Thursday, October 23, 2014

चाचा भतीजा के छः संवाद

चाचा भतीजा संवाद :- “चाचा, बैठे-बैठे बकचोदी करते रहते हो। देखो देश में कितना काम हो रहा है। क्रिकेट का भला हो गया, हॉकी का भला हो गया, कबड्डी का भला हो गया, अब फुटबाल के दिन फिरनेवाला है।” चाचा ने भतीजे की बात सुनी और खैनी पच्चाक से थूकते हुए बोले – “हां, सरकार तो कद्दू उगाने के लिए बनती है। ई देश भी कॉरपोरेट के हाथ में बेच दो शायद देश का भी भला हो जाए।”

चाचा भतीजा संवाद (भाग दो) :- “चाचा, बकचोदी छोड़के कुछ काम धाम कर लेओ। सत्ता बदल गई। अच्छे दिन आनेवाले हैं।” भतीजे की बात सुनते ही चाचा ने एक लंबी पाद मारी और चेहरे पर राजकीय सुकून लाके बोला – “किसी ने कह दिया और तुम मान गए? सत्ता तो कई बार बदली और बदलेगी। जिस दिन सत्ता का चरित्र बदले उस दिन बात करना। अभी जाओ हमको पदवास लगी है।” यह कहके चाचा ने एक और पाद मारी और तीसरे पाद की तैयारी में जुटकर “फिल गुड” करने लगे।

चाचा भतीजा संवाद (भाग तीन) :- चुनाव परिणाम देखकर चाचा सूखे छुहारे सा मुंह बनाकर घूम रहे थे कि भतीजे ने टोक दिया – “क्या हुआ चाचा, चेहरा बबासीर के मरीज़ जैसा कहे हो गया है?” चाचा का मन किया कि गालियां दे देकर भतीजे का ‘राग-दरबारी’ कर दें लेकिन अपने को सँभालते हुए बोले – “देख नहीं रहे हो कौन पार्टी जीत रही है।” भतीजा चाचा स्टाइल में पान की पिचकारी मारते हुए बोला – “चाचा लोकतंत्र है। लोक जिसे चुने उसमें विश्वास रखिए। न त लोकतंत्र विरोधी करार दे दिए जाईयेगा। गुड़ भी खाइएगा और गुलगुला से परहेज़ भी कीजिएगा, ई नहीं चलेगा।” चाचा के कलेजे पर सांप लोटने लगा उन्हें “एकला चलो रे” गाने का मन किया लेकिन चाचा को बंग्ला भाषा आती ही नहीं थी इसलिए अग्निपथ --- अग्निपथ गाते हुए खुद को अमिताभ बच्चन समझने लगे।

चाचा भतीजा संवाद (भाग चार) :- “चाचा दुनियां पूरब जाती है तो आप पश्चिम काहे जाते हैं?” भतीजे के इस संवाद पर चाचा कृष्ण की तरह मुस्कुराते हुए बोले –“बेटा आज के युग में हर बात का विरोध करना ही प्रगतिशीलता और बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पत्र है।” भतीजे ने आगे पूछा –“और विचारधारा के बारे में आपका क्या ख्याल है चाचा?” चाचा पाकिट से खैनी का चुनौटी निकालते हुए बोले – “देखो, विचाधारा की हालत आजकल धोबी के कुत्ते वाली हो गई है, जो न घर का है न घाट का। हम तो विचारधारा का पिटारा साथ रखतें हैं। समय, काल और परिवेश के हिसाब से सबका इस्तेमाल करते रहते हैं।” यह कहकर चाचा देवत्व भाव से खैनी मलने लगे और भतीजा चाचा के सिर के पीछे गौर से देखने लगा कि कहीं कोई दिव्य रोशनी तो नहीं निकल रही है। 

चाचा भतीजा संवाद (भाग पांच) :- “चाचा, ई चुनाव पांच साल में ही कहे होता है?” भतीजे ने आज ऐसा सवाल कर दिया कि चाचा चकरा गए और चकराते हुए बोले – “पता नहीं, ई सवाल उस चम्पक से पूछो जिसने यह विधान बनाया था।” चाचा के पेट में गुदगुदी होने लगी और वो तेज़ी से लोटा लेकर खेत की तरफ़ चल दिए।

चाचा भतीजा संवाद (भाग छः) :- “चाचा यह लभ जेहाद क्या है?” भतीजे के यह पूछने पर चाचा ने सड़े टमाटर जैसे मुंह बनाया और बोले – “अबे ई सब बात पर ध्यान मत दो। जो लभ नहीं कर पाते वो जेहाद की बात करते ही हैं। साला लभ न हुआ बियाह-शादी हो गया, अब ई सब भी आदमी जाति-बिरादरी पूछकर करेगा?”

Thursday, October 16, 2014

मंत्रीजी की भैंस उर्फ़ अकल बड़ी की भैंस!

