Wednesday, February 10, 2016

एच कन्हाईलाल को पद्मभूषण

एच कन्हाईलाल का पूरा नाम हैसनाम कन्हाईलाल है। इनका जन्म 17 जनवरी 1941 में कैसंथोंग थान्ग्जाम लाइरक इम्फाल में हुआ। सन 1969 में उन्होंने मणिपुर में कलाक्षेत्र की स्थापना की। उन्हें अब तक निर्देशन के लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान 1985, संगीत नाटक अकादमी रत्न पुरस्कार 2011 सहित पता नहीं कितने सम्मान मिल चुके हैं। इससे शायद ही किसी को इनकार हो कि आज एच कन्हाईलाल का नाम भारतीय रंगमंच का पर्याय बन चुका है।
2007 - 08 की बात है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से बतौर छात्र मैं और मेरे कुछ बैचमेट पढाई पूरी करने के पश्चात् राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में प्रशिच्क्षु (Apprentice) कलाकार के रूप में कार्यरत थे। रंगमंडल में प्रशिक्षुओं की स्थिति किसी मुहाजिर की तरह ही होती है, जो किसी देश में रहते हुए भी उस देश का शरणार्थी होता है। हमारी भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। हम शरणार्थियों के लिए रंगमंडल में तत्काल कोई योजना नहीं थी तो एच कन्हाईलाल को बुला लिया गया कि वो आएं और हमारे साथ “कुछ” काम करें। तीन साल के प्रशिक्षण के पश्चात् भी यह “कुछ” काम वाला तर्क हमारे गले से उतरना आसान नहीं था। लेकिन यह रंगमंडल हैं स्कूल नहीं। यहाँ विरोध का कोई स्थान नहीं है। हमें ऐसा लगा जैसे हमारी पढ़ाई तीन साल में खत्म नहीं हुई बल्कि चौथे साल में भी शुरू हो गई थी।
बहरहाल, कन्हाईलाल आए तो उनके साथ सावित्री जी और उनका पुत्र तोम्बा भी आए। तीनों ने हमारे साथ अभ्यास आरम्भ किया। तीनों व्यवहार में इतने सहज कि लगता ही नहीं था कि हम भारतीय रंगमंच के एक लिजेंड्री जोड़ी और परिवार के साथ काम कर रहे थे। कन्हाईलाल जी और सावित्री जी की जोड़ी को रंगमंचीय कलाकार की आदर्श जोड़ी है। दोनों एक दूसरे के पूरक जैसे ही हैं। कन्हाईलाल जी थ्योरी हैं तो सावित्री जी उस थ्योरी की व्यावहारिक आत्मा।
उन्होंने हमारे साथ कई सारे अभ्यास किए। अपनी रंगमंचीय तकनीक से अवगत करवाया और रंगमंचीय अभिनय को लेकर कई सारे जाले भी साफ़ किए। खोखली बौधिकता और जादुई शब्दावलियों से परे स्वतः और स्वभाविक मानवीय इंस्टिंक्ट को फिजिक्लाइज करना सिखाया। शुरू में हमें दिक्कत हुई क्योंकि आधुनिकता, विकास और बौद्धिकता के नाम पर हमने हमने इन्हीं चीज़ों का ही तो त्याग किया है। शारीरिक अभ्यास किए और शब्दों से ज़्यादा ध्वनियों पर काम किया। शुरूआती असफलताओं के बाद एक बार सूत्र पकड़ में आ गया और हमने "इसे ही रंगमंच कहते हैं" की बनी बनाई मान्यता को त्यागकर अपने को कन्हाईलाल जी के हवाले कर दिया तो फिर तो मज़ा ही मज़ा था। अभिनेता का शरीर ही उसका मूल अस्त्र है तो हमने सर्वप्रथम शरीर को साधना सीखा ताकि उससे संवेदना का सतत संचार हो सके। यह सब अभ्यास हमारे लिए बिलकुल भी नए थे ऐसा भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तीन वर्ष के पाठ्यक्रम में अभिनय के कई सारे रूप और प्रकार से परिचय तो प्राप्त हो ही जाता है।
कन्हाईलाल जी ने हमारे साथ कुछ डेमोस्ट्रेशन भी तैयार किया। वो चाहते थे कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के सामने इस डेमोस्ट्रेशन को प्रदर्शित करेगें ताकि कन्हाईलाल जी कैसे काम करते हैं यह समझ में आए और यह भी समझें कि उनके काम को तथाकथित शहरी रंगकर्मी भी आराम से आत्मसाथ कर सकते हैं जो यह कहके उनके काम को खारिज़ कर देते हैं कि उसके लिए एक खास प्रकार की ट्रेनिग की ज़रूरत है और उसे हर कोई नहीं अपना सकता। लेकिन डेमोस्ट्रेशन के दिन कोई भी नहीं आया - न कोई छात्र, न शिक्षक और ना ही कोई अन्य। किसी के भी पास इनके काम को देखने के लिए एक घंटा नहीं था। कन्हाईलाल और सावित्री जी इस बात से विचलित नहीं हुए बल्कि वो तो शायद यह जानते थे कि यही होनेवाला है। बहरहाल, उन्होंने हमें चाय समोसा की एक छोटी पार्टी और हमें खूब सारा प्यार दिया।
इस कार्यशाला के दौरान हमें उनके जीवन संघर्षों की गाथा सुनने का अवसर भी मिला। हम कभी दुखी, कभी आश्चर्यचकित भाव से उनकी कहानी सुनते रहे। मणिपुर जैसे राज्य में रहकर आज के खाऊ - पकाऊ और आत्ममुग्धता भरे दौर में कोई तो है जो जीवन के तमाम दुःख-सुख को आत्मसाथ करते हुए पूरी जीवटता, सहजता और लगन के साथ रंगमंच को न केवल खेलता है बल्कि जीता भी है।
यह तो सर्वविदित है कि कन्हाईलाल जी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र थे लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पुरी नहीं की। उसका सबसे बड़ा कारण भाषा तो था ही साथ ही साथ जो कुछ भी वहां पढ़ाया जा रहा था वह शायद उनके काम का ज़्यादा कुछ था नहीं। कुछ लोग इस घटनाक्रम को पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी जोड़ कर देखते हैं। असली करण चाहे जो भी ही किन्तु यह सच है कि स्थिति आज भी कुछ ज़्यादा बेहतर नहीं है। जो छात्र हिंदी भाषी नहीं होते वह कैसे धीरे – धीरे तनाव का शिकार होते हैं यह हम सबने खुद अपने बैच में महसूस किया है। अच्छे से अच्छा अभिनेता ठीक से हिंदी न बोल – समझ पाने से की वजह से कुंठाग्रस्त होने को अभिशप्त होते हैं क्योंकि राष्ट्रीय के नाम पर यहाँ आज भी अमूमन हिंदी का ही बोलबाला है।
कन्हाईलाल जी ने अपनी जीवन संगनी सावित्री जी के साथ मिलकर न केवल रंगमंच की अपनी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा खोजी बल्कि उसे किसी भी भाषा से ऊपर उठाकर समसामयिक और सार्थक भी बनाया। यह कहा जाय तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका रंगमंच किसी प्रकार के तड़क – भड़क से परे मूलतः अभिनेता – अभिनेत्री केंद्रित एक ग्लोबल रंगमंच है जहाँ भाषा से ज़्यादा भाव, भंगिमाओं, गतियों और ध्वनियों आदि जैसे वैश्विक चीज़ों का इस्तेमाल ज़्यादा है। इससे कथा का प्रवाह वाधित नहीं होता बल्कि वो और ज़्यादा व्यापक और वैश्विक होकर मुखर हो जाता है। यह वजह है कि कुछ लोग यह मानते हैं कि कन्हाईलाल जी जैसे लोगों का रंगमंच राष्ट्रीय रंगमंच है। एच कन्हाईलाल को वर्ष 2016 का पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा हुई है। वर्तमान सरकार और उसकी नीतियों से सहमति – असहमति के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एच कन्हाईलाल जैसे लोगों का सम्मान राष्ट्रीय रंगमंच का उचित सम्मान है। 

