जाय वो विनाश, अराजकता और विस्थापन को बढ़ावा देता है | सनद रहे, मुक्ति अकेले में अकेले की नहीं बल्कि सबके साथ होती है |
इप्टानामा नामक पत्रिका में प्रकाशित.


Tuesday, August 27, 2013

कथाकार मधुकर सिंह एक सपना देखते हैं.

मधुकर सिंह 
वैसे तो हिंदी साहित्य में रुचि रखनेवाले लोग मधुकर सिंह के नाम से भली भांति परिचित होगें ही फिर भी संभव है कि कुछ लोग यह सवाल करें कि ये कौन हैं ? बिहार के भोजपुर जिला के धरहरा गाँव के निवासी मधुकर सिंह कई प्रसिद्ध कहानियां और उपन्यास लिख चुके हैं. 2 जनवरी, 1934 को बिहार के एक ग्रामीण अंचल में जन्मे मधुकर सिंह की प्रमुख कृतियां पूरा सन्नाटा, भाई का जख्म, अगनुकापड़, पहला पाठ, माई (कहानी संग्रह); सबसे बड़ा छल, ‘सोनभद्र की राधा, सीताराम नमस्कार, सहदेव नाम का इस्तीफा, जंगली सूअर, मनबोध बाबू, बेमतलब बदनाम ज़िन्दगियाँ, उत्तरगाथा, आगिन देवी (उपन्यास) तथा सन् साठ के बाद की कहानियॉं, ग्राम्य जीवन की श्रेष्ठ कहानियॉं का संपादन सहित कई नाटक भी इनके नाम हैं. लेखन के लिए कई सम्मान से सम्मानित भी हैं. देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी है. इस बार नामक पत्रिका का संपादन भी किया.
यही मधुकर सिंह पिछले कई साल से लापता ज़िंदगी जी रहे थे. एकाएक राजभाषा विभाग द्वारा जोहांसबर्ग में आयोजित हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने के लिए इनके नाम का चयन किया जाता है और अधिकारीगण मधुकर सिंह नामक व्यक्ति की खोज में निकाल पडतें हैं. तमाम खोजबीन करने के बाद जब ये मिलते हैं तो पता चलता है कि इनकी हालत विदेश क्या किसी भी यात्रा के लायक नहीं है. आगे की कथा आप मधुकर सिंह की ही ज़ुबानी सुनिए – “मैं सात साल से बिस्तर पर पड़ा हूं. पैसे के अभाव में इलाज नहीं हो पा रहा है. मैं साहित्यकार हूं. भारत का प्रतिनिधित्व भी करना चाहता हूं. लेकिन साहित्यकारों को आज पूछ कौन रहा है. केवल हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही साहित्यकारों को सरकारें याद करती हैं. यदि मेरी खोज-खबर राज्य सरकार ने पहले की होती, तो आज मैं विदेश जाने में सक्षम होता. सरकार विदेश भेजने के प्रक्रम में जो राशि मुझ पर खर्च करना चाहती है, वह मुझे दे दे. ताकि मैं अपना इलाज करा सकूं.”