एक मनहूस रात की बात है जम्बो द्वीप के किसी प्रदेश के किसी पांच सितारा होटल में मंत्रीजी एक मस्त समाजवादी मसाज के बाद सोए ही थे कि पता चला उनकी भैंसे गायब हो गई। पहले तो इस खबर पर किसी को सहज ही यकीन नहीं हुआ, अब मंत्री भैंस क्यों पालेगा! फिर लगा कि लोकतंत्र है और यह सवाल ही अपने-आपमें अलोकतांत्रिक कि मंत्रीजी भैंस क्यों पलेंगें यह उनकी मर्ज़ी कि वो अपने अस्तबल में घोड़े पाले, चमचे पाले, गुंडे पाले या भैंस। वैसे भी सरकारी खर्चे पर सब पल जाता है
कोई मंत्री-विधायक यदि भैंस-गाय पालता है, खेती-बारी करता है, सदा खाता है और खादी धारण करता है तो यह अतिरिक्त समाजसेवा की श्रेणी में कुछ ऐसे दर्ज़ होना चाहिए जैसे रामचंद्रजी का बेर खाना दर्ज़ है। वैसे मफलर बांधकर चोर-चोर चिल्लाना भी आजकल सम्पूर्ण क्रांति की श्रेणी में आता है।
ज़माने के साथ हर चीज़ का अर्थ बदलता है इस बात से जिन्हें आपत्ति है वे निरर्थक हैं। अमेरिकी लेखक मैक्स डेप्री ने कहा था न कि “हम जो हैं, वही बने रहकर वह नहीं बन सकते जो कि हम बनना चाहते हैं।” ‘वही-वह’ का अर्थ क्या है यह बात हर ‘यह-वह’ को निर्धारित करने की स्वतंत्रता ही तो डेमोक्रसी कहलाती है! इसे जो न माने वो ‘अराजक’ है। इस मुद्दे पर बाद में बकर फैलाया जाएगा पहले सबसे ज़रुरी बात। तो आलम यह कि मंत्रीजी की भैंस गायब हो गई। मंत्रीजी अपनेआप में एक ऐतिहासिक अस्तित्व हैं तो उसकी हर चीज़ का इतिहास होना लाजमी है। इसलिए भैंस का भी इतिहास है। कहावत है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। अब किसी के हाथ में लाठी रहे और उसकी भैंसिया गायब हो जाए, इससे बड़ा अनर्थ और क्या होगा। इतिहास के शोधार्थियों को इस भैंस की ऐतिहासिकता विषय पर फौरन शोध कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। यकीन मानिए उनका यह शोध ऐतिहासिक माना जाएगा और इसके लिए आपको ‘संस्कृति विभाग’ से ढेर सारा अनुदान भी दिया जा सकता है
मंत्रीजी की भैंस का मामला जैसे ही मिडिया को पता चला, वो किसी क्रिकेट मैच की तरह लाइव प्रसारण करने लगे। चंद ही मिनट में सारे चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ आने लगेमीडियावाले गलाफाड़ शोर मचा रहे थे कि “जहाँ मंत्रीजी तक की भैंस सुरक्षित नहीं है वहां आम जन का क्या हाल होगा।” लोगों को हर बात में आम आदमी को घुसेड़ने की बिमारी सी लग गई थी। अर्थशास्त्री इस बात पर बहस करने लग पड़े थे कि तेंदुलकर के सौ शतकों का आम आदमी की आमदनी पर क्या असर पड़नेवाला है। तो कुछ क्रांतिकारी टाइप के लोग इन के शतकों को ही जनविरोधी करार देने पर तुले थे क्योंकि शतक बनाने के बाद उसने मुट्ठी हवा में भींचकर एक बार भी “इन्कलाब जिंदाबाद” नहीं कहा था। वहीं कुछ समाजशास्त्रियों का यह भी मानना था कि तेंदुलकर को क्रिकेट नहीं समाजसेवा के धंधे में होना चाहिए। बहरहाल, जनता नामक जीव के ज़िक्र से याद आया कि मंत्री हर प्रकार से जनता का प्रतिनिधि होता है। प्रतिनिधि का माल सुरक्षित मतलब जनता का माल सुरक्षित। प्रतिनिधि ही जहाँ सुख चैन की ज़िंदगी न बसर करे वहां आम जनता की चिंता कौन करे। शहर के सबसे ज़्यादा पुरस्कार प्राप्त बुद्धिजीवियों का कहना है कि “चुकी भैंस एक मादा भी होती हैं इसलिए यह एक अति संवेदनशील मुद्दा है। एक मादा का इस प्रकार गायब हो जाना हमारे समाज की सामंती मानसिकता का परिचायक है। पता नहीं बेचारी ‘अबला’ पर क्या-क्या बीत रही होगी।” यह कहते हुए बुद्धिजीवीजी वर्ग संघर्ष और मादा-नर समानता की चिंता से व्याकूल हो जाते हैं और गुस्से में सारे वाद पर विवाद खड़ा करने लगते हैं। मादा आयोग का मानना है कि “इस घटना से यह साबित होता है कि इस व्यवस्था में कोई भी मादा अब सुरक्षित नहीं है।” वहीं इस घटना पर नर आयोग ने चुप्पी साध रखी है।
घटनास्थल पर फ़ौरन पुलिस आ गई और मामले की गम्भीरतापूर्वक छानबीन करने के पश्चात बयान दिया कि “पहली नज़र में यह किसी चोर का काम लगता है।” पुलिस के इस वक्तव्य पर चोरों संधों ने आपत्ति ज़ाहिर की और कहा कि “यह सरासर हमारे ऊपर इलज़ाम है। लगता है पुलिस ने चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत नहीं सुनी है एक चोर दूसरे चोर का सामान कभी चोरी नहीं करता। पुलिस को यकीन नहीं तो चोरपुराण का 420वां अध्ययन पलटकर देख ले।” पुलिस का एक मरियल सिपाही, जो कुछ दिन पहले ही अनुकम्पा के आधार पर बहाल हुआ था थाने की ओर चोरपपुराण लाने के लिए दौड़ पड़ा। यह बताना ज़रुरी नहीं कि जम्बो द्वीप के हर थाने में चोरपुराण और हनुमानजी अति-अनिवार्य हैं। वैसे भैंस की खोज में क्राइम ब्रांच के सिपाही और खोजी कुत्ते लगा दिए गए हैं
भैंस के गायब हो जाने की खबर सुनके मंत्रीजी ने ठहाका मरना शुरू कर दिया है। दूसरे मंत्रियों का कहना हैं कि “मंत्रीजी को बड़ा ज़ोर का सदमा लगा है। उन्हें अपनी भैंस गांधीजी की बकरी से ज़्यादा प्यारी थी और वे बिना-नागा रोज़ इसी भैंस का दूध बिना शक्कर के ग्रहण करते थे।” शहर के सबसे बड़े आयुर्वेदिक डाक्टर ने मंत्रीजी को दिन में तीन बार किसी प्रतिष्ठित कवि के मुंह से विदेशी समाजवादी कविताओं का पाठ सुनने की सलाह दी है। यह बात जैसे ही शहर में फैली सारे कवि मंत्रीजी के घर कविता संग्रह की फोटो कॉपी लेके पहुँच गए। भीड़ ज़्यादा हो गई तो मंत्रीजी का दरबान अपनी ताव में आ गया और कवियों का ऑडिशन लेने लगा वहीं बेचारे कवियों के पेट ने गैस बनाना शुरू कर दिया है। कवि जब भी किसी दूसरे कवि की कविता का पाठ करते या सुनते हैं तो उन्हें इस प्रकार की शारीरिक व मानसिक वेदना से गुजरना ही पड़ता है। माहौल में गैस का आक्रमण शुरू होने ही वाला था कि तभी शहर के एक प्रतिष्ठित नाट्य निर्देशक अपनी सात ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों के साथ आ पहुंचे। उनका दावा है कि इन सात अभिनेत्रियों के माध्यम से उन्होंने कविताओं का शानदार नाट्य मंचन तैयार किया है। जिसे देखते ही मंत्रीजी को ज़बरदस्त स्वास्थ्य लाभ होगा और वो अपनी भैंस को भुलाकर अभिनेत्रियों के अभिनय खो जाएगें। उनकी खिचड़ी पकती इससे पहले ही गायक महोदय टपक पड़े। उन्होंने निर्गुण शैली में कविता गायन तैयार किया है। दरबान चुकी एक संगीत प्रेमी व्यक्ति भी है सो गायक से फरमाइशी गाने सुन रहा है। तराबनो फैजाबादी के लौंडा बदनाम हुआ पेश करने के बाद जब कविता गायन सुनाया गया तो दरबान महोदय खैनी का थूक पच्चाक से गायक महोदय के बगल में फेंककर कविता गायन की बारीकियों पर आलोचनात्मक भाषण देने लगे, जिन्हें उपस्थित सारे कलाकारों और कवियों ने भावविभोर होकर सुना। मिडिया तो इन सब गतिविधियों का सीधा प्रसारण कर ही रहा था जिसे देखकर प्रजातंत्र की प्रजा मुग्ध हुई जा रही थी।
भैंस पक्षवालों दलों का कहना था कि यह गायपक्ष वालों की साजिश है वही गायपक्ष वाले यह कह रहे थे कि यह सब भैंस पक्षवालों की नौटकीं है। लोमड़ी पक्ष वाले इस घटना पर मौन थे वहीं खरगोश पक्षवाले कभी-इसके कभी उसके समर्थन में अपनी बात कह रहे थे। राजनीति में एक पक्ष और होता है बकरा पक्ष। जो हमेशा, हर बात का बकरे की तरह आवाज़ निकलकर खंडन करता है कुत्तापक्ष वाले दल सारे एक्शन के बाद ही रिएक्शन देने के लिए जाने जाते थे।  
यह सबकुछ चल ही रहा था कि पुलिस गाजे-बाजे के साथ भैंस को लेकर हाज़िर हो गई। दरबान ने भैसों को देखते हुए कहा कि “यह भैंसे मंत्रीजी की नहीं हैं, उनकी भैसों में सुरखाव के पर लगे हुए हैं।” पुलिस जो मंत्री की भैंस गुम हो जाने के कारण अकारण ही नैतिक दबाव में आ गई थी, का दाबा है कि “यही मंत्रीजी की भैंस हैं, हमने अच्छे से ठोक बजाकर देख लिया है। पहले तो इस भैस का कहना था कि मैं मंत्री की नहीं कल्लू की भैंस हूँ लेकिन थाने में उलटा लटके चार डंडे पड़ते ही सच सामने आ गया। कह रहीं थी कि हमें किसी ने चुराया नहीं बल्कि हम खुद ही भाग गई थीं।”
यह बात जब मंत्रीजी को पता चली तो पहले तो उनका ठहाका बंद हो गया फिर बड़े उदास स्वर में उन्होंने पुलिस के कान में कुछ कहा। दूसरे दिन की खबर यह है कि भैंस की लाश किसी सड़क किनारे पाई गई और उनके पास से अपराधिक साहित्य और दस्तावेज़ भी बरामद किए गए।
शहर के कुछ लोगों को लगता है कि यह एक फर्ज़ी इनकाउंटर हैं इसलिए कुछ प्रगतिशील प्राणियों ने एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया है विषय है – अकल बड़ी की भैंस! इस आयोजन में तमाम प्रगतिशीलता के उपासक सादर आमंत्रित हैं। इस विचार गोष्टी को एक देसी मदिरा बनानेवाली कंपनी ने प्रायोजित किया है इसलिए यह आशा की जा सकती है कि शहर के तमाम बुद्धिजीवी ज़रूर एकत्रित होंगें ही।
इधर कल्लू नामक कोई व्यक्ति चिल्लाकर रहा है कि हमारी भैंस को मार दिया रे! यदि यह बात सच है तो मंत्रीजी की भैंस का क्या हुआ इसके लिए भी एक आयोग गठित होने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, नहीं हुई है तो हो जायेगी।