Sunday, January 31, 2016

रंगमंच पर भीष्म साहनी की लीला नंदलाल की

भीष्म साहनी की कहानी 'लीला नंदलाल की' का मंचन जब पटना के कालिदास रंगालय में हुआ तो दूसरे दिन एक प्रमुख अखबार में कमाल की पूर्वाग्रह भरी समीक्षा प्रकाशित हुई। प्रस्तुति के समाचार के बीच में अलग से एक कॉलम का शीर्षक था – ऐसी रही निर्देशक की लीला। आगे जो कुछ भी एफआईआर जैसा दर्ज़ था शब्दशः पेश कर रहा हूँ – “पटना : आज की प्रस्तुति में कुछ खास नज़र नहीं आया। एक दो पात्रों को छोड़कर सबकुछ अति-नाटकीय। कॉस्टयूम पर भी ध्यान नहीं दिया गया। प्रकाश व्यवस्था कामचलाऊ रही। रौशनी से कलाकार के कदम कभी आगे कभी पीछे। (अब रौशनी से कदम आगे पीछे कैसे होता है वह तो लिखनेवाला ही जाने।) ऐसा लगा जैसे नाटक की ग्राउंड रिहर्सल (जी हां, ग्राउंड रिहर्सल ही लिखा है ग्रैंड रिहर्सल नहीं।) भी नहीं कराई गई। लीला नन्दलाल की शीर्षक नाटक में जज को चलते फिरते दिखाया गया है। जबकि सब जानते हैं कि किसी भी अदालत में जज चलते फिरते सुनवाई नहीं करते। खैर कुछ भी हो कुछ न कुछ कमियां हर प्रोडक्शन में होतीं हैं। लोग कहते हैं, यह तो प्रयोग है। लेकिन ऐसे प्रयोग का क्या मतलब जो आसानी से हजम न हो। वह भी नामी-गिरामी नाट्य निर्देशक के चेलों की ओर से।”
अब समीक्षा का यह स्तर पढ़कर ठहाका लगाने के अलावा और किया भी क्या जा सकता है। हास्य, व्यंग्य, फार्स, छायावाद, यथार्थवाद आदि को एक ही तराजू से तोलनेवाले इन महान रंग-समीक्षकों की जय हो। वैसे भी समय का खेल ही कुछ ऐसा है कि पुर्वआग्रहपुर्ण निंदा या प्रसंशा को ही लोग समीक्षा मान बैठे हैं। अब ऐसे मूढ़ नाट्य-समीक्षक को कौन समझाए कि यदि कोई भी कला यथार्थ की नक़ल मात्र ही करे तो फिर उस कला की उपयोगिता ही क्या है। वैसे भी रंगमंचीय यथार्थ और यथार्थ जगत में फर्क होता है। बहरहाल, भीष्म साहनी की इस कहानी से मेरा जुड़ाव कुछ दूसरे किस्म का भी रहा है। इसे भावनात्मक जुडाव भी कहा जा सकता है। सन 1997 की बात है। महाजन जिस रास्ते चलें सही रास्ता वही है की तर्ज़ पर देश भर में, खासकर हिंदी प्रदेशों में कहानी मंचन की धूम मची थी। अभिव्यक्ति नामक जिस नाट्य दल के साथ मैंने पटना के नुक्कडों पर नाटक करना शुरू किया था उससे किसी कारणवश मोह भंग हो चुका था। मैं अब एक नए और ऐसे ठिकाने की तलाश था; जहाँ रहकर रंगमंच की बारीकियां सीख सकूँ। यह ठिकाना बना विजय कुमार द्वारा संचालित मंच आर्ट ग्रुप। विजय कुमार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) से प्रशिक्षित थे। हालांकि उस वक्त मैं रानावि के अस्तित्व से पुरी तरह अपरिचित था। मेरी मुलाकात विजय कुमार से हुई और उन्होंने मुझे दूसरे दिन प्रेमचंद रंगशाला आने को कहा। नाटक का पूर्वाभ्यास उस वक्त खंडहरनुमा प्रेमचंद रंगशाला में हो रहा था। मंच आर्ट ग्रुप के बैनर तले विजय कुमार के निर्देशन में भीष्म साहनी की इस कहानी का पूर्वाभ्यास शुरू हुआ। मैं पुरे नाटक में मंच पर ही रहता था किन्तु केवल एक ही संवाद बोलता था, वो भी जैसे-तैसे। इस प्रस्तुति ने ही मेरे वास्ते पटना रंगमंच के तथाकथित मुख्यधारा में प्रवेश का द्वारा खोला इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
छः साल बाद पुनः एक मौका मिला कि भीष्म साहनी की कोई रचना को मैं निर्देशित करूँ। इन छः सालों के दरमियां मैंने दस्तक नाम से अपना नाट्य दल गठित कर नाटकों को निर्देशित करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही उक्त दिनों मैं पटना के विभिन्न नाट्यदलों के साथ ही साथ प्रसिद्द नाट्य निर्देशक संजय उपाध्याय द्वारा संचालित निर्माण कला मंच से भी जुड़ा था और भीष्म साहनी कौन हैं इस बात से अब अपरिचित भी नहीं था। सन 2003 का साल था। इसी वर्ष 11 जुलाई को भीष्म साहनी का निधन हुआ था। इसलिए तय हुआ कि इन्हें श्रधांजलि देने के लिए निर्माण कला मंच से जुड़े तीन लोग इनकी तीन कहानियों का एक सेट तैयार करेंगें जिसका मंचन निर्माण कला मंच की पन्द्रवीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित होने वाले वार्षिकोत्सव’03 में किया जाएगा। इसीलिए शारदा सिंह ने चीफ़ की दावत, प्रशांत कुमार ने अमृतसर आ गया और मैंने लीला नंदलाल की नामक कहानी का चयन किया। अब मेरा यह चयन महज एक संयोग तो नहीं ही हो सकता है। वैसे भी जिस कहानी की एक छोटी सी भूमिका से मैंने पटना रंगमंच पर अपनी मंचीय यात्रा शुरू की थी आज उसी कहानी को निर्देशित करना एक रोमांचक अनुभव होने वाला था। वैसे मुझे इनकी यह कहानी आज भी बेहद प्रिय है और यदि मौका मिले तो इसे बार-बार अलग-अलग तरीके से निर्देशित भी करना चाहूँगा। वैसे पटना में ही इनके नाटक कबीरा खड़ा बाज़ार में, हानूश और माधवी का सफल मंचन देखने का अवसर मिल चुका था और इनकी अन्य रचनाएं जैसे मुआबज़े, तमस, मय्यादास की माड़ी आदि पढ़ भी चुका था।
तो आखिर क्या खास है इस कहानी में? यह कहानी स्कूटर चोरी जैसी एक अति साधारण सी प्रतीत होनेवाली घटना के माध्यम से किस-किस की खबर नहीं लेती। परिवार, समाज, कानून-व्यस्था आदि आदि। तो किस्सा यह कि एक व्यक्ति का स्कूटर चोरी हो जाता है। फ़ौरन पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने के पश्चात् जब यह बात वो अपने घरवालों को बताता है तो घरवाले इस घटना के लिए उसे ही ज़िम्मेदार मानते हैं। फिर शुरू होता है बीमा कंपनी और पुलिस का चक्कर। पुलिसवाले इस मामले को पहले तो टालते हैं फिर पैरवी लगाने के पश्चात् थोड़ा भाव देते हैं। स्कूटर की तलाश शुरू होती है। पता चलता है कि एक बाड़े में कई अन्य वाहनों के साथ स्कूटर रखा हुआ है। वो व्यक्ति बाड़े में जाता है तो वहां उसकी मुलाकात दयाराम नामक वाहन चोर से होता है। दयाराम को अपने कृत्य पर शर्म नहीं बल्कि गर्व है। फिर शुरू होता है पुलिस, कोर्ट का ऐसे घुमावदार चक्कर जिसके भंवर में फंसकर सब सफ़ेद वालों के मालिक हो जाते हैं और स्कूटर पेशी दर पेशी पेश होता हुआ एक खटारा में तबदील हो जाता है। पर पेशियों का सिलसिला बदस्तूर कायम है।
इस कथा के माध्यम से भीष्म साहनी ने हल्के-फुल्के हास्य के द्वारा क्या एक गंभीर कथा नहीं कहते हैं? यह कहानी इस बात का घोतक भी नहीं है कि वे एक ऐसे गंभीर लेखक हैं जिनकी पकड़ हास्य-व्यंग नामक विधा पर भी है? वैसे यह एक बहुत ही गलत मान्यता है कि हास्य-व्यंग्य एक गंभीर विषय नहीं है।
कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि को बिना उसके फॉर्म में कोई बदलाव किए मंचित करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। क्योंकि इनकी रचना व्यक्तिगत पाठ के लिए होता है सामूहिक प्रदर्शन के लिए नहीं। कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से साक्षात्कार करती है जबकि नाट्य-प्रदर्शन एक सामूहिक कला है। यहाँ लेखक के लिखे शब्दों को निर्देशक और परिकल्पक के निर्देशों और परिकल्पनाओं को आत्मसाथ करते हुए अभिनेता दर्शक समूह के लिए एक सामुहिक कला का सृजन कर रहा होता है। इसलिए कह सकते हैं कि जब कोई नाट्य-दल या निर्देशक कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि को मंचित करने का निर्णय लेता है तो वह चीज़ों को व्यक्तिगत से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रूप का रूपांतरण कर रहा होता है। वैसे भी मेरी रूचि हमेशा से ही लिखे-लिखाए नाटकों से ज़्यादा कविता, कहानियों, उपन्यासों को मंच पर उतारने में रही है। बहुत अच्छे से लिखा नाटक अपने आप ही एक दायरा बनाता है और मुझे दायरे पसंद नहीं।
लीला नंदलाल की कहानी को मंच पर रूपांतरित करते हुए सबसे पहली इस बात का ध्यान रखना था कि यह मेरे द्वारा पूर्व में अभिनीत प्रस्तुति की कार्बन कॉपी ना हो और दूसरी बात यह कि हमें केवल कहानी का पाठ नहीं करना बल्कि ऐसे नाटकीय दृश्यबंध भी तैयार करने हैं जो प्रस्तुति को नाटकीयता और भव्यता दोनों ही प्रदान करे। फिर बहुत दिनों से मन में पॉपुलर एलिमेंट्स को नाटक में प्रयोग करने की भी दिली इच्छा थी। जिसे विद्वानों द्वारा क्लिशे कहा जाता है। मन में बार-बार यह प्रश्न उमड़ता-घुमड़ता रहता कि क्या क्लिशे के सावधानी पूर्वक प्रयोग से कोई सार्थक नाट्य प्रस्तुति नहीं गढ़ी जा सकती है। आखिरकार हमने अभिनेताओं के दल के साथ इसका प्रयोग शुरू किया। चंद ही रोज़ में परिणाम भी आने लगा। नायक अपनी पत्नी को स्कूटर पर बैठता है। पत्नी बड़े प्यार से नायक को देखती है और बैकग्राउंड में किशोर दा का गाना बजने लगता है – कोर कागज़ था ये मन मेरा। कहानी स्कूटर की थी तो मंच पर स्कूटर के साथ ही साथ कई अन्य दोपहिया वाहनों का प्रयोग किया गया। कुछ फ़िल्मी और प्राइवेट एलबम के गाने भी जोड़े गए और उन गानों पर कहानी के अनुरूप ही व्यंगात्मक दृश्यबंध तैयार किया गया। विलेन की इंट्री पर पूरा फ़िल्मी माहौल भी बनाया गया – सफ़ेद सूट, छिला हुआ सिर, मंच पर धुँआ और बैकग्राउंड में विलेनियाँ संगीत। कुल मिलाकर यह स्वयं मेरे और मेरे अभिनेताओं लिए एक अनूठा अनुभव था और शायद दर्शकों के लिए भी। यही हमारी भीष्म साहनी को श्रधांजलि भी। आज इस प्रस्तुति को याद करते हुए इसके मुख्य अभिनेता प्रवीण की याद बार-बार आ जाती है जिसकी निर्मम हत्या उसके ही मोहल्ले के कुछ सडक छाप गुंडों ने बेवजह ही कर दिया था।