इस घटना के बाद जब मीडिया ने बिहार के कुछ साहित्यकारों के मुंह से बात निकलवाई तो बेचारे प्रगतिशीलता का मुखौटा ओढने की मजबूरी से कैसे बच सकते थे. झट से व्यवस्था और समाज को कोसने लगे ये भूलकर कि स्वयं इन्होनें भी इतने सालों में मधुकर सिंह की कोई खोज खबर नहीं ली. कुछ नहीं तो कम से कम मधुकर जी के ये महान समकालीन प्रगतिशील मित्रगण इनके बारे में एक आलेख तो लिख ही सकते थे या किसी प्रकार की कोई अपील कर हिंदी साहित्य जगत और आम जन से कोई मदद तो मांग सकते थे. पर लिखे तब न जब कुछ पता हो, कोई खोज खबर ली हो, और अगर पता होते हुए भी जिन्होंने चुप्पी साध रखी हो, वे किसी मिट्टी के बने हैं, वही बता सकते हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि सब जैसे हाथ में गेंदे का फूल लेकर लोगों के मृत्यु का इंतज़ार कर रहे हों, ताकि तस्वीर पर पुष्प अर्जित करते इनकी तस्वीर अखबारों में छपे. क्या श्रद्धांजलि सभाओं में मरनेवाले से जुड़े संस्मरणों को सुनाने में इन जैसे साहित्यकारों को शर्म नहीं आनी चाहिए ? कहा जाता है कि कला और साहित्य समाज का दर्पण होते हैं और कलाकार, साहित्यकार दुनियां की सबसे संवेदनशील विरादरी होती हैं. जिस समाज के साहित्यकार, कलाकार इतने संवेदनहीन हों वहाँ कैसी कला और साहित्य की रचना होगी इसका अनुमान आराम से लगाया जा सकता है. जब हमारे अंदर इतनी भी संवेदना नहीं है तो क्या कला और क्या साहित्य ! दुनिया में परिवर्तन जब होना होगा तब हो जायेगा पर संवेदनशीलता, प्रगतिशीलता आदि का दावा करनेवाले लोग आज कहाँ हैं और क्या कर रहें हैं ?
पटना के अखबारों में इससे संबंधित सूचना प्रकाशित हुई तो मदद के नाम पर कुछ खानापूर्ति भी हो गई. निश्चित रूप से कुछ लोग ऐसे भी होंगें ही जो तहे दिल से मधुकर सिंह की मदद में लगे होंगें. मुझे उनकी जानकारी नहीं है. ब्लॉग और फेसबुक पर इनको लेकर कुछ लोगों ने चिंताएं ज़ाहिर की हैं और मदद की गुहार भी लगाई है. एक ब्लॉगर ने सहायता के लिए इनका बैंक एकाउंट भी डाला है. किसने कितनी सहायता की, की भी या नहीं मुझे इसकी जानकारी नहीं है. मैं एक रंगकर्मी हूँ, मधुकर को कई साल पहले पटना में नाटक व साहित्यिक आयोजनों में आते जाते देखा है. व्यक्तिगत रूप से हम एक दूसरे से परिचित नहीं हैं, ना ही उनसे मेरा कोई सीधा संपर्क ही है.  
सरकारों की बात क्या करे कोई ! सरकारें ऐसे मामलों में कितनी संवेदनशील है ये बात किसी से छुपी नहीं है. ज़्यादा दवाब होगा तो भिखारी की तरह चंद रुपये फेंककर मुक्त हो जायेगी या जुगाड़ होगा तो कोई सम्मान पकड़ा देगी. मात्र पेट चलाने के लिए किसी कलाकार व साहित्यकार को कैसे-कैसे काम करने पडते हैं, यह हम सब जानते हैं. आज़ादी और प्रजातंत्र के बड़े-बड़े दावे के बीच कला और साहित्य की सेवा करते हुए कितनो का पेट भरा है ? आज देश के कितने मंत्री, विधायक, अधिकारी को कला-संस्कृति-साहित्य की चिंता है ? कला-साहित्य के बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों में पैसे का बंदरबांट के अलावा होता क्या है ? जिन कलाकार, साहित्यकार का जुगाड़ है वो सालों भर मलाई का मज़ा लें, किसी को कोई आपत्ति नहीं ! बाकि जाएँ भाड़ में ! अभी पिछले दिनों हिंदी दिवस के मौके पर झारखण्ड के विधायकों से उनकी व्यक्तिगत रुचि जानने के लिए उनके पसंदीदा लेखक का नाम बताने को कहा गया तो अधिकतर लोगों ने प्रेमचंद का नाम बताकर खानापूर्ति भर करके किसी प्रकार अपनी जान बचाई.