Saturday, August 30, 2014

एक मठ का जवाब एक और मठ नहीं हो सकता

किसी भी सार्थक साहित्य का दायरा इतना सीमित कभी हो ही नहीं सकता कि वह एक खास वर्ग,जाति, समुदाय द्वारा ही लिखा-पढ़ा, समझा-समझाया जाय। यदि कोई समूह या व्यक्ति ऐसा करता है तो यह उसकी संकीर्णता है, उसकी मंशा पर संदेह किया जाना चाहिए। इन दिनों ऐसे फतवे देने वाले, विचार-प्रक्रिया को एकालाप या स्वगत कथन में परिवर्तित करनेवाले लोगों की कोई कमी नहीं जो यह कहते हुए पाए जाते हैं कि जो लोग जन्मजात बहुजन समुदाय (दलित-आदिवासी) से नहीं हैं वो इनके सवालों पर सच्चा साहित्य रच ही नहीं सकते, यदि रचते हैं तो वो “टॉप एंगल साहित्य” या “मर्सी-पिटीशन” होता है। ऐसे विचार उसी ब्राह्मणवादी मानसिकता के परिचायक नहीं तो और क्या है? इस प्रकार के सिद्धांत के समर्थक अमूमन नफ़रत का बीजारोपण कर मुहीम को वैचारिक के स्थान पर व्यक्ति केंद्रित करने का काम ज़्यादा करते हैं।
यह संभव है कि व्यक्तिगत अनुभव साहित्य को और ज़्यादा धनी बनाता हो किन्तु केवल अनुभव मात्र से ही साहित्य सृजन संभव नहीं। साहित्य में शिल्पगत रूप से व्यक्तिगत सच सामूहिक सच में भी परिवर्तित होता है। जहाँ यह प्रक्रिया घटित नहीं होती वहां साहित्य व्यक्तिगत प्रलाप-एकालाप बनकर रह जाता है। यह अपने आप में एक असाहित्यिक वक्तव्य है कि किसी चीज़ पर रचना करने से पहले रचनाकार का उस विषय का व्यक्तिगत अनुभव होना ज़रुरी है। यह तर्क ज्ञान, बुद्धि, विवेक, कल्पना और प्रतिभा के विरुद्ध है। क्या मनुष्य केवल अनुभव मात्र से ही पीड़ा, संघर्ष, सुख-दुःख आदि की अनुभूति करता है? यदि ऐसा होता तो मानव एक चेतनशील प्राणी नहीं माना जाता। साहित्य क्या कोई भी कला केवल अनुभव मात्र की मोहताज़ कभी नहीं रही। यहाँ ज्ञान, कल्पना, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक आदि-आदि का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। ऐसे उदाहरणों से विश्व साहित्य भरा पड़ा है जहाँ लेखकों ने अपने समुदाय, वर्ग, लिंग आदि से परे जाकर कालजई और प्रेरक रचनाएँ रची हैं। अनुभव से एक खास प्रकार का साहित्य (आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा वृतांत इत्यादि) रचा जाता है किन्तु इसके लिए भी लेखकीय प्रतिभा का होना अनिवार्य है।
साहित्य की कलात्मकता और रचना प्रक्रिया पर बहुत सी बातें हो चुकी है, होती रहती हैं, यहाँ अलग से उस विषय पर बात करना ज़रुरी नहीं। साहित्य की सार्थकता को हम ओ हैनरी  की एक विश्वप्रसिद्ध कहानी आखिरी पत्ता  से समझ सकते हैं जहाँ रचनाकार स्वयं होम होकर एक मानवीय मास्टरपीस रचता है। जो साहित्य समाज के लिए आशा की किरण और संघर्ष की शक्ति को प्रस्फुटित नहीं करता, उसकी सार्थकता संदेहास्पद है। उसे समाज का हर तबका रचे इसमें क्या बुराई है। आज इसका साहित्य, उसका साहित्य, उसके लिए साहित्य नाम पर जितने भी मठ-गढ़ चल रहे हैं, उससे रचनाकार का भला भले ही हो जाय, रचना और समाज का भला शायद ही होगा। दूसरे को कमतर और अपने और अपने जैसों को श्रेष्टतर मानने की प्रवृति से न समाज अछूता है ना ही रचनाकार। मेरी कमीज़ तेरी कमीज़ से सफ़ेद है के व्यर्थ प्रलाप से ज़्यादा ज़रुरी है अमानवीयता के विरुद्ध सृजनात्मक योगदान की दिशा में रचना और रचनाकार को प्रयासरत होना। नए मापदंडों और व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण के साथ अनेकता में एकता भी साहित्यिक आंदोलन का उद्देश्य हो सकता है। बांटों और राज करो का नारा तो सदियों से बुलंद है ही।
यह सच है कि बहुजन साहित्य को पढ़ने, समझने के लिए साहित्य के नैतिकतावादी और बने-बनाए मापदंडों को चुनौती देना पड़ेगा, इस साहित्य की अपनी ही एक भाषा, शिल्प, सौंदर्यशास्त्र आदि है। बकौल राजेन्द्र यादव “दलित लेखन को गुस्ताखी का साहित्य कहा जा सकता है जिसका प्रमुख स्वर है गुस्सा या आक्रोश : यह आक्रोश जहाँ एक ओर सवर्ण व्यवस्था को लेकर है तो दूसरी ओर अपनी स्थिति, नियति और लाचारी को लेकर। यह आरोपपत्र भी है और मांगपत्र भी।” वहीं शरण कुमार लिम्बाले अपने संग्रह का नाम दलित ब्राहमण  रखते हैं। इस संग्रह कीआत्मकथा नामक कहानी में लिम्बाले लिखते हैं “दलित साहित्य पर बेहिसाब बहसें हो रही हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं की बड़ी प्रसिद्धि हो रही है। कोई एक आत्मकथा प्रकाशित हो जाती है और रातोंरात वह लेखक महान बन जाता है। उसे पुरस्कार मिलने लगते हैं। उसके सत्कार-समारोह संपन्न होते हैं। उसकी तारीफ़ में लेख छपने लगते हैं। फिर शासन की समितियों में उसकी नियुक्ति होने लगती है। उसकी पोशाक बदल जाती है। उसकी भाषा बदल जाती है। उसका रहन-सहन बदल जाता है।जो लिखता है लेखक बन जाता है।” यहाँ लिम्बाले जिस प्रवृति का ज़िक्र कर रहें हैं यह प्रवृति किसी भी साहित्य के लिए घातक है। अफ़सोस; आजकल ऐसी ही प्रवृतियों की चपेट में रचनाएं और रचनाकार दोनों हैं।
इससे कतई इनकार नहीं कि साहित्य की बहुजन धारा ने कई कड़वे सच से पर्दा हटाकर एक ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज़ की, नई बहसों को जन्म दिया। किन्तु तमाम वर्गों, वर्णों, समुदायों, संप्रदायों आदि में विभक्त बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज में आज बहुजन हिताय के संघर्ष को सर्वजन हिताय में परिवर्तित कर उसकी सार्थकता के दायरे का और ज़्यादा विस्तार हो तो क्या कुछ गलत होगा? क्या इसी में साहित्य और समाज की भलाई नहीं है? एक मठ का जवाब एक और मठ नहीं हो सकता। जिस मानसिकता के विरुद्ध यह आंदोलन खड़ा हुआ वही मानसिकता अगर इसे अपनी चपेट में ले ले इससे दुखद बात और क्या हो सकती है। दुखद है कि आज वैसे लोगों की कमी नहीं जो दलित-आदिवासी के नाम पर ‘अपनी डफली-अपना राग’ अलाप रहे हैं।

हम किस वर्ग-समुदाय के हैं से ज़्यादा ज़रुरी सवाल यह है कि रचनाकर्म का उद्देश्य और रचनाकार की मानसिकता क्या है और इससे किसको लाभ मिल रहा है। संघर्ष मानसिकता से होना चाहिए।जाति से जाति, समुदाय से समुदाय का संघर्ष किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति का मूल लक्ष्य हो भी नहीं सकता और यदि होता है वो वह अमानवीय है। इस अमानवीयता के खिलाफ़ संघर्ष ही मानव और मानवीय अभिव्यक्तियों का अंतिम लक्ष्य हो सकता है और मानवीय कला-साहित्य की सार्थकता भी। डॉ. अम्बेडकर का सन्देश था “बड़ी कठनाई के साथ इस कारवां को यहाँ तक लाया हूँ, इसे आगे बढ़ाना। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो इसे यहीं छोड़ देना, पीछे न धकेलना।” 

