Sunday, November 15, 2015

दिवाली : एक कम्युनिस्ट के बेटे का मूर्खतापूर्ण इमोशनल पोस्ट

बात उस ज़माने की है जब कम्युनिस्ट पार्टी के पास जूनून था, हौसला था। उसके कार्यकर्ताओं की आँखों में नई दुनियां बसने और बनाने का सपना था। हां कुछ नहीं था तो - पैसा। यह बिहार के पृष्ठभूमि में 1974 के छात्र आंदोलन के बाद वाले काल की बात है। जब कम्युनिस्ट होलटाइमर अपना घर परिवार छोड़कर अपने-अपने इलाके में किसी फकीर की तरह रहते थे। जो मिलता वो खाते, जहाँ नींद लगती वहीं जनता के साथ ही किसी घर, दालान या खुले आकाश के नीचे में सो जाते। सम्पत्ति के नाम पर उनके पास बस एक सर्वोदयी झोला होता जिसमें कलम, कॉपी, किताब, एकाध कपड़े के अलावा यदि कुछ होता तो वह था नई दुनियां बनाने का सपना। इसी काल में शायद “झोलटंग” नामक शब्द भी प्रचालन में आया था, जो शायद इनका ही उपहास बनाने के लिए प्रचलित हुए होगा। वैसे भी झोला और दाढ़ी तो उन दिनों फैशन बन ही गया था। महिलाओं की दाढ़ी आती नहीं, हां महिला कार्यकर्त्ता भी होंगे ही उन दिनों, अब वो झोलटंगी करती थीं या नहीं यह एक अध्ययन का विषय है।
वह चिट्ठी युग था - मोबाईल और टेलीफोन युग नहीं। वे कार्यकर्त्ता घर से महीनों महीना गायब रहते और उनके घरवालों को उनकी कहीं कोई खोज-खबर नहीं मिलती। अब ज़रा कल्पना कीजिए उन पत्निओं की हालत का जो इनसे ब्याह दी गईं थी और जिन बेचारियों को यह समझ ही नहीं आता था कि उनका पति आखिर करता क्या है। भिखारी ठाकुर की नायिका प्यारी सुंदरी को तो कम से कम यह तो पता था कि उसका पति बिदेसी बिदेस गया है तो नगदा-नगदी दाम कमाने; लेकिन इन पत्नियों को तो यह भी पता नहीं था कि उसके अच्छे खासे पढ़े लिखे पति कोई ढंग की नौकरी करने के बजाय जाता कहाँ है और करता क्या है! नगदा-नगदी दाम की तो बात ही बेकार है। घर आते वक्त कभी पांच पैसे का एक लमचुस (उस वक्त का टॉफी) भी ले आए तो गनीमत। अब इन बेचारियों की किस्मत में इंतज़ार और घर और आस पड़ोस के ताने सुनने के सिवा शायद ही कुछ और था। इनके पति जब कभी पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिए जाते तब तो दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ता जैसे। क्योंकि मान्यता यह है कि पुलिस तो गुंडे मवाली को पकड़ती है! खैर ये बेचारी पत्नियाँ किसी बटोही के कंधे पर सिर रखके सरेआम – “पीया निपटे नादंवा ए सजनी” भी नहीं गा सकतीं थी।
यह महिलाएं सिमोन द बुवआर भी नहीं नहीं थी कि अपने इस क्रांतिकारी और समाज की चिंता में बेदर्द हो गए पति को त्याग कर अपनी आज़ादी को गले लगा लें। यह एकदम साधारण सोच रखने वाली औरतें थीं जिनके लिए शादी का अर्थ जन्म जन्मांतर का बंधन जैसा ही कुछ था। अब इनके सामने घर के किसी अंधेरे कोने में मुंह दबाते हुए रोने-सिसकने और चुपचाप घरवालों के ताने सुनते हुए घर के काम में व्यस्त रहने के सिवा कोई और चारा भी नहीं था। अपने पति के आगमन पर कितनी रातें इन्होनें मीना कुमारी अंदाज़ में बिताएँ होंगें, किसी सामाजिक विज्ञानी के पास शायद ही इसकी कोई जानकारी उपलब्ध हो!
इनके बच्चों का आलम तो पूछिए ही मत। परिवार यदि निम्न मध्यवर्गीय है तो ये कब खाए, क्या खाए, क्या पहने और कब कुपोषित होते हुए बड़े हुए – किसे पता? साल में एक नया कपड़ा मिल जाए तो गनीमत। ऐसे ही एक ग्यारह वर्षीय लड़के को एक बार दिवाली में दो उपहार मिले। पहला कि पापा/पिताजी/बाबू घर आए और साथ ही कुछ पटाखे भी लाए। पता चला कि पापा को पटना में कोई कम्युनिस्ट पार्टी के नौकरी पेशावाले समर्थक मिल गए थे। उन्हें जैसे ही पता चला कि कॉमरेड घर जा रहे हैं – खाली हाथ, तो बच्चों के लिए कुछ पटाखे खरीदकर पकड़ा दिए और शायद कुछ पैसे भी। पत्नी के लिए कुछ साड़ी – वाडी जैसा कोई उपहार तो शायद नहीं ही था।
अब उस बच्चे को बीड़ीया पड़ाका (पटाखा) और छुर्छुरी तो चलाना आता था लेकिन आसमान तारा कैसे चलाया जाय, पता ही नहीं था। तो गोतिया के एक चाचा आए और शीशे की एक खाली शीशी (बोतल) में रखके आसमान तारा चलाते रहे और वो लड़का उसे ही देखकर मस्त होता रहा।
कुछ साल बाद फिर दिवाली आई। तबतक वो लड़का अपने एक भाई, बहन और माँ के साथ अपने पापा के कार्यक्षेत्र में ही रहने लगा था। उसकी माँ ने अन्तः यह तय कर लिया था कि अब चाहे जो हो उसे अपने पति के साथ ही रहना है। वह एक दलित जाति की बस्ती थी जिसमें उसके पापा कार्यरत थे। उस दिवाली की रात बाकि सारे लड़के पांच-दस बीड़ीया पड़ाका (पटाखा) लेकर फोड़ रहे थे। चौदह साल का यह बच्चा खाली हाथ ललचाई नज़रों से उन्हें देख रहा था। फिर वो दौड़ता हुआ आया और पटाखे की ज़िद्द करने लगा। पापा की जेब खाली थी और माँ के पास पैसे कहाँ से आएगें? पापा ने पहले समझाया, लेकिन बच्चा ज़िद्द पर अडा रहा तो पापा का धैर्य जवाब दे दिया और अपनी मज़बूरी और लाचारी को गुस्से में बदलकर पहले तो बच्चे की पिटाई की फिर उसे घर से (जिस सार्वजनिक स्कूल के एक कमरे में वो रहते थे) बाहर निकाल दिया। बच्चा बाहर निकला और बस्ती के एक खाली पड़े झोपड़ी में घुसकर बहुत देर तक सिसकता रहा। गुस्सा शांत होने पर उसके पापा उसे खोजते हुए आए और गोद में उठाकर सीने से लगा लिया। बच्चा अब भी सिसक रहा था और शायद पिता के आँखों में भी आसूं थे लेकिन अँधेरा इतना ज़्यादा था कि उस बच्चे को उसके पिता के आसूं शायद दिखाई नहीं पड़े।
उस बच्चे ने उसी दिन पटाखा नहीं चलाने का कसम खाया और वो अपने इस कसम पर आज भी कायम है। उसके पिता आज 60 की उम्र पार कर चुके हैं और आज भी मार्क्सवाद में उनकी आस्था अटूट है। वो आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर हैं लेकिन आज पार्टी को उनकी कोई परवाह नहीं है। पिछले दिनों उसके पापा का एक गंभीर सड़क दुर्घटना हुआ था, जिसमें उनकी जान जाते जाते बची। लेकिन उनके कुछ व्यक्तिगत शुभचिंतकों के अलावा किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। पार्टी ने तो उन्हें न जाने कब का मृत मान चुकी है। कारण यह कि आज जिस लाइन पर उनकी पार्टी चल रही है उससे इनकी पूर्ण-सहमति नहीं है।
पार्टी के पास जब कुछ पैसा आया था तो उसने अपने होलटाइमरों के लिए महीने की उतनी राशि देने का वादा किया था जितने में कि इनका परिवार साधारण तरीके से खा-पी और जी सके लेकिन पिछले कई सालों से इस रकम पर बिना किसी कारण और वाद-विवाद के रोक लगा दी गई।
और बेटे का आलम यह है कि मार्क्सवाद में पूर्ण विश्वास होते हुए भी वह किसी पार्टी का सदस्य नहीं है क्योंकि वह सिद्धांत चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि वह व्यवहार में नहीं है तो उसका उसके लिए कोई महत्व नहीं है।
बेटा पापा को कहता है - "पापा आपने अपने पुरी ज़िंदगी कम्युनिस्ट पार्टी में लगा दी, इस दौरान आपने कई जेनरल सेक्रेटरियों के साथ काम किया और आज आप यहाँ अनवांटेड की श्रेणी में डाल दिए गए हैं। कुछ नहीं तो कम से कम अपनी पुरी ज़िन्दगी पर बेवाकी से संस्मरण ही लिख दीजिए ताकि आनेवाली पीढियां आपलोगों की गलतियों और अच्छाइयों से कुछ सीख ले।” पापा साफ़ माना करते हुए कहते हैं – “इससे कम्युनिस्ट पार्टी की बहुत बदनामी होगी और अभी वो समय नहीं है। हमारा कार्य अभी अधूरा है और अभी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य करने हैं।”
बेटा एकटक उनकी तरफ़ देखता और सोचता है कि ये लोग किस मिट्टी के बने हैं। इनका विश्वास क्या कभी थकेगा नहीं? हालांकि बेटा ऐसे कई पिताओं को जानता है जो आज अपनी ही पार्टी में अनवांटेड की श्रेणी में डाल दिए गए हैं कुछ तो न जाने कब के मौत के गर्त में समा गए जिनकी असमय और अवसादग्रस्त मौत पर कुछ व्यक्तिगत साथियों के अलावा किसी ने लाल सलाम तक पेश नहीं किया।
बहरहाल, परिस्थिति शायद अभी ज़्यादा अनुकूल नहीं हैं। चुनौतियाँ और अंदर-बाहर का संघर्ष भी खतरनाक रूप से बढ़ा है लेकिन सबसे अच्छी बात है सपनों का ज़िंदा रहना क्योंकि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।
पुनश्च – बेटे के पिता शायद इस पोस्ट को सबसे ज़्यादा नापसंद करें, लेकिन क्या किया जाय बेटे ने भी तो सत्य बोलना और उसके पक्ष में खड़ा होना अपने पिता से ही सिखा है। इसकी कीमत की परवाह जब पिता ने आजतक नहीं किया तो बेटा क्यों करे? वैसे भी सर्वहारा के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और पाने के लिए सारी दुनियां।

Sunday, November 8, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव 2015 उर्फ़ मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है!