बहरहाल, वर्तमान में मधुकर सिंह पैरालिसिस से ग्रस्त हो अपने गांव में रह रहे हैं और तमाम उपेक्षाओं और शारीरिक कष्टों के बावजूद अपनी आत्मकथा ‘आवारा मसीहा का सफरनामा’ लिखने की कोशिश में लगे हैं. सिजोफ्रेनिया नामक बिमारी से पीड़ित महान गणितग्य वशिष्ट नारायण सिंह का हाल भी किसी से छुपा नहीं है. वर्तमान में वे अपने गाँव (बसंतपुर, भोजपुर) में परिवार के सहारे किसी तरह जीवनयापन रहें हैं. भारतीय सिनेमा की अज़ीम-ओ-शान फिल्म मदर इंडिया में ज़मींदार की ये छोटी-सी भूमिका निभाने वाला अभिनेता संतोष कुमार खरे लखनऊ की सड़कों पर और भिखारी ठाकुर जैसे भारतीय पारंम्परिक रंगमंच के अग्रणी कर्ता के नाट्य दल का एक सदस्य सीताराम पासवान भीख मांगकर गुज़ारा करने को अभिशप्त हैं. वो ज़िंदा भी हैं या नहीं ये जानने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं. ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं.
आम जनता सहित, पता नहीं कितने साहित्यकार, रंगकर्मी, लोक-कलाकार, समाजसेवी आदि आज इस प्रकार की ज़िंदगी जीने को अभिशप्त हैं. कम से कम इनकी खोज खबर लेते रहने का नैतिक दायित्व के निर्वाह करने की चेष्ठा तक अब नहीं रही ? क्या आज हम इतने मजबूर हैं कि केवल हाथ पर हाथ धरे और कभी-कभार फेसबुक और ब्लॉग पर ज़िक्र भर कर देने के सिवा कुछ नहीं कर सकते ? ये मानने को दिल नहीं करता कि हम सच में इतने मजबूर हैं. हाँ, ये माना जा सकता है कि हमारी संवेदना को किसी की नज़र लग गई है, शायद अपनी ही. तभी तो ऐसी बातें भी हमें उद्वेलित नहीं करती. या करती भी हैं तो हम कुछ खास नहीं करते. हम अपने लिए जब संघर्ष करने से कतराने लगे हैं तो दूसरों और समाज के लिए क्या खाक लड़ेंगें. हम व्यक्तिगत सच से ही भय खा जाते हैं सामाजिक सच तो दूर की बात है. शर्मनाक है. साथ ही जिस देश का साहित्यकार, कलाकार भूखो मरने को अभिशप्त है वहां कला-साहित्य के बड़े-बड़े जलसों के नाम पर उत्सवधर्मिता इनकी हालत और गरीबी का मजाक नहीं तो और क्या है और हमारा मौन एक प्रकार से सहमति और मजबूरी का ही घोतक है. इस खतरनाक मौन का नाश हो. खैर, मधुकर सिंह एक सपना देखते हैं कि उन्हें साहित्य अकादमी की ओर से दस लाख का पुरस्कार मिला है और पुरस्कार समारोह में शीला दीक्षित भी हैं.

Tuesday, August 13, 2013

रंगमंच का एक सार्थक गढ़ - डोंगरगढ़

ऐसा दिखता है डोंगडगढ़ 
“हमें हिम्मत नहीं हारनी है. काम करते रहना है और बढ़ते रहना है, लेकिन खराब नाटक नहीं करना है, खराब गाने नहीं गाना है. लगातार नई चीज़ों को, नए लोगों को रंगमंच से जोड़ना है.” – ए के हंगल.

चारों ओर से छोटी-छोटी पहाड़ियों और हर पहाड़ी पर विराजमान देवी-देवताओं और गुरुओं के आश्रमों के क़ानूनी व गैर-क़ानूनी कब्ज़ों से घिरा छत्तीसगढ़ का एक छोटा सा क़स्बा है डोंगरगढ़. यह घोषित रूप से एक धार्मिक नगरी है जहाँ शराबखोरी पर पूर्णतः प्रतिबन्ध है. इस छोटे से कस्बे में जन सवालों से सरोकार रखता हुआ रंगमंच का अपना ही एक इतिहास है यह जानना किसी भी कलाप्रेमी के लिए अपने आपमें एक सुखद अनुभूति देता है. जिस प्रकार भारत का दिल गाँव में बस्ता है ठीक उसी प्रकार सच्चा रंगमंच तमाम ग्रांटों, एनजीओ छाप रंगमंच से दूरी बनाये रंगमंच में ही धडकता है. रंगमंच पेशा से ज़्यादा पैशन है. ‘हम इसके बिना नहीं रह सकते’ यह कथन है इप्टा के डोंगरगढ़ इकाई के एक सदस्य का.
“जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है” इस सूत्रवाक्य एवं सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्तप्रसाद की कृति ‘नगाडावादक’ से सुसाज्जित इप्टा का गठन 25 मई 1943 को हुआ था. इप्टा यानि इंडियन पीपुल्स थियेटर एशोसिएशन (भारतीय जन नाट्य संघ), यह नामकरण करने का श्रेय विश्वविख्यात वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के नाम है. सामाजिक सरोकार से जुड़े तमाम कलाकारों को एक मंच प्रदान करना इप्टा के मूल मकसदों में से एक है. समय के साथ कई उतार चढाव का दौर आया फिर भी आज पुरे देश में इप्टा की लगभग 600 इकाइयां कार्यरत हैं, जो अपने-आपमें एक विश्व कीर्तिमान माना जाना चाहिए.
“कला कला के लिए हो सकती है. मगर हम केवल ‘थियेटर’ नहीं करते, ‘मूवमेंट’ करते हैं और इसलिए यह ज़रुरी हो जाता है कि आज के समय के सबसे बड़े शत्रु के विरुद्द धर्मयुद्ध को ज़रिया बनायें और असल ज़िंदगी में जबरन सूत्रधार की भूमिका अपनाकर बैठे हुए विदूषकों को मंच से उठाकर बाहर फेंक दें. प्रत्यक्ष शत्रु से लड़ना आसान होता है, लेकिन लड़ाई तब मुश्किल हो जाती है जब दुश्मन की पहचान का संकट हो. वे हमारे ही भेष में होते हैं और कब-कैसे वार करेंगें इसका कोई अंदाज़ा नहीं होता.” – ये चंद पंक्तियाँ हैं डोंगरगढ़, इप्टा के रजत जयंती समारोह के अवसर पर आयोजित प्रांतीय सम्मलेन के स्मारिका के. उपरोक्त बातों से गुज़रते ही इस संस्था का उद्देश्य की एक स्पष्ट झलक मिलाने लगती है.
मानवीय सरोकारों के प्रति समर्पित डोंगरगढ़ इप्टा के सफ़र की शुरुआत सन 1983 में स्व. चुन्नीलाल डोंगरे के नेतृत्व में हुई. तब से लेकर अब तक लगातार सक्रिय इस जनवादी नाट्य दल ने कई प्रमुख नुक्कड़ तथा मंच नाटकों का प्रदर्शन अपने सीमित संसाधनों के बावजूद सफलतापूर्वक संपन्न किये. जिसमें मुर्गीवाला, विरोध, महंगाई की मार, सड़क पर गड्ढा, सदाचार का तावीज़, तलाश, सबसे सस्ता गोश्त, अंधेर नगरी चौपट राजा, जमराज का भांटो, देश आगे बढाओ, रेल का खेल, मशीन, अंधे-काने, जनता पागल हो गई है, घर कहाँ है, रोटी नाम सत्य है, ठाढ़ द्वारे नंगा, जंगीराम की हवेली, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर, किस्सा कल्पनापुर का, प्लेटफार्म नम्बर चार, राजा का बजा, चार बहरे, अकड गयो, अभिशाप, अनपढ़ के फजीता, शहर के बोली, अंते तंते आदि नाटक प्रमुख हैं. वहीं समय-समय पर स्मारिकाओं का प्रकाशन भी होता रहा. जनगीतों के कुछ ऑडियो सीडी भी संगीतकार व गायक मनोज गुप्ता के निर्देशन में निकाला गया.