Friday, August 1, 2014

गोविन्दराम निर्मलकर : एक पारंपरिक आधुनिक भारतीय अभिनेता

गोविन्दराम निर्मलकर
दो महीने पहले की बात है : इप्टा डोंगरगढ़ के साथियों के साथ राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) के मोहारा ग्राम निवासी और कभी हबीब तनवीर के नया थियेटर के मुख्य अभिनेताओं में से एक रहे गोविन्दराम निर्मलकर का साक्षात्कार करना है । गोविन्दराम निर्मलकर अर्थात चरणदास चोर नाटक का चरणदास, पोंगा पंडित का पंडित, आगरा बाजार का ककड़ीवाला, लाला शोहरत बेग का शोहरत बेग, देख रहे हैं नैन का दीवान, मिट्टी की गाडी का नटी और मैत्रेय, मुद्राराक्षस में जीव सिद्धि, देख रहे हैं नैन का दीवान, कामदेव का अपना वसंत ऋतु का बाटम, गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद का दमाद, जिन लाहौर नई देख्‍या वो जन्‍मई नई का अलीमा चायवाला, वेणीसंघारम का युधिष्ठिर सहित बहादुर कलारिन, शाजापुर की शांतिबाई, सोन सरार, जिन लाहौर नई वेख्‍या वो जन्‍म्या ई नई, कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना और ना जाने कितने ही नाटकों के कितने चरित्रों को जीवंत करनेवाला अभिनेता !
50 के दशक से भारतीय रंगमंच पर कार्यरत 85 वर्षीय निर्मलकर से मिलने का अर्थ है भारतीय रंगमंच के एक समृद्ध इतिहास और परम्परा से रु-ब-रु होना । निर्मलकर की रंगयात्रा महानगरीय और अकादमीक चकाचौंध से दूर, भारतीय रंगमंच और अभिनय पद्दति को समृद्दि प्रदान करती है । वे उस पीढ़ी के अभिनेताओं में से एक थे जिन्होंने बाहर से आयातित अभिनय शैलियों से इतर भारतीय पारंपरिक अभिनय शैली को बड़े शिद्दत के साथ रंग पटल पर स्थापित किया । उनकी रंगयात्रा छत्तीसगढ़ी पारंपरिक नाट्यशैली नाचाके जोकर से शुरू होकर हबीब तनवीर के नया थियेटर तक पहुंचती है और देश-विदेश में अपनी खुशबू फैलाती है । ज्ञातव्य हो कि नाचा छत्तीसगढ़ की लोक शैली है, जिसे अमूमन निचली जाति के लोग ही करते हैं । वैसे भारत में जितनी भी लोक परम्पराएं या शैलियाँ हैं वह अमूमन निचली जाति के समपर्ण के कारण ही तो ज़िंदा हैं । ऊँची जाति और समाज के प्रतिष्ठित लोग या तो इन परम्पराओं को नचनियां-बजानियाँका पेशा मानते हैं या फिर इसका उपभोग मात्र करते हैं । वहीं अकादमिक और महानगरीय कलाकार इसे अमूमन देहाती, अनपढ़ और गवांरों की ही कला मानते हैं ।
किन्तु प्रचलित मान्यताओं और रुढियों से ऊपर उठाकर जिस दिन हम थोपी हुई अभिनय सिद्धांतों के इत्तर रंगमंच की सच्ची भारतीयता की चर्चा करेंगें उस दिन पृथवीराज कपूर, गोबिंदराम निर्मलकर, बाल गंधर्व, गिरीश घोष, गुलाब बाई, फ़िदा बाई, भिखारी ठाकुर, भुलवाराम यादव, सावित्री हैशनाम, रामचरण निर्मलकर, नथाराम गौड़, मास्टर फ़िदा हुसैन आदि के योगदान और महत्व को और अच्छे से समझ पाएंगें । वैसे भी कोई भी कला स्थानीय हुए बिना ग्लोबल नहीं हो सकती; यह तर्क सच के ज़्यादा करीब है । 
बहरहाल, हम मोहारा ग्राम पहुंचाते हैं और एक पान की दुकानवाले से निर्मलकर के घर का पता पूछते हैं । वो आगे की तरफ़ इशारा करके हमें उजले रंग के एक दुमंजिले मकान के पास जाने को कहता है । हम वहां पहुंचाते हैं तो दुमंजिले के ठीक सामने मिट्टी का एक खपरैल मकान होता है यही है पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी समेत कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित और अपनी पूरी ज़िंदगी रंगमंच के प्रति समर्पित अभिनेता गोविन्दराम निर्मलकर का घर । चूने में नील मिलाकर पोते इस छोटे से घर की दीवारों पर मटमैली पड़ चुकी तस्वीरों के रूप में भारतीय रंगमंच का सुनहरा इतिहास टंगा पड़ा है और साथ ही लटके पड़े हैं भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर युक्त पद्मश्री समेत कई सम्मानों के प्रमाणपत्र । निर्मलकर हाथ में एक पतली सी लाठी लिए आते हैं । दुआ-सलाम के बाद बातों का सिलसिला चल पड़ता है । किसे पता था कि यह उनका आखिरी साक्षात्कार है !
सन 1950 का साल था । निर्मलकर लगभग 16 साल के थे । नाचा के दौरान ही हबीब तनवीर से इनकी मुलाक़ात होती है । आगरा बाज़ार नाटक के लिए निर्मलकर को अपने एक और साथी के साथ दिल्ली आने का निमंत्रण मिला तो वे असमंजस में पड़ जाते हैं । सवाल था कि रेल पर चढ़के परदेस जाएँ कि न जाएँ । आखिरकार दिल्ली पहुंचे । वहां शहरी अभिनेताओं के साथ यह दोनों अपने को बड़ा सहमा-सहमा महसूस करते हैं । अनपढ़ निर्मलकर ने सुन-सुन कर अपने संवाद जल्दी याद कर लिया किन्तु नाचा में इम्प्रोवाइजेशन के उस्ताद इन कलाकारों को एकदम तयशुदा काम करना ज़रा अखर सा रहा था । इधर शहरी अभिनेता अपने संवादों का रट्टा मार रहे थे । निर्मलकर बताते हैं कि शहर वाले अभिनेता हमसे पूछते कि तुमलोगों ने कैसे याद किया तो हमने एकदिन मज़ाक में कहा कि हमलोग रात में सोते नहीं बल्कि अपने संवाद याद करते रहते हैं । --- दरअसल वो लोग एक साथ कई जगह काम कर रहे थे और हम केवल एक । एक ही साधे सब साधे ।फिर निर्मलकर आगरा बाज़ार के ककड़ीवाले का गीत गाने की कोशिश करते हैं पर शरीर अब साथ नहीं दे रहा ।
अपने तरह का नया थियेटर की तलाश में जब हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ आ जाते हैं और नाचा के कलाकारों के साथ ही रम जाते हैं तब इन अनपढ़ और देहाती माने-जाने वाले कलाकारों और हबीब तनवीर ने मिलकर भारतीय और विश्व रंगमंच में क्या आयाम हासिल किया यह जग ज़ाहिर है । चलताऊ लहज़े में यदि कहें तो फर्श से अर्श तक की इस यात्रा में नैसर्गिक प्रतिभा के धनी निर्मलकर पल-पल हबीब तनवीर के साथ थे । निर्मलकर अपने और हबीब तनवीर के बारे में बहुत सी बातें करते हैं, बहुत से किस्से सुनाते हैं लेकिन वह सब फिर कभी । तत्काल केवल इतना कि नया थियेटर पहली बार विदेश यात्रा पर जा रहा था । सबको हवाई जहाज़ से जाना है यह जानकार जैसे सांप सूंघ गया । लोग इस फिराक में थे कि किसी भी तरह यात्रा टल जाए । जाने के दिन घर से ऐसे विदा हुए जैसे यह आखिरी विदाई हो । डरते हुए हवाई जहाज़ पर चढ़ा और विदेश पहुंचे तो कहीं खाने लायक कोई चीज़ ही न मिले । जो था वो खाने की आदत नहीं थी या डर भी था कि पता नहीं इसमें क्या चीज़ मिला हो । दल के कुछ लोगों ने तो खाना-पीना छोड़ ही दिया था और खाया भी तो फल या दूध । बाद में जब ऐसी यात्राएं लगातार होने लगीं तो धीरे-धीरे सबको आदत सी पड़ गई । 
निर्मलकर के हिस्से अभावग्रस्त ज़िंदगी ही आया, जिसे देखते हुए उनको दिए गए सारे सम्मान बेमानी से लगते हैं । क्या सम्मान का एक कागज़ भर दे देने से सरकार और समाज का काम खत्म हो जाता है ? पूरी ज़िंदगी रंगमंच की सेवा करने के बाद भी निर्मलकर जैसे कलाकार फकीर के फकीर ही बने रहते हैं तो यह सम्मान क्या कागज़ के एक टुकड़े मात्र में नहीं बदल जाता ? यह कौन नहीं जानता कि आज रंगमंच के ठेकेदार लोग कैसे सरकारी पैसों से अपनी और अपने चमचों की जेबें भर रहे हैं वहीं निर्मलकर सरकार की ओर से मिलने वाली 1500 की पेंशन के सहारे ही इलाज और घर का खर्च चलाने को अभिशप्त थे ! बुढ़ापे के दिनों में लकवाग्रस्त शरीर लेकर उन्‍होंने अपने स्‍वास्‍थ्‍य और आर्थिक समस्याओं के मार्फ़त राज्‍यपाल, मुख्‍यमंत्री और छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री तक के से गुहार लगाई किन्तु प्रजातंत्र के कानफाडू शोर में एक निचली जाति के लोक कलाकार की गुहार सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं है ! आखिरकार इन्होने तय कर लिया कि पद्मश्री लौटा देना है । निर्मलकर कहते हैं जो सम्मान न मेरे काम आ रही है, न मेरी कला के उसे धारण करने से क्या लाभ !” 
राज्य सरकार को लगा कि किरकिरी हो जाएगी तो जैसे तैसे मामले को निपटा भर दिया गया । एक तरफ़ जहाँ अनुदान की राशि का बंदरबांट मचा है वहीं नाचा की दुर्गति से परेशान निर्मलकर नाचा के लिए कुछ करना चाह रहे थे तो सरकार अनुदान देने को तैयार नहीं होती । निर्मलकर कहते हैं- पद्मश्री के बाद कई लोगों ने मान लिया कि मुझे सरकार की ओर से सम्मान के साथ-साथ लाखों रुपये भी मिले होंगे । जबकि सच्चाई यह है कि इस सम्मान पत्र के अलावा मुझे सरकार से एक धेला तक नहीं मिला । मैं चाहता था कि नाचा को मैं नई पीढ़ी को सौंप दूं, लेकिन अब अफसोस के साथ मुझे इस दुनिया से अलविदा करना होगा । निर्मलकर का यह सपना सपना ही रहा ।
श्‍याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म चरणदास चोर में अभिनय कर चुके निर्मलकर का मन अब अपने किये नाटकों की सीडी देखने को करता है लेकिन उनके पास न ढंग की सुविधा है और ना ही अपने किसी भी नाटक की रिकॉडिंग । नया थियेटर रिकॉडिंग देने को कहता है लेकिन देता नहीं । वैसे भी हबीब तनवीर के देहांत के बाद नया थियेटर अपने पुराने कलाकारों को जैसे भूल सा ही गया है । 
सवाल तो बहुत सारे हैं पर किससे करें ? उस समाज से जिसे केवल कलाकार की कला का रस लेना आता है, ज़िम्मेदारी नहीं ? यदि निर्मलकर किसी कॉरपोरेट के बनाए नकली और सामानबेचू नायक या नेता होते तो क्या उनकी हालत ऐसी ही होती ? परंपरागत भारतीय रंग शैली को पल-पल अपनी सांसों में बसाए गोविन्दराम निर्मलकर एक आधुनिक कलाकार थे जिन्होंने लगभग पन्द्रह दिनों अम्बेडकर अस्पताल में लकवे और मस्तिष्क की फटी नशों से संघर्ष करने के बाद आखिरकार इस नाशुक्रे संसार को अलविदा कर ही दिया । निर्मलकर, अब इस दुनियां में नहीं हैं । जीते जी वो जैसे भी रहे मरने के बाद राजकीय सम्मानदिया ही जायेगा निर्मलकर चाहें न चाहें उनकी मर्ज़ी यहाँ भी नहीं चलेगी । निर्मलकर यदि महानगरीय अभिनेता होते तो देश के कई शहरों में अब तक शोक सभाओं का आयोजन हो गया होता और लोग फूल माला से इनकी तस्वीरों को लाद चुके होते । लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी इन्हें प्रमुखता से स्थान देता । -- जब तक कलाकार और समाज अपने असली नायकों का जिम्मेदारीपूर्वक सम्मान करना नहीं सीखता तब तक सब ऐसे ही चलेगा । यह सब दुखद तो है ही बेहद अफसोसजनक भी है !!!