भीष्म साहनी अर्थात एक ऐसा नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार जिन्हें किसी भी एक बने बनाए सांचे में नहीं डाला जा सकता। इनसे जुड़ी एक और इच्छा जो कई सालों से मेरे अभिनेता मन में पल रही है है वो यह कि इनके नाटक नाटक कबीरा खड़ा बाज़ार में मैं कबीर की भूमिका का करूँ। यह इच्छा मुझ जैसे न जाने कितने अभिनेताओं के दिलों पर आज भी राज कर रहा होगा। हां, यह अलग से कहने की ज़रूरत नहीं है कि आज के समय में भीष्म साहनी जैसे रचनाकार की उपयोगिता पहले से कहीं ज़्यादा है। इनकी रचनाओं को बार-बार पढ़ा-पढ़ाया, समझा-समझाया जाय, इनके नाटकों, कहानियों, उपन्यासों का बार-बार मंचन किया जाय, यही इस रचनाकार के प्रति हमारी सच्ची श्रधांजलि होगी।

Friday, January 29, 2016

हिंदी रंगमंच और महाभोज


हाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा, इसकी मुझे और सजा मिलेगी  । – अंधेरे में, मुक्तिबोध
हिंदी रंगमंच के सन्दर्भ में एक बात जो साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है वो यह कि वह ज़्यादातर समकालीन सवालों और चुनौतियों से आंख चुराने में ही अपनी भलाई देखता है । नाटक यदि समकालीन सवालों को उठता भी है तो उसकी पृष्ठभूमि या पात्र अमूमन इतिहास के पन्नों से निकलके सामने आते हैं और आम बोल-चाल की भाषा के बजाय हिंदी की पंडिताई भाषा और परिवेश से सराबोर होते हैं । नकली एतिहासिकता का चोला धारण किए और दादा की बात पोते से करनेवाले ऐसे नाटक आधुनिक नाटक क्यों कहे जाते हैं और समकालीन भारतीय हिंदी रंगमंच और रंगकर्मी समकालीन सवालों और चरित्रों का सीधा-सीधा साक्षात्कार करने से परहेज़ क्यों करते हैं? यह सवाल एक बार आधुनिक भारतीय नाटक पढानेवाले से पूछा तो टका सा जवाब मिला कि “नाटक एक “कला” है, कोई अखबार की कतरन नहीं कि घटना हुई नहीं कि उसे मंच पर प्रस्तुत कर दिया जाय ।” इस जवाब से संतुष्ट होना संभव नहीं । यह निश्चित रूप से सवाल का सही जवाब नहीं है । यदि होता तो विश्व के प्रसिद्द नॉबेल पुरस्कार विजेता नाटककार दरियो फ़ो यह न कहते  – “एक रंगमंचीय, एक साहित्यिक, एक कलात्मक अभिव्यक्ति जो अपने समय के लिए नहीं बोलती, उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है ।” 
हिंदी रंगमंच सदा ही समकालीन सवालों से कतराता रहता है, ऐसा कहना भी निश्चित रूप से एक अतिशयोक्ति ही होगी । यह समस्या ज़्यादातर तथाकथित मुख्यधारा, महानगरीय और अकादमिक रंगमंच वाले स्थानों की है । कारकों की पड़ताल की जाय तो इसका एक मुख्य कारक जो समझ में आता है वो यह कि वैचारिक शून्यता से सराबोर हिंदी रंगमंच कुछ अपवादों को छोड़कर अमूमन आज भी एक परजीवी के रूप में ही जीवित और सामाजिक सरोकार से लगभग दूर है । वहीं लोग भी यही मानते हैं या उन्हें यह मनवा दिया गया है कि नाटक, फिल्म, संगीत, नृत्य आदि का कार्य मनोरंजन मात्र है । कलावाद का भी एक समृद्ध और स्वयम्भू इतिहास रहा है, तो इस इतिहास के मोह से निकलना भी उतना आसान भी नहीं । समकालीन सवालों से सीधे साक्षात्कार का अर्थ है जलते अंगारों पर हाथ रखना, अपने लिए और अपनों के लिए चुनौतियों और जिम्मेदारियों का दामन थामना । हो सकता है इन सबके लिए रंगकर्मी और समाज तैयार ना हो । किन्तु सभी ऐसे नहीं हैं । रंगकर्मियों का एक वर्ग रंगमंच को केवल एक कला मात्र नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सांस्कृतिक हथियार भी मानता है । यह बात अलग है कि इन रंगकर्मियों की स्थिति भी आज निराशाजनक ही है । फिर भी मंच पर समय-समय पर समकालीन सवाल पूरी कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ प्रकट हुए और यह परम्परा आज भी कमोवेश बनी हुई है । इन अभिव्यक्तियों को रंगकर्मियों, दर्शकों और नाट्य-समीक्षकों का अपार स्नेह भी हासिल हुआ । मन्नू भंडारी का नाटक महाभोज समकालीन सवालों और जलते अंगारों को छूने की एक ऐसी ही कोशिश थी/है । 
आज़ादी के जश्न का भोज खत्म हो चुका था । गांधीवाद अनुकरणीय कम, पूजनीय ज़्यादा की उपाधि प्राप्त कर चुका था, साम्यवादी गलियारे या तो कांग्रेस के दरवाज़े पर जाकर खत्म हो जा रहे थे या फिर बारूद के गोदाम में, देश आपातकाल का स्वाद चख रहा था । कई गणमान्य चेहरों से नकाब उतर चुके थे और सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर एक नए किस्म की अराजकता ने अपना पासा फेंक दिया था । मतलब कि महाभोज की पृष्ठभूमि तैयार थी ।  
मन्नू भंडारी लिखित महाभोज पहले उपन्यास के रूप में छपा ततपश्चात नाटक के रूप में आया । यह हिंदी साहित्य की शायद एकमात्र कृति है जो उपन्यास और नाटक दोनों ही रूपों में मंच पर सफलतापूर्वक मंचित हुआ । प्रसिद्द नाट्य निर्देशक और कहानी का रंगमंच नामक विधा के प्रणेता के रूप में विख्यात देवेन्द्र राज अंकुर ने इसे अपने नाट्यदल के साथ उपन्यास के रूप में मंचित किया तो अमाल अलाना के निर्देशन में पहली बार इसे नाटक के रूप में खेला गया । तत्पश्चात देश के कई प्रसिद्द नाट्य निर्देशकों ने भी इसे नाटक के रूप में मंचित किया । लगभग तीस प्रमुख पात्रों और ग्यारह दृश्यों में समाहित इस नाटक को हिंदी प्रदेश में शायद ही ऐसा कोई नाट्य केंद्र हो जहां मंचन न हुआ हो । बिहार की राजधानी और हिंदी रंगमंच का एक प्रमुख केन्द्र पटना में इसका एक मंचन सन 1984 में इप्टा के बैनर तले परवेज़ अख्तर के निर्देशन में भारतीय नृत्य कला मंदिर के मुक्ताकाशी मंच पर हुआ था । जिसका इतिहास आज भी बिहार रंगमंच पन्नों और दर्शकों की स्मृतियों में अंकित है । उस प्रस्तुति में दा साहब की भूमिका निभानेवाले चर्चित रंगमंच और फिल्म अभिनेता विनीत कुमार बताते हैं – “वह हिंदी रंगमंच के महानगरीय संस्करण का स्वर्णिम काल था । देश की राजधानी समेत कई अन्य शहरों में रंगमंच अपने जूनून के घोड़े पर सवार हो पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा था । पटना के अलग अलग नाट्यदलों के लगभग 80 अभिनेता इस नाटक में कार्यरत थे । भारतीय नृत्य कला मंदिर के मुक्ताकाश मंच पर विशाल सेट लगाया गया था । मैं खुद जोराबर की भूमिका करना चाहता था लेकिन निर्देशक ने दा साहेब की भूमिका के लिए चयन किया । वैसे इस नाटक के हर चरित्र का अपना एक अलग ही महत्व और सुर है । दा साहेब की भूमिका करते हुए मैंने पाया कि यह चरित्र कठोर से कठोरतम बात भी कोमल स्वर में बोलता है, केवल एक स्थान पर इसका स्वर तीब्र या शुद्ध लगता है । इस नाटक के एक साथ कुल पांच या छः मंचन हुए और सबके सब शो हाउसफुल । जैसे पूरा शहर ही नाटक देखने उमड़ पड़ा हो ।”   
महाभोज नामक यह उपन्यास नाटक का रूप धरकर बेहद चर्चित, सुदृढ़ और सार्थक हुआ । सरोहा नामक गांव की पृष्टभूमि और बिसू की हत्या की विसात पर बिछी इस नाटक की कथा में वर्णित दा साहेब, जमना बहन, जोराबर, बिंदा, रूक्मा, महेश, थानेदार, दत्ता बाबू, सुकुल बाबू, नरोत्तम, सक्सेना, हीरा आदि चरित्र हिंदी रंगमंच के अग्रणी चरित्रों में से एक हैं, जिन्हें अभिनीत करते हुए कोई भी अभिनेता गौरवान्वित महसूस करता है । नई रंगचेतना और हिंदी नाटककार नामक पुस्तक में रंगचिन्तक जयदेव तनेजा लिखते हैं -  “समकालीन जीवन और परिवेश को विविध स्तरों पर प्रामाणिक और निर्धारित करनेवाले सत्ता व्यवस्था के ऊपर से भोले एवं मासूम किन्तु भीतर से क्रूर और घिनौने चेहरे को निर्ममता से बेनकाब करनेवाला सुप्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी का स्थिति प्रधान राजनैतिक उपन्यास महाभोज नाट्य रूपांतरित एवं अभिमंचित होकर अभूतपूर्व चर्चा का विषय बना ।”
लेखिका मूलतः नाटककार नहीं हैं । निश्चित ही नाट्य निर्देशिका अमाल अलाना और महाभोज को मंच पर पहली बार प्रस्तुत करनेवाली नाट्यदल ने नाट्य लेखन में भी भरपूर सहयोग और सलाह दिए होंगें । इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि नाटक एक सामूहिक कला है । यहाँ हर प्रकार का सृजन समूह में आकर ही अंतिम आकार लेता है । एक सामूहिक कला निश्चित रूप से एक दूसरे के सार्थक सहयोग से ऊर्जा और दिशा ग्रहण करता है । नाट्यालेख नाट्य-प्रस्तुति का मूल-आधार है और कोई भी नाट्य रचना दर्शकों के समक्ष मंच पर प्रदर्शित होकर ही अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त होती है । इसलिए नए नाट्यालेख को एक कुशल और मंचीय आकार बनने के लिए निर्देशक, अभिनेता व अन्य लोगों का सार्थक सहयोग एक अनिवार्य शर्त भी बन जाती है । यह सहयोग निश्चित ही मन्नू भंडारी को मिला और परिणामस्वरूप भारतीय नाट्य साहित्य को महाभोज नामक एक अनुपम और निहायत ही ज़रूरी रचना की जन्म हुआ । जिसे देखना, पढ़ना, सुनना केवल रोचक और कलात्मक ही नहीं बल्कि सत्य से साक्षात्कार और एक तकलीफ़देह अनुभूति भी है । इस अनुभूति के बीज भारतीय व्यवस्था के अंदर ही प्रमुखता से मौजूद हैं और आज तो और भी बेशर्मी की हद तक मुखर हो गए हैं । अभिनेता विनीत कुमार कहते हैं – “अब तो दा साहब नामक चरित्र भारतीय राजनीति में खत्म से ही हो गए हैं, अब जिधर देखिए उधर जोराबर राज कर रहे हैं ।”
महाभोज का बीज सूत्र 1977 में घटित बिहार के पटना जिले का बेलछी नरसंहार है । इस नरसंहार में दर्जन भर से ज़्यादा लोगों की निर्मम हत्या की गई थी । कुछ लोगों को ज़िंदा तक जला दिया गया था । यह अंग्रेजों से आज़ादी के बाद दूसरा सबसे बड़ा नरसंहार था । यह वही काल था जब इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने पराजय झेली थी और बिहार में 1974 के आंदोलन के फलस्वरूप जनता पार्टी की सरकार बनी थी । लेखिका ने बेलछी की इस घटना की रिपोर्ट किसी अख़बार में पढ़ी और महाभोज नामक उपन्यास के बीज उनके मन में अंकुरित होने लगे । वैसे, बेलछी की इस घटना के कई संस्करण हैं । सम्पूर्ण क्रांति के समर्थक इसे जनता पार्टी की सरकार को बदनाम करने की साजिश के तौर पर देखते हैं, तो जानकार बताते हैं कि यह दरअसल राजनीतिक शह प्राप्त दो आपराधिक गुटों की आपसी रंजिश का नतीज़ा था जिसे एक राजनीतिक स्वार्थ के तहत दलित संहार के रूप में भी प्रचारित किया गया । वहीं यह घटना इंदिरा गांधी की अति-नाटकीय बेलछी यात्रा के लिए भी इतिहास में दर्ज़ है, जहाँ श्रीमती गांधी हाथी पर सवार होकर नरसंहार पीडितों के दुःख दर्द बांटने गईं थी । कुल मिलाकर इतना तो कहा जा सकता है कि यह भारत की आजादी के सपनों से मोहभंग, कानून और न्याय व्यवस्था के पतन, सत्ता और व्यवस्था का अपराधीकरण और लोकतंत्र के चौथे खम्भे के शर्मनाक तरीके से चरमराने का काल था । व्यवस्था क्रूरता और अमानवीयता का एक से एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही थी और जनता केवल वोटर मात्र के रूप में परिणित हो जाने को अभिशप्त कर दिए गए थे । यही बात मन्नू भंडारी के उपन्यास और नाटक के मूल में है । एक ऐसे समय में महाभोज नामक इस कृति का आना अपने आपमें एक सुखद घटना थी । ब्रेख्त के शब्दों को थोड़ा फेरबदल करके कहा जाय तो यह अंधेरे समय में, अंधरे के बारे में गीत था । मन्नू भंडारी की यह कृति भारतीय रंगमंच में एक एतिहासिक महत्व की परिघटना है, लेकिन दुखद सच यह है कि नाटक में वर्णित स्थितियां-परिस्थितियां सुधरने के बजाय कहने, सुनने, देखने, समझने की तमाम सीमाओं को पार कर शर्मनाक रूप से क्रूर से क्रूरतम रूप धारण कर आज ज़रूरत से ज़्यादा खतरनाक और अराजक हो गई हैं । यह ऐसा समय है जब देशभक्ति की परिभाषाएँ बदल दी गई हैं । एक से एक आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक घोटालों और नैतिक पतनों पर फ़ाइल के फ़ाइल भरे पड़े हैं । मूर्खता और उदंडता ने हमारी मौन स्वीकृति के फलस्वरूप क्रूरतापूर्वक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है और मानवता और लोकतंत्र बिसू की लाश के रूप में परिणत होने को अभिशप्त बना दी गई हैं । ऐसे समय में महाभोज जैसी कृति का महत्व और ज़्यादा भी ज़्यादा बढ़ जाता है ।