मनोज गुप्ता द्वारा संगीतबद्ध किये और गए जनगीतों को सुनकर एवं संगीत तैयार करते समय उनके द्वारा अपनाये क्राफ्ट को समझकर उनकी प्रतिभा का आभास अपने-आप ही मिलता है. परम्परा और प्रयोग का उचित मिश्रण से लबरेज़ इनका संगीत सुनाने के बाद यह विश्वास और प्रखर हो जाता है कि भारतीय रंग संगीत का दायरा केवल चंद गिने-चुने प्रसिद्द नामों तक ही सीमित नहीं है बल्कि शहर-शहर और गाँव-गाँव में फैला हुआ है. प्रसिद्धि, प्रतिभा का मोहताज़ हो सकती है किन्तु प्रतिभा प्रसिद्धि की मोहताज़ हो यह ज़रुरी नहीं.
वर्तमान में डोंगरगढ़ इप्टा का कार्यभार मूलतः तीन व्यक्तियों के कंधों पर है. राधेश्याम तराने (अभिनेता, निर्देशक), मनोज गुप्ता (गायक, संगीत निर्देशक) एवं दिनेश चौधरी (अध्यक्ष, इप्टा, डोंगरगढ़). दिनेश चौधरी अपनी नौकरी से वीआरएस ले चुके हैं और पुरी तरह इप्टा के समर्पित हैं. बाकि दोनों नौकरी करते हुए रंगमंच की गाड़ी लगभग पिछले तीन दशक से अनवरत चला रहे हैं. इप्टा के बाकि सदस्य दिन भर जीवनयापन के लिए काम-धाम करते हैं और शाम को नाटक. इस दौरान इन्होनें बतौर कलाकार अच्छे-बुरे सारे दिन देखे पर कभी अपने अंदर की कला और कलाकार को स्थिर नहीं बैठने दिया. परिस्थिति चाहे जैसी हो लगातार सक्रियता ही इनके कला जीवन का मूल मन्त्र है. इन्हें कोई मलाल नहीं कि ‘तथाकथित’ मुख्यधारा तथा सरकारी रंगमंच में इनके नाम का जाप नहीं होता या ग्रांट पानेवाले रंगकर्मियों की लिस्टों में इनका नाम शामिल नही है. दर्शकों का स्नेह और उनके प्रति ज़िम्मेदारी ही इनकी सबसे बड़ी दौलत और इनके कला का मूल उद्देश्य है. देखनेवाले के चहरे पर संतुष्टि के भाव मात्र से ही इनकी कला सार्थक हो जाती है. ये दर्शकों का मनोरंजन नहीं बल्कि सार्थक और अर्थवान मनोरंजन करते हैं. वे अपनी कला के माध्यम से जनता के बीच सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि हस्तक्षेप प्रस्तुत करते हैं जिसके जनता का मनोरंजन मात्र नहीं होता बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना का भी विकास होता है.
डोंगडगढ़ का रंगमंच पुरी तरह से जनसहयोग से चलता है. हर साल यहाँ एक राष्ट्रीय स्तर का नाट्य समारोह का आयोजन किया जाता है. पुरे शहर में कोई उपयुक्त प्रेक्षागृह न होने के कारण इसका आयोजन बमलेश्वरी मंदिर प्रांगण में किया जाता है. नाटक करने के लिए यह प्रागंण इन्हें लगभग निःशुल्क मिल जाता है. जहाँ इन्हें मंच, टेंट, कुर्सियां, लाईट, साउंड आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है. साउंड सिस्टम नजदीकी जिले से तथा लाइट भिलाई से आता है. टेंट और कुसियाँ लगाने का ज़िम्मा राधेकृष्ण कन्नौजिया का होता है जो खुद टेंट का काम करके जीविका चलाते हैं और इप्टा के सदस्य भी हैं, सो इस काम के लिए वो इप्टा से कोई पैसा नहीं लेते. बाहर से आनेवाली नाट्य दल लगभग समान्तर सोच की होती है इसलिए मूलभूत सुविधाओं में भी हर साल यहाँ अपने नाटकों का प्रदर्शन करना इनकी दिली चाहत होती है, जिसका मूल कारण है यहाँ के आयोजकों और दर्शकों का अपार स्नेह. आयोजन का खर्च जनता के बीच जाकर चंदे से इकठ्ठा किया जाता है.