Thursday, July 31, 2014

प्रेमचंद रंगशाला, प्रेमचंद गोलंबर और प्रेमचंद जयंती

इसमें कोई संदेह नहीं कि मुंशी प्रेमचंद के नाम पर ही पटना के राजकीय प्रेमचंद रंगशाला का नामांकन किया गया है । रंगशाला से सटे एक चौराहा है । इस चौराहे को प्रेमचंद गोलंबर कहते हैं । इस गोलंबर के एक तरफ़ मोइनुल हक स्डेडियम है और दूसरी तरफ़ प्रेमचंद रंगशाला । गोलंबर के बीचो-बीच मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति लगी है । कहा जाता है कि पटना शहर के संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों आदि के मांग पर यह मूर्ति स्थापित हो पाई थी । लोग तो यह भी कहते हैं कि एक बार किसी कार्यक्रम में प्रेमचंद के पुत्र और साहित्यकार अमृतराय पटना आए हुए थे । उन्होंने इस बात पर राय ज़ाहिर करते हुए कुछ ऐसा वक्तव्य दिया था कि एक बेटे के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है कि वो अपने पिता की मूर्ति लगाने की मांग सरकार से करे ।
अमृतराय पटना कब आए थे और उन्होंने ये बातें कब और कैसे कही थी, यह बात कही भी थी कि नहीं, इस बारे में कोई सटीक जानकारी कम से कम मेरे पास नहीं है । यह सुनी सुनाई बातें हैं । जो सच हो भी सकतीं हैं और मनगढंत भी हो सकता है । बहरहाल, आज भी प्रेमचंद की मूर्ति के नीचे एक पट्टिका लगी है जिस पर यह अंकित है कि “उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की इस प्रस्तर प्रतिमा का अनावरण 8 अक्टूबर 1980 को महादेवी वर्मा ने किया । संयोजक साहित्यकार रमण” । गोलंबर चारो तरफ़ से लौह-उक्त दीवार से घिरा है और प्रवेश द्वार अमूमन सालों भर बंद ही रहता है । इसकी देखरेख का ज़िम्मा किसके ऊपर है, पता नहीं । वैसे गांधी मैदान की दीवार भी ऊँची कराई गई है और उसमें लोहे के भाले लगाए जा रहे हैं और सुना है कि वहां भी ताला लगनेवाला है । आनेवाले दिनों में यह भी हो सकता है कि गांधी मैदान में घुसने लिए कीमत अदा करना पड़े ! रूपक, अप्सरा, उमा सहित कई सिंगल स्क्रीन के सिनमाघरों में ताले तो झूल ही रहे हैं ।
31 जुलाई 2013, यानि प्रेमचंद की जयंती का दिन । बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ़ समस्त संस्कृतिकर्मी का आन्दोलन चल रहा था । 31 जुलाई को प्रेमचंद रंगशाला चलो का आह्वान किया जा चुका था । तय हुआ कि 30 जुलाई को प्रेमचंद गोलम्बर की सफ़ाई भी की जाय । तय कार्यक्रम के अनुसार कुछ संस्कृतिकर्मी प्रेमचंद गोलम्बर के अंदर झाड़ू और कुदाल लेकर घुस गए और गोलंबर के अंदर से पौधों, लत्तर, दारु की बोतलें, फटे पुराने कपड़े और पता नहीं क्या-क्या को निकल-निकालकर बाहर जलाने और फेंकने लगे । कूड़ा और गन्दगी इतनी ज़्यादा थी कि अपनी तमाम चाहतों के बावजूद संस्कृतिकर्मी आगे का आधा भाग ही साफ़ कर पाए । लगता था जैसे वर्षों से यहाँ सफाई नहीं हुई थी ! गोलंबर के अंदर दो पोल गड़े थे । इन पोलों पर अनगिनत विज्ञापनों के बैनर टगें पड़े थे, जिसे संस्कृतिकर्मियों ने डंडे से खींच-खींचकर हटाया । सफाई के पश्चात बगल से पानी लाकर गोलंबर की धुलाई की गई । मुंशी जी की मूर्ति की भी सफाई हुई जो उजाले से काले रूप में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर था ।
दूसरे दिन यानि 31 तारीख की सुबह संस्कृतिकर्मी जब माल्यार्पण के लिए पहुंचे तो पाया कि कुछ लोग पहले से ही उस जगह पर कब्ज़ा जमा लिया है और मुंशी जी की मूर्ति पर गेंदे की मालाओं का ढेर लगाने के पश्चात् उपस्थित छात्रों को मुंशी प्रेमचंद के बारे में बड़े गर्व से व्याख्यान भी चल रहा था । आसपास गाडियां शोर मचाती निकाल रही थीं और संस्कृतिकर्मी सोच रहे थे कि वो लोग हटें तो हम भी मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करें । किन्तु उपस्थित सज्जनों के मिज़ाज को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था कि वो जल्द हटानेवाले हैं । अन्तः संस्कृतिकर्मी किसी प्रकार माल्यार्पण करके प्रेमचंद रंगशाला की ओर चल पड़े जहाँ दिन भर सांस्कृतिक प्रतिरोध होना था । इस पूरे आयोजन में पटना के कुल दो साहित्यकारों ने शिरकत की और बिहार संगीत नाटक अकादमी को तो प्रेमचंद से कोई सरोकार ही नहीं । ज्ञातव्य हो कि पटना के संस्कृतिकर्मी हर साल प्रेमचंद की जयंती मनाते रहे हैं ।
प्रेमचंद गोलंबर की आधी सफाई करते-करते संस्कृतिकर्मियों में सो कोई मज़ाक में बोल उठा कि गोलंबर की आधी सफाई तो हमने कर दी बिहार संगीत नाटक अकादमी और संस्कृति-साहित्यिक-जनवादी विभागों और दलों की सफाई कौन करेगा ? 