Friday, January 15, 2016

धूमिल की पटकथा की रंगमंचीय प्रस्तुति

दस्तक की प्रस्तुति सुदामा पांडेय धूमिल लिखित
पटकथा
आशुतोष अभिज्ञ का एकल अभिनय
प्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमार
ध्वनि संचालन – आकाश कुमार
पोस्टर/ब्रोशर – प्रदीप्त मिश्रा
पूर्वाभ्यास प्रभारी – रानू बाबू
प्रकाश परिकल्पना – पुंज प्रकाश
सहयोग –  हरिशंकर रवि, राहुल कुमार, राग, विश्वा, बिहार आर्ट थियेटर व पटना के तमाम रंगकर्मी.
परिकल्पना व निर्देशन - पुंज प्रकाश

पटकथा के बारे में
पटकथा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लंबी कविताओं में से एक है जो आम अवाम के सपने, देश की आज़ादी और उसके सपनों के बिखराव की पड़ताल करती है। देश की आज़ादी से देश आम आवाम ने भी कुछ सपने पाल रखे थे किन्तु उनके सपने पुरे से ज़्यादा अधूरे रह गए। अब अपनी ही चुनी सरकार कभी क्षेत्रीय हित, साम्प्रदायिकता, तो कभी धर्म, भाषा, सुरक्षा, तो कभी लुभावने जुमलों के नाम पर लोगों और उनके सपनों का दोहन कर रही है। इस कविता के माध्यम से धूमिल व्यवस्था के इसी शोषण चक्र को उजागर करने के साथ ही लोगो को नया सोचने, समझने तथा विचारयुक्त होकर सामाजिक विसंगतियो को दूर करने की प्रेरणा भी देते हैं। कहा जा सकता है कि पटकथा प्रजातंत्र के नाम पर खुली भिन्न – भिन्न प्रकार के बेवफाई की बेरहम दुकानों से मोहभंग और कुछ नया रचने के आह्वान की कविता है। यह कविता बेरहमी, बेदर्दी और बेबाकी से कई धाराओं और विचारधाराओं और उसके नाम के माला जाप करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का काम करती है; वहीं आम आदमी की अज्ञानता-युक्त शराफत भरी कायरता पर भी क्रूरता पूर्वक सवाल करती है।
नाट्य दल के बारे में
रंगकर्मियों को सृजनात्मक, सकारात्मक माहौल एवं रंगप्रेमियों को सार्थक, सृजनात्मक और उद्देश्यपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने के उद्देश्य से “दस्तक” की स्थापना सन 2 दिसम्बर 2002 को हुई। दस्तक ने अब तक मेरे सपने वापस करो (संजय कुंदन की कहानी), गुजरात (गुजरात दंगे पर आधारित विभिन्न कवियों की कविताओं पर आधारित नाटक), करप्शन जिंदाबाद, हाय सपना रे (मेगुअल द सर्वानते के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास Don Quixote पर आधारित नाटक), राम सजीवन की प्रेम कथा (उदय प्रकाश की कहानी), एक लड़की पांच दीवाने (हरिशंकर परसाई की कहानी), एक और दुर्घटना (दरियो फ़ो लिखित नाटक) आदि नाटकों का कुशलतापूर्वक मंचन किया है।
दस्तक का उद्देश्य केवल नाटकों का मंचन करना ही नहीं बल्कि कलाकारों के शारीरिक, बौधिक व कलात्मक स्तर को परिष्कृत करना और नाट्यप्रेमियों तक समसामयिक और सार्थक रचनाओं की नाट्य प्रस्तुति प्रस्तुत करना भी है। रंगमंच एवं विभिन्न कला माध्यमों पर आधारित ब्लॉग मंडली का भी संचालन दस्तक द्वारा किया जाता है।
लेखक के बारे में
धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था। उनका मूल नाम सुदामा पांडेय था। सन् 1958 में आईटीआई (वाराणसी) से विद्युत डिप्लोमा लेकर वे वहीं विद्युत अनुदेशक बन गये। 38 वर्ष की अल्पायु मे ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई। मरणोपरांत उन्हें 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
धूमिल हिंदी की समकालीन कविता के दौर के मील के पत्थर सरीखे कवियों में एक है। उनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। व्यवस्था जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य है।
सन 1960 के बाद की हिंदी कविता में जिस मोहभंग की शुरूआत हुई थी, धूमिल उसकी अभिव्यक्ति करने वाले अंत्यत प्रभावशाली कवि है। उनकी कविता में परंपरा, सभ्यता, सुरुचि, शालीनता और भद्रता का विरोध है, क्योंकि इन सबकी आड़ में जो हृदय पलता है, उसे धूमिल पहचानते हैं। कवि धूमिल यह भी जानते हैं कि व्यवस्था अपनी रक्षा के लिये इन सबका उपयोग करती है, इसलिये वे इन सबका विरोध करते हैं। इस विरोध के कारण उनकी कविता में एक प्रकार की आक्रमकता मिलती है। किंतु उससे उनकी कविता की प्रभावशीलता बढती है। धूमिल अकविता आन्दोलन के प्रमुख कवियों में से एक हैं। वो अपनी कविता के माध्यम से एक ऐसी काव्य भाषा विकसित करते है जो नई कविता के दौर की काव्य- भाषा की रुमानियत, अतिशय कल्पनाशीलता और जटिल बिंबधर्मिता से मुक्त है। उनकी भाषा काव्य-सत्य को जीवन सत्य के अधिकाधिक निकट लाती है। इनके कुल तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हैं - संसद से सड़क तक, कल सुनना मुझे और सुदामा पांडे का प्रजातंत्र।
अभिनेता के बारे में 
आशुतोष अभिज्ञ; पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र विषय में ऑनर्स और पिछले लगभग सात वर्षों से नाट्य अभिनय के क्षेत्र में कार्यरत हैं। इस अवधी में इन्होने अब तक कई शौकिया और व्यावसायिक नाट्य दलों के साथ अभिनय किया। रंगमंच के क्षेत्र में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2008-10 का यंग आर्टिस्ट स्कॉलरशिप अवार्ड से भी सम्मानित। इनके द्वारा अभिनीत उल्लेखनीय नाटकों में रोमियो जूलियट और अंधेरा, होली, डाकघर, जहाजी, बाबूजी, दुलारी बाई, हमज़मीन, निमोछिया, एन इवनिंग ट्री, अगली शताब्दी में प्यार का रिहर्सल, बेबी, उसने कहा था, नटमेठिया आदि प्रमुख हैं।
निर्देशक के बारे में
सन 1994 से रंगमंच के क्षेत्र में लगातार सक्रिय अभिनेता, निर्देशक, लेखक, अभिनय प्रशिक्षक। मगध विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में ऑनर्स। नाट्यदल दस्तक के संस्थापक सदस्य। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के सत्र 2004 – 07 में अभिनय विषय में विशेषज्ञता। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में सन 2007-12 तक बतौर अभिनेता कार्यरत। अब तक देश के कई प्रतिष्ठित अभिनेताओं, रंगकर्मियों के साथ कार्य। एक और दुर्घटना, मरणोपरांत, एक था गधा, अंधेर नगरी, ये आदमी ये चूहे, मेरे सपने वापस करो, गुजरात, हाय सपना रे, लीला नंदलाल की, राम सजीवन की प्रेमकथा, पॉल गोमरा का स्कूटर, चरणदास चोर, जो रात हमने गुजारी मरके आदि नाट्य प्रस्तुतियों का निर्देशन तथा कई नाटकों की प्रकाश परिकल्पना, रूप सज्जा एवं संगीत निर्देशन। कृशन चंदर के उपन्यास दादर पुल के बच्चे, महाश्वेता देवी का उपन्यास बनिया बहू, फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास परती परिकथा एवं कहानी तीसरी कसम व रसप्रिया पर आधारित नाटक तीसरी कसम, संजीव के उपन्यास सूत्रधार, भिखारी ठाकुर रचनावली, कबीर के निर्गुण, रामचरितमानस को आधार बनाकर भिखारी ठाकुर के जीवन व रचनाकर्म पर आधारित नाटक नटमेठिया सहित मौलिक नाटक भूख और विंडो उर्फ़ खिड़की जो बंद रहती है का लेखन।
देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं मे रंगमंच, फिल्म व अन्य सामाजिक विषयों पर लेखों के प्रकाशन के साथ ही साथ कहानियों और कविताओं का भी लेखन व प्रकाशन। वर्तमान में रंगमंच की कुरीतियों पर आधारित व्यंग्य पुस्तक आधुनिक नाट्यशास्त्र उर्फ़ रंगमंच की आखिरी किताब की रचना सहित कई नाटकों के अभिनय में व्यस्त हैं। रंगमंच सहित विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक विषयों पर आधारी डायरी (www.daayari.bolgspot.com) नामक ब्लॉग के ब्लॉगर और पठन – पाठन और लेखन में विशेष रूचि रखनेवाले एक स्वतंत्र, यायावर रंगकर्मी, लेखक व अभिनय प्रशिक्षक के रूप में सतत कार्यरत हैं।
निर्देशकीय - पटकथा के बहाने
हिंदी रंगमंच में ग्रुप थियेटर पतन के साथ ही साथ सिखाने सिखाने की समृद्ध परंपरा का भी सबसे ज़्यादा ह्रास हुआ है। विभिन्न प्रकार के महोत्सवों ने एक ओर जहाँ नाटकों की प्रस्तुति की संख्या में इजाफा तो किया है लेकिन एक खास प्रकार का गणित भी रचा है, जिसमें नाटक एक उत्पाद के रूप में विकसित हो रहा है और निर्देशक प्रबंधक के रूप में परिवर्तित होने को भी अभिशप्त हुआ है। नाटकों का आदान प्रदान भी शुरू हुआ है और निर्देशक यात्रा को ध्यान में रखकर भी नाटकों की परिकल्पना करने लगे हैं। वहीं अब लोगों के पास अभिनेता को प्रशिक्षित करने का समय नहीं है। वहीं ऐसे अभिनेताओं की पुरी की पुरी जामत इकठ्ठा हो गई है जो सीखने सीखाने के बजाय खाने कमाने को ज़्यादा तबज्जो देते हैं।
सवाल यह कि एक पेशेवर परिकल्पक और निर्देशक अभिनेता प्रशिक्षण में अपना वक्त जाया क्यों करे? क्या यह उसका काम है? बिलकुल नहीं। फिर ग्रुप थियेटर तो है नहीं कि संस्थाओं के सदस्य होगें और वही इस समूह के नाटकों में अभिनय करेंगें। अब निर्देशक या परिकल्पक अपनी ज़रूरत के अनुसार अभिनेताओं को जमा करता और नाटक रूपी एक प्रोडक्ट तैयार करता है। ऐसे समय में अभिनय प्रशिक्षण का काम निश्चित रूप से अनुभवी अभिनेताओं और अभिनय प्रशिक्षकों को ही करना चाहिए क्योंकि इस तथाकथित पेशेवर समय में परिकल्पक और निर्देशक अभिनय और उससे जुडी समस्याओं के जानकार हों, यह ज़रूरी नहीं। वैसे भी जिसका जो कार्य है उसे ही वह शोभता है; और फिर इस बात से इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि अभिनय प्रशिक्षण अपने आपमें एक अलग और बृहद विषय है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमने अभिनेता के साथ अलग से कार्य करना शुरू किया और योजना बनाई कि जो भी अभिनेता सीखने सिखाने की परंपरा में विश्वास रखता हो और पूरी लग्न और मेहनत से रंगमंच की बारीकियां समझने को तत्पर हो, उनके साथ कार्य किया जाय। इसी सोच की परिणति है यह प्रस्तुति। यहाँ प्रस्तुति की सफलता असफलता से ज्यादा महत्व निश्चित रूप से प्रक्रिया की है; कम से कम हमारे लिए तो है ही।
एक कवि ह्रदय अक्खड़ व्यक्ति और वर्तमान राजनितिक परिवेश की विडम्बनाओं को प्रतिविम्बित करता हिंदी के प्रसिद्द कवि धूमिल लिखित इस चर्चित कविता को केवल एक अभिनेता के साथ प्रस्तुत करना निश्चित ही एक दुरूह कार्य है। लेकिन मज़ा तो न सध पाने वाली बातों को ही साधने में है। हमने तो अपनी बुद्दी, विवेक और समझ से इसकी लगाम साधते और कलात्मक चुनौतियों का सामना करते हुए भरपूर पीड़ादायक आनंद और तनावपूर्ण रचनाशीलता का मज़ा लिया। उम्मीद है यह अनुभूति आप तक भी पहुंचे। बहरहाल, महीनों समझने, बुझने, गुनने और पसीना बहाने के पश्चात् जो कुछ भी बन पड़ा अब आपके समक्ष प्रस्तुत है। हाँ एक बात तो निश्चित है कि “मनोरंजन” मात्र हमारा उदेश्य को कदापि नहीं है। प्रस्तुति के उद्देश्य को समझकर अपने विवेक से निर्णय करना आपका अधिकार है और सदा रहेगा। 