छोटे शहरों में सब एक दूसरे को जानते हैं और यहाँ रिश्ते जीवंत होते हैं किन्तु समय की चुनौतियों का सामना सबको करना पड़ाता. कभी लंबी सक्रिय सदस्यों की सूचि अपने पास रखनेवाली डोंगडगढ़ इप्टा के सक्रिए सदस्यों की संख्या आज उतनी नहीं है कि गौरवान्वित हुआ जा सके. कुछ पुराने और अति-सक्रिय सदस्यों का निधन हो चुका है, कुछ रंगमंच के प्रति अपार स्नेह रखते हुए भी दाल-रोटी के जुगाड़ में लग जाने को अभिशप्त हो गए, तो कुछ का रंगमंच से मोह भंग भी हुआ. रंगमंच और समाज आज भी रंगकर्मियों को सिवाय तालियों के कुछ और देने की स्थिति में नहीं हैं. तालियों से मन की भूख तो मिट जाती है पर तन की नहीं. फिल्म, क्रिकेट, शराब आदि के लिए ये समाज अपना जेब आराम से खाली करता है किन्तु रंगमंच के लिए भी जेब खाली करनी चाहिए ऐसी सोच अभी-तक हिंदी समाज में पैदा नहीं हो पाया है.
तमाम तरह के रुकावटों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए डोंगडगढ़ इप्टा ने नए-नए रास्ते तलाशने शुरू किये हैं और अपने साथ नए-नए सदस्यों को जोडने की प्रक्रिया भी शुरू की है. साथ ही इन नए सदस्यों के प्रशिक्षण के लिए बाहर से भी किसी प्रशिक्षक को बुलाना शुरू किया है. इसके लिए ये हर साल गर्मी की छुट्टियों में “बाल नाट्य कार्यशाला” का आयोजन करते हैं. जिसमें नाटक के विभिन्न आयामों के व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ ही साथ पेंटिंग आदि की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है. इस वर्ष यह कार्यशाला 31 मई से आयोजित की गई. जिसका समापन 15 जून को कार्यशाला में तैयार किये नाटक - हम हैं कौए (निर्देशक – अपर्णा), इत्यादि (राजेश जोशी की कविता पर आधारित प्रायोगिक नाट्य प्रस्तुति) एवं अंघेर नगरी चौपट राजा (लेखक - भारतेंदु हरिश्चंद्र) के साथ ही साथ मनोज गुप्ता के संगीत निर्देशन में तैयार जनगीतों के गायन से हुआ. आयोजन के दिन सुबह से ही बर्षा हो रही थी और उस दिन भारत-पाक क्रिकेट मैच भी था फिर भी न अभिनेताओं में उत्साह में कोई कमी थी ना ही दर्शकों में और ना ही आयोजकों में. उपरोक्त कार्यशाला में 3 से 15 साल के कुल लगभग एक सौ बच्चों ने भागीदारी की थी. इनमें से कुछ बच्चों का रंगमंच के प्रति उत्साह देखकर यह सहज ही समझ आता था कि यदि इन्हें अभी से रंगमंच की विधिवत प्रशिक्षण मिले और ये लगातार सक्रिय रहे तो आनेवाले दिनों में इन्हें बेहतर रंगकर्मीं के रूप में विकसित किया जा सकता है.   
गत दिनों डोंगडगढ़ से ही दिनेश चौधरी के संपादन में रंगमच पर केंद्रित ‘इप्टानामा’ नामक 248 पृष्ठों की पत्रिका का प्रकाशन भी हुआ है.

Monday, July 15, 2013

झारखण्ड : मानव तस्करी होता है यहाँ !!!

झारखण्ड घरेलू नौकरों की सप्लाई और मानव तस्करी का एक अड्डा बन गया है. यहाँ गरीब आदिवासियों को घरेलू नौकर बनाने के नाम पर एक बड़ा धंधा पिछले कई दशक से निर्वाध रूप से चल रहा है. चल ही नहीं बड़े ज़ोरों से फल फूल भी रहा है. इसे किसी का संरक्षण प्राप्त नहीं है ऐसा आज के युग में कोई मुर्ख भी मानने से बचता है.