Saturday, July 26, 2014

नाटक नटमेठिया के बारे में ---

नटमेठिया एक जीवनीपरक (Bio-graphical) नाटक है जिसके केन्द्र में हैं बिहार के लेखक, कवि, अभिनेता, निर्देशक, गायक, रंग-प्रशिक्षक भिखारी ठाकुर और भारतीय समाज की जटिल वर्गीय व जातीय बुनावट । भिखारी ठाकुर की संघर्षशील जीवनयात्रा का काल 1887 से 1971 रहा है यानि ब्रिटिश राज से लेकर आज़ाद भारत और भारत निर्माण तक का काल । यह वही काल है जिसमें दुनियां में क्रांतियों व विश्वयुद्धों का दौर चलता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है और भारत एक आज़ाद देश घोषित होता है । वैश्विक धरातल पर तेज़ी से घटित होता यह तमाम सामाजिक - राजनीतिक परिघटनाएं इस नाटक के विषय वस्तु को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं और कहीं-कहीं तो सीधे विषय-वस्तु ही बन जाती हैं । इस नाटक के केन्द्र में नाच जैसी इरोटिक और विशुद्ध मनोरंजन मात्र के रूप में लोकप्रिय विधा भी है जिसे परिष्कृत और कलात्मक बनाकर आज के आदमी का दुःख दर्द को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाकर प्रस्तुत करने की छटपटाहट भिखारी ठाकुर के अंदर साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है, जिसमें एक तरफ़ सामाजिक संघर्ष है तो दूसरी तरफ़ है एक कलाकार का अपना अंतर्जगत । कहीं परम्परा का निर्वाह है तो कहीं उसके घुटन भरे ताने-बाने से निकलने की चटपटाहट भी ।
यह नाटक नाट्यकला के प्रति पूर्णतः समर्पित भिखारी ठाकुर के जीवन, कला, नाट्यकर्म व लेखन के माध्यम से एक खास प्रकार का दलित व स्त्री विमर्श भी प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है । जिसमें उनके संघर्ष के साथ ही साथ भारतीय वर्ग-वर्ण व्यवस्था का सजीव, रोचक व क्रूर चित्रण भी सामने आता है ।
समाज में व्याप्त कुरीतिओं के खिलाफ़ जब कोई कलाकार पारंपरिक कलात्मक व सामाजिक तौर-तरीकों, प्रतीकों (Traditional artistic & Social Styles-Symbols) का इस्तेमाल सुधारवादी चिंतन के लिए करता है तो उसे लोकप्रियता के साथ ही साथ कला और मानव समाज के विचारों के अंतरद्वन्द का भी सामना करना पड़ता है । इस द्वन्द के सृजनात्मक और सार्थक इस्तेमाल से ही तो कला और समाज दोनों में निखार आता है और मानवीय संवेदनाएं वर्जनाओं और कर्मकांडों से ऊपर उठकर और ज़्यादा मानवीय होने की दिशा में अग्रसर होतीं हैं ।
तमाम वर्गों, वर्णों, जातियों, समुदायों में विभाजित, सामंती और उपभोक्तावादी मानसिकता से ग्रसित समाज में कला, कलाकार, वर्ग और समाज का संघर्ष युगों पुराना है । तिथियाँ बदली हैं, परिस्थितियां बदली हैं, स्वरुप बदला है, तरीका बदला है किन्तु यह संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ है । प्रस्तुत नाटक भिखारी ठाकुर के माध्यम से कला-कलाकार व समाज के बीच व्याप्त इसी द्वन्द व संघर्ष की भी एक व्यावहारिक गाथा प्रस्तुत करने का प्रयास है ।
नाटक का नाम - नटमेठिया, प्रस्तुति - रागा रंगमंडल, पटना, निर्देशक - रंधीर कुमार, नाटककार - पुंज प्रकाश; प्रथम प्रदर्शन दिनांक - 8 एवं 9 जुलाई 2014 स्थान - कालिदास रंगालय, पटना, समय - संध्या 7 बजे । अभिनेतागण - सुनील बिहारी, मनीष महिवाल, अजीत कुमार, बुल्लू कुमार, आशुतोष, रवि महादेवन, उदय, रवि कौशिक, शिल्पा भारती, निखिल व आकाश । पार्श्व सहयोग - भूपेंद्र कुमार, मार्कंडेय पाण्डेय, गुंजन कुमार, विनय आदि । नटमेठिया संजीव के उपन्यास सूत्रधार, भिखारी ठाकुर रचनावली, कबीर के निर्गुण, रामचरितमानस व दलित कविताओं को आधार बनाकर लिखा गया है । 