मेरा गांव बाढ़ शहर से लगभग आठ किलोमीटर अंदर है लेकिन चुनाव का क्षेत्र मोकामा पड़ता है। बाढ़ शहर से गांव की तरफ़ जानेवाली सड़क का अतिम पड़ाव है मेरे गांव। उसके आगे आज भी पगडंडियों का ज़माना है। गांव के लोग लगभग रोज़ ही बाढ़ जाते हैं, मोकामा नहीं। स्टेशन भी बाढ़ ही पड़ता है लेकिन चुनाव क्षेत्र पता नहीं क्यों मोकामा। आज से पच्चीस साल पहले गांव में बिजली थी और नल से पानी आता था। फिर एक समय इलाके में बिजली के तार की चोरी होने लगी। तो एक रात हमारे इलाके की तार भी चोरी हो गई और हम सब राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से लालटेन युग में चले गए। बिजली गई तो पानी भी गायब हो गया। सड़क की हालत ऐसी की कहाँ गड्ढा है और कहाँ सड़क यह तय कर पाना किसी कठिन पहेली को सुलझाने जैसा दुरूह प्रश्न था। लालटेन युग में अपराध का आलम यह हुए कि एक जाति का आदमी दूसरे जाति के गांव में जाने से भय खाने लगा। खुद मेरे गांव का रास्ता भी बदल गया। अब बगलवाले गांव में जाना खतरे से खाली नहीं रह गया था।
गांव में बहुत पहले स्टेट बैंक की एक शाखा खुली थी। बैंक मैनेजर रोज़ बाहर से आता था। एक दिन बैंक के मैनेजर से ही पैसे मांगने लगे कुछ लोकल गुंडे तो बैंक ही वहां से उठकर पंडारक चला गया। वहां आज भी बैंक के बोर्ड पर मेरे गांव का ही नाम टंगा है। ऐसा नहीं था कि सब एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हों लेकिन दूध भरी बाल्टी को दूषित करने के लिए एक मक्खी ही काफी है।
गांव के दक्षिण कोने पर मुसहर नामक दलित जाति की बस्ती है। एक से एक नायक, जननायक हुए बिहार में लेकिन विकास की कोई भी निशानी वहां तक पहुँच नहीं पाई। राजधानी से वहां के लिए कुछ चला भी तो बड़ी जाति की बस्ती में आकर ठहर गया। कुछ बदलाव हुए भी लेकिन इस बदलाव में सरकार की भूमिका के बजाय पलायन की भूमिका ज़्यादा है। पहले खेत में बनिहार और बंधुआ मजदूर बनकर किसी जानवर की तरह खटनेवाले यह लोग खेती और सामंतवाद की हालत खस्ता होने के उपरांत शहरों की ओर पलायन कर गए। वहां हाड़ तोड़ मेहनत मजदूरी करके रोज़ कमाओ, रोज़ खाओ वाले की श्रेणी में शामिल हो गए। इन्हें सामंतवाद की क्रूरता से तो मुक्ति मिली है लेकिन पूंजीवाद का दमन अभी भी इनकी किस्मत बनी है।
पुरे गांव का चक्कर मारिए तो उसकी भी हालत देश की हालत जैसी ही है अर्थात एक या दो घर अमीरी की चादर लपेटकर तरक्की (आर्थिक रूप से) कर रहे हैं और बाकि के लोग दिन प्रतिदिन और ज़्यादा गरीब होते जा रहे हैं। हां जो बिना किसी भेद भाव के बढ़ रहा है वह आबादी, गरीबी और पलायन। गाँव में पर्व - त्योहारों में थोड़ी रौनक आ भी जाती है लेकिन बाकि दिन तो सन्नाटा ही पसरा रहता है। जो लोग सालों भर यहाँ रहते हैं उनके चहरे देखर साफ़ समझा जा सकता है कि उन्होंने सालों से खुले दिल से ठहाका नहीं लगाया है। गांव की सामूहिकता और बैठकी तो अब इतिहास की बात हो गई है।
खेती यहाँ का मुख्य साधन है लेकिन उसकी हालत खस्ता है और न जाने कब से सरकारों को इसकी कोई चिंता भी नहीं है। घरों के ऊपर केवल टीवी के छाते और हाथ में मोबाईल आ गए हैं। पहले तीन फेज बिजली आती थी, जिससे सीचाई का काम भी होता था अब केवल एक फेज बिजली है जिससे आप टीवी देखिए, फ्रिज चलाइए और मोबाईल चार्ज कीजिए। हां, इधर शहर से गांव जानेवाला सड़क में कुछ सुधार है और कुछ छोटे अपराधी जेल की हवा खा रहे हैं। लेकिन जीवन और समाज के मुलभुत सवाल आज भी जस के तस मुंह बाए खड़े हैं।
यह स्थिति लगभग पुरे इलाके अर्थात एशिया का सबसे बड़ा टाल कहे जानेवाले इलाके की है। ऐसी स्थिति के बीच आखिरकार बिहार विधानसभा का एक और चुनाव संपन्न संपन्न हो गया। बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव मुख्यतः नितीश-लालू महागठबंधन और मोदी की भाजपा के बीच थी। महागठबंधन का मुख्य चेहरा नितीश कुमार थे तो भाजपा ने किसी भी बिहारी नेता को भाव न देते हुए मोदी ब्रांड सुनामी ही चलाने का काम किया। उन्हें शायद यह विश्वास था कि जब यह हवा देश में चल गई तो बिहार में क्यों नहीं चलेगी। जहाँ तक सवाल लालू का है तो वो क्या थे और क्या हो गए यह बात सबको पता है। वैसे भी जयप्रकाश नारायण के शिष्यगण उनका नाम लेकर आज के समय में क्या गुल खिला रहे हैं, यह बात अब जग ज़ाहिर है। कॉंग्रेस की हालत बिहार में चटनी जैसा है जिसे खाते वक्त ज़रा सा चाट लिया जाता है और वामपंथ अपना खूंटा ही तलाश ले तो काफी है।
तो मूल मुकाबला महागठबंधन और मोदी (यह चुनाव व्यक्ति केंद्रित ज़्यादा था पार्टी और विचारधारा केंद्रित कम) के बीच था। दोनों तरफ़ से ऐसे ऐसे और इतने प्रकार के दावे -वादे किए हैं कि उनमें से यदि आधे भी कोई पूरा किया जाय तो बिहार पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा। लेकिन अफ़सोस ऐसा होगा नहीं। क्योंकि जुमले का जवाब जुमला था और झूठ का जवाब उससे भी बड़ा झूठ। कोई कहता हम आम देंगें तो दूसरा झट से कह उठता कि आम क्या हम तो आम के साथ कटहल भी देंगें। यह कोई बताने को तैयार नहीं कि यह आम और कटहल और इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा।
नेता एक दूसरे के ऊपर बड़े ही बेशर्म होकर कीचड़ फेंकते रहे और किसी ने बिहार और बिहार की जनता की मुलभुत ज़रूरतों और समस्याओं पर कुछ भी कहना उचित नहीं समझा। गरीबी, बेरोज़गारी, जातिवाद, शिक्षा आदि को छोड़कर गाय और जंगलराज का कानफोडू शोर ही होता रहा। जाति की बात हुई भी तो केवल वोट बटोरने के लिए। चुनाव के ठीक पहले कुछ हत्याएं और धार्मिक स्थलों पर मांस के टुकड़े फेंकने जैसा पुराना नुस्खा भी अपनाया गया, जिसे बिहार की जनता ने बड़ी ही क्रूरता से नकार दिया। इसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ़ की जाय, कम है। दंगा कराकर वोट का धुर्वीकरण करना जिनका पेशा है वो बेचारे बड़े निराश भी हुए होंगें और बिहारियों को पानी पी-पीके कोसा भी होगा। जहाँ तक सवाल भाजपा का है तो इसकी विचारधारा के अंदर ही भष्मासुर के तत्व विराजमान हैं, जो अपना विनाश खुद ही करेगा। हां, इस चुनाव में वाम एकता भी हुए लेकिन वाम ने यह काम तब किया है जब वो आवाम से तमाम हो रहा है और देर आए लेकिन दुरुस्त आने जैसा अब कुछ बचा ही नहीं है इनके लिए बिहार में।
भारत के कोई भी चुनाव अब ताकत और पैसे का खेल बन चुका है। इस चुनाव के मद्देनज़र इलेक्शन कमीशन द्वारा बनाई गई टीम एवं इन्कम टेक्स डिपार्टमेंट द्वारा अब तक कुल 39 करोड़ रुपया (विदेशी मुद्रा सहित),1.67 लाख लीटर शराब, 857.91 किलोग्राम गांजा, 7.84 लाख किलोग्राम महुआ, 336 ग्राम हीरोइन, 8.66 किलोग्राम सोना पकड़ा गया। इतना तो पकड़ा गया। इससे कहीं ज़्यादा इस चुनाव के "महापर्व" में खाप गया होगा।
ज्ञातव्य है कि इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव कुल पांच चरणों में संपन्न हुआ। मुख्य चुनाव अधिकारी के अनुसार इस चुनाव में कुल 300 करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। जिसमें 152 करोड़ विभिन्न गाडियां, पेट्रोल, डीजल, बूथ बनाने, उसकी बैरिकेटिंग और चुनाव से सम्बंधित चीज़ों की छपाई में खर्च हुए। इस चुनाव में कुल 89,000 गाड़ियों का इस्तेमाल हुआ। वहीं सुरक्षा और केंद्रीय फ़ोर्स पर कुल 78 करोड़ रुपया खर्च किया गया। यदि विभिन्न पार्टियों द्वारा खर्च किए गए रुपयों को भी इस खर्च में जोड़ दिया जाय तो खर्च का यह आंकड़ा कितने हज़ार करोड़ पर जाके रुकेगा इसका अनुमान मात्र से ही किसी भी आम नागरिक का ह्रदय गति रुक सकता है।
चुनाव आयोग जितना रूपया खर्च करने की इजाज़त एक प्रत्याशी को देता है उतने में बहुत कम ही प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं। अभी हाल ही में एक स्ट्रिंग ऑपरेशन हुआ था जिसमें एक प्रतिष्ठित पार्टी के मंत्री महोदय रुपया ग्रहण करते हुए उदगार व्यक्त कर रहे थे कि एक प्रत्याशी को "सही तरीके से" चुनाव लड़ने में करोड़ों रुपया खर्च बैठता है। यदि इसे सच माना जाय तो काले धन का इस्तेमाल भी कोई आश्चर्यजनक तथ्य नहीं है।
इस बार के बिहार चुनाव में Bihar Election Watch and Association for Democratic Reform के अनुसार कुल 3450 कैंडिडेट मैदान में थे, जिनमें महिला उम्मीदवारों अर्थात आधी आबादी के उम्मीदवारों की संख्या केवल 273 (8%) थी। यह संख्या पिछले चुनाव से एक प्रतिशत कम थी। पार्टियां महिलाओं के लिए बड़े बड़े वादे तो करती हैं लेकिन उन्हें टिकट देने में हद दर्जे की कंजूसी करती है। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में 3523 प्रत्याशियों में 3019 की जमानत जब्त हो गई थी। ज्ञातव्य हो कि उस वर्ष कुल 307 महिला प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था जिनमें से 242 की जमानत जब्त हो गई थी। तो हारनेवाले प्रत्याशी पर कोई भी दल दाव और पैसे क्यों लगेगा भला? प्रसिद्द लेखिका इस्मत चुगताई अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक “कागज़ी है पैराहन” में लिखतीं हैं – “यह मर्द की दुनियां है, मर्द ने बनाई और बिगाड़ी है। औरत एक टुकड़ा है उसकी दुनियां का जिसे उसने अपनी मुहब्बत और नफ़रत के इज़हार का ज़रिया बना रखा है। वह उसे अपने मुड के मुताबिक पूजता भी है और ठुकराता भी है।” तो क्या यह चुनाव भी मर्दों और पैसों का खेल है? जो भी हो लेकिन लोगों का आज भी मतदान में हद दर्ज़े का विश्वास है। और कवि धूमिल के शब्दों में कहा जाय तो – बुरे और कम बुरे के बीच चुनते हुए न उन्हें भय है, न लाज है। इस चुनाव में 796 (23%) उम्मीदवारों पर हत्या, हत्या का प्रयास, सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गम्भीर अपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें भाजपा के 39%, जदयू के 41%, राजद के 29% कांग्रेस के 18% उम्मीदवार शामिल हैं। पिछले साल इनकी संख्या 560 (18%) थी। यानि की इस साल 5% की बढ़ोतरी हुई है। तर्क या कुतर्क यह कि दोषी या निर्दोष अदालत तय करेगा, हम या आप नहीं और फिर मुकद्दमे का क्या है वह तो किसी के ऊपर कोई भी कर सकता है। इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि हम जानते हैं कि फलां का पूरा इतिहास ही अपराधिक रहा है लेकिन हम उसे अपराधी नहीं कह सकते, मानना तो बहुत दूर की बात है। फिर अपराधी अगर दबंग है और अपनी जाति का है तो वह खलनायक नहीं बल्कि नायक होगा। हालत तो यह है कि अदालत से सजा पाने के बाद भी लोग पार्टियों के सुप्रीमो बने हुए हैं और जमानत पर बाहर निकलके खुलेआम न केवल चुनाव प्रचार कर रहे हैं वरन् राज्य और देश की दशा और दिशा सुधारने की बात भी कर रहे हैं! और सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि हम उनपर विश्वास भी करते हैं।
कहा जाता है कि बिहार एक गरीब और पिछाडा हुआ राज्य है। लेकिन भाजपा के 67%, जदयू के 75%, राजद के 65%, कॉंग्रेस के 20% उम्मीदवार सहित 1150 अन्य उम्मीदवार करोड़पति हैं। वही एक उम्मीदवार की संपत्ति तो 928 करोड़ है। तो गरीब राज्य के मंत्री अमीर कैसे हो जाते हैं? क्या सच में बिहार एक गरीब राज्य है? तो फिर एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) और बिहार इलेक्शन वॉच के इस आकड़े को क्या कहेंगें जो यह बताते हैं कि पिछले चुनाव (2010) से इस चुनाव के बीच जो विधायक पुनः चुनाव लड़ रहे हैं उनकी कुल संख्या 160 है। जिनमें जदयू के 52, भाजपा के 66, राजद के 12 और कांग्रेस के 6 विधायक शामिल हैं। उनमें जदयू विधायकों के धन में 314%, भाजपा के 155% और राजद के 76% की बढ़ोतरी हुई। पिछले 5 वर्षों में इन 160 विधायकों की औसत सम्पत्ति करीब 200% बढ़ी हैं। 2010 में इनकी औसत सम्पत्ति 86.1 लाख रूपए थी। यह 2015 में बढ़कर 2.57 करोड़ हो गई। जदयू के एक विधायक की सम्पत्ति तो 13 हज़ार प्रतिशत तक बढ़ गई। अब सवाल यह है कि यदि बिहार एक गरीब राज्य है तो एक गरीब राज्य के विधायक दिन प्रतिदिन अमीर कैसे होते जा रहे हैं?
बिहार ही नहीं भारत के बारे में भी यही बात प्रचारित की जाती है कि भारत एक गरीब देश है लेकिन पुरे भारत के नेताओं को देखकर क्या सच में ऐसा लगता है? “आज का भारत 1940” नामक पुस्तक में इतिहासकार रजनी पामदत्त का कथन हैं – “भारत गरीबों का देश है, लेकिन भारत गरीब देश नहीं है। भारत की वर्तमान स्थिति से दो तथ्य सामने आते हैं। एक तरफ़ भारत की प्राकृतिक सम्पदा एवं संसाधनों की बहुलता वर्तमान आबादी एवं उससे भी ज़्यादा आबादी को समृद्ध – संपन्न बनाने की क्षमता रखती है।” तो क्या इस देश की प्राकृतिक सम्पदा एवं संसाधन की लूट ज़ोरों से नहीं हो रही हैं और इस लूट में क्या वो सबलोग शामिल नहीं हैं जिनके उपर की इस देश का भविष्य संवारने का दारोमदार था/है। ज्ञातव्य है कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत की आधी से ज़्यादा आबादी आज भी गरीबी और भुखमरी से पीड़ित है।
खैर हम एक उदार लोकतंत्र के निवासी हैं और इन सब बातों से लोक और लोकतंत्र दोनों को ही अब कोई फर्क पड़ता नहीं पड़ता है! यहाँ चुनाव को एक ऐसे महापर्व के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया जाता है जैसे सारी समस्यायों का हल इसी से हो जाएगा! बहरहाल, चुनाव संपन्न हुआ। निश्चित ही किसी न किसी की जीत हार तो होगी ही। लेकिन जीतती भी जनता है और हारती भी जनता है !!! प्रसिद्द कवि धूमिल अपनी चर्चित कविता “पटकथा” में लिखते हैं –
मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्राएँ हैं
हर तरफ़
शब्दवेधी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूंथाता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है। 