Saturday, December 26, 2015

सत्ता, संस्कृति और जनवाद की संस्कृति

सत्ता, संघर्ष और मानव संस्कृति का इतिहास भी लगभग विश्व इतिहास के जितना ही पुराना है। आज का मानव समाज जहाँ खड़ा है वह विभिन्न एतिहासिक कालों और संघर्षों से श्रम के सहारे ही गुज़रकर इस मुकाम पर पहुंचा है। इतिहास की पुस्तकों में इसे अलग – अलग नामों से पढ़ाया भी जाता है। अलग - अलग कालों में सत्ता और संस्कृति की अच्छाई, बुराई और चुनौतियाँ अलग – अलग रहीं हैं। लेकिन कथित या तथाकथित रूप से सत्ता से आम जन का सीधा – सीधा जुड़ाव प्रजातंत्र नामक व्यवस्था के उपरांत ही देखने को मिलता है। वही सत्ता की संस्कृति और आम जन की संस्कृति का मेल-मिलाप और विभिन्न प्रकार के विरोधाभास भी सामने आते है। वहीं वामपंथ के आगमन के साथ ही जनवादी संस्कृति जैसे शब्द भी सुनाई पड़ने लगता है और यह मान्यता भी प्रखर रूप से सामने आती है कि असली जनवादी संस्कृति अक्सर सत्ता के विरोध या विपक्ष का काम करती है।
प्रसिद्द नाट्य चिन्तक नेमिचंद्र जैन का “सत्ता और संस्कृति” नामक एक आलेख है। यह आलेख सभी संस्कृतिकर्मियों को ज़रूर पढ़ना चाहिए और खासकर उनको जो यह मानते हैं कि कला, संस्कृति, साहित्य आदि स्वभाव से ही सत्ता विरोधी होते हैं; और असली संस्कृति वही है जिसका मूल चरित्र सत्ता विरोधी हो। वहीं ऐसी मान्यता वालों की भी कोई कमी नहीं जो यह मानते हैं कि सत्ता का हस्तक्षेप या संरक्षण कला-संस्कृति को अनिवार्य रूप से भ्रष्ट करता है इसलिए संस्कृतिकर्मी या कलाकार को सत्ता से कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए; कला साहित्य की पवित्रता की रक्षा के लिए यह एकदम ज़रूरी है। तो कुछ लोग यह भी मानते हैं कि समाज में दो संस्कृतियाँ होती हैं - एक सत्ताधारी अर्थात शोषक वर्ग की और दूसरी क्रांतिकारी अर्थात शोषित वर्ग की और असली संस्कृति वही है जो सत्ताधारी वर्ग और उसकी संस्कृति से निरंतर संघर्ष करके शोषित वर्ग की सत्ता और संस्कृति की स्थापना में हाथ बंटाती है। नेमिचंद्र जैन इन सारी बातों का तर्क और उदाहरणों के साथ खंडन करते हैं और इन मान्यताओं को मानने वालों को कोरा भावुक, चतुर, सतही, भोला या पाखंडी मानते हैं क्योंकि इन बातों में एतिहासिक सच्चाई नहीं है। यदि यह सच होता तो विश्व इतिहास के उन महान लेखकों – कलाकारों का तो वजूद ही नहीं होना चाहिए था जो सामंतवाद काल में और सत्ता के नजदीक रहकर एक से एक महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं।   
वर्तमान में भी सरकारी संस्थानों और उससे मिलनेवाले सहयोगों के लेकर खुद को जनवादी संस्कृति के वाहक मानने वाले समूहों और लोगों में एक खास किस्म का हिकारत का भाव है। वहीं सरकारी नौकरियां करनेवाले से इन्हें कोई परहेज़ नहीं। ऐसे लोग इन समूहों के न केवल सदस्य हैं बल्कि बड़े-बड़े पदों पर भी विराजमान हैं। लेकिन यहाँ भी शायद पदाधिकारियों और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अलग-अलग नियमावली हैं। लिखित रूप में न सही व्याहारिक रूप में तो हैं हीं। वैसे भी इन समूहों में जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है उनकी स्थिति निहायत ही दैनीय ही है और वो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कार्यकर्ताओं के दबंगई को सहना पड़ता है।
ऐसे ही एक समूह के एक सदस्य ने नाटक के लिए सरकारी ग्रांट लिया तो उसको दल से निकालने तक के लिए बैठक पर बैठक की जाने लगी जबकि उसकी खस्ता माली हालत पर ज़िम्मेवारी तो दूर, किसी ने उस विषय पर तनिक भी चिंता करना तक ज़रुरी नहीं समझा। नेमीचंद जैन कहते हैं – “इस मामले में वामपंथियों का रवैया पूरी तरह से दोमुंहा है। एक ओर वे संस्कृति को स्वभाव से सत्ता - विरोधी माननेवालों के साथ बड़े उत्साह से शामिल होते हैं और दूसरी ओर वो अपनी (और अपने जैसों – लेखक) सरकारों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समर्थक हैं।”
अब तो कई सारे जनवादी संस्कृति के वाहक दल और व्यक्ति NGO के रूप में परिवर्तित हो गए हैं। एक तरफ सरकारी और अन्य गैरसरकारी माध्यमों से मोटी रकम उठा रहे हैं वहीं मौके बे-मौके जनवाद का ढोल भी बजाते रहते हैं। नुक्कड़ नाटक विधा में विशेषज्ञता की वजह से प्रचार-प्रसार के लिए कई सारे सरकारी और गैर कंपनियों का काम भी इन्हें आसानी से मिल जाते हैं। दुखद सच तो यह भी है कि जनवाद के कुछ ठेकेदार कई शहरों और गांव में दलाली नामक नई “जनवादी” विधा के सबसे बड़े पैरोकार भी बनकर उभरें हैं। यह उनकी आर्थिक मजबूरी हो सकती है लेकिन मजबूरियां संविधान नहीं हो सकतीं।
नेमिचंद्र जैन सवाल करते हैं कि “संस्कृति और सत्ता के सम्बन्ध को लेकर सस्ती जुमलेबाज़ी करने से पहले हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम सचमुच चाहते हैं कि सरकार ने जो सांस्कृतिक संस्थान स्थापित किए हैं, उन्हें बंद कर दिया जाय और संस्कृति के क्षेत्र में कोई साधन सुलभ न कराए?” सत्ता के बारे में वह लिखते हैं कि “निस्संदेह, सत्ता हाथ में आने पर सत्ताधारी अनेक बार उसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने लगते हैं, स्वार्थ साधन में लग जाते हैं, या निरंकुश होकर सत्ता की स्थापना के मूल उद्देश्य को ही नष्ट करने लगते हैं। ऐसी हालत में उससे हटाकर सत्ता की कोई दूसरी व्यवस्था आवश्यक हो जाती है। --- जो भी सत्ता मौजूद हो, उसकी ज़िम्मेदारी और एक गैर ज़िम्मेदार सत्ता को बदलने की ज़रूरत के बीच फर्क करना बहुत ही आवश्यक है। यह न कर सकने से ही बहुत से खोखले विचार और नारे पैदा होते हैं।”
लेख के आखिर में वो लिखते हैं कि “अगर संस्कृति को सत्ता का पिछलगुआ बनना धातक है तो उतना ही आत्मघाती है उसे किसी राजनैतिक पार्टी, कार्यक्रम या विचारधारा का पिछलगुआ बनाना। यह एक विडम्बना ही है कि अपने आपको वैज्ञानिक चिंतन के हामी माननेवाले भी इस तरह के ढोंगी दोमुहें आचरण तथा वैचारिक खोखलेपन से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाते।”
अब थोड़ी सी पड़ताल जनवाद भी किया ही जाना चाहिए। जन का क्या अर्थ होता है? क्या जन का अर्थ केवल मेहनकश वर्ग है? तो क्या बाकि लोग जन नहीं हैं? यह समूह जब ब्रेख्त के नाटकों का मंचन करते हैं तो वह जनवादी नाटक हो जाता है और कोई और करे तो कलावादी! यह दोहरापन एक पाखंड नहीं तो और क्या है? जनता और जनवाद की इनकी व्याख्या एक खास प्रकार की संकीर्णता युक्त नहीं तो और क्या है? इनकी संकीर्णता का आलम तो यह है कि यह वाद्यों तक को सामंती और सर्वहारा बना देते हैं। मसलन सितार सामंती मानसिकता का परिचायक है और नगाडा जनवादी मानसिकता का। सितार से जो ध्वनि निकलती है वह सामंतवाद की ध्वनि होती है और नगाड़े से निकलने वाली जनवाद की? ऐसी मान्यताओं वाले लोग खुद तो हास्यास्पद होते ही हैं और अपने साथ उस वैज्ञानिक विचारधारा को भी हास्यास्पद बना देते हैं जो हज़ारों फूलों को खिलने दो जैसा सिद्धांत मानता है।
जहाँ तक सवाल कला और साहित्य है तो उसके लिए प्रसिद्द नाटककार दरियो फ़ो का यह कथा ही काफी है कि “एक रंगमंचीय, एक साहित्यिक, एक कलात्मक अभिव्यक्ति जो अपने समय के लिए नहीं बोलती, उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।” फ़ो के इस कथन में क्या जनवादिता नहीं है?
अपने माथे पर किसी फलाने वाद का तमगा भर लगा लेने से कोई जनवादी और प्रासंगिक नहीं हो जाता? जनवाद और प्रासंगिकता एक गंभीर और व्यापक विषय है। अ-गंभीर, संकीर्ण, मूढ़ और स्वार्थी लोगों को केवल अपने और अपनों का फ़ायदा नुकसान दिखता है। वो अगर जन और जनवाद की बात करते भी हैं तो यह उनका केवल एक छलावा मात्र है। ऐसे लोग न केवल जन और जनवाद के कट्टर और सबसे बड़े शत्रु हैं बल्कि उस विचार को भी संकीर्ण कर देते हैं जिन्हें मानने का दंभ ये भरते हैं।     

Sunday, December 6, 2015

कम्युनिस्ट पार्टियां कभी ऐसा भी करतीं थीं, अब पता नहीं!