Thursday, July 24, 2014

बिहार संगीत नाटक अकादमी का सांस्कृतिक भ्रष्टाचार ।

पिछले दिनों बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता और अकलात्मक नज़रिए के प्रतिरोध स्वरुप पटना के संस्कृतिकर्मियों ने आंदोलन किया । धरना, मशाल जुलुस, नुक्कड़ नाटक, जनगीत तथा आम जनता के बीच पर्चा वितरण का कार्यक्रम चलता रहा और कला-संस्कृति से जुड़ा सरकारी महकमा चैन की नींद सोता रहा । इन्हें यह भरोसा था कि कुछ दिन ये लोग हल्ला-गुल्ला करेंगें फिर सब कुछ अपनी गति से चलता रहेगा । इस व्यवस्था में यही होता रहा है, यही होगा । वैसे, कला-संस्कृति के संरक्षण और विकास के नाम पर विभिन्न विभागों-अकादमियों में क्या कुछ चलता रहता है, यह अब छुपा नहीं रहा है । जिस देश में कला-संस्कृति किसी के एजेंडे में ही न हो वहां कला-संस्कृति की दशा क्या होगी, इस बात सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । क्या यह एक त्रासदी नहीं है कि आज तक हमारे देश में कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति नहीं बनी है । विक्टोरियन मापदंड को आज तक सिर-आँखों पर लगाए यह मुल्क कब अपनी ज़मीन पहचानेगा ? वैसे यह बात भी निरा बकवास है कि कलाकारों को केवल अपनी कलाकारी से मतलब होना चाहिए । ऐसा बोलनेवाले समुदाय अमूमन खाए-अघाए लोगों का होता है जो यह भूल जाते हैं कि कलाकार भी पहले एक सामाजिक प्राणी है, जो सामजिक चुनौतियों से परे होकर नहीं रह सकता; और यदि रहता है तो उसे यह भी याद रखना चाहिए कि शुतुरमुर्ग बनाने से समस्या हल नहीं हो जाती ।
चिंगारी जिसे फूटना ही था ।
किसी भी विद्रोह की जड़ में अमूमन एक छोटी सी चिंगारी होती है, जो धीरे-धीरे दावानल का रूप धारण करती है और एक सफल आंदोलन के इतिहास में कई सारे असफल आंदोलनों की उर्जा समाहित होती है । बिहार संगीत नाटक अकादमी के संदर्भ में आग में घी डालने का काम किया एक बिना तारीख और हस्ताक्षर वाले एक नोटिस ने जिसपर अंकित था “पूर्वाभ्यास करनेवाली सभी स्वैच्छिक संस्थाओं को सूचित किया जाता है कि प्रेमचंद रंगशाला परिसर में पूर्वाभ्यास करने हेतु संस्था को पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा । किसी भी संस्था को पूर्वाभ्यास से सम्बंधित सामग्री प्रथम तल लॉबी या भीतर भूतल तल में रखने की अनुमति नहीं है । आदेश का उल्लंघन करने पर नियमानुसार करवाई की जायेगी ।”  
इस देश में; खासकर हिंदी प्रदेश में, रंगमंच का चरित्र मूलतः अव्यवसायिक ही है, और संस्कृतिकर्म यहाँ पेशा से ज़्यादा पैशन है । जो लोग भी पटना रंगमंच को जानते है उन्हें यह मालूम है कि प्रेमचंद रंगशाला का प्रागंण दशकों से पटना के रंगकर्मियों की कार्यस्थली रहा है । पटना के रंगकर्मी तब भी इस रंगशाला को अपने पूर्वाभ्यासों से गुलज़ार रखे हुए थे जब यह सरकारी उदासीनता का शिकार हो एक खंडहर में तबदील हो गया था ।
बहरहाल, पता करने पर ज्ञात हुआ कि यह नोटिस बिहार संगीत नाटक अकादमी के प्रभारी सचिव विभा सिन्हा महोदया ने लगवाया था । वह यह तानाशाही प्रवृति अपनाकर रंगशाला से रंगकर्मियों को बाहर निकालने की साजिश कर रही थी । इस नोटिस के पश्चात लिखित सूचना देने के बावजूद भी वहां संस्थाओं को पूर्वाभ्यास करने से रोका गया । पटना की एक रंग संस्था का सामान अकादमी की प्रभारी सचिव द्वारा रंगशाला की सुरक्षा का हवाला देकर बाहर कर दिया गया । इस नाटक का प्रदर्शन गांधी मैदान स्थित कालिदास रंगालय में संपन्न होने के पश्चात पटना के संस्कृतिकर्मी इकठ्ठा होकर यह तय करते हैं कि कला संस्कृति एवं युवा विभाग के सचिव चंचल कुमार, जो अभिनय कार्यशाला का उद्घाटन करने प्रेमचंद रंगशाला आने वाले हैं, से इस विषय में बात की जाय । यह घटना 11 से 16, 2013 जुलाई के बीच की है । दूसरे दिन संस्कृतिकर्मी प्रेमचंद रंगशाला पहुंचे तो कला संस्कृति विभाग के निदेशक विनय कुमार सामने थे और उन्होंने पता नहीं क्या कहा-सुना कि सचिव का आना एकाएक टल गया । संस्कृतिकर्मी वार्ता की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए । इधर आनन-फानन में अभिनय कार्यशाला सहित पूरी अकादमी भारतीय नृत्य कला मंदिर में चली गई । अकादमी की “अभूतपूर्व” प्रभारी सचिव ने अपनी सामंती बौद्धिकता का परिचय देते हुए एक दैनिक अखबार के माध्यम से रंगकर्मियों पर आरोप लगाया कि “रंगकर्मी वहां देर रात तक लड़कियों के साथ बैठते हैं और पौलिथिन (देसी दारु) पीते हैं ।” किन्तु मैडम सचिव प्रेमचंद रंगशाला में हुए अश्लील कार्यक्रमों पर एक भी शब्द खर्च करना ज़रुरी नहीं समझतीं । ज्ञातव्य हो कि एक दवा बेचनेवाली कंपनी को प्रेमचंद रंगशाला किराये पर दिया गया था । इस कार्यक्रम में खुलेआम दारूबाजी हुई और फूहड़ गानों, आपत्तिजनक कपड़ों में लड़कियों को नचवाया गया, आयोजक स्वयं भी नाचे । महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बने इस रंगशाला में हुए उपरोक्त कार्यक्रम का पटना के संस्कृतिकर्मियों ने विरोध करते हुए सवाल खड़ा किया कि इस तरह के कार्यक्रम की अनुमति देकर अकादमी आखिर किस संस्कृति को बढ़ावा दे रही है और किसी भी राजकीय रंगशाला का निर्माण वहां की कला-संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से होता है या मुनाफ़ा कमाने के उद्देश्य से ? इस बाबत अकादमी के अध्यक्ष शंकर आशीष दत्त (जो अपने को कलाकार कहने से ज़रा भी नहीं हिचकते) और उपाध्यक्ष प्रो. शैलेश्वर सती प्रसाद को उक्त कार्यक्रम का वीडियो दिखाकर पूछा गया तो उनका जवाब था – “हमें इसकी कोई सूचना नहीं है । अगर ये हुआ है तो गलत है ।” अब क्या यहाँ यह सवाल नहीं बनाता कि जब आपको पता ही नहीं कि आपका विभाग क्या कर रहा है तो आप बड़े-बड़े पद पर विराजमान हो आखिर किस महान संस्कृति की सेवा कर रहे हैं । यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि जीर्णोधार के बाद प्रेमचंद रंगशाला, बिहार संगीत नाटक अकादमी की देखरेख में संचालित होता है ।
अभिनय कार्यशाला बाधित करने का बेबुनियादी आरोप भी संस्कृतिकर्मियों पर लगाया गया । वहीं आंदोलन के समर्थन में कुछ सजग रंगकर्मियों ने स्वेच्छा से अभिनय कार्यशाला यह कहते हुए छोड़ दिया कि हमारे मित्र संस्कृतिकर्मी जब सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं वैसे वक्त में रंगमंचीय तकनीक सिखने से ज़्यादा ज़्यादा ज़रुरी है आंदोलन की ताकत बढ़ाना । वहीं कार्यशाला संचालित कर रहे पटना के ही कुछ पुराने रंगकर्मियों, जो स्वयं कभी प्रेमचंद रंगशाला मुक्ति संघर्ष के अग्रिणी सिपाही रहे थे, ने आंदोलन कर रहे रंगकर्मियों को नीचा दिखने के लिए तरह-तरह के दुष्प्रचार किया । इसे एक ‘खास’ पार्टी द्वारा प्रायोजित आंदोलन तथा लौंडे-लपाड़ों का आंदोलन कहने में ज़रा भी शर्म नहीं आई । इस दौरान ये लोग लगातार अकादमी के अधिकारियों तथा सांस्कृतिक विभागों को लगातार आश्वस्त भी करते रहे कि कुछ रोज़ चुपचाप तमाशा देखिए, सब अपने आप ही ठीक हो जाएगा । खैर, समय सबका इतिहास लिखता है और कोई आज इसलिए महान नहीं माना जाता कि भूतकाल में वो एक बड़ा क्रांतिकारी था । वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आंदोलनरत संस्कृतिकर्मियों का आपसी विश्वास भी बार-बार बिखर रहा था । इधर, आंदोलन के बारह दिन बीत जाने पर एक अखबार में अकादमी के प्रभारी सचिव विभा सिन्हा की झूठी प्रतिक्रिया थी कि “मेरी बर्खास्तगी की मांग को लेकर चल रहे किसी भी आंदोलन की खबर मुझे नहीं है ।”
प्रेमचंद रंगशाला और पटना रंगमंच ।
सन 1971–72 में यह रंगशाला बनकर तैयार हुआ । अपने पहले ही कार्यक्रम में ही इसे हिंसा की आंधी में झुलसना पड़ा । आपातकाल के दौरान सीआरपीएफ का कब्ज़ा रहा । जिसे मुक्त कराने का बीड़ा पटना के संस्कृतिकर्मियों ने उठाया । कलाकार संघर्ष समिति के बैनर तले पुलिस की लाठियां खाई । कवि कन्हैया जी की शहादत तक हुई । रंगशाला जब मुक्त हुआ तो खंडहर में बदल चुका था । पटना के नाट्य दलों ने इस खंडहरनुमा रंगशाला की साफ़-सफाई की और पूर्वाभ्यास के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया । बीच-बीच में प्रायोगिक स्पेस बनाकर कुछ नाटकों का मंचन भी किया गया । इधर कलाकारों का संघर्ष जारी था । आखिरकार 1987 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को इसके पुनरोद्धार की घोषणा करनी ही पड़ी । जो आखिरकार 14 जनवरी 2012 में जाकर पूरा हुआ । किन्तु साल भर में ही आलम यह है कि कुर्सियां टूट रही है, छत टपक रहे हैं, लाइटों से बल्ब गायब हैं, मंच की बुरी हालत हो चुकी है और आधुनिकतम मशीनें खराब हो रही हैं ।