Monday, October 26, 2015

युगल किशोर : वो ज़िन्दादिली, वो शरारत भरी मुस्कान

कल रात तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी तो मैं जल्दी सो गया था. सुबह – सुबह तड़के आँख खुलते ही नेट ऑन करके फेसबुक, वाट्सअप आदि के मैसेज चेक करना अब हम जैसे लोगों की आदतों में शुमार है. जैसे ही नेट ऑन किया तो वेदा राकेश जी का मैसेज वाट्सअप पर पड़ा था - V sad news…Jugal passed away. मैसेज 11.24 बजे रात्रि का था. मैं अभी ठीक से जगा भी नहीं था. मैंने जवाब में केवल व्हाट लिखा. सच कहूँ तो इस खबर पर यकीन नहीं किया जा सकता है. मैंने फ़ौरन वेदा जी को फोन लगाया. राकेश जी ने फोन उठाया. हमेशा बुलंद आवाज़ में बात करनेवाले राकेश जी के स्वर में बेहद उदासी थी. उन्होंने बस इतना ही कहा कि बड़ा ही विकट समय है, एक एक करके सारे अच्छे लोग हमें छोड़कर जा रहे हैं. मेरी और राकेश जी दोनों ही के समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि इस वक्त और क्या बात किया जा सकता है. सच है कि कभी – कभी शब्द बड़े ही बौने हो जाते हैं और मौन मुखर.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में बतौर कलाकार मेरे साथ भारतेंदु नाट्य अकादमी के कुछ पूर्व विद्यार्थी भी कार्यरत थे. उनके मुंह से जुगल सर के किस्से बहुत सुने थे. हालांकि सुनी सुनाई बातों पर किसी भी व्यक्ति के बारे में कोई अवधारणा बनाना उचित नहीं लेकिन इतना तो समझ में आ ही गया था कि एक खुशमिजाज और जिंदादिल इंसान की कथा है. फिर पीपली लाइव नामक फिल्म देखी तो इनके चहरे से भी रु-ब-रु होने का अवसर प्राप्त हुआ. चेहरे पर लखनवी पानी और नमक की चमक साफ़ - साफ़ देखी जा सकती थी. साथ ही साथ यह भी अंदाज़ा हो गया कि वो निश्चित ही एक बेहतरीन अभिनेता हैं.
फरवरी 2015 को युगल सर से मुलाकात हुई इप्टा के डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) इकाई द्वारा आयोजित 10 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में. रामलीला नाटक के लेखक राकेश जी, निर्देशिका वेदा राकेश जी के साथ युगल सर भी इस आयोजन में मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित थे. चाय पीते – पीते पता नहीं कब गप्पों का सिलसिला शुरू हो गया. अजनबी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था. अपने एकांतप्रिय स्वभाव के कारण मैं पहले थोड़ा असहज ज़रूर था किन्तु फ़ौरन ही यह असहजता कब और कैसे गायब हो गई, पता ही नहीं चला. फिर क्या था हम तीन दिनों तक जमके बातें करते रहे. दुनियां जहान के किस्से, मज़ाक. सकारात्मक सोच के इन तीनों इंसानों को सुनना ही मेरे मन में उर्जा का संचार कर रहा था. हम साथ – साथ नाश्ता करते, चाय पीते, खाना खाते, नाटक देखते, अतिथि की कुर्सी पर बैठते, घूमते – टहलते और खूब सारी गप्पें मारते.
एक शाम हम नाटक देखने पहुंचे. साउंड चेक करने के लिए ऑपरेटर कबीर का एक गीत “मन लागो यार फकीरी में” बजा रहा था. युगल सर और मैं दोनों सुकून भरा यह गायन सुनने लगे. युगल सर ने पूछा – किसने गाया है. मैंने कहा – सर मुझे पता नहीं. जुगल सर बोले – बड़ा सुकून से गया है. गीत खत्म हुआ तो युगल सर उठकर ऑपरेटर के पास गए और उससे दुबारा यह गीत बजाने का अनुरोध करते हुए पूछा कि यह गीत किसने गाया है. ऑपरेटर ने कहा – मुझे पता नहीं. फिर युगल सर ने कहा  - उन्हें यह गीत मिल सकता है क्या? ऑपरेटर ने कहा - पेन ड्राइव या स्मार्ट फोन है तो ले लीजिए. युगल सर के पास यह दोनों नहीं था. मैंने कहा – सर मैं ले लेता हूँ फिर आपको भेज दूँगा. युगल सर ने कहा – ठीक है. बाद में मैंने उस ऑपरेटर से यह और एक और गीत लिया – “पत्ता बोला बृक्ष से.” ले लिया. मैं जब गीत अपने मोबाईल में ट्रांसफर कर रहा था तो पता चला कि यह सुजात हुसैन खान ने गाया है. लेकिन अफ़सोस आजतक यह गीत मेरे ही पास हैं.
तीन दिन साथ रहने के पश्चात् हम विदा हो गए. युगल सर को जब भी मौका मिलता फोन लगा देते और फिर हम गप्पें मारने में व्यस्त हो जाते. अभी पिछले दिनों वो अपना नाटक “बेयरफुट इन एथेंस” (निर्देशक – राज बिसारिया) लेकर पटना आए हुए थे. लेकिन अफ़सोस कि मुझे उसी दिन पटना से रांची के लिए गाड़ी पकड़ना था. उन्हें मंच पर अभिनय करते हुए देखने की तमन्ना अधूरी ही राह गई. बहरहाल, कितनी बातों का अफ़सोस किया जाय. हां यह शिकायत ज़रूर रहेगी कि रंगमंच और समाज में जिंदादिल लोग अब बहुत ही कम बचे हैं. जिससे भी मिलो हाय पैसा, हाय पैसा करता रहता है. ऐसे समय में युगल सर का हमसे जुदा होना कही से भी सही और तर्क संगत नहीं है. यह भी कोई उम्र थी? इस उम्र में ही तो अभिनेता का अभिनय जवान होता है. अब तो बस यही उम्मीद है कि जुगल सर की जिंदादिली और शरारत भरी मुस्कान हम जैसे को सही राह दिखाए. अलविदा सर नहीं कहूँगा क्योंकि आप हम जैसे पता नहीं कितने शिष्यों के ह्रदय में धड़कन बनके धड़क रहे हैं और धड़कते रहेंगें.   