एक पुरानी भारतीय कहावत है कि पैसा अपने साथ बहुत सारी बुराइयों को भी लाता है। एक समय ऐसा भी था जब बिहार के कम्युनिस्ट पार्टियों के पास पैसा था ही नहीं। लेवी और विभिन्न प्रकार के टेक्स लेने का पेशा अभी शुरू नहीं हुआ था। कैडरों की ईमानदार, प्रतिबद्धता और जूनून और मेहनतकश जनता की एकता और अपने नेता पर उनका विश्वास ही उनकी कुल जमा पूंजी थी। आज का हाल तो खैर सबको पता है ही।
तो उसी ईमानदार काल का एक किस्सा कुछ यूं है – किसी इलाके के में पर्चा छपना था। पहले पर्चे का ड्राफ्ट तैयार किया गया। उस ड्राफ्ट को कुछ लोगों के बीच (जिनमें ग्रामीण ज़्यादा थे, नेता एक या दो) पढ़ा गया। फिर जो सुधार लोगों ने सुझाया उसे ठीक लगने पर दुरुस्त किया गया। फिर गाँव में चंदा किया गया। गांव क्या था कुछ झोपड़ियों से सुशोभित दलितों की बस्ती थी। रोज़ कुआँ खोदना और रोज़ पानी पीना यही उनकी ज़िंदगी थी। तो ऐसी बस्ती में चंदे के रूप में नगदी की कल्पना तो किया ही नहीं जा सकता है। वहां चंदे के रूप में वह अनाज ही मिलता जो औरत, मर्द रोज़ कमाकर या मेहनत से कमाए पैसे से खरीदकर लाते थे।
हम बच्चों को यह ज़िम्मेवारी मिलती थी कि कई प्रकार का झोला लेकर शाम के समय बस्ती में दरवाज़े दरवाज़े जाते और लोग उसमें अपनी मुट्ठी से चावल, दाल, आंटा आदि चीजें डालते। फिर उसको दूकान में बेचा जाता और उससे जो पैसा मिलता उससे पर्चा छप के आता। पर्चा जब छपकर हाथ में आता तो वह किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं होता।
पर्चा चुकी बहुत ही कम छप पता था तो हर गांव के हिस्से कुछ दर्जन पर्चे ही आते; जिसे लोग किसी अमानत की तरह संभालकर पढ़ते। अमूमन कोशिश यह किया जाता कि शाम में सबको बुलाकर यह पर्चा पढ़कर सुनाया जाय और बाकि पर्चे को बांटने के काम में लाया जाय। फिर भी कुछ लोग ऐसे थे जो अपने हाथों से पढ़ते। जो पढ़ सकते थे खुद पढ़ते और जो नहीं पढ़ सकते थे वो हम जैसे किसी बच्चे को पकड़कर पढ़वाते और बीच-बीच में हां-हूँ करते रहते। कहीं कुछ नहीं समझ में आने पर उस पंक्ति को बार-बार पढ़वाते। जब पर्चा पढ़ लिया जाता तो उसे किसी और को पढ़ने के लिए सौंप दिया जाता।
उस काल में कोई पर्चा फेंका हुआ पा लिया जाना एक बहुत बड़ी घटना थी और ऐसी घटनाएं शायद ही कभी हुईं।
केवल पर्चा ही नहीं बल्कि बैनर और पोस्टर भी ऐसे ही बनाए जाते। कूट (गत्ता) पर सदा कागज़ चिपकाया जाता और उस पर दातुन की कुंची बनाकर नारे लिखे जाते और उसे बांस के फट्ठे या किसी सीधे डंडे में किसी पतली रस्सी की सहायता से बड़ी ही सफाई से बंधा जाता।
बैनर के लिए लाल कपड़ा और एल्युम्युनियम पेंट का छोटा सा डब्बा ख़रीदा जाता और उसे अपने हाथों से बनाया जाता। दीवाल लेखन भी कुछ ऐसे ही होता था। टीन के छोटे-छोटे डब्बे में होली में इस्तेमाल होने वाले रंगों को थोड़ा गढा मिलाया जाता और उसे बबूल के दातून की कुंची बनाकर दीवाल पर लिखा जाता।
अब तो पर्चा कौन लिखता है, कैसे छपता है और कब बाँट दिया जाता है, किसी को कुछ पता ही नहीं चलता। बैनर, पोस्टर तो अब प्रोफेशनल ही बनाते हैं। सबकुछ एक रहस्य की तरह हो गया है। पर्चे पर वाद-विवाद तो अब दूर की बात है। लेकिन यह परम्परा हार जगह से खत्म हो गई है; ऐसा भी नहीं है। खैर, सन 1985 से 95 के बीच घटित यह पुरी घटना सुनाने के पीछे मेरा स्वार्थ केवल इतना है कि इस पुरे प्रकरण से ही मैंने पेंट और ब्रश से लिखना (कैलीग्राफी) सीखा और आज तो काफ़ी ठीक-ठाक लिख लेता हूँ। मैंने अपने नाटकों में भी मैंने अपनी इस कला का खूब इस्तेमाल किया। शुक्रिया कॉमरेड्स और जनता। 

Friday, December 4, 2015

कोठागोई : यथार्थ का किस्सागोई

संगीत और कला को जब-जब बाँधने की कोशिश की जाती है वह बाँध तोड़कर आगे बढ़ जाती है । - कोठागोई 