नाबालिक गरीब आदिवासी लड़कियां इसके आसान शिकार बनाई जा रही हैं. काम दिलाने के नाम पर इन्हें राज्य और देश कि सीमाओं से बाहर के नगरों-महानगरों तक ले जाया जाता है, जहाँ ये अमानवीय स्थितियों में काम करने और जीने को अभिशप्त होती हैं. जिन घरों में ये काम के नाम पर कैद कर दी जाती हैं वहां उनके मालिक अमूमन इनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं, यह आए दिन अख़बारों में पढने को मिलाता रहता है. इसे अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है.
करीब 6 हज़ार आदिवासी लड़कियों के लापता होने की सूचना पुलिस रिकार्ड में है. वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी इस बात पर शायद ही किसी को कोई आपत्ति हो. कमाल तो यह है कि इस समस्या से उबरने के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कई गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को प्रति व्यक्ति 19,400 रुपये के हिसाब से पैसों का भुगतान किया. उन्होंने इसे कंट्रोल करने के नाम पर उल्टे घरेलू नौकर बनाने का ही काम किया, वो भी सरकारी पैसे से. इन संस्थाओं ने राज्य और केंद्र को गलत रिपोर्टे सौंपी. फर्ज़ी प्रशिक्षणार्थियों के नाम लिखकर पैसे निकाले. कई संस्थाओं ने तो प्रशिक्षण दिया किसी और को, नौकरी का रहा है कोई और, नौकरी भी कैसी-घरेलू नौकर की. हद तो ये है कि ये संस्थाएं आगे भी प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की इजाज़त मांग रहीं हैं. उनमें से कुछ को गर इजाज़त मिल जाए तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ये संस्थाएं दावा ठोक रहीं हैं कि इन्होनें 10 हज़ार से भी अधिक युवाओं को नौकरी दिलवाई है. कहाँ और कैसी नौकरी इसका शायद ही कोई सही रिकार्ड इनके पास हो.
एक खबर के अनुसार इन संस्थाओं को अब तक 300 करोड़ से भी अधिक की राशि का भुगतान किया जा चुका है. इसमें किसी सरकारी कर्मचारी और अफसरों ने कोई घूस नहीं खाई होगी, ऐसा मानने का दिल नहीं करता.
देश की राजघानी दिल्ली समेत कई नगरों-महानगरों के अख़बारों में तो बाजाब्ता विज्ञापन छपता है कि अगर आपको आदिवासी नौकरानी चाहिए तो संपर्क करें. नीचे पता और फोन नंबर भी होते हैं. कहने का अर्थ यह कि ये सब खुलेआम चल रहा है और कानून के लंबे हाथ यहाँ तक केवल ‘चंदा’ वसूलने के लिए पहुंचते हैं.
अंधाधुंध विकास की इस अंधी दौड़ ने सबसे ज़्यादा अगर किसी चीज़ का नुकसान किया है तो वो है - मानवता. विकास के नाम पर इन आदिवासियों को इनके जल, जंगल और ज़मीन से बेदर्दी के साथ खदेड़ा जा रहा है. वहां से अलग होकर विस्थापन की मार झेलते इन सरल-सहज लोगों के पास दैनिक मज़दूर और घरेलू नौकरानियां बनाने के सिवा चारा ही क्या बचाता है ? यह एक विडंवना है. सरकार और मानव निर्मित विडंबना.
प्रतिकार करनेवाले को विकास विरोधी का तमगा पहनाकर ‘उग्रवादी’ की संज्ञा से विभूषित कर, एक आसान शिकार बना देना एक परम्परा है, जिसका निर्वाह कानूनी तौर पर, बड़ी शिद्दत के साथ किया जा रहा है. आदिवासी शासित और पोषित झारखण्ड में न जाने कितने आदिवासी झूठे मुकदमें में जेलों में कैद कर दिए गए है. ये खुशकिस्मत है कि इन्हें अब-तक किसी इनकाउंटर में मारा नहीं गया.
जो भी है, जैसा भी है, झारखण्ड की एक कड़वी सच्चाई यह भी है. हम माने या न माने. वैसे किसी के मानने या न मानने से सच झूठ में नहीं बदल जाता.  

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...