Wednesday, September 9, 2015

नटमेठिया का भिखारी ठाकुर

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल से त्यागपत्र देने के पश्चात मैं कुछ दिन पूरी तरह से विश्राम की मुद्रा में था कि एक दिन रणधीर कुमार का फोन आया और पूछा कि क्या सूत्रधार (संजीव का उपन्यास) पर नाटक लिखा जा सकता है? यह उपन्यास पढ़े कई साल हो गए थे इसलिए तत्काल कुछ कहना संभव नहीं था। मैंने कहा पहले पढ़ता हूं फिर आगे की बात करता हूं। झारखण्ड की राजधानी रांची में साहित्यिक पुस्तकों की बड़ी किल्लत है। मगर घर में धुरंधर पढाकों की वजह से मुझे एक जगह का पता चला जहां किताब मिलने की संभावना थी। बल्कि पढाकों के पास वहाँ का फोन नंबर भी निकल आया और दुकान चूँकि घर से बहुत दूर थी इसीलिए पहले फोन से ही कन्फर्म कर लिया गया कि किताब वहाँ है। मैं रांची के लिए नया था इसलिए मैं और स्वाति स्कूटी से दुकान की ओर चले। पता चला कि स्वाति को दुकान के जहां होने का पता था दुकान वहाँ है ही नहीं। आखिर घर से फोन पर बातचीत के कई दौर और गलियों के कई चक्कर लगाने के बाद आखिर पता चला कि दुकान कहीं और चली गयी है। किसी तरह वहाँ जाने का पैदल रास्ता पता चला। हम ये सोच ही रहे थे कि वहाँ स्कूटी से कैसे पहुंचा जा सकता है कि तब तक स्वाति की स्कूटी ने स्टार्ट होने से ही मना कर दिया। दुकान के बजाये अब हम किसी मेकैनिक का पता लगाने लगे और ठेल ठाल कर वहाँ पहुंचे। हमारी तीन महीने की बिटिया घर में नाना नानी के पास थी तो हम बहुत देर भी नहीं कर सकते थे। सो स्वाति मुझे स्कूटी बनवाने छोड़कर अकेले दुकान की खोज में चली। उसके जाने के कुछ ही देर बाद ज़ोरदार बारिश शुरू हो गयी और लगभग घंटे भर होती रही। हमारे पास न छाता न बरसाती। स्वाति का फोन मेरी जेब में रह गया था तो उससे कोई संपर्क भी नहीं हो पा रहा था। बीच में घर से फोन आया तो मैंने गाडी ले कर आने को कह दिया। बारिश के बीच में ही उस सज्जन दुकान मालिक ने, जो स्वाति के बाबूजी के मित्र भी हुआ करते हैं, स्वाति को परेशान देख कर उसे अपनी गाडी पर भिजवा दिया। उस पतली सी दुकान में लगभग घंटे भर मकैनिक हमारी स्कूटी ठीक करता रहा और हम किसी तरह उस टपकते छत के नीचे अपने आपको बारिश से बचाते रहे। पहाड़ी इलाके की बारिश बड़ी ज़ालिम होती है, भीगे नहीं कि सर्दी, जुकाम और बुखार ने आ दबोचा। आख़िरकार गाडी का आगमन हुआ और स्वाति मुझे छोड़ कर दौडी दौडी अपनी माँ और बेटी के साथ उस पर बैठ गयी। गाडी में जगह और थी मगर स्कूटी को तो घर ले ही जाना था। गनीमत है कि घर से बरसाती आ गयी थी। अब मैं और बेचारी बीमार स्कूटी लगभग दस किलोमीटर ठुमक-ठुमककर चलकर भींगते हुए घर पहुंचे।
बहरहाल, कई दिनों तक भिखारी ठाकुर रचनावली, सूत्रधार व उनके ऊपर लिखे कई अन्य आलेख पढ़ने के बाद यह तो तय हुआ कि भिखारी ठाकुर के रचनाकर्म और संघर्षों के लेकर नाटक लिखा जाना चाहिए किन्तु उसके केन्द्र में उसके अलावा क्या होगा यह बात अभी तय होना बाकी थी। नाटक और डाक्यूमेंट्री दो अलग विधा है इसलिए नाटक में क्या होना चाहिए क्या नहीं इस बात को लेकर रणधीर और मेरे बीच फोन पर लंबी-लंबी बातों का सिलसिला शुरू हो गया। इन बातों से जो सार निकला वो यह कि नाटक संगीतमय होगा और हम भिखारी ठाकुर को एक आम रंगकर्मी की तरह ट्रीट करेंगें, पहले ही दृश्य से महान कलाकार के रूप में नहीं। साथ ही यह भी तय हुआ कि इसमे जातीय संघर्ष, नाट्यकला और सामाजिक सन्दर्भ को भी समाहित करने का प्रयास किया जाएगा। इसी क्रम में कहीं न कहीं यह भी निर्धारित हुआ कि एक ही नाटक में सबकुछ कह देना संभव और उचित नहीं इसलिए हम इसमे भिखारी ठाकुर के जन्म से लेकर एक प्रतिबद्ध कलाकार बनने तक की कथा ही कहें तो ठीक है। अब सवाल यह था कि इसे केवल भिखारी ठाकुर के जीवन तक ही सीमित किया जाय या फिर इसमें आज के कलाकारों के सवाल और चुनौतियों से भी जोड़ा जाय। क्योंकि समय भले ही बदला हो कलाकारों की दिशा और दशा में कोई गुणात्मक परिवर्तन लगभग ना के बराबर ही हुआ है। लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी था कि मोकाम कुतुबपुर दियर, पोस्ट कोटवा पट्टी रामपुर, छपरा, जिला सारन के भिखारी ठाकुर आखिर थे कौन। इसे समझने के लिए संजीव का उपन्यास और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा प्रकाशित भिखारी ठाकुर रचनावली तो थी ही साथ ही हृषिकेश सुलभ का नाटक बटोही, मधुकर सिंह का नाटक क़ुतुब बाज़ार के साथ ही साथ जगदीशचंद्र माथुर, तैयब हुसैन ‘पीड़ित’, नारायण भक्त, विद्याभूषण, डॉ बालेंदु शेखर तिवारी, उमापति पाण्डेय, अंकुश्री, डॉ सिद्धेश्वर, चंद्रशेखर, ब्रज कुमार पाण्डेय, प्रोफ़ेसर रामसुहाग सिंह, जख्मिकांत ‘निराला’, गजेन्द्र नारायण सिंह, उर्मिल कुमार थापियाल, सुभाषचंद्र कुशवाहा, केदारनाथ सिंह, निराला, रघुवंश नारायण सिंह, मुन्ना कुमार पाण्डे आदि के आलेखों और रिसर्च का सहारा भी था। फिर उसी दौरान मैं रौवार्तो क्लासो की पुस्तक क भी पढ़ रहा था तो कुछ प्रभाव उसका भी था। इसी किताब का प्रभाव था जो इस तरह के संवाद नाटक में समाहित हुए – “ब्राहमण वह है जो ज्ञानी हो और स्वयं अपनी काया गलाकार संतुष्ट रहे। यहाँ तो ज्ञानी-पंडित भी जात देखकर बात करता है।”
तभी पता चला कि मेरे गांव बड्डोपुर में भी भिखारी ठाकुर अपने नाटकों की प्रस्तुति कर चुके हैं। तो पापा के साथ ही साथ गांव के कुछ बड़े बुजुर्गों से बातचीत कर उनके नाटकों और व्यक्तित्व के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया। भिखारी ठाकुर के जीवन और रचनाओं पर तुलसीदास कृत रामचरितमानस का बड़ा प्रभाव था इसलिए इस ग्रंथ को भी पढ़ा। इंटरनेट पर भी खूब सर्च किया। वहां बहुत सी जानकारी मिली किन्तु एक अनमोल खजाना जो हाथ लगा, वह था भिखारी ठाकुर की आवाज़ में उन्हीं के नाटक बिदेसिया का गीत – डगरिया जोहत ना। बुढ़ापे में भी आवाज़ की खनक सुनकर उनकी बहुमुखी प्रतिभा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फिर बिहार के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक इतिहास की भी पड़ताल ज़रुरी थी। बचपन में रात-रात भर जागकर देखे गए नाच-तमाशे और श्री संजय उपाध्याय के साथ लगभग दो साल तक भिखारी ठाकुर के प्रसिद्द नाटक में मेरे द्वारा निभाया गया नायक बिदेसी का अनुभव भी काम आ ही रहा था।  
इतना सबकुछ हो जाने के बाद मन में एक सवाल बहुत प्रखरता से कौंध रहा था कि हमारा भिखारी ठाकुर कैसा होगा? यदि वह बाकी लेखन से इतर न हुआ तो फिर इस लेखन की ज़रूरत ही क्या है? दो नाटक तो लिखे ही गए हैं उनके ऊपर फिर एक और नाटक की ज़रूरत ही क्या है? यह चिंतन मन में चल रहा था। रणधीर और मैं लगभग रोज़ घंटों इस मुद्दे पर फोन से बातचीत करते। इसी क्रम में यह समझ में आया कि हम नैरेटिव स्वरुप में काम करेंगें और हमारा भिखारी ठाकुर ऐसा रंगकर्मीं होगा जिसने तमाम संकटों, चुनौतियों, जातिगत संघर्षों आदि को पार करते हुए पूर्णतः देसज अंदाज़ में रंगकर्म को एक नया आयाम प्रदान किया। फिर यह भी समझ में आया कि जो काम बड़े-बड़े आधुनिक भरतमुनि नहीं कर पाए वह काम अपने समय में अनपढ़ माने जानेवाले भिखारी ठाकुर ने कर दिखाया। बिना समझौते और किसी प्रकार के ग्रांट के बिना सालों भर चलनेवाले एक व्यावसायिक रंगमंडल की स्थापना की। अपने नाटक लेकर जगह-जगह घूमे और अपने नाटकों के माध्यम से नाम और दाम कमाया। नाटक में एक जगह भिखारी कहते हैं – “खाली लगन भर कमाए से साल भर का खर्ची नहीं निकलेगा और जब नाच का धंधा कर लिया तो खाली लगन ही काकहे, साल भर कमाय के हिसाब बनावल जाओ।”
अब सबसे पहले यह तय होना था कि नाटक की भाषा क्या हो – तथाकथित बिहारी हिंदी, भोजपुरी या कुछ और? उक्त विषय पर रणधीर से बातचीत होने पर यह साफ़ हो गया कि चुकी इस नाटक को व्यापक दर्शकवर्ग के लिए तैयार किया जाना है इसलिए इसकी भाषा ऐसी रखी जाय जो व्यापक दर्शक वर्ग के समझ में आए। हालांकि इस बात का खतरा था कि एक भोजपुरिया पात्र जब शुद्ध हिंदी में संवाद अदायगी करेगा तो उसे लोग सहजता से स्वीकार करेंगे या नहीं। किन्तु यह सत्य ही है कि जब तक नाटक दर्शकों के समक्ष प्रदर्शित नहीं हो जाता तब तक हम दावे से कुछ नहीं कह सकते कि क्या स्वीकार किया जाएगा और क्या नहीं। इसी दौरान रणधीर ने यह भी बताया कि यह उसका “ड्रीम प्रोजेक्ट” है। मुझे काटो तो खून नहीं। एक तो भिखारी ठाकुर जैसा प्रसिद्द कलाकार और ऊपर से निर्देशक का ड्रीम प्रोजेक्ट। अब लिखूं तो क्या लिखूं। वैसे सच ही है कि वह भय ही है जो हमें चुनौती देता है। इससे डर गए तो मात और लगन, सार्थकता, सकारात्मक और सृजनात्मक उर्जा से भिड गए तो कुछ न कुछ अच्छा तो हो ही जाएगा। चिंतन की प्रक्रिया में एक बात तो साफ़ हो गई कि मुझे भिखारी ठाकुर के माध्यम से तुलसीदास से लेकर कबीर तक की यात्रा करनी है और दूसरी यह कि भिखारी ठाकुर के जीवन में घटित प्रमुख घटनाओं के माध्यम से जितनी भी मेरी समझ है उसके अनुसार कुछ सवाल भी खड़े करने हैं और साथ ही साथ तब से लेकर अब तक वर्ग, वर्ण और संस्कृतिकर्म पर टिपण्णी भी करनी है। भिखारी ठाकुर अपने नाटकों को नाच नहीं बल्कि तमाशा कहते हैं किन्तु नाच उनके तमाशे की प्रमुख श्रृंगार था, इसे भी परिभाषित करना था। नाटक में एक स्थान पर नाच को परिभाषित करते हुए भिखारी ठाकुर कहते हैं – “यह देह एक बागीचा है जिसमें तन-मन और आत्मा का वास होता है। नाच केवल तन नहीं बल्कि मन और आत्मा की चीज़ है। जब हम नाचते है तो पूरा देह नाचता है। सभी कुछ ताल में। एक ताल समाजी का, मतलब बजबैया का ढोलक, झाल और सारंगी और दूसरा ताल हमारे देह से निकलता है। कलाकार का ताल-लय, गीत-संगीत सब आत्मा से निकलना चाहिए तभी रस पैदा होगा नहीं तो सबकुछ ऊपर ही ऊपर रह जाएगा। जब देह, मन और आत्मा एकाकार हो जाता है तब आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, दीन, दुनियां का अस्तित्व खत्म हो जाता है और कला अपने पूरे कलात्मक स्वरूप से ओतप्रोत हो निराकार और उर्जावान रूप धारण कर लेती है।” कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां जानबूझकर नाट्यशास्त्र का सात्विक अभिनय और स्तानिस्लावासकी के अभिनय सिंद्धातों का समावेश किया गया है। भिखारी ठाकुर ने भले ही कोई नाट्य सिद्धांत नहीं लिखा किन्तु यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उनके मन में इस प्रकार के विचार नहीं चले होंगे। वैसे भी नाट्य-रचना में काल्पनिकता का समावेश न हो तो फिर रचना का आनंद खत्म हो जाता है। इतिहास लेखन और वृत्तचित्र से नाटक एक अलग विधा है।
हमें एक ऐसे कलात्मक चरित्र की रचना करनी थी जो सामाजिक ताने बाने में जाति के आधार पर कर्म निर्धारण को चुनौती पेश करे और मनमाफ़िक काम को करने की चुनौती स्वीकार करे। मैंने खुद से सवाल किया कि हमने रंगमंच जैसी अस्वीकृत और चुनौतीपूर्ण विधा का चयन क्यों किया? और जो जवाब मिला उसे भिखारी ठाकुर के मार्फ़त कुछ यूं कहलवाया  - “काम ऐसा हो जिसमें मन लगे। और मन ऐसा हो, जो मनमाफिक काम करने को बैचैन रहे। मनमाफिक काम का स्वाद एक बार मिल जाय, तो कहीं और मन कहां लगता है? तब क्या किया जाय – नाच? लोग क्या कहेंगें! मन में बहुत सारे ख्याल उठ रहें हैं। थोड़ा उजाला और ढेर सारा अँधेरा। क्या करें, कैसे करें?”
सूत्र मिल चुका था तो आखिरकार ए4 साइज़ के 84 पन्ने में नाटक का पहला ड्राफ्ट तैयार हुआ। इस ड्राफ्ट में ढेर सारे सीन थे बहुत सारे प्रकाश के अन्धकार और उजाला के साथ। यह निश्चित रूप से बहुत ही प्राथमिक स्तर का आलेख था जिसे रणधीर ने बड़े ही गौर और धर्य के साथ पढ़ा होगा और पहली प्रतिक्रिया दी कि नाटक में फेड आउट, फेड इन नहीं चाहिए ज़्यादा से ज़्यादा क्रॉस फेड कर सकते हो। फिर हम फोन पर एक-एक सीन पर घंटो बात करते रहे। आखिरकार मैंने कुछ दिन बाद दूसरा ड्राफ्ट भेजा जो 71 पन्ने का था। इस ड्राफ्ट के भेजने के कई दिनों तक रणधीर ने कोई फोन नहीं किया। इधर वो अभिनेताओं के साथ भिखारी ठाकुर से जुड़ी चीज़ों को पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर चुका था। मैं भी इस संकोच से फोन नहीं कर रहा था कि शायद उसे नाटक पसंद नहीं आया। अचानक एक दिन उसका फोन आया जिसका लब्बोलुआब यह कि “कई बार नाट्यालेख पढ़ने के पश्चात् उसकी राय यह है कि एक मुक्कमल नाटक तैयार करने के लिए बहुत सारा कच्चा माल उपलब्ध है इस आलेख में तो अब इस आलेख के सहारे काम शुरू किया जा सकता है। लेकिन नाटक बहुत बड़ा है लगभग पांच घंटे का हमें ज़्यादा से ज़्यादा डेढ़ घंटे का नाटक बनाना है।” वैसे यह पहले से ही तय था कि नाटक का फाइनल ड्राफ्ट फ्लोर पर काम करते हुए ही बनाना है। कुछ दिन रणधीर अभिनेताओं के साथ काम करेगा फिर वो, मैं और अभिनेतागण उसे सामूहिक रूप से अंतिम रूप देंगे। तो आलेख के साथ अभिनेताओं ने प्रयोग शुरू किया और मैं एक थियेटर वर्कशॉप के लिए डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) चला गया। अब समस्या यह कि नाटक का नाम क्या रखा जाय? मैंने जो नाम सुझाए थे वो रणधीर को पसंद नहीं थे। फिर मैंने भिखारी ठाकुर, नटयोगी, नटनायक, दलनायक, खेला, रंगमहल, नाच, तमाशा, मंडली, नाचलोक, समाजी, सवैय्या, नेवता, संवदिया, सट्टा आदि नाम सुझाए किन्तु कोई भी नाम उसे जंच नहीं रहा था। हर नाम पर खूब चर्चा ज़रूर हुई। बाद में पता चला कि नाम के तलाश में कई अन्य लोग भी लगे थे। नाम को लेकर मेरा मानना था कि नाम ऐसा हो जिसे सुनते ही पता चल जाए कि यह भिखारी ठाकुर के बारे में है लेकिन रणधीर का मानना था कि नहीं, हम ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे दर्शक किसी भी प्रकार पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नाट्य प्रदर्शन देखने आए।
पुरी रचना प्रक्रिया में हम दोनों एक दूसरे से क्रिएटिव रूप से सहमत-असहमत होते रहे। यह सहमति-असहमति नाटक के पहले भी थी और आज भी है। आज भी नाटक में कुछ चीजे मुझे पसंद नहीं तो कुछ उसे। बहरहाल, मैंने कहा तुम्हें जो नाम पसंद है रख लो। कुछ दिन के बाद उसने पूछा कि नटमेठिया नाम कैसा रहेगा? मैंने कहा एकदम सही। नट माने अभिनेता और मेठिया मेठ से बना है अर्थात नेतृत्वकर्ता। भिखारी ठाकुर नायक ही तो थे - नटों के नायक।
बहरहाल, कार्यशाला खत्म कर मैं पटना पहुंचा और कुछ दृश्य इधर-उधर, कुछ नए संवाद जोड़कर, कुछ घटाकर नाटक को एक रूप देने का कार्य सामूहिक रूप से शुरू हुआ। आज इस नाटक के बारे में विश्वास से यही कह सकता हूं कि यह एक जीवनीपरक (Bio-graphical) नाटक है जिसके केन्द्र में हैं लेखक, कवि, अभिनेता, निर्देशक, गायक, रंग-प्रशिक्षक भिखारी ठाकुर और भारतीय समाज की जटिल वर्गीय व जातीय बुनावट। यह नाटक जितना सच है उतना ही काल्पनिक भी। भिखारी ठाकुर की संघर्षशील जीवनयात्रा का काल 1887 से 1971 है यानि ब्रिटिश राज से लेकर आज़ाद भारत और भारत निर्माण तक का काल। यह वही समय है जिसमें दुनियां में क्रांतियों व विश्वयुद्धों का दौर चलता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है और भारत एक आज़ाद देश घोषित होता है। वैश्विक धरातल पर तेज़ी से घटित होता यह तमाम सामाजिक - राजनीतिक परिघटनाएं इस नाटक के विषय वस्तु को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं और कहीं-कहीं तो सीधे विषय-वस्तु ही बन जाती हैं। नाटक के केन्द्र में ‘नाच’ जैसी ‘इरोटिक’ और विशुद्ध मनोरंजन मात्र के रूप में लोकप्रिय विधा भी है जिसे परिष्कृत और कलात्मक बनाकर आज के आम आदमी का दुःख दर्द को अभिव्यक्त करने का माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने की छटपटाहट भिखारी ठाकुर के अंदर साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है; जिसमें एक तरफ़ सामाजिक संघर्ष है तो दूसरी तरफ़ एक कलाकार के अपने अंतर्जगत का संसार। कहीं परम्परा का निर्वाह है तो कहीं उसके घुटन भरे ताने-बाने से निकलने की चटपटाहट भी।
यह नाटक नाट्यकला के प्रति पूर्णतः समर्पित भिखारी ठाकुर के जीवन, कला व लेखन के माध्यम से एक खास प्रकार का दलित, स्त्री व रंगमंचीय विमर्श भी प्रस्तुत करने का प्रयत्न भी करता है। जिसमें उनके संघर्ष के साथ ही साथ भारतीय वर्ग-वर्ण व्यवस्था का सजीव, रोचक व क्रूर चित्रण भी सामने आता है।
एक ऐसे समाज में जहाँ पर्व-त्येहारों व कर्म-कांडों आदि के अलावा नाचना-गाना शूद्रों का पेशा माना जाता है और “नाटक/नौटंकी मत करो”  जैसे वाक्य लगभग गाली के रूप में इस्तेमाल होते हैं वहां समाज में व्याप्त कुरीतिओं के खिलाफ़ जब कोई कलाकार पारंपरिक कलात्मक व सामाजिक तौर-तरीकों, प्रतीकों (Traditional artistic & Social Styles-Symbols) का इस्तेमाल सुधारवादी चिंतन के लिए करता है तो उसे लोकप्रियता के साथ ही साथ कला और समाज के विचारों के अंतरद्वन्द का भी सामना करना ही पड़ता है। इस द्वन्द के सार्थक इस्तेमाल से ही तो कला और समाज दोनों में निखार आता है और मानवीय संवेदनाएं वर्जनाओं और कर्मकांडों से ऊपर उठकर और ज़्यादा मानवीय होने की दिशा में अग्रसर होतीं हैं।
तमाम वर्गों, वर्णों, जातियों, समुदायों में विभाजित, सामंती और उपभोक्तावादी मानसिकता से ग्रसित समाज में कला, कलाकार, वर्ग और समाज का संघर्ष पुराना है। तिथियाँ बदली हैं, परिस्थितियां बदली हैं, स्वरुप बदला है, तरीका बदला है किन्तु यह संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ है। प्रस्तुत नाटक भिखारी ठाकुर के माध्यम से कला-कलाकार व समाज के बीच व्याप्त इसी द्वन्द व संघर्ष की एक व्यावहारिक गाथा है।
इस नाटक की रचना प्रक्रिया में निर्देशक रणधीर कुमार के अलावा सुनील बिहारी, मनीष महिवाल, अजित कुमार, बुल्लू कुमार, आशुतोष अभिग्य, रवि महादेवन, शिल्पा भारती, आकाश कुमार, रवि कौशिक, निखिल, और आकाश आदि अभिनेताओं तथा भूपेंद्र कुमार, मार्कंडेय पांडे, आदित्य गुंजन, विनय राज आदि पार्श्वकर्मियों ने बराबर की भागेदारी की है। पटना की भीषण उमस वाली गर्मी में इस नाटक के एक-एक दृश्य को रचने, सजाने-सवारने में जम के अपना पसीना बहाया है। इनके प्रति आभार व्यक्त किए बिना इस नाटक की रचना अधूरी है। राग, पटना के तत्वावधान में 8 जुलाई 2014 को इस नाटक की पहली प्रस्तुति पटना के कालिदास रंगालय में हुई। तब से लेकर आजतक कई सारे दृश्य बदले, अभिनेता बदले लेकिन इसकी प्रस्तुति पटना सहित देश के विभिन्न शहरों में सतत जारी है। लगातार मंचित होते रहने और उसमें सक्रिय भागीदारी निभाते रहने से एक-एक करके नाट्यालेख की कमज़ोर कड़ियां पता चल रही हैं जिसे हम निर्देशक, अभिनेताओं के आपसी सामंजस्य से दूर करते चल रहे हैं। प्रसिद्द नाटककार दरियो फ़ो ने कहा है कि – “एक रंगमंचीय, एक साहित्यिक, एक कलात्मक अभिव्यक्ति जो अपने समय के लिए नहीं बोलती, उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।” फ़ो के इसी कथन की परिणति है मेरा पूरा रंगकर्म और नटमेठिया नामक यह नाटक भी।” कहा जा सकता है कि इस नाटक मे भिखारी ठाकुर और उन पर लिखी तमाम साहित्यिक कृतियों के माध्यम से हम सब अपने आपको ही तलाश रहे हैं और यह तलाश आज भी सतत जारी है। नटमेठिया रोज़ नए रूप धरता है, यही उसकी नियति है। उसमें शायद ही कभी पूर्ण-विराम लगे।  