‘समस्त संस्कृतिकर्मी’ के इस आंदोलन में प्रेमचंद रंगशाला मुक्ति की लड़ाई के कुछ पुराने सिपाहियों का भी आगमन हुआ । उनके अनुसार प्रेमचंद रंगशाला का मुक्ति संघर्ष अभी अधूरा है । हमारी लड़ाई इसे सीआरपीएफ के कब्ज़े से मुक्त करके सरकार के कब्ज़े में डालने के लिए नहीं थी । यह जब तक संस्कृतिकर्मियों के लिए सुलभ नहीं हो जाता तब तक इसकी लड़ाई अधूरी ही रहेगी । खेद है कि उस वक्त के मुक्ति संघर्ष के कुछ अग्रणी योद्धा आज संस्कृतिकर्मी के नाम पर धब्बा बन गए हैं और इस आंदोलन के खिलाफ़ लगातार दुष्प्रचार कर रहे हैं । वहीं जनसंघर्षों में बिना शर्त शिरकत करनेवाले लोग अब या तो अपनी अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं या नियम, शर्तें तय करते हुए निमंत्रण-पत्रों का इंतज़ार करने में लगे हैं ।
बिहार संगीत नाटक अकादमी का पंचनामा ।
राज्य सरकार द्वारा चाक्षुष कला और प्रदर्शनात्मक कला के लिए राज्य कला अकादमी का गठन 26 मार्च 1981 को किया गया । राज्य सरकार का पत्र, पत्रांक 213 दिनांक 16 अप्रैल 1982 से यह जानकारी मिलती है कि कला अकादमी के गठन के साथ ही अराजकता शुरू हो गई थी । तत्कालीन सचिव-सह संयोजक ने बिना विज्ञापन कराये, बिना कार्यकारी परिषद् या सामान्य परिषद् से सहमति लिए, बिना आवेदकों से आवेदन प्राप्त किये, बिना योग्यता का निर्धारण आदि किये स्वयं ही न केवल कर्मचारियों की नियुक्ति की बल्कि उनका वेतन दर और महंगाई भत्ता भी तय कर दिया, तत्पश्चात कार्यकारी परिषद् और सामान्य परिषद् में प्रस्ताव पेश कर स्वीकृत करके इसे वैध व संवैधानिक भी बना दिया ।   
वित्तीय वर्ष 1986-87 में राज्य कला अकादमी को समाप्त कर चाक्षुष कला के लिए बिहार ललित कला अकादमी और प्रदर्शन कला के लिए बिहार संगीत नाटक अकादमी का गठन हुआ । दस्तावेजों के अनुसार 1981 से लेकर 2002 तक अकादमी में वित्त समिति के गठन की अधिसूचना तक जारी नहीं हुई । अकादमी में वित्तीय और प्रशासनिक अराजकता और सरकारी नियमों का उल्लंघन खुलेआम होता रहा । दिनांक 16 नवम्बर 2002 को कार्यकारी परिषद् और सामान्य परिषद् की बैठक में अकादमी के अध्यक्ष डा । शंकर प्रसाद लिखते हैं - “अकादमी कार्यालय पूरी तरह से अपने दायित्व के प्रति असावधान, बेफिक्र और मर्यादा की रक्षा में अक्षम है ।” 28 सितम्बर 1994 को अकादमी में सरकारी कोष के दुरूपयोग की जाँच की मांग करते हुए वित्त विभाग, बिहार सरकार को लिखे एक गोपनीय पत्र (पत्रांक – बि.सा.ना.अ./01 गो./94 ) में श्री प्रसाद लिखते हैं - “अकादमी में वेतन भत्तों आदि मद में बड़ी राशियां बिना समुचित आदेश के निकाले जाने के कई मामले प्रकाश में आए थे जिनकी जाँच के लिए अकादमी ने कई बार आपके विभाग से समय-समय पर आग्रह पहले भी किया है । संस्कृति निदेशालय/विभाग को भी कई पत्र इस सन्दर्भ भेजे गए हैं, लेकिन विशेष कारणों से संस्कृति विभाग अकादमी में हुई वित्तीय अनियमिताओं/संभावित गबन के मामलों की जाँच करने से कतरा रही है ।” इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं “संस्कृति विभाग बार-बार पूछे जाने पर भी अकादमी के पत्रों का जवाब नहीं देता । इसका लाभ उठाकर बिना प्राधिकृत सरकारी आदेश के उक्त मनोनीत असंवैधानिक पदधारी व्यक्ति (सचिव) ने इन ग्यारह-बारह वर्षों में पूर्णकालिक सचिव के टाइमस्केल वेतनमान पर स्वयं ही आदेश प्रदानकर अब-तक 8-9 लाख से ऊपर की राशि की निकासी भी कर ली है ।” पत्र में आगे है “कई कार्यक्रमों के मद में अकादमी को भेजी गई राशि को संस्कृति निदेशालय सीधे आदेश देकर निदेशालय के अधिकारियों को भी चेक के माध्यम से राशि देने के लिए मजबूर कर राशि प्राप्त करता रहा है और अपने ढंग से कार्यक्रम आयोजित कर राशियों को खर्च करता रहा है । इन राशियों का भी हिसाब बार-बार मांगने पर भी सम्बंधित अधिकारियों से प्राप्त नहीं हुए हैं ।” पत्र में अकादमी कार्यालय से सम्बंधित संचिकाओं और लेखा पंजियों को गायब करने में दोषी लोग सफल हो जाएंगे ऐसी आशंका के साथ ही निष्पक्ष जांच की मांग भी की गई है ।
‘संवैधानिक वित्तीय एवं प्रशासनिक अराजकता के कारण बंद होने की कगार पर पहुँची अकादमी को सशक्त बनाना’ शीर्षक के तहत 30 मई 2002 को वे एक और पत्र (पत्रांक बि.स.ना.अ/अ.को./232) मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को लिखते हैं जिसका लब्बोलुआब यह है कि 1981 से लेकर आजतक अकादमी में लाखों रुपये की अनिमिततायें प्रकाश में आई हैं । जानबूझकर वित्तीय अंकेक्षण नहीं कराए जा रहे हैं । अकादमी के कार्य संचालन के लिए नियमावली का गठन अब तक नहीं हो पाया है । 1981 से लेकर आजतक संस्कृति विभाग को पच्चीसों पत्र लिखने के बावजूद यहाँ कुछ कर्मचारी सचिव के संरक्षण में कार्यरत हैं और मनमानी राशि उठा रहे हैं । सबकुछ जानते हुए भी संस्कृति विभाग की ख़ामोशी संस्कृति-धन घोटाले में कतिपय अधिकारियों की संलिप्तता की ओर संकेत करती है ।
वर्तमान में भी अकादमी का हाल इन बातों से इतर नहीं है । उपरोक्त बातें स्याह अध्याय के चंद पन्ने मात्र हैं, न जाने और कितने काले अध्यायों को अपने अंदर छुपाए यह अकादमी बिहार के संगीत-नाटक का सूत्रधार होने का दंभ भरती है । वहीं इसके कुर्सियों पर आसीन लोग कलाकार कम कला के दुकानदार ज़्यादा है, जहाँ परसेंटेज का खेल धरल्ले से चलता है और चुकी हर किसी का हिस्सा तय है इसलिए स्थिति “सूरज अस्त, सब मस्त” वाली है । ऐसी भ्रष्ट अकादमियों से किसी भी देश-राज्य के कला का भला नहीं हो सकता । लेकिन सवाल तो यही पैदा होता है कि शिकायत करें तो किससे ? जिधर देखो उधर ही दुकानदारी चालू है, जो अपना मुनाफा देखता है, कला और कलाकारिता का उत्थान पतन देखने का समय और ज़रूरत ही नहीं है ! इस खेल में कलाकार वर्ग शामिल नहीं है, कोई यह कहता है तो सच नहीं है । उपरोक्त स्थिति केवल बिहार संगीत नाटक अकादमी की हो, ऐसा नहीं है । देश की ज़्यादातर अकादमियां इसी पथ के अनुगामी हैं ।
सपने ज़िंदा रहते हैं, मरते नहीं ।
संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भूमिका के साथ बिहार संगीत नाटक अकदमी का पुनर्गठन, नियमावली का निर्माण व प्रेमचन्द रंगशाला को बिहार के सांस्कृतिक वर्तमान, भविष्य तथा इतिहास का साक्षी बनाने के लिए प्रांगण में पूर्वाभ्यास स्थलों का निर्माण, नाट्य साहित्य की प्रमुखता वाला एक पुस्तकालय, क्लासिक फ़िल्में, गीत-संगीत, रंग-संग्रहालय, शोध केन्द्र, नुक्कड़ नाटकों और विचार-गोष्ठियों की एक जगह, रंगमंडल सहित बिहार में एक नाट्य विद्यालय की परिकल्पना व बिहारी अस्मिता तथा बिहार की लोक कलाओं और कलाकारों का संरक्षण - ये कुछ ऐसे सपने हैं जो हर सजग रंगकर्मी देखता है । कला को संरक्षण देने का अर्थ केवल पैसे बांटना नहीं होता । किन्तु हकीकत यह कि फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी भवन में आज साहित्य नहीं, प्रबंधन की पढ़ाई होती है, प्रेमचंद रंगशाला अप-संस्कृति का केन्द्र बनने की ओर अग्रसर है और अकादमी की कारगुजारी जग ज़ाहिर है ।
66 वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ‘राष्ट्र के नाम संदेश में’ माननीय राष्ट्रपति कहते हैं कि “हमें अपने देश में शासन व्यवस्था एवं संस्थाओं के कामकाज के प्रति चारों ओर निराशा का वातावरण दिखाई दे रहा है ।” ऐसी निराशा किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए चिंता का विषय होना चाहिए ।

बहरहाल, ‘समस्त संस्कृतिकर्मियों’ के इस आंदोलन के समर्थन में दिल्ली के रंगकर्मियों और रंगप्रेमियों ने बिहार भवन पर प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री बिहार के नाम एक ज्ञापन भी दिया, वहीं देश भर के संवेदनशील संस्कृतिकर्मियों का समर्थन मिला । प्रतिरोध का मूल्याकंन सफलता और असफलता के पैमाने से न होता है, न होना चाहिए । बात बस इतनी सी है कि ज़िंदा कौमें प्रतिरोध करती है और करती रहेंगी । प्रतिरोध पर किसी भी वाद, पार्टी, संगठन या व्यक्ति का एकाधिकार नहीं होता । 
अंत में :- कुछ कुर्सियों पर नाम और चेहरे बदल देने से बदलाव नहीं बल्कि बदलाव का नाटक होता है. 

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...