अपने अंदर बृहद कालखंड समेटे वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रभात रंजन की किताब कोठगोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से) एक ही बैठकी में पढ़ी जानेवाली एक ज़रुरी रचना है । समाज और समाजिकता के स्याह और धूसर पन्नों के इतिहास और किस्सागोई में लेखक की विभिन्न लोगों से साक्षात्कारों, गप्पों, स्मृतियों और तमाम इन्द्रियों के सहारे गोते लगाती यह एक सामाजिक विज्ञान की पुस्तक भी बन जाती है । जिसमें इतिहास का स्याह और सफ़ेद अध्याय है, किस्सा है, कहानी है, गप्प है, गल्प है, उपन्यास है, निबन्ध है, कवित्त है, गीत है, आत्मकथा है, संस्मरण आदि है । तो मूल बात यह कि इस पुस्तक को किस स्थापित श्रेणी में रखा जाय ? शायद कहीं नहीं या शायद हर जगह । वैसे भी कुछ चीज़ें और कुछ इंसान ऐसे होते हैं जो बने बनाए किसी भी खांचे और सांचे में फिट नहीं बैठते । वैसे सच कहूँ तो मेरे व्यक्तिगत अनुभव और समझ उतनी उन्नत भी नहीं है कि इसे किसी खांचे में डालके पैक कर दूँ । और फिर लोक इतिहास यथार्थ और कल्पना के सटीक मेल से ही तो बनता है; नहीं क्या ? यह सुनी, सुनाई और इस सुनने सुनाने से बनाई गई कथागोई है । “जितनी उसने सुनाई थी, जितनी मैंने उसके सुनाए से बनाई थी ।” – (कोठागोई, पृष्ठ – 169) क्या इसे ही रिसर्च वर्क कहा जाता है ? यदि नहीं तो किसे कहा जाएगा  ?
वैसे पुस्तक की जड़ में मुज़फ्फरपुर (बिहार) का चतुर्भुज स्थान तो है लेकिन यहाँ मन में आनेवाले विचारों की तरह उन्मुक्त फैलाव भी है । जिसमें “अंधेरे-उजाले के बीच संगीत इबादत से पहले !”, “सुना गुना समझा जाना बुना !”, “ज़िंदगी उस पार जितनी ज़िंदगी उस पार है”, “गुमनाम कवि बदनाम गायिका, बाकि बाजत रसनचौकी”, “इज्ज़त उसे मिली जो वतन से निकल गया”, “दर्द का किस्सा यार बहुत है”, “पढ़ कर आगे जाना है अपना दाग मिटाना है”, “दर मिला मुझको दरबदर होकर”, “ब्लू कलर का पैंट पहनकर हैंड कमर में लाती हो”, “दुनियां दुनियां जीवन जीवन”, “अंतिम प्रणाम लोक देवता को”, आखिरी बात आदि कुल तेरह शीर्षकों के सहारे किस्से स्वतंत्र, रोचक और सहज तरीके से विचरण करते है; बिलकुल दादी, नानी और लोक कथाओं के कहानियों की तरह । यहाँ कथा है तो कथा कि परिकथा और उपकथा भी । कला है तो नंगा और क्रूर यथार्थ भी है, विषय है तो विषयान्तर भी, “विषय के नाम पर विषयान्तर, कथा के नाम पर कथान्तर !” (कोठागोई, पृष्ठ – 96), या “क्या कीजिएगा विषय के नाम पर विषयान्तर हो ही जाता है ।” (कोठागोई, पृष्ठ - 73) कई स्थान पर तो एक ही कथा के कई वर्जन भी हैं । बिलकुल वैसे ही जैसे एक ही घटना पर अलग-अलग व्यक्ति का वर्जन थोड़ा अलग होता है । सच्चाई, सहजता और यथार्थ भी तो यही है । यथार्थ के धरातल पर भी सच है तो उसमें कल्पना का मिश्रण भी कम नहीं । तो फिर ? सच-झूठ से ज़्यादा ज़रूरी नज़रिया हो जाता है । नजरिया समझ, अनुभव और ज्ञान से ही बनता है; तब जब दिल-दिमाग खुले हों और मन में सवाल उत्पन्न होते हों, दिल में बैचैनी का घर हो । साधारण जीवन जीना और बने बनाए ढर्रे पर रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह चलते चले जाना मुश्किल हो सकता है, मज़ेदार तो कतई नहीं है । ठीक वैसे ही जैसे कान तो सबके पास होते ही हैं लेकिन सब “कनरसिया” नहीं होते । वैसे यहाँ कथाओं का अंत गुमनाम है या फिर अंत के कई किस्से ।
साधारण जिंदगियों की कहानियां भी बड़ी ही साधारण होतीं हैं । शायद जीवन भी अति साधारण ही होता होगा । चुनौतियों का क्या, वो तो हर किसी की सहयात्री होती ही हैं । अलग-अलग रुतवे के लोग अपनी अलग-अलग ज़रूरतों के लिए अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं । इसमें कोई खास बात नहीं । तो  ? कहानियां होती हैं उनकी जो दुनियां के बीच रहकर भी कुछ अलग जीते हैं । अब यह जीवन खुशी से स्वीकारते हैं या मज़बूरी से यह बात और है । वैसे भी मनपसंद जीवन जीने का मौका और ज़ज्बा मिलाता ही कितने लोगों को है  ?
किस्सागोई एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है गाने-बजाने, सीखने-सीखने, सुनने-सुनाने, गुनने-गुनाने, बेचने-खरीदने, प्रसिद्धि और फिर गुमनामी के अंधेरे कोने में दफ़न हो जाने को अभिशप्त ना जाने कितने लोगों और संस्कृतियों का । लेकिन जैसा की प्रामाणिक सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह से कभी खत्म नहीं होता, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है । यह बदलाव अच्छा भी हो सकता है और अच्छा नहीं भी हो सकता है । बदलाव के बहुत से कारक होते हैं – सांस्कृतिक, एतिहासिक, आर्थिक, राजनैतिक और पता नहीं क्या क्या ! बदलाव कभी अंदरूनी होता है तो कभी बाहरी, लेकिन दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित तो करते हैं, इस तथ्य से कैसे इनकार किया जा सकता है । इस प्रकार कोठागोई चतुर्भुज स्थान की स्थापना से लेकर और न जाने कितने किस्से समेटते हुए उसके उत्थान-पतन की भी कथा कहता है ।
कोठागोई इस पुस्तक के लिए एकदम अनुकूल शीर्षक है । भाषाशास्त्री, भोलानाथ तिवारी, “शब्दों का जीवन” नामक पुस्तक में लिखते हैं – “शब्द जनमते हैं । जी हां, शब्द जनमते हैं । नयी घटनाएँ, नए विचार, नयी परम्पराएं, नयी वस्तु, प्रायः नए शब्द को जन्म देते हैं । पाकिस्तानियों ने 1965 में भारत में घुस-पैठ की और हिंदी में ‘घुस-पैठिया’ शब्द ने जन्म लिया । विभिन्न प्रलोभनों ने हमारे विधायकों को दल बदलने को मजबूर किया जिसका परिणाम था ‘दलबदलू’ शब्द का जन्म ।” कोठों का किस्सा सुनाने के लिए लेखक ने किस्सागोई नामक शब्द से प्रेरणा लेकर कोठागोई नामक शब्द की रचना की होगी या क्या पता यह शब्द पहले से प्रचलन में हो । लेकिन क्या कोठागोई केवल कोठे के किस्से तक ही सीमित है । नहीं, हरगिज़ नहीं । कथा का सूत्र किसी बरगद की जड़ की तरह चतुर्भुज स्थान से होकर ना जाने कितने देस-परदेस तक का सफ़र तय कर विभिन्न जाने अनजाने चरित्रों और घटनाओं के माध्यम से शब्दों के मार्फ़त अपनी यात्रा तय करता है ।