Wednesday, August 19, 2015

कबीरा इस संसार में भांति भांति के भक्त

हटिया पटना एक्सप्रेस में रांची में एक सज्जन हमारी कम्पटमेंट में चढ़े - साईं भक्त। सज्जन क्या हैं पूरी चर्बी के चलते फिरते नमूने थे। आते ही उन्होंने अपने 4 बड़े बड़े लगेज सीट के नीचे जय साईं राम करते हुए घुसेड़ दिए और चेन के सहारे एक बड़ा सा ताला भी यह कहते हुए जड़ दिया कि ट्रेन में "साले" चोर बदमाश भी बहुत घुसने लगे हैं। यह कहते हुए भाई साहेब महीने भर पहले घटित किसी चोरी की कथा का गालियों सहित वाचन भी करने लगे। सीट के नीचे उन्होंने इतना सामान भर दिया कि अब किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची थी। वो तो खैर मनाइए कि मिडिल का दो बर्थ खाली था नहीं तो महाभारत तय थी। फिर मोबाइल पर साईं भजन बजाते हुए यह बखान करने लगे कि वो साईं के कितने बड़े भक्त हैं। फिर योगा (जो निश्चित ही यह व्यक्ति कभी न करता होगा) पर प्रवचन देने लगे। फिर ट्रेन, बर्थ आदि की समस्या पर भी अपने ज्ञान बांटने लगे जैसे हम सब चाँद से आए हो और हमें इस दुनियां के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं है। उनकी सबसे बड़ी शिकायत बर्थ की चौड़ाई है जिसकी वजह से जनाब करबट तक नहीं बदल पाते हैं। इनकी साइज देखकर शिकायत जायज भी है लेकिन इन्हें कौन समझाए कि समस्या बर्थ का साइज नहीं बल्कि ये खुद हैं। फिर तकिया कम्बल के लिए झिक झिक करने लगे और आखिरकार दो तकिया और एक कम्बल सिर के नीचे अपनी ऊपरवाली सीट पर लगा के विंडो सीट पर विराजमान हो गए। बेचारे सरकार को कोस भी रहे थे कि लोयर सीट नहीं दिया।
खैर, जैसे ही सामने वाले एक सज्जन ने लैपटॉप ऑन किया भाई ने प्रभु प्रभु यदि आपकी आज्ञा हो तो -- करते हुए अपना मोबाइल का केबल उसमें घुसेड़ दिया और तब तक चार्ज करते रहे जब तक लेपटॉप ने दम न तोड़ दिया। फिर वो फोन पर व्यस्त हो गए और बहुत देर तक आपकी कृपा, आपका आशीर्वाद, प्रभु की कृपा जैसे वाक्यों से सहयात्रियों को कृतार्थ करते रहे। मुझे मोबाइल पर फ़िल्म देखनी थी तो मैंने कहा प्रभु लाइट बंद कर दें? उनका रुखाई से जवाब आया - नहीं मैं अभी फ़ोन कर रहा हूँ। फिर वो प्रभु तबतक फोन करते रहे जबतक कि फोन की बैट्री ने दम न तोड़ दिया।
अभी सुबह उठे हैं और प्रभु मैं आपका चार्जर इस्तेमाल कर सकता हूँ कहते हुए एक सहयात्री का चार्जर अपने मोबाइल में घुसेड़के बकबक किए जा रहे हैं। जनाब कपड़ा भी खुलेआम बदल रहें हैं और बातें तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं। हाँ वैसे इनकी भाषा बड़ी अच्छी हैं। हिंदी, अंग्रेजी और मगही दनादन बोले जा रहे हैं। और मैं यह सोच रहा हूँ कि साईं तो ताजीवन दूसरों की सेवा में लगे रहे लेकिन साईं के ये भक्त ---? पूजने मात्र से क्या होता है जी? संवेदनशीलता और सेवाभाव पूजने से नहीं आती। साईं भी सोच रहे होगें भांति भांति के भक्त हैं मेरे। वैसे कल जो इन्होंने बड़ा सा टिका अपने माथे पर सजा रखा था उसका अब कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। बिस्तर ने इनका टीका तो पोंछ दिया लेकिन मन? मुझे बाबा कबीर की याद आ रहे हैं।

Sunday, August 2, 2015

आर्तो और क्रूरता का रंगमंच

आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों को समझने के लिए रंगमंच की प्राचीनतम अवस्था से लेकर बीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक रंगमंच तक की समझ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आर्तो का चिंतन एक पागलपन और प्रलाप से ज़्यादा शायद ही कुछ लगे। मोटे तौर पर बात इतनी है कि प्राचीन काल में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जुड़ा रंगमंच आर्तो से पहले एक समृद्ध मनोवैज्ञानिक रंगमंच के रास्ते, रंगमंच और समाज दोनों ही एक खास तरह की नैतिकता व शुद्धतावादी मानसिकता से ग्रस्त हो चुका था। पारंपरिक कलाएं हाशिए पर या संग्रहालय में स्थान पाने को अभिशप्त हो चुकी थी। और ओद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी मानसिकता की चपेट में आकर मानवसमाज विश्वयुद्ध की पागलपन भरी राह की ओर अग्रसर हो चुका था। पूँजी और रुतवा सफलता के मापदंड के रूप में स्थापित हो चुके थे और सार्थकता की परिभाषा चुनौतीपूर्ण रूप से सफलता में बदल दी जा रही थी। तो क्या आर्तो का रंगमंच सम्बन्धी चिंतन इन तमाम चीज़ों से एक विद्रोह था?
आर्तो एक असफलता का भी नाम है लेकिन सफल व्यक्ति ही सार्थक हो ज़रुरी नहीं, ठीक उसी प्रकार यह भी ज़रुरी नहीं कि हर असफलता अर्थहीन ही हो। यह संभव है कि अपने समय का असफल व्यक्तित्व भविष्य के लिए बहुत कुछ गढ़ रहा हो। वैसे भी एक सफलता के पीछे कई सारी असफलताएं होती हैं। सफलता और सार्थकता दो भिन्न बातें हैं, जो एक साथ भी हो सकती हैं और नहीं भी।
हर सदी में बहुत से सफल लोग होते हैं और ढेर सारे असफल। इन असफल लोगों की भी अपनी-अपनी उपलब्धियां और सफलताएं-असफलताएं होतीं हैं। बीसवीं शताब्दी बहुत सारी उपलब्धियों के साथ ही साथ आधुनिक और वैज्ञानिक नाट्य व अभिनय चिंतन में उल्लेखनीय योगदान के लिए भी जाना जाता है। जिनमें कॉन्स्तानतिन स्तानिस्लाव्स्की, व्सेवलोद मेयरहोल्ड, माइकेल चेखव, बर्तोल्त ब्रेख्त, जैक्स कॉप्यु, ली स्त्रासबर्ग, स्टेला एडलर, सेनफोर्ड, सेनफोर्ड माइज्नर, जौसफ शैकीन, जेर्जी ग्रोतोव्सकी, पीटर ब्रुक, युजिन बार्बा, व्लोदजिमिर्ज़ स्तानिएव्सकी आदि जैसे अभिनेता, निर्देशक व चिन्तकों के नाम प्रमुख हैं। इन सबसे इतर एक नाम और है क्रूरता के रंगमंच के जनक आर्तो का, जिनके लिए रंगमंच ताउम्र मुक्ति और आत्मशुद्धि का मार्ग बना रहा। आर्तो कहते हैं “मैं अपने को जीवित महसूस नहीं करता, लेकिन मंच पर मैं महसूस करता हूँ अपने अस्तित्व को।” आर्तो एक कठिन पहेली भी हैं। ग्रोतोव्स्की ने थी ही यह कहा है कि “एक तरह से देखें तो आर्तो ने अपने पीछे न कोई सिद्धांत छोड़ा है न कोई तयशुदा तकनीक किन्तु दूसरी तरह से देखें तो दी है अंतर्ज्ञान, दृष्टिगत समझ और रूपयुक्त छवियों की भाषा।”
आर्तो एक परिचय – ताउम्र मुफलिसी, अस्वीकार, विवाद, आलोचना, अकेलापन व जीवन के नौ साल पागलखानों में जबरन यातना झेलते हुए व्यतीत करनेवाले अभिनेता, कवि, निर्देशक, चित्रकार, नाट्य सिद्धांतकार के रूप में प्रसिद्ध आर्तो का पूरा नाम ओंतोनी मारी जोसेफ़ आर्तो है। इनका जन्म 4 सितम्बर 1896 को दक्षिण फ्रांस के मार्सेल में तथा मृत्यु 4 मार्च 1948 को पेरिस में हुआ। महज पांच साल की उम्र से मेनेंजाइटिस दौरा पड़ा। इस बीमारी की वजह से ताउम्र उन्हें यातनादायक सिरदर्द सहना पड़ा। इस पीड़ा से लड़ने के लिए नशीली दवाओं का सेवन मजबूरन उनकी ज़िंदगी का एक ज़रुरी हिस्सा बन गया। कई अन्य बीमारियाँ भी ताउम्र उनसे चिपकी रहीं। नींद में चलने की आदत की वजह से फ्रेंच आर्मी से निष्काषित हुए। सन 1920 में लेखक बनने के उद्देश्य से पेरिस आगमन व कलात्मक जीवन का प्रारंभ। 1924 से 1935 के बीच लगभग बारह फ़िल्में में अभिनय, जिनमें नेपोलियन व द पैशन ऑफ जोन ऑफ आर्क प्रमुख फ़िल्में हैं। सन 1931 में उन्हें बलिनिज़ नृत्य देखने का अवसर मिला। यह बालिस्लैंड इंडोनेसिया की एक अतिप्राचीन पारंपरिक नृत्य शैली है जिसमें ताल-लय युक्त शारीरिक भाव-भंगिमा का उर्जावान प्रयोग द्वारा कहानी कही जाती है। इस नृत्य और मार्क्स बंधुओं की फिल्म एनिमल क्रेकर्स व मोंकी बिज़नेस का आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों पर गहरा प्रभाव माना जाता है। आर्तो के रंगमंच में विद्रोही तत्व मार्क्स बंधुओं की फिल्मों की देन माने जाते हैं। इसी वर्ष First Manifesto for a Theatre of Cruelty नामक आलेख का प्रकाशन हुआ। उनकी प्रमुख रचना The Theatre and Its Double का प्रकाशन 1938 में हुआ। यह पुस्तक आर्तो के रंगमंचीय अवधारणा Theatre of Cruelty (क्रूरता का रंगमंच) का घोषणापत्र भी माना जाता है। आर्तो का मानना था कि रंगमंच को सच्चाई का पुनर्प्रदर्शन करके दर्शकों पर ज़्यादा से ज़्यादा प्रभावित करना चाहिए।
अमूमन यह ऐतिहासिक सच नज़रंदाज़ कर दिया जाता है कि आर्तो का काल विश्वयुद्धों (प्रथम 1914–1918, द्वितीय 1939–1945) का काल भी रहा है और दुनियां का कोई भी संवेदनशील कलाकार एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक घटनाक्रमों के प्रभाव से वंचित कैसे रह सकता है और वो भी फ्रांस जैसे देश का नागरिक होकर। रंगमंच और क्रूरता नामक अपने आलेख में आर्तो यूं ही नहीं कहते हैं कि “जिस वेदना और संकट के समय में हम रहते हैं, ऐसे में हम उस रंगमंच की ज़रूरत को तीब्रता से महसूस करते हैं, जो किसी घटना की छाया से प्रभावित न हो, जो उत्साहित कर सके हमारी गूंज को, जो उस अव्यवस्थित समय पर हावी हो जाए, उसको गहरे प्रभावित कर ले।” ज्ञातव्य हो कि अपने रंगमंच और प्लेग नामक आलेख में आर्तो मंच पर विकराल और डरावना समय में आपदा की स्थिति उत्पन्न कर क्रूरतम सच्चाई को उद्घाटित करने की बात करते हैं।
आर्तो और रंगमंच – रंगमंच एक स्वतंत्र अलौकिक कला है यह माननेवाले आर्तो के लिए रंगमंच की अवधारणा सच्चा है, जो सामाजिक अवधारणाओं को रद्द करने की बात करता है। यहाँ वैचारिक क्रांति के लिए जगह और नस्लवाद की मुखालफत है। रंगमंच पर विचार करते हुए आर्तो ने कई ऐसी बातें कही जिससे आजतक ना जाने कितनों ने प्रेरणा हासिल किया है। आर्तो कहतें है “हम रंगमंच के विचार से वेश्यावृत्ति जारी नहीं रख सकते जो सिर्फ़ उस नैतिक मूल्य के साथ बसती है। जो पीड़ा और संघर्ष से भरे जादुई अंतर्सबंधों के यथार्थ और खतरे में निहित है।”
सच्चा रंगमंच एक सृजनात्मक अनुभूति है जो ‘यथार्थ जगत’ की नक़ल नहीं हो सकता। यहाँ यथार्थ का पुनर्परीक्षण होता है। शब्द, संकेत, सार्थक सैधान्तिकी (Metaphysical) को सृजित करने के साथ ही साथ आर्तो रंगमंच की अपनी एक विशिष्ट भाषा तलाशने के पैरोकार थे, बने-बनाए आलेख से उनका मोह नहीं था बल्कि वो तो बार-बार आवरण रहित, जादुई, ताल-लय से भरपूर, काव्यात्मक, प्रतीकात्मक, अनुष्ठानिक, कोडिफाइड, सीमारहित और सपनों जैसा रंगमंच की बात करते हैं।
आर्तो रंगमंच में प्रभावशाली दृश्य और उत्तेजना को फिर से तलाश करने के पक्षधरता के साथ कहते हैं “रंगमंच में जीवन है, ऐसा जीवन जो अपनी प्रमाणिकता लिए हो, जिसमें कोई असत्य, कोई दिखावा और पाखंड न हो। जीवन, जो भूमिका खेलने के विपरीत है, जिसमें जीवन का पुनर्निर्माण होता है। किसी भी प्रदर्शन के मूल आधार में क्रूरता के तत्व के बिना कोई दृश्य प्रभावशाली नहीं हो सकता। हमारी गिरती संवेदनशीलता आज उस बिंदु तक आ पहुंची है जहाँ हमें यक़ीनन एक ऐसे रंगमंच की ज़रूरत है जो हमारी भावनाएँ और विचार दोनों को जाग्रत कर दे। हम ऐसा रंगमंच चाहते हैं जो विश्वसनीय सच्चाई की ठोस रूप से पड़ताल कर सके, जो भावनाओं के रूप में ह्रदय और इन्द्रियों में समा सके, ठीक उस तरह जिस तरह हमारे स्वप्न हमारे यथार्थ को उस हद तक प्रभावशाली रूप में अभिनीत करते हैं, जहाँ पहुंचकर वे उस हिंसा को महसूस करते हैं।”
आर्तो रंगमंच को किसी भी राजनैतिक विचार के प्रभाव से मुक्त रखने के पक्षधर थे। वे अपने लिखे को हमेशा अपर्याप्त और दोषपूर्ण मानते थे। उसकी एक वजह एक खास तरह की बेचैनी, उन्हें उचित स्थान व सम्मान न मिलना हो सकता है। पल-पल इम्तहानों से गुजरनेवाले आर्तो ने शायद विषाद से ग्रस्त होकर यह लिखा कि “दैत्याकार शक्तियों ने मुझे धकेल दिया है, इसलिए इसे स्वीकार करते हुए मैं क्या हूँ, मैंने यह तलाश छोड़ दी है।”
आर्तो प्राचीन रंगमंच के मिथकों, अनुष्ठानिकता, स्वप्नलोक से बड़े प्रभावित थे और उसे नए अर्थ में अपनाने की भी बात करते थे क्योंकि यदि इन चीज़ों को जैसे का तैसा रख दिया जाय तो वो अर्थहीन होगा। आर्तो रंगमंच में शब्दों से ज़्यादा मनोवृति और भावनाओं के समर्थक थे। वे मानते थे कि शब्दों का प्रभाव सामान्य सा होता है। उनका यह भी मानना था कि वास्तविक भावनाओं को मंच पर अभिनीत नहीं किया जा सकता है बल्कि ऐसा करने को वो एक धोखा भी मानते थे।
रंगमंच और प्लेग – आर्तो के इस बहुचर्चित व मुश्किल संभाषण का पाठ 1933 में आएन्दी के आयोजन में सर्बोन बौधिक श्रृंखला के तहत किया गया था। इसमें आर्तो रंगमंच की तुलना प्लेग जैसी महामारी से करते हुए कहते हैं – रंगमंच प्लेग जैसा है, एक ऐसा संकटकालीन चरमबिंदु जो स्वयं ही उसकी दवा है। प्लेग एक ऐसी निरंकुश संकट है जिसमें मौत, तबाही या सबकुछ पाक-साफ़ के अलावा तीसरा रास्ता नहीं होता। रंगमंच ऐसी ही स्थिति बनाता है। रंगमंच अपने में सर्वोत्कृष्ट संतुलन है, जो मस्तिष्क का आह्वान करता है, उसे सन्निपात की स्थिति तक ले जाकर उसकी सोचने की शक्ति तीव्रतर कर देता है और अंत में सब विध्वंस होने के बाद गहन मानवीय दृष्टिकोण उद्घाटित होता है : रंगमंच प्लेग जैसा है क्योंकि हमें यह देखने के लिए उकसाता है कि हम वास्तव में अंदर से कैसे हैं। यह हम पर दबाव डालता है ताकि हम बाहरी मुखौटे को गिराकर झूठ, पाखंड, पंगुपन का पर्दाफ़ाश होने दें।” आर्तो लिखते हैं “मैं दर्शकों को सीधी मुठभेड देना चाहता हूँ, प्लेग के लिए प्लेग ही देना चाहता हूँ, ताकि वे डर जाएँ, जाग जाएँ। मैं उनको जगाना चाहता हूँ। उनको यह एहसास नहीं कि वे मर चुके हैं। उनका मरना, उनका अंधा, उनका बहरा होना, यही मेरी व्यथा है जिसे मैंने सामने रखा है। हां मेरी और हर उसकी व्यथा जो ज़िंदा है।”