कोठागोई का किस्सा सूत्रधारात्मक (Narrative) है सदियों पुरानी प्रथा किस्सागोई की तरह । जिसका सूत्रधार निश्चित रूप से लेखक ही हैं । हलांकि यह भी विश्वास से कहना उचित नहीं होगा । हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि किस्से लेखक के मार्फ़त ही आते हैं । अब लो यह भी कोई बात हुई, किस्से लेखक के मार्फ़त ही तो आएंगें ना ! खैर, पुस्तक के शुरुआत ही में लेखक ने यह दावा पेश किया है कि “मैं चतुर्भुज की शपथ लेकर कहता हूँ कि इस पुस्तक में जो लिखा है सब झूठ है । इसमें झूठ के सिवा कुछ नहीं है ।” यह बड़ा अटपटा है । दरअसल, लेखक का यह कथन ही इस पुस्तक का सबसे बड़ा झूठ है । वही कुछ और विचार पुस्तक में बार-बार अन्य-अन्य तरीके से दुहराए जाते हैं जो निश्चित ही उपरोक्त कथन की बार-बार पुष्टिकरण ही करते हैं । वो भी इतनी बार की कई बार तो इस पुष्टिकरण पर ही संदेह होने लगता है । किसी ने सच ही कहा है कि इंसान एक बार झूठ का सहारा ले ले तो उसे बरकरार रखने के लिए बार-बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है और हो सकता है कि अगला झूठ पिछले झूठ से बड़ा झूठ हो । इस प्रक्रिया में भय यह रहता है कि झूठ का एक बड़ा पुलिंदा ही न बन जाए । लेकिन इंसान की बात अलग है और लेखक की अलग । लेखक झूठ में सच और सच में झूठ की मिलावट न करे तो शायद कोई किस्सा ही न बने । इसी को नाट्यशास्त्र में भरतमुनि कथावस्तु (Plot) कहते हैं । जिसके तीन श्रोत होते हैं - प्रख्यात यानि किसी प्रसिद्द कथा को विषय बनाकर लिखा गया । उत्पाध यानि किसी काल्पनिक कथा वस्तु को आधार बनाकर लिखा गया । मिश्रित यानि प्रसिद्ध तथा काल्पनिक कथा वस्तु को मिलाकर लिखा गया । हालाकिं भरतमुनि यह बात नाटक के सन्दर्भ में कह रहे हैं लेकिन क्या कथा, कहानियों व उपन्यासों आदि का भी सच यही या इसी के आसपास नहीं है ? वैसे “सच - झूठ होता क्या है ? अपना अपना नज़रिया है । --- जो हमें अच्छा लगता है हम उसे सच मान लेते हैं । --- सच असल में कुछ होता नहीं, अपने-अपने सोच की सुविधा होती है ।” (कोठागोई, पृष्ट - 57)
तो क्या कोठागोई का सच फार्स और काल्पनिकता है ? नहीं, हरगिज़ नहीं ! बल्कि यहाँ रचनात्मक सच है । भारतीय परम्परा में जिसे काव्यात्मक सच (Poetic Truth) कहा गया है । यह सच झूठ से परे एक विश्वास है । जिसकी अन्तःप्रेरणा है कथ्य । इसी कथ्य को अभिव्यक्त करने के लिए रचनाकार रचनात्मक सच रचता है । इसे सच नहीं, सच का एहसास (Sense of Truth) कहें तो ज़्यादा बेहतर होगा । यहाँ पाठ नहीं बल्कि समय, काल, स्थिति और परिवेश आदि ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं । यहाँ जितना इतिहास है उतना ही गप्प भी । जितना सच लगभग उतनी ही गल्प । निरा गप्प भी नहीं बल्कि चुन-चुनकर सजाया हुआ, इतिहास के पन्नों से निकाला और कुरेदा हुआ गप्प । जिसके केन्द्र में हैं एक पूरी की पूरी कला और पल-पल बदलता, टूटता, बिखरता और समृद्ध होता या तबाह होता नंगा यथार्थ । सामाजिक मान्यताओं ने जिसे बदनाम का नाम दे रखा था लेकिन उसका रस भी इसी समाज ने जम के चूसा और जब सारा गूदा खत्म हो गया तो आम की गुठली की मानिंद चतुर्भुज स्थान से बाहर फेंक दिया और किसी नए मनबहलाव की खोज में व्यस्त हो गया । वैसे कुछ आमों की किस्मत में चूसा जाना भी नहीं होता बल्कि वो वही पड़े-पड़े कुढ़ते-खीजते और अंततः कुम्हलाते हुए किसी अंधेरे कोने में गुम हो जाते हैं; तो कुछ चुसे जाने के बाद ज़मीन के सहारे एक नया पौधा बन जीवन प्राप्त करते हैं । यह सच है कोई हैरत की बात नहीं । वैसे भी “जब यथार्थ ही इतना अविश्वसनीय हो चला हो तो ऐसे में किसी भी बात पर हैरत नहीं होना चाहिए ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 184)
कोठागोई, कोठे के मार्फ़त समाज की कथा कहता है । इसे ऐसे भी कहें तो गलत नहीं कि कोठागोई समाज के मार्फ़त कोठे की कथा कहता है । या फिर इसे यूं भी कहा जा सकता है कि कोठागोई कथाएँ कहता है जिसमें इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान, कोठा, सांस्कृतिक परम्परा, कला, देह, रुतबा, रूपया आदि और पता नहीं क्या-क्या समाहित होता जाता है । नहीं; इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि कोठागोई एक पेड़ है जिसकी जड़ तो एक है, लेकिन कई टहनियाँ हैं और अनगिनत नए, पुराने, सूखे, हरियाते, गिरे तुड़े पत्ते हैं ।
बाकी इस किताब के बारे में और क्या-क्या और लिखा जाना चाहिए मुझे नहीं पता । निश्चित रूप से इस पुस्तक में भी कई छेद होंगे ही, होने भी चाहिए । सम्पूर्ण तो आजतक कुछ हुआ ही नहीं है । लेकिन अभी तो इसके पहले प्यार में अभिभूत हूँ और प्यार जब नया नया होता है तो बस खुमारी ही खुमारी होती है । वहां कमजोरियों और बेतुकेपन पर भी प्यार ही आता है । जैसे प्रूफ की गडबड़ी के कारण शारदा सिन्हा, शारदा सिंह हो जाती हैं । अच्छा, क्या यह बात हमारे समय की सच्चाई बन चुकी है कि अब अच्छे प्रूफ रीडर बहुत ही कम हैं और प्रकाशकों ने लेखक को ही यह सारा काम करने को अभिशप्त कर दिया है ? वही एकाध जगह नैरेशन में अंगेजी के शब्दों का प्रयोग भी खटकता है । लेकिन यह सब छोटी-मोटी बातें हैं जिसे अगले संस्करण (यदि छपा तो !) में आराम से दुरुस्त किया जा सकता है ।
कोठागोई गुमनाम जगहों और लोगों का किस्सा है । जो काल्पनिक नहीं बल्कि यथार्थ है – नंगा यथार्थ । हम इसे स्वीकारें न स्वीकारें यह अलग बात है । वैसे भी “शाम होते ही मर्द बाहर निकल आते हैं और घर बाज़ार बन जाते हैं । दिन में वे घर होते हैं, पुरुष होते हैं, बच्चे होते हैं, शाम को बस बाज़ार । कुछ खरीदार होते हैं, कुछ तफरीहदार ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 91) सच यह है कि दुनियां बाज़ार में तेज़ी से तबदील होती जा रही है और इंसान उपभोक्ता के रूप में परिवर्तित होने को अभिशप्त । लेकिन इस सच को स्वीकारने के लिए बहुत कम लोग तैयार है । अब यह अज्ञानता है, अनभिज्ञता, तटस्था, अक्खड़ता, अहम् या कुछ और या सब कुछ, या कुछ भी नहीं; कौन जाने  ? बहरहाल –
शोहरत-वोहरत इज्ज़त-विज्जत जिसको चाहे मिल जाये
चादर-वादर दौलत-वौलत जिसको चाहे मिल जाए
सच्चे फनकारों को कदरदां हर टेशन पर मिल जाए
बाकि तो सब फाव की दौलत जिसको चाहे मिल जाए
तो अंत में बस इतना ही कि कोठागोई पढ़िए और मेरी लिखी सारी बातों को सिरे से ख़ारिज कर दीजिए मुझे ज़रा भी दुःख नहीं होगा – सच्ची-मुच्ची । चतुर्भुज स्थान की कसम । लेकिन बिना पढ़े खारिज़ करेंगें तो किसी का भला नहीं होनेवाला, आपका भी नहीं । वैसे लगे हाथ यह भी बता ही दूँ कि कसम उसम पर मेरा कोई यकीन नहीं है । वैसे भी “जीवन के उमंग से जगानेवाली आवाज़ें कभी अमर नहीं होतीं । उनका मरना ही उनकी नियति है शायद । जिनका कोई नाम नहीं होता उनका गुम हो जाना ही उनकी नियति होती है । हम बस खोज सकते हैं । उनको जो गुम हो गए ।” (कोठागोई, पृष्ठ – 65)

कोठागोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से), लेखक – प्रभात रंजन, प्रकाशक – वाणी प्रकाशन, मूल्य 295 रुपया  
                                                       पाखी में प्रकाशित 

दमा दम मस्त कलंदर

आज सुबह-सुबह वडाली ब्रदर्स का गाया हुआ दमा दम मस्त कलंदर सुन रहा था. गाने के दौरान उन्होंने फ़कीर मस्त कलंदर से जुड़ा एक अद्भुत किस्से का ...