आर्तो रंगमंच की तुलना प्लेग से इसलिए नहीं करते कि यह एक संक्रमण और छूत की बिमारी है बल्कि उसके प्रभाव की बात करते हैं जो भड़कता है और फैलता चला जाता है। आर्तो के अनुसार प्लेग एक महामारी का रूप धारण कर तमाम सामान्य सामाजिक अनुशासन व्यवस्था को ध्वस्त कर देता है ठीक यही काम रंगमंच अपने दर्शकों पर करता है। आर्तो प्लेग की तरह रंगमंच के द्वारा समाज की सारी बीमारियाँ साफ़ करने की बात करते हैं। रंगमंच को प्लेग जैसा प्रभावकारी बनाना चाहते हैं। वे प्लेग की ही तरह रंगमंच में ऐसी ताकत देखते हैं जो अपने फैलाव में ऐसी ताकत पैदा करती है जो विचार (दिमाग) की तरफ़ लौटती है और अंदर चल रहे संघर्ष को प्रेरित करती है; और हम फैंटेसी को अपनी संवेदना में साफ़-साफ़ अनुभव करने लगते हैं। तब एक अवचेतन में खौफभरी स्थिति पैदा होती है जिसमें रहस्यमय स्थिति का भ्रम पैदा होता है, उसका सच सामने आने लगता है और अंधेरे में पुलकित होता दिखाई पडता है।
रंगमंच प्लेग जैसा ही लाभकारी है। यह हमें तमाम बाधाओं और भौतिक जड़ता को पार कर आमने आपको देखने-समझाने को बाध्य करता है, बने बनाए नियम-कायदे सब टूट जाते हैं और छिपे हुए अंधेरे के पीछे से इंसानी शक्ति उजागर होती है। यह शक्ति इंसान को साहस, नैतिकता के साथ परिस्थितियों के सामने सर उठाकर खड़ा होने की शक्ति देती है।
रंगमंच और क्रूरता – यह हर तरह के आधिपत्य से मुक्त और आडम्बरहीन रंगमंच की एक विद्रोही अवधारणा है, आर्तों के इस अवधारणा को हिंसा के सन्दर्भ में नहीं बल्कि नवीन सृजन के सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए। यहाँ क्रूरता का अर्थ कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे धरती का सीना फड़के कोई नया बीज पनपता है। आर्तो कहते हैं कि “किसी भी कर्म को अभिनीत करना क्रूरता है। क्रूरता के रंगमंच का विचार जनमानस के रंगमंच को प्रस्ताव देना है, उसको अपनाना है। इसलिए हमें रंगमंच का पुनर्निर्माण करना चाहिए। हम रंगमंच की समझ खो चुके हैं। हमारी मनःस्थिति उस छोर तक जा पंहुची है जहाँ उस रंगमंच की नितांत आवश्यकता है, जो हमारे दिलों की धडकन, हमारे धैर्य और हमारी इन्द्रियों को जागृत करता है। विरासत में मिले ध्यान को भटका देनेवाली आदतों के चलते हमने उस गहन सूक्ष्म रंगमंच के विचार को भूला दिया है जिसमें हमारे अपने पूर्व ज्ञान को नष्ट कर देने की शक्ति है। अपने आपमें उस गहन और उग्र विचार के साथ जिसको संकीर्ण कर सीमित कर दिया गया है। रंगमंच को एक विश्वास करनेवाली वस्तु बनाया जाय जो भावना और चेतना के स्तर पर आगे बढ़ाई जा सके। एक ऐसा रंगमंच जो अपने में पूरी कायनात समेटे नए बिम्बों के साथ दर्शकों से सीधा संवाद करे। यहाँ मंचीय घटनाओं में इतनी जीवन्तता हो कि वो पहले से नपी तुली तमाम तैयारियों को झटके में तोड़ दे। एक ऐसा रंगमंच जहाँ ज़िंदगी अपना सब कुछ खो दे और दिमाग सब पा ले।”
क्रूरता के अर्थ को प्रतिपादित करते हुए आर्तो का मानना है “क्रूरता मेरे विचार की सहयोगी नहीं यह तो हमेशा से ही रंगमंच मौजूद थी। मैं क्रूरता या निर्ममता का उपयोग, जीवन्तता की भूख, ब्रह्मांडीय पूर्णता, न चुकनेवाली अनिवार्यता, इस कायनात में बसे उसके रूप, अंधेरे में समेटे रहस्यमय भवंर के रूप में लेता हूँ। जहां जीवन के लिए अनिवार्य रूप में क्रूरता की आवश्यकता है। इस कष्ट को उठे बिना जीवन का चक्र चलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही अर्थों में क्रूरता का अर्थ प्रतिपादित किया जाना चाहिए। प्रत्येक वस्तु जिसका जीवन जड़ नहीं, वह क्रूरता के लिए है। उदाहरणार्थ : जब बच्चे का जन्म होता है तो पीड़ा क्या होती है, जन्मदाता जानती है। मृत्यु हो या जन्म, दोनों में सामान क्रूरता है। भूख, प्रेम, आग, वर्षा, इस पृथ्वी का स्वभाव सभी क्रूरता लिए हुए हैं। गति की ज़रूरत में परिवर्तनशीलता, अंधेरे के लिए रौशनी, पदार्थ के लिए जीवन भाव, जड़ से चेतन का भाव, संघर्ष से पीड़ा तक सभी में क्रूरता निहित है।”
क्रूरता का रंगमंच : पहला घोषणापत्र – 1933 से 34 के बीच लिखित आर्तो की यह रचना उनके रंगमंच सम्बन्धी खोजों को प्रस्तुत करती है जिसमें वे रंगमंचीय तकनीक, प्रयोग वस्तु, प्रदर्शन, अभिनय, भाषा, संगीत उपकरण, प्रकाश, वेशभूषा, मंच-सभागार, मंच सामाग्री, सजावट, सामयिकता, प्रस्तुति, अभिनेता, नाट्यलेख आदि विषय पर अपने विचार रखते हैं। क्रूरता का रंगमंच यह शीर्षक देने से पहले आर्तो सर्व रसायन रंगमंच (The all chemical Theatre), अधिभौतिक रंगमंच (The metaphysical theatre), सत्यपरिक्षा का रंगमंच (The theatre of the doily), विकास का रंगमंच (The theatre of evolution), चरम रंगमंच (The theatre of  the absolute) आदि नामों पर विचार कर रहे थे।
आर्तो और अभिनेता – अभिनेता एक क्रियाशील व्यायामी की अवधारणा आर्तो रेड इंडियंस के पयोते नामक नृत्य से प्रेरित होकर किया था। अभिनेता को आर्तो ने भावनात्मक स्तर पर कसरत करनेवाला व्यक्ति भी कहा है। वे अभिनेता को रंगमंच का एक प्रमुख कारक मानते हुए कहते हैं “क्योंकि प्रस्तुति की सफलता उसके अभिनय की प्रभावशीलता पर निर्भर करता है।” एक सच्चे अभिनेता का मकसद है मंच पर जीवन को जीवंत तरीके से जीना और उसे शाश्वत साकार करना है। आर्तो कहते हैं “अभिनेता मेरे लिए एक भावनात्मक व्यायामी की तरह है जो एक ही समय में भावों का संचार, उनका संचालन और अभिनय करता चलता है। मंच पर अभिनय करते समय वह अपने को विभाजित करता है और भावनात्मक संघटन की स्थिति प्राप्त करता है।”
आर्तो का नाटक द सेंसी – एल्फ्रेड जैरी थियेटर द्वारा क्रूरता के रंगमंच का एक मात्र प्रयोग नाटक द सेंसी असफल साबित होता है। यह नाटक सोलहवीं सदी की एक सत्य घटना पर आधारित थी। फ्रांको सेंसी (1549-1598) रोम का एक निर्दयी संभ्रांत व्यक्ति था। सात बच्चों की माँ बनने के पश्चात इसकी पत्नी का देहांत हो जाता है। तत्पश्चात वह एक अत्यंत ख़ूबसूरत महिला पेत्रोनी से ब्याह और अपने बेटों की हत्या और बेटी के साथ बलात्कार करता है। उसकी एक बेटी अपने बाकि बचे भाइयों तथा सौतेली माँ के साथ मिलकर सेंसी की हत्या की योजना बनाती है। अन्तः भाड़े के हत्यारों के द्वारा सेंसी की क्रूर हत्या कराई जाती है। साजिशकर्ता पकड़ लिए जाते हैं और उनपर मुकद्दमा चलाया जाता है। सेंसी की हत्या के जुर्म में रूढ़िवादी पोप सबका सिर कलम कर देने का हुक्म देता है।
इस नाटक के बारे में आर्तो का कथन था “यह नाटक दर्शकों के लिए आग के स्नान घर में घुसने के सम्मान होगा। दर्शक अपनी आत्मा और स्नायु के कंपन के साथ प्रदर्शन में भाग लें।” नाटक का पूर्वाभ्यास अत्यंत दैनीय स्थिति में चला रहा था। अभिनेताओं के समझ में ही नहीं आता कि आर्तो उनसे क्या चाहते हैं। बहुत सारी कठिनाइयों के बावजूद इस नाटक का प्रथम प्रदर्शन 7 मई 1935 हुआ, जो दर्शकों के लिए एक दुस्वप्न सबित हुआ और मात्र सत्रह प्रदर्शनों के पश्चात नाटक बंद हो गया।
द थियटर एंड इट्स डबल – आर्तो द्वारा रंगमंच पर लिखित निबन्धों का यह संग्रह मात्र नहीं बल्कि एक ऐसी दुर्लभ रचना है जो रंगमंच की नब्ज़ को पकड़ती है, पूर्वी रंगमंच की समझ और आधुनिक रंगमंच में मिथकों की अनिवार्यता पर ज़ोर देती है।
अंततोगत्वा -“यह है वह – अविश्वनीय, हां – अविश्वसनीय, यह अविश्वसनीय ही है, जो सच है।” जैसे ख़याल थे जो आर्तो के अकेलेपन की उपज थे। आर्तो अब अजीब हरकतें कर रहे थे। कभी डब्लिन की गलियों में अपनी छड़ी हिलाकर लोगों को अपने अभिनय में साथ देने की ज़िद्द करते तो कभी ईसा की शक्ति को आर्तो के अंदर समाहित करने का ख्याल करते। जीवन के अंतिम वर्षों में आर्तो बंदी बना लिए जाते हैं और लगभग नौ साल तक पागलखानों में इलाज के नाम पर बिना बेहोश किए बिजली के झटकों की यातना सहने पर मजबूर कर दिए जाते हैं। आर्तो ताउम्र अपने रंगमंच की खोज में लगे रहे। आर्तो अपने टूटे फूटे शब्दों में कहते हैं “मुझे मालूम है मेरा व्यवहार धीरे-धीरे खराब होता जा रहा है। मैं जब भी अपनी छड़ी का इस्तेमाल करता हूँ, मुझे अपने भीतर अयोग्यता और आत्मा में खालीपन का अनुभव होता है।”
आर्थर अदामव, मार्थ रॉबर्ट, ब्रेटो जूवे, ब्राक, पिकासो, गिआकोमेती, सार्त्र, सिमोन आदि के प्रयासों से आर्तो को पागलखाने से निकालकर एक निजी चिकित्सालय में रखा जाता है, जहाँ अपनी बची खुची उर्जा वो वॉनगॉफ के चित्रों के देखने के पश्चात एक महत्वपूर्ण आलेख लिखने में लगते हैं। 52 वर्ष की अवस्था में पीड़ा, यातना, अस्वीकार और अकेलपन से जर्जर हो गए आर्तो 4 मार्च 1948 को अपने पलंग के पास शांति से बैठे हुए पाए जाते हैं। यह मृत्यु और सुकून का आलिंगन था।
यह सबकुछ आर्तो का पागलपन था या वो कुछ कह रहे थे जिसे विश्वयुद्ध के दौरान कोई समझने को तैयार नहीं था ! आर्तो भौतिकता से आध्यात्मिकता, वास्तविकता से कल्पना की ओर उड़ान भरनेवाले जिस रंगमंच की परिकल्पना कर रहे थे उसके लिए शायद उस वक्त दर्शक और नाट्य समीक्षक तैयार नहीं थे। क्रूरता के रंगमंच के जनक के ऊपर क्रूरता के बावजूद विश्व रंगमंच के आकाश में आर्तो और उनका रंगमंचीय चिंतन आज एक ऐसी चमकती पहेली है जिन्हें सुलझाया और समझा जान अभी शेष है। 

Thursday, July 30, 2015

प्रगतिशील और क्रांतिकारी लोग गलती नहीं बल्कि ऐतिहासिक गलतियां करते हैं!

कार्ल मार्क्स ने प्रिय कवि के रूप में ग्रीक नाटककार और कवि एक्सकिलस, विश्वप्रसिद्ध अँगरेज़ कवि व नाटककार शेक्सपियर, और गेटे का नाम लिया और प्रिय गद्य लेखक के रूप में दिदारो का। फ्रेडरिक ऐंगल्स कवि के रूप में दे वोस, शेक्सपियर, आरिओस्टो और गद्यकार के रूप में गेटे, लेसिंग, ड़ॉ. जामेलसन का ज़िक्र करते हैं। लेकिन "भारतीय अति-क्रांतिकारियों" और "ज़रूरत से ज़्यादा प्रगतिशील" लोगों को इन सभी के अलावे वेद, पुराण, बुद्ध, महाबीर, तुलसी, कबीर, सूर, व्यास, वाल्मीकि, भास, शूद्रक, कालिदास, ग़ालिब, मीर, मोमिन, भारतेंदु, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि से बिना जाने, पढ़े, गुने ही लगभग नफ़रत है। वे इन्हें बुर्जुआ, यथास्थितवादि, सामंती मानसिकता से ग्रसित और पता नहीं किन किन मूर्खतापूर्ण उपाधियों से बिना पढ़े ही नवाज़ देते हैं। वो यदा कदा पाश, मुक्तिबोध, धूमिल, परसाई, गोरख पांडे आदि के नाम तो ले लेते हैं लेकिन यहाँ भी लगभग एहसानी मुद्रा ही अपनाए रहते हैं; जैसे इनके प्रमाणपत्र के बिना उपरोक्त लेखकों की सार्थकता ही मैली हो जाएंगीं। वैसे प्रमाणपत्र बाँटते इन महानुभावों को इनकी बस उन चार-चार पंक्तियों से ही स्नेह है जो यदा-कदा इन्हें अपनी बात को सही साबित करने के लिए कोट करने के काम आते हैं। उदाहरणार्थ - अब उठाने ही होंगें अभिव्यक्ति के खतरे। इन पंक्तियों के अलावा मुक्तिबोध आज भी इनके लिए अँधेरे में ही हैं।
अब ऐसे महाविद्वान लोग यदि पंडित रविशंकर और कलाम को सशर्त श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने का सहस करते भी हैं तो इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पंडित रविशंकर इनके लिए एक कलाकार नहीं बल्कि सामन्ती कला के पोषक हैं और कलाम एक वैज्ञानिक, शिक्षक और भारत के राष्ट्रपति नहीं बल्कि मिडिया द्वारा प्रसिद्द किया गया नाम यानी मिसाइल मैन हैं।
मार्क्स सादगी और एंगेल्स प्रफुल्लता को इंसान का मूल्यवान गुण मानते हैं लेकिन यह बेचारे अतिक्रान्तिकारी-प्रगतिशील अपनी मूढ़ता और अज्ञानता में ही प्रसन्न हैं। उनके लिए मार्क्स का यह कथन कि Nihil humani a me alienum puto (सब मानवीय गुण-अवगुण मेरे लिए पराए नहीं हैं।) और एंगेल्स का यह कथन का कि "सब सहजता से ग्रहण करो।" का कोई अर्थ नहीं रह गया है शायद।
अब इन्हें कौन बताए कि बिना मानवतावादी हुए न तो कोई क्रांतिकारी हो सकता है ना ही प्रगतिशील। समय निकालकर भगत सिंह को ही पढ़ लेते तो यह छोटी सी बात न जाने कब की समझ में आ जाती। वैसे इनसे सार्त्र, कामू आदि पढने की चाहत भी रखना मूर्खता का ही परिचायक है। इन्होंने मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ भी पढ़ा होगा और पढ़ा तो समझा भी होगा, इसपर मुझे गहरा संदेह हैं।
मार्क्स ने सही कहा है - De omnibus dubitandum (सब कुछ संदेह योग्य है।) लेकिन यह तो मार्क्स के भी पिताश्री हैं। कहते हैं "सबकुछ संदेह योग्य है सिवाए मार्क्सवाद के। शायद ऐसे ही मूढ़ों पर खिन्न होकर मार्क्स को कहना पड़ा था - यदि ऐसे है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ।
बाकि अन्य लकीर के फ़क़ीर पिटनेवाले विचारों और व्यक्तियों की पूजा करनेवालों के लिए क्या कहा जाय उनके लिए तो महामूर्खता और पिछलग्गूपना ही सबसे बड़ा संविधान और देशभक्ति का प्रमाणपत्र है। जो इनसे अलग सोचता है वो देशद्रोही है और उसे फ़ौरन ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए!
खैर, अब यह किससे कहा जाय कि आलोचनात्मक समीक्षा एक निहायत ही ज़रूरी चीज़ है लेकिन उसके लिए सही समय, काल, परिस्थिति आदि का चयन करना ज़रूरी है। एक सीनियर कॉमरेड ने किस्सा सुनाया था - चीन में जैसे ही क्रांति हुई लाल सेना ने "धर्म जनता का अफ़ीम है" नामक सूक्ति से प्रेरणा लेकर तमाम धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। अपने पूजा और पूज्यनीय स्थलों को ध्वस्त होते देख स्थानीय जनता लाल सेना के विरुद्ध प्रतिकार करने को खड़ी हो गई। यह बात जब माओ को पता चली तो उन्होंने फ़ौरन इन स्थलों को तोड़ने से यह कहते हुए रोका कि इन स्थलों में जनता का विश्वास है। पहले एक लंबी प्रक्रिया में इनके मन में बसी सदियों पुरानी मान्यतायों और विश्वास को ख़त्म करो। यदि हम यह करने में सफल हुए तो जनता खुद ही इन स्थलों को ध्वस्त कर देंगीं। और यदि हम ऐसा न कर सके तो जनता हमारे विरुद्ध खड़ी हो जाएगी।
इतिहास हमें सुन्दर भविष्य गढ़ने की शिक्षा देता है और अपनी गलतियों से प्रेरणा भी। लेकिन इसके लिए खुले दिल और दिमाग से अध्ययन करने की आवश्यकता है। मूर्खतापूर्ण व्यवहार और वक्तव्य सनसनी तो पैदा कर सकते हैं लेकिन शायद ही कोई सुन्दर और सार्थक बदलाव का सहयात्री बन सके।
पुनश्च - माओ के बारे में उपरोक्त किस्सा सुना सुनाया है। इसकी ऐतिहासिक सत्यता का दावा करने में तत्काल मैं असमर्थ हूँ।

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...